Sunday, 22 March 2015

तो शायद निर्णय कुछ और होता.....



कॉलेज की तरफ से जामिया मीलिया इस्लामिया में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की वाद विवाद प्रतियोगिता में कॉलेज का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला तो मन में बस एक ही प्रश्न था कि विषय क्या होगा? हालाँकि किसी भी विषय पर बोलना मुश्किल नहीं था लेकिन यदि विषय मन का मिल जाए तो बात ही कुछ और होती है....खैर कुछ समय के बाद विषय भी पता चल गया ,विषय था – ‘नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों के संरक्षण के लिए सेंसरशिप आवश्यक है’....मेरी इच्छा थी कि मैं विषय के विपक्ष में बोलूं लेकिन कॉलेज के द्वारा चयनित दुसरे प्रतिभागी कि इच्छानुरूप मेरा विपक्ष में बोलना तय हुआ..मुझे ख़ुशी थी कि एक राष्ट्रीय मंच से मैं कुछ बोलूँगा लेकिन उससे ज्यादा ख़ुशी थी कि श्रोताओं में वो व्यक्ति भी होगा जिसके उपस्थित होने मात्र से ही मुझमें ऊर्जा प्रवाह बढ़ जाता है....मेरी क्वीन (काल्पनिक नाम) मेरी नजरों के सामने होगी यह सोचकर ही मैं अपने वक्तव्य के लिए तैयारी करने लगा...पिछले 5 सालों में पहली बार मैं भाषण के लिए तैयारी कर रहा था ...रात भर अनेकों वक्ताओं को सुना ...2 दिनों कि मेहनत के बाद 7 पेज के नोट्स तैयार किए....शायद ये अपने लिए नहीं,कॉलेज के लिए नहीं ,बस एक इन्सान को इम्प्रेस करने के लिए कर रहा था....
लेकिन हमेशा मन का चाहा कहाँ होता है....प्रतियोगिता से पहले वाली रात मेरी क्वीन ने बताया कि वो नहीं आ सकती शायद तबियत ख़राब थी उसकी या सच में तबियत ख़राब थी .....मुझे पता था अब मैं मन से नहीं बोल पाउँगा लेकिन अपने नोट्स के साथ अगले दिन सुबह 8 बजे मैं जामिया मिलिया इस्लामिया के परिसर में था....मैं बार बार अपने नोट्स पलट कर देख रहा था पता नहीं क्यों एक अजीब सा डर था मन में....ये बात मैं किसी से भी नहीं कह सकता था...शायद इस लिए क्यों कि मुझे लगता था कि शायद कोई समझ ही ना पाए....खैर शाम 5 बजे मेरे कॉलेज का नंबर आया ...मैं अब मंच पर था और नीचे मेरे गुरुदेव....मंच पर पहुँचते ही मेरे चेहरे पर हसीं तो थी लेकिन मैं खुश नहीं था ....मेरा दिमाग एकदम खाली हो चूका था ....मेरा दिल बस यही कह रहा था कि काश मेरी क्वीन यहाँ होती ये जानते हुए कि ये संभव नहीं था...मेरे विपक्षी वक्ता के वक्तव्य के बाद जब मैंने बोलना शुरू किया तो बस वही बोला जो मन में आया....ये पहला मौका था जब मैं हताशा में बोल रहा था...5 मिनट पूरे होने के बाद जब मैं मंच से नीचे आया तो अचानक से एक बात की ख़ुशी हुई कि चलो कुछ रटा रटाया नहीं बोला....
मैं अपनी मुहब्बत का शिकवा उससे कैसे कँरु, मुहब्बत तो मैंने की है वो तो बेकसूर हो !

अगले दिन ना चाहते हुए भी मै जामिया में था....अपने लिए नहीं किसी और के लिए....हां अपनी क्वीन के लिए...शाम को जब विजेताओं की घोषणा होने का समय आया तो मुझे पता था कि वाद विवाद में कॉलेज का कोई स्थान नहीं आने वाला...क्यों कि ये पुरुस्कार टीम (पक्ष + विपक्ष) को जाने वाला था ,और ना मैं मन से बोल पाया था और ना ही मेरे विपक्षी वक्ता....मैंने पहली बार अपने विपक्षी वक्ता रुपेश को नर्वस देखा था...हम दोनों ना एक दुसरे से संतुष्ट थे और ना खुद से ....लेकिन अचानक घोषणा हुई कि तृतीय पुरस्कार हमारे कॉलेज को गया है ....बिना उम्मीद के जब कुछ मिलता है तो ज्यादा ख़ुशी होती है....मंच पर ndtv के वरिष्ठ पत्रकार अभिज्ञान प्रकाश थे...पुरस्कार लेकर मैं नीचे आया ....परिसर को उस प्रतियोगिता में पहली बार कोई पुरस्कार मिला था....नीचे कुछ परिचित और कुछ अपरिचित मित्र बधाई दे रहे थे....मेरे चेहरे पर बनावटी मुस्कराहट थी....अपनी सीट पर बैठ कर जैसे ही मैंने अपना नेट ऑन किया तुरंत मेरी नजर watsapp पर आए संदेशों पर गई ....क्वीन का बधाई सन्देश था.....वो वहीं पर थी और ये सन्देश मुझे खुश करने के लिए पर्याप्त था...

मैं उससे नहीं कह पाया कि अगर एक दिन पहले भी वो वहां होती तो मैं ज्यादा अच्छा बोलता....उसका उस दिन वहां ना होना शायद मेरे किसी बुरे कर्म का नतीजा था....
वो कहते हैं सोच लेना था प्यार करने से पहले। अब उनको कौन समझाए सोच कर तो साजिश की जाती हैं प्यार नहीं...!!
  जीवन में कुछ शाश्वत सत्य ऐसे होते हैं जिनकी अनुभूति हम नहीं करना चाहते , क्यों की हम जानते हैं की उनकी अनुभूति से पीड़ा होगी.....लेकिन समय की वीरता के आगे हमारी एक नहीं चलती और नपुंसकों की भांति खड़े होकर एक नया अनुभव हम प्राप्त करते हैं ....  
झूठ अगर ये हैं की तुम मेरे हो, तो यकीन मानो सच मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता.....

Friday, 20 March 2015

आखिर क्यों होते हैं बलात्कार...

अभी हाल ही में एक विदेशी महिला के निर्देशन में एक डॉक्युमेंट्री बनाई गई। उस विषय पर बहुत से तथाकथित बुद्धिजीवियों ने और राष्ट्रवादियों ने अपने विचार रखे। उनका कहना है कि ऐसी फिल्मों पर रोक लगा देनी चाहिए क्यों कि इससे विश्वस्तर पर भारत की छवि खराब होती है। मेरा एक सीधा और सरल सा प्रश्न है कि क्या जो उस बेटी के साथ हुआ उससे भारत की छवि नहीं खराब हुई और जब इस देश के लोगों को ऐसा करने में शर्म नहीं है तो उसे देखने में कैसी शर्म? मुझे तो लगता है कि इस डॉक्यूमेंट्री को तो डीडी नेशनल पर दिखाना चाहिए ताकि आजकल के जो युवा जोश में आकर महिलाओं और लड़कियों को रेप के लिए दोषी ठहराते हैं उन्हें भी पता चले कि वो किसी रेपिस्ट की तरह सोचते हैं।

कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी ऐसे विषयों पर कुतर्क करते हैं कि बलात्कार टॉप,स्कर्ट और जींस की वजह से होते हैं तो फिर आखिर क्यों नकाब में लिपटी महिला का बलात्कार हो जाता है। वो फिर कहते हैं कि बलात्कार  के लिए वक्ष दिखाने वाली ही खुद जिम्मेदार है तो फिर कभी दो साल की तो कभी छ : साल की मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार क्यों होता है।
वे फिर आगे कहते हैं कि ज्यादा बाहर घूमना ठीक नहीं है  क्यों कि अपरिचित लोग ही ऐसा करते हैं लेकिन मैं देखता हूं कि समाचार पत्रों में खबरें आती हैं कि कभी पिता ,कभी  ससुर , तो कभी चचेरे भाई तक लड़की की अस्मत को तार तार कर देते हैं।
उनका अगला तर्क आता है कि ज्यादा आधुनिक होंगे तो बलात्कार होंगे ही तो फिर आदिवासी और गाँव की महिलाओं की इज्जत के साथ खिलवाड़  क्यों होता रहता है।

मेरा मानना है कि बलात्कार एकमात्र कारण कुत्सित भावना और घटिया संस्कार हैं। वो संस्कार जो ना खून का , ना धागे का, ना शर्म का , ना उम्र का ख्याल करते हैं। उनके लिए नारी का मतलब, बस देह तक सिमटा होता है।

जब बात आती है सामूहिक बलात्कार की तो हमारे मीडिया के मित्र इसे पाशविक कृत्य करार देते हैं लेकिन मित्रों यह पाशविक कृत्य नहीं हो सकता क्यों कि पशु कभी सामूहिक बलात्कार नहीं करते।
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि एक आदमी को बहुत सारे  लोग पत्थर मार रहे थे , तो किसी ने कहा कि जिसने कभी कोई गलती न की हो वो पत्थर मारे, तब कोई नहीं आगे आ सका। जब पिछले वर्ष बलात्कार के खिलाफ चल रहे आंदोलन में पुरुषों को नारेबाजी करते हुए देखा तो ये कहानी याद आ गई। मेरे मन में आया कि मैं भी कह दूं कि जिस व्यक्ति ने कभी सोच में भी किसी स्त्री के विषय में गलत न सोचा हो वो ही इसका विरोध करने आगे आए। रास्ते पे चलते हुए , बस में या ट्रेन में , मंदिरों की भीड़ में हमें बहुत से ऐसे पुरुष दिख जाते है जो महिलाओं को इस तरह देखते हैं जैसे  नजरों से ही बलात्कार कर रहे हों।
अभी तक इस लेख को पढ़कर संभवतः आपको ऐसा लगा हो कि मैं पाश्चात्य सभ्यता का समर्थक हूं लेकिन नहीं मैं पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण का पूर्ण रूप से विरोध करता हूं। मैं मानता हूं कि व्यक्ति को आधिनिक होना चाहिए लेकिन मेरे लिए आधुनिकीकरण का पैमाना नग्नता नहीं है। सामाजिक भटकाव के कारण आज बलात्कार बढ़ रहे हैं और इस सामाजिक भटकाव के पीछे एक बड़ा कारण आज के विज्ञापन हैं।
मित्रों भारत में लगभग सभी उत्पादों के विज्ञापनों का एक ही उद्देश्य है 'लड़की पटवाना':
क्रीम लगाओ लड़की पटाओ
 पाउडर लगाओ लड़की पटाओ
 डीयोडरंट लगाओ लड़की पटाओ
 फेयर एंड हैंडसम लगाओ लड़की पटाओ
 कोक पेप्सी पियो लड़की
 दिमाग की बत्ती जलाओ लड़की पटाओ
 मंजन करो और ताज़ा साँसों से लड़की पटाओ
एंटी डेनड्रफ शैम्पू लगाओ लड़की पटाओ कोई भी चिप्स खाओ लड़की पटाओ
फोन में फ्री स्कीम का रीचार्ज कराओ और लड़की पटाओ
हद तो तब हो गयी जब पुरुषों के अंतर्वस्त्रों से भी लड़की पट रही है। इनके विज्ञापनों में खास बात ये है कि आपको कुछ करना नही है सिर्फ इन चीजों को इस्तेमाल करो लड़की खुद आपके पास चल कर आएगी। आखिर क्या हो गया है हमारे मीडिया और समाज को ? क्या जीवन का एक ही उद्देश्य है लड़की पटाओ ?
आखिर हमारे घर में भी तो लडकियां हैं और हमें पता है कि हम समाज में उनसे कैसा व्यवहार चाहते हैं, फिर क्यों हम ऐसे विज्ञापनों का समर्थन करते हैं और फिर क्यों हम ऐसे उत्पाद खरीदते हैं जो कि ऐसे विज्ञापन देकर हमारे समाज और संस्कृति को खत्म कर रहे हैं। हमें ऐसे उत्पादों का बहिष्कार करना चाहिए, फिर चाहे वो उत्पाद स्वदेशी ही क्यों ना हों।

सनी लियोनी जैसी वेश्या को भारत में जब अतिथि बना कर लाया जाएगा तो माँ बहिन बेटियों का सामूहिक बलात्कार होना स्वाभाविक है। पश्चिमी सभ्यता का परित्याग ही भारत को बचा सकता है। जो लोग टीवी और फिल्मों के माध्यम से नग्नता फैलाते है वो तो सुरक्षा लेकर घूमते हैं और इनकी नग्नता फैलाने की सजा बेचारी हमारी आम माँ बहन बेटियों को भुगतनी पड़ती है। बलात्कारी उन माँ बहिनों मे ही सनी लिओन ढूंढते रहते है और मौका पाते ही बलात्कार कर देते हैं।

Wednesday, 18 March 2015

नारी और हमारे समाज की विकृत मानसिकता

सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के बाद सृष्टि सृजन में यदि किसी का सर्वाधिक योगदान है तो वो नारी का है। ये दुर्भाग्य है हमारा कि हमारे देश में ये सब हो रहा है, आखिर क्यों एक लड़की की इज्जत सरेआम नीलाम कर दी जाती है? क्यों ये देश जो विश्वगुरू के नाम से जाना जाता था आज अपनी ही परंपराओं से मँह चुराता हुआ दिख रहा है? आधुनिक इंडियन समाज का एक अजीब है किंतु शाश्वत सत्य है कि लोग फुटपाथ की नग्न भिखारिन का तन ढकने के लिए तो एक कपड़े का टुकड़ा तक नहीं खरीद कर दे सकते पर किसी बिस्तर पर स्त्री को निर्वस्त्र करने के लिए हजारों रुपए लुटा देते हैं।

हम श्री रामचरित मानस का पाठ तो आज भी करते हैं लेकिन उस श्री राम के चरित्र को समझ नहीं पाए। मैं इतिहास से जोड़कर बताता हूं कि राम क्या हैं ? सीता जी का हरण करने के बाद रावण सीता जी को समझा समझा कर हार गया था पर सीता जी ने रावण की तरफ एक बार देखा तक नहीं था। रावण की पत्नी मंदोदरी से रावण की ये दशा देखी नहीं गई तो मंदोदरी ने एक उपाय बताया। उसने रावण से कहा कि तुम तो मायावी हो कोई भी रूप रख सकते हो, तो तुम राम बन के सीता के पास जाओ तब वो तुम्हें जरूर देखेगी। रावण ने उत्तर दिया कि मैं ऐसा कई बार कर चुका हूं मंदोदरी लेकिन राम बनने के बाद मैं स्वयं सीता को नहीं देख सका क्योंकि मैं जब-जब राम बनता हूँ मुझे पराई नारी अपनी माता और अपनी पुत्री सी दिखती है। हमें समझना होगा कि राम कोई व्यक्ति नहीं एक विचार हैं। हमारा नैतिक पतन उसी दिन से शुरू हो गया था जब हम मंदिरों में राम को ढूढ़ंने निकल पड़े थे। आज के समाज में व्यक्तिवादिता का प्रभाव इस प्रकार से हो गया है कि हम अपने मूल चरित्र को भूलते जा रहे हैं। आधुनिकता की आँधी में हम इस कदर बहे जा रहे हैं कि अपनी संस्कृति को ताक पर रखकर नग्नता को ही आधुनिकता समझने लगे हैं। इस तथाकथित आधुनिकता के नाम पर हमने राम के चरित्र को भूलकर रावण के चरित्र का प्रतिपादन शुरू कर दिया है।

लड़खड़ायी बुढ़िया को उठाने भरे बाजार मे कोई न झुका
और गोरी का झुमका क्या गिरा, बाजार घुटनों पर आ गया
ये जुमला कोई सामान्य जुमला नहीं है अपितु यह जुमला वर्तमान समाज के सच को प्रदर्शित कर रहा है।आज के समाज की स्थिति कुछ ऐसी ही हो गई है। एक बार महसूस करके देखिए क्या आज का पुरुष, महिला को भोग्या की दृष्टि से नहीं देखता?

आप सड़कों की बात करते हो दोस्तों !
ये "बेटियां" तो गर्भ में भी महफूज नही हैं।
एक जमाना था जब युवा देश के लिए मर मिटने को तैयार रहते थे । आज के युवा की स्थिति कैसी हो गई है कुछ उदाहरण देखिए। आज के युवा से पूछो कि उदास क्यों हो? तो अगला रोते हुये बोलेगा, यार तेरी भाभी नाराज हो गई । इस वाक्य की गहराईयों में जाकर देखिए कि आखिर इस देश के युवाओं का आधार क्या बन रहा है। उनसे पूछो  अरे ये बालो पर क्या लगा रहा है? तो  उत्तर मिलेगा यार सिर के कुछ बाल सफेद होने लगे हैं, ये T.V. पर देखा तो मँगा लिया। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि जिस चीज का प्रयोग वो कर रहे हैं उसका शरीर पर प्रभाव अथवा बालों पर क्या दुष्प्रभाव होगा और जब उनसे पूछो कि कितने रुपए लगे? तो उत्तर मिलता है कि ज्यादा नही , बस 3499। अरे कोई उन मूर्खों से पूछो कि जिस देश में 70 करोड़ लोग प्रतिदिन 20 रूपए कमाने की स्थिति में न हों उस देश में 3499 रूपए बालों पर खर्च कर देना कहां की समझदारी  है। जब उनसे पूछो कि  अच्छा ये बता इस बार देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा ? तो उत्तर देते हैं कि मिलेगा कि अरे यार ये फालतू के लोगों का काम है मुझे ये सब बिल्कुल पसन्द नहीँ है। उनसे आगे पूछो कि अच्छा देश के लिए तू क्या सोचता है ? तो कहते हैं कि छोड़ ना यार क्या देश का रोना लगा रखा है और आज वैसे भी मेरा मूड खराब है मेरी जानू ने मेरे मैसेज  का रिप्लाई नहीँ किया।

ये स्थिति मात्र लड़कों की ही नहीं है पहले की लड़कियां लक्ष्मीबाई जैसी होती थीं और आज
 हे भगवान ! प्रोफाइल पिक चेंज किए 2 मिनट हो गए और अभी तक एक भी लाइक नहीं मिला। ऐसी हो गई हैं हमारे देश की नारियां। मेरे लिए समस्या ये नहीं है कि देश कैसे चलेगा ?अपितु मेरे लिए मूल समस्या ये है कहीं देश ऐसे ही ना चलता रहे।

जिस देश के लड़के भारत मां की स्वतंत्रता हेतु अपना जीवन न्यौछावर करने वाले वीर विनायक दामोदर सावरकर को भूलकर अश्लील माँ बहन की गाली को गाना बनाकर गाने वाले हनी सिंह को आदर्श मानने लगें और जिस देश की लड़कियां भारतीय मर्यादा को शर्मसार करने वाली वेश्या सनी लियोनी, पूनम पांडे और शर्लिन चोपड़ा को आइकॉन बना लें तो उस देश की लडकियों की उनकी कोख से कोई भगत सिंह जैसा देशभक्त या स्वामी विवेकानंद जैसा धर्मवीर पैदा नहीं हो सकता।
 मेरी शिकायत मात्र इस देश के लड़के अथवा लड़कियों से ही नहीं है अपितु मेरी शिकायत उनके परिवार के अन्य बड़े सदस्यों से भी है जो बेटी के बाहर निकलने पर कहते हैं कि छोटे कपडे पहन कर मत जाओ लेकिन बेटे से कभी नहीं कहते कि नज़रों मैं गंदगी मत लाओ।
बेटी से कहते हैं कि कभी घर कि इज्जत खराब मत करना पर बेटे से नहीं कहते कि किसी के घर कि इज्जत से खिलवाड़ मत करना।
किसी लड़के से बात करते देखकर जो भाई अपनी बहन को हड़काता है वो ही भाई अपनी गर्लफ्रेंड के किस्से घर में हंस हंस कर सुनाता है।
बेटा घूमे गर्लफ्रेंड के साथ तो कहते हैं अरे बेटा बड़ा हो गया है और बेटी अगर अपने  दोस्त से भी बातें करें तो कहते हैं कि बेशर्म हो गई है।
पहले शोषण घर से बंद करना होगा तब समाज से शिकायत करने वाले स्तर पर पहुंचेंगे। आज वह समय आ गया है जब इस देश की युवा तरुणाई एकजुट होकर कहे कि सत्तालोभियों उठो और भागो यहाँ से क्योंकि हम अर्थात देश के कर्णधार जाग चुके हैं। ये देश एक बार फिर क्रान्ति चाहता है लेकिन वह क्रांति खून की नहीं ,विचारों की हो। उस वैचारिक क्रान्ति के लिए आवश्यक है एकात्मवाद। वह एकात्मवाद जो मानवीयता की बात करता है, वह एकात्मवाद जो राष्ट्र सर्वप्रथम की बात करता है, वह एकात्मवाद जो मातृभूमि के वंदन की बात करता है। आज इसी को आधार बनाकर हम स्वयं को पुनः विश्वगुरू के पद पर प्रतिस्थापित कर सकते हैं।

Wednesday, 11 March 2015

कितना अच्छा होता .. अगर हर दिन की समाप्ति पर... जिंदगी पूछती...... Save changes ?

(मेरी जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित मेरे द्वारा लिखे जा रहे उपन्यास का एक अंश)

एक किताब की तरह पढ़ना चाहता हूँ ,तुम्हें धूप में छत पर लेटे लेटे पन्ने आगे पीछे कर के कहानी को अपने तरीके से बनाना चाहता हूँ,
 हाँ शब्दों में तुम्हारी तस्वीर बनाकर उसे देखना चाहता हूँ जब मन चाहे और अकेले बैठ तुम्हें सोच के मुस्कुराना चाहता हूँ 
जैसे किताब को सीने पर रख कर सो जाता हूँ कई बार ठीक वैसे ही तुम्हारे पास आना चाहता हूँ 
क्या लगती हो तुम मेरी ये सब को बताना चाहता हूँ  हाँ मेरी किताब मेरी कहानी मेरा सब कुछ सच ही है
 लेकिन ये झूठ है की मैं तुमको पाना चाहता हूँ



मशरूफ रहने का अंदाज़ तुम्हे तनहा ना कर दे, रिश्ते फुर्सत के नहीं तवज्जो के मोहताज़ होते है।!!!!!!

रोज रात को अपनी नींद के साथ सुलह करके सोता हूँ... इसी आस में कि कल सुबह मुझे तुम फिर से दिखोगी... मुझसे मिलोगी, मुझसे बातें करोगी... तुम फिर से उसी प्यारी सी मुस्कान के साथ कैंपस में मुझसे नजरें चुराओगी ... वही चेहरे पे भोलापन साथ लिए... छुप छुप के तुझे देखा करते है जैसे कोई गुनाह किया हो हमने... पर गुनाह तो हमने कर दिया तुमसे प्यार जो हमने कर लिया... अगर ये गुनाह है तो हमे सजा भी मंजूर है, तेरी ख़ुशी के लिए तुझसे दूर जाने कि सजा भी कबूल कार ली हमने ... अगर मैं गलती से तुझे छु भी लूँ तो ऐसे लगता है मंजिल छु ली हो... क्या पता तुम्हें कि तुम खुद क्या चीज हो, शीशे में नहीं कभी मेरी आँखों में देखना... तुम्हें खुद के लिए ही खुद की इज्जत और बढ़ जाएगी... अब तुझे रोज न देखूं तो घुटन सी होती है... अब तेरी आदत जो हो गयी है... और ये आदत ही मेरी आदत बन गयी है... जब तू मुझे देखती है मुझे लगता है मैं दुनिया में सबसे खास हूँ... क्योकि वो कोई खास ही होगा जिस किसी पे नजर तेरी पड़ेगी... सच कहूँ तो आजकल मुझे मंदिर जाने की जरुरत नहीं पड़ती... तुझे देखता हूँ तो खुदा दिख जाता है वही सजदा कर लेता हूँ... मुझको जिन्दगी से कोई शिकवा गिला नहीं है... क्योकि जिसने मुझे चाहा उसका मैं हो ना सका... और जिसको मैंने चाहा वो मेरा हो न पाया..!
कुछ खास नही बस इतना ही कहूँगा कि हर रात का आखरी खयाल और हर सुबह की पहली सोच हो तुम..,!!
मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था के वो रोक लेगी, मना लेगी, दामन के दामन पकड़कर बिठा लेगी, मेरे  कदम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे कि जैसे वो  आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको 
मगर उसने न रोका ,न मनाया, न दामन ही पकड़ा, न मुझको बिठाया, न आवाज़ ही दी, न वापस बुलाया,
मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया यहाँ तक के उससे जुदा हो गया मैं ..



बस इतना ही कहूँगा कि 
अब सज़ा दे ही चुके हो तो मेरा हाल ना पूछना, अगर मैं बेगुनाह निकला तो तुम्हे अफ़सोस बहुत होगा

Friday, 26 December 2014

तुम ना तब मिली ना अब ...

(मेरी जीवन की सत्य घटनाओं पर आधारित मेरे द्वारा लिखे जा रहे उपन्यास का एक अंश)
"और इस बार कालेज के सर्व श्रेष्ठ छात्र का पुरस्कार दिया जाता है ......." कालेज प्रागण कि अंतिम  लाइन कि पहली  सीट पर बैठा मै अपना नाम सुन कर जैसे नीद से जग गया था , आज कालेज के वार्षिक उत्सव  का आखरी दिन था, और मेरा कालेज के आखिरी साल में .......
तालियो कि गूंज के बीच पता ही नही चला कि मै कब मंच पर पहुच गया था ,  मैं चेहरो में उन दो आँखों को ढूंढ रहा था जो जब मै मंच पर होता था तो मजाकिया इशारे करते हुए मेरा मजाक बनया करती थी,मैं तुम्हारे इशारों को देखकर हर बार भ्रम में पड़ जाता था कि कहीं मैं कुछ गलत तो नहीं बोल रहा लेकिन मंच से नीचे आकर जब दोस्तों से अपनी तारीफें सुनता था तो तुम पर गुस्सा भी आता था और प्यार भी ....
और सर्वश्रेष्ठ छात्र कि ट्राफी मेरे हाथ में थी , सबकी नजरे मुझ पर थी ,और इन हजारो जाने अनजाने चेहरों में तुमको ढूंढ रहा था उस  दिन संचालक जी चाह रहे  थे कि मै दो शब्द बोलू , पर मै तो तुम से बोलना चाह रहा था कि देखो तुम्हारा डफर आज कालेज का सर्वश्रेष्ट छात्र बन गया है , 9 में 5 पुरस्कार मिले है तुम्हारे पागल  को .?
उस दिन तुम नहीं दिखी मै हंस रहा था लेकिन खुश नहीं था फिर कॉलेज के बाहर तुम मिली और  तुमने जब मुझे बताया कि तुम अपने मामा जी के घर जा रही हो 
हमेशा के लिए और अब तुम कभी बात नहीं कर पाओगी  , जंहा तुम आगे कि पढ़ाई करोगी, मुझे ऐसा लगा कि शायद सब कुछ खो चुका हूँ
मुझ से हर दिन बात बेबात पर लड़ने वाली तुम मुझ से कभी न बात कि बात कर रही थी , जिसने मेरे सीने पर हर रोज अनगिनत प्यार भरे मुक्के मारे थे वो कभी न मिलने कि बात कर रही थी ,
उस दिन मैं घर वापस नहीं जाना चाह रहा था मै बस तुम्हारे साथ एक डूबती शाम बिताना चाहता था , और जो कुछ भी इन दिनों मेरे सीने में पला है...ज़िंदगी के उस बेमानीपन को बयां कर देना चाहता था
लेकिन मै ये भी जानता था कि हमारे बीच बचा ऐसा कुछ भी नहीं जिसे बयां किया जाना जरुरी हो. .....रिश्तों के बीच रात के उतर आने में महज अब पलके झपकाने भर की बात रह गई थी .....मुझे नहीं पता कि क्यों मुझे ऐसा लगा कि तुम मेरे बारे में पता करने कि कोसिस करोगी और ये दिखाने के लिए कि देखो मैं तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं मै १२ में फेल हो गया ....और वो भी उस सब्जेक्ट में जिसमे 100 /100 मिलता था ....

क्या बचपना था वो ....तुमने कभी दुबारा मेरी तरफ नहीं नहीं देखा.....कुछ साल याद रखने के बाद एक बार फिर वही कंडीशन आई फिर मैंने तुम्हें भीड़ में ढूँढा .6 सालों के बाद लखनऊ से दूर नॉएडा में अपने कॉलेज में किस ऑफ़ लव  विषय पर डिबेट कम्पटीशन में मुझे बोलना था ...विषय ऐसा था जिस पर पक्ष एवं विपक्ष दोनों ही तरफ से बहुत कुछ बोला जा सकता था ....लेकिन दो बातों ने मुझे निर्णय करने में सहायता की कि मुझे किस तरफ से बोलना है एक तो मेरे घर के संस्कार और दूसरा तुम ....
उस दिन पोर्डियम पर बोलते हुए मेरी निगाहें बस तुम्हे ढूंढ रही थी तुम मेरे सामने थी लेकिन मेरी हिम्मत नहीं थी कि मैं तुम्हें देखूं क्यों कि मुझे पता था अगर मैं तुम्हें देखकर बोलता तो निश्चित ही मेरे मुह से निकल ही जाता कि देखो मैं वही सोचता भी हूँ जैसे तुम्हारे साथ रहता हूँ ...मैं सबके सामने कह ही देता कि मैं जिससे प्यार करता हूँ उसे हाथ भी नहीं लगाया ....लेकिन फिर भी उस दिन पहली बार मैं वो बोला जो मेरे दिल में था ,कोई दिखावा नहीं कुछ भी नहीं .....मै बिना तुम्हे देखे उस दिन वो बोल रहा था जो प्यार को लेकर मैं सोचता हूँ और जो मैं तुम्हे समझाना चाहता था ....मैं उस दिन भाषण नहीं दे रहा था मैं बस तुमसे अपने दिल की बात कह रहा था .....
अपने जीवन में पहली बार अपने मन की बात कर रहा था ...

जीवन के इन दोनों हिस्सों में एक बात कॉमन थी "तुम" तब भी नहीं मिली और
"तुम" अब भी नहीं मिली....
लेकिन सुकून इस बात का है कि "तुम " आज मेरे प्यार को याद करती हो ....
और यकीन इस बात का है कि 
"तुम " मेरी चाहत को याद करोगी .....

Wednesday, 17 December 2014

पेशावर में घटी ह्रदय विदारक घटना पर विरोध स्वरुप कुछ पंक्तियाँ।

पेशावर में घटी ह्रदय विदारक घटना पर विरोध स्वरुप कुछ पंक्तियाँ।
दूध पिलाते थे नागों को
भारत पर चढ़ जाने को
आतंकी पैदा करते थे
दहशत को फ़ैलाने को
पाकिस्तान तेरी करनी का
फल बच्चों ने भोगा है
दोहरे चेहरे वाले जालिम
उतरा तेरा चोगा है
इसी बेल को पाल पास कर
तूने कितना बड़ा किया
हर आतंकी को अपनाया
अपना अड्डा खड़ा किया
आज तुझे ही डस डाला
तेरे ही पाले साँपों ने
पैरों तले कुचल डाला
तेरे आतंकी बापों ने
देख जरा उस पीड़ा को
जो हर ह्रदय में उठती है
सूंघ जरा उस बदबू को
जो मरे शवों से उठती है
यूँ ही लोग मरे थे जब
तुमने मुम्बई दहलाया था
गोली की आवाजों से जब
अक्षरधाम गुंजाया था
संसद पर हमला हो या
कई बारों के बम के विस्फोट
अफज़ल गुरु कसाब भेजकर
कितनी गहरी दी है चोट
फिर भी तेरे दुःख में जालिम
तेरे साथ खड़े हैं हम
आतंकवाद से लड़ जाने को
खुलकर आज अड़े हैं हम
बात समझ आ पाई हो तो
अब ये दहशत बंद करो
भाड़े के आतंकी रोको
अब ये वहशत बंद करो
वरना एक दिन तुम डूबोगे
सारे मारे जाओगे
अपनी करनी के कारण तुम
जीवन भर पछताओगे।।

Wednesday, 22 October 2014

हाथ में मौली (कलावा) क्यों बांधा जाता है



क्या आप जानते हैं कि..... हमारे हिन्दू परम्पराओं के अनुसार ... हाथ में मौली (कलावा) क्यों बांधा जाता है ...?????


आपने अक्सर देखा होगा कि..... घरों और मंदिरों में पूजा के बाद पंडित जी हमारी कलाई पर लाल रंग का कलावा या मौली बांधते हैं.... और, हम में से बहुत से लोग बिना इसकी जरुरत को पहचाते हुए इसे हाथों में बंधवा लेते हैं...। सिर्फ इतना ही नहीं... बल्कि, .... आजकल पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े लोग .... मौली बांधने को एक ढकोसला मानते हैं .... और, उनका मजाक उड़ाते हैं...! हद तो ये है कि..... कुछ लोग मौली बंधवाने में अपनी आधुनिक शिक्षा का अपमान समझते हैं .... एवं, मौली बंधवाने से उन्हें ... अपनी सेक्यूलरता खतरे में नजर आने लगती है...! परन्तु , मैं आपको एक बार फिर से ये याद दिला दूँ कि..... एक पूर्णतया वैज्ञानिक धर्म होने के नाते ......हमारे हिंदू सनातन धर्म की कोई भी परंपरा...... बिना वैज्ञानिक दृष्टि से हो कर नहीं गुजरता... और. हाथ में मौली धागा बांधने के पीछे भी एक बड़ा वैज्ञानिक कारण है...! दरअसल.... मौली का धागा कोई...... ऐसा- वैसा धागा नहीं होता है..... बल्कि, यह कच्चे सूत से तैयार किया जाता है..... और, यह कई रंगों जैसे, लाल,काला, पीला अथवा केसरिया रंगों में होती है। मौली को लोग साधारणतया लोग हाथ की कलाई में बांधते हैं...! और, ऐसा माना जाता है कि ..... हाथ में मौली का बांधने से मनुष्य को ....... भगवान ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती एवं सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है...। कहा जाता है कि ....हाथ में मौली धागा बांधने से मनुष्य बुरी दृष्टि से बचा रहता है...... क्योंकि.... भगवान उसकी रक्षा करते हैं...! और, इसीलिए कहा जाता है ... क्योंकि.... हाथों में मौली धागा बांधने से ... मनुष्य के स्वास्थ्य में बरकत होती है... कारण कि, इस धागे को कलाई पर बांधने से शरीर में..... वात,पित्त तथा कफ के दोष में सामंजस्य बैठता है। तथा, ये सामंजस्य इसीलिए हो पाता हैं क्योंकि...... शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है (आपने भी देखा होगा कि .. डॉक्टर रक्तचाप एवं ह्रदय गति मापने के लिए कलाई के नस का उपयोग प्राथमिकता से करते हैं )...... इसीलिए.... वैज्ञानिकता के तहत .... हाथ में बंधा हुआ मौली धागा .... एक एक्यूप्रेशर की तरह काम करते हुए..... मनुष्य को रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और लकवा जैसे गंभीर रोगों से काफी हद तक बचाता है.. एवं, इसे बांधने वाला व्यक्ति स्वस्थ रहता है। और, हाथों के इस नस और उसके एक्यूप्रेशर प्रभाव को हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों -लाखों साल पहले जान लिया था! परन्तु हरेक व्यक्ति को एक-एक कर हर बात की वैज्ञानिकता समझाना संभव हो नहीं पाता.... इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने गूढ़ से गूढ़ बातों को भी हमारी परम्परों और रीति- रिवाजों का हिस्सा बना दिया ताकि, हम जन्म-जन्मांतर तक अपने पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान से लाभान्वित होते रहें...! जानो,समझो और अपने आपको पहचानो हिन्दुओं हम हिन्दू उस गौरवशाली सनातन धर्म का हिस्सा हैं..... जिसके एक-एक रीति- रिवाजों में वैज्ञानिकता रची- बसी है...! जय महाकाल...!!!

*नोट : शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में , एवं विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में मौली बांधने का नियम है। कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों ....उसकी मुठ्ठी बंधी होनी चाहिए.... और, दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।

एक भूल

जीवन में कुछ लोग ऐसे आते हैं जो अपना विशिष्ट महत्व बना लेते हैं...कभी कभी वो भावनाओं .के आधार पर कभी दिखावे के आधार पर...मैंने अपने अब तक के जीवन में किसी को अपने बहुत अधिक करीब नहीं आने दिया लेकिन नॉएडा आने के बाद एक शख्स ऐसा मिला जिससे अपने जीवन की हर बात शेयर करने की इच्छा हुई....लेकिन शायद उस व्यक्ति की प्रवत्ति अलग थी....2 दिन लगातार उसके व्यव्हार के विषय में सोचा तो लगा कि क्यों हम किसी के लिए स्वयं को परिवर्तित करे ....मित्रता स्वार्थी नहीं होती लेकिन उसकी हर एक बात से मात्र उसका स्वार्थ ही दिखता था.....मैंने भी प्रेम किया और शायद आज के समय में बिना अपेक्षा के प्रेम कोई नहीं कर सकता ....लेकिन जिससे प्रेम किया उसको भी मैं दुसरे स्थान पर रखता था फिर भी मेरी भावनाओं के साथ उस व्यक्ति ने खेला.....दोहरा चरित्र बहुत ही ख़राब होता है ...मुझे स्वयं पर गर्व होता था की मैं चेहरे से चरित्र को भांप सकता हूँ लेकिन अब पता चल रहा है की वो मेरी ग़लतफ़हमी थी ...
ये ब्लॉग लिखने से पहले मेरे मन में बहुत सी बातें थी लेकिन अभी मन में आ रहा है कि अपने करोडो के शब्दों को 2 कौड़ी के विचार पर क्यों नष्ट किया जाए .....
मेरे जीवन में अब एक ही इन्सान है जो मुझे मेरे जैसा लगता है....उसके लिए कुछ करने को जी चाहता है .....जिसके लिए बदलना अच्छा लगता है ....जिससे गुस्सा होकर फिर से मानना अच्छा लगता है....शायद मुझे उससे प्यार है या शायद एक धोखा.....


ई मेल - rss.gaurav@gmail.com

एक सन्देश अपने अनदेखे अनजाने मित्रों के नाम....

मित्रों आप सभी का प्यार मुझे मेरे लेखन की वजह से मिला ऐसा मैं नहीं मानता ....मेरे विचार आपके विचारों से मिलते हैं इसी नाते आप सभी मुझे पसंद करते हैं ....आप सभी के मेल मुझे मिलते रहते हैं लेकिन सभी को व्यक्तिगत रूप से उत्तर दे पाना संभव नहीं...इसलिए सार्वजनिक रूप से लिख रहा हूँ...नागपुर के अविरल जी , लखनऊ के शुशांत जी,भुवनेश्वर के कार्तिकेय जी का विशेष रूप से धन्यवाद् ....आप तीनों ने मुझे बहुत शक्ति प्रदान की ...मेरे मन के भावों को समझकर एक समाधान देने का प्रयास किया ...यदि ईश्वर ने चाहा तो एक बार आप से अवश्य मिलूँगा....
मित्रों मुझे पता है मैं बदल गया हूँ , पहले राष्ट्रवाद और सिर्फ राष्ट्रवाद की बात करने वाला व्यक्ति प्रेम पर कैसे लिखने लगा उसका एक मात्र कारण है कि 2 महींने में प्रेम को मुझे बहुत करीब से समझने का अवसर मिला लेकिन अपने लक्ष्य को मैं भूला नहीं हूँ...बल्कि और भी अधिक तन्मयता के साथ प्रयासरत हूँ ....प्रेम जीवन का एक ऐसा विषय है जिसमे सिर्फ थ्योरी की क्लास चलती है.....उसी क्लास में कुछ नया सीखने का प्रयास कर रहा हूँ.....

अभी कल एक अन्य मित्र वत्सल जी का मेल आया कि मैं दोस्ती पर अपने कुछ अनुभव शेयर करूँ....
पिछले तीन दिनों में मित्रता में कुछ अलग हुआ है मेरे साथ उसी को अपने अगले ब्लॉग में लिखने का प्रयास करूँगा....

एक अंतिम बात मैं शब्द नहीं भावनाएं लिखता हूँ इस नाते उन भावनाओं का आप सभी सम्मान करेंगे यही आशा और अपेक्षा है ....
वन्दे भारती

ई-मेल  ---   rss.gaurav@gmail.com

Saturday, 13 September 2014

एक अधूरी कहानी

जीवन में कभी कभी कुछ ऐसे पल आते जिनकी कमी जीवन भर खलती.उन पलों में कुछ ऐसे लोग मिल जाते जिनसे दूर जाने का ख्याल ही हमको परेशान कर देता....अपने मन के विचारों को हम उनसे कह भी नहीं पाते और हमारा व्यव्हार भी ऐसा हो जाता कि सब कुछ समझ में आ जाए....अपने जीवन में अभी मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा...ये हमारे जीवन का एक ऐसा समय होता है जब हम नहीं समझ पाते कि हम क्या कर रहे ...लेकिन हमारे जैसे व्यक्ति शायद ऐसी स्थिति में कुछ नहीं कर सकता क्यों की दिल और दिमाग एक साथ नहीं रहता...प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में यादों की लंबी फेहरिस्तहोती है। इन यादों में सफलता-असफलता, सुख-दुख सभी कुछ शामिल रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी यादों को लेकर संजीदा रहता है और उसे लगता है कि वह अपनी यादों को याददाश्त में हमेशा बनाए रखे। ऐसा करना ठीक भी है क्योंकि इससे व्यक्ति अच्छे-बुरे दिन की तुलना करता है।जिन्हें गुस्सा आता है, वो लोग सच्चे होते हैं... हमने झूठों को अक्सर मुस्कुराते हुये देखा है...पता नहीं क्यों की कब और कैसे उससे इतनी मोहब्बत हो गयी कि उसके बिना एक पल बिताना भी मुश्किल लगता..बस दिल में एक ही तमन्ना रहती कि वो बस मेरे सामने बैठा रहे और हम उसे देखते रहें....वो हमसे बात करती रहे और हम उसकी आवाज सुनते सुनते सो जाएँ..ये सब मेरे जीवन में पहली बार हो रहा... हमेशा अपने लक्ष्य का निर्धारण करने अपने जीवन को अपनी खुद की शर्तों पर जीने का प्रयास किया ...ऐसा पहली बार हो रहा जब किसी और के लिए जीने का मन कर रहा ...मन करता की जैसा वो चाहती वैसा ही बन कर रहूँ ...उसे हमेशा अपनी साँसों में महसूस करूँ...इतनी ज्यादा मोहब्बत कभी किसी से होगी कभी नहीं सोचा था...पहली बार ऐसा लग रहा कि ज़िन्दगी अपने लिए जीनी है....बहुत कुछ कहना चाहता लेकिन उसे खोने के डर  से उससे कुछ नहीं कह पता ....उसे दुनिया की हर वो ख़ुशी देना चाहता जो उसने सपने में सोची हो...लिखना तो बहुत कुछ चाहता था लेकिन  शायद नहीं लिख सकता क्यों कि हम ही गलत हैं.....हमेशा से हम ही गलत थे....किसी के साथ रहने के लिए ये जरूरी नहीं आप क्या सोचते....ये जरूरी है कि आप किसे कितना महत्व देते....

Monday, 8 September 2014

प्रेम क्या है

मुझे “प्रेम” पर लिखना ना आया ,
क्योंकि “प्रेम” मुझमे कहीं ना समाया ,
मैंने जब भी “प्रेम” को गले लगाया ,
उसे अधूरा ही अपने अंदर सा पाया ।
मुझे “प्रेम” पर लिखना ना आया ,
क्योंकि “प्रेम” अक्सर मैंने अपने सवालों में पाया ,
मैंने जब भी “प्रेम” को गले लगाया ,
उसे पिघलता सा अपने अंदर कहीं पाया ।
मैंने अब “प्रेम” पर लिखने का मन बनाया ,
और हर प्रेमी युगल को अपनी कलम में कहीं समाया ,तब मेरी कलम में भी इतना “प्रेम” समाया ,
कि हर पढ़ने वाले के मन में भी “प्रेम” का अक्स था छाया ।
“प्रेम” एक एहसास है मन का ,
“प्रेम” एक तृष्णा है तन की ,
“प्रेम” कुछ ख्यालों की माया ,
जिसमे है पूरा विश्वास समाया ।
“प्रेम” एक गहरा सा सागर ,
“प्रेम” ही नदिया , “प्रेम” ही बादल ,
“प्रेम” है जीवन का सारांश ,“प्रेम” ना हो तो हर शब्द लगे कटाक्ष ।
“प्रेम” से जो रहे अछूता ,
उसको न मनु योनि में कोई गिनता ,“प्रेम” से ही जाँचे जाते पशु और मनुष्य ,
तभी तो “प्रेमी” का मन रहे सदा शुद्ध ।
“प्रेम” होता है दो आत्माओं का एक मिलन ,
“प्रेम” में अक्सर लगी होती है एक अगन ,“प्रेम” जितना सरल उतना ही विशाल ,
तभी तो “प्रेम” से ही होते सब मालामाल ।
मुझे “प्रेम” पर लिखना जैसे ही आया ,
हर शब्द को मेरे “प्रेम” का स्वरुप समझ आया ,
“प्रेम” अब मेरे तन-मन में इतना है छाया ,
कि कागज़ और कलम में भी मैंने “प्रेम” का सन्दर्भ है पाया ।
मुझे “प्रेम” पर लिखना अब आया ,
हर ग्रन्थ को मैंने अब “प्रेम” से सजाया ,
“प्रेम” कोई शब्द नहीं जिसे हम विशेषण से सज़ाएँ ,“प्रेम” तो “प्रेम” है ………
बस उसे समझें और आगे बढ़ते जाएँ ॥

Saturday, 6 September 2014

एक बेटी का दर्द

मैं प्यार भी दूंगी, दुलार भी दूंगी,
सार भी दूंगी, ये संसार भी दूंगी,

मुसीबत के समय
देश के लिये जिंदगी वार भी दूंगी,
इसलिए मत मारो मुझे|
मैं इज्जत भी दूंगी, जन्नत भी दूंगी,
सोहरत भी दूंगी, ताकत भी दूंगी,
मोका मिला तो
हर सपना हकीकत कर दूंगी,
इसलिए मत मारो मुझे|
पढूंगी, लिखूंगी अफसर बन जाऊँगी,
पर तुम्हारे सामने सदा शीश झुकाऊँगी
और समय आने पर
घर को स्वर्ग बनाउंगी,
इसलिए मत मारो मुझे|
अगर किसी कारणवस रह गई अनपढ़,
तो भी घर का सारा काम करवाउंगी,
गिनकर रात के तारों को,
तुमको अच्छी नींद सुलाऊँगी,
इसलिए मत मारो मुझे अपनी कोख से

Wednesday, 3 September 2014

वो सात दिन---कुछ खोया और कुछ सीखा

२४ अगस्त एक ऐसा दिन जिस दिन मुझे अपने परिवार के सामने स्वयं को प्रमाणित करना था..मेरी सिविल सर्विसेज की परीक्षा लेकिन मन पर इस बात का नहीं किसी और बात का दबाव...वो दबाव था या परेशानी नहीं समझ पाया....मेरे सबसे अच्छे मित्र की बहन का स्वास्थ्य ख़राब था और वो मेरे गृहनगर लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में एडमिट थी..उस दिन पहली बार एहसास हुआ की मेरे जीवन में उस व्यक्ति का कितना महत्व है मैंने कभी किसी भी इन्सान को खुद के इतना करीब नहीं आने दिया की वो मेरी जरुरत बन जाए लेकिन पता नहीं क्यों उसके परेशां चेहरे को देखकर मैं परेशान हो गया...मुझे आज भी नहीं पता कि वो मेरे बारे में क्या सोचता है लेकिन उसके प्रति मेरी भावनाएं निष्कपट हैं ये एहसास उस दिन पहली बार हुआ....
परीक्षा देने के बाद रात में लखनऊ के लिए निकला...सुबह पहुँचने के बाद से अगले सात दिन मेरे जीवन के अब तक के सबसे बुरे दिन थे..उसकी माँ स्थिति को देखकर मेरी आखों में आंसू आ गए...मैं कभी इतना कमजोर नहीं था कि आंसू ना रोक पाऊं ...वो कैसे हुआ पता नहीं बस हो गया...उस दिन से अगले 5 दिनों तक हर एक मंदिर में बस एक ही दुआ मांगी कि कैसे भी बस दीदी का स्वास्थ्य सही हो जाए ...इन दिनों में कई बार ऐसा समय आया जब मैं भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया....मन में ईश्वर पर अटूट विश्वास भी था कि वो कुछ गलत नहीं होने देंगे....इसी बीच तीसरे दिन दीदी का स्वास्थ्य अचानक बहुत अधिक ख़राब हो गया...मेरे मित्र के पिता जी ने बताया कि अब उनको नहीं बचाया जा सकता....वो समय मेरे लिए असहनीय था ...मेरे अन्दर इतनी क्षमता नहीं थी कि मैं अपने मित्र से नजर मिला सकूँ...बस एक ही रास्ता नजर आ रहा था ....और वो रास्ता था ईश्वर ...
अगले दिन सुबह उठकर माँ चन्द्रिका देवी के दर्शन के लिए गया...वापस आते ही पता लगा की दीदी के स्वास्थ्य में अद्वतीय सुधर हुआ है....मेरे विश्वास एक बार फिर अटूट हो गया ...आँखों में आंसू तो थे लेकिन ख़ुशी के ...दो दिन सब कुछ सामान्य रहा लेकिन तीसरे दिन सुबह पता लगा कि फिर से स्वास्थ्य बिगड़ गया ....लेकिन मैं पूर्ण रूप से निश्चिंत था क्यों कि मुझे ऐसा लग रहा था की कुछ भी हो जाए लेकिन मेरे राम मेरे साथ कुछ गलत नहीं कर सकते....शायद विधि का विधान कुछ और ही था शाम 5:58 पर दीदी का स्वर्गवास हो गया....जब मित्र के पिता जी ने ये बात मुझे बताई तो ऐसा लगा की मेरे जीवन का समापन हो गया....उस सत्ता पर से भी विश्वास उठ गया जिसके भरोसे मैं सब कुछ करता था....अगले 2 दिन लखनऊ में मेरे लिए बोझ लग रहे थे....ये सब कुछ कैसे हुआ कुछ नहीं पता लेकिन इन सात दिनों में बहुत कुछ पता लगा ...अपने विषय में भी और अन्य लोगों के विषय में भी ....जिस संगठन का कार्य करते हुए मुझे अवसरवादी और कट्टरवादी संज्ञाएँ दी जाती थी उस संगठन के पूर्णकालिकों एवं उनके तथाकथित राष्ट्रवाद का वास्तविक चेहरा भी सामने आया और यह भी पता लगा कि जितना खुदगर्ज मैं स्वयं को समझता था उतना नहीं हूँ ....मुझे कभी कोई फर्क नहीं पड़ता था कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते ....मैं हमेशा से वही करता था जो मुझे सही लगता था .....मैं वही करता था जिसमें मुझे ख़ुशी मिलती थी....मैं आज भी नहीं जानता कि जिस  इन्सान से मुझे इतना लगाव है वो मेरे बारे में क्या सोचता है और मुझे इस बात से कोई फर्क भी नहीं पड़ता....बस इन सात दिनों में उस सत्ता पर से विश्वास उठ गया ...ऐसा नहीं है कि मेरे मुहं से अब श्री राम का नाम निकलना बंद हो गया है लेकिन मन की भावना पर आघात अवश्य हुआ है...

(इस लेख में मैंने किसी भी प्रकार की अलंकारिक भाषा या शब्द का प्रयोग नहीं किया है ...ये मात्र मेरे वो विचार हैं जो मैं किसी से नहीं कह सकता ....मुझे नहीं पता कि मैं अब कभी ईश्वर पर विश्वास कर पाऊंगा या नहीं लेकिन अब यदि विश्वास हुआ भी तो उस ईश्वर पूर्व की भांति कभी कोई अपेक्षा नहीं रखूँगा ....क्यूँ कि खुद को हारते हुए नहीं देख सकता  )

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...