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Tuesday, 9 June 2026

प्रिय Gen Z! दुनिया ‘ऑप्शन्स’ से नहीं, जिम्मेदारियों से चलती है

पिछले कुछ दिनों से एक बात बार-बार सुनने को मिल रही है। कहा जा रहा है कि पुरानी पीढ़ियाँ, खासकर Gen Y, ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा ऐसी नौकरियों में गुज़ार दिया जहाँ उन्हें सम्मान नहीं मिला, जहाँ उन्होंने ज़रूरत से ज़्यादा काम किया, जहाँ उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी की कीमत पर संस्थानों को प्राथमिकता दी। और वो नया वर्ग, वो नई जेनरेशन, Gen Z कहते हैं कि "हम ऐसा नहीं करेंगे।"

ठीक है। क्या करना है और क्या नहीं, यह व्यक्ति का अपना फैसला होता है, लेकिन लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब एक पूरी की पूरी पीढ़ी कुछ ऐसे विचार के अधीन हो जाए, जिससे उनका खुद का, उनके परिवार का, समाज का, देश का और विशेषतः मनुष्यता का नुकसान हो। समस्या तब होती है, जब अपने फैसलों को सही साबित करने के लिए पिछली पीढ़ियों को गलत साबित करना ज़रूरी समझ लिया जाता है। आज मन है कि इन ‘बच्चों’ से बात की जाए। कम से कम पीढ़ी बदल जाने के कुतर्क के साथ ‘हम भारत के लोग’ अपने बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से तो नहीं भाग सकते। 

जब भी पीढ़ी बदलती है, तब पहले वाली पीढ़ी और बाद वाली पीढ़ी दोनों को अजस्ट करने में थोड़ी समस्या होती है, लेकिन इतनी पीढ़ियां बदलने-बीतने के बाद भी हिंदुस्तान में बच्चे अपने दादा-दादी के साथ जितना खुश महसूस करते हैं, वो किसी के साथ नहीं करते, क्योंकि हमने परिवार बचाकर रखे हैं, हमने परिवार में संस्कार बचाकर रखे हैं, हमने रिश्ते बचाकर रखे हैं, हमने यह आत्मबोध बचाकर रखा है कि ‘मैं’ हूं, क्योंकि ‘ये’ सब भी हैं। आज पूरी दुनिया में भारतीय मस्तिष्क को प्रणाम किया जा रहा है, कभी सोचा है क्यों? क्योंकि ‘परिवार’ जैसी प्रारंभिक इकाई से दायित्वबोध का जो बीज उनके मस्तिष्क में डाला जाता है, वह आगे चलकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के रूप में वृक्षाकारित हो जाता है। 

अब, Gen Z के दौर में डर लग रहा है। कई बार इनके व्यवहार को देखकर लगता है कि ये अगर इसी व्यवहार के साथ किसी ऐसे पेशे में आए, जहां लोग उनसे इतने प्रभावित हो जाएं कि हमें इनके जैसा बनना है तो देश कहां जाएगा, परिवार कहां जाएगा। कुछ दिनों से विभिन्न सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर (विशेषकर Linkedin पर) कई पोस्ट्स देख चुका हूं, जिनमें 'काम' के बोझ से बचने के टिप्स दिए जा रहे हैं। जिनमें आपके 'अधिकारों' की बात हो रही है, जिनमें बताया जा रहा है कि ऑफिस से निकलकर ऑफिस के ग्रुप्स को म्यूट कर दीजिए, जिनमें बताया जा रहा है कि ऐसा करके आपकी मेंटल हेल्थ अच्छी होगी। कुल मिलाकर आपको यह बताया जा रहा कि 'कामचोर' बनो, सब ठीक रहेगा।

हां, हो सकता है कि आपके मेरे 'कामचोर' शब्द से आपत्ति हो, लेकिन सत्य यही है कि अनियोजित तरीके से ही सही, आपके DNA से 'दायित्वबोध' को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। पश्चिम ने आपसे सबकुछ छीन लिया है। आप हर बात में, हर काम में, हर रिश्ते में, सिर्फ ‘फायदा’ खोजने लगे हैं। आपके दिमाग में यह भर दिया गया है कि आपके पास पैसा है तो सबकुछ है। लेकिन हमें ये नहीं सिखाया गया। हमें बताया और सिखाया गया कि रिश्ते सबकुछ है, समाज सबकुछ है, देश सबकुछ है। ऐसी ही एक पोस्ट देखी तो सोचा कि बात करनी चाहिए…

तुम कहते हो कि तुम दुखी रहकर वफ़ादारी साबित नहीं करना चाहते।

सवाल यह है कि क्या हर असुविधा दुख है? क्या हर संघर्ष शोषण है? क्या हर दबाव अन्याय है? और क्या हर त्याग मूर्खता है?

जीवन का कोई भी क्षेत्र उठा कर देख लो, व्यापार, खेल, कला, साहित्य, विज्ञान या सेना, हर जगह सफलता के पीछे ऐसा वक्त छिपा होता है, जिन्हें बाहर से देखने वाले लोग "कठिन समय" कहते हैं। लेकिन वही समय व्यक्ति का निर्माण भी करता है। आज की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि लोग नौकरी बदल रहे हैं। नौकरी बदलना कोई अपराध नहीं है। समस्या यह है कि धैर्य की अवधि लगातार छोटी होती जा रही है। पहले लोग किसी भूमिका में खुद को साबित करने की कोशिश करते थे। अब कई बार लोग खुद को साबित करने से पहले ही यह तय कर लेते हैं कि उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं मिल रहा।

पहले लोग पूछते थे, "मैं इस काम में और बेहतर कैसे बन सकता हूँ?" अब अक्सर पहला सवाल होता है, "मुझे इससे क्या मिल रहा है?"

दोनों सवाल गलत नहीं हैं। लेकिन दूसरा सवाल पहले से पहले आ जाए, तो समस्या शुरू होती है। आज सोशल मीडिया ने एक नई भाषा बना दी है।

अगर बॉस ने परफॉरमेंस सुधारने को कहा तो वो टॉक्सिक हो जाता है।  अगर अतिरिक्त प्रयास की ज़रूरत है तो वह बर्नआउट लगता है। अगर प्रमोशन देर से मिलता है तो एक्सप्लॉइटेशन हो जाता है। अगर किसी निर्णय से असहमति हुई तो रेड फ्लैग लगने लगता है। ऐसा लगता है जैसे पेशेवर जीवन के हर असुविधाजनक हिस्से के लिए एक नया लेबल तैयार है। लेकिन सच्चाई यह है कि जीवन का बड़ा हिस्सा असुविधाजनक ही होता है। स्किल डिवेलप करना असुविधाजनक है, क्योंकि अब AI की स्किल्स पर भरोसा किया जा रहा है। अनुशासन असुविधाजनक है। आलोचना सुनना असुविधाजनक है। गलतियों से सीखना असुविधाजनक है। और जिम्मेदारी उठाना भी असुविधाजनक है। लेकिन तुम ये भूल रहे हो कि इन्हीं चीज़ों से व्यक्तित्व बनता है।

तुम कहते हो कि तुम्हारे पास ‘ऑप्शन्स’ हैं।

बहुत अच्छी बात है। हमने जब नौकरी की शुरुआत की थी तो इंटरनेट हमारी ‘जेब’ में नहीं था। नौकरी के अवसर सीमित थे। जानकारी सीमित थी। नेटवर्क सीमित थे। लेकिन एक बात समझ लो। विकल्प होना और निर्णय लेने की परिपक्वता होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। अगर हर बार कोई बेहतर ऑफर आते ही हम दिशा बदल दें, तो हो सकता है हमारी सैलरी बढ़ जाए। लेकिन क्या हमारी विश्वसनीयता भी बढ़ती है? क्या हमारी विशेषज्ञता भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती है? क्या लोग हमें उस व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिस पर कठिन समय में भरोसा किया जा सकता है? किसी भी संगठन में सबसे मूल्यवान लोग हमेशा सबसे प्रतिभाशाली नहीं होते। अक्सर सबसे मूल्यवान लोग वे होते हैं जो भरोसेमंद होते हैं।

जो मुश्किल समय में साथ खड़े रहते हैं, जो समस्या देखकर गायब नहीं होते। जो यह नहीं पूछते कि "यह मेरा काम क्यों है?" बल्कि यह पूछते हैं कि "इसे ठीक कैसे किया जाए?"

हमारी पीढ़ी ने अधिकारों से पहले जिम्मेदारियों की भाषा सीखी। तुम्हारी पीढ़ी ने जिम्मेदारियों से पहले अधिकारों की। हमसे गलतियाँ हुईं। हमने कई बार अनावश्यक समझौते किए। हमने कई बार खराब मैनेजमेंट को चुनौती नहीं दी। कई बार अपने स्वास्थ्य और परिवार की उपेक्षा भी की। लेकिन कम-से-कम हमने यह नहीं माना कि दुनिया हमारे आराम के हिसाब से खुद को बदल लेगी। हमने खुद को दुनिया के हिसाब से तैयार करने की कोशिश की। और हम आज भी वही कर रहे हैं, तुम्हारे हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

तुम कहते हो, "कंपनी तुम्हारी परवाह नहीं करती, तो तुम कंपनी की क्यों करो?"

सुनने में यह बात बहुत क्रांतिकारी लगती है। लेकिन सोचकर देखिए। कंपनी क्या है? कोई इमारत? कोई लोगो?

नहीं।

कंपनी तुम्हारी टीम है। वहां तुम्हारे सहयोगी हैं। वह व्यक्ति है जो तुम्हारे बाद काम संभालता है। वह क्लाइंट है जिसने तुम पर भरोसा किया। जब तुम बिना जिम्मेदारी लिए केवल अपने 9 घंटे देखते हो, तो नुकसान किसी कॉरपोरेट संस्थान का नहीं होता। नुकसान उन लोगों का होता है जो तुम्हारे काम पर निर्भर हैं। इसलिए जिम्मेदारी का अर्थ कंपनी के प्रति अंधभक्ति नहीं है। जिम्मेदारी का मतलब है अपने कमिटमेंट का सम्मान करना। अपने काम का सम्मान करना। अपने सहयोगियों का सम्मान करना।

और अपने पेशे का सम्मान करना। 

आप मेंटल हेल्थ की बात करते हैं।

यह अच्छी बात है।

कार्यस्थल पर पारदर्शिता की बात करते हैं।

यह भी अच्छी बात है।

आप सम्मानजनक व्यवहार की मांग करते हैं।

यह भी बिल्कुल सही बात है।

लेकिन मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ यह नहीं कि हर चुनौती से बचा जाए। पारदर्शिता का अर्थ यह नहीं कि हर संस्था को खलनायक घोषित कर दिया जाए। और सम्मान का अर्थ यह नहीं कि केवल हमें सम्मान मिले, जबकि हम किसी के प्रति जवाबदेह न हों। करियर केवल यह नहीं है कि आपको क्या मिला। करियर यह भी है कि आपने क्या बेहतर बनाया, क्या सीखा, मनुष्यता को और अधिक बेहतर करने में क्या योगदान दिया। और कितने लोग आपको ऐसा व्यक्ति मानते हैं जिस पर भरोसा किया जा सकता है? इसलिए, नौकरी बदलो अगर ज़रूरी हो। खराब माहौल छोड़ो अगर वह सचमुच खराब है। बेहतर अवसर पकड़ो अगर वह तुम्हें आगे ले जाता है। लेकिन हर कठिनाई को अत्याचार, हर आलोचना को अपमान और हर जिम्मेदारी को बोझ मत समझो। क्योंकि अंत में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। सफलता उन लोगों को मिलती है जो भरोसेमंद होते हैं, जो टिकते हैं, जो सीखते हैं, जो जिम्मेदारी उठाते हैं, और जो यह समझते हैं कि दुनिया केवल अधिकारों से नहीं, जिम्मेदारियों से भी चलती है।




Saturday, 4 January 2025

मनुष्यता के हत्यारे संग इतनी सहानुभूति! ‘तैमूर’ प्रशंसकों की मति ‘लंग’ है

जाते साल के साथ देश के जाने माने कवि डॉ. कुमार विश्वास ने एक कवि सम्मेलन के दौरान एक ऐसा सवाल उठाया, जिससे सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया। कुमार विश्वास के परिवार को, उनकी बेटियों को, उन्हें, उनकी विचारधारा को, सबको टारगेट किया जाने लगा। मीम्स बनने लगे, गंदी और भद्दी बातें होने लगीं लेकिन इन सबके बीच असल मुद्दा तो कहीं दूर ही रह गया। असल मुद्दा वह था जो डॉ. कुमार विश्वास ने उठाया था।

क्या गलत कहा था कुमार विश्वास ने? यही तो कहा था- मायानगरी में बैठने वाले लोगों को समझना पड़ेगा कि देश क्या चाहता है। अब ये चलेगा नहीं कि लोकप्रियता हमसे लोगे, पैसा हम देंगे, टिकट हम खरीदेंगे, हीरो-हीरोइन हम बनाएंगे। फिर तुम्हारी तीसरी शादी से औलाद होगी तो उसका नाम तुम बाहर से आने वाले किसी आक्रमणकारी पर रखोगे। ये चलेगा नहीं, इतने नाम पड़े हैं यार, कुछ भी रख लेते तुम. रिजवान रख लेते, उस्मान रख लेते, यूनुस रख लेते, हुजूर के नाम पर कोई नाम रख लेते. तुम्हें एक ही नाम मिला। जिस बदतमीज, लंगड़े आदमी ने हिंदुस्तान में आकर हमारी मां-बहनों का रेप किया, आप लोगों को अपने बेटे का नाम रखने के लिए वो लफंगा ही मिला. अब अगर इसे हीरो बनाओगे तो इसे खलनायक तक नहीं बनने देंगे, ये याद रखना। ये नया भारत है।

क्या गलत था इसमें? क्यों इस बयान को ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे डॉ. कुमार विश्वास कट्टर हो गए हैं? क्यों इसे ऐसे पेश किया गया जैसे डॉ. कुमार विश्वास मुस्लिम विरोध की बात कर रहे हैं? क्या कुमार विश्वास ने यह कहा था कि उस बच्चे का नाम ‘राम स्वरूप’ या ‘शिवकुमार’ होना चाहिए था? उन्होंने तो यही कहा था कि भई, हुजूर के नाम पर रख लेते, उस्मान, यूनुस, रिजवान कुछ भी रख लेते। लेकिन उस बात पर बात ही नहीं की गई। 30 सेकेंड का वीडियो काटकर फिर से एक राष्ट्रवादी को मुस्लिम विरोधी दिखाने की कोशिश की गई। मजेदार बात यह है कि अपने खुद के इतिहास और अस्तित्व की हत्या करके बाहर से आई एक अवैज्ञानिक, असामाजिक, अनैतिक वैचारिकी के पोषक अपने बिलों से बाहर निकले और लग गए मानवता के एक हत्यारे के महिमामंडन में।  

एक पत्रकार के तौर पर, एक भारतीय पत्रकार के तौर पर मेरी मुखरतम आवाज इस विषय पर उठनी चाहिए कि एक शख्स जो दिल्ली को लूटने की नीयत से समरकंद से हिंदुकुश की पहाड़ियों के रास्ते देश में दाखिल हुआ, जिसने करीब एक लाख हिंदुओं को कटवा दिया, हमारे देश के नागरिकों को कटवा दिया, इंसानों को कटवा दिया, उस मनुष्यता के हत्यारे शख्स के नाम पर इस देश में छोड़िए, दुनिया में किसी भी चीज का नाम क्यों होना चाहिए?

दिल्ली में दाखिल होते ही जिसने अपने सैनिकों को खुली छूट दे दी कि जाओ और धन से लेकर महिलाओं की इज्जत तक की लूट करो, वह हमारा हीरो बनेगा? मोहम्मद क़ासिम फ़ेरिश्ता अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द राइज़ ऑफ़ मोहमडन पावर इन इंडिया में' तैमूर के सैनिकों के आतंक के बारे में लिखते हैं, "हिंदुओं ने जब देखा कि उनकी महिलाओं की बेइज़्ज़ती की जा रही है और उनके धन को लूटा जा रहा है तो उन्होंने दरवाज़ा बंद कर अपने ही घरों में आग लगा दी। यही नहीं वो अपनी पत्नियों और बच्चों की हत्या कर तैमूर के सैनिकों पर टूट पड़े।"

आपको शर्म नहीं आती कि किसी ने अपने बच्चे का नाम उस क्रूर आक्रांता के नाम पर रख लिया और आप खामोश बैठे रहे! तुम मुसलमान हो? तैमूर के सैनिकों ने एक मस्जिद पर हमला करके वहां पर शरण लिए एक-एक शख्स को मौत के घाट उतार दिया था। तैमूर के सैनिकों ने काटे हुए सिरों की मीनार खड़ी कर दी और कटे हुए शरीर के टुकडों को चील और कौवों को खाने के लिए छोड़ दिया। यह कत्लेआम लगातार तीन दिनों तक चला था। जिस शख्स ने तुम्हारे इबादतगाह तक की मर्यादा की हत्या कर दी, उसकी पवित्रता की हत्या कर दी, तुम उसका महिमामंडन करने में लगे हो!

सोचकर देखो, एक शख्स ने 15 दिन में इतनी तबाही मचा दी थी कि उससे उबरने में दिल्ली को 100 साल लग गए थे, और आप उस शख्स को लेकर यह कह रहे हैं कि वह दुनिया का सबसे ताकतवर शासक था! 

कुछ लोग हैं, जो कह रहे हैं कि नाम में क्या रखा है? अजब-गजब से तर्क दे रहे हैं कि किसी रमेश नामक शख्स ने किसी रमेश नामक शख्स का बलात्कार कर दिया हो तो क्या लोगों को ‘रमेश’ नाम से नफरत करनी चाहिए। अरे भई! इतनी समझदारी भरी बातें कर रहे हो तो हिंदू होकर रख लो अपने बेटे का नाम रावण, बेटी का नाम शूर्पणखा और मुस्लिम होकर रख लो अपने बेटे का नाम इब्लीस। नहीं रख पाओगे! क्योंकि तुम भी जानते हो कि नाम से बहुत कुछ होता है, तुम्हें बस एक अजेंडा सेट करना है। अजेंडा- जिसमें सनातन को, राष्ट्रवाद को पीछे खड़ा किया जा सके। लेकिन इस अजेंडे के साथ काम करने वाले नेता, अभिनेता, पत्रकार, एक्टिविस्ट याद रखें कि अब यह नहीं चलेगा। दरअसल इसे चलने नहीं दिया जाएगा। बात हिंदू-मुसलमान की ना कभी थी और ना कभी होगी, बात सिर्फ देश की है, बात इतिहास की है, बात सही और गलत के नजरिये की है।

Wednesday, 28 August 2024

पहले पूतिन, फिर ज़ेलेंस्की से भी गले मिले PM मोदी, दो-गले से बात क्यों कर रहे वामपंथी?

पहले पूतिन, फिर ज़ेलेंस्की से भी गले मिले PM मोदी, दो-गले से बात क्यों कर रहे वामपंथी?

बहुत लंबे समय से किसी विषय पर चर्चा नहीं कर पाया। कई परिचितों के मैसेज आए कि कुछ लिख नहीं रहे, दरअसल एक, कुछ तो समय का अभाव था और दूसरा कोई ऐसा विषय नहीं मिल रहा था कि कुछ विमर्श किया जाए। हालांकि आज जिस विषय पर चर्चा करने वाला हूं, वह विषय तो सामान्य है, लेकिन कुछ बौद्धिकतावादी लोगों ने विषय को विशिष्ट बना दिया है। बीते दिनों फेसबुक पर एक पोस्ट देखी। यह पोस्ट थी, मेरे प्रथम पूर्णकालिक संपादक रहे नीरेन्द्र नागर जी की। उन्होंने लिखा था-


मोदी पूतिन के बाद अब ज़ेलेंस्की से भी गले मिल लिए। यानी बता दिया कि भारत आक्रांता के साथ भी हैं और आक्रांत के साथ भी। थप्पड़ मारने वाले के साथ भी और थप्पड़ खाने वाले के साथ भी।

अंग्रेज़ी में इसे कहते हैं - Running with the hare and hunting with the hounds. हिंदी में शालीन भाषा में कहें तो गंगा गए गंगाराम, जमुना गए जमुनादास। अशालीन भाषा में एक शब्द है जिसका मैं प्रयोग नहीं करना चाहता। आप ख़ुद ही समझ जाएँ।

वैसे मोदी के लिए यह कोई नई बात नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही है कि भाषणों में नारी सुरक्षा की दुहाई देना और ज़मीन पर आततायियों का साथ देना चाहे वह राम रहीम हो या गुजरात के संस्कारी।

मेरे पिता कहा करते थे कि कोई क्या 'कहता' है, यह उसकी असल पहचान नहीं होती। असल पहचान इससे होती है कि वह क्या 'करता' है।

और मोदी क्या 'करते' हैं, यह हम सब जानते हैं। भक्त भी।


एक तरफ वसुधैव कुटुंबकम् का जाप, दूसरी तरफ़ मेरे देश, मेरे लोगों का हित। अजीब दोगलापन है। इसी को मैं स्वार्थप्रेरित कायरता कहता हूँ।

राम-रावण युद्ध में भी दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क थे। तो क्यों राम का समर्थन करते हो? महाभारत युद्ध में भी कौरवों का अपना पक्ष था। फिर क्यों पांडवों का पक्ष लेते हो?


इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाया। दरअसल बात सिर्फ नीरेन्द्र नागर जी की नहीं है, कई अन्य लोग भी, विशेषकर वामपंथी, सोशल मीडिया पर ऐसी ही बातें कर रहे हैं, इसलिए विषय की गहराई में जाना बहुत जरूरी है। नरेन्द्र मोदी का विरोध अपनी जगह है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों का वैचारिक विरोध होता रहना चाहिए, लेकिन किसी भी व्यवस्था में यदि आप मुल्क को, मनुष्यता को किसी भी अन्य चीज से ऊपर रखते हैं तो मेरी इसपर आपत्ति है। रूस और यूक्रेन का क्या मामला है, कौन सही है, कौन गलत है, इस प्रश्न पर दोनों पक्षों की अपनी राय है औऱ यह दोनों देशों के बीच का मामला है, इसमें किसी तीसरे का हस्तक्षेप तब तक नहीं होना चाहिए, जबतक वह मामला आपको या आपके मुल्क के एक भी व्यक्ति को प्रभावित ना कर रहा हो। 


किसी एक पक्ष को आक्रांता कहना और किसी दूसरे पक्ष को आक्रांत कहना, निश्चित तौर पर दो देशों के बीच की निजता में हस्तक्षेप है। एक तीसरे मुल्क के नागरिक के तौर पर मेरे लिए तो गर्व का विषय यही है कि उन दो देशों के युद्ध के बीच जब भारत के बेटे-बेटियों को यूक्रेन से बाहर आना था तो मेरे देश के बच्चे जब तिरंगा लेकर निकले तो दोनों देशों की सेनाओं ने अपने हथियार नीचे किए और उन्हें रास्ता दिया। और सिर्फ इतना ही नहीं, मेरे मुल्क के बच्चों के साथ उस मुल्क के बच्चे भी तिरंगे की छत्रछाया में बाहर आ गए, जो हमारा सामाजिक दुश्मन किंतु पड़ोसी था। मेरे लिए तो यही गर्व का विषय है कि मेरे मुल्क की मनुष्यता ने मेरे सामाजिक दुश्मन देश के बच्चों को भी जिंदगी दी।


मैं विदेश नीति का पंडित नहीं हूं, लेकिन यदि दो दुश्मन देशों से हमारे अपने संबंध अच्छे हैं और हम उसके निजी मामलों में ‘मनुष्यता’ के नाम पर किसी एक का समर्थन ना करते हुए हिंसक कार्यपद्धति का सहारा न लेते हुए पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कह सकते हैं कि रास्ता शांति से ही निकलेगा, बातचीत से ही निकलेगा और दोनों में एक भी देश हमारी बात पर प्रतिउत्तर नहीं करता है तो हमें इसे अपनी विदेश नीति की विजय क्यों नहीं मानना चाहिए?

बाकी राजनीति हो या असल जीवन, कोई क्या 'कहता' है, यह उसकी असल पहचान नहीं होती। असल पहचान इससे होती है कि वह क्या 'करता' है। शून्यता के गर्त में पहुंच चुकी वैचारिकी को जीवित रखने के लिए ‘कुछ भी’ लिख देना और कह देना तो बहुत आसान होता है, लेकिन करना बहुत मुश्किल। किसी वाममार्गी से मिलिए, उसके लिए बहुत आसान होता है यह कहना कि ब्राह्मणों ने दलितों का खूब शोषण किया, उनकी जमीनें छीन लीं, मेरे दादा-परदादा ने भी ली थीं, लेकिन इस प्रश्न पर मौन हो जाते हैं कि जब आपको पता है कि आपके दादा-परदादा ने किसी दलित-शोषित की जमीन पर कब्जा किया था, छल से उसकी जमीन ले ली थी, तो आपको जानकारी मिलने के बाद आपने वापस क्यों नहीं की? तब आप कह देते हैं कि मुझे क्या पता कि 70-80 साल पहले वो जमीन किसकी थी। अरे नहीं पता है तो उस जमीन को किसी दलित-शोषित को दान कर दीजिए, लेकिन वो नहीं कर पाएंगे।
इस पूरी वाममार्गी वैचारिकी के लिए अशालीन भाषा में एक शब्द है जिसका मैं प्रयोग नहीं करना चाहता। पाठक ख़ुद ही समझ जाएँगे।

यह विषय कूटनीति का है, उसमें संस्कार और संस्कृति को लाने की आवश्यकता ही क्या है। लेकिन मेरे लिए प्रसन्नता का विषय यह है कि कम से कम अपना विषय तर्कयुक्त सिद्ध करने के लिए नीरेन्द्र नागर जी ने उन पात्रों का उदाहरण दिया, जो उनकी वैचारिकी के ऐतिहासिक कोश में अस्तित्वहीन थे। देने को तो वह शक्तिमान और तमराज किलविष का उदाहरण भी दे सकते थे, लेकिन नहीं, उन्होंने राम-रावण और पांडव-कौरवों का जिक्र किया। नीरेन्द्र नागर जी के प्रश्नों का उत्तर देने में मुझे बहुत खुशी होगी, क्योंकि श्रीराम मेरा प्रिय विषय हैं, लेकिन उससे पहले एक अन्य विषय को समझना भी बहुत जरूरी है। मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी हूं। मनोविज्ञान की दृष्टि से बताता हूं कि नीरेन्द्र नागर जी ने शक्तिमान-तमराज की जगह श्रीराम-श्रीकृष्ण का उदाहरण क्यों दिया। दरअसल 2014 की भाजपा की 282 सीटें, 2019 की 303 सीटें जीतना और फिर 2024 में 240 सीटों पर आना उनकी पराजय नहीं है, उनकी विजय तो इसी बात में है कि उन्होंने वामपंथ की Anti Theist वैचारिकी को 10-15 सालों में Anti Modi बना दिया है। यह बात आपको सामान्य लग सकती है, लेकिन मनोवैज्ञानिक नजरिये से देखेंगे तो पता लगेगा कि जिस वैचारिकी की स्वीकार्यता लंबे समय तक पूरी दुनिया में रही, उसे BJP ने खत्म नहीं किया, बल्कि उसे बदल दिया, और यह बहुत बड़ी बात है।


अब आते हैं नीरेन्द्र नागर जी के प्रश्न पर। हम कहते हैं वसुधैव कुटुंबकम्। इसे स्वीकार भी करते हैं लेकिन अगर समय/काल/परिस्थिति के अनुसार कोई अपने व्यवहार में बदलाव को लेकर उचित निर्णय नहीं लेगा तो वह समाप्त हो जाएगा। उदाहरण से समझिए- उपनिवेशवाद के विरोध के नाम पर खड़ी हुई वामपंथी वैचारिकी इसीलिए समाप्त हो गई क्योंकि उन्होंने समयानुरूप सामाजिक परिवेश के अनुसार आवश्यकता को स्वीकार नहीं किया। और जिन वामपंथियों ने स्वीकार किया, उन्होंने अलग-अलग संस्थानों में नौकरी की, वहां अपनी वैचारिकी को स्थापित करने का प्रयास किया, अब इसे आप ‘दोगलापन’ कहिए या स्वार्थप्रेरित वैचारिक आत्महत्या, आपकी समझ है। मेरे हिसाब से तो यह उचित था। कोई वामपंथी अगर किसी कॉर्पोरेट मीडिया संस्थान में संपादक बन जाए, उसका कार्यालय जंगलों को काटकर बसाई गई किसी फिल्म सिटी में हो और उस संस्थान में उपनिवेशवाद के समर्थन वाले विज्ञापन चलते रहें, और उसी से उसका वेतन आए तो इसे आपके तर्क के हिसाब से तो गलत कहा जाएगा। फिर तो आप भी समझ सकते हैं कि कौन कितना गलत है।


वसुधैव कुटुंबकम् की वैचारिकी हमारे अपने मन और शरीर से शुरू होती है, फिर वह ब्रह्मांड तक जाती है। पहले यह वैचारिकी हमें अपने शरीर रूपी कुटुंब में स्थापित करनी होगी कि शरीर का प्रत्येक अंग बराबर है, प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है। फिर इसे अपने परिवार, मोहल्ले, समाज और देश में स्थापित करना होगा। अभी हम अपने शरीर और मन में तो स्थापित कर नहीं पाए, बात करेंगे दुनिया की। गालियां इस बात पर देते हैं कि वर्ण व्यवस्था के एक वर्ग को पैरों से निकला हुआ क्यों दिखाया, अरे जब सारे अंग बराबर हैं तो पैर कौन सी खराब चीज हो गए?


राम-रावण युद्ध हो या कौरव-पांडव युद्ध, समय और परिस्थिति के हिसाब से हमारे इतिहास में फैसले लिए गए हैं। त्रेतायुग में बड़ा भाई दुनिया के सबसे बड़े सिंहासन को ठोकर मारकर एक वल्कल पहनकर 14 वर्षों के लिए वन को चला जाता है, तो उसका सौतेला भाई बड़े भाई की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राज्य का संचालन करता है। राम और रावण का इतिहास स्वीकार कर रहे हैं और उसका उदाहरण दे रहे हैं तो इसे भी स्वीकार करिए कि वह इतिहास था और भविष्य में इतिहास का मूल्यांकन होता है। उस काल में दोनों पक्षों के अपने तर्क थे, लोगों ने अपनी समझ के अनुसार एक पक्ष चुना, एक पक्ष हारा और दूसरा जीता। हजारों सालों के बाद जब इतिहास का मूल्यांकन हुआ तो श्रीराम और पांडवों का पक्ष न्यायोचित लगा तो हम उस पक्ष के समर्थन में रहते हैं। जिसे रावण या कौरव का पक्ष न्यायोचित लगता है, वह उसके समर्थन में रहते हैं। इसमें कौन सी गलत बात है?

त्रेतायुग में परिस्थितियां अलग थीं, इसलिए वहां कूटनीति भी कम थी। द्वापर में परिस्थितियां बदलीं, युद्ध की नीतियां बदलीं तो कूटनीति भी बदल गई। आज कलियुग में परिस्थितियां और अलग हैं तो कूटनीति भी अलग स्तर की होनी चाहिए, जो कि है भी।

पड़ोसी मुल्क पूर्वी पाकिस्तान में जब उसके अपने ही लोग अत्याचार कर रहे थे, और वहां से जब शरणार्थी बंगाल में आने लगे और उससे हमारे मुल्क का हित प्रभावित होने लगा तो भारत की शेेरनी इंदिरा गांधी ने उनकी औकात दिखा दी थी, आज चाहे यूक्रेन हो या इजरायल, अगर कोई मदद मांगे और दूसरा प्रेम से बात समझने को तैयार ना हो तो निश्चित ही सत्ताधीशों को वही करना चाहिए जो मैडम इंदिरा ने किया था। लेकिन, उस परिस्थिति में भी तो वामपंथी यही कहेंगे कि युद्ध गलत है? है ना?


Sunday, 25 December 2016

क्या आप अपने 'सिकुड़ते' मन में 'संजय' को खोजेंगे?

दिल्ली में ठंड का कहर शुरू हो गया है। इस कड़कड़ाती ठंड में सुबह 6 बजे उठकर 7 बजे ऑफिस के लिए निकलना बेहद मुश्किल लगता है लेकिन ऑफिस तो जाना ही है। आपके साथ भी ऐसा ही होता होगा ना? हमारे पास ना कपड़ों की कमी है और ना सुविधाओं की लेकिन इस देश में, इस दिल्ली में लाखों की संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो इस रूह कंपा देने वाली ठंड में इसलिए जिंदा नहीं रह पाते क्योंकि उनके पास रहने का कोई ऐसा ठिकाना ही नहीं है जहां वे इस ठंड से लड़ सकें। रहने का ठिकाना छोड़िए, उनके पास तो पहनने के लिए कपड़े तक नहीं हैं। रात में सड़क के किनारे सो जाने वाले इन लोगों को तो यह तक नहीं पता होता कि अगली सुबह की रोशनी वह देख भी पाएंगे या नहीं।

हम क्या कर सकते हैं? अगर आपके मन में यह सवाल आया है तो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि आप बहुत कुछ कर सकते हैं। लगातार ठंड से मरने वालों के दर्द को महसूस करके उनके लिए कुछ करने वाले हमारे आपके बीच बहुत से लोग हैं। आज इस ब्लॉग के माध्यम से ऐसे ही एक लड़के के बारे में आपको बताने वाला हूं, जो पिछले 4 सालों से सड़क के किनारे रहने वालों को ठंड से लड़ने के ‘हथियार’ उपलब्ध करा रहा है। उम्मीद है कि एक बार दिल से आप भी उन गरीबों का दर्द महसूस करेंगे और इस लड़के से प्रेरणा लेकर ऐसा ही कुछ करेंगे।
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25 वर्षीय संजय तिवारी नाम का यह लड़का पिछले 4 सालों से लगातार ठंड के दिनों में स्वेटर कलेक्शन की एक मुहिम चलाता है। सोशल मीडिया के माध्यम से संजय लोगों से अपने पुराने ऊनी कपड़े मांगता है और रात में ठंड से ठिठुरते लोगों तक उन कपड़ों को पहुंचाता है। अस्पतालों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों के आसपास रात गुजारने वाले इन लोगों को पिछले साल यानी 2015 में संजय ने 15000 से अधिक गर्म कपड़े डोनेट किए।
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संजय की इस मुहिम में बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो दिल्ली से काफी दूर हैं और आर्थिक सहयोग के जरिए वे इस काम में मदद करते हैं। संजय उन पैसों  से कंबल इत्यादि खरीदकर लोगों तक पहुंचाते हैं। संजय ने 4 साल पहले जब इस मुहिम को शुरू किया था तो उनके साथ सिर्फ उनकी एक दोस्त थी लेकिन आज उनकी टीम बहुत बड़ी हो गई है। संजय का कहना है कि उनकी यह कोशिश ठंड में बने रिश्तों को गर्माहट देने के लिए है। संजय की इस मुहिम से अब दिल्ली के कई एनजीओ भी जुड़ चुके हैं। वह अनेकों स्थानों पर ठंड के दौरान कलेक्शन बॉक्स रखते हैं और लोगों से अपने पुराने कपड़ों को उसमें डालने का निवेदन करते हैं।

हाल ही में दिल्ली के शास्त्री नगर स्थित जेडी फूड कोर्ट के संचालक जतिन ने भी संजय की मदद के लिए अपने फूड कोर्ट के बाहर एक ड्रॉप बॉक्स रखा है। जतिन के अलावा बहुत से लोग हैं जो उनकी मुहिम में उनका साथ दे रहे हैं। हर शाम कनॉट प्लेस के आस-पास संजय आपको गर्म कपड़े कलेक्ट करते हुए मिल जाएंगे। आज बस आपसे इतना ही निवेदन है कि अगर आप दिल्ली में हैं तो संजय या उनके जैसी मुहिम चलाने वालों के साथ मिलकर कुछ अच्छा करें। संजय और उनकी मुहिम से जुड़ी डिटेल्स आपको यहां क्लिक करके मिल सकती हैं। और अगर आप दिल्ली के बाहर हैं तो ठंड में ठिठुरते लोगों के दर्द को महसूस करके अपने अंदर के ‘संजय’ को खोजिए। आपकी छोटी सी कोशिश किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकती है, किसी की जिंदगी बचा सकती है।
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क्या एक सफल महिला के पीछे 'पुरुष' नहीं होता?

‘प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे किसी ना किसी महिला का हाथ जरूर होता है।’ यह बात आपने भी अपने जीवन में सुनने के साथ-साथ महसूस की होगी। वह महिला आपकी मां, बहन, पत्नी, प्रेमिका या कोई अन्य भी हो सकती है। कोई भी पुरुष यह नहीं कह सकता कि उसने अपने जीवन में जितना भी अर्जित किया है, उसमें किसी महिला का योगदान नहीं है, क्योंकि उस पुरुष की उत्पत्ति का आधार ही महिला है। जिसने भी इस ‘कहावत’ को सर्वप्रथम कहा होगा उसके मन में सफल पुरुष की सफलता के पीछे जिस महिला का त्याग, बलिदान और साहस रहा होगा, उसे प्रणाम करने की कल्पना रही होगी। लेकिन क्या एक महिला की सफलता के पीछे पुरुष का कोई योगदान नहीं होता?

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अजीब सा सवाल है ना? यदि आप एक पुरुष हैं तो आप तत्काल कह देंगे, ‘बिल्कुल, महिला की सफलता के पीछे पुरुष का ही हाथ होता है।’ लेकिन क्या महिलाएं भी ऐसा ही सोचती हैं? क्या महिलाएं भी ‘हां’ में इस प्रश्न का तत्कालिक उत्तर दे सकती हैं? मुझे नहीं लगता…मेरी सोच ऐसी क्यों बनी, उसका कारण मेरा अपना एक अनुभव है।

कुछ दिन पहले ‘नव चेतना’ नामक एक वर्कशॉप को अटेंड करने का मौका मिला। उस वर्कशॉप के ट्रेनर ने स्टिकी नोट्स पर कुछ लड़कों को यह लिखने को कहा कि लड़कियां कैसी होती हैं और लड़कियों से लिखने को कहा कि वे लिखें कि लड़के कैसे होते हैं। लड़कों में से लगभग सभी ने लिखा कि लड़कियां भावुक होती हैं, काफी मजबूत होती हैं, सहनशील होती हैं… इत्यादि… बात भी सही है, एक लड़की/महिला के बराबर संवेदनाएं एक ‘सामान्य’ पुरुष में नहीं हो सकतीं। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जन्म के बाद जो महिला सबसे पहले मेरे संपर्क में आई, वह मेरी मां थी। एक महिला के बारे में सोचने पर सबसे पहले मेरे मन में मेरी मां का चेहरा आता है। मेरे सिर पर जब जरा सी चोट लगती थी तो मैंने उनकी आंखों में आंसू देखे हैं, पापा से उन्हें मेरी अपनी गलतियों के लिए लड़ते देखा है। आज अधिकतर पुरुषों के मन में एक महिला के बारे में सोचने पर पहला चित्र अपनी मां का ही आता होगा।

लेकिन इसके विपरीत उसी वर्कशॉप में अधिकतर महिलाओं ने पुरुषों के बारे में जो लिखा वह वास्तव में आश्चर्यचकित करने वाला था। किसी ने पुरुषों को अहंकारी बताया, तो किसी ने कहा कि पुरुष भरोसे के लायक नहीं होते। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो मुझे लगता है कि किसी महिला का पिता तो उसके लिए अहंकारी नहीं हो सकता, एक पिता तो उसके भरोसे को नहीं तोड़ सकता, तो फिर ऐसे विचार क्यों?

ये विचार अनायास ही नहीं बने। महिलाओं ने अपने बॉयफ्रेंड, पति या अन्य किसी में जिस पुरुष को देखा है, उसी के आधार पर अपने मानसपटल पर पुरुष के व्यवहार की एक छवि बना ली। हो सकता है कि किसी पुरुष ने उस महिला का विश्वास तोड़ा हो, हो सकता है किसी ने उसका सम्मान न किया हो लेकिन सिर्फ एक व्यक्ति विशेष के व्यवहार के कारण संपूर्ण पुरुष जाति के व्यवहार को वैसा ही मान लेना क्या ठीक होगा?

आज कहा जाता है कि समाज बदल रहा है, अब महिलाएं घर की चहारदीवारी लांघकर हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं, पर इसके पीछे इस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है कि इस परिवेश के बदलाव का एक मुख्य कारण पुरुषों की सोच में परिवर्तन भी है। वैदिक काल के बाद से भारत के लोगों ने जिस तरह से स्त्री को लेकर अपनी सोच को अधोगामी बनाया, उस सोच के दायरे से बाहर निकल कर एक सकारात्मक परिवर्तन यदि हमें दिखाई दे रहा है तो उसके पीछे पुरुषों की मानसिकता में बदलाव और महिलाओं का साहस है। पुरुषों की मानसिकता नहीं बदली होती तो महिलाओं का घर से बाहर निकलना, अपनी व्यक्तिगत पहचान को समाज में प्रतिस्थापित करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होता।

हमें इस बात को मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि समाज के परंपरागत रिवाजों को तोड़कर पुरुष ने भी स्त्री को इस बात का अहसास कराया कि जो हम कर सकते हैं, वह तुम भी कर सकती हो। निश्चित रूप से आज भी बहुत से लोग इस परिवर्तन को स्वीकार करने की मानसिकता नहीं रखते लेकिन ऐसे लोगों में सिर्फ पुरुष नहीं आते, बहुत सी महिलाएं भी हैं जो आज भी कहती हैं कि लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। लेकिन उन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। क्योंकि अगर उनको कुछ कह दिया तो ‘नारीवादी’ होने का तमगा छिन जाएगा। महिलाओं के प्रति पुरुषों के समर्पण को अनदेखा किया जाएगा, क्योंकि अगर पुरुषों के लिए कुछ अच्छा कह दिया तो ‘पुरुषवादी’ होने का ठप्पा लग जाएगा।

नारीवादी होना, क्या भेदभाव को बढ़ावा देना नहीं है? यदि वास्तव में हम लिंगभेद को नहीं मानते तो ‘नारीवादी’ और ‘पुरुषवादी’ जैसे शब्दों को क्यों बड़े गर्व के साथ अपने चरित्र का बखान करने में उपयोग करते हैं? अगर हम यह कहते हैं कि ‘प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे किसी ना किसी महिला का हाथ जरूर होता है’ तो आखिर क्यों हम यह भी नहीं कह सकते कि ‘प्रत्येक सफल महिला के पीछे भी किसी ना किसी पुरुष का हाथ जरूर होता है’? एक बार इन सवालों के जवाब सोचने का प्रयास जरूर करिएगा…

अतहर और टीना डाबी के प्यार से आपके पेट में दर्द क्यों?

आपको क्या लगता है कि आपके भगवान या खुदा ने धर्म (पूजा पद्धतियां) या जातियां बनाई हैं, वो भी सिर्फ इसलिए ताकि लोगों के बीच संबन्ध न बन सकें? यानी अगर आप हिंदू हैं और आपने मुस्लिम से शादी कर ली तो आपका भगवान आपसे नाराज हो जाएगा, मुस्लिम हैं और हिंदू से निकाह कर लिया तो खुदा नाराज हो जाएगा, ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर यदि कायस्थ परिवार में शादी की तो आपका ईश्वर आपको ‘भयानक’ कष्ट देगा? आप सोच रहे होंगे कि मैं आज ये कौन सी बातें लेकर बैठ गया। चलिए बताता हूं….

मेरा एक पत्रकार मित्र है। कुछ महीनों पहले उससे काम के दौरान गलतियां हुईं। कभी कोई समाचार लिखते समय कोई भाषागत गलती हो जाती तो कभी संस्थान के ऑफिशल अकाउंट से कुछ गलत ट्वीट हो जाता। चूंकि उसे मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं इसलिए पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूं कि उसकी योग्यता, क्षमता और प्रतिभा में कोई कमी नहीं है। फिर ऐसी गलतियां उससे क्यों हो जाती हैं?
कुछ सप्ताह पहले अपने उस मित्र के साथ खाना खाने बैठा था तो उसका चेहरा उतरा-उतरा सा लगा। सोचा बात करूं। मैंने उससे पूछा कि आखिर उसकी समस्या क्या है? क्या उसे कोई परेशानी है? उसने पहले तो बात टालने की कोशिश की लेकिन फिर भावुक होकर उसने बताया कि वह एक लड़की से प्यार करता है लेकिन जातिगत विभेद के कारण वे दोनों कभी एक नहीं हो सकते। मैंने कहा कि परिवार से बात करो तो उसने कहा कि उन दोनों के परिवार कभी इस रिश्ते को मान्यता नहीं देंगे। और इसी कारण से उसका किसी काम में मन नहीं लगता।

जब मैं स्नातक की पढ़ाई कर रहा था उस समय का भी एक किस्सा ध्यान में आता है। मेरी एक जूनियर जो कि ब्राह्मण परिवार की थी, उसे एक क्षत्रिय लड़के से ‘प्यार’ था। घरवालों ने इस रिश्ते को मंजूरी नहीं दी तो वह लड़की भागकर लड़के के घर चली गई। लड़के के घरवालों ने उसे स्वीकार कर लिया लेकिन लड़की के घरवालों ने हमेशा के लिए उससे रिश्ता खत्म कर दिया। लगभग 1 साल के बाद उन दोनों के रिश्ते में खटास आ गई और वह रिश्ता खत्म हो गया। लड़की फिर से अपने घर आ गई और लड़की के प्रति प्यार के चलते परिवार को उसे स्वीकार करना पड़ा।
इन दो उदाहरणों को पढ़कर आप किस निष्कर्ष पर पहुंचे? पता नहीं आप क्या सोच रहे हैं लेकिन क्या एक 18 साल की लड़की और लगभग इसी उम्र का लड़का अपने जीवन और भविष्य का निर्णय ले सकता है? क्या उसका मस्तिष्क इतना विकसित हो चुका है कि वह ‘प्यार’ और ‘आकर्षण’ के अंतर को समझ सके?या एक लड़का जिसकी उम्र 26 साल है, जो पिछले 3-4 साल से पत्रकारिता कर रहा है, समाज के बीच रह रहा है, आप उसकी भावनाओं को भी आकर्षण मान लेंगे? किसी का मस्तिष्क पूर्ण रूप से विकसित हो गया है, इसकी प्रमाणिकता उसकी उम्र तय नहीं करती। बल्कि उसकी सामाजिक स्थिति बताती है कि वह किसी रिश्ते और उस रिश्ते के भविष्य के प्रति कितना जागरुक है।

यह तो एक पक्ष था। दूसरा पक्ष है जाति और धर्म का। इस विषय पर बात करने से पहले एक सवाल है कि राम तो क्षत्रिय थे, लेकिन माता सीता की जाति क्या थी? मैं यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं कि बात उन परंपराओं की हो रही है जो लंबे समय से चली आ रही हैं तो सवाल भी उसी पौराणिक इतिहास से उठाना चाहिए। वाल्मीकि रामायण के मुताबिक, मिथिला के राजा जनक को खेत जोतते समय एक बच्ची मिली, जनक ने उन्हें  धरती माता की पुत्री मानकर पाला-पोसा और बाद में उनका विवाह राम के साथ हुआ।
कहने का अर्थ यह है कि सीता, जनक की पुत्री नहीं थीं, उनके कुल इत्यादि का पता नहीं था, उनके जन्म का समय नहीं पता था कि कुंडली इत्यादि का मिलान किया जाए और राम या उनके परिवार ने बिना कुल,जाति इत्यादि की जांच किए बिना उन्हें अपनाया और आज हम माता सीता की अनुपस्थिति में श्रीराम के चित्र की कल्पना नहीं कर सकते।

जिन्हें प्रत्येक जाति के लोग आराध्य मानते हैं, जब उन्होंने अपने विवाह में जातिगत भेद को स्थान नहीं दिया तो फिर हम एक सामान्य मनुष्य होकर, उन्हीं राम के वंशज होकर कैसे जातिभेद को अपने जीवन में स्थान दे सकते हैं? जाति और धर्म हमने बनाए हैं, लेकिन अगर हमारी ही बनाई किसी परंपरा से समाज टूट रहा है तो समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए हमें उन परंपराओं को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर देना चाहिए।
साल 2006 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस राकेश शर्मा ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को ‘लव जिहाद’ की जांच के आदेश दिए तो राष्ट्रीय मीडिया के यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। ‘लव जिहाद’ के ये आरोप यूपी से शुरू होकर केरल और फिर कर्नाटक पहुंच गए। ज्यादातर मामलों में कट्टर मुस्लिम युवकों पर आरोप लगे कि वे अपना नाम बदलकर हिंदू लड़कियों से नजदीकियां बढ़ाते हैं। इसके बाद झूठे प्यार का नाटक करके शादी कर उनका जबरन धर्म परिवर्तन करा देते हैं।

लेकिन ये कौन लोग हैं जो प्रेम जैसी शाश्वत अनुभूति की आड़ में किसी की धार्मिक भावनाओं के साथ खेलते हैं? इस सवाल का कोई पुख्ता जवाब आज तक नहीं मिल पाया। मैं इस बहस में नहीं जाना चाहता कि ‘लव जिहाद’ जैसा कुछ होता भी है या नहीं लेकिन क्या देश की सबसे कठिन परीक्षा कही जाने वाली यूपीएससी की परीक्षा के 2 टॉपर्स यदि धार्मिक विभेद को मिटाकर समाज को एक संदेश देना चाहें तो क्या इसे ‘लव जिहाद’ का नाम देना ठीक होगा?

क्या दो लोग अपनी मर्जी से शादी के बंधन में नहीं बंध सकते? और वे सामान्य लोग नहीं हैं, वे दोनों अपनी बुद्धि, योग्यता और प्रतिभा के बल पर इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि उन्हें ‘धर्म’ का झंडा लेकर चलने वालों से ‘भारत’ की लाख गुना ज्यादा समझ है।

अतहर आमिर खान जब ‘युवान’ के मंच पर स्वामी विवेकानंद की तस्वीर के नीचे खड़े होकर युवाओं के सामने सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ ‘भारत भक्ति’ के प्रेरणापुंज के रूप में खड़ा होता है तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन जब वह एक हिंदू लड़की से शादी की बात करता है तो कुछ लोगों के पेट में दर्द क्यों होता है?


यह दर्द सिर्फ इसलिए है क्योंकि उनको धर्म और मजहब के बीच की खाईं को और गहरा करके अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं। अगर प्रेम की प्रतिमूर्ति श्रीकृष्ण के देश में कोई यह कहता है कि दो अलग-अलग पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग विवाह नहीं कर सकते, तो एक बात तो तय है कि जिस ‘भगवान’ की सेवा के नाम पर वे यह सब कर रहे हैं, उसे मैं ‘भगवान’ नहीं मान सकता क्योंकि मेरा भगवान कभी ‘जातिवादी’ और ‘सांप्रदायिक’ नहीं हो सकता।

सानिया के लिबास पर सवाल, एक शायर का घटिया ख़याल

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टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा ने कुछ साल पहले पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी की। कैसा लगा था आपको? एक भारतीय के रूप में अपनी सोच को एक सीमित दायरे में रखकर यदि आप सोचेंगे तो आपको यही लगेगा कि नहीं! सानिया मिर्जा को ऐसा नहीं करना चाहिए था। अगर आप भी ऐसा ही सोच रहे हैं तो मैं आपसे सहमति नहीं रखता। क्योंकि मैं मानता हूं कि प्यार को देश की सीमाओं में नहीं बंधना चाहिए और हम किसी के प्यार को सीमाओं में बांधने वाले कोई नहीं होते। हालांकि जब सानिया की शादी की खबर आई थी तो मुझे भी ‘गुस्सा’ आया था। क्योंकि मुझे लगता था कि सानिया को ‘सानिया’ भारत ने बनाया है, भारत के लोगों की मोहब्बत ने उन्हें पहचान दी और वह शादी के लिए ‘दुश्मन’ देश के साथ चली गईं। मुझे लगता था कि जिसका शौहर पाकिस्तानी हो, वह मन से भारतीय कैसे रह सकती है? मैं सोचता था कि अब सानिया भारत के लिए नहीं खेलेंगी… लेकिन समय ने मेरी सोच को गलत साबित किया। सानिया उसी शिद्दत के साथ भारत के लिए खेलती रहीं। विंबल्डन से लेकर ओलिंपिक तक सानिया भारत के प्रतिनिधि के तौर पर खेलीं और विश्व स्तर पर भारत के मस्तक को ऊंचा किया। ना सिर्फ उन्होंने भारत के मस्तक को ऊंचा किया बल्कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की मूल अवधारणा को भी प्रतिस्थापित किया। 2015 में जब देश के सिलेब्रिटीज भारतीय सेना के साथ खड़े होकर देश का मनोबल बढ़ा रहे थे तो उस पाकिस्तानी बहू ने भी अपना राष्ट्रीय दायित्व निभाते हुए भारतीय सेना के त्याग के लिए धन्यवाद दिया।


saniaआप सोच रहे होंगे कि मैं ये सारी बातें क्यों कह रहा हूं? चलिए, एक बार कल्पना करिए कि किसी भारतीय पुरुष सिलेब्रिटी ने किसी पाकिस्तानी महिला सिलेब्रिटी से शादी/निकाह किया होता और वह महिला किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पाकिस्तान का नेतृत्व करती तो? तो, भारत के फर्जी राष्ट्रवादी उन दोनों को जीने नहीं देते। कल्पना करिए वही महिला यदि पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर पाकिस्तानी सेना के समर्थन में ट्वीट करती तो? तो क्या होता मुझे बताने की जरूरत नहीं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि पाकिस्तान में रहने वाले लोग सानिया मिर्जा को लेकर क्या-क्या कहते होंगे? सब छोड़िए! एक बार उस पाकिस्तानी शौहर के बारे में सोचिए जो खुलेआम कहता है कि उसकी भारतीय पत्नी पाकिस्तान के खिलाफ भारत का समर्थन करेगी। यहां क्लिक कर पढ़ें खबर।

चलिए अब मूल बात पर आते हैं। ऐसी महिला के बारे में एक व्यक्ति कहता है कि सानिया मिर्जा उसकी मां को इसलिए पसंद नहीं क्योंकि उसके सिर पर दुपट्टा नहीं है। और वह व्यक्ति अपनी मां की इस सोच को बहुत गर्व के साथ बताता है। क्यों कहता है वह ऐसा? क्योंकि इस्लाम पर्दाप्रथा का हिमायती है।

क्या कहेंगे आप इस पर? मुझे नहीं पता आप क्या कहेंगे लेकिन मेरा मानना है कि ऐसे लोग ‘देशभक्ति’ के नाम पर एक महिला की स्वतंत्रता का हनन कर रहे हैं। खास बात यह है कि ऐसी बातें करने वाले इमरान प्रतापगढ़ी के जेएनयू और भारत के बड़े-बड़े वामपंथियों से बहुत ही नजदीकी संबंध हैं। लेकिन वे लोग इमरान को अपना ‘नारीवादी’ पाठ क्यों नहीं पढ़ाते हैं, यह सोच का विषय है। यह वही इमरान हैं जिन्हें अपनी ऐसी ही बातों को शायरी के रूप में पिरोने के कारण उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा सम्मान ‘यश भारती’ दिया जाता है। उसे 11 लाख रुपए और प्रतिमाह 50,000 रुपये की पेंशन प्रदेश सरकार उसकी बातों के लिए देती है।

सिर्फ इतना ही नहीं, इमरान प्रतापगढ़ी नामक यह तथाकथित शायर उस किशन बाबूराव (अन्ना) हजारे पर भी सवाल उठाते हैं। उस अन्ना हजारे पर जिसने 60 सालों से सोए हुए देश को भ्रष्टाचार के खिलाफ जगाया, जिसने देश को लड़ना सिखाया। इमरान अन्ना के अनशन को बीमारी और नाटक बताते हैं।

उनकी समस्या यह है कि जिस संजीव भट्ट नाम के एक पूर्व आईपीएस अफसर के बारे में गुजरात में सन 2002 में हुए दंगों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाया गया विशेष जांच दल (एसआईटी) कहता है कि उन्होंने गुजरात सरकार को बदनाम करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए, जिस संजीव भट्ट को सुप्रीम कोर्ट फटकार लगाते हुए कहता है वह पाक-साफ नहीं है, उसे जेल भेजे जाने पर अन्ना हजारे क्यों कुछ नहीं बोलते? क्या गजब का तर्क है इमरान साहब का?

बड़ी बात यह नहीं है कि इमरान यह सब बोलते हैं। वह तो नादान हैं, अभी विद्यार्थी हैं लेकिन जब अन्ना हजारे को नौटंकीबाज बताने वाले व्यक्ति को कुमार विश्वास जैसा व्यक्ति अपना भाई बताते हुए उसकी बातों का समर्थन करता है, तो सवाल कुमार विश्वास की सोच पर उठना लाजमी है, जब ऐसा वैचारिक विद्वेष फैलाने वाले व्यक्ति को साहित्य के नाम पर हमारे-आपके द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे से आजीवन पेंशन दी जाती है तो सवाल अखिलेश सरकार पर उठाना एक भारतीय होने के नाते मेरी जिम्मेदारी बनती है। लेकिन मेरे सवालों का कोई अर्थ नहीं क्योंकि वोटबैंक के लिए तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और कुमार विश्वास को यह सब करना ही पड़ेगा, नहीं?

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने जैसे नारे लगे थे। क्या हुआ फिर? मीडिया चीखा, ‘राष्ट्रवादी’ चिल्लाए, पुलिस ने कुछ लेफ्ट विंग के छात्रनेताओं को उठाया, उनको कोर्ट में पेश किया और फिर कोर्ट ने उन्हें सशर्त अंतरिम जमानत दे दी। बस कहानी खत्म….

लगभग 9 महीने बीत गए, लेकिन आज तक भारत विरोधी नारे लगाने वालों को सजा नहीं मिली। अरे सजा छोड़िए साहब, हमारी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां उन लोगों की पहचान तक नहीं कर पाईं जिन्होंने देश को गालियां दी थीं। हम भी खामोश हो गए। हमें तो भूलने की बीमारी है। हम भूल गए कि हमारी मां को गालियां दी गई थीं।

भारत, एक ऐसा देश जहां के एक विश्वविद्यालय का छात्र गुमशुदा हो जाता है तो उस विश्वविद्यालय के वीसी तक को बंधक बना लिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां विश्व के सबसे बड़े गैर-राजनीतिक संगठन के कार्यकर्ताओं की हत्या पर नेता से अभिनेता तक, सभी मौन हो जाते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां गोरक्षक बनकर लोग अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी निकालते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां एक आतंकी के जनाजे में हजारों की संख्या में लोग मातम मनाते हुए दिखते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां एक अभिनेता सीमा पर तैनात सैनिक की शहादत पर ‘बिगड़े बोल’ बोलने से भी नहीं हिचकता, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां एक आतंकी को ‘शहीद’ कहकर सम्मान दिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत एक ऐसा देश जहां सिर्फ तीन बार ‘तलाक-तलाक-तलाक’ बोलकर एक महिला के सपनों को एक झटके में चकनाचूर कर दिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते? (क्लिक कर पढ़ें: महिलाओं के शोषण का नायाब तरीका है तीन तलाक)

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग नवरात्र में तो भोज के लिए कन्याएं खोजते हैं, लेकिन पैदा होने से पहले ही अपनी बेटी को मार देते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?
विश्व गौरव

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग हलाला और मुताह जैसी कुप्रथाओं का खुले आम समर्थन करते हुए एक धर्मनिरपेक्ष देश में मजहबी कानून का पक्ष लेते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग बात तो ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ की करते हैं, लेकिन महिला को दहेज के लालच में जिंदा जला देते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग राष्ट्र की वंदना की पर्याय सूक्ति, वंदे मातरम को एक संगठन और धर्म विशेष से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि उनके गले पर चाकू भी रख दी जाएगी तब भी वंदे मातरम नहीं बोलेंगे, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग राजनीतिक विरोध करते-करते अपने स्तर को राष्ट्र विरोध तक ले आते हैं, उन्हें विदेशों में भी अपने प्रधानमंत्री की बुराई करने से कोई परहेज नहीं होता, वे घर के मतभेदों को मनभेद के रूप में विश्वपटल पर प्रदर्शित करते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग सरकार की अच्छी योजनाओं के साथ इसलिए नहीं खड़े होते क्योंकि वे विपक्षी पार्टी से आते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां ‘सवर्ण’ होते हुए भी दलितों को सम्मान दिलाने का प्रथम प्रयास करने वाले विनायक दामोदर सावरकर को गद्दार और सांप्रदायिक करार दिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां सनातन धर्म की सर्वोच्च पदवी पर विराजमान, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती कहते हैं कि महिलाओं द्वारा शनि शिंगणापुर में पूजा किए जाने से बलात्कार बढ़ेंगे, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के तथाकथित नारीवादियों ने महिला आजादी का पैमाना उनके कम कपड़ों और सिगरेट-शराब पीने को बना दिया है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

असहिष्णुता क्या है?  कोई भारत को गाली दे और उसे रोका जाए, असहिष्णुता यह नहीं है। असहिष्णुता है अपने कर्तव्य और अधिकार के मध्य सामंजस्य स्थापित न करना। लेकिन इस असहिष्णुता के होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि मैं अपने देश को छोड़कर पाकिस्तान चला जाऊं या अगर मैं यह कहूं कि भारत में असहिष्णुता है तो कोई फर्जी राष्ट्रवादी मुझे देशद्रोही करार करके मेरे लिए पाकिस्तान का टिकट कटाकर ले आए। वास्तविक पीड़ा तो इस बात की है कि इस तरह की ‘असहिष्णुताओं’ पर ना ही कोई अवॉर्ड वापसी अभियान चलता है और ना कोई पत्रकार अपने चैनल की स्क्रीन काली करता है….

तीन तलाक: महिलाओं के शोषण का नायाब तरीका

जनवरी 2016 में एक मुस्लिम महिला को स्पीड पोस्ट से एक लेटर मिलता है, जिसमें उसके पति ने कथित तौर पर इस्लामी कानून का प्रयोग करके तलाक दे दिया होता है। जयपुर की रहने वाली आफरीन नामक उस महिला के दर्द को क्या आप महसूस कर सकते हैं? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि निकाह से पहले आफरीन ने अपनी जिंदगी को लेकर कैसे-कैसे सपने देखे होंगे? उत्तराखंड की निवासी शायरा बानो ‘तलाक’ से सताई हुईं एक अन्य महिला हैं। शायरा का कहना है कि उनका पति उनके साथ मारपीट करता था और बाद में उसने शायरा को तलाक दे दिया। शायरा के दो बच्चे हैं लेकिन वे उसके पति के साथ रहते हैं और शायरा का पति बच्चों से उनकी मां को बात तक नहीं करने देता। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक मां, अपने बच्चों से दूरी कैसे बर्दाश्त करती होगी।

विश्व गौरव
देश में इस समय ट्रिपल तलाक को लेकर बहस छिड़ी है। इस बहस में एक पक्ष ऐसा भी है जो कहता है कि अगर कोई मर्द तीन बार तलाक यानी ‘तलाक-तलाक-तलाक’ कह दे तो उसकी उस महिला के प्रति सारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है जो अपने परिवार को छोड़कर अपनी पूरी जिंदगी उस मर्द के साथ बिताने का सपना देखकर आई है। यह सही है या गलत इस बहस में पड़ने से पहले उन परंपराओं पर बात कर लेते हैं जो कई सौ सालों से उस मजहब का आधार बनी हुई हैं जो महिलाओं को सर्वाधिक अधिकार देने का दावा करता है।

निकाह- इस्लाम में निकाल को एक तरह का ‘अग्रीमेंट’ जैसा माना गया है। निकाल के दौरान मेहर की एक रकम तय की जाती है, जिसे किसी परिस्थिति में विवाह विच्छेद यानी तलाक के बाद पुरुष द्वारा महिला को अदा करना होता है। लेकिन सवाल यह है कि एक लड़की जो अपने परिवार, संबंध, रिश्ते, सपने और अपने भविष्य को छोड़कर अपनी जिंदगी को जिस इंसान के हवाले कर देती है, तलाक के बाद उसे कितना भी पैसा मिल जाए, क्या वह उस पैसे से खुश रह सकती है? क्या भावनाओं और अधूरे सपनों की एक ‘रकम’ तय कर देना न्यायसंगत है? तर्क चाहे कुछ भी हों लेकिन इस अग्रीमेंट जैसी परंपरा को सही नहीं ठहराया जा सकता।

तीन तलाक- अगर पत्नी-पत्नी के रिश्ते सामान्य नहीं हैं तो एक खास तरीके से तीन बार में एक निश्चित समय अंतराल पर पति, अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। लेकिन आज जो परंपरा चल रही है वह वास्तविक इस्लामिक कानून से एकदम भिन्न है। आज तीन बार एक ही समय पर तलाक कहकर निकाह को खत्म कर दिया जाता है। इस तरह के तलाक में खास बात यह है कि कुछ मुल्ले-मौलवी आज 21वीं सदी में भी इसे जायज ठहरा रहे हैं। उनका तर्क है कि इस्लाम में इस तरह से दिया गया तलाक गलत जरूर माना गया है लेकिन ‘तलाक-तलाक-तलाक’ बोल दिया तो तलाक माना तो जाएगा ही। यानी अगर किसी को अपनी पत्नी पर गुस्सा आ जाए तो वह दो गवाहों के सामने अपनी पत्नी को तीन बार ‘तलाक’ बोलकर रिश्ते को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर सकता है। सवाल यह है कि जब निकाह के वक्त शौहर और बीवी दोनों की रजामंदी की जरूरत होती है तो फिर तलाक के वक्त क्यों नहीं?

हलाला- तलाक के बाद अगर पूर्व पति को अपनी गलती का अहसास हो और वह अपनी पत्नी से दोबारा निकाह करना चाहे तो उसकी पत्नी को पहले किसी और मर्द से निकाह करना होगा, उस मर्द के साथ शारीरिक संबन्ध बनाने होंगे, क्योंकि बिना शारीरिक संबंध के तो निकाह पूरा ही नहीं माना जाता। और फिर उस नए शौहर से तलाक लेकर या उसकी मौत हो जाने पर वह महिला पुराने शौहर से निकाह कर सकती है। हालांकि कुछ मौलवियों का तर्क है कि ये सब ‘सुनियोजित’ नहीं होना चाहिए और ‘हलाला’ कानून बनाकर इस्लाम, मर्दों को एक तरह से सजा देता है। यानी कि अगर मर्द ने कोई गलती की, उसे कुछ समय के बाद अपनी गलती का एहसास हो गया, उसकी पूर्व पत्नी गलती की माफी देकर फिर से उसके साथ रहना भी चाहे तो उसे पहले अपने शरीर को किसी और मर्द के हवाले करना पड़ेगा और यह पूर्व पति के लिए सजा होगी। एक महिला को किसी और के साथ बिना मर्जी के मजबूरी में शारीरिक संबंध बनाए और इसे मर्द को दी गई सजा माना जाए, कैसे? एक बार तलाक हो गया और फिर मियां-बीवी चाहें तो भी उनके पास एक प्रताड़ना भरी प्रक्रिया से गुजरने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

मुताह- यह एक तरह का निकाह होता है जिसमें पहले से ही समय तय कर लिया जाता है कि मियां-बीबी कितने समय तक साथ रहेंगे। इसके लिए बाकायदा औरत को पैसा दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को यदि इस्लामी कानून आधारित वेश्यावृत्ति कहा जाए तो गलत नहीं होगा। हाल ही में कई ऐसे मामले सामने आए हैं कि खाड़ी देशों से महीने-दो महीने के लिए मर्द वापस जब आते हैं तो वक्त बिताने के लिए, अपने शरीर की भूख मिटाने के लिए उन्हें कोई औरत चाहिए होती है और वे जिम्मेदारी भी नहीं निभाना चाहते। इसलिए वे मुताह निकाह करते हैं। जितने दिन का करार तय हो जाता है, उतने दिन के बाद सब कुछ खुद-ब-खुद खत्म हो जाता है।

खुला- यह भी एक तरह का तलाक होता है जो औरत की ओर से मर्द को दिया जाता है लेकिन यह ‘तीन तलाक’ के जैसा नहीं होता। औरत अगर मर्द से खुला मांगती है तो अंतत: देता मर्द ही है। अगर वह नहीं चाहे तो उसे मनाना पड़ता है। किसी काजी, किसी बुजुर्ग या दोस्त से दबाव डलवाना पड़ता है या कुछ संपत्ति वगैरा देकर मनाना पड़ता है। औरत को बच्चों से मिलने का अधिकार छोड़ना पड़ता है या मेहर की रकम छोड़नी पड़ती है। इस तरह कुछ चीजें छोड़कर महिला को तलाक मिलता है। इतना सब होने के बावजूद अंतिम घोषणा पुरुष को ही करनी पड़ती है। महिला सब कुछ दे दे, तब भी ‘तलाक-तलाक-तलाक’ की घोषणा पुरुष ही करता है। गजब की समानता है यार।

हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां विविध पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग निवास करते हैं। जहां अंतिम नागरिक तक को अपने धर्म के मुताबिक जीवन जीने का अधिकार है लेकिन क्या मानवता से बड़ा कोई धर्म है, क्या इंसानियत से बड़ा कोई धर्म है? जो अधिकार हिंदू औरत को मिलें वह मुसलमान औरत को क्यों नहीं? जो अधिकार एक पुरुष को मिलें वह एक औरत को क्यों नहीं? आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस इस्लाम की दुहाई देकर ‘तीन तलाक’ के नियम में परिवर्तन न करने की बात कही जा रही है, उसी इस्लाम को मानने वाले कई इस्लामिक देशों में इस तरह के कानूनों में बदलाव किया जा चुका है।
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पाकिस्तान में 1961 के अध्यादेश के अनुसार, आर्बिट्रेशन काउंसिल की अनुमति के बिना कोई भी पुरुष दूसरा निकाह नहीं कर सकता। अफगानिस्तान में एक साथ तीन बार तलाक कहकर तलाक लेना गैरकानूनी है। मोरक्को में पहली पत्नी की रज़ामंदी और जज की इजाजत लिए बिना दूसरा निकाह नहीं हो सकता। ट्यूनीशिया में तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। तुर्की में एक से अधिक निकाह करने पर 2 साल की सज़ा दी जाती है। इंडोनेशिया में दूसरे निकाह और तलाक के लिए धार्मिक अदालत से इजाज़त लेनी होती है और अल्जीरिया में पुरुष द्वारा तलाक देने के एकतरफा अधिकार को खत्म किया जा चुका है। वहां तलाक के मामले कोर्ट के ज़रिए ही निपटाए जाते हैं। पाकिस्तान में 1961 से, बांग्लादेश में 1971 से, मिस्र में 1929 से, सूडान में 1935 से और सीरिया में 1953 से तीन तलाक को बैन किया जा चुका है।

तलाक एक ऐसा शब्द है जो ना सिर्फ हंसते-मुस्कुराते परिवार को तोड़ देता है बल्कि रिश्तों के सौन्दर्य को भी समाप्त कर देता है। भारत में रुढ़िवादी मुसलमानों के एक वर्ग की ‘जिद’ के कारण तीन तलाक का जहर पीकर भी खामोश रहने वाली हजारों महिलाएं पड़ी हैं। कोई व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो, उसके संवैधानिक अधिकार बराबर हैं। एक महिला के सम्मान और उसकी गरिमा के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। हमारे और आपके जन्म के साथ-साथ इस सृष्टि के संचालन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान यदि किसी का है तो वह औरत का है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसके अधिकारों के लिए आवाज उठाएं।

क्रिसमस को भारतीय क्यों नहीं बना सकते?

आज क्रिसमस है। मैं पिछले 3-4 दिनों से लगातार सोशल मीडिया पर देख रहा हूं कि समाज का एक वर्ग कह रहा है कि क्रिसमस विदेशी त्योहार है, इसे मत मनाइए। कोई कह रहा है, ‘क्रिसमस अंग्रेजों का त्योहार है, हम अब उनके गुलाम नहीं हैं, क्रिसमस की बधाई ना दें।’ कोई कह रहा है कि हिंदू हैं, तो ईसाइयों का त्योहार क्यों   मनाएं? अजीब-अजीब से सवाल और सुझाव हैं, लेकिन इस सबके बीच मैं बस इतना जानता हूं कि भारतीय संस्कृति की आत्मा का आधार यहां की उत्सवधर्मिता है। हमारी संस्कृति की खासियत यह है कि लगभग हर दिन हमारे यहां कोई ना कोई त्योहार होता ही है। christmasऐसे में अगर हम भारत के अंदर ही रहने वाले एक वर्ग के प्रमुख त्योहार को स्वीकार कर लेंगे तो क्या बिगड़ जाएगा? इसके अलावा एक सवाल यह भी है कि क्या जिस सभ्यता से यह त्योहार आया है, हमें उसी रूप में इसे स्वीकार करना चाहिए? मेरा मानना है ‘नहीं’…
हम पश्चिम से आए त्योहार में भारतीयता  को क्यों नहीं घोल सकते? भारतीय परंपरा के जितने भी पर्व और त्योहार हैं उन सभी का कोई ना कोई वैज्ञानिक अथवा पर्यावरणीय पक्ष जरूर होता है। हम होली मनाते हैं। शरद ऋतु की समाप्ति और बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही पर्यावरण और शरीर में बैक्टीरिया की वृद्धि को बढ़ जाती है, लेकिन जब होलिका जलाई जाती है तो उससे करीब 145 फ़ारनहाइट तक तापमान बढ़ता है। परंपरा के अनुसार जब लोग जलती होलिका की परिक्रमा करते हैं, तो होलिका से निकलता ताप शरीर और आसपास के पर्यावरण में मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है। और इस प्रकार यह शरीर तथा पर्यावरण को स्वच्छ करता है।
christmas-celebrationsहम दिवाली मनाते हैं, दिवाली वर्षा ऋतु के बाद आती है। इसलिए यह समय कीटों, फफूंदियों आदि के पोषण का समय होता है। अर्थात इस समय कीड़े-मकोड़े अधिक हो जाते हैं क्योंकि इनको सही वातावरण मिलता है। इससे कई तरह की बीमारियां होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। दिवाली की परंपरागत मान्यता के मुताबिक दिवाली के दौरान घरों की सफाई की जाती है। माना जाता है कि सफाई रखने से मां लक्ष्मी आपके घर आती हैं। दिवाली के दौरान सफाई करने से कीटों का खतरा कम हो जाता है, साथ ही घी और तेल के दीपक जलाने से वातावरण भी शुद्ध होता है।
हम नवरात्र में और रमजान में उपवास अथवा रोजे रखते हैं। सभी रोजा या व्रत रखने से पाचन क्रिया ठीक हो जाती है और पेट में पल रहे जहरीले तत्व निष्कासित होने शुरू हो जाते हैं। हमारी रक्षात्मक ताकत में बढ़ोतरी होती है और दिमागी ताकत भी बढ़ जाती है। इसके अलावा इससे हमारे व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन भी आता है।
homeless-peopleहम छठ मनाते हैं। छठ के व्रत के साथ सूर्य की अग्नि के माध्यम से ऊर्जा का संचय किया जाता है, ताकि शरीर सर्दी में स्वस्थ रहे। इसके अलावा सर्दी आने से शरीर में पाचन तंत्र से संबंधित कई परिर्वतन होते हैं। छठ पर्व का उपवास पाचन तंत्र के लिए लाभदायक होता है। इससे शरीर की आरोग्य क्षमता में वृद्धि होती है। जब सूर्यदेव को अर्घ्य और जलाशय में पूजन करके उपवास किया जाता है तो शरीर की जीवनी शक्ति ज्यादा मजबूत होती है।
tulsi-plantअब बात करते हैं क्रिसमस की। मैंने कई लोगों से बात की, लेकिन कोई इस बात का उत्तर नहीं दे पाया कि क्रिसमस मनाने का वैज्ञानिक कारण क्या है। हालांकि एक सामाजिक कारण जरूर सामने आया कि पश्चिम में अधिकतर परिवार आज बिखरे हुए हैं, ऐसे में एक त्योहार के मौके पर सब एक जगह एकत्रित होकर कुछ समय साथ में बिताते हैं, लेकिन हमारे भारत में तो कुछ अपवादों को छोड़कर यह समस्या नहीं है कि परिवारों में विघटन हो। यहां तो कोई त्योहार हो या ना हो, मां के हाथ का खाना खाने के लिए बेटा हजारों किलोमीटर दूर से चला आता है। यहां परिवार और कुछ खास परिचितों से मिलने के लिए किसी त्योहार रूपी कारण की तो जरूरत नहीं महसूस होती।
मुझे लगता है कि प्लास्टिक के पेड़ को सजाने से बेहतर है कि क्यों ना हम तुलसी, अशोक या पीपल का पूजन करें। पूजन हमारी परंपरा भी है और इन पेड़ों से मानव जाति को लाभ भी होता है, तो क्यों ना इस खास दिन हम इन विशिष्ट पौधों या पेड़ों को धन्यवाद दें। हम पढ़े लिखे हैं, क्रिसमस पर हम अपने परिचितों को, अपने परिवार के सदस्यों को, अपने दोस्तों को गिफ्ट देते हैं। हम दूसरों के सैंटा क्लॉज बनते हैं। क्यों ना क्रिसमस पर हम उनके सैंटा क्लॉज बनें, जो इस कड़कड़ाती ठंड में सड़क के किनारे बनी झोपड़पट्टियों में, स्टेशनों के बाहर, अस्पतालों के बाहर ठिठुर रहे हैं। क्यों ना हम एक निर्जीव चीज को सजाने के लिए बर्बाद होने वाले धन से किसी की जिंदगी को कुछ गर्माहट दें। एक बार सोचिएगा जरूर…

ऐसे 'निष्पक्ष' हिंदुस्तान पर शर्मिंदा हूँ!


मिलाद-उन-नबी के अगले दिन कोलकाता से 28 किलोमीटर दूर स्थित हावड़ा के धूलागढ़ में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों के द्वारा एक मंदिर पर बम फेंके गए, हिंदुओं की दुकानें जला दी गईं, उनके घरों में घुसकर मारपीट की गई। पुलिस और धूलागढ़ के मुस्लिमों का कहना है कि मुस्लिमों के जुलूस पर कुछ हिन्दुओं ने घात लगाकर हमला किया और जुलूस को बाधित करने की कोशिश की जिसके जवाब में अगले दिन प्रतिक्रिया स्वरूप दंगे भड़के। इसमें गलती किसकी? निश्चित तौर पर प्रशासन की... लेकिन आज बात करते हैं मीडिया की...

इस मामले में एक समाचार संस्थान यह तो लिखता है कि मोहम्मद साहब के जुलूस पर हमला हुआ लेकिन वह ये लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता कि वहां हिंदुओं के घर और दुकानें जलाए जा रहे हैं, वह यह नहीं लिख पाता कि हिंदू मंदिर तोड़े गए। एक अन्य प्रतिष्ठित समाचार चैनल ने अपनी वेबसाइट पर यह तो बताया गया कि मोहम्मद साहब के जुलूस पर हमला किया गया लेकिन उसके बाद किस समुदाय के लोगों ने बम तक से हमला किया।

कोलकाता में रहने वाले कुछ परिचितों से बात की तो उनका साफ तौर पर कहना है कि टीएमसी, सीपीएम और बीजेपी, किसी भी पार्टी से जुड़ा हिंदू हो, वह सिर्फ हिंदू होता है और उन्हें दंगाइयों के आक्रोश को झेलना ही पड़ता है। निष्पक्षता का बाजा बजाने वाले लोगों में तो इतनी भी हिम्मत नहीं है कि वे खुलकर ऐसी घटनाओं के बारे में बता सकें कि किस समुदाय विशेष से जुड़े लोगों ने किस समुदाय विशेष के लोगों को अपना निशाना बनाया। क्योंकि अगर वे बता देंगे कि मुस्लिमों ने हिंदुओं को मारा है तो वे सांप्रदायिक हो जाएंगे और उनकी निष्पक्षता खतरे में पड़ जाएगी। क्या आपको शर्म नहीं आती कि आप एक ऐसे देश में रहते हैं जहां का मीडिया भी निष्पक्षता के नाम पर तुष्टीकरण करता है?

इन सबके बीच एक सवाल मन में यह भी आता है कि जिस पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित 350 हिंदू और 20 मुस्लिम परिवारों वाले कांगला पहाड़ी गांव में हिंदुओं को दुर्गा पूजा की अनुमति नहीं दी जाती है। उसी पश्चिम बंगाल के हिंदुओं में इतनी हिम्मत कहां से आएगी कि वे मुस्लिमों के जुलूस पर घात लगाकर हमला करें। क्या वे सीएम साहिबा की 'मुस्लिम ममता' से अनजान थे? क्या उन्हें इस बात का बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि यदि वे लोग ऐसा कुछ भी करेंगे तो उसके परिणामस्वरूप उन्हें क्या भुगतना पड़ेगा। मेरे मन में यह सवाल इसलिए भी उठा क्योंकि कोलकाता के आसपास के हिस्से में 2 साल पहले मैं एक सप्ताह रहकर आया और वहां जाने का उद्देश्य भी यही था कि वहां कि सांप्रदायिक स्थिति को समझा जाए। मैंने वहां मुस्लिम तुष्टीकरण की पराकाष्ठा को देखा है।

जानी-मानी अमेरिकी पत्रकार जेनेट लेवी ने अमेरिकन थिंकर नामक पत्रिका में 'The Muslim Takeover of West Bengal'  शीर्षक से लिखे गए लेख में लेखिका ने 2013 के उस दौर का जिक्र भी किया था जब पहली बार बंगाल के कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने अलग ‘मुगलिस्तान’ की मांग शुरू कर दी थी। उसी साल बंगाल में हुए दंगों में सैकड़ों हिंदुओं के घर तथा दुकानें लूटी गईं और कई मंदिरों को तोड़ दिया गया। ममता बनर्जी पर आरोप भी लगा था कि सरकार की तरफ से ऑर्डर दिया गया था कि दंगाई मुसलमानों पर कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। आरोप के मुताबिक, ममता को डर था कि मुसलमानों को रोका गया तो वे नाराज हो जाएंगे और वोट नहीं देंगे। इस आरोप में सच्चाई इसलिए नजर आती है क्योंकि उन दंगों के आरोपियों को अब तक किसी तरह की सजा नहीं हुई है।

जेनेट ने लेख में बताया गया था कि पश्चिम बंगाल के जिन जिलों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है वहां पर वे हिंदू कारोबारियों का बॉयकॉट करते हैं। मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर जिलों में मुसलमान हिंदुओं की दुकानों से सामान तक नहीं खरीदते। इसी कारण बड़ी संख्या में हिंदुओं को घर और कारोबार छोड़कर दूसरी जगहों पर जाना पड़ा। ये वो जिले हैं जहां हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं। लेकिन इन विषयों पर ना तो हमारी मीडिया बोलेगी और ना ही हमारे नेता...

जून 2014 में ममता बनर्जी ने अहमद हसन इमरान नामक प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी के सह-संस्थापक को अपनी पार्टी के टिकट पर राज्यसभा भेजा। उस पर आरोप था कि उसने शारदा चिटफंड घोटाले का पैसा बांग्लादेश के जिहादी संगठन जमात-ए-इस्लामी तक पहुंचाया, ताकि वे बांग्लादेश में दंगे भड़का सके। हसन इमरान के खिलाफ अभी एनआईए और सीबीआई की जांच चल रही है। हालांकि प्राथमिक रिपोर्ट में जांच एजेंसियों ने कहा है कि उनकी अब तक की जांच में ऐसा कोई लिंक नहीं मिला है और आगे की जांच जारी है। इसके अलावा पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी उसके रिश्ते होने के आरोप लगते रहे हैं। क्या ऐसे लोगों को राज्यसभा भेजने वाली पार्टी और उस पार्टी की कार्यपद्धति पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी मीडिया की नहीं है?


इन सबके बावजूद अगर मैं किसी एक समुदाय को गालियां दूं तो गलत होगा। क्योंकि मेरा हिंदुस्तान मंदिरों में तोड़फोड़ करने वाले मुस्लिमों और कथित तौर पर जुलूसों पर हमला करने वाले हिंदुओं से नहीं बनता। मेरा हिंदुस्तान तो तब बनता है जब सुबह घर में बजने वाले राधा के भजन को शकील बदायुनी द्वारा लिखा जाता है, उसी भजन को नौशाद साहब द्वारा संगीत दिया जाता है, मोहम्मद रफी साहब उसे अपनी आवाज देते हैं और जब फिल्माने की बारी आती है तो उसे युसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार पर फिल्माया जाता है।

मेरा हिंदुस्तान तो तब बनता है जब ईद उल मिलाद के जुलूस के दौरान हिंदू परिवार बाहर निकल कर मुस्लिम भाईयों को पानी और चाय पिलाते हैं। हां! मुझे शर्म आती है कि मैं एक ऐसे देश में रहता हूं जहां मजहब के नाम पर वोट तो लिए जाते हैं लेकिन मजहब की बुराईयों के बारे में बोलने से डर लगता है। लेकिन इस शर्म के बीच मुझे एक गर्व भी होता है कि मैं एक ऐसे देश में रहता हूं जहां पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में स्थिति धारन गांव में वर्षों से बंद पड़ी दुर्गा पूजा को वहां के बहुसंख्यक मुस्लिम यह कहकर शुरू करवाते हैं कि वे दुर्गा पूजा के दौरान हिंदू भाइयों के दुखी चेहरे नहीं देख पा रहे।

Thursday, 22 December 2016

नोटबंदी: लंबी लाइनों से छुटकारे का यही एक रास्ता

देश में एटीएम और बैंकों के बाहर लाइनें छोटी होने का नाम नहीं ले रही हैं। इन लाइनों से कैसे निपटा जाएगा? 8 नवंबर की शाम को पीएम नरेंद्र मोदी ने देश से वादा किया था कि दिसंबर अंत तक सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन अभी तक का माहौल देखकर तो नहीं लगता कि इतनी जल्दी सबकुछ सामान्य हो पाएगा। आपको क्या लगता है कि सरकार नोट छापती जाएगी और फिर सरकार ने जिस उद्देश्य के साथ विमुद्रीकरण का फैसला लिया था, वह उद्देश्य पूरा हो जाएगा? बिलकुल नहीं। सरकार जितने ज्यादा नोट छापेगी, उससे नुकसान हमें और आपको होगा। क्योंकि यदि पुरानी मात्रा में ही नोट छपते गए तो फिर उनका भंडारण शुरू हो जाएगा और स्थिति जैसी थी, उससे भी बदतर हो जाएगी, क्योंकि अब तो 2000 का नोट भी है।
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किसी से भी पूछो कि भाई विमुद्रीकरण का फैसला कैसा है? जवाब यही मिलता है कि फैसला बहुत अच्छा है लेकिन सरकार को नोट ज्यादा छापने चाहिए, सरकार ने तैयारियां नहीं की। लेकिन जब उनसे कहो कि इसमें हम क्या कर सकते हैं तो वे मौन हो जाते हैं। हमने व्यक्तिगत रूप से देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में कभी सोचा ही नहीं। हम तो यह मानकर बैठे हैं कि सरकार तो है ही सबकुछ करने के लिए लेकिन हमें समझना होगा कि सरकार तब तक कुछ नहीं कर सकती जब तक हम खुद सरकार के साथ खड़े होकर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें।

RBI के अनुसार 31 मार्च 2016 तक भारत में 16.42 लाख करोड़ रूपये मूल्य के नोट बाजार में थे जिसमें से करीब 14.18 लाख रुपये 500 और 1000 के नोटों के रूप में थे। RBI की रिपोर्ट के अनुसार देश में तब तक मौजूद कुल 9026 करोड़ नोटों में करीब 24 प्रतिशत नोट (करीब 2203 करोड़ रुपये) ही प्रचलन में थे।

एक अनुमान के अनुसार देश की कुल मुद्रा प्रसार में 25 प्रतिशत तक नकली करंसी है। इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट और नैशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी की ओर से किये गए संयुक्त अध्ययन में यह पाया गया कि लगभग 70 करोड़ रुपये की नकली मुद्रा हर साल चलन में आ जाती है। इसमें से सिर्फ एक तिहाई जाली मुद्रा ही पकड़ी जाती है और बाकी हमारी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन जाती है। इन सबसे नुकसान किसका होता है? सिर्फ और सिर्फ हमारे देश की अर्थव्यवस्था का? नहीं…. हमें समझना होगा कि इससे अप्रत्यक्ष रूप से हमारा नुकसान होता है और इस नुकसान से बचने के लिए हमें अपनी जिम्मेदारी तय करनी ही होगी।

आज जरूरत है कि हम कैशलेस इकॉनमी की ओर चलने की कोशिश करें। सरकार के इनकम टैक्स का बड़ा स्त्रोत नौकरीपेशा वाला वर्ग है जबकि कारोबारी समुदाय अपनी आय छिपाने में काफी हद तक कामयाब हो जाते हैं। जब लोगों के आय-व्यय की जानकारी ऑनलाइन हो जायेगी तो निश्चित ही सरकार के राजस्व में बड़ी बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा भी कैशलेस इकॉनमी के बहुत से फायदे हैं।

हम जितना अधिक कैश का उपयोग करते हैं, ब्लैकमनी के जमा होने की संभावना उतनी ही अधिक रहती है। ब्लैकमनी से हमारी अर्थव्यवस्था के समानांतर एक और अर्थव्यवस्था तैयार हो जाती है, जिसका सरकार के पास कोई हिसाब नहीं होता। ऐसे में टैक्स चोरी भी काफी ज्यादा होती है। यदि हमारी अर्थव्यवस्था कम से कम कैश वाली होगी तो सरकारी कोष में टैक्स के रूप में अधिकतम पैसा पहुंचेगा और उसका सीधा फायदा हमें यानी आम आदमी को होगा।

कैशलेस व्यवस्था अपनाने से नोट छापने पर होने वाला खर्च बचेगा, नकली नोट का व्यापार खत्म होगा, कागज की बचत होगी, भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, आतंकवाद और नक्सलवाद कम होगा। इसके अलावा इस व्यवस्था को अपनाने से हमें और भी कई फायदे होंगे।

मैं मानता हूं कि भारत एक झटके में कैशलेस नहीं हो सकता क्योंकि असली भारत तो गांव में बसता है। भारत में वे लोग भी हैं जो इंटरनेट छोड़िए, मोबाइल चलाने भी नहीं जानते। लेकिन हम तो उस श्रेणी में नहीं आते। हम तो मोबाइल, इंटरनेट का भरपूर उपयोग अपने दैनिक जीवन में करते हैं। क्या हम व्यक्तिगत स्तर पर यह प्रयास कर सकते हैं कि अपने परिवार में, अपने परिचितों में और दैनिक जीवन में मिलने वाले लोगों को कम से कम कैश प्रयोग करने के तरीके और उसके फायदे बता सकें? क्या हम अपने व्यक्तिगत जीवन में यह संकल्प कर सकते हैं कि जहां तक संभव होगा बिना कैश के ही जीवन जीने का प्रयास करेंगे? विश्वास मानिए, पिछले 43 दिनों के अनुभव के आधार पर बता रहा हूं कि यह बहुत आसान है।

भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली जी ने भी कह दिया है कि बैन की गई करंसी के बराबर की रकम के नोट दोबारा से नहीं छापे जाएंगे। यहां क्लिक कर पढ़ें जेटली का पूरा बयान। ऐसे में पहले जैसी स्थितियां कभी नहीं आने वालीं। इन लंबी लाइनों से निपटने का एक रास्ता है कि हम मिनिमम कैश का प्रयोग करें। कैश को घर में संचित करके ना रखें। क्योंकि अगर आपने ऐसा किया तो इसका सीधा नुकसान उसे हो रहा है जो दिन भर मजदूरी करके शाम को उसी पैसे से रोटी खरीदता है, उसके पास ना ही बैंक अकाउंट है और ना ही मोबाइल। अब जरूरत है कि हम अपनी जिम्मेदारी समझें और यह मानकर चलें कि आज आप गरीबों के लिए कुछ करने की स्थिति में आए हैं।

मेरे बहुत से परिचित हैं जिन्होंने लाखों रुपये के नए नोट जमा करके रखें हैं। हालांकि वह पूरी तरह से पाक-साफ पैसा है लेकिन फिर भी कैश को संग्रहित करना व्यक्तिवादिता और ‘सिर्फ मैं’ की प्रवृत्ति को प्रदर्शित करता है। वे पढ़े-लिखे भी हैं लेकिन अपना पूरा काम कैश से ही कर रहे हैं। समस्या बस इतनी है कि हमने कभी अपनी जिम्मेदारी समझी ही नहीं। हम गरीबी हटाओ के नारे तो लगाते रहे लेकिन कभी इस बारे में सोचने की कोशिश नहीं की कि हम गरीबों और पिछड़ों के लिए क्या कर सकते हैं।

आज हर एक पढ़े-लिखे व्यक्ति के पास एक मौका है कि वह पिछड़ों के लिए कुछ कर सके। कम से कम इतना तो जरूर कि लोगों को ऑनलाइन और कैशलेस व्यवस्था के बारे में जागरुक करें…साथ ही अपनी आर्थिक यात्रा को लेस कैश से कैशलेस तक ले जाएं…. इन लंबी-लंबी लाइनों से निपटने का और कोई रास्ता नहीं…

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...