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Tuesday, 26 August 2014

शिवलिंग रहस्य- जरूर पढ़ें


लिंग का संस्कृत में चिन्ह ,प्रतीक अर्थ होता है…

" शिवलिंग " शब्द में ' लिंग ' शब्द दो शब्दों से बना है, " लीन + गा (गति) " अर्थात, शिव में लीन होकर ही मनुष्य को गति प्राप्त होता है; यानी, शिव के निराकार स्वरूप में ध्यान-मग्न आत्मा सद्गति को प्राप्त होती है, उसे परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
तात्पर्य यह है कि हमारी आत्मा का मिलन परमात्मा के साथ कराने का माध्यम-स्वरूप है, शिवलिंग! शिवलिंग साकार एवं निराकार ईश्वर का 'प्रतीक' मात्र है, जो परमात्मा - आत्म-लिंग का द्योतक है। शिवलिंग शाश्वत-आत्मा का स्वरूप है, जो न जल से प्रभावित होता है, न अग्नि से, न पृथ्वी से, न किसी अस्त्र-शस्त्र से... जो अजित है, अजेय है! शिव और शक्ति का पूर्ण स्वरूप है, शिवलिंग।

पुरुषलिंग का अर्थ पुरुष का प्रतीक इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ स्त्री का प्रतीक और नपुंसकलिंग का अर्थ है ..नपुंसक का प्रतीक —-

अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य के जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये 'स्त्री लिंग' के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए…और खुद अपनी औरतो के लिंग को बताये फिर आलोचना करे—-
”शिवलिंग”’क्या है।
शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है।शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है।
शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है ना ही शुरुआत |
वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है।

शिवलिंग के महात्म्यका वर्णन करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि जो मनुष्य किसी तीर्थ की मृत्तिका से शिवलिंग बना कर उनका विधि-विधान के साथ पूजा करता है, वह शिवस्वरूप हो जाता है। शिवलिंग का सविधि पूजन करने से मनुष्य सन्तान, धन, धन्य, विद्या, ज्ञान, सद्बुद्धि, दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति करता है। जिस स्थान पर शिवलिंग की पूजा होती है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है। जिस स्थान पर सर्वदा शिवलिंग का पूजन होता है, उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक जाता है। शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरण शुद्ध हो जाता है। दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूप एवं तारक है। इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है।

तारकंब्रह्म परमंशिव इत्यक्षरद्वयम्। नैतस्मादपरंकिंचित् तारकंब्रह्म सर्वथा॥

लिंग का अर्थ उस आदि से प्रकट होने वाली अंडाकार ज्योति से है, जिसने सब संसार को प्रकट किया है | यही आकृति संसार का उपादान  का कारण है, वह ज्योतिर्लिंग कहलाता है, “यथा हि तदण्डमभवदैॄमं सहस्त्रांशुभमप्रमम् ”

मनु द्वादश ज्योतिर्लींगो का तात्पर्य यही है की, शिवजी के उपासको को परम भक्ति से द्वादश​ स्थानो में ज्योति: – स्वरूप का दर्शन होता है

“”मनसो लिडॄ़ंम्, आत्मनो लिडॄ़ंम्, अडॄं।रलिडॄों अग्नि :””

यह मान की पहचान है, ये आत्मा की पहचान है , अंगार अग्नि का चिन्ह है,

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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