Thursday, 25 June 2026

वर्दीधारी 'पागलों' ने भरत तिवारी की 'हत्या' कर डाली!

भरत तिवारी का तरीका गलत रहा होगा। उसने अवैध हथियार उठाया, अधिकारियों को धमकाया, कानून को अपने हाथ में लिया, उसकी आलोचना होनी चाहिए। कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता। लेकिन क्या पूरी कहानी यहीं पर खत्म हो जानी चाहिए?
क्या किसी इंसान की पूरी जिंदगी को उसकी गलतियों के एक पन्ने में समेट देना ही न्याय है? क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि आखिर एक गरीब गांव का लड़का उस मोड़ तक पहुंचा ही क्यों, जहां उसे बंदूक उठानी पड़ी? क्या यह जानने की कोशिश नहीं होनी चाहिए कि जिन लोगों को जनता ने शासन चलाने के लिए चुना, जिन अधिकारियों की तनख्वाह इन्हीं गरीब किसानों, मजदूरों और गांव वालों के टैक्स से मिलती है, उन्होंने उसकी और उसके गांव की चिंता क्यों नहीं की?

भरत तिवारी लंबे समय से अपने इलाके की समस्याओं, खासकर बाढ़, कटाव और विस्थापन जैसे मुद्दों को उठा रहा था। गांव के लोग उसे अपना प्रतिनिधि मानते थे। आज भी उसके गांव के लोग यही कह रहे हैं कि "अब हमारी बात कौन सुनेगा?" यह सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर अविश्वास का प्रमाण है, जिसने लोगों को यह महसूस करा दिया कि उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचती ही नहीं।

सबसे बड़ा सवाल , भरत तिवारी की 'हत्या' 
परिवार, ग्रामीणों और कई स्थानीय लोगों की मत मानिए, वीडियो देखिए, आखिरी लाइव में साफ दिख रहा है कि भरत ने बंदूक फेंक दी थी, आत्मसमर्पण कर दिया था, तो फिर उसके बाद गोली क्यों चली? अगर वह निहत्था हो चुका था, तो फिर उसे जिंदा गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? 

इस लोकतांत्रिक देश में पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार और जिम्मेदारी दी गई है। पुलिस अदालत नहीं है, पुलिस जज नहीं है, पुलिस जल्लाद भी नहीं है। किसी व्यक्ति के अपराध को तय करने और सजा सुनाने का अधिकार सिर्फ न्यायपालिका को है। अगर यह सिद्धांत कमजोर पड़ गया, तो फिर संविधान की किताबों और जंगल के कानून में फर्क ही क्या रह जाएगा?

यह सवाल सिर्फ भरत तिवारी का नहीं है।

यह सवाल उन हजारों गांवों का है, जहां लोग सालों तक अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं होती। यह सवाल उस शासन व्यवस्था का है, जो जनता की समस्याओं को फाइलों में दबाकर भूल जाती है और फिर किसी त्रासदी के बाद बयान जारी करती है।

प्रशासन यह कह रहा है कि भरत तिवारी का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं था। मान लीजिए, एक पल के लिए यह बात सही है। तब सवाल और गंभीर हो जाता है। अगर कोई व्यक्ति मानसिक तनाव या असामान्य मानसिक स्थिति में था, तो ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए प्रशिक्षित पुलिस बल की भूमिका क्या होनी चाहिए थी? क्या ऐसे मामलों में संयम, संवाद और स्थिति को नियंत्रित करने की पेशेवर क्षमता नहीं दिखाई जानी चाहिए थी? जिन पुलिसकर्मियों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संकट की परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, उनसे समाज अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा करता है। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम पर उठ रहे सवालों का निष्पक्ष और पारदर्शी जवाब मिलना जरूरी है, क्योंकि अगर प्रशिक्षित तंत्र भी तनावपूर्ण परिस्थितियों में संयम खो दे, तो फिर आम नागरिक अपने जीवन और अधिकारों की सुरक्षा के लिए किस पर भरोसा करेगा?

अगर भरत तिवारी ने कानून तोड़ा था, तो उसे अदालत के सामने पेश किया जाना चाहिए था। अगर उसने अपराध किया था, तो उसे कानून के मुताबिक सजा मिलनी चाहिए थी। लेकिन आत्मसमर्पण के बाद भी उस पर गोली चलाई गई, यह सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर हमला है।

अगर इस देश में आत्मसमर्पण करने के बाद भी किसी नागरिक की जान सुरक्षित नहीं है, तो मान लीजिए संविधान में लिखे मौलिक अधिकार सिर्फ शब्दों का एक गुलदस्ता हैं। सत्ता और प्रशासन को यह समझना होगा कि डर से शासन चल सकता है, सम्मान नहीं कमाया जा सकता। अगर जनता की आवाज़ को लगातार अनसुना किया जाएगा, अगर फरियादी को अपराधी और सवाल पूछने वाले को दुश्मन समझा जाएगा, तो व्यवस्था के प्रति लोगों का भरोसा टूटेगा ही। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है, और जिस दिन यह विश्वास पूरी तरह खत्म हो गया, उस दिन सबसे बड़ी हार किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की होगी।

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