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Saturday, 29 August 2015

अरे कूल डू़ड !! धिक्कार है तुम पर...

अभी अभी मेरे watsapp के एक ग्रुप में एक मैसेज आया।
किसी भी अनजान चीज को हाथ न लगाएं उसमे राखी हो सकती है।
पिछले कुछ वर्षों से देख रहा हूं कि सोशल मीडिया पर एक प्रचलन चला है, या यूं कहें एक षड़यंत्र चला है, वह यह कि जैसे ही कोई त्यौहार आने वाला होता है कुछ लोग उस त्यौहार को ऐसे पेश करते हैं जैसे वो उनके ऊपर बोझ हो।

 अरे कूल डू़ड !! तुम्हारे लिए अपनी बहन बोझ बन रही है क्या जो तुम राखी का मजाक बना कर बैठे हो। तुम कैसे अपनी माँ बहन की रक्षा करोगे। राखी एक रक्षा सूत्र है अगर तुम भूल रहे हो तो याद दिलाऊं राजस्थान में औरतों अपनी रक्षा के लिए जौहर कर आग में कूद जाती थीं। रानी पद्मिनी के साथ 36000 औरतों ने जौहर किया था । एक महिला की रक्षा तुम्हें मजाक लगती है ? महोदय, देवी की रक्षा नहीं करोगे तो इस धरती से मानव जीवन समाप्त हो जाएगा।

मित्रों इस प्रकार के संदेश मात्र रक्षाबंधन पर ही नहीं आते। हर त्यौहार पर इस प्रकार के मैसेज आ ही जाते हैं। अभी पिछले वर्ष दशहरे पर एक अतिमूर्खतापूर्ण संदेश पढ़ा। संदेश था
रावण सीता जी को उठा ले गया है और राम जी लंका पर चढ़ाई करने जा रहे हैं उसके लिय बंदरो की आवश्यकता है जो भी मैसेज पढ़े तुरंत निकल जाये ||

वाह !!! आज सीता अपहरण हमारे लिए मजाक का विषय हो गया है। जोरू का गुलाम बनना गर्व का विषय राम का सैनिक बनना मजाक हो रहा है !!!

एक अन्य पोस्ट देखी कि रावण को कोर्ट ले जाया गया वहां कहा गया कि गीता पर हाथ रख कसम खाओ तब रावण कहता है कि सीता पर हाथ रखा उसमे इतना बवाल हो गया गीता पर रखा तो……||
यह बड़े शर्म की बात है कि अग्नि परीक्षा देने के बाद भी आज ये समाज सीता माता के चरित्र पर सवाल उठाने को मजाक समझते है। कभी घर पर बैठी माँ से पूछो पिताजी कहां कहां हाथ लगाते हैं अगर नहीं पूछ सकते तो तुम्हें किसने अधिकार दिया एक आदर्श प्रस्तुत करने वाली माता सीता पर हाथ रखने को मजाक बनाने का ????

हम राखी और सीता अपहरण पर मजाक करते हैं ऐसा करके हमारी वजह से समाज की क्या मानसिकता बनती है, कभी विचार किया है। लोग लड़की की रक्षा से कतराते हैं क्यों की राखी को हमने मजाक बना दिया है हमने सीता माता जैसी पवित्र माँ का मजाक बना दिया है।आज हमने समाज में महिला का मजाक बना दिया है उसकी रक्षा और उसकी अस्मिता एक जोक बनकर हमारा हास्य कर रही है इससे पता चलता है हम कितने धार्मिक हैं।


इस बार फिर रक्षाबंधन पर अपनी बहन के पास नहीं जा पा रहा हूं......

Thursday, 27 August 2015

भारत vs इंडिया- एक विश्लेषण



वर्तमान समय में भारत, इंडिया मे खोता जा रहा हैं। मेरे इस लेख पर बहुत से तथाकथित बुद्धिजीवी मुझे ज्ञान की बाते बतायेंगे। आप सभी पाठकों से निवेदन हैं की इस लेख को लिखने की आवश्यकता मुझे क्यों पडी उसे समझने का प्रयास करें। भारत को इंडिया से अलग करके देखने की मेरी कोशिश कइयों को नागवार लगेगी, और कई इसे मेरी सनक कह कर खारिज कर देंगे। लेकिन भारत इंडिया नही हैं यह कहने वाला मै अकेले नहीं हूं। अंग्रजों द्वारा लागू की गई शिक्षा पद्धति एवं कुछ मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भारत एवं इंडिया को एक दिखाने का प्रयास किया। मेरे कुछ सामान्य से प्रश्न उन बुद्धिजीवीयों से हैं जो भारत को इंडिया कहते हैं- 

जब कोई उनसे हिन्दी मे पूछता है आप किस देश मे रहते हैं? तो सामान्य सा उत्तर आता हैं, 'मैं भारत या हिन्दुस्तान में 
रहता हूं' लेकिन जब उसी व्यक्ति से अंगेजी मे पूछा जाता हैं  In which country do you live? तो वहीं बडे शौक से कहते हैं I live in india । पूरे विश्व के अंदर किसी एक देश का नाम कोई बता सकता है जिसको दो अलग अलग भाषाओं मे अलग अलग नाम से बुलाया जाता हो। जब भारतीय क्रिक्रेट टीम क्रिक्रेट खेलती है तो टीवी पर नीचे लिख कर आता हैं इंडिया। क्या किसी अन्य देश के साथ ऐसा होता है क्या कोई अन्य देश अपने गुलामी को अपने सर का ताज बना कर चलता है। 


सामान्य अंग्रेजी में कक्षा 4 में हमें नाउन की परिभाषा पढाई जाती हैं एव नाउन के सिद्धातों के अनुसार प्रापर नाउन का कभी ट्रांसलेशन नहीं होता उदाहरण के तौर पर यदि मेरा नाम विश्व गौरव हैं तो क्या अंग्रेजी मे मुझे 'world pride' या 'world dignity' कहा जायेगा? नहीं न.... अंग्रेजी की थोड़ी बहुत व्याकरण का ज्ञान मुझे भी है और उसके अनुसार प्रापर नाउन का अंग्रेजी में ट्रासलेशन करना व्याकरण के साथ खिलवाड करने जैसा है। हो सकता हैं बहुत से बु़द्धिजीवी यह बोलें कि आर्यावत, भारत, विश्वगुरू, हिन्दुस्तान, सोने की चिडिया की तरह ही इंडिया भी इस देश का नाम हैं लेकिन यदि नाम हैं तो व्याकरण के साथ ऐसा भद्दा मजाक क्यूं क्या संविधान में लिखी एक लाईन INDIA THAT IS BHARAT के लिए हम बचपन में पढ़ी हुई व्याकरण को भूल सकतें हैं ? आज के संदर्भ में भारत को पहचानना बहुत आसान हैं। भारत के लोग गावों और शहर की गरीब बस्तियों मे रहते हैं, यह भी हो सकता है कि वो उसी अटटालिकाओं मे रहतें हो लेकिन उनके मन में आज भी भारतीय संस्कति, भारतीय आचार-विचार, भारतीय संस्कार कहे-अनकहे रूप में दिख ही जाते हैं। भारत के लोग हमारी पंरम्परा का पालन करते हैं, उसमें गर्व महसूस करते हैं, ये लोग जमीन से जुडे़ हुए लोग हैं जो स्वयं में अपने देश को देखते हैं। ये लोग स्वयं को 1/125 करोड़ भारत समझते हैं। ये लोग इतनी झमता रखते हैं, कि विश्व पटल पर भारत का प्रतिनिधित्व कर सकें। उसी भारत के एक निवासी के रूप में भगवा वेशधारी स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो धर्म सम्मेलन में इंडिया को नहीं भारत को प्रस्तुत किया था। 

वर्तमान समय में यदि चर्चा इंडिया के विषय में की जाए तो ध्यान मे आता है कि इंडिया, भारत का शोषण करता हैं। भारत इंडिया का उपनिवेश बन के रह गया हैं। इंडिया अमीर हैं, उसके पास बेसुमार धन-दौलत, चल-अचल सम्पत्ति है इनके बच्चे इंग्लिस मीडियम मिशीनरी स्कूलों में पढ़ते हैं तथा बडे़ होकर अमेरिका, इग्लैड, जर्मनी, आस्टेलिया में पढ़ने जाते हैं । ये भारतवासियों को हेय दृष्टि से देखते हैं। भारत में इनकों कुछ भी अच्छा नही लगता ये अंग्रेजी बोलना पंसद करते हैं। भारतीय भाषायों को बोलने मे इन्हें शर्म महसूस होती है। इंडिया के लोग अपनी पंरम्परा के पालन मे हीन भावना महसूस करते हैं। उनको भारत के इतिहास का कोई ज्ञान नहीं है, वे विदेशी सभ्यता, संस्कति को अपनाने मे गर्व महसूस करते हैं। इन्हें भारतीय कला,साहित्य, संस्कृति और विज्ञान नित्कृष्ट लगते हैं । मुझे डर इस बात का है कि भारत के अंदर एक ऐसी जड़ विहीन पीढ़ी अस्तित्व में आ रही हैं जो न यहां की होगी न वहां की। 

क्या है इंडिया और क्या है भारत

भारत में गॅाव हैं, गली हैं, चैबारा हैं। इंडिया में सिटी हैं, मॅाल हैं, पंचतारा हैं। 
भारत में काका हैं, बाबा हैं, दादी हैं। इंडिया में अंकल, आंटी कि आबादी हैं। 
भारत मे मटके है, दोने हैं, पत्तल हैं। इंडिया में पॅालिथीन हैं, वॅाटर हैं और वॅाईन हैं। 
भारत में दूध हैं, दही हैं, लस्सी हैं। इंडिया मे खतरनाक कोक, विस्की और पेप्सी हैं। 
भारत में मंदिर हैं, मंडप हैं, पंडाल है। इंडिया में पब है, डिस्कों हैं और हॅाल हैं। 
भारत मे आदर हैं, प्रेम हैं, सत्कार हैं। इंडिया मे स्वार्थ हैं, नफरत हैं और दुत्कार हैं। 
भारत सीधा हैं, सरल हैं, सहज हैं। इंडिया धुर्त हैं, चालाक हैं, कुटील हैं। 
भारत में संतोष हैं, सुख हैं, चैन हैं। इंडिया बदहबास, दुखी और बेचैन हैं। 
क्यूं कि---------- 
भारत को देवों ने वीरों ने रचाया हैं। इंडिया को लालची अंग्रेजो ने बसाया हैं। (मांइड इट से साभार) 

राष्टीयता, एकात्मता एवं भारतीय अर्थव्यवस्था को तोड़ने के लिए किया गया अंग्रेजो का प्रयास आज विकराल परिणामों के साथ भलीभूत होता दिख रहा हैं एवं इन सभी के लिए पूर्णरूप से मैकाले शिक्षा पद्धति जिम्मेदार हैं अब वास्तव में आवश्यकता हैं कि भारत को भारत कि शिक्षा दी जाए। जिससे कि भारत का बेटा अमेरिका और इंग्लैड के सामने हाथ फैला कर ना खड़ा हो। 

इस बात का गर्व मुझे भी है कि नासा के अंदर 46 प्रतिशत भारतीय काम करते हैं लेकिन एक पीड़ा यह भी हैं कि वह अपनी प्रतिभा को भारत से नाकार दिए जाने के बाद वहां जा कर वह सम्मान पाते हैं जो उन्हे भारत में मिलना चाहिए था। और यही पीडा जन्म देती हैं शिक्षा पद्धति में बदलाव के लिए किए जा रहे आंदोलन को। 

Tuesday, 25 August 2015

इस रक्षाबंधन ये गिफ्ट चाहती हैं हमारी बहनें

इस सप्ताह भारतीय संस्कृति का एक बड़ा त्योहार मनाया जाएगा। एक ऐसा त्योहार जिसमें एक भाई अपनी बहन की रक्षा का संकल्प लेता है। मूलतः ये त्योहार हमें अपने कर्तव्य अथवा दायित्व की स्मृति दिलाने के लिए नहीं मनाया जाता अपितु भारतीय संस्कृति की उत्सवधर्मिता को प्रदर्शित करने के लिए मनाया जाता है। इस रक्षाबंधन पर मैं आपसे 3 संकल्प चाहता हूं। ये यंकल्प शायद आपके लिए विशेष महत्व न रखते हों परन्तु राष्ट्रीय एकात्मता के संरक्षण के लिए परम आवश्यक हैं।  मित्रों पिछले कई लेखों में मैंने जिक्र किया कि किस प्रकार से विदेशी षणयंत्र के माध्यम से वैलेन्टाइंस डे, फ्रेंडशिप डे, रोज डे, मदर्स डे जैसे तथाकथित वैश्विक त्योहारों के द्वारा इस देश का धन विदेश जा रहा है। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह धन न केवल इन त्योहारों के द्वारा भारत के बाहर जा रहा है बल्कि इन षणयंत्रओं का कुचक्र अब हमारे उत्सवों में भी सेंध लगाने लगा है।


अभी मैंने टीवी पर एक विज्ञापन देखा जिसमें भाई अपनी बहन के लिए अपनी पॉकेट मनी बचाकर कैडबरी चॉकलेट लाता है और बहन उस चॉकलेट को देखकर ऐसे खुश होती है जैसे कि वह इसी चॉकलेट के लिए भाई को राखी बांधती थी। मित्रों मुझे याद है जब बचपन में मेरी बहन मुझे राखी बांधने के लिए आती थी तो मेरे पिता जी मुझे कुछ रुपए देते थे और फिर मैं वो रुपए अपनी बहन को देता था। अब जब मैं थोड़ा बहुत अपनी परंपराओं को समझने लगा हूं तब मुझे उस परंपरा का रहस्य समझ में आया। और उस गूढ़ रहस्य को जानने के बाद एक बार फिर मैं इस देश के विचारों और परंपराओं को लेकर गर्वित हो उठा। मित्रों जब हमारा देश अर्थ यानी लक्ष्मी के फेर में फंसने लगा तब यह परंपरा शुरु हुई। और इस परंपरा के द्वारा अर्थ को सर्वोपरि मानने के विचार को समाप्त करने का प्रयास किया गया।

मित्रों इस रक्षाबंधन के पुनीत पर्व पर आपसे कुछ अपेक्षाओं के साथ इस लेख को लिख रहा हूं। मेरी अपेक्षा यह है कि आप इस राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें। जिन संकल्पों की मैं आपसे अपेक्षा रखता हूं मात्र उन तीन संकल्पों को लेकर आप महसूस करेंगें की सांस्कृतिक संरक्षण में आपका अभूतपूर्व योगदान है।
प्रथम संकल्प यह कि अब से आप किसी भी रक्षाबंधन पर अपनी बहन को कोई विदेशी वस्तु गिफ्ट नहीं करेंगे।
दूसरा संकल्प यह कि इस रक्षाबंधन पर संकल्प लीजिए कि जो आपको रक्षासूत्र बांध रही है उसके साथ साथ इस देश की प्रत्येक बेटी की रक्षा करेंगे।
और अंतिम संकल्प संघ की एक परंपरा से जुड़ा हुआ है कि आपने जिस पतित पावनी धरती पर जन्म लिया है उस धरती की रक्षा को सर्वोपरि मानेंगे।

लेख को बहुत अधिक विस्तार न देते हुए आपसे अपेक्षा करता हूं कि इन संकल्पों की गंभीरता को समझकर अपनी जिम्मेदारी का पूर्ण मनोयोग से निर्वहन करेंगे।
वन्दे भारती

Friday, 14 August 2015

क्या करें ऐसी आजादी का...

" हुआ हुक्म जब फांसी का तो भगत सिंह यूँ मुस्काया
बोला माँ अब गले लगा लो मुद्दत में मौक़ा आया
तख़्ते फाँसी कूंच पेजब क़दमों की आहट आती थी
तो दीवारें भी झूम-झूम कर वंदेमातरम् गाती थीं
चूम के फाँसी का फन्दा जब इंक़लाब वो बोला था
काँप उठी थी वसुंधरा अंग्रेज़ी शासन डोला था
आख़िर बोला यही वसीयत ऐ रखवाले करता हूँ
माँ की लाज बचा लेना अब तुम्हे हवाले करता हूँ
आओ तुमको इंक़लाब की ताक़त मैं दिखलाता हूँ
छोड़ दिए तुमने जो पन्ने उनकी याद दिलाता हूँ ।"
-शहनाज हिन्दुस्तानी


एक बार फिर देश तैयार है 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस की एक और वर्षगांठ मनाने के लिए। हम सिर्फ यह कह-सुन कर आपस में खुश हो लेते हैं कि हम आजाद हैं, लेकिन सच में हम कितना आजाद हैं, यह तो हमारा दिल ही जानता है। यही वजह है कि आजादी का आंदोलन देख चुकी हमारी बुजुर्ग पीढ़ी बड़े सहज भाव में कहती सुनाई देती है कि इससे तो अंग्रेजों का राज अच्छा था।



वस्तुत: हमारी आजादी आधी अधूरी ही है। इसकी वजह ये है कि हम 15 अगस्त 1947 को अग्रेजों की दासता से तो मुक्त हो गए, मगर जैसी शासन व्यवस्था है, उसमें अब हम अपनों की ही दासता में जीने को विवश हैं। आज हम किस बात पर गर्व करें, सत्ता के सिंहासन के पैर की जूती बन चुकी व्यवस्था पर या अंग्रेजों द्वारा भारत को बर्बाद करने के लिए बनाए गए कानूनों पर जो आज भी हमारे गले में लटके हुए हैं, या इस बात पर कि इस देश का युवा को 14 नवंबर और 30 जनवरी तो याद है लेकिन 27 सितंबर नहीं।

मित्रों आज एक बार फिर रोने का मन कर रहा है। बहुत से लोग अधिकारों की बात करते हुए दिख जाते हैं। हमारे संविधान ने हमको बहुत से अधिकार दे रखे हैं, जैसे.....
1. किसी के भी मुंह पर कालिख फेंकने की आजादी
2. किसी के भी ऊपर जूता फेंकने की आजादी
3. किसी को भी गलियां देने की आजादी
4. कश्मीर में पाकिस्तानी झंडा फहराने देने की आजादी
5. आतंकवादियों को अपने दामाद की तरह पूरी सुरक्षा और इज्ज़त के साथ रखने की आज़ादी
6. सरबजीत जैसे देशभक्त को आतंकवादी बताने और अफजल गुरु जैसे आतंकवादी को फांसी नहीं होने देने की आजादी
7. शांति और अहिंसक तरीकों से आन्दोलन करने वालो को बिना कारण के जेलों में ठूंसने की आजादी
8. अरबों रुपयों का भ्रष्टाचार करके सीना तान के खड़े रहने की आजादी
9. भारत के साधू संतो और भगवानों का अपमान करने की आजादी
10. सिख जैसी देशभक्त कौम पर गंदे गंदे चुटकुले बनाने की आजादी
11. सरकारी दफ्तरों मैं काम नहीं करने और आराम से रिश्वत लेकर काम करने की आजादी
ऐसी बहुत सी आजादी हमें हमारे संविधान ने दे रखी हैं।
क्या हमारे महान क्रांतिकारियों ने ऐसे भारत के लिए कुर्बानियाँ दी थी ???

दरअसल, अब हम एक ऐसी परंतत्रता में जी रहे हैं, जिसके खिलाफ अब दोबारा संघर्ष की जरूरत है। हमें अगर पूरी आजादी चाहिए, तो हमें एक और स्वाधीनता संग्राम के लिये तैयार हो जाना चाहिये। यह स्वाधीनता संग्राम जमाखोरों, कालाबाजारियों के खिलाफ होना चाहिए। यह संग्राम भ्रष्टाचारियों से लड़ा जाना चाहिए। यह संग्राम चोर, उचक्कों, लुटेरों और ठगों के खिलाफ छेड़ा जाना चाहिये। यह संग्राम देश को खोखला कर रहे सत्ता व स्वार्थलोलुप नेताओ के विरुद्ध लड़ा जाना चाहिए।
हर भारतीय की इच्छा है कि आजादी केवल किताबों और शब्दों में ही नहीं, बल्कि धरातल पर भी दिखनी चाहिये। हमें भगत सिंह के सपनों का भारत चाहिए। हमें देश के महान क्रांतिकारियों के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देना है। विडंबना यह है कि हम आजादी के पर्व पर इन तथ्यों पर जरा भी चिंतन नहीं करते। हम सिर्फ इस दिन रस्म अदायगी करते हैं। सुबह झंडा फहरा कर और बड़े-बड़े भाषण देकर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और दूसरे ही दिन पुराने ढर्ऱे वाली आपाधापी में व्यस्त हो जाते हैं।

देश तो बनता है संस्कृति ,परंपराओं और देश के निवासियों की असंदिग्ध निष्ठा से, पर देश के निवासियों में सर्वप्रथम निष्ठा तो जाति धर्म के प्रति प्रतीत होती है। सांस इस देश में भरते है गुणगान विदेश का करते हैं। ये कैसा राष्ट्र प्रेम है? इस मनोदशा को बदलना होगा समृद्धशाली और सामर्थ्यवान भारत की रचना करनी होगी। स्वतंत्र भारत के 69 सालों के बाद भी गौरवमयी इतिहास पर खून के धब्बे आज भी विराजमान हैं, कुछ कराहते हैं, आज भी जीवनयापन के साथ आत्मसम्मान के लिये संघर्षरत हैं, जिनकी कराह देश की नींद में दाखिल है परंतु सत्ताधीशों की नींद नहीं टूट रही है।

महोदय अब मत करिए कुछ ऐसा कि खुद से भी नजर मिला पाओ। देश के लिए सिर्फ एक दिन ही नहीं है, हर दिन, हर पल है देश के लिए और देशवासियों के लिए...
अपने अधिकार ही नहीं कर्तव्यों को भी समझें
देश को तोड़ने वाले तत्त्वों से बचें और आजादी की उड़ान भरें अपने आजाद विचारों के साथ...
वन्दे भारती

Wednesday, 12 August 2015

सावन,भारतीय संस्कृति और एक रहस्य


यहाँ दो पात्र हैं : एक है भारतीय और एक है इंडियन ! आइए देखते हैं दोनों में क्या बात होती है !

इंडियन : ये शिव रात्रि पर जो तुम इतना दूध चढाते हो शिवलिंग पर, इस से अच्छा तो ये हो कि ये दूध जो बहकर नालियों में बर्बाद हो जाता है, उसकी बजाए गरीबों मे बाँट दिया जाना चाहिए ! तुम्हारे शिव जी से ज्यादा उस दूध की जरुरत देश के गरीब लोगों को है. दूध बर्बाद करने की ये कैसी आस्था है ?




भारतीय : सीता को ही हमेशा अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है, कभी रावण पर
प्रश्नचिन्ह क्यूँ नहीं लगाते तुम ?

इंडियन : देखा ! अब अपने दाग दिखने लगे तो दूसरों पर ऊँगली उठा रहे हो ! जब अपने बचाव मे कोई उत्तर नहीं होता, तभी लोग दूसरों को दोष देते हैं. सीधे-सीधे क्यूँ नहीं मान लेते कि ये दूध चढाना और नालियों मे बहा देना एक बेवकूफी से ज्यादा कुछ नहीं है !

भारतीय : अगर मैं आपको सिद्ध कर दूँ की शिवरात्री पर दूध चढाना बेवकूफी नहीं समझदारी है तो ?

इंडियन : हाँ बताओ कैसे ? अब ये मत कह देना कि फलां वेद मे ऐसा लिखा है इसलिए हम ऐसा ही करेंगे, मुझे वैज्ञानिक तर्क चाहिए।

भारतीय : ओ अच्छा, तो आप विज्ञान भी जानते हैं ? कितना पढ़े हैं आप ?

इंडियन : जी, मैं ज्यादा तो नहीं लेकिन काफी कुछ जानता हूँ, एम् टेक किया है, नौकरी करता हूँ. और मैं अंध विशवास मे बिलकुल भी विशवास नहीं करता, लेकिन भगवान को मानता हूँ.

भारतीय : आप भगवान को मानते तो हैं लेकिन भगवान के बारे में जानते नहीं कुछ भी. अगर जानते होते, तो ऐसा प्रश्न ही न करते ! आप ये तो जानते ही होंगे कि हम लोग त्रिदेवों को मुख्य रूप से मानते हैं : ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शिवजी (ब्रह्मा विष्णु महेश) ?

इंडियन : हाँ बिलकुल मानता हूँ.

भारतीय : अपने भारत मे भगवान के दो रूपों की विशेष पूजा होती है : विष्णु जी की और शिव जी की ! ये शिव जी जो हैं, इनको हम क्या कहते हैं – भोलेनाथ, तो भगवान के एक रूप को हमने भोला कहा है तो दूसरा रूप क्या हुआ ?

इंडियन (हँसते हुए) : चतुर्नाथ !

भारतीय : बिलकुल सही ! देखो, देवताओं के जब प्राण संकट मे आए तो वो भागे विष्णु जी के पास, बोले “भगवान बचाओ ! ये असुर मार देंगे हमें”. तो विष्णु जी बोले अमृत पियो. देवता बोले अमृत कहाँ मिलेगा ? विष्णु जी बोले इसके लिए समुद्र मंथन करो !
तो समुद्र मंथन शुरू हुआ, अब इस समुद्र मंथन में कितनी दिक्कतें आई ये तो तुमको पता ही होगा, मंथन शुरू किया तो अमृत निकलना तो दूर विष निकल आया, और वो भी सामान्य विष नहीं हलाहल विष ! भागे विष्णु जी के पास सब के सब ! बोले बचाओ बचाओ !
तो चतुर्नाथ जी, मतलब विष्णु जी बोले, ये अपना डिपार्टमेंट नहीं है, अपना तो अमृत का डिपार्टमेंट है और भेज दिया भोलेनाथ के पास ! भोलेनाथ के पास गए तो उनसे भक्तों का दुःख देखा नहीं गया, भोले तो वो हैं ही, कलश उठाया और विष पीना शुरू कर दिया ! ये तो धन्यवाद देना चाहिए पार्वती जी का कि वो पास में बैठी थी, उनका गला दबाया तो ज़हर नीचे नहीं गया और नीलकंठ बनके रह गए.

इंडियन : क्यूँ पार्वती जी ने गला क्यूँ दबाया ? 

भारतीय : पत्नी हैं ना, पत्नियों को तो अधिकार होता है ..:P किसी गण की हिम्मत होती क्या जो शिव जी का गला दबाए……अब आगे सुनो फिर बाद मे अमृत निकला ! अब विष्णु जी को किसी ने invite किया था ???? मोहिनी रूप धारण करके आए और अमृत लेकर चलते बने.
और सुनो – तुलसी स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती है, स्वादिष्ट भी, तो चढाई जाती है कृष्ण जी को (विष्णु अवतार).
लेकिन बेलपत्र कड़वे होते हैं, तो चढाए जाते हैं भगवान भोलेनाथ को !
हमारे कृष्ण कन्हैया को 56 भोग लगते हैं, कभी नहीं सुना कि 55 या 53 भोग लगे हों, हमेशा 56 भोग ! और हमारे शिव जी को ? राख , धतुरा ये सब चढाते हैं, तो भी भोलेनाथ प्रसन्न ! कोई भी नई चीज़ बनी तो सबसे पहले विष्णु जी को भोग ! दूसरी तरफ शिव रात्रि आने पर हमारी बची हुई गाजरें शिव जी को चढ़ा दी जाती हैं……

अब मुद्दे पर आते हैं……..इन सबका मतलब क्या हुआ ???

विष्णु जी हमारे पालनकर्ता हैं, इसलिए जिन चीज़ों से हमारे प्राणों का
रक्षण-पोषण होता है वो विष्णु जी को भोग लगाई जाती हैं !
और शिव जी?
शिव जी संहारकर्ता हैं, इसलिए जिन चीज़ों से हमारे प्राणों का नाश होता है,
मतलब जो विष है, वो सब कुछ शिव जी को भोग लगता है !

इंडियन : ओके ओके, समझा !

भारतीय : आयुर्वेद कहता है कि वात-पित्त-कफ इनके असंतुलन से बीमारियाँ होती हैं और श्रावण के महीने में वात की बीमारियाँ सबसे ज्यादा होती हैं. श्रावण के महीने में ऋतू परिवर्तन के कारण शरीर मे वात बढ़ता है. इस वात को कम करने के लिए क्या करना पड़ता है ? ऐसी चीज़ें नहीं खानी चाहिएं जिनसे वात बढे, इसलिए पत्ते वाली सब्जियां नहीं खानी चाहिएं !और उस समय पशु क्या खाते हैं ?

इंडियन : क्या ?

भारतीय : सब घास और पत्तियां ही तो खाते हैं. इस कारण उनका दूध भी वात को बढाता है ! इसलिए आयुर्वेद कहता है कि श्रावण के महीने में (जब शिवरात्रि होती है !!) दूध नहीं पीना चाहिए. इसलिए श्रावण मास में जब हर जगह शिव रात्रि पर दूध चढ़ता था तो लोग समझ जाया करते थे कि इस महीने मे दूध विष के सामान है, स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है, इस समय दूध पिएंगे तो वाइरल इन्फेक्शन से बरसात की बीमारियाँ फैलेंगी और वो दूध नहीं पिया करते थे ! इस तरह हर जगह शिव रात्रि मनाने से पूरा देश वाइरल की बीमारियों से बच जाता था ! समझे कुछ ?
इंडियन : omgggggg !!!! यार फिर तो हर गाँव हर शहर मे शिव रात्रि मनानी चाहिए, इसको तो राष्ट्रीय पर्व घोषित होना चाहिए !

भारतीय : हम्म….लेकिन ऐसा नहीं होगा भाई कुछ लोग साम्प्रदायिकता देखते हैं, विज्ञान नहीं ! और सुनो. बरसात में भी बहुत सारी चीज़ें होती हैं लेकिन हम उनको दीवाली के बाद अन्नकूट में कृष्ण भोग लगाने के बाद ही खाते थे (क्यूंकि तब वर्षा ऋतू समाप्त हो चुकी होती थी). एलोपैथ कहता है कि गाजर मे विटामिन ए होता है आयरन होता है लेकिन आयुर्वेद कहता है कि शिव रात्रि के बाद गाजर नहीं खाना चाहिए इस ऋतू में खाया गाजर पित्त को बढाता है ! तो बताओ अब तो मानोगे ना कि वो शिव रात्रि पर दूध चढाना समझदारी है ?

इंडियन : बिलकुल भाई, निःसंदेह ! ऋतुओं के खाद्य पदार्थों पर पड़ने वाले प्रभाव को ignore करना तो बेवकूफी होगी.

भारतीय : ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है ! ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते !
जिस संस्कृति की कोख से मैंने जन्म लिया है वो सनातन (=eternal) है, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें ! -

Thursday, 6 August 2015

अच्छा तो मैं भी नक्सली हूं.... लेकिन ऐसा नक्सली होने पर गर्व है...

कुछ दिन पहले अपने एक छोटे भाई प्रीतम दुबे के साथ राष्ट्रीय एकात्मता के विषय पर चर्चा हो रही थी, तो उसने किसी विषय पर बोला कि हमारे संविधान में ऐसा लिखा है...तो मेरे मुंह से अचानक निकला कि मैं संविधान को नहीं मानता। मेरे मुंह से संविधान के विषय में ऐसा पहली बार निकला था। उस रात मेरे लिए चिंतन का विषय यही था कि मेरे मुंह से संविधान को लेकर ऐसी बात क्यों निकली। इसका मतलब यह नहीं कि मैं हमेशा से संविधान का पूर्ण रूप से समर्थन करता था। मैं पहले भी संविधान का विरोध करता रहा हूं लेकिन वो विरोध इस लिए होता था क्यों कि मैनें संविधान की बहुत सी धाराओं  तथा कानूनों के विषय में विस्तार पूर्वक अध्ययन किया था। अंग्रेजों द्वारा बनाए गए उन कानूनों के पीछे के मूल उद्देश्यों को मैं समझता था इस नाते मैं संविधान का विरोध करता था लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा कि संविधान को पूर्ण रूप से नकारना उचित होगा।

उस दिन प्रीतम से बात करते हुए जब मेरे मुंह से निकला कि मैं संविधान को नहीं मानता तो मेरे स्वयं के वाक्य ने मुझे चिंतन की स्थिति में ले जाकर खड़ा कर दिया और ऐसा इस लिए हुआ क्यों कि ये विचार मेरे मूल विचार नहीं थे। ऐसा लगा कि किसी और के विचार मुझ पर हावी हो रहे हैं। फिर जब इस विषय पर सकारात्मक चिंतन किया तो समझ आया कि मैं इतना कमजोर नहीं कि किसी और के विचार मुझ पर हावी हो जाएं। ये वाक्य जो मेरे मुंह से निकला था उसे यह मानकर सत्य मान लिया कि ये ईश्वर की सोच है और मुझे चलाने वाले, मुझे जन्म देने वाले परमपिता परमेश्वर ने मेरे मन में ये विचार डाला।

आज ऑफिस में बैठे समय कुछ लिख रहा था तभी अचानक मेरी नजर बाबा सत्यनारायण मौर्य की एक कविता पर पड़ी। कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं...

भारत माँ के सब बेटे हैं, सबको माँ का प्यार मिले।
एक रहे कानून व्यवस्था, सबको सम अधिकार मिले॥
जाति भाषा पंथ भेद तो, रूप रंग खुशबू भाई
इन बातों को लेकर ना, इस धरती पर हथियार चले॥
समरस भावों से भारत माँ, पुत्रों तुम्हें निहारती।
वन्दे मातरम् गाकर लो, भारत माँ की आरती॥ 

इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे समझ आया कि सांस्कृतिक आधार पर हमें संविधान की नहीं अपितु सम विधान की आवश्यकता है। ऐसी व्यवस्था जो सभी के लिए समान हो अर्थात भेदभाव रहित व्यवस्था।

इस विषय पर एक अन्य मित्र से चर्चा हुई तो उन्होंने कहा कि नक्सली भी संविधान नहीं मानते तो तुममें और उनमें क्या अंतर है? यदि नक्सली इस विषय को लेकर नक्सली कहे जाते हैं तो मुझे भी नक्सली कहलाने में गर्व होगा।

मित्रों एक बार सोच कर देखिए कि जब ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया तो उसने ऐसा नहीं किया कि अमुख पेड़ से प्राप्त ऑक्सीजन का प्रयोग केवल महिलाएं करेंगी तथा अमुख पेड़ से पुरुष.... इस नदी से प्राप्त जल का प्रयोग केवल 14 वर्ष तक के बच्चे कर सकते हैं।लिखने को ऐसे बहुत से विषय हैं लेकिन इसे संकेत समझ कर एक बार आप भी चिंतन करें कि क्या हम स्वयं को भगवान से भी ऊपर समझने लगे हैं? जब ईश्वर ने कोई भेदभाव नहीं किया तो हम क्यों कर रहे हैं?

आज इसी प्रश्न के साथ......

वन्दे भारती

Wednesday, 5 August 2015

राम मंदिर कब बनेगा?


कल शाम कुछ वामपंथी मित्रों के साथ बैठा हुआ था, उन सभी के साथ चर्चा का विषय था मोदी सरकार का एक साल...जैसा कि वामपंथी परंपरा रही है कि जब उनके पास मूल तथ्य या तार्किक विषय नहीं रहता है तो वो विषय से चर्चा से भटका देते हैं। ऐसा ही कुछ कल भी हुआ, एक मित्र ने कहा कि तुम्हारे राम का मंदिर कब बनेगा?
उनके इस प्रश्न को सुनकर मैं समझ गया कि अब उनके पास कोई तर्क नहीं बचा है...लेकिन उनके प्रश्न ने मुझे ब्लॉग लिखने का एक विषय दे दिया..मैं इस ब्लॉग के माध्यम से राम मंदिर के विषय में अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूं।

प्रश्न था कि तुम्हारे राम का मंदिर कब बनेगा?
मेरे राम का मंदिर तो बना हुआ है, मेरे राम मेरे मन में बसते हैं और मेरे राम का मंदिर पूर्ण रूप से पूर्ण भव्यता के साथ बना हुआ है। जहां तक बात है अयोध्या के राम मंदिर की तो वो मेरे राम का नहीं हमारे राम का मंदिर है। राम जिस दिन मेरे तुम्हारे से हटकर अपने हो गए उसी दिन भव्य राम मंदिर का निर्माण हो जाएगा। दिस राम की मैं वन्दना करता हूं वो राष्ट्रदेव राम हैं। वो राष्ट्रदेव राम एक ऐसे चेतन तत्व हैं जो दुनिया के कण कण में समाए हुए हैं। राम मंदिर के भव्य निर्माण से पहले हमें यह समझना होगा कि राम कौन हैं, राम कोई और नहीं हम स्वयं हैं। जब हमारी आखों के सामने कुछ गलत हो रहा हो और हम उसके खिलाफ संघर्ष करें तो समझ लेना कि राम आ गए और जब हम उसका विरोध न करें तो समझ लेना हम पर रावण हावी हो रहा है।
जब हमारे यहां किसी बच्चे का जन्म होता है तो यही कहा जाता है कि राम को कौशल्या ने जन्म दिया है न कि ये कहा जाता है विश्व गौरव या फलाने ने जन्म लिया है। राम किसी उपन्यास के पात्र नहीं हैं, यदि वह किसी उपन्यास के पात्र होते तो यह नाम कब का मिट गया होता। राम राष्ट्र की संस्कृति के आधार हैं, और इसी लिए जब भारत में किसी का विवाह होता है तो महिलाएं जो गीत गाती हैं उसमें यही कहती हैं कि राम और सीता का विवाह हो रहा है।
हमारे यहां कहा भी गया है कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।




दृष्टि के बदलते ही सृष्टि बदल जाती है, क्योंकि दृष्टि का परिवर्तन मौलिक परिवर्तन है। अतः दृष्टि को बदलें सृष्टि को नहीं, दृष्टि का परिवर्तन संभव है, सृष्टि का नहीं। दृष्टि को बदला जा सकता है, सृष्टि को नहीं। हाँ, इतना जरूर है कि दृष्टि के परिवर्तन में सृष्टिभी बदल जाती है। इसलिए तो सम्यकदृष्टि की दृष्टि में सभी कुछ सत्य होता है और मिथ्या दृष्टि बुराइयों को देखता है। अच्छाइयाँ और बुराइयाँ हमारी दृष्टि पर आधारित हैं।
श्री राम के रूप को लेकर संटों में मटभेद हो सकते हैं कोई सगुण राम को मानता है तो कोई निर्गुण राम को, कोई प्रेम मार्गी है तो कोई अन्य किसी रूप में लेकिन सभी के राम का चरित्र एक जैसा ही है।
हमारे राम का मंदिर मुझे या नरेन्द्र मोदी को नहीं बनाना है वो मंदिर हमें बनाना पड़ेगा। 6 दिसंबर को जब हमारा स्वाभिमान जागा और ढ़ांचा गिराया गया तो एक प्रश्न उठा कि प्रेम की प्रतिमूर्ति श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए आन्दोलन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

इस बात का उत्तर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने बहुत पहले ही दे दिया था। उन्होंने कहा था कि
"शस्त्र नहीं हैं वहाँ.. शास्त्र सिर धुनते और रोते हैं,
ऋषियों को भी सिद्धि तभी मिलती है
जब पहरे पर स्वयं धनुर्धर राम खड़े होते हैं."
मेरे एक पूर्वज ने कहा था कि जो कायर होते हैं उनके देवता भी कायर होते हैं। इसी कारण राम मंदिर टूट गया। जब हमने कायरता धारण की तो बाबर ने हमारे राम का मंदिर तोड़ दिया तब श्री राम भी कुछ नहीं कर पाए और जब हमने कायरता का परित्याग किया तो ढ़ांचा गिर गया। हमने भक्ति योग को तो ध्यान में रखा लेकिन शक्ति का प्रयोग करना भूल गए।
घर में बैठकर राम की पूजा करने से धरती स्वर्ग नहीं बनेगी, धरती को स्वर्ग बनाने के लिए हमें राम के चरित्र को स्वयं में उतारना पड़ेगा। बिना शक्ति के भक्ति का कोई महत्व नहीं रहता।

कुछ लोग कहते हैं कि एक नहीं बनेगा तो क्या हो जाएगा, आज तक 3000 से अधिक मंदिरों को तोड़ कर मस्जिद का निर्माण किया गया लेकिन हम उन 3000 मंदिरों के लिए आंदोलन नहीं कर रहे। हमारी आस्था के आधार मंदिरों में 3 प्रमुख मंदिर आते हैं, एक- अयोध्या का राम मंदिर दूसरा काशी का बाबा विश्वनाथ का मंदिर तथा तीसरा मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि। और इन मंदिरों के लिए नियमित संघर्ष चल रहा है।

मित्रों मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि बाबरी ढ़ांचा गिराकर राष्ट्रवादियों ने मुस्लिमों का अपमान हुआ है। मैं उनसे मात्र एक प्रश्न पूछना चाहता हूं कि हम हजारों सालों से रावण का पुतला जलाते हैं तो उससे नाराज होकर क्या ब्राह्मणों ने कभी कहा कि इससे हमारा अपमान हो रहा है। इस देश का सच्चा मुस्लिम कभी स्वयं को बाबर की औलाद नहीं मान सकता।

राम मंदिर निर्माण के लिए एकजुट हों और सभी मुस्लिम भाइयों से निवेदन है कि राम मंदिर को किसी मजहब से न जोड़ें । राम सिर्फ हिन्दुओं के न होकर इस देश की अस्मिता के आधार हैं।

भगवान राम सिर्फ हिन्दुओं के आस्था के कारण ही भगवान नहीं हैं बल्कि वे अपने कर्मों की वजह से पूजे जाते हैं और, पुरुषोत्तम कहलाते हैं-

  • भगवान राम द्वारा सीता को यह वचन दिया जाना कि मैं अपने जीवन में सिर्फ एक ही विवाह करूँगा, और तुम मेरी एकमात्र पत्नी रहोगी यह दर्शाता है कि वे बहुविवाह के विरोधी थे जो कि उस समय बहुत ही आम बात थी ( आज भी हिन्दुओं में भगवान् राम की तरह एक विवाह की ही मान्यता है)। 
  • जंगल में निषादराज से गले मिलकर भगवान राम ने उंच-नीच की भावना पर कुठाराघात किया और हमें यह सन्देश दिया कि जाति अथवा धन आधारित विभेद नहीं होना चाहिए !, सबरी जो कि एक अछूत जाति से थी उसके हाथों के जूते बेर खा कर उन्होंने जाति या वर्ण व्यवस्था को कर्म  आधारित प्रमाणित कर दिया और हमें यह सन्देश दिया कि मोल व्यक्तियों और उसकी भावनाओं का होता है ना कि उसके कुल या जाति का !
  • जंगल में ही अहिल्या को शापमुक्त कर उन्होंने यह सन्देश दिया कि अनजाने में हुए गलती गलती नहीं कहलाती है और, बेहतर भविष्य के लिए उसे माफ़ कर देना ही उचित है !, बाली वध का सार यह है कि अगर आपका मित्र सही है तो किसी भी हालत में आपको आपके मित्र की सहायता करनी चाहिए और, येन-केन-प्रकारेण पृथ्वी पर से दुष्टों का संहार जरुरी है ताकि सज्जन चैन से जी सकें !, 
  • सीता जी के अपहरण के पश्चात् पहले समुद्र से विनय पूर्वक रास्ता मांगना फिर उस पर ब्रह्मास्त्र से प्रहार को उत्तेजित होना यह दर्शाता है कि शक्तिसंपन्न होने के बाद भी लोगों को अपनी मर्यादा नहीं भुलानी चाहिए.!, समुद्र को मात्र एक बाण से सुखा देने कि क्षमता होने के वाबजूद भी समुद्र पर राम सेतु का बनाना हमें यह सिखाता है कि अगर कम बन जाए तो बिना वजह शक्ति प्रदर्शन अनुचित है और, अपने से कमजोर को ताकत के बल पर अपना पसंदीदा काम करवाना सर्वथा अनुचित है !
  • रावण वध के पश्चात् लक्ष्मण को उसके पास शिक्षा ग्रहण करने को भेजना हमें सिखाता है कि ज्ञान जिस से भी मिले जरुर ग्रहण करना चाहिए और, मनुष्य ये कभी भी नहीं समझना चाहिए कि वो सम्पूर्ण है !, 
  • सीता की अग्नि परीक्षा पर भगवन राम कहते हैं कि ""आज ये सीता की अग्नि परीक्षा अंतिम अग्नि परीक्षा है और, दुनिया में फिर किसी नारी को ऐसी प्रताड़ना नहीं दी जाएगी, मनुष्य को अपनी अर्धागिनी पर विश्वास करना चाहिए क्योंकि माता सीता उतने वर्ष रावण जैसे व्यक्ति के पास रह कर भी पवित्र ही थी !, ठीक उसी प्रकार आधुनिक नारी को भी घर में अथवा बाहर अकेला छोड़ देने के बाद उसकी बातों और उसकी पवित्रता पर विश्वास करना चाहिए क्योंकि, नारी वो शक्ति है जो रावण जैसे नराधम के पार अकेली रह कर भी अपनी लाज की रक्षा करने में सक्षम है !, यदि अग्नि परीक्षा नहीं हुई होती तो नारी की सच्चाई संदिग्ध ही जाती और, वो विश्वास का मामला होता परन्तु अग्नि परीक्षा ने यह साबित कर दिया कि नारी पर शक करने का कोई कारण नहीं है खास कर जब वो आपकी अर्धांगिनी हो !
     
  • एक धोबी के कहने पर भगवान् राम द्वारा माता सीता का परित्याग भगवान राम का राजधर्म था जहाँ उन्होंने माता सीता का परित्याग कर यह सन्देश दिया कि राजा की अपनी कोई ख़ुशी अथवा गम नहीं होना चाहिए !, अगर राज्य का एक भी व्यक्ति भले ही वो एक धोबी जैसा निर्धन, निर्बल ही क्यों ना हो उसका मत भी महत्वपूर्ण है और, उसके राय भी महत्वपूर्ण हैं !, कोई भी काम सर्वसम्मति के करना चाहिए और, सर्वसम्मति बनाने के लिए अगर राजा को अपनी निजी खुशी को यदि बलिदान भी करना पड़े तो राजा को कर देना चाहिए क्योंकि राजा बनने के व्यक्ति खुद का या परिवार का नहीं रह जाता है बल्कि वो राज्य का हो जाता है ! प्रजा की ख़ुशी में ही राजा की ख़ुशी होनी चाहिए और, प्रजा के दुःख में ही राजा का भी दुःख निहित है ! 


भगवान राम के हर काम में हमारे लिए अहम् सन्देश है...! तो कहने का मूल तात्पर्य यह है कि राम के चरित्र को अपनाओ तभी राम राज्य आएगा और उस चरित्र को अपनाने के लिए राम मंदिर का भव्य निर्माण परम आवश्यक है वो भी प्रत्येक नागरिक के सहयोग से।

वन्दे मातरम

Tuesday, 4 August 2015

यूं ही नहीं मैं तिरंगा हो जाता हूं....

'तिरंगा' एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही हर एक भारतवासी के मन में ऊर्जा का प्रवाह एवं संचार बढ़ जाता है। तिरंगे को देखकर स्वतः ही हमारा सिर उसके सम्मान में झुक जाता है और ऐसा इस लिए होता है क्यों कि हमें पता है कि इस राष्ट्रीय ध्वज की संप्रभुता के संरक्षण के लिए देश के क्रातिकारियों ने समर्पण की पराकाष्ठा को पार किया। भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज की अभिकल्‍पना को स्वीकार किया गया।  इसके वर्तमान स्‍वरूप की अभिकल्पना पिंगली वैंकैयानन्‍द ने की थी। प्रत्‍येक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र का अपना एक ध्‍वज होता है जो कि एक संकेत होता है कि अमुख देश स्‍वतंत्र है।  वर्तमान भारतीय राष्‍ट्रीय ध्वज ‘’तिरंगे’’ के नाम से जाना जाता है।


भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की प‍ट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्‍वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्‍य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्‍तंभ पर बना हुआ है। इसका व्‍यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।

समय समय पर इस देश में अनेक ध्वजों को राष्ट्रीय ध्वज माना गया। प्रथम राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।
द्वितीय ध्‍वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्‍वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्‍तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
तृतीय ध्‍वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया । यह ध्‍वज जो वर्तमान स्‍वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। तथापि यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं था और इसकी व्‍याख्‍या इस प्रकार की जानी थी।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा। केवल ध्‍वज में चलते हुए चरखे के स्‍थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्‍वज अंतत: स्‍वतंत्र भारत का तिरंगा ध्‍वज बना।

भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्‍य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है। ध्वज के मध्य में बने धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्‍यु है।

26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया और स्‍वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्‍ट‍री में न केवल राष्‍ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्‍ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते है। बशर्ते कि वे ध्‍वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्‍वज संहिता, 2002 को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्‍थानों आदि के सदस्‍यों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्‍द्रीय और राज्‍य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।

26 जनवरी 2002 विधान पर आधारित कुछ नियम और विनियमन हैं कि ध्‍वज को किस प्रकार फहराया जाए

राष्‍ट्रीय ध्‍वज को शैक्षिक संस्‍थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्‍काउट शिविरों आदि) में ध्‍वज को सम्‍मान देने की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्‍वज आरोहण में निष्‍ठा की एक शपथ शामिल की गई है। किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्‍थान के सदस्‍य द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज का अरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्‍यथा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के मान सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है। नई संहिता की धारा 2 में सभी निजी नागरिकों अपने परिसरों में ध्‍वज फहराने का अधिकार देना स्‍वीकार किया गया है।

इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए। इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता। किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।

तिरंगे से जुड़े सभी विषयों को न सिर्फ समझें अपितु इस परम पवित्र तिरंगे को अपने भावों में, विचारों में, उद्देश्यों में, चरित्र में तथा आत्मा में उतारें।

वन्दे भारती

Saturday, 1 August 2015

हां आप बेच रहे हैं देश....

हां मैं करता हूं इन 'डे' का विरोध
कल शाम को स्टेशनरी की एक दुकान पर एक पेन लेने के लिए जाना हुआ। वहां जाकर कुछ अलग लग रहा था.... उस दुकान पर भीड़ कुछ ज्यादा ही लग रही थी और उस भीड़ का एक बड़ा हिस्सा कार्ड के सेक्शन में दिख रहा था। नोएडा की संस्कृति कुछ ऐसी है कि रक्षाबंधन तथा दीपावली पर भी कार्ड दिए जाते हैं। लेकिन रक्षाबंधन तथा दीपावली में अभी बदुत समय था, दिमाग पर थोड़ा जोड़ डाला तो ध्यान आया कि दो दिन बाद फ्रेंडशिप डे है।




पूरी शिद्दत से निभाई मित्रता
अगस्त माह के प्रथम रविवार को युवा वर्ग द्वारा ‘फ्रेंडशिप डे’ मनाया जाता है । इस वर्ष 2 अगस्त को ‘फ्रेंडशिप डे’ मनाया जाएगा । फ्रेंडशिप डे के नाम पर इस दिन मित्रों को प्रीतिभोज देना, मैत्री के प्रतीक के रूप में एक-दूसरे के हाथ में फ्रेंडशिप बैंड बांधना आदि घटनाएं भारी मात्रा में होती हैं । विद्यालय एवं महाविद्यालयों में इसका प्रमाण लक्षणीय है । क्या वास्तव में कोई एक बैंड बांधकर मैत्री में वृद्धि होती है ? एक-दूसरे को संकट के समय सहायता करने एवं मित्र का कदम अयोग्य दिशा से जाते समय उसे सहायता करने को खरी मैत्री कहते हैं । एक-दूसरे को अड़चन के समय सहायता करने के अनेक उदाहरण हिन्दुओं के प्राचीन इतिहास में देखने को मिलते हैं, जिसमें एक है श्रीकृष्ण-सुदामा ! परंतु वर्तमान समय के युवा पाश्‍चात्त्य सभ्यता के अधीन जाकर ऐसी मैत्री का केवल प्रदर्शन करने में बड़प्पन मानते हैं । वास्तव में राष्ट्र पर जब संकट छाया हो, तो ऐसे बेकार दिन मनाने की अपेक्षा सभी मित्रों के साथ बैठकर राष्ट्र के वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा करना ज्यादा उचित लगता है।

मित्रों के साथ बैठकर शराब के पेग बनाना और उस के बाद दिल की बातों के नाम एक दूसरे को गालियां देना और भी बहुत सारी हरकतें करना मुझे व्यक्तिगत रूप से उचित नहीं लगता। लेकिन ‘फ्रेंडशिप डे’ का विरोध मैं मात्र इस लिए नहीं करता क्यों कि इससे हमारा सांस्कृतिक क्षरण होता है...इस प्रकार के सभी तथाकथित उत्सवों के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है....
हमने तो कभी बैंड नहीं बांधे...

"एक ग्रीटिंग कार्ड बनाने वाली कंपनी 'Hallmark Cards' के मालिक 'जॉइस सी॰ हॉल' द्वारा 1910 में अपनी कंपनी में ग्रीटिंग की बिक्री बढ़ाने के लिए एक दिन बनाया गया, जिसे 'Friendship-Day ' का नाम दिया गया और आज स्पष्ट रूप से बधाई कार्ड को बढ़ावा देने के लिए एक वाणिज्यिक नौटंकी को पूरी दुनिया (खासकर एशियाई देश) मना रही है..!" Friendship-Day (मित्रता-दिवस) अमेरीकी कंपनियों द्वारा शुरू किया गया 'व्यावसायीकरण' का एक विपणन (Marketing) नाटक है..!
भारतीयों के इसी उतावलेपन का फायदा उठाकर कंपनियां 'चॉकलेट-डे', 'टेडी-डे', 'फादर्स-डे', 'मदर्स-डे', 'वेलेन्टाइन-डे, आदि फालतू के दिनों को व्यावसायीकरण के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं..! दुनिया हमारी अच्छाइयों को पेटेंट कर रही है और हम उनके त्यागे हुए मूल्यों को अपने जीवन में उतार रहें हैं..! ऐसा लगता है कि भारतीयों के जीवन में समय की इतनी कमी होने लगी है कि उन्हें 'फ्रेंडशिप-डे' का सहारा लेना पड़ रहा है..!
साथ हों या न हों लेकिन वो यादें तो हैं

मैं इन तमाम 'डे' का विरोध लाठी लेकर नहीं करता..! मेरा बस इतना कहना है कि मित्रता का व्यवहार हो, मित्रता का व्यापार नहीं..! प्यार का सम्मान किया जाए, प्यार का व्यापार नहीं..! मित्रता को, प्यार को हम किसी एक विशेष
दिन की परिधि में न बाँधेँ..! मेरे इस पोस्ट को अन्यथा न लिया जाए, मैं सिर्फ मित्रता तथा प्यार जैसे रिश्तोँ के व्यवसायीकरण का विरोध करता हूँ..!

ऐसे तमाम डे का प्रचार-प्रसार करके विदेशी कंपनियाँ और उनके दलाल इस देश से अरबों रुपये लूट कर हर साल ले जाते हैं, जिससे इस देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है..! इन तमाम डे को मनाने के चक्कर में हमारे देश का युवा-वर्ग 'गिफ्ट तथा कार्ड' पर अपने पैसे को बर्बाद कर रहा है और विदेशी बनियोँ (व्यवसायियों) के हाथों को मजबूत कर रहा है, जो कहाँ तक उचित है..!

हमें इन अंतर्राष्ट्रीय साजिशों को भी समझना चाहिए..! हो सकता है कि आपको सांस्कृतिक क्षरण से कोई फर्क न पड़ता हो लेकिन मुझे पता है कि आप देश को बेचने में आप सहयोग नहीं करेंगे...

"वन्दे-मातरम्"
वन्दे भारती

Friday, 31 July 2015

हां मैं पत्रकार हूं, और राष्ट्रवादी हिन्दू भी...

आज मेरे पास एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय का फोन आया, संभवतः उन्होंने मेरा मोबाइल नंबर फेसबुक से लिया होगा (उनकी बातों से अनुमान लगाया)। उन्होंने मुझसे पहला प्रश्न पूछा कि विश्व गौरव जी आपने अपना फेसबुक पेज कब बनाया था। मैनें उनसे कहा महोदय पहले अपना परिचय दीजिए..तब उन्होंने कहा कि वो एक निजी चैनल में वरिष्ठ पत्रकार हैं...इतना बताने के बाद उन्होंने फिर से अपना प्रश्न दोहरा दिया...उनके प्रश्न को सामान्य रूप से लेते हुए मैंने बताया कि 6 साल पहले बनाया था...मेरे जवाब देने के बाद वो बोले अच्छा अच्छा उस समय छात्र जीवन में रहे होंगे...मैंने कहा हां...तो उन्होंने कहा विश्व गौरव जी अब तो आप व्यावसायिक जीवन में आ चुके हैं फेसबुक पेज का नाम तो नहीं बदल सकता लेकिन फेसबुक प्रोफाइल से राष्ट्रवादी शब्द हटा दीजिए...उनके इतना कहते ही मुझे उनके पूरा विषय समझ आ गया दरअसल में उनके अन्दर मेरे पेज पर मेरे नाम के साथ राष्ट्रवादी हिन्दू देखकर सेक्लुरिज्म का कीड़ा जाग उठा था। 



मित्रों जब मैंने वो फेसबुक पेज बनाया था उस समय मेरी उम्र 18 साल थी लेकिन इस का मतलब ये नहीं मैंने राष्ट्रवादी हिन्दू शब्द का प्रयोग भावावेश में किया था। मैंने पूरे विवेक के साथ उस शब्द को अपने नाम के साथ जोड़ा था। मैंने उन पत्रकार महोदय से 1 घंटे तक बात की तब वो मेरे विषय से सहमत हुए। मुझे लगा कि ऐसे विषय पर ब्लाग लिखना चाहिए जिससे कि यदि कोई मुझे ऐसी राय दे तो मैं अपना समय व्यर्थ नष्ट न करते हुए अपने ब्लॉग का लिंक देकर अपना विषय स्पष्ट कर सकूं।

मित्रों मेरे लिए राष्ट्रवादी और हिन्दू दोनों शब्दों के मायने थोड़े अलग हैं... भारत के अतरिक्त किसी भी अन्य देश का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह देशभक्त नहीं हो सकता। राष्ट्रवाद की मूल परिकल्पना को समझने के लिए देश, राज्य तथा राष्ट्र की परिकल्पना को अलग अलग समझना आवश्यक है। 
देश एक भौगोलिक ईकाई है तथा राज्य देश का राजकीय अथवा शासकीय घटक है । देश मे एक अथवा एक से अधिक राज्य भी हो सकते है । जबकि राष्ट्र एक सांस्कृतिक ईकाई है , जिसके लिए मात्र भूमि ,लोगो ,एवं शासन पर्याप्त नहीं है अपितु सांस्कृतिक एकता की अनुभूति आवश्यक है । देश राष्ट्र के शरीर का एक भाग हो सकता है ,जबकि संस्कृति राष्ट्र की आत्मा है । राष्ट्र स्थिर व चिरंतर है जबकि राज्य अस्थिर हो सकता है अथवा बदल भी सकता है । 

अपने देश एवं उनकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , उसकी सुरक्षा एवं समृद्धि के प्रति जिसकी अव्यभिचारी एवं एकांतिक निष्ठा हो वही लोग राष्ट्रीय अथवा राष्ट्रवादी कहे जाते हैं। 

मैंने अभी लिखा कि भारत के अतरिक्त किसी भी अन्य देश का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता वो इस लिए क्योंकि किसी भी अन्य देश के पास उनकी स्थायी संस्कृति ही नहीं है। इस लिए वो अपनी भौगोलिक ईकाई के प्रति समर्पित तो हो सकते हैं लेकिन उनसे राष्ट्रवादी होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। मेरे लिए भौगोलिक संरक्षण से अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संरक्षण है, क्योंकि मुझे पता है कि परम पवित्र भारतवर्ष का आधार यहां की संमृद्ध संस्कृति है ।

ये विषय तो हो गया राष्ट्रवादी शब्द के मूल भाव का अब विषय आता है हिन्दू शब्द का....

हमारे पौराणिक ग्रन्थों में कहीं हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म का उल्लेख नहीं है।पुराणों में कर्इ कथाएं हैं, पर किसी कथा में हिन्दू धर्म की व्याख्या नहीं की गयी है। रामायण और महाभारत संसार के वहृततम और श्रेष्ठतम महाकाव्य है, जिनके महानायक राम और कृष्ण हैं, किन्तु इनकी महता देवताओं के रुप में नहीं की गयी हैं। इन्हें विष्णु का मनुष्य रुप में अवतार माना गया है। भग्वदगीता को धर्म का चश्मा उतार कर पढ़ने से इसमें छुपा हुआ गूढ आध्यात्मिक अर्थ समझ में आता है। भग्वद गीता धर्म, दर्शन और आध्यात्म का अनुपम ग्रन्थ है, जो हमारी राष्ट्रीय निधि  है। शताब्दियों पूर्व लिखा गया यह ग्रन्थ विश्व का पहला और अंतिम ऐसा ग्रन्थ हैं, जैसा न कभी लिखा गया था और न लिखा जायेगा। किन्तु गीता के किसी श्लोक में हिन्दू, हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व की व्याख्या नहीं की गयी है।

हिन्दू और हिन्दुत्व शब्द को सियासत मे लपेट कर जो व्याख्या की जा रही है, वह जानबूझ कर वातावरण को विषाक्त करने का प्रयास है। हमारा राष्ट्र भारत था, भारत है और भारत ही रहेगा। मुगलो ने इसे हिन्दुस्तान बनाया और अंग्रेजों ने इंड़िया। अंग्रेज इंड़िया में रहते थे, किन्तु अपने आपको ब्रिटिश कहते थे, किन्तु मुगल हिन्दुस्तानी कहते थे, क्योंकि हिन्दुस्तान को ही वे अपना मुल्क मानते थे। उन्हें हिन्दू शब्द से न तो घृणा थी और न ही इस विशेषण को अपनी पहचान के आगे लगाने से अपने आपको अपमानित महसूस करते थे। पाकिस्तान बनने के पहले सारे मुसलमान हिन्दुस्तानी मुसलमान कहलाते थे, किन्तु अब वे पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी कहलाते हैं। स्पष्ट है, हिन्दु धर्म नहीं, पहचान है, फिर इसे धर्म से क्यों जोड़ा जा रहा है ?

हमारी संस्कृति शांति और सहिष्णुता का पाठ पढाती है। हमने तलवार के बल पर नहीं, दिलों को जोड़ कर दुनिया जीती हैं । पूरी दक्षिण -पूर्वी ऐशिया में हज़ारों वर्षों से हमारी सांस्कृतिक विरासत आज भी अक्षुण्ण हैं। हमने हिंसा से नहीं, शांति के पाठ से संसार को बोद्धमय बनाया। कभी खून खराबे से दुनिया को जीतने की योजनाएं नहीं बनायी। इतिहास गवाह है कि जो तलवार ले कर दुनिया फतह करने निकले थे, वे मिट गये, किन्तु हमारी धर्म पताका विश्व में आज भी फहरा रही है।

सामान्य शब्दों में यदि समझें तो अटक से कटक तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति जो गाय, गंगा ,गीता और गायत्री का सम्मान करता है भले ही वह किसी भी पूजा पद्धति को मानता हो, हिन्दू है।जो व्यक्ति श्री राम की मूर्ति के सामने बैठकर पूजा करता हो किन्तु गायत्री के रहस्य को न जानता हो वह हिन्दू नहीं हो सकता और जो भले ही नमाज अदा करता हो लेकिन गंगा की पवित्रता को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हो वह हिन्दू है।

राष्ट्रवादी तथा हिन्दू शब्द की मूल परिकल्पना को यदि हमने समझकर स्वीकार कर लिया तो निश्चय ही हमारी 90 प्रतिशत समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

वन्दे भारती

Monday, 27 July 2015

"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"

विदेशी कंपनियों से सामान खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से देश बेचने वाला व्यक्ति पूछता है
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*दीवार पर पेशाब करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*बिजली चोरी करता व्यक्ति पूछता है, "अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*यहाँ-वहाँ कचरा फैंकता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*कामचोर कर्मचारी पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*टेक्स चोरी करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*नौकरी पर देरी से व जल्दी घर दौड़ता कर्मचारी पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*लड़कियों से छेड़खानी करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?
"वंदे मातरम् के समय बातें करते स्कूलों के कुछ लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"

*स्कूल में बच्चों को न भेजने वाले लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*सड़क पर रेड सिग्नल तोड़ते लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*किताबों से दूर भागते विद्यार्थी पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*कारखानों में हराम खोरी करते लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे........!!

अच्छे दिन आएंगे लेकिन उनको लाने वाले पीएम साहब नहीं होंगे....हम अगर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और अपने जीवन में प्रत्येक काम यह सोचकर करेंगे कि मेरे प्रत्येक कार्य से देश पर प्रभाव पड़ रहा है, तो निश्चित ही अच्छे दिन आ जाएंगे। सड़क पर कचरा नरेन्द्र मोदी नाम का व्यक्ति नहीं फेंकता है, अपने बच्चों को यो-यो टाईप नरेंद्र मोदी नहीं बनाता....हमें करना होगा स्वयं में परिवर्तन यदि हम वास्तव में अच्छे दिनों की परिकल्पना को साकार करना चाहते हैं तो....

वन्दे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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