Tuesday, 9 June 2026

प्रिय Gen Z! दुनिया ‘ऑप्शन्स’ से नहीं, जिम्मेदारियों से चलती है

पिछले कुछ दिनों से एक बात बार-बार सुनने को मिल रही है। कहा जा रहा है कि पुरानी पीढ़ियाँ, खासकर Gen Y, ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा ऐसी नौकरियों में गुज़ार दिया जहाँ उन्हें सम्मान नहीं मिला, जहाँ उन्होंने ज़रूरत से ज़्यादा काम किया, जहाँ उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी की कीमत पर संस्थानों को प्राथमिकता दी। और वो नया वर्ग, वो नई जेनरेशन, Gen Z कहते हैं कि "हम ऐसा नहीं करेंगे।"

ठीक है। क्या करना है और क्या नहीं, यह व्यक्ति का अपना फैसला होता है, लेकिन लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब एक पूरी की पूरी पीढ़ी कुछ ऐसे विचार के अधीन हो जाए, जिससे उनका खुद का, उनके परिवार का, समाज का, देश का और विशेषतः मनुष्यता का नुकसान हो। समस्या तब होती है, जब अपने फैसलों को सही साबित करने के लिए पिछली पीढ़ियों को गलत साबित करना ज़रूरी समझ लिया जाता है। आज मन है कि इन ‘बच्चों’ से बात की जाए। कम से कम पीढ़ी बदल जाने के कुतर्क के साथ ‘हम भारत के लोग’ अपने बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से तो नहीं भाग सकते। 

जब भी पीढ़ी बदलती है, तब पहले वाली पीढ़ी और बाद वाली पीढ़ी दोनों को अजस्ट करने में थोड़ी समस्या होती है, लेकिन इतनी पीढ़ियां बदलने-बीतने के बाद भी हिंदुस्तान में बच्चे अपने दादा-दादी के साथ जितना खुश महसूस करते हैं, वो किसी के साथ नहीं करते, क्योंकि हमने परिवार बचाकर रखे हैं, हमने परिवार में संस्कार बचाकर रखे हैं, हमने रिश्ते बचाकर रखे हैं, हमने यह आत्मबोध बचाकर रखा है कि ‘मैं’ हूं, क्योंकि ‘ये’ सब भी हैं। आज पूरी दुनिया में भारतीय मस्तिष्क को प्रणाम किया जा रहा है, कभी सोचा है क्यों? क्योंकि ‘परिवार’ जैसी प्रारंभिक इकाई से दायित्वबोध का जो बीज उनके मस्तिष्क में डाला जाता है, वह आगे चलकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के रूप में वृक्षाकारित हो जाता है। 

अब, Gen Z के दौर में डर लग रहा है। कई बार इनके व्यवहार को देखकर लगता है कि ये अगर इसी व्यवहार के साथ किसी ऐसे पेशे में आए, जहां लोग उनसे इतने प्रभावित हो जाएं कि हमें इनके जैसा बनना है तो देश कहां जाएगा, परिवार कहां जाएगा। कुछ दिनों से विभिन्न सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर (विशेषकर Linkedin पर) कई पोस्ट्स देख चुका हूं, जिनमें 'काम' के बोझ से बचने के टिप्स दिए जा रहे हैं। जिनमें आपके 'अधिकारों' की बात हो रही है, जिनमें बताया जा रहा है कि ऑफिस से निकलकर ऑफिस के ग्रुप्स को म्यूट कर दीजिए, जिनमें बताया जा रहा है कि ऐसा करके आपकी मेंटल हेल्थ अच्छी होगी। कुल मिलाकर आपको यह बताया जा रहा कि 'कामचोर' बनो, सब ठीक रहेगा।

हां, हो सकता है कि आपके मेरे 'कामचोर' शब्द से आपत्ति हो, लेकिन सत्य यही है कि अनियोजित तरीके से ही सही, आपके DNA से 'दायित्वबोध' को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। पश्चिम ने आपसे सबकुछ छीन लिया है। आप हर बात में, हर काम में, हर रिश्ते में, सिर्फ ‘फायदा’ खोजने लगे हैं। आपके दिमाग में यह भर दिया गया है कि आपके पास पैसा है तो सबकुछ है। लेकिन हमें ये नहीं सिखाया गया। हमें बताया और सिखाया गया कि रिश्ते सबकुछ है, समाज सबकुछ है, देश सबकुछ है। ऐसी ही एक पोस्ट देखी तो सोचा कि बात करनी चाहिए…

तुम कहते हो कि तुम दुखी रहकर वफ़ादारी साबित नहीं करना चाहते।

सवाल यह है कि क्या हर असुविधा दुख है? क्या हर संघर्ष शोषण है? क्या हर दबाव अन्याय है? और क्या हर त्याग मूर्खता है?

जीवन का कोई भी क्षेत्र उठा कर देख लो, व्यापार, खेल, कला, साहित्य, विज्ञान या सेना, हर जगह सफलता के पीछे ऐसा वक्त छिपा होता है, जिन्हें बाहर से देखने वाले लोग "कठिन समय" कहते हैं। लेकिन वही समय व्यक्ति का निर्माण भी करता है। आज की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि लोग नौकरी बदल रहे हैं। नौकरी बदलना कोई अपराध नहीं है। समस्या यह है कि धैर्य की अवधि लगातार छोटी होती जा रही है। पहले लोग किसी भूमिका में खुद को साबित करने की कोशिश करते थे। अब कई बार लोग खुद को साबित करने से पहले ही यह तय कर लेते हैं कि उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं मिल रहा।

पहले लोग पूछते थे, "मैं इस काम में और बेहतर कैसे बन सकता हूँ?" अब अक्सर पहला सवाल होता है, "मुझे इससे क्या मिल रहा है?"

दोनों सवाल गलत नहीं हैं। लेकिन दूसरा सवाल पहले से पहले आ जाए, तो समस्या शुरू होती है। आज सोशल मीडिया ने एक नई भाषा बना दी है।

अगर बॉस ने परफॉरमेंस सुधारने को कहा तो वो टॉक्सिक हो जाता है।  अगर अतिरिक्त प्रयास की ज़रूरत है तो वह बर्नआउट लगता है। अगर प्रमोशन देर से मिलता है तो एक्सप्लॉइटेशन हो जाता है। अगर किसी निर्णय से असहमति हुई तो रेड फ्लैग लगने लगता है। ऐसा लगता है जैसे पेशेवर जीवन के हर असुविधाजनक हिस्से के लिए एक नया लेबल तैयार है। लेकिन सच्चाई यह है कि जीवन का बड़ा हिस्सा असुविधाजनक ही होता है। स्किल डिवेलप करना असुविधाजनक है, क्योंकि अब AI की स्किल्स पर भरोसा किया जा रहा है। अनुशासन असुविधाजनक है। आलोचना सुनना असुविधाजनक है। गलतियों से सीखना असुविधाजनक है। और जिम्मेदारी उठाना भी असुविधाजनक है। लेकिन तुम ये भूल रहे हो कि इन्हीं चीज़ों से व्यक्तित्व बनता है।

तुम कहते हो कि तुम्हारे पास ‘ऑप्शन्स’ हैं।

बहुत अच्छी बात है। हमने जब नौकरी की शुरुआत की थी तो इंटरनेट हमारी ‘जेब’ में नहीं था। नौकरी के अवसर सीमित थे। जानकारी सीमित थी। नेटवर्क सीमित थे। लेकिन एक बात समझ लो। विकल्प होना और निर्णय लेने की परिपक्वता होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। अगर हर बार कोई बेहतर ऑफर आते ही हम दिशा बदल दें, तो हो सकता है हमारी सैलरी बढ़ जाए। लेकिन क्या हमारी विश्वसनीयता भी बढ़ती है? क्या हमारी विशेषज्ञता भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती है? क्या लोग हमें उस व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिस पर कठिन समय में भरोसा किया जा सकता है? किसी भी संगठन में सबसे मूल्यवान लोग हमेशा सबसे प्रतिभाशाली नहीं होते। अक्सर सबसे मूल्यवान लोग वे होते हैं जो भरोसेमंद होते हैं।

जो मुश्किल समय में साथ खड़े रहते हैं, जो समस्या देखकर गायब नहीं होते। जो यह नहीं पूछते कि "यह मेरा काम क्यों है?" बल्कि यह पूछते हैं कि "इसे ठीक कैसे किया जाए?"

हमारी पीढ़ी ने अधिकारों से पहले जिम्मेदारियों की भाषा सीखी। तुम्हारी पीढ़ी ने जिम्मेदारियों से पहले अधिकारों की। हमसे गलतियाँ हुईं। हमने कई बार अनावश्यक समझौते किए। हमने कई बार खराब मैनेजमेंट को चुनौती नहीं दी। कई बार अपने स्वास्थ्य और परिवार की उपेक्षा भी की। लेकिन कम-से-कम हमने यह नहीं माना कि दुनिया हमारे आराम के हिसाब से खुद को बदल लेगी। हमने खुद को दुनिया के हिसाब से तैयार करने की कोशिश की। और हम आज भी वही कर रहे हैं, तुम्हारे हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

तुम कहते हो, "कंपनी तुम्हारी परवाह नहीं करती, तो तुम कंपनी की क्यों करो?"

सुनने में यह बात बहुत क्रांतिकारी लगती है। लेकिन सोचकर देखिए। कंपनी क्या है? कोई इमारत? कोई लोगो?

नहीं।

कंपनी तुम्हारी टीम है। वहां तुम्हारे सहयोगी हैं। वह व्यक्ति है जो तुम्हारे बाद काम संभालता है। वह क्लाइंट है जिसने तुम पर भरोसा किया। जब तुम बिना जिम्मेदारी लिए केवल अपने 9 घंटे देखते हो, तो नुकसान किसी कॉरपोरेट संस्थान का नहीं होता। नुकसान उन लोगों का होता है जो तुम्हारे काम पर निर्भर हैं। इसलिए जिम्मेदारी का अर्थ कंपनी के प्रति अंधभक्ति नहीं है। जिम्मेदारी का मतलब है अपने कमिटमेंट का सम्मान करना। अपने काम का सम्मान करना। अपने सहयोगियों का सम्मान करना।

और अपने पेशे का सम्मान करना। 

आप मेंटल हेल्थ की बात करते हैं।

यह अच्छी बात है।

कार्यस्थल पर पारदर्शिता की बात करते हैं।

यह भी अच्छी बात है।

आप सम्मानजनक व्यवहार की मांग करते हैं।

यह भी बिल्कुल सही बात है।

लेकिन मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ यह नहीं कि हर चुनौती से बचा जाए। पारदर्शिता का अर्थ यह नहीं कि हर संस्था को खलनायक घोषित कर दिया जाए। और सम्मान का अर्थ यह नहीं कि केवल हमें सम्मान मिले, जबकि हम किसी के प्रति जवाबदेह न हों। करियर केवल यह नहीं है कि आपको क्या मिला। करियर यह भी है कि आपने क्या बेहतर बनाया, क्या सीखा, मनुष्यता को और अधिक बेहतर करने में क्या योगदान दिया। और कितने लोग आपको ऐसा व्यक्ति मानते हैं जिस पर भरोसा किया जा सकता है? इसलिए, नौकरी बदलो अगर ज़रूरी हो। खराब माहौल छोड़ो अगर वह सचमुच खराब है। बेहतर अवसर पकड़ो अगर वह तुम्हें आगे ले जाता है। लेकिन हर कठिनाई को अत्याचार, हर आलोचना को अपमान और हर जिम्मेदारी को बोझ मत समझो। क्योंकि अंत में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। सफलता उन लोगों को मिलती है जो भरोसेमंद होते हैं, जो टिकते हैं, जो सीखते हैं, जो जिम्मेदारी उठाते हैं, और जो यह समझते हैं कि दुनिया केवल अधिकारों से नहीं, जिम्मेदारियों से भी चलती है।




Sunday, 15 February 2026

रावण का महिमामंडन! आशुतोष राणा के साथ मिल कौन सी साजिश रच रही केजरीवाल की AAP?

बचपन में घर में हमारी ‘बूढ़ी अम्मा’ (परदादी) सोने से पहले रात में कहानियां सुनाती थीं। लवकुश, आरुणि, एकलव्य, अष्टावक्र, भरत जैसे बालकों के जीवन, ज्ञान, पराक्रम को सुनकर ही नींद आती थी। रामायण-महाभारत की हजारों कथाएं, जो उन्हें कंठस्थ थीं, उनका लाभ मुझे भी मिला। वैसे तो उस वक्त बहुत छोटा था, लेकिन उस समय की स्मृतियां आज भी मस्तिष्क में हैं। सीतापुर के एक छोटे से कस्बे में रहते थे, टीवी था लेकिन बिजली नहीं थी, बाहर से बैटरी चार्ज होकर आती थी तो उसमें चित्रहार, चंद्रकांता और अलिफलैला ही चलता था, वो भी हमें देखने की अनुमति नहीं थी। उस वक्त में ‘मनोरंजन’ का एक ही साधन था, वो था- बूढ़ी अम्मा की कहानियां।

बूढ़ी अम्मा की कथाएं ही थीं, जिन्होंने राम और कृष्ण से परिचय कराया, वो भी अपने पूर्वज के तौर पर। और वही थीं, जिन्होंने दुनिया के सबसे बड़े शत्रु रावण के विषय में बताया। कक्षा-7 में पहुंचा तो सिधौली से निकलकर लखनऊ पहुंचा। वहां ना बिजली की समस्या थी, ना टीवी की। लेकिन टीवी देखने का समय बस उतनी देर के लिए मिलता था, जितनी देर रात में रामायण आती थी। उस रामायण में जब सीता-परित्याग देखा तो उसे भी रामकथा का हिस्सा मान लिया। हालांकि इस विषय में मैंने कभी अपनी ‘बूढ़ी अम्मा’ से नहीं सुना था। थोड़ा और बड़ा हुआ, अध्ययन बढ़ा, ज्ञानियों से संपर्क-संवाद बढ़ा तो पता लगा कि एक राजा ने अपनी प्रजा के एक शख्स के कहने पर अपनी पत्नी का परित्याग कर दिया। उस समय तक सोचने-समझने की क्षमता एक परिधि तक ही सीमित थी। धीमे-धीमे इंटरनेट आया, साइबर कैफे में ऑरकुट, रैडिफ पर समय देने लगा तो पता लगा कि रावण तो अत्यंत ज्ञानी था, उसने तो अपनी बहन का बदला लेने के लिए माता सीता का अपहरण किया था, राम ने ‘छलपूर्वक’ बालि को मारा, और भी ऐसे कई प्रलाप पढ़ने को मिल जाते थे। मानस में तो असल रामायण और उसके चरित्रों की छवि की वही थी जो ‘बूढ़ी अम्मा’ ने सुनाई थी, लेकिन आगे के ‘प्रलाप’ सुनकर/पढ़कर आप यदि 8वीं/9वीं के छात्र हैं तो क्या ही तर्क दे पाएंगे, वह भी तब जब आपका अध्ययन ऐसे विषयों पर कुछ खास ना हो। 8वीं से लेकर 12वीं तक तो आप वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में अपने पाठ्यक्रम से इतर कुछ और अध्ययन कर ही नहीं कर पाते। ईश्वर की कृपा से 11वीं के बाद 8-10 साल अध्ययन का खूब समय मिला, कोशिश करता था कि दो-तीन दिन में एक पुस्तक तो पढ़ ही डालूं। खैर, जब अध्ययन बढ़ा तो जिज्ञासाएं भी बढ़ीं, मन में प्रश्न भी उठे, लेकिन उनके संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाते थे।

पत्रकारिता शुरू करने के साथ ही जिज्ञासाएं और बढ़ीं, प्रश्न और बढ़े। अब किसी विषय पर कोई कुछ कहे तो शोध करके तथ्यों और तर्कों के साथ जवाब देने की प्रवृत्ति बनने लगी। समझ में आया कि किस तरह से भारत के इतिहास, भारत के महापुरुषों की छवियों को खराब करने के प्रयास किए गए हैं। पता लगा कि किस तरह से भारतीय साहित्य में मिलावट करके हमारे मस्तिष्क में शंका का बीज बोया गया। परब्रह्म पर भी प्रश्न उठाने वाले विचार को स्वीकार्यता देने वाले देश के मानस को ऐसा बनाया गया कि वे उस ‘मिलावट’ पर प्रश्न उठाने के बजाय उसे जस्टिफाई करने लगे। ये जस्टिफाई करने वाले कुछ लोग तो अनजाने में इस भाव के साथ कर रहे थे कि ‘उनके सामने जो लिखा हुआ इतिहास रखा है, उसपर सवाल कैसे उठाएं।’ दूसरे कुछ लोग योजनाबद्ध तरीके से इस ‘मिलावट’ को और अधिक वैचारिक मजबूती देने में लगे थे। वे रावण को महाज्ञानी, महापंडित, महाभक्त, अद्भुत भाई और भी ना जाने क्या-क्या बताकर पेश करने में लगे थे/हैं। वे रावण-वध को गलत नहीं बता रहे हैं, वे कह रहे हैं, कि राम द्वारा रावण का वध किया जाना, एक लीला थी। वे इस विचार को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं कि सीता जीवित मिलीं यह निश्चित रूप से श्रीराम की ताकत थी, परन्तु वह पवित्र मिलीं यह रावण की मर्यादा थी। वे राम को अपनी पत्नी का परित्याग करने वाले ‘पति’ के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। वे ‘सीता-परित्याग’ को गलत नहीं कह रहे हैं, वे कह रहे हैं कि राम ने सही किया।

अब आपके मन में सवाल उठ सकता है कि ऐसा करके क्या मिलेगा?

दरअसल ऊपर लिखी पूरी कहानी का उद्देश्य इसी प्रश्न पर बात करना था। वे चाहते हैं कि आपको मर्यादा सिखाने के लिए आपके बीच, आपके ही रूप में आकर, आपकी तरह से ही जीवन जीने वाले मानक व्यक्तित्व को आप अपने जैसा मानें ही ना। आप उन्हें भगवान मान लें, आप रामायण को कहानी मान लें, आप हर मर्यादा के मानक को यह कहकर टाल दें कि अरे! वह तो भगवान थे, उन्होंने कर लिया, हम तो इंसान हैं, हम कैसे कर पाएंगे। वे चाहते हैं कि हम हर बुरी चीज को कहीं ना कहीं भगवान से जोड़कर ‘जस्टिफाई’ करने लगें। 

विश्वास नहीं है?

कृष्ण की रासलीला को किस रूप में प्रस्तुत किया गया? लड़कियों को छेड़ने वाला ना? क्या कहा गया- ‘तुम करो तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला’। भुवनमोहन कन्हैया से लेकर योगेश्वर कृष्ण को तुमने किस रूप में पेश नहीं किया? रणछोड़ कह दिया, लेकिन पीछे की कहानी नहीं बताई। छलिया कह दिया, लेकिन उस कथित छल का उद्देश्य नहीं बताया।

कर्ण का नाम सुनते ही क्या दिमाग में आता है? बहुत अच्छा मित्र, यही ना? अरे पढ़िए महाभारत से जुड़ा वास्तविक इतिहास, पूरी महाभारत के पीछे कर्ण ही था। दुर्योधन तो मान भी जाता, दे देता शायद पांच गांव भी, लेकिन वह कर्ण ही था जिसने मित्रता के नाम पर दुनिया के सबसे बड़े युद्ध को कराया।

रावण अच्छा भाई था? रावण बहुत मर्यादित था? नहीं, असल बात यह है कि रावण ने सीता को बलपूर्वक इसलिए हाथ नहीं लगाया क्योंकि उसे कुबेर के पुत्र नलकुबेर ने श्राप दिया था कि यदि रावण ने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध अनैतिक कामेच्छा से छुआ या अपने महल में रखा तो उसके सिर के सौ टुकड़े हो जाते। रावण को एक मानक भाई बताने वालों से पूछिएगा कि शूर्पणखा को विधवा किसने किया था, उसके पति विद्युतजिव्ह की हत्या किसने की थी?

ऐसे रावण को महिमामंडित करने का षणयंत्र कितने संगठित रूप से चल रहा है, उसका अंदाजा लगाइए। ये षणयंत्र व्यक्तिगत नहीं है। इसमें वे सरकारें भी शामिल हैं, जिनकी पार्टियों के नेता श्रीराम के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। जिनके नेताओं की नानी को भी अहंकार के शमन के बाद बनने वाला श्रीरामलला का मंदिर स्वीकार नहीं है। 

ये नेता अब उन लोगों का सहारा लेकर राजनीति करने निकल चुके हैं, जो आपके मस्तिष्क में शंका का जहर घोल रहे हैं। हिंदुओं को उस राजनीतिक पार्टी से दूर करने का प्रयास है, जो श्रीराम के नाम पर राजनीति करती है। ऐसे में पंजाब के उन 38% हिंदुओं को भाजपा से दूर करने के लिए ‘राम’ के नाम का सहारा लेकर ‘रावण’ के महिमामंडन का प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रम का नाम है- ‘हमारे राम’। एक शो का चार्ज है लगभग 3 करोड़ और आम आदमी के टैक्स से प्राप्त पैसे से ऐसे 40 से अधिक कार्यक्रम कराए जाएंगे।  इसके अतिरिक्त, आयोजन, प्रचार और अन्य व्यवस्थाओं पर होने वाले खर्च को भी जोड़ लिया जाए तो अनुमान के मुताबिक करीब 200 करोड़ रुपये पंजाब की सरकार ‘हमारे राम’ के सहारे रावण का महिमामंडन करेगी।

अब प्रश्न सीधा है, जनता के टैक्स के पैसों से वैचारिक मिलावट का यह प्रयोग किसके इशारे पर और किस उद्देश्य से किया जा रहा है? आम आदमी पार्टी की सरकार यह बताए कि क्या उसकी जिम्मेदारी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार है या फिर सांस्कृतिक भ्रम फैलाकर आस्था को संदिग्ध बनाने की? जिन श्रीराम से देश-दुनिया के करोड़ों लोगों का विश्वास जुड़ा है, उन्हीं राम की पत्नी, भारतेश्वरी माता सीता का अपहरण करने वाले के चरित्र को ‘अद्भुत’ दिखाने का प्रयास करने वाले कार्यक्रमों पर सैकड़ों करोड़ उड़ाना, क्या यही “ईमानदार राजनीति” है? अगर यह सांस्कृतिक विमर्श है, तो इसमें रावण-महिमामंडन क्यों? और अगर यह राजनीति है, तो फिर जनता को साफ-साफ क्यों नहीं बताया जाता कि उनके पैसे से किस वैचारिक एजेंडे का पोषण किया जा रहा है?

और सबसे गंभीर सवाल कलाकारों की भूमिका पर है। आशुतोष राणा जैसे प्रभावशाली कलाकारों से पूछा जाना चाहिए कि क्या मंच पर खड़े होकर भ्रम को वैचारिक गरिमा देना आपकी कला का उद्देश्य है? क्या अभिनय की प्रतिष्ठा का उपयोग कर आस्था पर प्रहार करना “रचनात्मक स्वतंत्रता” कहलाता है? जब कलाकार सत्ता के वैचारिक औज़ार बन जाएँ, तब सवाल उठाना अपराध नहीं, दायित्व होता है, और ऐसे सवाल हर उस व्यक्ति को उठाने चाहिए, जिसे इस देश की वैचारिकी, इसके इतिहास, इसकी परंपराओं पर विश्वास है।

Monday, 9 February 2026

KV कुटीर में महोत्सव: यह 'विश्वास' का युग है

आज से 100-200 साल बाद जब कभी हिंदी 'कवि सम्मेलन संस्थान' की विकासगाथा पर चर्चा होगी, तब हिंदी का विद्यार्थी पूर्ण गर्वानुभूति के साथ कहेगा कि मंचीय कविता को मात्र लोकप्रियता नहीं, बल्कि परंपरा, मर्यादा और उत्तरदायित्व का बोध देने वालों में युगकवि डॉ. कुमार विश्वास जी का स्थान सबसे पहले आता है। यह स्वीकार करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि उनसे पूर्व भी सिद्धहस्त कवि हुए हैं और उनके समय में भी कई समर्थ रचनाकार उपलब्ध हैं; परंतु कविता के साथ-साथ, कविता-संस्कार का जो बीजारोपण नई पीढ़ी में उन्होंने किया, वह विरल है। उन्होंने मंच को आत्मप्रदर्शन, हंसी-ठिठोली, गाली-गलौज का माध्यम नहीं बनने दिया, बल्कि उसे गुरु-शिष्य परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए एक सेतु बनाया।

डॉ. कुमार विश्वास जी को जितना मैंने सुना है, जितना उन्हें समझा है और जितना उन्हें देख रहा हूं, उसके आधार पर कह सकता हूं कि उन्होंने यह सिद्ध किया है कि बड़ा कवि वही होता है, जो अपने पूर्वजों, अपने समकालीनों और अनुजों के कद को भी ऊँचा करने का साहस रखता हो।


आज के इस आत्ममुग्ध युग में, जहाँ ‘मैं’ की प्रतिध्वनि ‘हम’ को निगल जाने को आतुर है, डॉ. कुमार विश्वास जी ने उन प्रतिभाओं को खोजा है, जो गुमनामी के अंधकार में अपनी साधना को साधे बैठी थीं। किसी की वाणी में उन्होंने ओज का प्राण फूंका, किसी की संवेदना को शिल्प का अनुशासन दिया और किसी के आत्मविश्वास को मंच पर जाने लायक बनाया। यह उनकी ही साधना का प्रताप है कि उनके संरक्षण में पली कोई वाणी आज देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित और 'महंगी' कवयित्री है, तो किसी नए किंतु प्रतिभावान कवि को देश के सर्वाधिक महनीय व्यक्तित्व के आगमन से जुड़े कार्यक्रम में मंच संचालन का अवसर प्राप्त होता है।


और ये सब सिर्फ कहने-सुनने या लिखने वाली बातें नहीं हैं, कुमार जी इस परंपरा को जीते हैं। ताजा उदाहरण लीजिए, ओजस्वी काव्य के सशक्त हस्ताक्षर, कविकुल के अग्रज हरिओम पंवार जी का ‘उत्तर प्रदेश गौरव सम्मान’ से अलंकृत होना हो या हास्य-व्यंग्य के प्रखर हस्ताक्षर रमेश मुस्कान जी को भारत सरकार के राजभाषा सलाहकार के रूप में दायित्व मिलना, डॉ. कुमार विश्वास जी ने इन दोनों उपलब्धियों को अपने निजी उत्सव की तरह मनाया। 6 फरवरी को अपने निवास ‘केवी कुटीर’ को उन्होंने कवियों के लिए उल्लास-भूमि के रूप में परिवर्तित कर दिया।


यही वह भाव है, जो कुमार विश्वास जी को केवल एक लोकप्रिय कवि नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का एक सांस्कृतिक वाहक बनाता है। वे स्वयं प्रकाशमान रहकर दूसरों के लिए दीपशिखा बनते हैं, स्वयं शिखर पर होकर भी हिंदी कविता के आधार को सुदृढ़ करने में लगातार लगे रहते हैं। और यही कारण है कि आने वाली पीढ़ियाँ जब इस युग के विषय में बात करेंगी, तो इसे 'विश्वास युग' कहने से कतई नहीं हिचकिचाएंगी।


और संभव है कि कालांतर में इन्हीं में से कुछ कवि अपने कथित यश पर मुग्ध होकर स्वयं को ही अपनी सिद्धि का एकमात्र स्रोत मान बैठें। यह भी संभव है कि वे भूल जाएं कि जिस दीपक के रूप में वे आज समाज को साहित्यिक आलोक प्रदान कर रहे हैं, उस दिये में पड़ा घी डॉ. कुमार विश्वास जी का अथक परिश्रम है, उसमें प्रज्जवलित बाती उनके सान्निध्य से प्राप्त मार्गदर्शन है, और जिस अग्नि से उस दीपक का प्रज्ज्वलन हुआ, वह अग्नि, डॉ. कुमार विश्वास जी के नि:स्वार्थ संरक्षण की ही ज्वाला थी। इतिहास ऐसे कृतघ्नों का साक्षी रहा है, जो अपने प्रकाश के अहंकार में उस मूल दीप को ही नकारने लगते हैं, जिससे उन्हें प्रकाश प्राप्त हुआ था। किंतु काल की लेखनी सत्य के साथ न्याय अवश्य करती है। उसे स्मरण रहता है कि कौन दीपक था और कौन उस उस दीपक में प्राणतत्व बनकर जल रहा था। जब कभी हिंदी साहित्य तथा सनातन परंपरा की उत्तरवर्ती पीढ़ियाँ अपने इतिहास की ओर दृष्टि करेंगी, तब उन्हें यह स्पष्ट दिखेगा कि प्रकाश का प्रमुख स्रोत डॉ. कुमार विश्वास जी का तप, त्याग और संस्कार-चेतना ही थी।

Saturday, 28 June 2025

वैदिक तथ्यों-तर्कों के आधार पर महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण थे?

 महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण थे? 

एक शब्द में इसका जवाब है- हां। इसपर ना किसी तरह का विवाद है, ना ही होना चाहिए। असल मुद्दा यह है कि क्या उनके ब्राह्मण होने के पीछे उनका किसी व्यक्ति विशेष के यहां जन्म लेना कारण है? जवाब है- नहीं। आज वैदिक तर्कों के साथ इसी पर बात करेंगे। जन्मजाति के अंहकार में डूबे कुछ लोगों को मेरा यह लेख पसंद नहीं आएगा। उसका कारण भी स्पष्ट है कि लोगों ने धर्म की, परंपराओं की, व्यवस्थाओं की, अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या कर ली है और उसे व्यावहारिक बना लिया है। 

एक और समस्या है। जिनकी सैकड़ों-हजारों पीढ़ियों ने अध्ययन करने और कराने का काम पूरी जिम्मादारी से किया, उन जन्म आधारित ब्राह्मणों ने दूसरों को दीक्षित करने की जिम्मेदारी तो छोड़िेए, खुद भी अध्ययन करना छोड़ दिया है। गूगल बाबा और वॉट्सऐप विश्वविद्यालय के क्रैश कोर्स में जो आधी-अधूरी जानकारी मिलती है, उसी को सत्य मान लेते हैं। तो आज ऐसे कुपढ़ ‘ब्राह्मणों’ पर भी बात करना बेहद जरूरी हो गया है। यह ब्लॉग लिखने की जरूरत क्यों महसूस हुई, वह भी जान लीजिए। 

दरअसल एक बालक ने सुप्रसिद्ध कवि और वक्ता डॉ. कुमार विश्वास जी के वक्तव्य को शेयर करते हुए कुछ लिखा, मेरी पत्नी को आपत्ति हुई तो उसने जवाब दिया। इसके बाद उस बालक ने मेरी पत्नी से कहा- ‘आप मुझे नहीं जानतीं भाभी जी, गौरव भैया से मेरे बारे में पूछिएगा।’ मेरी पत्नी ने जिज्ञासावश मुझसे पूछा तो मेरे ध्यान में नहीं आया कि वह कौन है। मेरी पत्नी ने नंबर पता करके दिया तो मैंने फोन किया। बातचीत में पता लगा कि कभी किसी विषय को लेकर बात हुई होगी तो वह मुझे जानता होगा। लेकिन जब उसने बताया कि उसने लिखा क्या था तो सामान्य तौर पर मैंने पूछा कि ’वेदव्यास’ तो उपाधि है, उनका असली नाम क्या था? जवाब था- नहीं पता। मैंने पूछा कि उनके पिता का नाम क्या था? जवाब था- मुझे यह सब नहीं पता लेकिन हमारे सप्तऋषि ब्राह्मण ही थे। मुझे बेहद दुःख हुआ कि सोशल मीडिया पर ब्राह्मणों की आवाज बुलंद करने वाला एक 25-26 साल का लड़का अपने खुद के इतिहास के बारे में शून्य है। उसे यह तक नहीं पता कि महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास सप्तऋषियों में तो सम्मिलित ही नहीं हैं। खैर, मुझे लगा कि संक्षेप में इस विषय पर बात करना बेहद जरूरी है।

 

पहले बात करते हैं महर्षि वाल्मीकि पर। महर्षि वाल्मीकि के जन्म को लेकर दो मान्यतायें प्रचलित हैं। एक वर्ग स्कन्द पुराण के आधार पर कहता है कि महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिये इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है। उपनिषद के विवरण के अनुसार ये भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे। एक बार ध्यान में बैठे हुए इनके शरीर को दीमकों ने अपना ढूह (बाँबी) बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब ये दीमक-ढूह से, जिसे वाल्मीकि कहते हैं, बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे। 

अब यदि स्कंद पुराण के आधार पर महर्षि वाल्मीकि के जन्म को प्रमाणिक मानें तो उसी पुराण में एक बात और भी कही गई है- 

'जन्मना जायते शूद्रः संस्कारवान् द्विज उच्यते ॥' (स्कन्द 6.239.31)

स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम् उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद जी को बताया गया है कि जन्म से (प्रत्येक) मनुष्य शूद्र, संस्कार से द्विज बनता है। माना जाता है कि उपनयन संस्कार के बाद व्यक्ति का दूसरा जन्म होता है। ‘उपनयन’ का अर्थ है, ‘पास या सन्निकट ले जाना।’ किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। वेदाध्ययन के लिए जब बालक गुरु के सन्निकट जाता है, तब वह पूर्ण रूप से परिवार का मोह त्यागकर सिर्फ शिक्षा के लिए, ज्ञान के लिए, ब्रह्म के लिए समर्पित होता है- तब वह ब्राह्मण बनता है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि जन्म से ‘ब्राह्मण’ कोई नहीं होता, वह ज्ञान-सिद्धि के आधार पर ब्राह्मण बनता है। यानि जन्म किसी भी परिवार में हुआ हो, यदि कोई ब्रह्म के प्रति समर्पित है, ईश्वर के प्रति समर्पित है, ज्ञान के प्रति समर्पित है तो वह ब्राह्मण ही है। अब जन्म से रामनरेश यादव हो या शिवकुमार पासवान, यज्ञोपवीत संस्कार के बाद उसका उपनाम उसकी शिक्षा के आधार पर तय होता है। हमारी वैदिक परंपरा जो आज भी आपको संस्कृत शिक्षा में मिल जाएगी, उसमें शास्त्री जैसी उपाधियां शिक्षा के आधार मिलती हैं, जिन्हें उपनाम की तरह उपयोग में लाया जाता है। इसी उपनाम से पता लग जाता है कि सामने वाले व्यक्ति ने कितना अध्ययन किया है। वैदिक काल में ये उपाधियां थोड़ा विस्तृत थीं, जो कि ज्ञान और अध्ययन परंपरा के अनुसार दी जाती थीं। हालांकि ये सिर्फ ब्राह्मणों को ही मिलती थीं, और ब्राह्मण वही होता था जो अध्ययन करके फिर उसके विस्तार का दायित्व लेता था।


अब आते हैं महर्षि वाल्मीकि के जन्म को लेकर प्रचलित दूसरी मान्यता पर। उसके मुताबिक वाल्मीकि पहले ‘रत्नाकर’ नामक डाकू हुआ करते थे। यहां एक बात और बता दूं कि कुछ जगह पर जिक्र मिलता है कि वह डाकू बनने से पहले एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, लेकिन बाद में एक शिकारी जोड़े के साथ रहने लगे। कुछ जगहों पर यह भी जिक्र आता है कि वह एक भील राजा थे। हालांकि हम इस विवाद में ना जाते हुए मूल विषय पर ही रहेंगे। रत्नाकर नामक डाकू लोगों पर हमला करके जबरन उनसे उनकी संपत्ति छीनने का काम करता था। ऐसा करते काफी समय हो गया, इसी बीच एक दिन अचानक नारद मुनि उसके सामने आए। रत्नाकर ने उन्हें डराने की कोशिश की लेकिन नारदजी बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए। नारदजी ने उससे एक प्रश्न किया कि तुम यह दूसरों को लूटने का जो काम करते हो, वह किसके लिए करते हो। रत्नाकर ने जवाब दिया- अपने परिवार को सुविधाएं देने और उनका भरण पोषण करने के लिए। नारदजी का अगला सवाल था- 'तुम अपने परिवार को लोगों से धन लूटकर दे रहे हो, क्या जब इस कर्म का परिणाम आने पर भी वो परिवार तुम्हारा साथ देगा। क्या इस डकैती के कर्म में तुम्हारा परिवार तुम्हारा सहभागी है?'


रत्नाकर के मन में भी जिज्ञासा उठी और वह नारदजी को एक पेड़ से बांधकर अपने परिवार से सवाल करने गया। तब उसके परिजनों यानी पत्नी और पिता दोनों ने साफ इनकार कर दिया कि वह भले ही लूट के धन से सुख-सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं लेकिन डकैती के कर्म का फल रत्नाकर को अकेले ही भोगना होगा, वह इस काम में उसके सहभागी नहीं हो सकते। परिवार के जवाब से हताश-निराश रत्नाकर नारद के पास वापस लौटा। उसको अहसास हुआ कि वह व्यर्थ के कामों में जीवन नष्ट कर रहा है, और जिनके लिए कर रहा है वह भी उसके साथी नहीं। उसके अंदर बदलाव की चाह जगी और तब नारद मुनि ने डाकू रत्नाकर को ‘राम’ नाम के विषय में बताया। और फिर रत्नाकर ‘राम नाम’ में इतना रमे कि वाल्मीकि बन गए।

अब यहां प्रश्न यह है कि अगर वाल्मीकि का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में भी हुआ होता, तो भी क्या आप उन्हें पूजते? नहीं। आप उन्हें इसलिए ही पूजते हैं क्योंकि उन्होंने राम को समझा, उन्होंने ब्रह्म को समझा और हमें रामायण दी। यानी यहां भी कर्म ही प्रधान है। 


अब बात करते हैं महर्षि वेद व्यास की। हिन्दू शास्त्रों की मान्यता है कि प्रत्येक युग में स्वयं ईश्वर अवतार ग्रहण कर वेदों का युगानुरूप विस्तार करते हैं। एक गणना के अनुसार अब तक 28 व्यास हो चुके हैं। जिस मनवंतर में हम हैं, उसमें द्वापर युग में यह गौरव श्रीकृष्ण द्वैपायन को मिला। पुराणों के अनुसार वह व्यास ऋषि पराशर और सत्यवती के पुत्र थे। सत्यवती एक मछुवारे की पुत्री थीं। अब एक ब्राह्मण और मछुआरिन के बेटे को जन्म के आधार पर तो वर्णसंकर माना जाएगा, फिर उन्हें महर्षि क्यों कहा गया, वेदव्यास की उपाधि क्यों दी गई? अब आप कहेंगे कि वो तो पिता के आधार पर तय होता है। अच्छा? अगर ऐसा है तो फिर तो वर्णसंकर की अवधारणा को भी स्वीकार करते हुए उन्हें स्वीकृति ही नहीं मिलनी चाहिए। वैदिक परंपरा में तो वर्णसंकर की व्यवस्था तो स्वीकार ही नहीं थी। तो असल धारणा मैं आपको बताता हूं। 


दरअसल सनातन परंपरा में प्रत्येक व्यवस्था बेहद वैज्ञानिक और व्यवहारिक है। वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर तय होती थी। अपने वर्ण में विवाह की परंपरा को सही और दूसरे वर्ण में इसलिए उचित माना गया था, ताकि पति-पत्नी का कर्म एक ही रहे, जिससे परिवार में समन्वय बना रहे। यह तो हम आज भी महसूस करते हैं ना! पति और पत्नी एक ही पेशे में होते हैं तो व्यवस्था ठीक बनी रहती है।  

श्रीकृष्ण द्वैपायन ने वेद का प्रतिभाग करके श्रौतयज्ञ की आवश्यकता के अनुसार चार वेदों में सम्पादित किया, इसलिए वे ‘वेदव्यास’ कहलाते हैं। पुराणों के द्वारा वेद का उपबृंहण या व्याख्यात्मक विस्तार करने का कारण उन्हें व्यास कहा गया। वे 18 पुराणों और श्रीमद्‌भगवद्‌गीता के सहित महाभारत, ब्रह्मसूत्र (जो भारतीय दर्शन की वेदान्त धारा के सीमान्त प्रस्थानों का शाश्वत स्रोत है) और पतंजलि कृत सूत्रों पर व्यासभाष्य के भी प्रणेता माने जाते है। वेदों के परमार्थ को, जो उपनिषदों में प्रतिष्ठित है, सूत्रबद्ध कर ‘ब्रह्मसूत्र’ की रचना करके उन्होंने भारतीय दार्शनिक चिन्तन का आधार प्रस्तुत कर दिया, जिसकी शताब्दियों तक विभिन्न दार्शनिक प्रस्थान अपनी-अपनी तरह से व्याख्या करते रहे। ‘व्यास-स्मृति’ के प्रणेता के रूप में वे स्मृतिकार हैं। हमारे लिए वह पूज्यनीय हैं। 


महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण हैं, लेकिन इसका उनके जन्म से कोई लेना-देना नहीं है। ढेर सारे ऋषि-महर्षि हैं, जिनके जन्म पर बात ही नहीं होती, होनी भी नहीं चाहिए लेकिन हम उनके ज्ञान के कारण उन्हें पूजते हैं। एक और तर्क है। वर्तमान मनवंतर के सप्तऋषियों में प्रथम कश्यप ऋषि को समस्त देवताओं एवं मानवों का पूर्वज माना गया है। वह तो ऋषि यानी ब्राह्मण हैं, ऐसे में तो समस्त मानव जन्म से तो ब्राह्मण ही हुए। इसके आधार पर भी यह प्रमाणित होता है कि समस्त मनुष्य ब्राह्मण ही हुए। उन्हीं सप्तऋषियों में से एक महर्षि विश्वामित्र का जन्म तो क्षत्रिय कुल में हुआ था। जन्म के आधार पर यदि ब्राह्मण ही ऋषि अथवा महर्षि हो सकता तो विश्वामित्र महर्षि कैसे हुए? सोचिएगा।


ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वालों से अंत में एक ही बात कहूंगा। आपके पूर्वज ज्ञान परंपरा के आधार रहे हैं। आज के समय में हो सकता है कि आप कर्मकांड और अध्यापन ना कर पा रहे हों लेकिन कम से कम अध्ययन तो कर ही सकते हैं। पढ़ेंगे तभी मन में जिज्ञासा उठेगी, और फिर उस जिज्ञासा के समाधान के लिए और पढ़ेंगे। जन्म से मिले ‘ब्राह्मणत्व’ की रक्षा सोशल मीडिया पर कुतर्क करके नहीं होगी, ज्ञान से होगी। सोशल मीडिया के चक्कर में पड़ेंगे तो ब्राह्मणवंशी रावण को पूजना पड़ेगा और रावण को पूजने वाला रामभक्त हो ही नहीं सकता।


Tuesday, 29 April 2025

पूर्णकालिक प्रेयसी बने रहने का संकल्प लेने वाली प्राणवल्लभा के नाम पत्र

प्रिये,

पारिवारिक, सामाजिक और संवैधानिक रूप से एकत्व के 8 साल हो गए लेकिन आत्मिकता के आधार पर देखें तो 14 साल 2 महीने और 15 दिन बीत गए हैं। इस छोटे से समयकाल में तुम्हारी सिर्फ एक शिकायत रही है। शायद मेरी कमी है कि मैं तुम्हारी उस शिकायत को दूर नहीं कर पाया। आज कोशिश कर रहा हूं। 


पता है! मैं हमेशा सोचता हूं कि क्या सच में कोई इस धरती पर हुआ होगा, जिसने प्रेम किया हो और उसकी प्रेमिका/प्रेमी को अपने साथी से कोई शिकायत ना रही हो? प्रेम की शाश्वत परिभाषाओं के मानक व्यक्तित्व क्या सच में प्रेम में बिना झगड़े के जिये होंगे? शायद नहीं! मेरा ईश्वर भी जब इस धरती पर मनुष्य रूप में आया तो वह रोया, उसने विरह झेला, उसने अभूतपूर्व प्रेम किया, फिर क्या उनकी प्रेयसी ने उनसे प्रश्न नहीं पूछा होगा? क्या राजा जनक को विदेह होने के बाद पुत्री रूप में प्राप्त हुईं वैदेही ने अपने प्रेमी से यह नहीं पूछा होगा कि पिता के वचन का पालन करने की सौगंध लेने के बाद भी आप अपनी पत्नी, अपनी प्रेमिका को चंद पलों में रावण की कैद से मुक्ति दिला सकते थे, फिर आपने क्यों नहीं दिलाई? क्या अपराजिता किशोरी जी ने मुरलीधर से सुदर्शनधारी केशव बने आदिदेव अपराजित धर्माध्यक्ष द्वारिकाधीश से यह नहीं पूछा होगा कि उन्होंने दुनिया से लड़कर उन्हें अपनी पत्नी होने का अधिकार क्यों नहीं दिया? जरूर पूछा होगा, और उन्हें उत्तर भी मिला होगा। लेकिन मैं, उनके सिखाए, उनके दिखाए प्रेम-मार्ग पर चलने को आतुर प्रेम की पाठशाला का एक नव-विद्यार्थी तुम्हारे उस एकमात्र प्रश्न का उत्तर आजतक नहीं दे पाया, ऐसा उन सभी लोगों को लगता होगा, जो तुमसे या मुझसे हमारे बहाने इस प्रश्न का उत्तर जानने की कोशिश करते हैं।

तुम हमेशा पूछती थी ना, कि तुमने जिससे पहली बार प्रेम किया, उसे इतने पत्र लिखे कि एक किताब बन गई, दो-तीन वर्षों में प्रेम में इतना कुछ लिख डाला, फिर हमारे इतने सालों के प्रेम में तुमने एक पत्र तक नहीं लिखा, हमारे प्रति प्रेम में कमी थी क्या?
नहीं! तुम्हारे प्रति प्रेम में कमी नहीं थी, दरअसल आवश्यकता ही नहीं पड़ी। संबंध जब कागजों की सीमाओं में बंधे होते हैं, तो वे अनुबंध होते हैं लेकिन प्रेम जब हर तरह की सीमाओं को पार कर जाता है, तभी वह देवत्व का गुण आत्मसात करता है। पता है! जब मन जुड़ जाता है ना, तो शब्दों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। पता नहीं क्यों और कैसे, तुम्हारे सामने बैठूं, या तुमसे सैकड़ों किलोमीटर दूर रहूं, मेरे बिना बोले सबकुछ समझ लेने की जो योग्यता तुम में है, उसके बाद लिखने को कुछ बचता ही कहां है?
मुझे पता है कि मैं आज जो तुम्हें समझाने की कोशिश कर रहा हूं, वह तुम पहले से ही समझती हो, लेकिन यह पत्र असल में तुम्हें नहीं, उन सबको बताने के लिए है कि प्रेम आपको अच्छे से बेहतर और फिर बेहतर से बेहतरीन कैसे बनाता है।

पता है! हम दोनों इतने सारे ‘परफेक्ट’ कपल्स से मिलते हैं, लगता है कि अरे ये लोग झगड़ा नहीं करते होंगे, तभी तो इतने खुश हैं ना! मतलब मुझे तो ऐसा लगता है। लेकिन सच में, उसी के साथ एक बात और भी मन में आती है कि ये झगड़ा नहीं करते होंगे, तो प्रेम भी करते हैं क्या?

पता नहीं! लेकिन झगड़ा ना होना, एक-दूसरे से नाराज ना होना, गुस्से में एक-दूसरे की बात को चुपचाप बर्दाश्त कर लेना, यह प्रेम का मानक नहीं है, हो ही नहीं सकता। प्रेम तो वह है कि जब आप घनघोर क्रोध में अपने मन की बात अपने साथी से कहें और उस वक्त वह भी अपने मन की बात खुलकर कहे, लेकिन आप दोनों के क्रोध की सीमा क्या हो, यह समझना प्रेम है।

मैं ऐसा नहीं था, मैं अपने क्रोध की सीमा नहीं जानता था, दरअसल मैं जानना ही नहीं चाहता था कि दूसरे को मेरी बातें कैसी लग रही होंगी, तुमने मुझे यह सिखाया कि मैं अब किसी के भी सामने अपने व्यवहार की सीमा समझने लगा हूं। तुम कैसी हो यार! लालच के पाश की परिधि से दूर, संतुष्टि के सागर में ध्यान लगाकर बैठी विदुषी सी लगती हो।
कई बार मन में प्रश्न उठता है कि तुम्हारी निजी इच्छाएं, आकांक्षाएं क्यों समाप्त सी हो गई हैं? क्यों संबंधों के प्रति तुम इतना समर्पित हो जाती हो कि मेरी इच्छाओं और विचारों का भी सम्मान रखने से इनकार कर देती हो, क्यों तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम जो कर रही हो, वही सही है! लेकिन पता है, फिर खुद-ब-खुद इस प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। तुम्हारे निर्णय मुझे सर्वदा स्वीकार करने पड़ते हैं (ना चाहते हुए भी), क्योंकि तुम्हारे आचार, व्यवहार और विचार ने मुझे यह स्वीकार करा दिया है कि तुम्हारे फैसले भले ही तात्कालिक हित में ना हों, लेकिन दूरगामी परिणाम स्वरूप में किसी ना किसी रूप में लोकहितकारी अवश्य होंगे। 


मैंने प्रेम किया था, उस प्रेम ने मुझे स्वयं से मिलाया, मुझे बताया कि मैं क्या हूं, लेकिन तुमने मुझे मुझ में बसे ईश्वरत्व से साक्षात्कार कराया। तुमने बताया, तुमने सिखाया कि स्वयं से पहले दूसरों के बारे में, दूसरों के हित के बारे में विचार आना ही ईश्वरत्व है। कोशिश करूंगा कि तुमने जिस व्यक्तित्व से मेरी  पहचान कराई है, उसे बचाकर, बनाकर रखूं। 


वैवाहिक वर्षगांठ की अशेष मंगलकामनाओं के साथ

सिर्फ तुम्हारा,

-विश्व गौरव

Saturday, 25 January 2025

जनेऊ परपंरा नहीं, संस्कार है साहब! तब पहनिए, जब उसका मान रख सकें

आज जिस विषय पर लिखने जा रहा हूं, इसपर लिखने के लिए कई बार सोचा लेकिन यह विषय इतना बोझिल लगता था कि हर बार विचार को मस्तिष्क तक ही सीमित रहने दिया। लेकिन आज किसी ने आग्रह किया कि इसपर आपका मत क्या है, वह जरूर बताइए। पहले थोड़ी भूमिका- साल 2017 में मेरा यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। मैं इसे करने के पक्ष में नहीं था लेकिन फिर मुझे बताया गया कि कोई भी शुभ कर्म बिना इसके फलित नहीं होता। अब चूंकि विवाह करना था और उसे फलित भी करना था तो लगभग मजबूरी में कुछ घंटों में ‘यज्ञोपवीत’ हो गया। मैं इसके पक्ष में क्यों नहीं था, इसपर चर्चा बाद में करेंगे, पहले यह बताना जरूरी है कि मैं नियमित तौर पर यज्ञोपवीत धारण नहीं करता। विवाहोपरांत जब इसे धारण करना बंद किया तो मेरे बाबाजी बहुत नाराज हुए। बीते लगभग 15 वर्षों में मेरे बाबाजी ने यदि मेरे किसी फैसले पर आपत्ति की है तो वह यही है कि मैं यज्ञोपवीत धारण नहीं करता। वह मुझे वामपंथी, अंग्रेज… और भी ना जाने क्या-क्या कहते हैं। मेरे मन में भी कई बार आता है कि 6 धागों का एक समूह ही तो धारण करना है, उनकी खुशी के लिए कर लेते हैं, लेकिन उसके तुरंत बाद मन में एक प्रश्न यह भी उठता है कि किसी अपने की खुशी के लिए क्या हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा प्रतिपादित नितांत वैज्ञानिक परंपराओं को सिर्फ दिखावे के लिए स्वीकार करना क्या उनका ’अपमान’ नहीं होगा?


मैं यज्ञोपवीत कराने के पक्ष में क्यों नहीं था?

शास्त्रवचन है- 'जन्मना जायते शूद्रः संस्कारवान् द्विज उच्यते ॥' (स्कन्द 6.239.31)

स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम् उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद को बताया गया है। जन्म से (प्रत्येक) मनुष्य शूद्र, संस्कार से द्विज बनता है। माना जाता है कि उपनयन संस्कार के बाद व्यक्ति का दूसरा जन्म होता है। उपनयन’ का अर्थ है, ‘पास या सन्निकट ले जाना।’ किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। वेदाध्ययन के लिए जब बालक गुरु के सन्निकट जाता है, तब वह पूर्ण रूप से परिवार का मोह त्यागकर सिर्फ शिक्षा के लिए, ज्ञान के लिए ‘जनेऊ’ धारण करता है। यह जनेऊ उसे उसके संकल्प को स्मरण रखने में मदद करता है। यह संकल्प क्या होता है? यज्ञोपवीत (जनेऊ) की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का एक संकल्प चाहिए। 

-चार वेद

-चार उपवेद

-छह अंग

-छह दर्शन

-तीन सूत्रग्रंथ

-नौ अरण्यक सहित कुल 32 विद्याएँ होती है।

इसके अलावा वास्तु निर्माण, युजन कला, साहित्य, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, किन, बुनाई, आभूषण निर्माण, ऋषि ज्ञान आदि मिलाकर कुल 64 कलाएं होती हैं। यानी कुल 32+64= 96।
इनके अध्ययन के संकल्प का प्रतीक ही यज्ञोपवीत है। लेकिन क्या आज उपनयन संस्कार इसी व्यवस्था के तहत कराया या किया जाता है? 64 कलाएं छोड़ दीजिए। 4 वेद और 4 उपवेद तक का अध्ययन तक छोड़ दीजिए, उनके नाम तक पता नहीं होते हैं, और धारण करके यज्ञोपवीत खुद को बड़ा ‘सनातनी’ साबित करने में लगे हैं। मतलब हद है! 


सोशल मीडिया पर कई बार मैंने देखा कि अलग-अलग ग्रंथों का संदर्भ देते हुए यह प्रमाणित करने का प्रयास किया जाता है कि ‘जनेऊ’ ना धारण किया तो हिंदू कैसे हुए, ब्राह्मण कैसे हुए, धर्म का ज्ञान कैसे देने लगे? ऐसे अन्य कई अनर्गल प्रलाप लगातार चलते रहते हैं। तो आइए, आज ग्रंथों के संदर्भ के साथ ही बात करते हैं।


उपनयन संबंधी आयु निर्धारण के संबंध में यद्यपि वैदिक संहिताओं में कोई उल्लेख नहीं मिलता, किंतु गृह्यसूत्रों तथा स्मृतिग्रंथों में इसका स्पष्ट निर्देश पाया जाता है। इन ग्रंथों के मुताबिक, अधिकतम 12 वर्ष तक यज्ञोपवीत हो जाना चाहिए, यानि अधिकतम् 12 वर्ष की आयु तक आते-आते वेदाध्ययन प्रारंभ हो जाना चाहिए, सिर्फ धागों के एक समूह को जनेऊ समझने वाले बताएं कि उनका यज्ञोपवीत किस आयु में और किस उद्देश्य के साथ हुआ था!


पद्म पुराण के कौशल खण्ड में आया है:

कोटि जन्मार्जितं पापं ज्ञानाज्ञान कृतं च यत् ।

यज्ञोपवीत मात्रेण पलायन्ते न संशयः ।।

अब इसकी व्याख्या कुछ ऐसे की जाती है- करोड़ों जन्म के ज्ञान-अज्ञान में किये हुए पाप यज्ञोपवीत धारण करने से नष्ट हो जाते हैं, इसमें किसी तरह का संशय नहीं है।

जबकि इसका वास्तविक अर्थ है कि यदि कोई वेदाध्ययन करे, ज्ञान अर्जित करे तो  करोड़ों जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। 

अब सवाल उठेगा कि वेदाध्ययन करने से पाप कैसे नष्ट होंगे? अरे भाई पुरानी परंपरा में ज्ञान का मतलब शिक्षा नहीं होता था, उसे अपने जीवन में उतारना, उस ज्ञान को विस्तार देना भी बड़ी जिम्मेदारी होती थी। जो अध्ययन कर रहा है, वह करता ही इसीलिए था कि समाजहित में उस ज्ञान का उपयोग कर सके। इसका प्रतीकशास्त्र ना समझे तो मत समझो, सिर्फ शब्दों में फंसे रहोगे तो मूढ़ ही कहलाओगे।

देवा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तर्षयस्तपसे ये निषेदुः ।

भीमा जग्या ब्राह्मणस्योपनीता दुर्धा दधाति परमे व्योयम् ।।

(ऋग्वेद 10।109।4)


ग्वेद में उल्लेखित इस सूक्ति के मुताबिक, प्राचीन तपस्वी सप्त ऋषि तथा देवगण ऐसा कहते हैं कि यज्ञोपवीत ब्राह्मण की महान् शक्ति है। यह शक्ति अत्यन्त शुद्ध चरित्रता और कठिन कर्तव्यपरायणता प्रदान करने वाली है। इस यज्ञोपवीत को धारण करने से नीच जन भी परमपद् को पहुंच जाते हैं।
अब कोई मूढ़ यह समझ ले कि धागों का एक समूह धारण कर लेने से कोई नीचकर्म वाला परमपद को प्राप्त कर लेगा तो मान लीजिए कि उसकी मति ज्ञान की परिधि से बाहर जा चुकी है। इसका सीधा सा अर्थ है- यज्ञोपवीत ब्राह्मण की महान् शक्ति है। अर्थात ब्राह्मण यानी जो ज्ञान के विस्तार के दायित्वबोध के बंधन में है, उसके लिए यज्ञोपवीत रूपी संकल्प एक महान शक्ति है। और इसी दायित्वबोध को यदि कोई नीचकर्म वाला भी समझ ले तो वह परमपद को प्राप्त कर ही लेगा।


आपस्तम्ब गृह्यसूत्र के अनुसार, उपनयन संस्कार केवल उन्हीं व्यक्तियों के लिए आवश्यक था, जो कि गुरुजनों के आश्रम में जाकर उनके सानिध्य में रहकर ब्रह्मचर्यादि व्रतों का पालन करते हुए गुरुमुख से वैदिक विद्याओं को प्राप्त करना चाहते थे। इसमें प्रत्येक वैदिक शाखा के अध्ययन के लिए उपनयन का पृथक्-पृथक् विधान हुआ करता था। अतः उपनयन उन लोगों के लिए अनिवार्य नहीं था, जो कि गुरुओं के आश्रमों में जाकर उनके नैकट्य में रहते हुए वेदाध्ययन के इच्छुक नहीं होते थे।


ये तो हो गए कुछ शास्त्रीय तर्क। अब आइए कुछ वैज्ञानिक तथ्यों पर बात कर लेते हैं। मैं बिना किसी शंका के यह मानता हूं कि भारतीय सनातन व्यवस्था में जितने भी संस्कार हैं, जितनी भी परंपराएं हैं, उनके पीछे नैतिक, सामाजिक, बौद्धिक कारण के साथ वैज्ञानिक कारण भी जरूर रहता है। हमारे ऋषियों ने ये परंपराएं और ये संस्कार बहुत सोच-समझकर बनाए थे। उस विज्ञान को किसी कथा-कहानी से जोड़ दिया गया, ताकि उसके अनुपालन में आसानी रहे। लेकिन इनका अनुसरण करते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसके अनुपालन के लिए जो रीति-नीति बनाई गई है, उसे ना छोड़ें, नहीं तो उसका दुष्परिणाम भी हो सकता है।

एक आसान उदाहरण से समझाता हूँ। प्राणायाम करना सेेहत के लिए बहुत लाभदायक होता है, लेकिन यदि भोजन के तुरंत बाद प्राणायाम करेंगे तो पेट दर्द, गैस, और एसिडिटी जैसी समस्याएं होने लगेंगी। यही चीज भारतीय परंपराओं के साथ भी है। वैसे सभी परंपराओं की बात करेंगे तो विषय बहुत लंबा हो जाएगा। सीधे-सीधे यज्ञोपवीत पर बात करते हैं और एक बहुत सामान्य से उदाहरण से समझते हैं।


चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है। कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जाग्रण होता है, पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

अब इस बात पर तो शोध हुआ है कि मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से लाभ होता है। और शोध तो आज हुआ है, हमारे मुनियों ने तो यह व्यवस्था बहुत पहले बना दी थी लेकिन यहां एक बात जो समझने वाली है कि यह लाभ तभी होता है, जब आप बैठकर लघुशंका करें। अब आप बताइए कि कितने लोग आज के समय में बैठकर लघुशंका करते हैं। ऐसे में क्या इस बात की संभावना नहीं है कि खड़े होकर दाएं कान पर जनेऊ लपेटकर लघुशंका करने से नुकसान नहीं होगा? बिलकुल वैसे ही, जैसे प्राणायाम की किसी क्रिया को ठीक प्रकार से ना करने पर उसका दुष्प्रभाव हो सकता है।

अंत में एक बात और, हर संस्कार के लिए एक समय सुनिश्चित है। गर्भाधान संस्कार जन्म के 10 वर्ष बाद नहीं हो सकता। विवाह संस्कार 70 वर्ष की आयु में नहीं हो सकता। अंतिम संस्कार व्यक्ति के जीवित रहते नहीं हो सकता। फिर उपनयन संस्कार कभी भी, किसी भी आयु में क्यों करना चाहिए? क्या यह उस संस्कार विशेष का अपमान नहीं है? 


Saturday, 4 January 2025

मनुष्यता के हत्यारे संग इतनी सहानुभूति! ‘तैमूर’ प्रशंसकों की मति ‘लंग’ है

जाते साल के साथ देश के जाने माने कवि डॉ. कुमार विश्वास ने एक कवि सम्मेलन के दौरान एक ऐसा सवाल उठाया, जिससे सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया। कुमार विश्वास के परिवार को, उनकी बेटियों को, उन्हें, उनकी विचारधारा को, सबको टारगेट किया जाने लगा। मीम्स बनने लगे, गंदी और भद्दी बातें होने लगीं लेकिन इन सबके बीच असल मुद्दा तो कहीं दूर ही रह गया। असल मुद्दा वह था जो डॉ. कुमार विश्वास ने उठाया था।

क्या गलत कहा था कुमार विश्वास ने? यही तो कहा था- मायानगरी में बैठने वाले लोगों को समझना पड़ेगा कि देश क्या चाहता है। अब ये चलेगा नहीं कि लोकप्रियता हमसे लोगे, पैसा हम देंगे, टिकट हम खरीदेंगे, हीरो-हीरोइन हम बनाएंगे। फिर तुम्हारी तीसरी शादी से औलाद होगी तो उसका नाम तुम बाहर से आने वाले किसी आक्रमणकारी पर रखोगे। ये चलेगा नहीं, इतने नाम पड़े हैं यार, कुछ भी रख लेते तुम. रिजवान रख लेते, उस्मान रख लेते, यूनुस रख लेते, हुजूर के नाम पर कोई नाम रख लेते. तुम्हें एक ही नाम मिला। जिस बदतमीज, लंगड़े आदमी ने हिंदुस्तान में आकर हमारी मां-बहनों का रेप किया, आप लोगों को अपने बेटे का नाम रखने के लिए वो लफंगा ही मिला. अब अगर इसे हीरो बनाओगे तो इसे खलनायक तक नहीं बनने देंगे, ये याद रखना। ये नया भारत है।

क्या गलत था इसमें? क्यों इस बयान को ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे डॉ. कुमार विश्वास कट्टर हो गए हैं? क्यों इसे ऐसे पेश किया गया जैसे डॉ. कुमार विश्वास मुस्लिम विरोध की बात कर रहे हैं? क्या कुमार विश्वास ने यह कहा था कि उस बच्चे का नाम ‘राम स्वरूप’ या ‘शिवकुमार’ होना चाहिए था? उन्होंने तो यही कहा था कि भई, हुजूर के नाम पर रख लेते, उस्मान, यूनुस, रिजवान कुछ भी रख लेते। लेकिन उस बात पर बात ही नहीं की गई। 30 सेकेंड का वीडियो काटकर फिर से एक राष्ट्रवादी को मुस्लिम विरोधी दिखाने की कोशिश की गई। मजेदार बात यह है कि अपने खुद के इतिहास और अस्तित्व की हत्या करके बाहर से आई एक अवैज्ञानिक, असामाजिक, अनैतिक वैचारिकी के पोषक अपने बिलों से बाहर निकले और लग गए मानवता के एक हत्यारे के महिमामंडन में।  

एक पत्रकार के तौर पर, एक भारतीय पत्रकार के तौर पर मेरी मुखरतम आवाज इस विषय पर उठनी चाहिए कि एक शख्स जो दिल्ली को लूटने की नीयत से समरकंद से हिंदुकुश की पहाड़ियों के रास्ते देश में दाखिल हुआ, जिसने करीब एक लाख हिंदुओं को कटवा दिया, हमारे देश के नागरिकों को कटवा दिया, इंसानों को कटवा दिया, उस मनुष्यता के हत्यारे शख्स के नाम पर इस देश में छोड़िए, दुनिया में किसी भी चीज का नाम क्यों होना चाहिए?

दिल्ली में दाखिल होते ही जिसने अपने सैनिकों को खुली छूट दे दी कि जाओ और धन से लेकर महिलाओं की इज्जत तक की लूट करो, वह हमारा हीरो बनेगा? मोहम्मद क़ासिम फ़ेरिश्ता अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द राइज़ ऑफ़ मोहमडन पावर इन इंडिया में' तैमूर के सैनिकों के आतंक के बारे में लिखते हैं, "हिंदुओं ने जब देखा कि उनकी महिलाओं की बेइज़्ज़ती की जा रही है और उनके धन को लूटा जा रहा है तो उन्होंने दरवाज़ा बंद कर अपने ही घरों में आग लगा दी। यही नहीं वो अपनी पत्नियों और बच्चों की हत्या कर तैमूर के सैनिकों पर टूट पड़े।"

आपको शर्म नहीं आती कि किसी ने अपने बच्चे का नाम उस क्रूर आक्रांता के नाम पर रख लिया और आप खामोश बैठे रहे! तुम मुसलमान हो? तैमूर के सैनिकों ने एक मस्जिद पर हमला करके वहां पर शरण लिए एक-एक शख्स को मौत के घाट उतार दिया था। तैमूर के सैनिकों ने काटे हुए सिरों की मीनार खड़ी कर दी और कटे हुए शरीर के टुकडों को चील और कौवों को खाने के लिए छोड़ दिया। यह कत्लेआम लगातार तीन दिनों तक चला था। जिस शख्स ने तुम्हारे इबादतगाह तक की मर्यादा की हत्या कर दी, उसकी पवित्रता की हत्या कर दी, तुम उसका महिमामंडन करने में लगे हो!

सोचकर देखो, एक शख्स ने 15 दिन में इतनी तबाही मचा दी थी कि उससे उबरने में दिल्ली को 100 साल लग गए थे, और आप उस शख्स को लेकर यह कह रहे हैं कि वह दुनिया का सबसे ताकतवर शासक था! 

कुछ लोग हैं, जो कह रहे हैं कि नाम में क्या रखा है? अजब-गजब से तर्क दे रहे हैं कि किसी रमेश नामक शख्स ने किसी रमेश नामक शख्स का बलात्कार कर दिया हो तो क्या लोगों को ‘रमेश’ नाम से नफरत करनी चाहिए। अरे भई! इतनी समझदारी भरी बातें कर रहे हो तो हिंदू होकर रख लो अपने बेटे का नाम रावण, बेटी का नाम शूर्पणखा और मुस्लिम होकर रख लो अपने बेटे का नाम इब्लीस। नहीं रख पाओगे! क्योंकि तुम भी जानते हो कि नाम से बहुत कुछ होता है, तुम्हें बस एक अजेंडा सेट करना है। अजेंडा- जिसमें सनातन को, राष्ट्रवाद को पीछे खड़ा किया जा सके। लेकिन इस अजेंडे के साथ काम करने वाले नेता, अभिनेता, पत्रकार, एक्टिविस्ट याद रखें कि अब यह नहीं चलेगा। दरअसल इसे चलने नहीं दिया जाएगा। बात हिंदू-मुसलमान की ना कभी थी और ना कभी होगी, बात सिर्फ देश की है, बात इतिहास की है, बात सही और गलत के नजरिये की है।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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