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Monday, 7 November 2016

रवीश जी! आपातकाल की बगिया में 'बहार' देखे थे?

प्रिय रवीश जी,
नमस्ते

‘खुला खत’ के माध्यम स संवाद करने की आपकी शैली का मैं पुराना प्रशंसक हूं। आज सोचा कि आपसे आपकी ही शैली में बात करूं… मैं यह बिलकुल नहीं कहता कि सरकार द्वारा किसी भी मीडिया संस्थान पर प्रतिबंध लगाना उचित है। लेकिन मुझे लगता है कि प्रतिबंध और दंडात्मक कार्रवाई के बीच के अंतर को समझने की जरूरत है। यह पूरा मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। मुझे पूरा विश्वास है कि आप देश की न्यायव्यवस्था पर पूरा विश्वास रखते हैं। कोर्ट का जो भी फैसला होगा, वह सभी को स्वीकार्य होगा। मैं इस बहस में नहीं पड़ूंगा कि एनडीटीवी की रिपोर्टिंग गलत थी या सही। इस बात का फैसला कोर्ट करेगा। यदि वह रिपोर्टिंग गलत थी तो निश्चित ही दंड मिलना चाहिए, लेकिन वह दंड उन सभी मीडिया संस्थानों को मिलना चाहिए, जिन्होंने कुछ ऐसी ही रिपोर्टिंग की थी। मेरा मुद्दा कुछ और है, आपने अपने हालिया प्राइम टाइम शो में देश की स्थिति को आपातकाल जैसा बताया।

vishva gaurav
वर्तमान स्थिति को आपातकाल जैसा बताकर आप जताना क्या चाहते हैं? चलिए आपको इंदिरा जी के काल के समय वाले ‘आपातकाल’ की याद दिलाता हूं। वैसे तो आप मुझसे बहुत बड़े हैं, 1975 के आपातकाल के पहले आपका जन्म भी हो चुका था तो निश्चित है जिनसे आपने उस समय को जाना होगा, उनकी स्मृतियां उन लोगों से ज्यादा अच्छी रही होंगी जिनसे मैंने आपातकाल को जाना है। लेकिन फिर भी जितना पढ़ा है, और जितना सुना है उसे आपकी स्मृति में पुनर्स्थापित करके ‘आपातकाल’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करना चाहता हूं।

लोकतंत्र सत्याग्रही जितेंद्र अग्रवाल इंदिरा के आपातकाल को कभी न भूलने वाली त्रासदी कहते हैं। उनके मुताबिक, ‘उसमें न कोई दलील थी और न कोई सुनवाई, सीधे जेल भेज दिया जाता था। लोगों को घरों से पकड़ कर उनकी नसबंदी कर दी जा रही थी। लिहाजा तमाम लोग डर और दहशत से खेतों में छुप कर दिन बिता रहे थे। जिसने भी इस काले कानून के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की उसे पकड़ कर जेल में ठूंस दिया जा रहा था।’

आगरा शहर के पुरुषोत्तम खंडेलवाल और अशोक कोटिया कई महीने जेल में बंद थे और उनके मुताबिक, ‘आपातकाल के दौरान जेलों में सीवर की कोई व्यवस्था नहीं थी और मीसा में बंद कैदियों के शौचालयों में दरवाजे नहीं होते थे। उनके गुप्तांगों में पेट्रोल डाल दिया जाता था, पेचकस और प्लास द्वारा नाखूनों को उखड़ा जाता था।’

महाराष्ट्र से विधायक एवं समाज सेवी मिडाल गोरे को अकोला जेल में चूहों से भरे सेल में रखा गया था। उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी मालती चौधरी को गिरफ्तार कर मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के साथ वाली सेल में रखा गया। अरे साहब! कल्पना करिए उस आपातकाल की जब बेंगलुरु में एक गर्भवती महिला कार्यकर्ता श्रीमती नर्सम्या गरुयप्पा को जंजीरों में बांधकर रखा गया था।

आपातकाल वह था जिसमें सरकार की तानाशाही नीतियों के कारण महंगाई दर 20 गुना बढ़ गई थी। आप तो बड़े आराम से तथाकथित आपातकाल में सरकार पर ‘कटाक्ष’ कर ले रहे हैं लेकिन साहब याद करिए, वह समय जब रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर देश में न पहुंचे इसलिए, दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के कार्यालयों की बिजली रात में ही काट दी गई।

उस दौर के सूचना प्रसारण मंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को हटाकर विद्या चरण शुक्ला को नई जिम्मेदारी दी गई, जिन्होंने फिल्मकारों को सरकार की प्रशंसा में गीत लिखने-गाने पर मजबूर किया, ज्यादातर लोग झुक गए, लेकिन किशोर कुमार ने आदेश नहीं माना। उनके गाने रेडियो पर बजने बंद हो गए-उनके घर पर इनकम टैक्स के छापे पड़े। अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सी कुर्सी का’ को सरकार विरोधी मानकर उसके सारे प्रिंट जला दिए गए। गुलजार की आंधी पर भी पाबंदी लगाई गई। उस समय कई अखबारों ने मीडिया पर सेंसरशिप के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, पर उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया गया। उस समय देश के 50 जाने माने पत्रकारों को नौकरी से निकलवाया गया, तो अनगिनत पत्रकारों को जेलों में ठूंस दिया गया।

आपातकाल के बारे में कहने के लिए और भी बहुत कुछ है लेकिन आपने तो आपातकाल की परिभाषा ही बदल दी। आप तो खुद ही आपातकाल घोषित करके अपने चैनल की स्क्रीन काली कर देते हैं। आपको सवाल पूछने से कोई नहीं रोक रहा, यदि कोई रोकता है तो वह आप पर नहीं बल्कि पूरी मीडिया पर हमला कर रहा है। मीडिया के प्रति अथॉरिटी की जवाबदेही होनी चाहिए लेकिन साहब मीडिया की भी आम जनता के प्रति जवाबदेही बनती है। ‘दादरी’ पर आपके चैनल ने खूब ‘विलाप’ किया था और उसके बाद ‘मालदा’ पर मुंह में दही जमा लिया था, तब कहां गई थी जवाबदेही? आपके चैनल के ऑफिस में हजारों लोगों ने सवाल पूछे, सोशल मीडिया पर आपके चानल से सवाल पूछे गए लेकिन तब तो सवाल पूछने वाले ‘गुंडे’ हो गए थे, तब तो उनसे कहा जाता था कि हमारा चैनल है और हमारा जो मन करेगा वह दिखाएंगे।

एक मिनट, कहीं ऐसा तो नहीं था कि उस दिन एक अरनब गोस्वामी, एक दीपक चौरसिया, एक रोहित सरदाना ने आपको अपनी टीवी की स्क्रीन काली करने पर मजबूर कर दिया था?  नीरा राडिया और बरखा दत्त, 26/11 के दौरान एनडीटीवी की रिपोर्टिंग इत्यादि ऐसे आपके एनडीटीवी से जुड़े बहुत से ‘कांड’ हैं, जिन पर लिखने लगूंगा तो समय कम पड़ जाएगा। आज आपको और आपके साथियों को लगता है कि मीडिया का एक तबका खुद न्यायालय बनकर किसी को भी आरोपी से दोषी बना देता है लेकिन साहब, आप भी उनसे अलग कहां हैं, इशरत जहां और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की अपने चैनल की रिपोर्टिंग और याद करिए, आपने भी तो टीवी स्टूडियो में इशरत को मासूम, निर्दोष और शहीद करार दिया था।

खैर छोड़िए यह सब, मुझे बस इतना बता दीजिए कि यदि एक लोकतांत्रिक देश में, जहां हजारों अखबार, चैनल और तमाम संचार माध्यम मौजूद हों, वहां अगर एक कोई भी मीडिया संस्थान कुछ गलत करे, कुछ ऐसा करे जो किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं अपितु पूरे देश के लिए घातक हो, तो ऐसे में उस संस्थान के साथ क्या किया जाना चाहिए? क्या ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर उसे दंड नहीं मिलना चाहिए? संभव है कि आपको ‘गलत’ शब्द की व्याख्या की आवश्यकता पड़े? सीधे शब्दों में हर वह चीज गलत है जो राष्ट्रहित में ना हो, जनहित में ना हो?

मैं मीडिया की स्वतंत्रता के साथ हूं लेकिन वह स्वतंत्रता किसी विशेषाधिकार के साथ नहीं होनी चाहिए। जितनी स्वतंत्रता इस देश के अंतिम व्यक्ति को है, उतनी ही मीडिया को भी।

निश्चित ही अथॉरिटी की जवाबदेही मीडिया के प्रति होनी चाहिए लेकिन साथ ही मीडिया की जवाबदेही भी जनता के प्रति, देश के प्रति होनी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने पर जिस तरह से एक आम नागरिक दंड का अधिकारी है, वैसे ही मीडिया भी। फिर चाहे वह मीडिया संस्थान कोई भी हो।

आपका यह कहना है कि जिस अपराध के लिए NDTV इंडिया को सज़ा दी जा रही है, वह अपराध दूसरे चैनलों ने भी किया है बल्कि रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता तक ने वे बातें उजागर की थीं जो आतंकवादियों के काम की हो सकती थीं। (पढ़ें यह ब्लॉग ) यदि यह सच है तो यह वाकई भेदभाव है जो कि नहीं होना चाहिए। लेकिन यह सच है या नहीं, इसका फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया जाए। मैं अपने इस ब्लॉग में केवल इतना कहना चाहता हूं कि यदि कोई मीडिया संस्थान – कोई भी मीडिया संस्थान चाहे वह सरकार समर्थक हो या सरकार विरोधी –  राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने का अपराध करता है तो उसे सज़ा मिलनी ही चाहिए। किसी एक मीडिया संस्थान पर सिर्फ इसलिए कार्रवाई की जाए कि वह सत्ता या किसी खास विचारधारा का आलोचक रहा है  और दूसरे को छोड़ दिया जाए कि वह सत्ता या किसी खास विचारधारा का समर्थक है तो विश्वास मानिए देश का कोई भी पत्रकार जो अपनी जिम्मेदारी से समझौता नहीं कर सकता, वह सत्ता के अहंकार को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।
धन्यवाद

Tuesday, 9 August 2016

बरखा जी! आप पहले भारतीय हैं या पत्रकार?

बरखा जी नमस्ते,
आशा है राष्ट्रवाद और निष्पक्षता की बहस को नए आयाम देने के लिए आपका अध्ययन जारी होगा। मैडम, हाल ही में आपके द्वारा की गई फेसबुक पोस्ट को पढ़ा। उसे पढ़कर मन में एक सवाल उठा कि आप और आपके कुनबे के लोग पहले भारतीय हैं या पत्रकार? आपको शर्म आती है क्योंकि एक पत्रकार स्वयं को पहले भारतीय कहता है। लेकिन आपको पता है, मुझे गर्व होता है कि मैं उस पेशे से जुड़ा हूं जहां ऐसे लोग हैं जो राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हैं। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है और वह लोकतंत्र, भारत का लोकतंत्र है। आखिर क्यों हम ‘भारतीय पत्रकार’ नहीं हो सकते?
मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हाफिज सईद जैसा कोई आतंकवादी आपको जानता है। आप बड़ी पत्रकार हैं, स्वाभाविक है कि सभी तरह के लोग आपको जानते होंगे। अब आप अपने पीएम साहब को ही ले लीजिए, उनको भी तो हाफिज सईद जानता है। इसमें इतना हो-हल्ला मचाने वाली क्या बात है। मोहतरमा, समस्या यह नहीं है कि आपको हाफिज सईद जानता है। समस्या यह है कि वह कहता है, ‘भारत में एक तबका ऐसा है जो पाकिस्तान के खिलाफ जहर उगलता है, लेकिन वहां बरखा दत्त जैसे अच्छे लोग भी शामिल हैं। कांग्रेस में भी अच्छे लोग हैं जिन्होंने कहा है कि पाकिस्तान पर इल्जाम लगाने की जगह अपने अंदर झांककर देखना चाहिए।’ मुझे पता है आप भी उससे उतनी ही नफरत करती हैं जितनी मैं करता हूं लेकिन अगर आपको वह ‘अच्छा’ समझता है तो जाहिर है उसको आपसे कुछ तो सकारात्मक ऊर्जा मिलती ही होगी। आपके ‘कर्मों’ से वह एक सीमा तक आपको स्वयं के करीब पाता होगा। तो अब अगर एक आतंकवादी, जिसे आप जेल में देखना चाहती हैं, वह अगर आपको अपने नजरिए से अच्छा कहता है तो क्या आपको अपने ‘कर्मों’ पर चिंतन नहीं करना चाहिए?
आपको समस्या इस बात से है कि एक पत्रकार, सरकार को उपदेश देता है कि मीडिया के कुछ धड़ों को बंद कर देना चाहिए। तो महोदया, क्या बुराई है इसमें? क्या जब कोई नेता कुछ गलत और असंवैधानिक काम करता है तो अन्य नेता उसके विरोध में आ ही जाते हैं। हालांकि तब भी नेताओं का एक छोटा सा वर्ग गलत का समर्थन करता है क्योंकि वह स्वयं गलत होता है और उसे पता होता है कि अगर वह चुप रहा और उसके ‘साथी’ के साथ कुछ हुआ तो उसका निपटना भी तय है। और वैसे ही आपके साथ, आपके समर्थन में, आपकी ‘कैटिगरी’ के लोगों का आना स्वाभाविक है। आप और आपके साथी कश्मीर में जनमत संग्रह की बात करते हैं ना? तो एक बार अपने विचारों पर भी जनमत संग्रह करा लीजिए। मुझे पता है कि आप लोग ऐसा नहीं करा सकते क्योंकि हर रोज अपने ट्वीट्स, फेसबुक पोस्ट्स इत्यादि पर आपको जिस तरह से आम जनता गाली देती है, उससे आपको अंदाजा हो गया है कि देश क्या चाहता है।
अब जब आपको यह पता है कि देश आपको नकार चुका है तो फिर क्यों वैश्विकता और समानता के नाम पर भारत विरोध का झुनझुना लेकर घूमते रहते हैं? और जब आप लोगों से इन सारे विषयों पर बात करो तो आप लोग कहते हो कि मोदी, पाकिस्तान से नजदीकियां क्यों बढ़ा रहे हैं? मुझे भी एनडीए सरकार आने के बाद ये चीजें नहीं भा रही थीं और मेरी पीड़ा भी आपसे ज्यादा बड़ी थी क्योंकि मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में मेरी भी ऊर्जा लगी थी। लेकिन जब शांत मन से इस विषय पर सोचा तो सरकार जो कर रही है, उससे ज्यादा बेहतर कोई अन्य रास्ता नहीं दिखा। और अगर इससे बेहतर रास्ता आपके पास है तो दीजिए… मैं, आप और हम सब एक नए विकल्प के तौर पर सरकार के सामने आपके उस ‘रास्ते’ को रखेंगे। लेकिन आप रास्ता देंगे कहां से, आपको तो सिर्फ सरकार पर उंगली उठाना आता है।
मोहतरमा, अरनब ने तो आपका नाम कभी नहीं लिया, लेकिन उन्होंने जिन ‘ऐंटी नैशनलिस्ट जर्नलिस्ट्स’ की बात की थी, आप और आपके साथी खुद उस कैटिगरी में जाकर खड़े हो गए। बार-बार के झंझट से बचने के लिए मैं, आप और आपके समर्थकों के लिए सिर्फ 4 सवाल छोड़ रहा हूं। अगर आपकी संवाद क्षमता शून्य के स्तर तक न पहुंची हो तो सिर्फ इनका विस्तृत जवाब दे दीजिए और बाकी देश पर छोड़ दीजिए, देश स्वयं आपका और आपकी विचारधारा का स्तर तय कर लेगा।
1. कश्मीर पर देश के प्रधान को क्या करना चाहिए?
2. पाकिस्तान पर देश की सरकार को क्या करना चाहिए?
3. आप निष्पक्ष हैं या तटस्थ?
4.आप पत्रकार पहले हैं या भारतीय?
सरकार की नीतियों पर उंगली उठाना बहुत आसान होता है लेकिन इन सबके बीच काम करना उतना ही मुश्किल हो जाता है। मैं यह नहीं कह रहा कि मोदी सरकार सब कुछ अच्छा कर रही है लेकिन इतना तो कह सकता हूं कि पूर्व की तुलना में बहुत कुछ अच्छा हो रहा है। और जो नहीं हो रहा है उसे करवाने का काम एक जिम्मेदार व्यक्ति होने के नाते मेरा और आपका है। लेकिन इसके लिए लानी होगी सकारात्मक सोच, जिसका आधार भारतीयता हो। मेरे सिर्फ चार सवाल हैं, और जो व्यक्ति पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हो कि वह आपके कुनबे का वैचारिक प्रतिनिधित्व करता है… आए और इन सवालों के जवाब दे…
विश्व गौरव को ट्विटर पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

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