Tuesday, 9 June 2026

प्रिय Gen Z! दुनिया ‘ऑप्शन्स’ से नहीं, जिम्मेदारियों से चलती है

पिछले कुछ दिनों से एक बात बार-बार सुनने को मिल रही है। कहा जा रहा है कि पुरानी पीढ़ियाँ, खासकर Gen Y, ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा ऐसी नौकरियों में गुज़ार दिया जहाँ उन्हें सम्मान नहीं मिला, जहाँ उन्होंने ज़रूरत से ज़्यादा काम किया, जहाँ उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी की कीमत पर संस्थानों को प्राथमिकता दी। और वो नया वर्ग, वो नई जेनरेशन, Gen Z कहते हैं कि "हम ऐसा नहीं करेंगे।"

ठीक है। क्या करना है और क्या नहीं, यह व्यक्ति का अपना फैसला होता है, लेकिन लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब एक पूरी की पूरी पीढ़ी कुछ ऐसे विचार के अधीन हो जाए, जिससे उनका खुद का, उनके परिवार का, समाज का, देश का और विशेषतः मनुष्यता का नुकसान हो। समस्या तब होती है, जब अपने फैसलों को सही साबित करने के लिए पिछली पीढ़ियों को गलत साबित करना ज़रूरी समझ लिया जाता है। आज मन है कि इन ‘बच्चों’ से बात की जाए। कम से कम पीढ़ी बदल जाने के कुतर्क के साथ ‘हम भारत के लोग’ अपने बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से तो नहीं भाग सकते। 

जब भी पीढ़ी बदलती है, तब पहले वाली पीढ़ी और बाद वाली पीढ़ी दोनों को अजस्ट करने में थोड़ी समस्या होती है, लेकिन इतनी पीढ़ियां बदलने-बीतने के बाद भी हिंदुस्तान में बच्चे अपने दादा-दादी के साथ जितना खुश महसूस करते हैं, वो किसी के साथ नहीं करते, क्योंकि हमने परिवार बचाकर रखे हैं, हमने परिवार में संस्कार बचाकर रखे हैं, हमने रिश्ते बचाकर रखे हैं, हमने यह आत्मबोध बचाकर रखा है कि ‘मैं’ हूं, क्योंकि ‘ये’ सब भी हैं। आज पूरी दुनिया में भारतीय मस्तिष्क को प्रणाम किया जा रहा है, कभी सोचा है क्यों? क्योंकि ‘परिवार’ जैसी प्रारंभिक इकाई से दायित्वबोध का जो बीज उनके मस्तिष्क में डाला जाता है, वह आगे चलकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के रूप में वृक्षाकारित हो जाता है। 

अब, Gen Z के दौर में डर लग रहा है। कई बार इनके व्यवहार को देखकर लगता है कि ये अगर इसी व्यवहार के साथ किसी ऐसे पेशे में आए, जहां लोग उनसे इतने प्रभावित हो जाएं कि हमें इनके जैसा बनना है तो देश कहां जाएगा, परिवार कहां जाएगा। कुछ दिनों से विभिन्न सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर (विशेषकर Linkedin पर) कई पोस्ट्स देख चुका हूं, जिनमें 'काम' के बोझ से बचने के टिप्स दिए जा रहे हैं। जिनमें आपके 'अधिकारों' की बात हो रही है, जिनमें बताया जा रहा है कि ऑफिस से निकलकर ऑफिस के ग्रुप्स को म्यूट कर दीजिए, जिनमें बताया जा रहा है कि ऐसा करके आपकी मेंटल हेल्थ अच्छी होगी। कुल मिलाकर आपको यह बताया जा रहा कि 'कामचोर' बनो, सब ठीक रहेगा।

हां, हो सकता है कि आपके मेरे 'कामचोर' शब्द से आपत्ति हो, लेकिन सत्य यही है कि अनियोजित तरीके से ही सही, आपके DNA से 'दायित्वबोध' को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। पश्चिम ने आपसे सबकुछ छीन लिया है। आप हर बात में, हर काम में, हर रिश्ते में, सिर्फ ‘फायदा’ खोजने लगे हैं। आपके दिमाग में यह भर दिया गया है कि आपके पास पैसा है तो सबकुछ है। लेकिन हमें ये नहीं सिखाया गया। हमें बताया और सिखाया गया कि रिश्ते सबकुछ है, समाज सबकुछ है, देश सबकुछ है। ऐसी ही एक पोस्ट देखी तो सोचा कि बात करनी चाहिए…

तुम कहते हो कि तुम दुखी रहकर वफ़ादारी साबित नहीं करना चाहते।

सवाल यह है कि क्या हर असुविधा दुख है? क्या हर संघर्ष शोषण है? क्या हर दबाव अन्याय है? और क्या हर त्याग मूर्खता है?

जीवन का कोई भी क्षेत्र उठा कर देख लो, व्यापार, खेल, कला, साहित्य, विज्ञान या सेना, हर जगह सफलता के पीछे ऐसा वक्त छिपा होता है, जिन्हें बाहर से देखने वाले लोग "कठिन समय" कहते हैं। लेकिन वही समय व्यक्ति का निर्माण भी करता है। आज की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि लोग नौकरी बदल रहे हैं। नौकरी बदलना कोई अपराध नहीं है। समस्या यह है कि धैर्य की अवधि लगातार छोटी होती जा रही है। पहले लोग किसी भूमिका में खुद को साबित करने की कोशिश करते थे। अब कई बार लोग खुद को साबित करने से पहले ही यह तय कर लेते हैं कि उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं मिल रहा।

पहले लोग पूछते थे, "मैं इस काम में और बेहतर कैसे बन सकता हूँ?" अब अक्सर पहला सवाल होता है, "मुझे इससे क्या मिल रहा है?"

दोनों सवाल गलत नहीं हैं। लेकिन दूसरा सवाल पहले से पहले आ जाए, तो समस्या शुरू होती है। आज सोशल मीडिया ने एक नई भाषा बना दी है।

अगर बॉस ने परफॉरमेंस सुधारने को कहा तो वो टॉक्सिक हो जाता है।  अगर अतिरिक्त प्रयास की ज़रूरत है तो वह बर्नआउट लगता है। अगर प्रमोशन देर से मिलता है तो एक्सप्लॉइटेशन हो जाता है। अगर किसी निर्णय से असहमति हुई तो रेड फ्लैग लगने लगता है। ऐसा लगता है जैसे पेशेवर जीवन के हर असुविधाजनक हिस्से के लिए एक नया लेबल तैयार है। लेकिन सच्चाई यह है कि जीवन का बड़ा हिस्सा असुविधाजनक ही होता है। स्किल डिवेलप करना असुविधाजनक है, क्योंकि अब AI की स्किल्स पर भरोसा किया जा रहा है। अनुशासन असुविधाजनक है। आलोचना सुनना असुविधाजनक है। गलतियों से सीखना असुविधाजनक है। और जिम्मेदारी उठाना भी असुविधाजनक है। लेकिन तुम ये भूल रहे हो कि इन्हीं चीज़ों से व्यक्तित्व बनता है।

तुम कहते हो कि तुम्हारे पास ‘ऑप्शन्स’ हैं।

बहुत अच्छी बात है। हमने जब नौकरी की शुरुआत की थी तो इंटरनेट हमारी ‘जेब’ में नहीं था। नौकरी के अवसर सीमित थे। जानकारी सीमित थी। नेटवर्क सीमित थे। लेकिन एक बात समझ लो। विकल्प होना और निर्णय लेने की परिपक्वता होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। अगर हर बार कोई बेहतर ऑफर आते ही हम दिशा बदल दें, तो हो सकता है हमारी सैलरी बढ़ जाए। लेकिन क्या हमारी विश्वसनीयता भी बढ़ती है? क्या हमारी विशेषज्ञता भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती है? क्या लोग हमें उस व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिस पर कठिन समय में भरोसा किया जा सकता है? किसी भी संगठन में सबसे मूल्यवान लोग हमेशा सबसे प्रतिभाशाली नहीं होते। अक्सर सबसे मूल्यवान लोग वे होते हैं जो भरोसेमंद होते हैं।

जो मुश्किल समय में साथ खड़े रहते हैं, जो समस्या देखकर गायब नहीं होते। जो यह नहीं पूछते कि "यह मेरा काम क्यों है?" बल्कि यह पूछते हैं कि "इसे ठीक कैसे किया जाए?"

हमारी पीढ़ी ने अधिकारों से पहले जिम्मेदारियों की भाषा सीखी। तुम्हारी पीढ़ी ने जिम्मेदारियों से पहले अधिकारों की। हमसे गलतियाँ हुईं। हमने कई बार अनावश्यक समझौते किए। हमने कई बार खराब मैनेजमेंट को चुनौती नहीं दी। कई बार अपने स्वास्थ्य और परिवार की उपेक्षा भी की। लेकिन कम-से-कम हमने यह नहीं माना कि दुनिया हमारे आराम के हिसाब से खुद को बदल लेगी। हमने खुद को दुनिया के हिसाब से तैयार करने की कोशिश की। और हम आज भी वही कर रहे हैं, तुम्हारे हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

तुम कहते हो, "कंपनी तुम्हारी परवाह नहीं करती, तो तुम कंपनी की क्यों करो?"

सुनने में यह बात बहुत क्रांतिकारी लगती है। लेकिन सोचकर देखिए। कंपनी क्या है? कोई इमारत? कोई लोगो?

नहीं।

कंपनी तुम्हारी टीम है। वहां तुम्हारे सहयोगी हैं। वह व्यक्ति है जो तुम्हारे बाद काम संभालता है। वह क्लाइंट है जिसने तुम पर भरोसा किया। जब तुम बिना जिम्मेदारी लिए केवल अपने 9 घंटे देखते हो, तो नुकसान किसी कॉरपोरेट संस्थान का नहीं होता। नुकसान उन लोगों का होता है जो तुम्हारे काम पर निर्भर हैं। इसलिए जिम्मेदारी का अर्थ कंपनी के प्रति अंधभक्ति नहीं है। जिम्मेदारी का मतलब है अपने कमिटमेंट का सम्मान करना। अपने काम का सम्मान करना। अपने सहयोगियों का सम्मान करना।

और अपने पेशे का सम्मान करना। 

आप मेंटल हेल्थ की बात करते हैं।

यह अच्छी बात है।

कार्यस्थल पर पारदर्शिता की बात करते हैं।

यह भी अच्छी बात है।

आप सम्मानजनक व्यवहार की मांग करते हैं।

यह भी बिल्कुल सही बात है।

लेकिन मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ यह नहीं कि हर चुनौती से बचा जाए। पारदर्शिता का अर्थ यह नहीं कि हर संस्था को खलनायक घोषित कर दिया जाए। और सम्मान का अर्थ यह नहीं कि केवल हमें सम्मान मिले, जबकि हम किसी के प्रति जवाबदेह न हों। करियर केवल यह नहीं है कि आपको क्या मिला। करियर यह भी है कि आपने क्या बेहतर बनाया, क्या सीखा, मनुष्यता को और अधिक बेहतर करने में क्या योगदान दिया। और कितने लोग आपको ऐसा व्यक्ति मानते हैं जिस पर भरोसा किया जा सकता है? इसलिए, नौकरी बदलो अगर ज़रूरी हो। खराब माहौल छोड़ो अगर वह सचमुच खराब है। बेहतर अवसर पकड़ो अगर वह तुम्हें आगे ले जाता है। लेकिन हर कठिनाई को अत्याचार, हर आलोचना को अपमान और हर जिम्मेदारी को बोझ मत समझो। क्योंकि अंत में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। सफलता उन लोगों को मिलती है जो भरोसेमंद होते हैं, जो टिकते हैं, जो सीखते हैं, जो जिम्मेदारी उठाते हैं, और जो यह समझते हैं कि दुनिया केवल अधिकारों से नहीं, जिम्मेदारियों से भी चलती है।




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