Showing posts with label फादर्स-डे. Show all posts
Showing posts with label फादर्स-डे. Show all posts

Tuesday, 25 August 2015

इस रक्षाबंधन ये गिफ्ट चाहती हैं हमारी बहनें

इस सप्ताह भारतीय संस्कृति का एक बड़ा त्योहार मनाया जाएगा। एक ऐसा त्योहार जिसमें एक भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है। मूलतः ये त्योहार हमें अपने कर्तव्य अथवा दायित्व की स्मृति दिलाने के लिए नहीं मनाया जाता अपितु भारतीय संस्कृति की उत्सवधर्मिता को प्रदर्शित करने के लिए मनाया जाता है। इस रक्षाबंधन पर मैं आपसे 3 संकल्प चाहता हूं। ये यंकल्प शायद आपके लिए विशेष महत्व न रखते हों परन्तु राष्ट्रीय एकात्मता के संरक्षण के लिए परम आवश्यक हैं।  मित्रों पिछले कई लेखों में मैंने जिक्र किया कि किस प्रकार से विदेशी षणयंत्र के माध्यम से वैलेन्टाइंस डे, फ्रेंडशिप डे, रोज डे, मदर्स डे जैसे तथाकथित वैश्विक त्योहारों के द्वारा इस देश का धन विदेश जा रहा है। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह धन न केवल इन त्योहारों के द्वारा भारत के बाहर जा रहा है बल्कि इन षणयंत्रओं का कुचक्र अब हमारे उत्सवों में भी सेंध लगाने लगा है।


अभी मैंने टीवी पर एक विज्ञापन देखा जिसमें भाई अपनी बहन के लिए अपनी पॉकेट मनी बचाकर कैडबरी चॉकलेट लाता है और बहन उस चॉकलेट को देखकर ऐसे खुश होती है जैसे कि वह इसी चॉकलेट के लिए भाई को राखी बांधती थी। मित्रों मुझे याद है जब बचपन में मेरी बहन मुझे राखी बांधने के लिए आती थी तो मेरे पिता जी मुझे कुछ रुपए देते थे और फिर मैं वो रुपए अपनी बहन को देता था। अब जब मैं थोड़ा बहुत अपनी परंपराओं को समझने लगा हूं तब मुझे उस परंपरा का रहस्य समझ में आया। और उस गूढ़ रहस्य को जानने के बाद एक बार फिर मैं इस देश के विचारों और परंपराओं को लेकर गर्वित हो उठा। मित्रों जब हमारा देश अर्थ यानी लक्ष्मी के फेर में फंसने लगा तब यह परंपरा शुरु हुई। और इस परंपरा के द्वारा अर्थ को सर्वोपरि मानने के विचार को समाप्त करने का प्रयास किया गया।

मित्रों इस रक्षाबंधन के पुनीत पर्व पर आपसे कुछ अपेक्षाओं के साथ इस लेख को लिख रहा हूं। मेरी अपेक्षा यह है कि आप इस राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें। जिन संकल्पों की मैं आपसे अपेक्षा रखता हूं मात्र उन तीन संकल्पों को लेकर आप महसूस करेंगें की सांस्कृतिक संरक्षण में आपका अभूतपूर्व योगदान है।
प्रथम संकल्प यह कि अब से आप किसी भी रक्षाबंधन पर अपनी बहन को कोई विदेशी वस्तु गिफ्ट नहीं करेंगे।
दूसरा संकल्प यह कि इस रक्षाबंधन पर संकल्प लीजिए कि जो आपको रक्षासूत्र बांध रही है उसके साथ साथ इस देश की प्रत्येक बेटी की रक्षा करेंगे।
और अंतिम संकल्प संघ की एक परंपरा से जुड़ा हुआ है कि आपने जिस पतित पावनी धरती पर जन्म लिया है उस धरती की रक्षा को सर्वोपरि मानेंगे।

लेख को बहुत अधिक विस्तार न देते हुए आपसे अपेक्षा करता हूं कि इन संकल्पों की गंभीरता को समझकर अपनी जिम्मेदारी का पूर्ण मनोयोग से निर्वहन करेंगे।
वन्दे भारती

Monday, 3 August 2015

धिक्कार तथाकथित राष्ट्रवादियों पर....

दो दिन पूर्व फ्रेंडशिप डे के विरोध में एक ब्लॉग लिखा, जिन्होंने उसे पढ़ा उन्होंने उसका समर्थन किया, लेकिन एक बुद्धजीवी वर्ग ऐसा भी था जिसने बिना ब्लॉग पढ़े, अथवा आंशिक रूप से पढ़कर आधारहीन तथा तथ्यहीन मैसेज करना शुरू कर दिया। मेरा विषय स्पष्ट था कि मित्रता का व्यापार नहीं होना चाहिए और मैंने मात्र फ्रेंडशिप डे का विरोध नहीं किया था अपितु 'चॉकलेट-डे', 'टेडी-डे', 'फादर्स-डे', 'मदर्स-डे', 'वेलेन्टाइन-डे, आदि फालतू के दिनों का विरोध किया था।

जिन वामपंथी एवं पाश्चात्य सभ्यता के संवाहक मित्रों ने मेरे विषय का विरोध किया उनके बेकार के संदेशों का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मुझे मूल पीड़ा हुई उन लोगों के संदेशों से जो स्वयं को संस्कृति का संवाहक कहते थे, खुद को संघ का बहुत बड़ा स्वयंसेवक कहते थे। उन लोगों ने फ्रेंडशिप डे की शुभकामनाएं न देकर मैत्री दिवस/ मित्रता दिवस की शुभकामनाएं दीं। वो संस्कृति के तथाकथित संवाहक एक दिन पहले 1 अगस्त को लोकमान्य बाल गंगाधर की पुण्यतिथि पर एक शोक संदेश भी न भेज पाए। पीड़ा इस बात की नहीं वो मैत्री दिवस अथवा मित्रता दिवस की शुभकामनाएं दे रहे थे, पीड़ा इस बात की है वो परम पवित्र भारत वर्ष को स्वतंत्र करने वाले, देश में स्वदेशी आंदोलन के जनक को फ्रेंडशिप डे की तैयारियों के कारण भूल गए।

और तो और वो मित्र भारत के राष्‍ट्रीय ध्वज की रूपरेखा तैयार करने वाले पिंगली वेंकैय्या का जन्मदिन भी भूल गए। धन्य हैं ऐसे राष्ट्रवादी जो विदेशी षड़यंत्रों का हिंदी अनुवाद कर स्वयं को राष्ट्रवादी कहते हैं।

और मेरा विरोध सिर्फ ऐसे तथाकथित ग्लोबल त्योहारों से नहीं है अपितु देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए रक्षाबंधन पर विदेशी राखियों का भी विरोध करता हूं, दीपावली पर विदेशी दीपकों तथा मोमबत्तियों और चायनीज पटाखों का भी विरोध करता हूं, होली पर विदेशी रंगों का भी विरोध करता हूं। और मैं ऐसा इसलिए करता हूं कि जब मुझसे कोई ये कहे कि आपने देश के लिए क्या किया है तो मैं खुद से नजर मिला कर जवाब दे सकूं कि स्वदेशी संरक्षण में एक हिस्सा मेरा भी है।

अगर मैं ईद पर जीव हत्या का विरोध करता हूं तो दीपावली पर पटाखों पर व्यर्थ पैसे बर्बाद करने का भी विरोध करता हूं, अगर मैं चर्च में मोमबत्ती जलाने का विरोध करता हूं तो शिवलिंग पर दूध बहाने का भी विरोध करता हूं।

ऐसे विषयों को किसी संप्रदाय विशेष से न जोड़कर देखें अपितु राष्ट्र सर्वप्रथम की भावना के साथ ऐसे विषयों पर चिंतन करें।

वन्दे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...