Showing posts with label विश्व गौरव. Show all posts
Showing posts with label विश्व गौरव. Show all posts

Tuesday, 9 June 2026

प्रिय Gen Z! दुनिया ‘ऑप्शन्स’ से नहीं, जिम्मेदारियों से चलती है

पिछले कुछ दिनों से एक बात बार-बार सुनने को मिल रही है। कहा जा रहा है कि पुरानी पीढ़ियाँ, खासकर Gen Y, ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा ऐसी नौकरियों में गुज़ार दिया जहाँ उन्हें सम्मान नहीं मिला, जहाँ उन्होंने ज़रूरत से ज़्यादा काम किया, जहाँ उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी की कीमत पर संस्थानों को प्राथमिकता दी। और वो नया वर्ग, वो नई जेनरेशन, Gen Z कहते हैं कि "हम ऐसा नहीं करेंगे।"

ठीक है। क्या करना है और क्या नहीं, यह व्यक्ति का अपना फैसला होता है, लेकिन लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब एक पूरी की पूरी पीढ़ी कुछ ऐसे विचार के अधीन हो जाए, जिससे उनका खुद का, उनके परिवार का, समाज का, देश का और विशेषतः मनुष्यता का नुकसान हो। समस्या तब होती है, जब अपने फैसलों को सही साबित करने के लिए पिछली पीढ़ियों को गलत साबित करना ज़रूरी समझ लिया जाता है। आज मन है कि इन ‘बच्चों’ से बात की जाए। कम से कम पीढ़ी बदल जाने के कुतर्क के साथ ‘हम भारत के लोग’ अपने बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से तो नहीं भाग सकते। 

जब भी पीढ़ी बदलती है, तब पहले वाली पीढ़ी और बाद वाली पीढ़ी दोनों को अजस्ट करने में थोड़ी समस्या होती है, लेकिन इतनी पीढ़ियां बदलने-बीतने के बाद भी हिंदुस्तान में बच्चे अपने दादा-दादी के साथ जितना खुश महसूस करते हैं, वो किसी के साथ नहीं करते, क्योंकि हमने परिवार बचाकर रखे हैं, हमने परिवार में संस्कार बचाकर रखे हैं, हमने रिश्ते बचाकर रखे हैं, हमने यह आत्मबोध बचाकर रखा है कि ‘मैं’ हूं, क्योंकि ‘ये’ सब भी हैं। आज पूरी दुनिया में भारतीय मस्तिष्क को प्रणाम किया जा रहा है, कभी सोचा है क्यों? क्योंकि ‘परिवार’ जैसी प्रारंभिक इकाई से दायित्वबोध का जो बीज उनके मस्तिष्क में डाला जाता है, वह आगे चलकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के रूप में वृक्षाकारित हो जाता है। 

अब, Gen Z के दौर में डर लग रहा है। कई बार इनके व्यवहार को देखकर लगता है कि ये अगर इसी व्यवहार के साथ किसी ऐसे पेशे में आए, जहां लोग उनसे इतने प्रभावित हो जाएं कि हमें इनके जैसा बनना है तो देश कहां जाएगा, परिवार कहां जाएगा। कुछ दिनों से विभिन्न सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर (विशेषकर Linkedin पर) कई पोस्ट्स देख चुका हूं, जिनमें 'काम' के बोझ से बचने के टिप्स दिए जा रहे हैं। जिनमें आपके 'अधिकारों' की बात हो रही है, जिनमें बताया जा रहा है कि ऑफिस से निकलकर ऑफिस के ग्रुप्स को म्यूट कर दीजिए, जिनमें बताया जा रहा है कि ऐसा करके आपकी मेंटल हेल्थ अच्छी होगी। कुल मिलाकर आपको यह बताया जा रहा कि 'कामचोर' बनो, सब ठीक रहेगा।

हां, हो सकता है कि आपके मेरे 'कामचोर' शब्द से आपत्ति हो, लेकिन सत्य यही है कि अनियोजित तरीके से ही सही, आपके DNA से 'दायित्वबोध' को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। पश्चिम ने आपसे सबकुछ छीन लिया है। आप हर बात में, हर काम में, हर रिश्ते में, सिर्फ ‘फायदा’ खोजने लगे हैं। आपके दिमाग में यह भर दिया गया है कि आपके पास पैसा है तो सबकुछ है। लेकिन हमें ये नहीं सिखाया गया। हमें बताया और सिखाया गया कि रिश्ते सबकुछ है, समाज सबकुछ है, देश सबकुछ है। ऐसी ही एक पोस्ट देखी तो सोचा कि बात करनी चाहिए…

तुम कहते हो कि तुम दुखी रहकर वफ़ादारी साबित नहीं करना चाहते।

सवाल यह है कि क्या हर असुविधा दुख है? क्या हर संघर्ष शोषण है? क्या हर दबाव अन्याय है? और क्या हर त्याग मूर्खता है?

जीवन का कोई भी क्षेत्र उठा कर देख लो, व्यापार, खेल, कला, साहित्य, विज्ञान या सेना, हर जगह सफलता के पीछे ऐसा वक्त छिपा होता है, जिन्हें बाहर से देखने वाले लोग "कठिन समय" कहते हैं। लेकिन वही समय व्यक्ति का निर्माण भी करता है। आज की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि लोग नौकरी बदल रहे हैं। नौकरी बदलना कोई अपराध नहीं है। समस्या यह है कि धैर्य की अवधि लगातार छोटी होती जा रही है। पहले लोग किसी भूमिका में खुद को साबित करने की कोशिश करते थे। अब कई बार लोग खुद को साबित करने से पहले ही यह तय कर लेते हैं कि उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं मिल रहा।

पहले लोग पूछते थे, "मैं इस काम में और बेहतर कैसे बन सकता हूँ?" अब अक्सर पहला सवाल होता है, "मुझे इससे क्या मिल रहा है?"

दोनों सवाल गलत नहीं हैं। लेकिन दूसरा सवाल पहले से पहले आ जाए, तो समस्या शुरू होती है। आज सोशल मीडिया ने एक नई भाषा बना दी है।

अगर बॉस ने परफॉरमेंस सुधारने को कहा तो वो टॉक्सिक हो जाता है।  अगर अतिरिक्त प्रयास की ज़रूरत है तो वह बर्नआउट लगता है। अगर प्रमोशन देर से मिलता है तो एक्सप्लॉइटेशन हो जाता है। अगर किसी निर्णय से असहमति हुई तो रेड फ्लैग लगने लगता है। ऐसा लगता है जैसे पेशेवर जीवन के हर असुविधाजनक हिस्से के लिए एक नया लेबल तैयार है। लेकिन सच्चाई यह है कि जीवन का बड़ा हिस्सा असुविधाजनक ही होता है। स्किल डिवेलप करना असुविधाजनक है, क्योंकि अब AI की स्किल्स पर भरोसा किया जा रहा है। अनुशासन असुविधाजनक है। आलोचना सुनना असुविधाजनक है। गलतियों से सीखना असुविधाजनक है। और जिम्मेदारी उठाना भी असुविधाजनक है। लेकिन तुम ये भूल रहे हो कि इन्हीं चीज़ों से व्यक्तित्व बनता है।

तुम कहते हो कि तुम्हारे पास ‘ऑप्शन्स’ हैं।

बहुत अच्छी बात है। हमने जब नौकरी की शुरुआत की थी तो इंटरनेट हमारी ‘जेब’ में नहीं था। नौकरी के अवसर सीमित थे। जानकारी सीमित थी। नेटवर्क सीमित थे। लेकिन एक बात समझ लो। विकल्प होना और निर्णय लेने की परिपक्वता होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। अगर हर बार कोई बेहतर ऑफर आते ही हम दिशा बदल दें, तो हो सकता है हमारी सैलरी बढ़ जाए। लेकिन क्या हमारी विश्वसनीयता भी बढ़ती है? क्या हमारी विशेषज्ञता भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती है? क्या लोग हमें उस व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिस पर कठिन समय में भरोसा किया जा सकता है? किसी भी संगठन में सबसे मूल्यवान लोग हमेशा सबसे प्रतिभाशाली नहीं होते। अक्सर सबसे मूल्यवान लोग वे होते हैं जो भरोसेमंद होते हैं।

जो मुश्किल समय में साथ खड़े रहते हैं, जो समस्या देखकर गायब नहीं होते। जो यह नहीं पूछते कि "यह मेरा काम क्यों है?" बल्कि यह पूछते हैं कि "इसे ठीक कैसे किया जाए?"

हमारी पीढ़ी ने अधिकारों से पहले जिम्मेदारियों की भाषा सीखी। तुम्हारी पीढ़ी ने जिम्मेदारियों से पहले अधिकारों की। हमसे गलतियाँ हुईं। हमने कई बार अनावश्यक समझौते किए। हमने कई बार खराब मैनेजमेंट को चुनौती नहीं दी। कई बार अपने स्वास्थ्य और परिवार की उपेक्षा भी की। लेकिन कम-से-कम हमने यह नहीं माना कि दुनिया हमारे आराम के हिसाब से खुद को बदल लेगी। हमने खुद को दुनिया के हिसाब से तैयार करने की कोशिश की। और हम आज भी वही कर रहे हैं, तुम्हारे हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

तुम कहते हो, "कंपनी तुम्हारी परवाह नहीं करती, तो तुम कंपनी की क्यों करो?"

सुनने में यह बात बहुत क्रांतिकारी लगती है। लेकिन सोचकर देखिए। कंपनी क्या है? कोई इमारत? कोई लोगो?

नहीं।

कंपनी तुम्हारी टीम है। वहां तुम्हारे सहयोगी हैं। वह व्यक्ति है जो तुम्हारे बाद काम संभालता है। वह क्लाइंट है जिसने तुम पर भरोसा किया। जब तुम बिना जिम्मेदारी लिए केवल अपने 9 घंटे देखते हो, तो नुकसान किसी कॉरपोरेट संस्थान का नहीं होता। नुकसान उन लोगों का होता है जो तुम्हारे काम पर निर्भर हैं। इसलिए जिम्मेदारी का अर्थ कंपनी के प्रति अंधभक्ति नहीं है। जिम्मेदारी का मतलब है अपने कमिटमेंट का सम्मान करना। अपने काम का सम्मान करना। अपने सहयोगियों का सम्मान करना।

और अपने पेशे का सम्मान करना। 

आप मेंटल हेल्थ की बात करते हैं।

यह अच्छी बात है।

कार्यस्थल पर पारदर्शिता की बात करते हैं।

यह भी अच्छी बात है।

आप सम्मानजनक व्यवहार की मांग करते हैं।

यह भी बिल्कुल सही बात है।

लेकिन मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ यह नहीं कि हर चुनौती से बचा जाए। पारदर्शिता का अर्थ यह नहीं कि हर संस्था को खलनायक घोषित कर दिया जाए। और सम्मान का अर्थ यह नहीं कि केवल हमें सम्मान मिले, जबकि हम किसी के प्रति जवाबदेह न हों। करियर केवल यह नहीं है कि आपको क्या मिला। करियर यह भी है कि आपने क्या बेहतर बनाया, क्या सीखा, मनुष्यता को और अधिक बेहतर करने में क्या योगदान दिया। और कितने लोग आपको ऐसा व्यक्ति मानते हैं जिस पर भरोसा किया जा सकता है? इसलिए, नौकरी बदलो अगर ज़रूरी हो। खराब माहौल छोड़ो अगर वह सचमुच खराब है। बेहतर अवसर पकड़ो अगर वह तुम्हें आगे ले जाता है। लेकिन हर कठिनाई को अत्याचार, हर आलोचना को अपमान और हर जिम्मेदारी को बोझ मत समझो। क्योंकि अंत में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। सफलता उन लोगों को मिलती है जो भरोसेमंद होते हैं, जो टिकते हैं, जो सीखते हैं, जो जिम्मेदारी उठाते हैं, और जो यह समझते हैं कि दुनिया केवल अधिकारों से नहीं, जिम्मेदारियों से भी चलती है।




Saturday, 28 June 2025

वैदिक तथ्यों-तर्कों के आधार पर महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण थे?

 महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण थे? 

एक शब्द में इसका जवाब है- हां। इसपर ना किसी तरह का विवाद है, ना ही होना चाहिए। असल मुद्दा यह है कि क्या उनके ब्राह्मण होने के पीछे उनका किसी व्यक्ति विशेष के यहां जन्म लेना कारण है? जवाब है- नहीं। आज वैदिक तर्कों के साथ इसी पर बात करेंगे। जन्मजाति के अंहकार में डूबे कुछ लोगों को मेरा यह लेख पसंद नहीं आएगा। उसका कारण भी स्पष्ट है कि लोगों ने धर्म की, परंपराओं की, व्यवस्थाओं की, अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या कर ली है और उसे व्यावहारिक बना लिया है। 

एक और समस्या है। जिनकी सैकड़ों-हजारों पीढ़ियों ने अध्ययन करने और कराने का काम पूरी जिम्मादारी से किया, उन जन्म आधारित ब्राह्मणों ने दूसरों को दीक्षित करने की जिम्मेदारी तो छोड़िेए, खुद भी अध्ययन करना छोड़ दिया है। गूगल बाबा और वॉट्सऐप विश्वविद्यालय के क्रैश कोर्स में जो आधी-अधूरी जानकारी मिलती है, उसी को सत्य मान लेते हैं। तो आज ऐसे कुपढ़ ‘ब्राह्मणों’ पर भी बात करना बेहद जरूरी हो गया है। यह ब्लॉग लिखने की जरूरत क्यों महसूस हुई, वह भी जान लीजिए। 

दरअसल एक बालक ने सुप्रसिद्ध कवि और वक्ता डॉ. कुमार विश्वास जी के वक्तव्य को शेयर करते हुए कुछ लिखा, मेरी पत्नी को आपत्ति हुई तो उसने जवाब दिया। इसके बाद उस बालक ने मेरी पत्नी से कहा- ‘आप मुझे नहीं जानतीं भाभी जी, गौरव भैया से मेरे बारे में पूछिएगा।’ मेरी पत्नी ने जिज्ञासावश मुझसे पूछा तो मेरे ध्यान में नहीं आया कि वह कौन है। मेरी पत्नी ने नंबर पता करके दिया तो मैंने फोन किया। बातचीत में पता लगा कि कभी किसी विषय को लेकर बात हुई होगी तो वह मुझे जानता होगा। लेकिन जब उसने बताया कि उसने लिखा क्या था तो सामान्य तौर पर मैंने पूछा कि ’वेदव्यास’ तो उपाधि है, उनका असली नाम क्या था? जवाब था- नहीं पता। मैंने पूछा कि उनके पिता का नाम क्या था? जवाब था- मुझे यह सब नहीं पता लेकिन हमारे सप्तऋषि ब्राह्मण ही थे। मुझे बेहद दुःख हुआ कि सोशल मीडिया पर ब्राह्मणों की आवाज बुलंद करने वाला एक 25-26 साल का लड़का अपने खुद के इतिहास के बारे में शून्य है। उसे यह तक नहीं पता कि महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास सप्तऋषियों में तो सम्मिलित ही नहीं हैं। खैर, मुझे लगा कि संक्षेप में इस विषय पर बात करना बेहद जरूरी है।

 

पहले बात करते हैं महर्षि वाल्मीकि पर। महर्षि वाल्मीकि के जन्म को लेकर दो मान्यतायें प्रचलित हैं। एक वर्ग स्कन्द पुराण के आधार पर कहता है कि महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिये इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है। उपनिषद के विवरण के अनुसार ये भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे। एक बार ध्यान में बैठे हुए इनके शरीर को दीमकों ने अपना ढूह (बाँबी) बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब ये दीमक-ढूह से, जिसे वाल्मीकि कहते हैं, बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे। 

अब यदि स्कंद पुराण के आधार पर महर्षि वाल्मीकि के जन्म को प्रमाणिक मानें तो उसी पुराण में एक बात और भी कही गई है- 

'जन्मना जायते शूद्रः संस्कारवान् द्विज उच्यते ॥' (स्कन्द 6.239.31)

स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम् उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद जी को बताया गया है कि जन्म से (प्रत्येक) मनुष्य शूद्र, संस्कार से द्विज बनता है। माना जाता है कि उपनयन संस्कार के बाद व्यक्ति का दूसरा जन्म होता है। ‘उपनयन’ का अर्थ है, ‘पास या सन्निकट ले जाना।’ किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। वेदाध्ययन के लिए जब बालक गुरु के सन्निकट जाता है, तब वह पूर्ण रूप से परिवार का मोह त्यागकर सिर्फ शिक्षा के लिए, ज्ञान के लिए, ब्रह्म के लिए समर्पित होता है- तब वह ब्राह्मण बनता है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि जन्म से ‘ब्राह्मण’ कोई नहीं होता, वह ज्ञान-सिद्धि के आधार पर ब्राह्मण बनता है। यानि जन्म किसी भी परिवार में हुआ हो, यदि कोई ब्रह्म के प्रति समर्पित है, ईश्वर के प्रति समर्पित है, ज्ञान के प्रति समर्पित है तो वह ब्राह्मण ही है। अब जन्म से रामनरेश यादव हो या शिवकुमार पासवान, यज्ञोपवीत संस्कार के बाद उसका उपनाम उसकी शिक्षा के आधार पर तय होता है। हमारी वैदिक परंपरा जो आज भी आपको संस्कृत शिक्षा में मिल जाएगी, उसमें शास्त्री जैसी उपाधियां शिक्षा के आधार मिलती हैं, जिन्हें उपनाम की तरह उपयोग में लाया जाता है। इसी उपनाम से पता लग जाता है कि सामने वाले व्यक्ति ने कितना अध्ययन किया है। वैदिक काल में ये उपाधियां थोड़ा विस्तृत थीं, जो कि ज्ञान और अध्ययन परंपरा के अनुसार दी जाती थीं। हालांकि ये सिर्फ ब्राह्मणों को ही मिलती थीं, और ब्राह्मण वही होता था जो अध्ययन करके फिर उसके विस्तार का दायित्व लेता था।


अब आते हैं महर्षि वाल्मीकि के जन्म को लेकर प्रचलित दूसरी मान्यता पर। उसके मुताबिक वाल्मीकि पहले ‘रत्नाकर’ नामक डाकू हुआ करते थे। यहां एक बात और बता दूं कि कुछ जगह पर जिक्र मिलता है कि वह डाकू बनने से पहले एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, लेकिन बाद में एक शिकारी जोड़े के साथ रहने लगे। कुछ जगहों पर यह भी जिक्र आता है कि वह एक भील राजा थे। हालांकि हम इस विवाद में ना जाते हुए मूल विषय पर ही रहेंगे। रत्नाकर नामक डाकू लोगों पर हमला करके जबरन उनसे उनकी संपत्ति छीनने का काम करता था। ऐसा करते काफी समय हो गया, इसी बीच एक दिन अचानक नारद मुनि उसके सामने आए। रत्नाकर ने उन्हें डराने की कोशिश की लेकिन नारदजी बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए। नारदजी ने उससे एक प्रश्न किया कि तुम यह दूसरों को लूटने का जो काम करते हो, वह किसके लिए करते हो। रत्नाकर ने जवाब दिया- अपने परिवार को सुविधाएं देने और उनका भरण पोषण करने के लिए। नारदजी का अगला सवाल था- 'तुम अपने परिवार को लोगों से धन लूटकर दे रहे हो, क्या जब इस कर्म का परिणाम आने पर भी वो परिवार तुम्हारा साथ देगा। क्या इस डकैती के कर्म में तुम्हारा परिवार तुम्हारा सहभागी है?'


रत्नाकर के मन में भी जिज्ञासा उठी और वह नारदजी को एक पेड़ से बांधकर अपने परिवार से सवाल करने गया। तब उसके परिजनों यानी पत्नी और पिता दोनों ने साफ इनकार कर दिया कि वह भले ही लूट के धन से सुख-सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं लेकिन डकैती के कर्म का फल रत्नाकर को अकेले ही भोगना होगा, वह इस काम में उसके सहभागी नहीं हो सकते। परिवार के जवाब से हताश-निराश रत्नाकर नारद के पास वापस लौटा। उसको अहसास हुआ कि वह व्यर्थ के कामों में जीवन नष्ट कर रहा है, और जिनके लिए कर रहा है वह भी उसके साथी नहीं। उसके अंदर बदलाव की चाह जगी और तब नारद मुनि ने डाकू रत्नाकर को ‘राम’ नाम के विषय में बताया। और फिर रत्नाकर ‘राम नाम’ में इतना रमे कि वाल्मीकि बन गए।

अब यहां प्रश्न यह है कि अगर वाल्मीकि का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में भी हुआ होता, तो भी क्या आप उन्हें पूजते? नहीं। आप उन्हें इसलिए ही पूजते हैं क्योंकि उन्होंने राम को समझा, उन्होंने ब्रह्म को समझा और हमें रामायण दी। यानी यहां भी कर्म ही प्रधान है। 


अब बात करते हैं महर्षि वेद व्यास की। हिन्दू शास्त्रों की मान्यता है कि प्रत्येक युग में स्वयं ईश्वर अवतार ग्रहण कर वेदों का युगानुरूप विस्तार करते हैं। एक गणना के अनुसार अब तक 28 व्यास हो चुके हैं। जिस मनवंतर में हम हैं, उसमें द्वापर युग में यह गौरव श्रीकृष्ण द्वैपायन को मिला। पुराणों के अनुसार वह व्यास ऋषि पराशर और सत्यवती के पुत्र थे। सत्यवती एक मछुवारे की पुत्री थीं। अब एक ब्राह्मण और मछुआरिन के बेटे को जन्म के आधार पर तो वर्णसंकर माना जाएगा, फिर उन्हें महर्षि क्यों कहा गया, वेदव्यास की उपाधि क्यों दी गई? अब आप कहेंगे कि वो तो पिता के आधार पर तय होता है। अच्छा? अगर ऐसा है तो फिर तो वर्णसंकर की अवधारणा को भी स्वीकार करते हुए उन्हें स्वीकृति ही नहीं मिलनी चाहिए। वैदिक परंपरा में तो वर्णसंकर की व्यवस्था तो स्वीकार ही नहीं थी। तो असल धारणा मैं आपको बताता हूं। 


दरअसल सनातन परंपरा में प्रत्येक व्यवस्था बेहद वैज्ञानिक और व्यवहारिक है। वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर तय होती थी। अपने वर्ण में विवाह की परंपरा को सही और दूसरे वर्ण में इसलिए उचित माना गया था, ताकि पति-पत्नी का कर्म एक ही रहे, जिससे परिवार में समन्वय बना रहे। यह तो हम आज भी महसूस करते हैं ना! पति और पत्नी एक ही पेशे में होते हैं तो व्यवस्था ठीक बनी रहती है।  

श्रीकृष्ण द्वैपायन ने वेद का प्रतिभाग करके श्रौतयज्ञ की आवश्यकता के अनुसार चार वेदों में सम्पादित किया, इसलिए वे ‘वेदव्यास’ कहलाते हैं। पुराणों के द्वारा वेद का उपबृंहण या व्याख्यात्मक विस्तार करने का कारण उन्हें व्यास कहा गया। वे 18 पुराणों और श्रीमद्‌भगवद्‌गीता के सहित महाभारत, ब्रह्मसूत्र (जो भारतीय दर्शन की वेदान्त धारा के सीमान्त प्रस्थानों का शाश्वत स्रोत है) और पतंजलि कृत सूत्रों पर व्यासभाष्य के भी प्रणेता माने जाते है। वेदों के परमार्थ को, जो उपनिषदों में प्रतिष्ठित है, सूत्रबद्ध कर ‘ब्रह्मसूत्र’ की रचना करके उन्होंने भारतीय दार्शनिक चिन्तन का आधार प्रस्तुत कर दिया, जिसकी शताब्दियों तक विभिन्न दार्शनिक प्रस्थान अपनी-अपनी तरह से व्याख्या करते रहे। ‘व्यास-स्मृति’ के प्रणेता के रूप में वे स्मृतिकार हैं। हमारे लिए वह पूज्यनीय हैं। 


महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण हैं, लेकिन इसका उनके जन्म से कोई लेना-देना नहीं है। ढेर सारे ऋषि-महर्षि हैं, जिनके जन्म पर बात ही नहीं होती, होनी भी नहीं चाहिए लेकिन हम उनके ज्ञान के कारण उन्हें पूजते हैं। एक और तर्क है। वर्तमान मनवंतर के सप्तऋषियों में प्रथम कश्यप ऋषि को समस्त देवताओं एवं मानवों का पूर्वज माना गया है। वह तो ऋषि यानी ब्राह्मण हैं, ऐसे में तो समस्त मानव जन्म से तो ब्राह्मण ही हुए। इसके आधार पर भी यह प्रमाणित होता है कि समस्त मनुष्य ब्राह्मण ही हुए। उन्हीं सप्तऋषियों में से एक महर्षि विश्वामित्र का जन्म तो क्षत्रिय कुल में हुआ था। जन्म के आधार पर यदि ब्राह्मण ही ऋषि अथवा महर्षि हो सकता तो विश्वामित्र महर्षि कैसे हुए? सोचिएगा।


ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वालों से अंत में एक ही बात कहूंगा। आपके पूर्वज ज्ञान परंपरा के आधार रहे हैं। आज के समय में हो सकता है कि आप कर्मकांड और अध्यापन ना कर पा रहे हों लेकिन कम से कम अध्ययन तो कर ही सकते हैं। पढ़ेंगे तभी मन में जिज्ञासा उठेगी, और फिर उस जिज्ञासा के समाधान के लिए और पढ़ेंगे। जन्म से मिले ‘ब्राह्मणत्व’ की रक्षा सोशल मीडिया पर कुतर्क करके नहीं होगी, ज्ञान से होगी। सोशल मीडिया के चक्कर में पड़ेंगे तो ब्राह्मणवंशी रावण को पूजना पड़ेगा और रावण को पूजने वाला रामभक्त हो ही नहीं सकता।


Tuesday, 9 January 2024

विश्व गौरव से विभिन्न सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर जुड़े:

 फेसबुक प्रोफाइल पर जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें 👉 https://www.facebook.com/news.vgaurav/

 फेसबुक प्रोफाइल पर जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें 👉 https://www.facebook.com/vishvagaurav

विश्व गौरव के ट्विटर हैंडल से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें 👉 https://twitter.com/vishvagaurav

विश्व गौरव की टीम के ट्विटर हैंडल से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें 👉  https://twitter.com/VGTtweets

YouTube चैनल से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें 👉 https://www.youtube.com/@vishvagaurav

इंस्टाग्राम पर जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें 👉 https://www.instagram.com/vishvagaurav/

Linkdin पर जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें 👉 https://www.linkedin.com/in/vishvagaurav/

Thursday, 16 June 2022

'पत्थरवार' और 'अग्निवार' के जाहिल एक जैसे, कार्रवाई में भेदभाव क्यों कर रहीं 'रामराज्य' वाली राष्ट्रवादी सरकारें?

 10 जून 2022, दिन शुक्रवार

कुछ मुसलमान, किसी हिंदू की बयान से इस कदर नाराज हो गए कि जमकर तोड़फोड़ की, मंदिरों पर हमले किए, आम लोगों पर पत्थर चलाए, यहां तक की व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश में जुटे यानी संविधान बचाने का प्रयास कर रहे पुलिसवालों को पीटा। पुलिस अफसरों के रोते हुए चेहरे दिखे, आम लोगों की आंखों में भय दिखा, टूटे मंदिर दिखे, हमारी-आपकी यानी देश की संपत्ति का नुकसान दिखा। 


11 जून 2022, दिन शनिवार

लोगों को हिरासत में लिया गया, पुलिसवालों ने जमकर खातिरदारी की। हिंसा करने वालों की 'अवैध' संपत्तियों पर बुलडोजर चलने का आदेश हुआ। एक दिन पहले मेरे मन में जो गुस्सा था, वो अब दूर हो रहा था। मैंने सोशल मीडिया पर लिखा भी कि जो जिस भाषा में समझे, उसे उसी भाषा में समझाना चाहिए। यह लाइन गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में बोली थी। 


श्रीराम ने भी ऐसा ही किया था

मैं बिना शंका के इस बात को मानता हूं कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जीवन से आप काफी कुछ सीख सकते हैं। इतना ही नहीं, मैं यह भी मानता हूं कि अगर किसी राष्ट्र या 'State' को न्याय आधारित व्यवस्था बनानी है तो वह किसी किसी व्यक्ति द्वारा बनाए गए सिद्धांतों के संकलन को पुस्तक का रूप देने से नहीं आ सकती, वह रामराज्य से ही आ सकती है। मैं राष्ट्र में 'सम विधान' चाहता हूं, यानी ऐसी व्यवस्था जो सबके लिए समान हो। सिर्फ ऊपर से नहीं मन से, और यह व्यवस्था हमारी व्यवस्था का हिस्सा रही है:

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। 

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।


एक छोटा सा प्रसंग याद दिलाता हूं। मेरे राम, अपनी पत्नी को एक तत्कालीन आतंकी से आजादी दिलाने के लिए निकले, रास्ते में समुद्र पड़ा, तीन दिन तक समुद्र से राह देने की गुहार लगाई, बार-बार आग्रह करते रहे लेकिन समुद्र ने एक ना सुनी। तब श्रीराम समझ गए कि मामला ऐसे नहीं जमेगा, और फिर उन्होंने दूसरा तरीका अपनाया। इस प्रसंग को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ यूं लिखा है:


विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।


लक्ष्मण तीन दिन पहले से ही आग्रह के पक्ष में नहीं थे। वह जानते थे कि समुद्र को चंद क्षणों में सुखाया जा सकता है। लेकिन राम ने तीन दिनों का अवसर दिया, आग्रह किया और फिर जब समुद्र ने नहीं सुनी तो अपने महा-अग्निपुंज-शर का संधान किया, जिससे समुद्र के अन्दर ऐसी आग लग गई कि उसमें वास करने वाले जीव-जन्तु जलने लगे। इसके बाद समुद्र देव ने अपनी रक्षा के लिए याचना की। श्रीराम चाहते तो तीन दिन पहले भी वही कर सकते थे जो बाद में किया, लेकिन उन्हें पता था कि उससे समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं को पीड़ा होगी, इसलिए उन्होंने वह नहीं किया। लेकिन जब अंतिम विकल्प ही बचा तो व्यक्ति क्या ही करे।


10 जून की जहालत क्यों?

अब जरा इसे 10 जून की घटना से जोड़िए। नुपुर शर्मा ने कुछ कहा। कहां से पढ़ा, उसमें कितना सच है, किस बात के रिएक्शन में कहा, वह सब बाद की बात है, मैं मानता हूं कि हम सामने वाले से अलग इसीलिए हैं क्योंकि हमारी संस्कृति हमें इसकी अनुमति नहीं देती। मुझे लगता है कि नहीं कहना चाहिए था, संयम रखना चाहिए था, खासकर तब जब देश आपको देख रहा हो। लेकिन कहा! फिर? देर से ही सही, ऐक्शन हुआ। निजी तौर पर मुझे लगता है कि नहीं होना चाहिए था लेकिन हुआ। फिर एफआईआर हुई, निजी तौर पर मुझे लगता है कि यह ठीक था। मामला न्यायालय में जाएगा और सामने आएगा कि भई, नुपुर ने क्या और कहां से पढ़कर कहा। अब और क्या किया जा सकता था? न्यायालय आज के संविधान के मुताबिक सर्वोच्च व्यवस्था है ना? वहां मामला पहुंच गया, बात खत्म। लेकिन नहीं! इसके बाद 10 जून इतिहास बन गया।


व्यवस्था का आधार है पर्सेप्शन!

लोगों ने सोशल मीडिया पर नुपुर के समर्थन में बहुत कुछ लिखा लेकिन भाजपा के किसी आधिकारिक प्रवक्ता ने उसके बाद नुपुर के कृतित्व का समर्थन नहीं किया। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि देश जलाया जाए? खूब बवाल काटा गया। फिर पुलिस/प्रशासन/सरकार ने उन्हें सीख देने के लिए बल का प्रयोग किया। मैं मानता हूं कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह बिलकुल वैसा ही था, जैसे श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करते वक्त किया था। मुझे लगता है कि यह बिलकुल सही फैसला था। जो प्यार से/ समझाने से ना माने, उसे डराकर/धमकाकर ही रखना चाहिए। और वैसे भी किसी राज्य की व्यवस्था पर्सेप्शन पर ही चलती है। पर्सेप्शन ठीक रहना चाहिए। 


जरा सोचकर देखिए!

इस पूरी घटना को एक सप्ताह भी नहीं बीता कि केन्द्र की मोदी सरकार 'अग्निपथ योजना' ले आई। यह कितनी बेहतर है और इसमें क्या खामियां हैं, यह अलग विषय है। एक भारतीय नागरिक के तौर पर मुझे लगता है कि किसी सरकार को जनता के रोजगार को लेकर गंभीरता से काम करना चाहिए, उस लिहाज से मैं इसे सही मानता हूं। लेकिन एक राष्ट्रवादी के तौर पर मुझे लगता है कि नोटबंदी की तरह ही देश का प्रधान एक बार फिर से आत्मचेतना विहीन जनता पर एकबार फिर से जरूरत से अधिक भरोसा कर रहा है और यह देश के लिए घातक हो सकता है। खैर, इसपर फिर कभी बात कर लेंगे, अभी विषय है कि अगर सरकार के किसी फैसले से आप खुश नहीं हैं तो क्या करेंगे? आप विरोध दर्ज करा सकते हैं, आप उस योजना में हिस्सा नहीं ले सकते हैं, लेकिन आपने क्या किया? वही जहालत दिखाई जो 10 जून को 'मुसलमानों' ने दिखाई थी। 


10 जून और 16 जून वाले जाहिलों में अंतर क्यों?

अब मेरा सीधा सवाल सरकार से है। इस देश का हिस्सा बिहार भी है, राजस्थान भी, मध्य प्रदेश भी, उत्तर प्रदेश भी और अन्य राज्य भी। 10 जून को प्रदर्शन के नाम पर जो नंगापन दिखाया गया, क्या वह 16 जून 2022 को हुई जहालत से कम था? हां, बस इतना अंतर था कि वह मजहबी जहालत थी और यह राजनीति से प्रेरित जहालत। लेकिन ना मजहब बुरा है और ना ही राजनीति, गलत तो जहालत है ना? फिर जहालत करने वालों में भेदभाव क्यों? मैं राजस्थान, बिहार या किसी अन्य गैर भाजपा शासित राज्य से अपेक्षा नहीं करता, लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की सरकार चलाने वाली पार्टी तो राम राज्य की बात करती है ना? राम तो भेदभाव नहीं करते थे। श्रीराम ने तो अपने उस अनुज को भी व्यवस्था तोड़ने पर सजा दी थी, जिसने 14 साल तक निद्रा देवी को अपने पास तक नहीं फटकने दिया। फिर आप क्यों वैसी ही कार्रवाई नहीं करते? क्यों बुलडोजर वाली कार्रवाई 16 जून को जहालत करने वालों पर होने की बात नहीं कर रहे? वजह कोई भी हो, विद्वेष कैसा भी हो, लेकिन विश्वास मानिए यह रामराज्य नहीं है, यह न्याय नहीं है!

Saturday, 14 May 2022

मनुस्मृति ने मुझे क्या सिखाया और मौलवी ने क्या बताया? 'जन्म' जाति के अहंकार में डूबे लोग जरूर पढ़ें

भारत की सामाजिक परंपरा ने व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए दो तरह के संगठन बनाए। एक था वर्ण और दूसरा आश्रम। वर्ण यानी कर्म की प्रकृति और आश्रम यानी वर्ण के लिए प्रशिक्षण। कौन किसका बेटा है, कौन किस जगह पर पैदा हुआ, इसकी जगह पर कौन किस विषय में रुचि रखता है, कौन किस विषय में 'कुशलता' प्राप्त करना चाहता है, इसे चुनने का अधिकार दिया गया। आसान शब्दों में कहें तो आज जिस स्किल डिवेलपमेंट की बात सरकार कर रही है, वह तो हमारी परंपरा का हिस्सा था। 


थोड़ा विस्तार से समझते हैं। हम जब कोई व्यवस्था बनाते हैं तो उसकी कुशलता में कोई कमी नहीं छोड़ते। सब बेहतर रखने की कोशिश करते हैं। इसी व्यवस्था के तहत चार वर्ण बने और कर्मों के आधार पर उनका नामकरण कर दिया गया। यह वर्ण व्यवस्था विभेद रहे, इसके लिए सभी की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा के शरीर से ही बताई गई। ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल के 90वें सूक्त की 12वीं ऋचा में कहा गया:


ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायतः ॥


अर्थात

जो समाज को ज्ञान देने का काम करे, लोगों को शिक्षित करे, नैतिकता का पाठ पढ़ाए... वह मुख से उत्पन्न हुआ ब्राह्मण

जो अपने भुजबल से समाज की रक्षा करे, वह भुजाओं से उत्पन्न हुआ क्षत्रिय

जो समाज का पेट पाले, उनके जीवन यापन के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए, वह उदर यानी पेट से उत्पन्न हुआ वैश्य

जो समाज के लिए श्रम साधना करे, वह पैरों से उत्पन्न हुआ शूद्र


अब यहां से दो विषय लेकर चलते हैं। पहला विषय यह है कि भाई शूद्रों को लिस्ट में सबसे नीचे रखा और फिर पैरों से उत्पत्ति करा दी। मतलब इतनी नाइंसाफी! यह मैं नहीं कह रहा, यह हमारे नवबौद्ध कहते हैं। अब उन मूर्खों को कौन समझाए कि भाई, पैर कौन सी खराब चीज है। एक-एक काम बंट रहा था, कोई नीचे रहा, कोई ऊपर, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी काम का महत्व कम आंका गया। अगर ऐसा होता तो कह देते कि शूद्र नौकर हैं, उनका छुआ नहीं खाना है, उनकी उत्पत्ति तो ब्रह्मा जी ने की ही नहीं। कोई कहानी बना देते, जैसे बहुत से नवबौद्धों ने बना रखी है। कह देते कि वो ब्रह्मा जी के वाहन हंस का मन किया कि किसी को परेशान किया जाए तो बस परेशान करने के लिए हंस ने 'शूद्र' की उत्पत्ति कर दी। मतलब अजब ही मूर्खता चल रही है।


कोई ऊपर नीचे नहीं, सभी का अपना महत्व है। इन चारों कामों से एक भी काम ना हो तो हो सकता है कि आप जिंदा रह लें लेकिन सामाजिक तानाबाना नहीं चल सकता था। हमने व्यवस्था बनाई, इसीलिए आज हमारे पास हजारों लाखों सालों का इतिहास है। हमने दायित्वों का वर्गीकरण किया, लोगों की योग्यता, क्षमता और प्रतिभा को निखरने का अवसर दिया, इसलिए हम विश्वगुरु कहलाए, इसीलिए सबसे प्रतापी राजा हमारे पास हुए, इसलिए पूरी दुनिया में सबसे बड़े निर्यातक हम रहे, इसीलिए हमारा हर काम व्यवस्थित रहा। 


सब परफेक्ट था तो समस्या कैसे हुई?

जैसा मैंने पहले भी कहा कि हम जब कोई व्यवस्था बनाते हैं तो उसकी कुशलता में कोई कमी नहीं छोड़ते। हमारी वर्ण और आश्रम व्यवस्था भी परफेक्ट थी, जैसे जब भारत का संविधान बना तो वह भी सभी के बारे में सोचकर एकदम परफेक्ट बनाया गया, उस समय के हिसाब से। लेकिन फिर विसंगतियां आनी शुरू हो गईं, लोग निजी लाभ के लिए उनका दुरुपयोग करने लगे। बिलकुल वैसे ही, जैसे कई बार आज पड़ोसी से कूड़ा डालने को लेकर झगड़ा हो जाए तो SC-ST एक्ट लगवा दिया जाता है, या पत्नी अपनी सास को खाना ना दे और पति इसे लेकर डांटे तो दहेज उत्पीड़न का केस लगवा दिया जाता है। उसी तरह से लोगों ने उस वर्ण व्यवस्था का भी दुरुपयोग किया, उसके सहारे लोगों का शोषण भी किया, उनके मानवीय अधिकारों का हनन भी किया। लेकिन क्या इसके लिए आप वर्ण व्यवस्था को दोषी ठहराएंगे? नहीं! दोषी वह है, जिसने दुरुपयोग किया, जैसे संविधान का होता है। फर्जी केस लगवाने वालों की वजह से हम संविधान को गलत नहीं कह सकते। बदलते वक्त के साथ मल्टिटास्किंग उपयुक्त व्यवस्था है। अब कोई 'वैश्य' आपका पेट पालने के लिए नहीं बैठा है, अब आपको अपना पेट पालने के लिए कभी ब्राह्मण वाला, तो कभी क्षत्रिय वाला, तो कभी शूद्र वाला काम करना पड़ेगा। जब काम दूसरे वर्ण वाला कर रहे हैं तो जन्म को लेकर अहंकार क्यों? और यह कहने का अधिकार मैं तब रखता हूं, जब पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कहूं कि बदलते वक्त के साथ जब हम बिना किसी की जाति पूछे उसके साथ ऑफिस में खाना खाते हैं, साथ में  डेस्क शेयर करते हैं, एक ही रूम में शेयरिंग करते हैं, एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, तो जाति आधारित कानूनों को खत्म करके 'समान नागरिक संहिता' लागू की जाए। 


जब ऊपर के पैराग्राफ के अंतिम हिस्से का पहला भाग कहता हूं तो जन्म आधारित जाति के अहंकार में डूबे मूर्खों को मैं ब्राह्मण विरोधी लगने लगता हूं, और जब दूसरा हिस्सा कहता हूं तो आरक्षण विरोधी हो जाता हूं। मेरा स्पष्ट मानना है कि जाति व्यवस्था इस देश में नहीं होनी चाहिए, आज हमें उसकी आवश्यकता ही नहीं है। इसके साथ ही कहीं पर भी जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था भी नहीं होनी चाहिए।


अब तक तो ज्ञान की बातें हुईं। अब मैं आपको बताता हूं कि आज सालों बाद मेरा मन क्यों किया कि 'ब्राह्मण' रूप में आया जाए। दरअसल कुछ दिन पहले एक राजनीतिक दल की महिला नेता ने ट्वीट किया, 'ब्राह्मण समाज को अपने पुत्र-पुत्रियों को ब्राह्मणों में ही विवाह करने के लिए प्रेरित, संस्कारित और शिक्षित करना ही चाहिए। जिससे ब्राह्मण संस्कार चिरायु हों। रोटी सबके साथ मिल बाँटकर खाओ, पर बेटी अपने ब्राह्मण कुल में ही दो और अपने ब्राह्मण कुल से ही लो।'


https://twitter.com/RoliTiwariMish1/status/1523863999519277058


इस ट्वीट के बाद मैं बड़ा आश्चर्यचकित हुआ कि समाजवादी पार्टी की नेता होकर ब्राह्मणों की इतनी चिंता कैसे? फिर नाम देखा, उसमें पंडित भी था, तिवारी भी और मिश्रा भी। वंशावली की बात करूं तो मैं विश्व गौरव, कश्यप गोत्र, वेद-सामवेद, उपवेद- गंधर्ववेद, शिखा-वाम, पाद-वाम, शाखा-कौथुमी, सूत्र-गोभिल, देवता-विष्णु और छंद-जगति होने के बाद सैकड़ों धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करने के उपरांत भी इस तरह का ज्ञानार्जन नहीं कर पाया। जिस मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जन्मस्थान के लिए के लिए देश का लगभग पूरा हिंदू मन से एकमत था, उस राम की पत्नी का कुल-गोत्र किसी को नहीं पता था। ऐसे राम को पूजने वाले देश में जाति को लेकर ऐसी बातें। कितने ऋषियों ने राक्षसों की कन्याओं से विवाह किया, क्यों? ताकि उनकी आने वाली पीढ़ी की प्रवृत्ति बदले। कुछ की बदली, तो कुछ की नहीं बदली। लेकिन जब पंडित डॉ. रोली तिवारी मिश्रा ने यह पोस्ट की तो अपने उपरोक्त ज्ञान के आधार पर मैंने जवाब दिया, 'कर्म के आधार पर बनी वर्ण व्यवस्था को आज की व्यवस्था में कैसे स्थापित कर सकती हैं आप? आपके परिवार का एक सदस्य भी क्या आज 'ब्राह्मण' रह गया है? नाम के आगे पंडित लगाने से कोई ब्राह्मण नहीं होता, इस अहंकार से बाहर निकलिए।'


मेरे इस कॉमेंट के साथ ही दो तरह के लोग फुल मूड में आ गए। अलग-अलग कॉमेंट किए। मैं कोशिश करूंगा कि इस ब्लॉग में सभी के सवालों का जवाब दूं और जिज्ञासा का समाधान करूं। इनमें से कुछ को तो भ्रम है, यानी वे समय के अभाव में अध्ययन नहीं कर पाए, और जो सुना, उसे मान लिया। दूसरे हैं कुपढ़, जिन्होंने वही पढ़ा जो विकृत साहित्य उन्हें पढ़ाया गया। ऐसे लोगों को समझाना लगभग नामुमकिन है, लेकिन फिर भी इनका जवाब देना इसलिए जरूरी है, ताकि कम से कम अनपढ़ों को ये कुपढ़ अपने वश में ना कर पाएं।


अल्पज्ञान से भरे मेरे अनुज राशिद के सवाल और उनके जवाब

जब मैं नवभारत टाइम्स डिजिटल में कार्यरत था, तो मैंने मेरठ से एक बालक को अपनी टीम में रखा था। राशिद नाम था उसका। मैंने किसी के चुनाव के लिए जो मानक तय किया था, उसमें वह फिट बैठता था। जब उसका चुनाव किया तो बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया, क्योंकि वह सोशल मीडिया पर काफी कुछ अनर्गल लिखता था। लेकिन वह मेरा विषय नहीं था, इसलिए मैं अपने फैसले पर अडिग रहा। चूंकि वह मेरी टीम का हिस्सा रहा है, इसलिए उसकी जिज्ञासा का समाधान बेहद जरूरी है।


राशिद ने लिखा, 'कर्म के आधार पर बनी वर्ण व्यवस्था को क्या ये कहना चाहिए की शूद्र आपकी सेवा के लिए बने हैं, उन्हें चाहे जैसे इस्तेमाल करो, और यदि किसी शूद्र के कानो में गीता के शब्द पड़ जाए तो उसके कानों में सीसा पिघला कर डाल दो।' मैंने पूछा कि यह जवाब कहां से मिला तो राशिद ने 2-4 ग्रंथों के साथ उनकी तथाकथित सूक्तियां लिख डालीं।


शूद्र किस लिए बने थे, वह मैं ऊपर स्पष्ट कर चुका हूं और गीता में तो भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥' अब ऐसे में अगर कोई यह कहे कि गीता सुनने वाले के कान में सीसा पिघलाकर डाल दो तो हास्यास्पद लगता है। कौन सी बात किस प्रसंग में कही गई, किसने कही, बिना इसे समझे कुछ भी कह देना गलत होगा। वाल्मीकी रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने रावण से भी बहुत कुछ कहलवाया है, अगर आप उस एक श्लोक को पढ़कर यह कह देंगे कि यह तो रामायण में लिखा है, तो गलत होगा। खैर, राशिद ने मनुस्मृति की एक तथाकथित सूक्ति बताई- 'अनिष्टेषु वर्तन्ते सर्व कर्मसु। सर्वथा ब्राह्मणा पूज्या: परमं दैवतं हितत्।। मनु-स्मृति-९/३१९' बड़े धड़ल्ले से ऐसी सूक्तियां, श्लोक और बातें बिना प्रसंग के और भावहीन विषय को केन्द्र में रखकर फैलाई जाती हैं। 


ऊपर की तरह ही श्रीरामचरित मानस की एक तथाकथित चौपाई का जिक्र किया जाता है, 'पूजहि विप्र सकल गुण हीना। शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।', इसका जिक्र भी राशिद ने किया है। 

ऐसे और भी सूक्तियों/ चौपाइयों/श्लोकों के साथ इस बात को प्रमाणित करने की कोशिश की जाती है कि सनातन परंपरा में ब्राह्मण जाति को सबसे ऊपर रखा गया, शूद्रों को दबाया गया। अरे साहब! सनातन पर सवाल उठाने से पहले सनातन को समझ तो लो। सनातन में जब कर्म आधारित व्यवस्था है तो उसमें ब्राह्मण जन्म से कोई कैसे हो गया। श्रीरामचरितमानस की जिस  चौपाई का ऊपर जिक्र किया गया है, उसके साथ कितनी चालाकी से छेड़छाड़ की गई है, उसे समझिए। असल चौपाई है:

पूजिय विप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ज्ञान प्रवीना।

लेकिन इस चौपाई को इतना स्पष्ट कर दिया गया कि लोग आसानी से समझ सकें कि शूद्रों के साथ तो सनातन में बड़ा भेदभाव हुआ है। खैर, हम आपको अरण्यकांड की इस चौपाई का अर्थ बताते हैं। पूरा प्रसंग समझाएंगे तो बहुत समय लगेगा, लेकिन इतना समझ लीजिए कि राक्षस कबंध से भगवान श्रीराम यह कह रहे हैं और बात हो रही है ऋषि दुर्वासा के बारे में। ऋषि दुर्वाषा के क्रोध के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन उनके ज्ञान और कर्म के बारे में कोई पश्नचिह्न नहीं लगा सकता। इस चौपाई को दो हिस्सों में तोड़कर समझते हैं:

पहला हिस्सा: पूजिय विप्र सील गुन हीना।

पूजिए+ विप्र (साधु) को+ सील का गुन (कोमल हृदय के गुण से रहित)

अर्थात- 


दूसरा हिस्सा: सूद्र न गुन गन ज्ञान प्रवीना

सूद्र न गुन (शूद्र यानी तपस्या से हीन मत समझ)+ गन ज्ञान प्रवीना (ज्ञानी मानो)


पूरी चौपाई का अर्थ समझें तो वहां किसी ब्राह्मण और शूद्र की बात ही नहीं हो रही है, वहां तो बस दुर्वासा ऋषि के बारे में राम बता रहे हैं कबंध को। 

इसका अर्थ होगा- वह विप्र जिसमें भले ही कोमलता ना हो, जो भले ही डांटता-फटकारता हो, दंडित करता हो, लेकिन फिर भी वह पूज्य है। उसे उसके व्यवहार के आधार पर शूद्र यानी तपस्या से हीन मत समझो, बल्कि उनके तप, त्याग, गुण और विशेषताओं के आधार पर उन्हें ज्ञानी समझो।


अब इस चौपाई में ब्राह्मण व्यभिचारी होने पर भी पूज्य है, यह कहां से आ गया? यह सिर्फ एक उदाहरण है। भारतीय परंपराओं और साहित्य के साथ लगातार ऐसा हुआ। साहित्य में विकृति आती है तो परंपरा और समाज स्वतः विकृत हो जाता है, यही हमारे साथ हुआ। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस विकृति से हमारी संस्कृति खत्म होती जा रही है। लेकिन इसका जिम्मेदार कोई व्यक्ति, कोई जाति, कोई संप्रदाय या कोई विशेष वर्ग नहीं है। हर जाति/संप्रदाय/वर्ग में ऐसे लोग हैं, जो बिना पढ़े सिर्फ उसी को सत्य मान लेते हैं, जो उन्हें बताया जाता है। ऐसी ही एक और सूक्ति राशिद ने लिखी


शतं ब्राह्मण माक्रश्य क्षत्रियो दण्डं अर्हति।

वैश्योप्यर्ध शतं द्वेवा शूद्रस्तु वधम् अर्हसि।।

(मनु-स्मृति-- ८/२६७/)


कुपढ़ का अर्थ समझिए। राशिद के अनुसार इसका अर्थ है कि मनु-स्मृति में वर्णित है कि ब्राह्मण बुरे कर्म करे, तब भी पूज्य है, क्योंकि वह भू- मण्डल का परम देवता है।


जब मैंने इसे पढ़ा तो हंसी आई। क्योंकि ऊपर जो सूक्ति लिखी है, उसका इस अर्थ से कोई लेना देना नहीं है। उस सूक्ति में बताया गया है कि यदि किसी ब्राह्मण (उस समय के हिसाब से कर्म वाला) को दुष्ट वचन कहे तो उसे क्या सजा मिलेगी। यानि अगर क्षत्रिय कुछ कहेगा तो उसे क्या दंड मिलेगा, वैश्य को क्या दंड मिलेगा और शूद्र को क्या दंड मिलेगा। यह सामान्य सा दंड विधान था। इस सूक्ति के विषय में जब एक आचार्य से बात कर रहा था तो उन्होंने बहुत शानदार उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, 'मान लीजिए, किसी कक्षा में 40 बच्चे हैं, उन्हें तीन कैटिगरी में बांटिए, पहली जो पढ़ने में बहुत होशियार हैं और शिक्षक की सारी बातें मानते हैं, दूसरी जो कम होशियार हैं और कभी-कभी गड़बड़ कर देते हैं तथा तीसरी में वे छात्र जो अधिक गड़बड़ करते हैं। अब अगर कोई छात्र शिक्षक की अवज्ञा करे तो शिक्षक हर कैटिगरी के छात्र को उसके पुराने रेकॉर्ड के हिसाब से ही दंड देगा।' यह उस समय का एक दंडविधान था। खास बात यह है कि अगर कोई ब्राह्मण किसी ब्राह्मण को कुछ कहता है तो उसपर राजदरबार में राजा के समक्ष शास्त्रार्थ का विधान था। उनके जवाब पर मैंने पूछा कि ऐसा क्योंकि किसी और वर्ण का व्यक्ति एक ब्राह्मण को कुछ नहीं कह सकता? उनका जवाब था, 'एक व्यक्ति सुबह भोजन करता है, उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि शाम को भोजन कहां से मिलेगा। लोगों को शिक्षित करने का काम करता है, कुटिया में रहता है, लालच शून्य है। उसे कोई कुछ कहेगा तो कष्ट तो होगा।'


इस्लाम आतंकवाद सिखाता है?

इसी तरह सैकड़ों सूक्तियां, श्लोक मार्केट में तैर रहे हैं, जिनका अर्थ विकृत रूप में फैलाकर समाज में विद्वेष फैलाया जा रहा है। अब हो सकता है कि किसी के मन में सवाल उठे कि हम ये कैसे सही मानें कि मनुस्मृति या अन्य किसी ग्रंथ में किसी जाति के लिए विद्वेष नहीं है। मैं इसका जवाब एक उदाहरण से देता हूं। एक बार मेरे एक परिचित ने पूछा कि आपके मुसलमान दोस्त क्यों हैं, उनको तो आतंकवाद सिखाया जाता है, जिहाद सिखाया जाता है। मैंने पूछा कि यह किसने कहा कि मुसलमानों को आतंकवाद सिखाया जाता है? उसने कहा, वे जिहाद के नाम पर कत्लेआम करते हैं, ये तो आतंकवाद ही है और उन्हें यह सब कुरान सिखाती है।


मौलवी साहब ने समझाया इस्लाम

सवाल में दम था, लेकिन मैं सनातनी इस्लाम के बारे में क्या ही जानता। लेकिन मैं अपने उन मित्रों को तो जानता था, जो मेरे साथ रहते थे, मेरे साथ जिन्होंने दामिनी के लिए तिरंगा उठाया था, जिन्होंने शिक्षा के व्यापारीकरण के खिलाफ मेरे छात्र जीवन के दौरान एबीवीपी का भगवा झंडा भी उठाया था, फिर मैं कैसे मान लेता कि उनको आतंकवाद सिखाया जाता है। इसके बाद मैं एक मौलवी साहब के पास गया। उनसे यही सवाल रखे, तो उन्होंने सबसे पहले तो जिहाद का मतलब बताया। उन्होंने कहा कि 'जिहाद का मतलब है अपने अंदर के राक्षस से लड़ना। अपने अंदर की बुराइयों से लड़ना और सिर्फ लड़ना नहीं बल्कि उस लड़ाई में अत्यधिक प्रयास करना मतलब जीतकर ही दम लेना। अब अगर कोई जिहाद के नाम पर एक कौम को बुराई बताकर उसकी हत्या कर रहा है, तो वह कुछ भी हो सकता है, सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता।' 


बात बस इतनी सी है। इस दुनिया में आपका मानस तय करने वाले बहुत से लोग हैं। आपने उनके हिसाब से अपना मानस बना लिया तो किसी का कोई नुकसान हो या ना हो, 'आप' में से 'आप' खत्म हो जाएंगे। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं कि कोई किसी चीज की कैसी भी व्याख्या करे, लेकिन उसमें जो आपके साथ आपके पड़ोसी और आपके समाज के लिए हितकारी हो, उसे स्वीकार करो। 


नारी के विषय में मनुस्मृति

मनुस्मृति के विषय में कहा जाता है कि वह नारी स्वतंत्रता के खिलाफ है। लेकिन जितना मैंने पढ़ा है, मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 56वें श्लोक में वर्णित है, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:, यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:’, अर्थात जहां पर स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं और जहां उनकी पूजा नहीं होती, वहां सब काम निष्फल होते हैं। नारी के लिए ऐसा भाव भारतीय परंपरा को छोड़कर किसी अन्य परंपरा में नहीं दिखता और यह परंपरा मनुस्मृति आधारित है। तो बताइए आखिर किस आधार पर मनुस्मृति का विरोध किया जाए।


दहेज इत्यादि पर मनुस्मृति

मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के 138वें श्लोक का अर्थ मुझे बताया गया कि स्त्री, रोगी, भारवाहक, अधिक आयुवाले, विद्यार्थी, वर और राजा को पहले रास्ता देना चाहिए। इसी मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 52वें श्लोक में कहा गया कि जो वर के पिता, भाई, रिश्तेदार आदि लोभवश, कन्या या कन्या पक्ष से धन, संपत्ति, वाहन या वस्त्रों को लेकर उपभोग करके जीते हैं वे महानीच लोग हैं। क्या दहेज प्रथा का इससे बड़ा विरोध कोई कर सकता है? विश्वास मानिए, किसी और वजह से नहीं, बल्कि एक सनातनी होने का गर्व अनुभव करने के लिए मैंने अपने विवाह कतो पूर्ण रूप से दहेज रहित रखा। मेरे कई 'अपने' इस बात से आज तक मुझसे नाराज हैं, लेकिन मैं गर्वित हूं कि जिस गौरवशाली परंपरा का इतिहास हजारों-लाखों वर्ष पुराना है, उसे संरक्षित करने में थोड़ा सा योगदान मेरा भी है। 


मुझे टैग करते हुए सोशल मीडिया पर आरक्षण व्यवस्था से प्रताड़ित एक नवयुवक ने लिखा, 'मेरे माता-पिता दोनों जन्म से ब्राह्मण हैं, मैं दिन-रात साफ सफाई का काम कर लूंगा, मुझे SC-ST का सर्टिफिकेट कैसे मिल सकता है?' 


कुल/गोत्र का अहंकार! मनुस्मृति पढ़ लो आज के ब्राह्मणो

आज इस देश में भ्रष्टाचार से भी बड़ी कोई बीमारी है तो वह जातिवाद है। मैं मानता हूं कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था इस देश की एकात्मता, अखंडता और एकता के लिए खतरा है लेकिन इस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराना गलत होगा। नीति की स्पष्ट व्याख्या मनुस्मृति में मिलती है, आज जब पूरा दलित आंदोलन मनुवाद के विरोध पर टिका है, ऐसे समय में मैं बताना चाहता हूं कि वर्ण व्यव्स्था को जन्म के आधार पर नहीं अपितु कर्म के आधार पर शुरू किया गया था। वर्ण अर्थात वरण करने वाला यानी चुनाव करने वाला, अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्म को चुनने का अधिकार था। उस गुण, कर्म, स्वभाव आधारित व्यवस्था को आज जन्म आधारित बनाकर एक पुण्य संस्कृति का विरोध करना वास्तव में दुखद है। मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 109वें श्लोक में साफ तौर पर कहा गया है कि अपने गोत्र या कुल की दुहाई देकर भोजन करने वाले को स्वयं का उगलकर खाने वाला माना जाए। अतः मनुस्मृति के अनुसार जो जन्म से ब्राह्मण या ऊंची जाति वाले अपने गोत्र या वंश का हवाला देकर स्वयं को बड़ा कहते हैं और मान-सम्मान की अपेक्षा रखते हैं उन्हें तिरस्कृत किया जाना चाहिए। अब अगर कोई अल्पज्ञानी 'ब्राह्मण' खुद को सिर्फ इसलिए 'बड़ा' मानने लगे कि उसका कुल/गोत्र क्या है तो उसका तिरस्कार करने का आदेश स्वयं मनुस्मृति देती है।


आज की व्यवस्था बेहतर है, या तब की थी?

मनुस्मृति के 10वें अध्याय के 65वें श्लोक में कहा गया है कि ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र, ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं। मनुस्मृति के अनेक श्लोक कहते हैं कि उच्च वर्ण का व्यक्ति भी यदि श्रेष्ठ कर्म नहीं करता, तो वह शूद्र (अशिक्षित) बन जाता है। अब अगर आप उस शूद्र शब्द को जन्म आधारित जाति से जोड़ दें तो गलत होगा। इस तरह से वर्ण बदलने का व्यवस्था आज का संविधान देता है क्या? लेकिन उस समय के विधान यानी मनुस्मृति में ऐसी व्यवस्था थी। 


....फिर भी, इसे समझना जरूरी है

इतना कुछ होने के बावजूद संभव है कि मनुस्मृति में कुछ ऐसी बातें हों जो आज के परिपेक्ष्य में आत्मसात करने के लिए उपयुक्त न हों अथवा यह भी संभव है कि जिस उद्देश्य के साथ वे बातें लिखी गई हों, वह उद्देश्य हमारी समझ से परे हों लेकिन इस तर्क के साथ पूरी मनुस्मृति को नकार देना अनुचित होगा। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, सभी को परिवर्तित होना चाहिए लेकिन उस परिवर्तन की दिशा सकारात्मक होनी चाहिए। सकारात्मक सोचें, सकारात्मक समझें और सकारात्मक करें……हमें तो गर्व करना चाहिए कि हमारे देश में 2000 से अधिक सालों का इतिहास रखने वाली सेवा समर्पित ईसाईयत है, 1400 से अधिक सालों का इतिहास रखने वाला शांतिप्रिय इस्लाम है, लगभग 500 सालों का गौरवशाली इतिहास रखने वाला सिख पंथ है, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी और आदि काल से चला आ रहा पूर्ण सनातन भी है। जिस परंपरा (रिलिजन) में जो भी उचित हो, जो भी वर्तमान परिपेक्ष्य में अनुकरणीय हो, उसे ससम्मान आत्मसात करने में क्या बुराई है?


अध्ययन का वक्त नहीं है तो मेल करें

और अंत में बस इतना ही कहूंगा कि आप अपने जन्मजातीय ब्राह्मण होने के अहंकार में हैं या बाप-दादाओं की कहानियों के आधार पर आज सक्षम होने के बावजूद एक वर्ग विशेष को अपने उस शोषण का जिम्मेदार मानते हैं, जो आज हो नहीं रहा, या फिर आपको किसी भी भारतीय साहित्य में कोई खामी दिखती है और आपको उसकी पुष्टि करने के लिए अध्ययन का समय नहीं है  तो प्लीज मुझे news.vgaurav@gmail.com पर मेल करें। मैं उपनिषद परंपरा का पालन करते हुए अध्ययन करूंगा और आपकी जिज्ञासा का समाधान करूंगा। और एक और बात, विश्वास मानिए, अगर कुछ गलत हुआ तो वह भी बताऊंगा और अपने पूर्वजों की तरफ से क्षमा भी मांगूंगा। पर अगर आप फर्जी ज्ञान बाटेंगे तो उससे मेरा कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन आपका कोई लाभ भी नहीं होने वाला। शुभकामनाएं...

Monday, 20 September 2021

UP में सच दिखाने की सजा FIR क्यों है? CM योगी आदित्यनाथ के नाम एक पत्रकार का खुला पत्र

 प्रिय योगी आदित्यनाथ जी,
देश में बीते साल जब कोरोना का कहर शुरू हुआ तो सरकार ने बेहद संजीदगी से प्रवासी मजदूरों को मुफ्त में राशन पैकेट और भोजन पैकेट उपलब्ध कराने शुरू किए। फिर जब काम-धंधे रुक गए तो सरकार ने गरीबों को मुफ्त राशन देने की घोषणा कर दी। दुनिया में मुफ्त में राशन वितरण की यह सबसे बड़ी योजना थी। एक भारतीय के तौर पर मेरे लिए ये गर्व का विषय था कि अचानक आई महामारी को लेकर तमाम अव्यवस्थाओं के बीच सरकार कम से कम भूख मिटाने का इंतजाम कर रही है।

इस बीच अचानक पता लगा कि गरीबों के हक पर डाका जा रहा है। सरकारी राशन की दुकानों पर कोटेदार गरीबों के राशन में घटतौली कर रहे हैं। खबर हुई तो कुछ कोटेदारों पर ऐक्शन भी हो गया। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसका संज्ञान लिया। कई फोन आए, लोगों ने बधाइयां दीं, सुकून था कि प्रदेश के अंतिम व्यक्ति को मिलने वाले हक में थोड़ा योगदान मेरा और मेरे संस्थान का भी है।

पढ़ें: एनबीटी के 'ऑपरेशन भूख' का बड़ा असर: सीएम योगी बोले- कतई न होने पाए गरीबों के राशन में कटौती

फिर कोरोना की दूसरी लहर आई, फिर वैसी शिकायतें थीं, लोगों का कहना था कि हमें एकबार फिर से 'ऑपरेशन भूख' को रिएक्टिवेट करना चाहिए। हमने किया।

देखें वीडियो:
https://www.facebook.com/watch/?v=921599678683156


कोटेदारों ने खोली गोदाम की पोल
इसबार कोटेदारों ने साफ कहा कि उन्हें राशन गोदाम से ही कम मिलता है, बोरियों का वजन नहीं दिया जाता, अतिरिक्त वसूली भी होती है। अफसरों से बात की गई तो उन्होंने जांच कराने की बात कही। लेकिन कार्रवाई फिर से कोटेदारों पर हो गई और मामले को खत्म करा दिया गया। हमारे पास लगातार फोन आ रहे थे कि व्यवस्थाएं नहीं सुधरीं। अफसर छोटी मछलियों पर कार्रवाई करके खानापूर्ति कर देते हैं और बड़ी मछलियां आराम से भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगाती रहती हैं। खैर, हमारी टीम बुलाकी अड्डे के पास स्थित FCI के गोदाम पहुंची। यहीं से कोटेदारों को राशन दिया जाता है। वहां जाने से पहले हमने अपने कुछ कोटेदारों को फोन किया और पूछा कि क्या वे वहां आ सकते हैं। किसी ने समय मांगा तो किसी ने मना कर दिया। इसबीच अलका नाम की एक कोटेदार के रिश्तेदार रजनीश ने कहा कि वह आज राशन लेने जा रहे हैं। मैंने उनको गोदाम पर मिलने को कहा।

जब दबाव काम नहीं आया तो मैडम धमकाने लगीं
गोदाम पर मार्केटिंग इंस्पेक्टर शशि सिंह मौजूद नहीं थीं, एक कथित कर्मचारी जिसका नाम मोनू था, वो कोटेदारों को राशन दे रहा था। पहले तो हमने चुपचाप उसके काम और बातचीत की रिकॉर्डिंग की, फिर उसे अपना परिचय देने के बाद उसका परिचय पूछा। वो भड़क गया और कई लोगों से फोन कराकर दबाव डलवाने लगा। इसबीच उसने शशि सिंह से बात कराई, शशि सिंह ने मेरा परिचय पूछने के बाद फो न काट दिया। इसके बाद शशि सिंह ने अपने कई 'रिश्तेदार' पत्रकारों से फोन कराया, लेकिन मेरा साफ स्टैंड था कि मैं अपनी खबर के बीच में किसी को नहीं आने दूंगा।

कुछ देर के बाद शशि सिंह आईं और जब उनसे पूछा गया उनकी अनुपस्थिति में एक आउटसोर्सिंग वाला कर्मचारी कैसे बिना वेरिफिकेशन के राशन कैसे बांट सकता है तो वह भड़क गईं और एफआईआर की धमकी देने लगीं। बाद में विभिन्न धाराओं में मेरे साथ मेरे सहयोगी आशीष सुमित मिश्रा पर FIR हुई और मुख्य आरोपी रजनीश नामक शख्स को बनाया गया। इसकी वजह थी कि वह कैमरे पर वहां की व्यवस्थाओं को नंगा कर रहा था, सच बोल रहा था।

अब मैं कुछ टेक्निकल चीजें समझाता हूं।
1. उत्तर प्रदेश में एक कोटेदार को प्रति क्विंटल 70 रुपये मानदेय मिलता है, राशन बंटवाने के लिए।
2. डोर स्टेप डिलिवरी खत्म होने के बाद सरकार कोटेदारों को लगभग 18 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से अतरिक्त धन दे रही है, गोदाम से कोटे तक लाने के लिए।
यानी कोटेदार को कुल 70+18= 88 रुपये सरकार की ओर से मिलता है।
3. कोटेदार को राशन तौलवाने का पैसा गोदाम पर अलग से देना पड़ता है, उसे खुद गोदाम जाकर राशन लदवाना पड़ता है और इतनी महंगाई में वह कम से कम 35-40 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से राशन को अपने कोटे तक लेकर आता है। अब एक गणित समझिए:

मान लीजिए किसी कोटेदार के पास 200 क्विंटल राशन आ रहा है, इसका मतलब है कि उसे सरकार की ओर से 17,600 रुपये मिल रहा है।
इसके बाद उसके खर्च जोड़िए
गोदाम से कोटे तक राशन लाने का खर्च: 200x40= 8000
दुकान का किराया= 4000 (औसतन)
सहयोगी का खर्च= 8000 (औसतन)
बिजली का बिल= 1000 (औसतन)
स्टेशनरी (पेन, डायरी, बिल)= 1000 (औसतन)
अतिरिक्त खर्चे (राशन लेने जाना, उतरवाना)=1000
कुल= 23000 रुपये
यानी क्या कोटेदार 5400 रुपये अपनी जेब से भरेगा? नहीं वो भ्रष्टाचार करेगा। क्योंकि सिस्टम ऐसा बना हुआ है। और ये जो गणित मैंने समझाया है, ये हर अधिकारी को पता है, इसलिए कठोर कार्रवाई नहीं होती।

कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार
सबसे आसान तरीका ये है कि सरकारी राशन की दुकानों को सरकार सीधे तौर पर अपने अंडर में ले ले और वहां बाकायदा कर्मचारी तैनात करके राशन का वितरण कराए। ऐसे मामलों में जवाबदेही उस सरकारी कर्मचारी की तय होगी।
दूसरा रास्ता यह है कि दिल्ली, हरियाणा जैसे अन्य राज्यों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में कम से कम मानदेय इतना किया जाए कि इन कोटेदारों को गलत करने की जरूरत ना पड़े। फिर गोदाम से लेकर दुकान तक, कड़ाई से व्यवस्था का पालन कराया जाए।  

हो सकता है कि ये कोटेदारों के पक्ष की बात हो, लेकिन असल में ये बात सीधे तौर पर सूबे के गरीबों से जुड़ी हुई है। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान एक पेपर हुआ करता था 'मीडिया रिसर्च'। उसमें खबर के पीछे छिपी खबर निकालना बताया जाता था। मैं जो भी स्टोरी करता हूं, उसकी तह में जाकर पता करता हूं कि असल मसला फंस कहां रहा है। इस मामले में भी वही है। मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। बेहद संजीदगी के साथ अपना काम करता रहूंगा।

मामले में भले ही FIR हुई हो, लेकिन उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं अपना काम कर रहा हूं और व्यवस्था अपना काम करेगी। बस दो छोटे से सवाल हैं
1. एक बच्ची को लगातार अश्लील वीडियो कॉल आते हैं, 4 दिन तक पिता थाने के चक्कर लगाता रहता है, लेकिन एक FIR दर्ज नहीं करती।
दुकान से लूट हो जाती है, दुकानदार से मारपीट होती है, पुलिस कहती है कि 151 में मुकदमा कराना है तो कराओ, लूट का नहीं लिखेंगे। इसके बाद पीड़ित आपको पत्र लिखता है।
किसी के साथ राजधानी के बड़े चौराहे पर मोबाइल लूट होती है, लेकिन पुलिस 3 दिन तक FIR नहीं दर्ज करती।
इतनी संजीदा UP पुलिस कुछ ही घंटों में बिना एक बार भी मेरा पक्ष जाने FIR कैसे दर्ज कर लेती है। क्या इसलिए क्योंकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दबाने की कोशिश में सब हिस्सेदार हैं।

2. ये तेजी अच्छी है, FIR का मतलब होता है- First Information Report यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट। सूचना मिलते ही पुलिस का नैतिक दायित्व है कि FIR दर्ज करे, लेकिन हर मामले में ही ऐसा करे। बाकी मामलों में ऐसा क्यों नहीं होता?

एक राष्टवादी सरकार से मेरी अपेक्षा क्या थी?
FIR हो गई थी, कोई बात नहीं थी। लेकिन 3 दिन बीत जाने के बाद भी एक कामचोर अफसर कुर्सी पर बैठा है, मामले में उच्चस्तरीय जांच क्यों नहीं हुई? हम तो सरकार की मदद कर रहे हैं, बता रहे हैं कि किस तरह से व्यवस्था को खराब किया गया है, किस तरह से अफसरों ने गड़बड़ की है, सरकार को तो हमारा सहयोग करना चाहिए। और हम अपेक्षा भी यही करते हैं।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...