इस पर चर्चा इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि मुझे पता है कि मेरे लिखने पर पहली आपत्ति यही आएगी कि दूसरी पंक्ति में डॉ. कुमार विश्वास को युगकवि क्यों लिखा?
इसलिए डॉ. कुमार विश्वास ही हैं युगकवि
डॉ. कुमार विश्वास को युगकवि लिखने का मतलब यह नहीं है कि मैं या युगकवि लिखने, मानने या बोलने वाला कोई भी व्यक्ति उन्हें ‘कलियुग’ का सर्वश्रेष्ठ कवि कह रहा है। उनका साहित्यिक योगदान कितना बड़ा और महत्त्वपूर्ण है, इसका मूल्यांकन समय कर रहा है। हिंदी को पिछड़ों की भाषा मानने वाली वैचारिकी को उन्होंने समाप्त किया। नए बच्चों को तैयार किया कि वे भारत के गैर-हिंदीभाषी राज्यों समेत दूसरे देशों में हिंदी की कविता पढ़ सकें और उसके लिए लाखों रुपये ले सकें। उन्होंने अपने रहते साहित्यकारों को यह वैभव दिलाया कि वे अभाव में न जिएं। ऐसा न हो कि फटे कपड़ों में साहित्यकार बिना दवाई के मर गया और बाद में उस पर पीएचडी बाँटी जा रही है।
आपके बच्चे पढ़ेंगे ‘विश्वास युग’, लिख लीजिए
अगर साहित्य की थोड़ी-सी समझ होगी, तो आपको अच्छी तरह पता होगा कि यहाँ युग का निर्धारण साहित्यिक प्रवृत्तियों, सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटनाओं, ऐतिहासिक कालक्रम और भाषा के विकास के आधार पर होता है। आप सभी ने द्विवेदी युग, भारतेंदु युग जैसे साहित्यिक युग सुने ही होंगे। हो सकता है कि आप कहें कि इन युगों के नाम तो उन साहित्यकारों के इस लोक से जाने के बाद दिए गए। तो भाईसाहब! यही बदलाव आया है कि इस दौर को लोगों ने, श्रोताओं ने, नेताओं ने, कवियों ने और कवि-सम्मेलन आयोजकों ने कुमार विश्वास का काल, कुमार विश्वास का युग मान लिया है। और आज मैं पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ, लिख लीजिए, स्क्रीनशॉट ले लीजिए, आने वाले कल में इस युग को ‘विश्वास युग’ कहकर आपकी दो पीढ़ियों बाद की पीढ़ी को पढ़ाया जाएगा।
‘मंगल रंग’ पर आपत्ति क्यों?
अब वापस आते हैं ‘मंगल रंग’ पर। असल में आपत्ति क्या है? गीत के शब्दों में कोई त्रुटि है? संगीत आपको कनेक्ट नहीं कर रहा, उसमें देवत्व का भाव नहीं आ रहा? आखिर समस्या कहाँ है? और उससे भी बड़ा सवाल, ये सवाल उठा कौन रहा है?
विवाह के जिस मंगल-उत्सव में समस्त देवी-देवताओं को साक्षी मानकर, उन्हें आमंत्रित करके वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य दो आत्माओं को सात जन्मों तक एक-दूसरे का साथ निभाने का संकल्प लेना चाहिए, उस पावन अवसर पर जब तुम उस गृहलक्ष्मी को अपने घर में मर्यादा और सम्मान के साथ आमंत्रित करने के स्थान पर शराब के नशे में ‘लौंडिया लंदन से लाएँगे’, ‘चोली के पीछे क्या है’ और ‘तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त’ जैसे अश्लील गीतों पर हुड़दंग मचाते हुए उसे लेने जाते हो, तब तुम्हारी भावनाएँ आहत नहीं होतीं?
जिस उत्सव में वधू को सम्मानपूर्वक अपने परिवार का हिस्सा बनाने की मंगलकामना होनी चाहिए, वहाँ उसे किसी वस्तु की तरह संबोधित करने वाले गीतों पर थिरकते हुए तो तुम्हें तनिक भी संकोच नहीं होता? तुम्हारी भावनाएँ तब भी आहत नहीं होतीं, जब पाणिग्रहण संस्कार के लिए पुरोहित द्वारा निर्धारित शुभ मुहूर्त की अवहेलना करके तुम चार-चार घंटे विलंब करते हो? जब तुम्हारे लिए वैदिक विधि-विधान से अधिक महत्त्व किसी वीआईपी के साथ मंच पर तस्वीर खिंचवाने, अपनी कथित प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने और डीजे को चार घंटे और बजवाने का हो जाता है।
आज एक गीत आया है, जो परमपिता परमेश्वर के मनुष्य रूप में अवतरण के पश्चात माता के साथ उनके परिणय का है, तो तुम उसके संगीत में खामियाँ निकाल रहे हो।
रामायण और मानस में कैसा था श्रीराम का विवाहोत्सव?
चलो! अब कव्वाली पर आते हैं। जरा सोचो! भगवान राम और माता सीता के विवाह के समय पीछे से किसी भी तरह का गाना बजा होगा?
क्या मूर्खतापूर्ण बात है! महिलाएँ मंगलगीत गा रही थीं, मंत्रोच्चार हो रहा था, देवता पुष्पवर्षा कर रहे थे। यही सब तो है रामायण और श्रीरामचरितमानस में। आज के किसी भी तरह के संगीत को उस समय से नहीं जोड़ा जा सकता। और रही बात कव्वाली की, तो अगर कव्वाली जैसा लग भी रहा है, तो समस्या क्या है?
इस गाने के लिरिक्स समझे आपने?
शब्द सुने हैं आपने उस गीत के? उस गीत का भाव समझा है आपने? एक रामभक्त और हिंदी का एक विद्यार्थी होने के नाते मुझे इस गीत में क्या भाव दिखे, कुछ पंक्तियों से समझाता हूँ:
तू ही मुझ निर्गुण का सगुण अभिमान भी तू
निर्गुण अर्थात गुणों और रूप की सीमाओं से परे परम तत्त्व; सगुण अर्थात वही परम तत्त्व, जो रूप और गुणों के माध्यम से अनुभव किया जा सके। श्रीराम परम तत्त्व के अवतार हैं, जो मनुष्य के रूप में प्रकट होकर धर्म, करुणा और मर्यादा को जीवन में उतारते हैं। लेकिन जब वे सगुण रूप में आते हैं, मनुष्य रूप में आते हैं, तो उन्हें क्या चाहिए? यह तीसरी पंक्ति में स्पष्ट होगा।
तू ही है धरती की महिमा, सम्मान भी तू
सीता जी का एक प्रसिद्ध नाम भूमिजा है, अर्थात धरती से प्रकट हुईं। यहाँ धरती केवल जन्मभूमि नहीं, बल्कि धैर्य, सहनशीलता, उर्वरता और जीवन को धारण करने वाली शक्ति है। प्रकृति केवल जीवन की पृष्ठभूमि नहीं; वह स्वयं जीवन का आधार और सम्मान की अधिकारी है।
तेरे होने से ही मेरा होना है, जन्मों से संग तेरे
ऊपर की दो पंक्तियों का अर्थ इस तीसरी पंक्ति से खुल रहा है। मेरे भगवान जब सगुण स्वरूप में आए, मनुष्य रूप में आए, तो उन्हें प्रकृति की आवश्यकता थी। धरती मनुष्यता के लिए जीवन है। यदि धरती और पर उसपर उपजने वाली प्रकृति ही न हो, तो ‘जीवन’ चल ही नहीं सकता। और यह संबंध सदा स्थायी था, है और रहेगा।
तू है इन हाथों की रेखा, मर्यादा भी तू
सनातन परंपरा में हाथों की रेखाएँ नियति और भविष्य की संभावनाओं का प्रतीक हैं। अर्थात मेरी माता कह रही हैं कि उनके प्रेमी, उनके पति से ही उनका भविष्य हैं। वह मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को ही अपनी मर्यादा बता रही हैं। प्रेम में इससे अधिक कोई कुछ कह सकता है? हाँ! मेरे राम कह सकते हैं। श्रीराम आगे कह रहे हैं:
तुम ही हो इस जीवन का अर्थ, तुम्हारे बिना स्वर्ग भी व्यर्थ
अहा! इस पंक्ति पर तो सब न्योछावर है। क्या अद्भुत पंक्ति है! महर्षि वाल्मीकि रामायण में बताते हैं कि श्रीराम, माता सीता से कहते हैं-
अर्थात- सीते! अब तुम वनवास के योग्य दान आदि कर्म प्रारंभ करो। इस समय तुम्हारे इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेने पर तुम्हारे बिना स्वर्ग भी मुझे अच्छा नहीं लगता है।
इस बात को कितने सुंदर शब्दों के चयन के साथ प्रस्तुत किया गया है, उस पर आपकी नज़र नहीं गई। याद करिए रामानंद सागर जी की ‘संपूर्ण रामायण’। उसमें गीत था- ‘श्री रघुवर कोमल कमलनयन को, पहनाओ जयमाला…’ क्या वह किसी शास्त्रीय शैली में था? उसमें रवींद्र जैन जी ने एकदम नई शैली से परिचय कराया था, लेकिन उसका विरोध नहीं हुआ, क्योंकि उस समय आप नहीं थे, सोशल मीडिया नहीं था। राम नाम का विस्तार हो रहा था, उनके चरित्र का विस्तार हो रहा था, सब साथ थे। अभिनेता और अभिनेत्री को राम-सीता के रूप में ही स्वीकार कर लिया गया था। पूजा घरों में उनकी तस्वीरें रखी जाती थीं।
रामानंद सागर की रामायण में कौन सी शास्त्रीय शैली थी?
वह रामायण उस समय के हिसाब से बनी थी, उस समय की तकनीक के हिसाब से। विधर्मी उसका भी विरोध करते थे, कुंभकर्ण के आकार, बाणों से निकलती रोशनी, पुष्पक विमान; इन सब पर कुछ विधर्मी हँसते थे। लेकिन आज भी वरमाला के समय अधिकांशतः उसी रामायण का यही गीत बजता मिलता है। आपको इतनी छोटी-सी बात समझ में नहीं आ रही है कि श्रीराम के नाम को विश्व पटल पर स्थापित करने की कोशिश हो रही है। दुनियाभर में लोग एक असली हीरो की वीरगाथा देखने के लिए उत्सुक हैं, लेकिन आपको केवल बवाल करना है, क्योंकि आप खाँचों के बाहर देखना ही नहीं चाहते।
संगीत की विधा से परेशानी क्यों?
मैं यह बिल्कुल भी नहीं कह रहा हूँ कि हमारे इतिहास के साथ छेड़छाड़ होनी चाहिए। मैंने अभी फ़िल्म नहीं देखी है। फ़िल्म आएगी, देखूँगा, फिर तय करूँगा कि यह भारतीय परंपरा और विरासत को विस्तार देने वाली है या उससे छेड़छाड़ करने वाली। लेकिन गीतों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि इस फ़िल्म के गीतों में बहुत कुछ विशेष है। कव्वाली जैसा संगीत लग रहा है, तो लगने दीजिए। आपको तो अनुभूति हो रही है न? और कव्वाली कहाँ से आई है? भारत से ही है न? दुनिया में जितने तरह के संगीत हैं, उनका जनक सामवेद ही है। और क्यों ही संगीत को इस्लाम से जोड़ना? इस्लाम में तो संगीत ही हराम है। संगीत देवी मां सरस्वती हैं, जिस संगीत में ईश्वर का गुणगान हो, वह माता के ही आशीष से निकला है।
रामकाज में डिस्टर्ब मत करो
जब ‘आदिपुरुष’ आने वाली थी और उसका बॉयकॉट शुरू हुआ था, मैंने तब भी कहा था कि फ़िल्म देखे बिना बॉयकॉट करना गलत है। आज फिर कह रहा हूँ, फ़िल्म देखिए। श्रीराम के नाम का विस्तार हो रहा है, प्रसन्नता से स्वीकार करिए। रामकाज है, डिस्टर्ब मत करिए… उनके काम में डिस्टर्ब करने वालों से हनुमान जी बात करते हैं।


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