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Tuesday, 10 May 2016

यादों में, 1857 की क्रांति और वे वीरांगनाएं!

10 मई 1857, मुझे यकीन है कि आपको याद आ गया होगा कि इस दिन क्या हुआ था। यही वह दिन था जब सैकड़ों सालों की गुलामी सहने वाला भारत का स्वाभिमान एक बार फिर जाग उठा था। अंग्रेजों की नीतियों से आजादी के लिए प्रत्येक वर्ग को लड़ने की प्रेरणा देने वाली क्रांति, इसी दिन शुरू हुई थी। यह भारत में महाभारत के बाद लड़ा गया सबसे बड़ा युद्ध था। इस संग्राम की मूल प्रेरणा स्वधर्म की रक्षा के लिए स्वराज की स्थापना करना था।
यह स्वाधीनता हमें बिना संघर्ष, बिना खड़ग-ढाल के नहीं मिली है अपितु लाखों हुतात्माओं द्वारा इस महायज्ञ में स्वयं की आहुति देने से मिली है। एसी कमरों में बैठकर, सब्सिडी वाली शराब पीकर ‘भारत में आजादी’ की मांग करना बहुत आसान लगता है लेकिन जो हमारे पास आज है, उसके लिए हमारे पूर्वजों ने क्या-क्या किया है, इसे महसूस करना संभव नहीं। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान मेरे गुरुदेव श्री राकेश योगी कहते थे कि आजाद भारत में जन्म लेने वाले लोग समझ ही नहीं सकते कि गुलामी क्या होती है। उस गुलामी को न मैं महसूस कर सकता हूं और ना ही आप, लेकिन हम इतना जरूर कर सकते हैं कि अपने पूर्वजों के संघर्ष का सम्मान करें।
1857
भारत में नारी को हमेशा देवी की संज्ञा दी गई है। जब आवश्यकता पड़ी तो उसने ज्ञान की प्रतिमूर्ति बनकर स्वरों से देश को एक नई दिशा दी और जब अवसर आया तो उसी नारी ने शक्ति स्वरूपा चंडी का भी रूप धारण कर अदम्य शक्ति का लोहा मनवाया। ‘शासन और समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं’ जैसी पुरुषवादी धारणाओं को ध्वस्त करती भारतीय वीरांगनाओं का जिक्र किए बिना संपूर्ण स्वाधीनता आंदोलन की दास्तान अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए। आज जब महिला सशक्तिकरण और महिला ‘स्वतंत्रता’ की बातें हो रही हैं, ऐसे समय में मैं आपको इस ब्लॉग के माध्यम से 1857 की क्रांति से संबन्धित 6 ऐसी महिलाओं की याद दिलाऊंगा जिन्होंने उस दौर में भी राष्ट्र को सर्वोपरि माना।
लज्जो– बहुत ही कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि बैरकपुर में मंगल पांडे को चर्बी लगे कारतूसों के बारे में सबसे पहले मातादीन ने बताया और मातादीन को इसकी जानकारी उसकी पत्नी लज्जो ने दी। लज्जो, अंग्रेज अफसरों के घर पर काम करती थी और वहीं पर उसे यह सुराग मिला कि अंग्रेज गाय और सुअर की चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने जा रहे हैं।
hazrat-mahalबेगम हजरत महल– लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया। अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेजी सेना का स्वयं मुकाबला किया। उनकी अभूतपूर्व संगठन क्षमता के कारण ही अवध के जमींदार, किसान और सैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे। आलमबाग की लड़ाई के दौरान अपने जांबाज सिपाहियों की उन्होंने भरपूर हौसला अफजाई की और हाथी पर सवार होकर अपने सैनिकों के साथ दिन-रात युद्ध करती रहीं। लखनऊ में पराजय के बाद वह अवध के देहातों मे चली गईं और वहां भी क्रांति की चिंगारी सुलगाई।
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बेगम जीनत महल– मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की बेगम जीनत महल ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में स्वातंत्र्य योद्धाओं को संगठित कर अभूतपूर्व देश प्रेम का परिचय दिया। सन् 1857 की क्रांति के लिए बहादुरशाह जफर को प्रोत्साहित करने का काम उन्होंने ही किया था। बेगम जीनत महल ने ललकारते हुए कहा था, ‘यह समय गजलें कह कर दिल बहलाने का नहीं है, बिठूर से नाना साहब का पैगाम लेकर देशभक्त सैनिक आए हैं, आज सारे हिन्दुस्तान की आंखें दिल्ली तथा आप पर लगी हैं, खानदान-ए-मुगलिया का खून हिन्द को गुलाम होने देगा तो इतिहास उसे कभी क्षमा नहीं करेगा।’
हैदरीबाई– लखनऊ की तवायफ हैदरीबाई के यहां तमाम अंग्रेज अफसर आते थे और कई बार क्रांतिकारियों के खिलाफ योजनाओं पर बात किया करते थे। हैदरीबाई ने पेशे से परे अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए इन महत्वपूर्ण सूचनाओं को क्रांतिकारियों तक पहुंचाया और बाद में वह भी रहीमी के नेतृत्व में बनाए गए बेगम हजरत महल के महिला सैनिक दल में शामिल हो गईं।
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ऊदा देवी– ऊदा देवी ने पीपल के घने पेड़ पर छिपकर लगभग 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। अंग्रेज असमंजस में पड़ गए और जब हलचल होने पर कैप्टन वेल्स ने पेड़ पर गोली चलाई तो ऊपर से एक मानवाकृति गिरी। नीचे गिरने से उसकी लाल जैकेट का ऊपरी हिस्सा खुल गया, जिससे पता चला कि वह महिला है। ऊदा देवी का जिक्र वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार अमृतलाल नागर ने अपनी कृति ‘गदर के फूल’ में भी किया है। यह भी माना जाता है कि क्रिस्टोफर हिबर्ट ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट म्यूटिनी’ में लखनऊ स्थित सिकन्दरबाग किले पर हमले के दौरान जिस वीरांगना के अदम्य साहस का वर्णन किया है, वह ऊदा देवी ही थीं।
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झलकारीबाई– झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की ‘दुर्गा दल’ नामक एक अलग टुकड़ी बनाई थी। इस दल की पूरी जिम्मेदारी कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई के हाथों में थी। झलकारीबाई ने कसम खाई थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं श्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊंगी। अंग्रेजों ने जब झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई पूरे जोश के साथ लड़ीं और शहीद हो गईं।
ऐसा नहीं है कि उस क्रांति में सिर्फ इन्हीं महिलाओं का योगदान था। इनके अतरिक्त भी हजारों ऐसी महिलाएं थीं जिन्होंने देशप्रेम में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया लेकिन मुझे पता है कि सभी को अपनी स्मृति में रख पाना संभव नहीं होता। इसलिए कुछ नाम जो उस क्रांति के बारे में पढ़ते समय मेरी स्मृति में रहे, उन्हें आपसे साझा कर रहा हूं। भले ही ये लड़ाईयां भारतीय महिलाओं ने न जीती हों लेकिन उनके अदम्य शौर्य और साहस को नमन करना तो बनता ही है। और वैसे भी युद्ध में जय-पराजय इस बात से तय नहीं होती कि अंत में किसने-किसको पराजित किया बल्कि इस बात से तय होती है कि स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा के नाम पर लड़ने वाले सैनिकों ने गोली पीठ पर खाई है या सीने पर।
आज 159 साल हो गए उस क्रांति को, माना कि लंबा समय हो गया है लेकिन संपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन की आधारशिला तैयार करने वाली उस यशस्वी क्रांति को पूरी तरह से भूल जाना उचित नहीं होगा। आइए, नमन करें उन्हें जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की नींव तैयार करते हुए धर्म, जाति, लिंग, वर्ग, वर्ण, श्रेणी इत्यादि से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि माना। याद रखिए, वे कोई और नहीं थे बल्कि हमारे और आपके परिवारों के लोग ही थे।
1857 की क्रांति को शुरू करने वाले तथा उसे अंजाम तक पहुंचाने वाले इतिहास के पृष्ठों में गुम हो चुके प्रत्येक क्रांतिपुरोधा को वंदन।

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