बचपन में घर में हमारी ‘बूढ़ी अम्मा’ (परदादी) सोने से पहले रात में कहानियां सुनाती थीं। लवकुश, आरुणि, एकलव्य, अष्टावक्र, भरत जैसे बालकों के जीवन, ज्ञान, पराक्रम को सुनकर ही नींद आती थी। रामायण-महाभारत की हजारों कथाएं, जो उन्हें कंठस्थ थीं, उनका लाभ मुझे भी मिला। वैसे तो उस वक्त बहुत छोटा था, लेकिन उस समय की स्मृतियां आज भी मस्तिष्क में हैं। सीतापुर के एक छोटे से कस्बे में रहते थे, टीवी था लेकिन बिजली नहीं थी, बाहर से बैटरी चार्ज होकर आती थी तो उसमें चित्रहार, चंद्रकांता और अलिफलैला ही चलता था, वो भी हमें देखने की अनुमति नहीं थी। उस वक्त में ‘मनोरंजन’ का एक ही साधन था, वो था- बूढ़ी अम्मा की कहानियां।बूढ़ी अम्मा की कथाएं ही थीं, जिन्होंने राम और कृष्ण से परिचय कराया, वो भी अपने पूर्वज के तौर पर। और वही थीं, जिन्होंने दुनिया के सबसे बड़े शत्रु रावण के विषय में बताया। कक्षा-7 में पहुंचा तो सिधौली से निकलकर लखनऊ पहुंचा। वहां ना बिजली की समस्या थी, ना टीवी की। लेकिन टीवी देखने का समय बस उतनी देर के लिए मिलता था, जितनी देर रात में रामायण आती थी। उस रामायण में जब सीता-परित्याग देखा तो उसे भी रामकथा का हिस्सा मान लिया। हालांकि इस विषय में मैंने कभी अपनी ‘बूढ़ी अम्मा’ से नहीं सुना था। थोड़ा और बड़ा हुआ, अध्ययन बढ़ा, ज्ञानियों से संपर्क-संवाद बढ़ा तो पता लगा कि एक राजा ने अपनी प्रजा के एक शख्स के कहने पर अपनी पत्नी का परित्याग कर दिया। उस समय तक सोचने-समझने की क्षमता एक परिधि तक ही सीमित थी। धीमे-धीमे इंटरनेट आया, साइबर कैफे में ऑरकुट, रैडिफ पर समय देने लगा तो पता लगा कि रावण तो अत्यंत ज्ञानी था, उसने तो अपनी बहन का बदला लेने के लिए माता सीता का अपहरण किया था, राम ने ‘छलपूर्वक’ बालि को मारा, और भी ऐसे कई प्रलाप पढ़ने को मिल जाते थे। मानस में तो असल रामायण और उसके चरित्रों की छवि की वही थी जो ‘बूढ़ी अम्मा’ ने सुनाई थी, लेकिन आगे के ‘प्रलाप’ सुनकर/पढ़कर आप यदि 8वीं/9वीं के छात्र हैं तो क्या ही तर्क दे पाएंगे, वह भी तब जब आपका अध्ययन ऐसे विषयों पर कुछ खास ना हो। 8वीं से लेकर 12वीं तक तो आप वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में अपने पाठ्यक्रम से इतर कुछ और अध्ययन कर ही नहीं कर पाते। ईश्वर की कृपा से 11वीं के बाद 8-10 साल अध्ययन का खूब समय मिला, कोशिश करता था कि दो-तीन दिन में एक पुस्तक तो पढ़ ही डालूं। खैर, जब अध्ययन बढ़ा तो जिज्ञासाएं भी बढ़ीं, मन में प्रश्न भी उठे, लेकिन उनके संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाते थे।
पत्रकारिता शुरू करने के साथ ही जिज्ञासाएं और बढ़ीं, प्रश्न और बढ़े। अब किसी विषय पर कोई कुछ कहे तो शोध करके तथ्यों और तर्कों के साथ जवाब देने की प्रवृत्ति बनने लगी। समझ में आया कि किस तरह से भारत के इतिहास, भारत के महापुरुषों की छवियों को खराब करने के प्रयास किए गए हैं। पता लगा कि किस तरह से भारतीय साहित्य में मिलावट करके हमारे मस्तिष्क में शंका का बीज बोया गया। परब्रह्म पर भी प्रश्न उठाने वाले विचार को स्वीकार्यता देने वाले देश के मानस को ऐसा बनाया गया कि वे उस ‘मिलावट’ पर प्रश्न उठाने के बजाय उसे जस्टिफाई करने लगे। ये जस्टिफाई करने वाले कुछ लोग तो अनजाने में इस भाव के साथ कर रहे थे कि ‘उनके सामने जो लिखा हुआ इतिहास रखा है, उसपर सवाल कैसे उठाएं।’ दूसरे कुछ लोग योजनाबद्ध तरीके से इस ‘मिलावट’ को और अधिक वैचारिक मजबूती देने में लगे थे। वे रावण को महाज्ञानी, महापंडित, महाभक्त, अद्भुत भाई और भी ना जाने क्या-क्या बताकर पेश करने में लगे थे/हैं। वे रावण-वध को गलत नहीं बता रहे हैं, वे कह रहे हैं, कि राम द्वारा रावण का वध किया जाना, एक लीला थी। वे इस विचार को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं कि सीता जीवित मिलीं यह निश्चित रूप से श्रीराम की ताकत थी, परन्तु वह पवित्र मिलीं यह रावण की मर्यादा थी। वे राम को अपनी पत्नी का परित्याग करने वाले ‘पति’ के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। वे ‘सीता-परित्याग’ को गलत नहीं कह रहे हैं, वे कह रहे हैं कि राम ने सही किया।
अब आपके मन में सवाल उठ सकता है कि ऐसा करके क्या मिलेगा?
दरअसल ऊपर लिखी पूरी कहानी का उद्देश्य इसी प्रश्न पर बात करना था। वे चाहते हैं कि आपको मर्यादा सिखाने के लिए आपके बीच, आपके ही रूप में आकर, आपकी तरह से ही जीवन जीने वाले मानक व्यक्तित्व को आप अपने जैसा मानें ही ना। आप उन्हें भगवान मान लें, आप रामायण को कहानी मान लें, आप हर मर्यादा के मानक को यह कहकर टाल दें कि अरे! वह तो भगवान थे, उन्होंने कर लिया, हम तो इंसान हैं, हम कैसे कर पाएंगे। वे चाहते हैं कि हम हर बुरी चीज को कहीं ना कहीं भगवान से जोड़कर ‘जस्टिफाई’ करने लगें।
विश्वास नहीं है?
कृष्ण की रासलीला को किस रूप में प्रस्तुत किया गया? लड़कियों को छेड़ने वाला ना? क्या कहा गया- ‘तुम करो तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला’। भुवनमोहन कन्हैया से लेकर योगेश्वर कृष्ण को तुमने किस रूप में पेश नहीं किया? रणछोड़ कह दिया, लेकिन पीछे की कहानी नहीं बताई। छलिया कह दिया, लेकिन उस कथित छल का उद्देश्य नहीं बताया।
कर्ण का नाम सुनते ही क्या दिमाग में आता है? बहुत अच्छा मित्र, यही ना? अरे पढ़िए महाभारत से जुड़ा वास्तविक इतिहास, पूरी महाभारत के पीछे कर्ण ही था। दुर्योधन तो मान भी जाता, दे देता शायद पांच गांव भी, लेकिन वह कर्ण ही था जिसने मित्रता के नाम पर दुनिया के सबसे बड़े युद्ध को कराया।
रावण अच्छा भाई था? रावण बहुत मर्यादित था? नहीं, असल बात यह है कि रावण ने सीता को बलपूर्वक इसलिए हाथ नहीं लगाया क्योंकि उसे कुबेर के पुत्र नलकुबेर ने श्राप दिया था कि यदि रावण ने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध अनैतिक कामेच्छा से छुआ या अपने महल में रखा तो उसके सिर के सौ टुकड़े हो जाते। रावण को एक मानक भाई बताने वालों से पूछिएगा कि शूर्पणखा को विधवा किसने किया था, उसके पति विद्युतजिव्ह की हत्या किसने की थी?
ऐसे रावण को महिमामंडित करने का षणयंत्र कितने संगठित रूप से चल रहा है, उसका अंदाजा लगाइए। ये षणयंत्र व्यक्तिगत नहीं है। इसमें वे सरकारें भी शामिल हैं, जिनकी पार्टियों के नेता श्रीराम के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। जिनके नेताओं की नानी को भी अहंकार के शमन के बाद बनने वाला श्रीरामलला का मंदिर स्वीकार नहीं है।
ये नेता अब उन लोगों का सहारा लेकर राजनीति करने निकल चुके हैं, जो आपके मस्तिष्क में शंका का जहर घोल रहे हैं। हिंदुओं को उस राजनीतिक पार्टी से दूर करने का प्रयास है, जो श्रीराम के नाम पर राजनीति करती है। ऐसे में पंजाब के उन 38% हिंदुओं को भाजपा से दूर करने के लिए ‘राम’ के नाम का सहारा लेकर ‘रावण’ के महिमामंडन का प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रम का नाम है- ‘हमारे राम’। एक शो का चार्ज है लगभग 3 करोड़ और आम आदमी के टैक्स से प्राप्त पैसे से ऐसे 40 से अधिक कार्यक्रम कराए जाएंगे। इसके अतिरिक्त, आयोजन, प्रचार और अन्य व्यवस्थाओं पर होने वाले खर्च को भी जोड़ लिया जाए तो अनुमान के मुताबिक करीब 200 करोड़ रुपये पंजाब की सरकार ‘हमारे राम’ के सहारे रावण का महिमामंडन करेगी।
अब प्रश्न सीधा है, जनता के टैक्स के पैसों से वैचारिक मिलावट का यह प्रयोग किसके इशारे पर और किस उद्देश्य से किया जा रहा है? आम आदमी पार्टी की सरकार यह बताए कि क्या उसकी जिम्मेदारी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार है या फिर सांस्कृतिक भ्रम फैलाकर आस्था को संदिग्ध बनाने की? जिन श्रीराम से देश-दुनिया के करोड़ों लोगों का विश्वास जुड़ा है, उन्हीं राम की पत्नी, भारतेश्वरी माता सीता का अपहरण करने वाले के चरित्र को ‘अद्भुत’ दिखाने का प्रयास करने वाले कार्यक्रमों पर सैकड़ों करोड़ उड़ाना, क्या यही “ईमानदार राजनीति” है? अगर यह सांस्कृतिक विमर्श है, तो इसमें रावण-महिमामंडन क्यों? और अगर यह राजनीति है, तो फिर जनता को साफ-साफ क्यों नहीं बताया जाता कि उनके पैसे से किस वैचारिक एजेंडे का पोषण किया जा रहा है?
और सबसे गंभीर सवाल कलाकारों की भूमिका पर है। आशुतोष राणा जैसे प्रभावशाली कलाकारों से पूछा जाना चाहिए कि क्या मंच पर खड़े होकर भ्रम को वैचारिक गरिमा देना आपकी कला का उद्देश्य है? क्या अभिनय की प्रतिष्ठा का उपयोग कर आस्था पर प्रहार करना “रचनात्मक स्वतंत्रता” कहलाता है? जब कलाकार सत्ता के वैचारिक औज़ार बन जाएँ, तब सवाल उठाना अपराध नहीं, दायित्व होता है, और ऐसे सवाल हर उस व्यक्ति को उठाने चाहिए, जिसे इस देश की वैचारिकी, इसके इतिहास, इसकी परंपराओं पर विश्वास है।
एक कोशिश, आपको समझने की। एक कोशिश, खुद को समझाने की। एक कोशिश, आपसे जुड़ने की। एक कोशिश, आपकी आवाज बनने की। एक कोशिश, खुद के नाम को सार्थक करने की।
Sunday, 15 February 2026
रावण का महिमामंडन! आशुतोष राणा के साथ मिल कौन सी साजिश रच रही केजरीवाल की AAP?
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