Monday, 9 February 2026

KV कुटीर में महोत्सव: यह 'विश्वास' का युग है

आज से 100-200 साल बाद जब कभी हिंदी 'कवि सम्मेलन संस्थान' की विकासगाथा पर चर्चा होगी, तब हिंदी का विद्यार्थी पूर्ण गर्वानुभूति के साथ कहेगा कि मंचीय कविता को मात्र लोकप्रियता नहीं, बल्कि परंपरा, मर्यादा और उत्तरदायित्व का बोध देने वालों में युगकवि डॉ. कुमार विश्वास जी का स्थान सबसे पहले आता है। यह स्वीकार करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि उनसे पूर्व भी सिद्धहस्त कवि हुए हैं और उनके समय में भी कई समर्थ रचनाकार उपलब्ध हैं; परंतु कविता के साथ-साथ, कविता-संस्कार का जो बीजारोपण नई पीढ़ी में उन्होंने किया, वह विरल है। उन्होंने मंच को आत्मप्रदर्शन, हंसी-ठिठोली, गाली-गलौज का माध्यम नहीं बनने दिया, बल्कि उसे गुरु-शिष्य परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए एक सेतु बनाया।

डॉ. कुमार विश्वास जी को जितना मैंने सुना है, जितना उन्हें समझा है और जितना उन्हें देख रहा हूं, उसके आधार पर कह सकता हूं कि उन्होंने यह सिद्ध किया है कि बड़ा कवि वही होता है, जो अपने पूर्वजों, अपने समकालीनों और अनुजों के कद को भी ऊँचा करने का साहस रखता हो।


आज के इस आत्ममुग्ध युग में, जहाँ ‘मैं’ की प्रतिध्वनि ‘हम’ को निगल जाने को आतुर है, डॉ. कुमार विश्वास जी ने उन प्रतिभाओं को खोजा है, जो गुमनामी के अंधकार में अपनी साधना को साधे बैठी थीं। किसी की वाणी में उन्होंने ओज का प्राण फूंका, किसी की संवेदना को शिल्प का अनुशासन दिया और किसी के आत्मविश्वास को मंच पर जाने लायक बनाया। यह उनकी ही साधना का प्रताप है कि उनके संरक्षण में पली कोई वाणी आज देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित और 'महंगी' कवयित्री है, तो किसी नए किंतु प्रतिभावान कवि को देश के सर्वाधिक महनीय व्यक्तित्व के आगमन से जुड़े कार्यक्रम में मंच संचालन का अवसर प्राप्त होता है।


और ये सब सिर्फ कहने-सुनने या लिखने वाली बातें नहीं हैं, कुमार जी इस परंपरा को जीते हैं। ताजा उदाहरण लीजिए, ओजस्वी काव्य के सशक्त हस्ताक्षर, कविकुल के अग्रज हरिओम पंवार जी का ‘उत्तर प्रदेश गौरव सम्मान’ से अलंकृत होना हो या हास्य-व्यंग्य के प्रखर हस्ताक्षर रमेश मुस्कान जी को भारत सरकार के राजभाषा सलाहकार के रूप में दायित्व मिलना, डॉ. कुमार विश्वास जी ने इन दोनों उपलब्धियों को अपने निजी उत्सव की तरह मनाया। 6 फरवरी को अपने निवास ‘केवी कुटीर’ को उन्होंने कवियों के लिए उल्लास-भूमि के रूप में परिवर्तित कर दिया।


यही वह भाव है, जो कुमार विश्वास जी को केवल एक लोकप्रिय कवि नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का एक सांस्कृतिक वाहक बनाता है। वे स्वयं प्रकाशमान रहकर दूसरों के लिए दीपशिखा बनते हैं, स्वयं शिखर पर होकर भी हिंदी कविता के आधार को सुदृढ़ करने में लगातार लगे रहते हैं। और यही कारण है कि आने वाली पीढ़ियाँ जब इस युग के विषय में बात करेंगी, तो इसे 'विश्वास युग' कहने से कतई नहीं हिचकिचाएंगी।


और संभव है कि कालांतर में इन्हीं में से कुछ कवि अपने कथित यश पर मुग्ध होकर स्वयं को ही अपनी सिद्धि का एकमात्र स्रोत मान बैठें। यह भी संभव है कि वे भूल जाएं कि जिस दीपक के रूप में वे आज समाज को साहित्यिक आलोक प्रदान कर रहे हैं, उस दिये में पड़ा घी डॉ. कुमार विश्वास जी का अथक परिश्रम है, उसमें प्रज्जवलित बाती उनके सान्निध्य से प्राप्त मार्गदर्शन है, और जिस अग्नि से उस दीपक का प्रज्ज्वलन हुआ, वह अग्नि, डॉ. कुमार विश्वास जी के नि:स्वार्थ संरक्षण की ही ज्वाला थी। इतिहास ऐसे कृतघ्नों का साक्षी रहा है, जो अपने प्रकाश के अहंकार में उस मूल दीप को ही नकारने लगते हैं, जिससे उन्हें प्रकाश प्राप्त हुआ था। किंतु काल की लेखनी सत्य के साथ न्याय अवश्य करती है। उसे स्मरण रहता है कि कौन दीपक था और कौन उस उस दीपक में प्राणतत्व बनकर जल रहा था। जब कभी हिंदी साहित्य तथा सनातन परंपरा की उत्तरवर्ती पीढ़ियाँ अपने इतिहास की ओर दृष्टि करेंगी, तब उन्हें यह स्पष्ट दिखेगा कि प्रकाश का प्रमुख स्रोत डॉ. कुमार विश्वास जी का तप, त्याग और संस्कार-चेतना ही थी।

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