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Sunday, 25 December 2016

क्या आप अपने 'सिकुड़ते' मन में 'संजय' को खोजेंगे?

दिल्ली में ठंड का कहर शुरू हो गया है। इस कड़कड़ाती ठंड में सुबह 6 बजे उठकर 7 बजे ऑफिस के लिए निकलना बेहद मुश्किल लगता है लेकिन ऑफिस तो जाना ही है। आपके साथ भी ऐसा ही होता होगा ना? हमारे पास ना कपड़ों की कमी है और ना सुविधाओं की लेकिन इस देश में, इस दिल्ली में लाखों की संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो इस रूह कंपा देने वाली ठंड में इसलिए जिंदा नहीं रह पाते क्योंकि उनके पास रहने का कोई ऐसा ठिकाना ही नहीं है जहां वे इस ठंड से लड़ सकें। रहने का ठिकाना छोड़िए, उनके पास तो पहनने के लिए कपड़े तक नहीं हैं। रात में सड़क के किनारे सो जाने वाले इन लोगों को तो यह तक नहीं पता होता कि अगली सुबह की रोशनी वह देख भी पाएंगे या नहीं।

हम क्या कर सकते हैं? अगर आपके मन में यह सवाल आया है तो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि आप बहुत कुछ कर सकते हैं। लगातार ठंड से मरने वालों के दर्द को महसूस करके उनके लिए कुछ करने वाले हमारे आपके बीच बहुत से लोग हैं। आज इस ब्लॉग के माध्यम से ऐसे ही एक लड़के के बारे में आपको बताने वाला हूं, जो पिछले 4 सालों से सड़क के किनारे रहने वालों को ठंड से लड़ने के ‘हथियार’ उपलब्ध करा रहा है। उम्मीद है कि एक बार दिल से आप भी उन गरीबों का दर्द महसूस करेंगे और इस लड़के से प्रेरणा लेकर ऐसा ही कुछ करेंगे।
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25 वर्षीय संजय तिवारी नाम का यह लड़का पिछले 4 सालों से लगातार ठंड के दिनों में स्वेटर कलेक्शन की एक मुहिम चलाता है। सोशल मीडिया के माध्यम से संजय लोगों से अपने पुराने ऊनी कपड़े मांगता है और रात में ठंड से ठिठुरते लोगों तक उन कपड़ों को पहुंचाता है। अस्पतालों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों के आसपास रात गुजारने वाले इन लोगों को पिछले साल यानी 2015 में संजय ने 15000 से अधिक गर्म कपड़े डोनेट किए।
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संजय की इस मुहिम में बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो दिल्ली से काफी दूर हैं और आर्थिक सहयोग के जरिए वे इस काम में मदद करते हैं। संजय उन पैसों  से कंबल इत्यादि खरीदकर लोगों तक पहुंचाते हैं। संजय ने 4 साल पहले जब इस मुहिम को शुरू किया था तो उनके साथ सिर्फ उनकी एक दोस्त थी लेकिन आज उनकी टीम बहुत बड़ी हो गई है। संजय का कहना है कि उनकी यह कोशिश ठंड में बने रिश्तों को गर्माहट देने के लिए है। संजय की इस मुहिम से अब दिल्ली के कई एनजीओ भी जुड़ चुके हैं। वह अनेकों स्थानों पर ठंड के दौरान कलेक्शन बॉक्स रखते हैं और लोगों से अपने पुराने कपड़ों को उसमें डालने का निवेदन करते हैं।

हाल ही में दिल्ली के शास्त्री नगर स्थित जेडी फूड कोर्ट के संचालक जतिन ने भी संजय की मदद के लिए अपने फूड कोर्ट के बाहर एक ड्रॉप बॉक्स रखा है। जतिन के अलावा बहुत से लोग हैं जो उनकी मुहिम में उनका साथ दे रहे हैं। हर शाम कनॉट प्लेस के आस-पास संजय आपको गर्म कपड़े कलेक्ट करते हुए मिल जाएंगे। आज बस आपसे इतना ही निवेदन है कि अगर आप दिल्ली में हैं तो संजय या उनके जैसी मुहिम चलाने वालों के साथ मिलकर कुछ अच्छा करें। संजय और उनकी मुहिम से जुड़ी डिटेल्स आपको यहां क्लिक करके मिल सकती हैं। और अगर आप दिल्ली के बाहर हैं तो ठंड में ठिठुरते लोगों के दर्द को महसूस करके अपने अंदर के ‘संजय’ को खोजिए। आपकी छोटी सी कोशिश किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकती है, किसी की जिंदगी बचा सकती है।
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क्या एक सफल महिला के पीछे 'पुरुष' नहीं होता?

‘प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे किसी ना किसी महिला का हाथ जरूर होता है।’ यह बात आपने भी अपने जीवन में सुनने के साथ-साथ महसूस की होगी। वह महिला आपकी मां, बहन, पत्नी, प्रेमिका या कोई अन्य भी हो सकती है। कोई भी पुरुष यह नहीं कह सकता कि उसने अपने जीवन में जितना भी अर्जित किया है, उसमें किसी महिला का योगदान नहीं है, क्योंकि उस पुरुष की उत्पत्ति का आधार ही महिला है। जिसने भी इस ‘कहावत’ को सर्वप्रथम कहा होगा उसके मन में सफल पुरुष की सफलता के पीछे जिस महिला का त्याग, बलिदान और साहस रहा होगा, उसे प्रणाम करने की कल्पना रही होगी। लेकिन क्या एक महिला की सफलता के पीछे पुरुष का कोई योगदान नहीं होता?

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अजीब सा सवाल है ना? यदि आप एक पुरुष हैं तो आप तत्काल कह देंगे, ‘बिल्कुल, महिला की सफलता के पीछे पुरुष का ही हाथ होता है।’ लेकिन क्या महिलाएं भी ऐसा ही सोचती हैं? क्या महिलाएं भी ‘हां’ में इस प्रश्न का तत्कालिक उत्तर दे सकती हैं? मुझे नहीं लगता…मेरी सोच ऐसी क्यों बनी, उसका कारण मेरा अपना एक अनुभव है।

कुछ दिन पहले ‘नव चेतना’ नामक एक वर्कशॉप को अटेंड करने का मौका मिला। उस वर्कशॉप के ट्रेनर ने स्टिकी नोट्स पर कुछ लड़कों को यह लिखने को कहा कि लड़कियां कैसी होती हैं और लड़कियों से लिखने को कहा कि वे लिखें कि लड़के कैसे होते हैं। लड़कों में से लगभग सभी ने लिखा कि लड़कियां भावुक होती हैं, काफी मजबूत होती हैं, सहनशील होती हैं… इत्यादि… बात भी सही है, एक लड़की/महिला के बराबर संवेदनाएं एक ‘सामान्य’ पुरुष में नहीं हो सकतीं। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जन्म के बाद जो महिला सबसे पहले मेरे संपर्क में आई, वह मेरी मां थी। एक महिला के बारे में सोचने पर सबसे पहले मेरे मन में मेरी मां का चेहरा आता है। मेरे सिर पर जब जरा सी चोट लगती थी तो मैंने उनकी आंखों में आंसू देखे हैं, पापा से उन्हें मेरी अपनी गलतियों के लिए लड़ते देखा है। आज अधिकतर पुरुषों के मन में एक महिला के बारे में सोचने पर पहला चित्र अपनी मां का ही आता होगा।

लेकिन इसके विपरीत उसी वर्कशॉप में अधिकतर महिलाओं ने पुरुषों के बारे में जो लिखा वह वास्तव में आश्चर्यचकित करने वाला था। किसी ने पुरुषों को अहंकारी बताया, तो किसी ने कहा कि पुरुष भरोसे के लायक नहीं होते। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो मुझे लगता है कि किसी महिला का पिता तो उसके लिए अहंकारी नहीं हो सकता, एक पिता तो उसके भरोसे को नहीं तोड़ सकता, तो फिर ऐसे विचार क्यों?

ये विचार अनायास ही नहीं बने। महिलाओं ने अपने बॉयफ्रेंड, पति या अन्य किसी में जिस पुरुष को देखा है, उसी के आधार पर अपने मानसपटल पर पुरुष के व्यवहार की एक छवि बना ली। हो सकता है कि किसी पुरुष ने उस महिला का विश्वास तोड़ा हो, हो सकता है किसी ने उसका सम्मान न किया हो लेकिन सिर्फ एक व्यक्ति विशेष के व्यवहार के कारण संपूर्ण पुरुष जाति के व्यवहार को वैसा ही मान लेना क्या ठीक होगा?

आज कहा जाता है कि समाज बदल रहा है, अब महिलाएं घर की चहारदीवारी लांघकर हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं, पर इसके पीछे इस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है कि इस परिवेश के बदलाव का एक मुख्य कारण पुरुषों की सोच में परिवर्तन भी है। वैदिक काल के बाद से भारत के लोगों ने जिस तरह से स्त्री को लेकर अपनी सोच को अधोगामी बनाया, उस सोच के दायरे से बाहर निकल कर एक सकारात्मक परिवर्तन यदि हमें दिखाई दे रहा है तो उसके पीछे पुरुषों की मानसिकता में बदलाव और महिलाओं का साहस है। पुरुषों की मानसिकता नहीं बदली होती तो महिलाओं का घर से बाहर निकलना, अपनी व्यक्तिगत पहचान को समाज में प्रतिस्थापित करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होता।

हमें इस बात को मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि समाज के परंपरागत रिवाजों को तोड़कर पुरुष ने भी स्त्री को इस बात का अहसास कराया कि जो हम कर सकते हैं, वह तुम भी कर सकती हो। निश्चित रूप से आज भी बहुत से लोग इस परिवर्तन को स्वीकार करने की मानसिकता नहीं रखते लेकिन ऐसे लोगों में सिर्फ पुरुष नहीं आते, बहुत सी महिलाएं भी हैं जो आज भी कहती हैं कि लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। लेकिन उन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। क्योंकि अगर उनको कुछ कह दिया तो ‘नारीवादी’ होने का तमगा छिन जाएगा। महिलाओं के प्रति पुरुषों के समर्पण को अनदेखा किया जाएगा, क्योंकि अगर पुरुषों के लिए कुछ अच्छा कह दिया तो ‘पुरुषवादी’ होने का ठप्पा लग जाएगा।

नारीवादी होना, क्या भेदभाव को बढ़ावा देना नहीं है? यदि वास्तव में हम लिंगभेद को नहीं मानते तो ‘नारीवादी’ और ‘पुरुषवादी’ जैसे शब्दों को क्यों बड़े गर्व के साथ अपने चरित्र का बखान करने में उपयोग करते हैं? अगर हम यह कहते हैं कि ‘प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे किसी ना किसी महिला का हाथ जरूर होता है’ तो आखिर क्यों हम यह भी नहीं कह सकते कि ‘प्रत्येक सफल महिला के पीछे भी किसी ना किसी पुरुष का हाथ जरूर होता है’? एक बार इन सवालों के जवाब सोचने का प्रयास जरूर करिएगा…

अतहर और टीना डाबी के प्यार से आपके पेट में दर्द क्यों?

आपको क्या लगता है कि आपके भगवान या खुदा ने धर्म (पूजा पद्धतियां) या जातियां बनाई हैं, वो भी सिर्फ इसलिए ताकि लोगों के बीच संबन्ध न बन सकें? यानी अगर आप हिंदू हैं और आपने मुस्लिम से शादी कर ली तो आपका भगवान आपसे नाराज हो जाएगा, मुस्लिम हैं और हिंदू से निकाह कर लिया तो खुदा नाराज हो जाएगा, ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर यदि कायस्थ परिवार में शादी की तो आपका ईश्वर आपको ‘भयानक’ कष्ट देगा? आप सोच रहे होंगे कि मैं आज ये कौन सी बातें लेकर बैठ गया। चलिए बताता हूं….

मेरा एक पत्रकार मित्र है। कुछ महीनों पहले उससे काम के दौरान गलतियां हुईं। कभी कोई समाचार लिखते समय कोई भाषागत गलती हो जाती तो कभी संस्थान के ऑफिशल अकाउंट से कुछ गलत ट्वीट हो जाता। चूंकि उसे मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं इसलिए पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूं कि उसकी योग्यता, क्षमता और प्रतिभा में कोई कमी नहीं है। फिर ऐसी गलतियां उससे क्यों हो जाती हैं?
कुछ सप्ताह पहले अपने उस मित्र के साथ खाना खाने बैठा था तो उसका चेहरा उतरा-उतरा सा लगा। सोचा बात करूं। मैंने उससे पूछा कि आखिर उसकी समस्या क्या है? क्या उसे कोई परेशानी है? उसने पहले तो बात टालने की कोशिश की लेकिन फिर भावुक होकर उसने बताया कि वह एक लड़की से प्यार करता है लेकिन जातिगत विभेद के कारण वे दोनों कभी एक नहीं हो सकते। मैंने कहा कि परिवार से बात करो तो उसने कहा कि उन दोनों के परिवार कभी इस रिश्ते को मान्यता नहीं देंगे। और इसी कारण से उसका किसी काम में मन नहीं लगता।

जब मैं स्नातक की पढ़ाई कर रहा था उस समय का भी एक किस्सा ध्यान में आता है। मेरी एक जूनियर जो कि ब्राह्मण परिवार की थी, उसे एक क्षत्रिय लड़के से ‘प्यार’ था। घरवालों ने इस रिश्ते को मंजूरी नहीं दी तो वह लड़की भागकर लड़के के घर चली गई। लड़के के घरवालों ने उसे स्वीकार कर लिया लेकिन लड़की के घरवालों ने हमेशा के लिए उससे रिश्ता खत्म कर दिया। लगभग 1 साल के बाद उन दोनों के रिश्ते में खटास आ गई और वह रिश्ता खत्म हो गया। लड़की फिर से अपने घर आ गई और लड़की के प्रति प्यार के चलते परिवार को उसे स्वीकार करना पड़ा।
इन दो उदाहरणों को पढ़कर आप किस निष्कर्ष पर पहुंचे? पता नहीं आप क्या सोच रहे हैं लेकिन क्या एक 18 साल की लड़की और लगभग इसी उम्र का लड़का अपने जीवन और भविष्य का निर्णय ले सकता है? क्या उसका मस्तिष्क इतना विकसित हो चुका है कि वह ‘प्यार’ और ‘आकर्षण’ के अंतर को समझ सके?या एक लड़का जिसकी उम्र 26 साल है, जो पिछले 3-4 साल से पत्रकारिता कर रहा है, समाज के बीच रह रहा है, आप उसकी भावनाओं को भी आकर्षण मान लेंगे? किसी का मस्तिष्क पूर्ण रूप से विकसित हो गया है, इसकी प्रमाणिकता उसकी उम्र तय नहीं करती। बल्कि उसकी सामाजिक स्थिति बताती है कि वह किसी रिश्ते और उस रिश्ते के भविष्य के प्रति कितना जागरुक है।

यह तो एक पक्ष था। दूसरा पक्ष है जाति और धर्म का। इस विषय पर बात करने से पहले एक सवाल है कि राम तो क्षत्रिय थे, लेकिन माता सीता की जाति क्या थी? मैं यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं कि बात उन परंपराओं की हो रही है जो लंबे समय से चली आ रही हैं तो सवाल भी उसी पौराणिक इतिहास से उठाना चाहिए। वाल्मीकि रामायण के मुताबिक, मिथिला के राजा जनक को खेत जोतते समय एक बच्ची मिली, जनक ने उन्हें  धरती माता की पुत्री मानकर पाला-पोसा और बाद में उनका विवाह राम के साथ हुआ।
कहने का अर्थ यह है कि सीता, जनक की पुत्री नहीं थीं, उनके कुल इत्यादि का पता नहीं था, उनके जन्म का समय नहीं पता था कि कुंडली इत्यादि का मिलान किया जाए और राम या उनके परिवार ने बिना कुल,जाति इत्यादि की जांच किए बिना उन्हें अपनाया और आज हम माता सीता की अनुपस्थिति में श्रीराम के चित्र की कल्पना नहीं कर सकते।

जिन्हें प्रत्येक जाति के लोग आराध्य मानते हैं, जब उन्होंने अपने विवाह में जातिगत भेद को स्थान नहीं दिया तो फिर हम एक सामान्य मनुष्य होकर, उन्हीं राम के वंशज होकर कैसे जातिभेद को अपने जीवन में स्थान दे सकते हैं? जाति और धर्म हमने बनाए हैं, लेकिन अगर हमारी ही बनाई किसी परंपरा से समाज टूट रहा है तो समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए हमें उन परंपराओं को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर देना चाहिए।
साल 2006 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस राकेश शर्मा ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को ‘लव जिहाद’ की जांच के आदेश दिए तो राष्ट्रीय मीडिया के यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। ‘लव जिहाद’ के ये आरोप यूपी से शुरू होकर केरल और फिर कर्नाटक पहुंच गए। ज्यादातर मामलों में कट्टर मुस्लिम युवकों पर आरोप लगे कि वे अपना नाम बदलकर हिंदू लड़कियों से नजदीकियां बढ़ाते हैं। इसके बाद झूठे प्यार का नाटक करके शादी कर उनका जबरन धर्म परिवर्तन करा देते हैं।

लेकिन ये कौन लोग हैं जो प्रेम जैसी शाश्वत अनुभूति की आड़ में किसी की धार्मिक भावनाओं के साथ खेलते हैं? इस सवाल का कोई पुख्ता जवाब आज तक नहीं मिल पाया। मैं इस बहस में नहीं जाना चाहता कि ‘लव जिहाद’ जैसा कुछ होता भी है या नहीं लेकिन क्या देश की सबसे कठिन परीक्षा कही जाने वाली यूपीएससी की परीक्षा के 2 टॉपर्स यदि धार्मिक विभेद को मिटाकर समाज को एक संदेश देना चाहें तो क्या इसे ‘लव जिहाद’ का नाम देना ठीक होगा?

क्या दो लोग अपनी मर्जी से शादी के बंधन में नहीं बंध सकते? और वे सामान्य लोग नहीं हैं, वे दोनों अपनी बुद्धि, योग्यता और प्रतिभा के बल पर इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि उन्हें ‘धर्म’ का झंडा लेकर चलने वालों से ‘भारत’ की लाख गुना ज्यादा समझ है।

अतहर आमिर खान जब ‘युवान’ के मंच पर स्वामी विवेकानंद की तस्वीर के नीचे खड़े होकर युवाओं के सामने सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ ‘भारत भक्ति’ के प्रेरणापुंज के रूप में खड़ा होता है तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन जब वह एक हिंदू लड़की से शादी की बात करता है तो कुछ लोगों के पेट में दर्द क्यों होता है?


यह दर्द सिर्फ इसलिए है क्योंकि उनको धर्म और मजहब के बीच की खाईं को और गहरा करके अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं। अगर प्रेम की प्रतिमूर्ति श्रीकृष्ण के देश में कोई यह कहता है कि दो अलग-अलग पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग विवाह नहीं कर सकते, तो एक बात तो तय है कि जिस ‘भगवान’ की सेवा के नाम पर वे यह सब कर रहे हैं, उसे मैं ‘भगवान’ नहीं मान सकता क्योंकि मेरा भगवान कभी ‘जातिवादी’ और ‘सांप्रदायिक’ नहीं हो सकता।

सानिया के लिबास पर सवाल, एक शायर का घटिया ख़याल

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टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा ने कुछ साल पहले पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी की। कैसा लगा था आपको? एक भारतीय के रूप में अपनी सोच को एक सीमित दायरे में रखकर यदि आप सोचेंगे तो आपको यही लगेगा कि नहीं! सानिया मिर्जा को ऐसा नहीं करना चाहिए था। अगर आप भी ऐसा ही सोच रहे हैं तो मैं आपसे सहमति नहीं रखता। क्योंकि मैं मानता हूं कि प्यार को देश की सीमाओं में नहीं बंधना चाहिए और हम किसी के प्यार को सीमाओं में बांधने वाले कोई नहीं होते। हालांकि जब सानिया की शादी की खबर आई थी तो मुझे भी ‘गुस्सा’ आया था। क्योंकि मुझे लगता था कि सानिया को ‘सानिया’ भारत ने बनाया है, भारत के लोगों की मोहब्बत ने उन्हें पहचान दी और वह शादी के लिए ‘दुश्मन’ देश के साथ चली गईं। मुझे लगता था कि जिसका शौहर पाकिस्तानी हो, वह मन से भारतीय कैसे रह सकती है? मैं सोचता था कि अब सानिया भारत के लिए नहीं खेलेंगी… लेकिन समय ने मेरी सोच को गलत साबित किया। सानिया उसी शिद्दत के साथ भारत के लिए खेलती रहीं। विंबल्डन से लेकर ओलिंपिक तक सानिया भारत के प्रतिनिधि के तौर पर खेलीं और विश्व स्तर पर भारत के मस्तक को ऊंचा किया। ना सिर्फ उन्होंने भारत के मस्तक को ऊंचा किया बल्कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की मूल अवधारणा को भी प्रतिस्थापित किया। 2015 में जब देश के सिलेब्रिटीज भारतीय सेना के साथ खड़े होकर देश का मनोबल बढ़ा रहे थे तो उस पाकिस्तानी बहू ने भी अपना राष्ट्रीय दायित्व निभाते हुए भारतीय सेना के त्याग के लिए धन्यवाद दिया।


saniaआप सोच रहे होंगे कि मैं ये सारी बातें क्यों कह रहा हूं? चलिए, एक बार कल्पना करिए कि किसी भारतीय पुरुष सिलेब्रिटी ने किसी पाकिस्तानी महिला सिलेब्रिटी से शादी/निकाह किया होता और वह महिला किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पाकिस्तान का नेतृत्व करती तो? तो, भारत के फर्जी राष्ट्रवादी उन दोनों को जीने नहीं देते। कल्पना करिए वही महिला यदि पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर पाकिस्तानी सेना के समर्थन में ट्वीट करती तो? तो क्या होता मुझे बताने की जरूरत नहीं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि पाकिस्तान में रहने वाले लोग सानिया मिर्जा को लेकर क्या-क्या कहते होंगे? सब छोड़िए! एक बार उस पाकिस्तानी शौहर के बारे में सोचिए जो खुलेआम कहता है कि उसकी भारतीय पत्नी पाकिस्तान के खिलाफ भारत का समर्थन करेगी। यहां क्लिक कर पढ़ें खबर।

चलिए अब मूल बात पर आते हैं। ऐसी महिला के बारे में एक व्यक्ति कहता है कि सानिया मिर्जा उसकी मां को इसलिए पसंद नहीं क्योंकि उसके सिर पर दुपट्टा नहीं है। और वह व्यक्ति अपनी मां की इस सोच को बहुत गर्व के साथ बताता है। क्यों कहता है वह ऐसा? क्योंकि इस्लाम पर्दाप्रथा का हिमायती है।

क्या कहेंगे आप इस पर? मुझे नहीं पता आप क्या कहेंगे लेकिन मेरा मानना है कि ऐसे लोग ‘देशभक्ति’ के नाम पर एक महिला की स्वतंत्रता का हनन कर रहे हैं। खास बात यह है कि ऐसी बातें करने वाले इमरान प्रतापगढ़ी के जेएनयू और भारत के बड़े-बड़े वामपंथियों से बहुत ही नजदीकी संबंध हैं। लेकिन वे लोग इमरान को अपना ‘नारीवादी’ पाठ क्यों नहीं पढ़ाते हैं, यह सोच का विषय है। यह वही इमरान हैं जिन्हें अपनी ऐसी ही बातों को शायरी के रूप में पिरोने के कारण उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा सम्मान ‘यश भारती’ दिया जाता है। उसे 11 लाख रुपए और प्रतिमाह 50,000 रुपये की पेंशन प्रदेश सरकार उसकी बातों के लिए देती है।

सिर्फ इतना ही नहीं, इमरान प्रतापगढ़ी नामक यह तथाकथित शायर उस किशन बाबूराव (अन्ना) हजारे पर भी सवाल उठाते हैं। उस अन्ना हजारे पर जिसने 60 सालों से सोए हुए देश को भ्रष्टाचार के खिलाफ जगाया, जिसने देश को लड़ना सिखाया। इमरान अन्ना के अनशन को बीमारी और नाटक बताते हैं।

उनकी समस्या यह है कि जिस संजीव भट्ट नाम के एक पूर्व आईपीएस अफसर के बारे में गुजरात में सन 2002 में हुए दंगों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाया गया विशेष जांच दल (एसआईटी) कहता है कि उन्होंने गुजरात सरकार को बदनाम करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए, जिस संजीव भट्ट को सुप्रीम कोर्ट फटकार लगाते हुए कहता है वह पाक-साफ नहीं है, उसे जेल भेजे जाने पर अन्ना हजारे क्यों कुछ नहीं बोलते? क्या गजब का तर्क है इमरान साहब का?

बड़ी बात यह नहीं है कि इमरान यह सब बोलते हैं। वह तो नादान हैं, अभी विद्यार्थी हैं लेकिन जब अन्ना हजारे को नौटंकीबाज बताने वाले व्यक्ति को कुमार विश्वास जैसा व्यक्ति अपना भाई बताते हुए उसकी बातों का समर्थन करता है, तो सवाल कुमार विश्वास की सोच पर उठना लाजमी है, जब ऐसा वैचारिक विद्वेष फैलाने वाले व्यक्ति को साहित्य के नाम पर हमारे-आपके द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे से आजीवन पेंशन दी जाती है तो सवाल अखिलेश सरकार पर उठाना एक भारतीय होने के नाते मेरी जिम्मेदारी बनती है। लेकिन मेरे सवालों का कोई अर्थ नहीं क्योंकि वोटबैंक के लिए तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और कुमार विश्वास को यह सब करना ही पड़ेगा, नहीं?

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने जैसे नारे लगे थे। क्या हुआ फिर? मीडिया चीखा, ‘राष्ट्रवादी’ चिल्लाए, पुलिस ने कुछ लेफ्ट विंग के छात्रनेताओं को उठाया, उनको कोर्ट में पेश किया और फिर कोर्ट ने उन्हें सशर्त अंतरिम जमानत दे दी। बस कहानी खत्म….

लगभग 9 महीने बीत गए, लेकिन आज तक भारत विरोधी नारे लगाने वालों को सजा नहीं मिली। अरे सजा छोड़िए साहब, हमारी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां उन लोगों की पहचान तक नहीं कर पाईं जिन्होंने देश को गालियां दी थीं। हम भी खामोश हो गए। हमें तो भूलने की बीमारी है। हम भूल गए कि हमारी मां को गालियां दी गई थीं।

भारत, एक ऐसा देश जहां के एक विश्वविद्यालय का छात्र गुमशुदा हो जाता है तो उस विश्वविद्यालय के वीसी तक को बंधक बना लिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां विश्व के सबसे बड़े गैर-राजनीतिक संगठन के कार्यकर्ताओं की हत्या पर नेता से अभिनेता तक, सभी मौन हो जाते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां गोरक्षक बनकर लोग अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी निकालते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां एक आतंकी के जनाजे में हजारों की संख्या में लोग मातम मनाते हुए दिखते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां एक अभिनेता सीमा पर तैनात सैनिक की शहादत पर ‘बिगड़े बोल’ बोलने से भी नहीं हिचकता, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां एक आतंकी को ‘शहीद’ कहकर सम्मान दिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत एक ऐसा देश जहां सिर्फ तीन बार ‘तलाक-तलाक-तलाक’ बोलकर एक महिला के सपनों को एक झटके में चकनाचूर कर दिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते? (क्लिक कर पढ़ें: महिलाओं के शोषण का नायाब तरीका है तीन तलाक)

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग नवरात्र में तो भोज के लिए कन्याएं खोजते हैं, लेकिन पैदा होने से पहले ही अपनी बेटी को मार देते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?
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भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग हलाला और मुताह जैसी कुप्रथाओं का खुले आम समर्थन करते हुए एक धर्मनिरपेक्ष देश में मजहबी कानून का पक्ष लेते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग बात तो ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ की करते हैं, लेकिन महिला को दहेज के लालच में जिंदा जला देते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग राष्ट्र की वंदना की पर्याय सूक्ति, वंदे मातरम को एक संगठन और धर्म विशेष से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि उनके गले पर चाकू भी रख दी जाएगी तब भी वंदे मातरम नहीं बोलेंगे, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग राजनीतिक विरोध करते-करते अपने स्तर को राष्ट्र विरोध तक ले आते हैं, उन्हें विदेशों में भी अपने प्रधानमंत्री की बुराई करने से कोई परहेज नहीं होता, वे घर के मतभेदों को मनभेद के रूप में विश्वपटल पर प्रदर्शित करते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग सरकार की अच्छी योजनाओं के साथ इसलिए नहीं खड़े होते क्योंकि वे विपक्षी पार्टी से आते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां ‘सवर्ण’ होते हुए भी दलितों को सम्मान दिलाने का प्रथम प्रयास करने वाले विनायक दामोदर सावरकर को गद्दार और सांप्रदायिक करार दिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां सनातन धर्म की सर्वोच्च पदवी पर विराजमान, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती कहते हैं कि महिलाओं द्वारा शनि शिंगणापुर में पूजा किए जाने से बलात्कार बढ़ेंगे, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के तथाकथित नारीवादियों ने महिला आजादी का पैमाना उनके कम कपड़ों और सिगरेट-शराब पीने को बना दिया है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

असहिष्णुता क्या है?  कोई भारत को गाली दे और उसे रोका जाए, असहिष्णुता यह नहीं है। असहिष्णुता है अपने कर्तव्य और अधिकार के मध्य सामंजस्य स्थापित न करना। लेकिन इस असहिष्णुता के होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि मैं अपने देश को छोड़कर पाकिस्तान चला जाऊं या अगर मैं यह कहूं कि भारत में असहिष्णुता है तो कोई फर्जी राष्ट्रवादी मुझे देशद्रोही करार करके मेरे लिए पाकिस्तान का टिकट कटाकर ले आए। वास्तविक पीड़ा तो इस बात की है कि इस तरह की ‘असहिष्णुताओं’ पर ना ही कोई अवॉर्ड वापसी अभियान चलता है और ना कोई पत्रकार अपने चैनल की स्क्रीन काली करता है….

तीन तलाक: महिलाओं के शोषण का नायाब तरीका

जनवरी 2016 में एक मुस्लिम महिला को स्पीड पोस्ट से एक लेटर मिलता है, जिसमें उसके पति ने कथित तौर पर इस्लामी कानून का प्रयोग करके तलाक दे दिया होता है। जयपुर की रहने वाली आफरीन नामक उस महिला के दर्द को क्या आप महसूस कर सकते हैं? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि निकाह से पहले आफरीन ने अपनी जिंदगी को लेकर कैसे-कैसे सपने देखे होंगे? उत्तराखंड की निवासी शायरा बानो ‘तलाक’ से सताई हुईं एक अन्य महिला हैं। शायरा का कहना है कि उनका पति उनके साथ मारपीट करता था और बाद में उसने शायरा को तलाक दे दिया। शायरा के दो बच्चे हैं लेकिन वे उसके पति के साथ रहते हैं और शायरा का पति बच्चों से उनकी मां को बात तक नहीं करने देता। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक मां, अपने बच्चों से दूरी कैसे बर्दाश्त करती होगी।

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देश में इस समय ट्रिपल तलाक को लेकर बहस छिड़ी है। इस बहस में एक पक्ष ऐसा भी है जो कहता है कि अगर कोई मर्द तीन बार तलाक यानी ‘तलाक-तलाक-तलाक’ कह दे तो उसकी उस महिला के प्रति सारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है जो अपने परिवार को छोड़कर अपनी पूरी जिंदगी उस मर्द के साथ बिताने का सपना देखकर आई है। यह सही है या गलत इस बहस में पड़ने से पहले उन परंपराओं पर बात कर लेते हैं जो कई सौ सालों से उस मजहब का आधार बनी हुई हैं जो महिलाओं को सर्वाधिक अधिकार देने का दावा करता है।

निकाह- इस्लाम में निकाल को एक तरह का ‘अग्रीमेंट’ जैसा माना गया है। निकाल के दौरान मेहर की एक रकम तय की जाती है, जिसे किसी परिस्थिति में विवाह विच्छेद यानी तलाक के बाद पुरुष द्वारा महिला को अदा करना होता है। लेकिन सवाल यह है कि एक लड़की जो अपने परिवार, संबंध, रिश्ते, सपने और अपने भविष्य को छोड़कर अपनी जिंदगी को जिस इंसान के हवाले कर देती है, तलाक के बाद उसे कितना भी पैसा मिल जाए, क्या वह उस पैसे से खुश रह सकती है? क्या भावनाओं और अधूरे सपनों की एक ‘रकम’ तय कर देना न्यायसंगत है? तर्क चाहे कुछ भी हों लेकिन इस अग्रीमेंट जैसी परंपरा को सही नहीं ठहराया जा सकता।

तीन तलाक- अगर पत्नी-पत्नी के रिश्ते सामान्य नहीं हैं तो एक खास तरीके से तीन बार में एक निश्चित समय अंतराल पर पति, अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। लेकिन आज जो परंपरा चल रही है वह वास्तविक इस्लामिक कानून से एकदम भिन्न है। आज तीन बार एक ही समय पर तलाक कहकर निकाह को खत्म कर दिया जाता है। इस तरह के तलाक में खास बात यह है कि कुछ मुल्ले-मौलवी आज 21वीं सदी में भी इसे जायज ठहरा रहे हैं। उनका तर्क है कि इस्लाम में इस तरह से दिया गया तलाक गलत जरूर माना गया है लेकिन ‘तलाक-तलाक-तलाक’ बोल दिया तो तलाक माना तो जाएगा ही। यानी अगर किसी को अपनी पत्नी पर गुस्सा आ जाए तो वह दो गवाहों के सामने अपनी पत्नी को तीन बार ‘तलाक’ बोलकर रिश्ते को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर सकता है। सवाल यह है कि जब निकाह के वक्त शौहर और बीवी दोनों की रजामंदी की जरूरत होती है तो फिर तलाक के वक्त क्यों नहीं?

हलाला- तलाक के बाद अगर पूर्व पति को अपनी गलती का अहसास हो और वह अपनी पत्नी से दोबारा निकाह करना चाहे तो उसकी पत्नी को पहले किसी और मर्द से निकाह करना होगा, उस मर्द के साथ शारीरिक संबन्ध बनाने होंगे, क्योंकि बिना शारीरिक संबंध के तो निकाह पूरा ही नहीं माना जाता। और फिर उस नए शौहर से तलाक लेकर या उसकी मौत हो जाने पर वह महिला पुराने शौहर से निकाह कर सकती है। हालांकि कुछ मौलवियों का तर्क है कि ये सब ‘सुनियोजित’ नहीं होना चाहिए और ‘हलाला’ कानून बनाकर इस्लाम, मर्दों को एक तरह से सजा देता है। यानी कि अगर मर्द ने कोई गलती की, उसे कुछ समय के बाद अपनी गलती का एहसास हो गया, उसकी पूर्व पत्नी गलती की माफी देकर फिर से उसके साथ रहना भी चाहे तो उसे पहले अपने शरीर को किसी और मर्द के हवाले करना पड़ेगा और यह पूर्व पति के लिए सजा होगी। एक महिला को किसी और के साथ बिना मर्जी के मजबूरी में शारीरिक संबंध बनाए और इसे मर्द को दी गई सजा माना जाए, कैसे? एक बार तलाक हो गया और फिर मियां-बीवी चाहें तो भी उनके पास एक प्रताड़ना भरी प्रक्रिया से गुजरने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

मुताह- यह एक तरह का निकाह होता है जिसमें पहले से ही समय तय कर लिया जाता है कि मियां-बीबी कितने समय तक साथ रहेंगे। इसके लिए बाकायदा औरत को पैसा दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को यदि इस्लामी कानून आधारित वेश्यावृत्ति कहा जाए तो गलत नहीं होगा। हाल ही में कई ऐसे मामले सामने आए हैं कि खाड़ी देशों से महीने-दो महीने के लिए मर्द वापस जब आते हैं तो वक्त बिताने के लिए, अपने शरीर की भूख मिटाने के लिए उन्हें कोई औरत चाहिए होती है और वे जिम्मेदारी भी नहीं निभाना चाहते। इसलिए वे मुताह निकाह करते हैं। जितने दिन का करार तय हो जाता है, उतने दिन के बाद सब कुछ खुद-ब-खुद खत्म हो जाता है।

खुला- यह भी एक तरह का तलाक होता है जो औरत की ओर से मर्द को दिया जाता है लेकिन यह ‘तीन तलाक’ के जैसा नहीं होता। औरत अगर मर्द से खुला मांगती है तो अंतत: देता मर्द ही है। अगर वह नहीं चाहे तो उसे मनाना पड़ता है। किसी काजी, किसी बुजुर्ग या दोस्त से दबाव डलवाना पड़ता है या कुछ संपत्ति वगैरा देकर मनाना पड़ता है। औरत को बच्चों से मिलने का अधिकार छोड़ना पड़ता है या मेहर की रकम छोड़नी पड़ती है। इस तरह कुछ चीजें छोड़कर महिला को तलाक मिलता है। इतना सब होने के बावजूद अंतिम घोषणा पुरुष को ही करनी पड़ती है। महिला सब कुछ दे दे, तब भी ‘तलाक-तलाक-तलाक’ की घोषणा पुरुष ही करता है। गजब की समानता है यार।

हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां विविध पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग निवास करते हैं। जहां अंतिम नागरिक तक को अपने धर्म के मुताबिक जीवन जीने का अधिकार है लेकिन क्या मानवता से बड़ा कोई धर्म है, क्या इंसानियत से बड़ा कोई धर्म है? जो अधिकार हिंदू औरत को मिलें वह मुसलमान औरत को क्यों नहीं? जो अधिकार एक पुरुष को मिलें वह एक औरत को क्यों नहीं? आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस इस्लाम की दुहाई देकर ‘तीन तलाक’ के नियम में परिवर्तन न करने की बात कही जा रही है, उसी इस्लाम को मानने वाले कई इस्लामिक देशों में इस तरह के कानूनों में बदलाव किया जा चुका है।
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पाकिस्तान में 1961 के अध्यादेश के अनुसार, आर्बिट्रेशन काउंसिल की अनुमति के बिना कोई भी पुरुष दूसरा निकाह नहीं कर सकता। अफगानिस्तान में एक साथ तीन बार तलाक कहकर तलाक लेना गैरकानूनी है। मोरक्को में पहली पत्नी की रज़ामंदी और जज की इजाजत लिए बिना दूसरा निकाह नहीं हो सकता। ट्यूनीशिया में तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। तुर्की में एक से अधिक निकाह करने पर 2 साल की सज़ा दी जाती है। इंडोनेशिया में दूसरे निकाह और तलाक के लिए धार्मिक अदालत से इजाज़त लेनी होती है और अल्जीरिया में पुरुष द्वारा तलाक देने के एकतरफा अधिकार को खत्म किया जा चुका है। वहां तलाक के मामले कोर्ट के ज़रिए ही निपटाए जाते हैं। पाकिस्तान में 1961 से, बांग्लादेश में 1971 से, मिस्र में 1929 से, सूडान में 1935 से और सीरिया में 1953 से तीन तलाक को बैन किया जा चुका है।

तलाक एक ऐसा शब्द है जो ना सिर्फ हंसते-मुस्कुराते परिवार को तोड़ देता है बल्कि रिश्तों के सौन्दर्य को भी समाप्त कर देता है। भारत में रुढ़िवादी मुसलमानों के एक वर्ग की ‘जिद’ के कारण तीन तलाक का जहर पीकर भी खामोश रहने वाली हजारों महिलाएं पड़ी हैं। कोई व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो, उसके संवैधानिक अधिकार बराबर हैं। एक महिला के सम्मान और उसकी गरिमा के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। हमारे और आपके जन्म के साथ-साथ इस सृष्टि के संचालन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान यदि किसी का है तो वह औरत का है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसके अधिकारों के लिए आवाज उठाएं।

क्रिसमस को भारतीय क्यों नहीं बना सकते?

आज क्रिसमस है। मैं पिछले 3-4 दिनों से लगातार सोशल मीडिया पर देख रहा हूं कि समाज का एक वर्ग कह रहा है कि क्रिसमस विदेशी त्योहार है, इसे मत मनाइए। कोई कह रहा है, ‘क्रिसमस अंग्रेजों का त्योहार है, हम अब उनके गुलाम नहीं हैं, क्रिसमस की बधाई ना दें।’ कोई कह रहा है कि हिंदू हैं, तो ईसाइयों का त्योहार क्यों   मनाएं? अजीब-अजीब से सवाल और सुझाव हैं, लेकिन इस सबके बीच मैं बस इतना जानता हूं कि भारतीय संस्कृति की आत्मा का आधार यहां की उत्सवधर्मिता है। हमारी संस्कृति की खासियत यह है कि लगभग हर दिन हमारे यहां कोई ना कोई त्योहार होता ही है। christmasऐसे में अगर हम भारत के अंदर ही रहने वाले एक वर्ग के प्रमुख त्योहार को स्वीकार कर लेंगे तो क्या बिगड़ जाएगा? इसके अलावा एक सवाल यह भी है कि क्या जिस सभ्यता से यह त्योहार आया है, हमें उसी रूप में इसे स्वीकार करना चाहिए? मेरा मानना है ‘नहीं’…
हम पश्चिम से आए त्योहार में भारतीयता  को क्यों नहीं घोल सकते? भारतीय परंपरा के जितने भी पर्व और त्योहार हैं उन सभी का कोई ना कोई वैज्ञानिक अथवा पर्यावरणीय पक्ष जरूर होता है। हम होली मनाते हैं। शरद ऋतु की समाप्ति और बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही पर्यावरण और शरीर में बैक्टीरिया की वृद्धि को बढ़ जाती है, लेकिन जब होलिका जलाई जाती है तो उससे करीब 145 फ़ारनहाइट तक तापमान बढ़ता है। परंपरा के अनुसार जब लोग जलती होलिका की परिक्रमा करते हैं, तो होलिका से निकलता ताप शरीर और आसपास के पर्यावरण में मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है। और इस प्रकार यह शरीर तथा पर्यावरण को स्वच्छ करता है।
christmas-celebrationsहम दिवाली मनाते हैं, दिवाली वर्षा ऋतु के बाद आती है। इसलिए यह समय कीटों, फफूंदियों आदि के पोषण का समय होता है। अर्थात इस समय कीड़े-मकोड़े अधिक हो जाते हैं क्योंकि इनको सही वातावरण मिलता है। इससे कई तरह की बीमारियां होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। दिवाली की परंपरागत मान्यता के मुताबिक दिवाली के दौरान घरों की सफाई की जाती है। माना जाता है कि सफाई रखने से मां लक्ष्मी आपके घर आती हैं। दिवाली के दौरान सफाई करने से कीटों का खतरा कम हो जाता है, साथ ही घी और तेल के दीपक जलाने से वातावरण भी शुद्ध होता है।
हम नवरात्र में और रमजान में उपवास अथवा रोजे रखते हैं। सभी रोजा या व्रत रखने से पाचन क्रिया ठीक हो जाती है और पेट में पल रहे जहरीले तत्व निष्कासित होने शुरू हो जाते हैं। हमारी रक्षात्मक ताकत में बढ़ोतरी होती है और दिमागी ताकत भी बढ़ जाती है। इसके अलावा इससे हमारे व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन भी आता है।
homeless-peopleहम छठ मनाते हैं। छठ के व्रत के साथ सूर्य की अग्नि के माध्यम से ऊर्जा का संचय किया जाता है, ताकि शरीर सर्दी में स्वस्थ रहे। इसके अलावा सर्दी आने से शरीर में पाचन तंत्र से संबंधित कई परिर्वतन होते हैं। छठ पर्व का उपवास पाचन तंत्र के लिए लाभदायक होता है। इससे शरीर की आरोग्य क्षमता में वृद्धि होती है। जब सूर्यदेव को अर्घ्य और जलाशय में पूजन करके उपवास किया जाता है तो शरीर की जीवनी शक्ति ज्यादा मजबूत होती है।
tulsi-plantअब बात करते हैं क्रिसमस की। मैंने कई लोगों से बात की, लेकिन कोई इस बात का उत्तर नहीं दे पाया कि क्रिसमस मनाने का वैज्ञानिक कारण क्या है। हालांकि एक सामाजिक कारण जरूर सामने आया कि पश्चिम में अधिकतर परिवार आज बिखरे हुए हैं, ऐसे में एक त्योहार के मौके पर सब एक जगह एकत्रित होकर कुछ समय साथ में बिताते हैं, लेकिन हमारे भारत में तो कुछ अपवादों को छोड़कर यह समस्या नहीं है कि परिवारों में विघटन हो। यहां तो कोई त्योहार हो या ना हो, मां के हाथ का खाना खाने के लिए बेटा हजारों किलोमीटर दूर से चला आता है। यहां परिवार और कुछ खास परिचितों से मिलने के लिए किसी त्योहार रूपी कारण की तो जरूरत नहीं महसूस होती।
मुझे लगता है कि प्लास्टिक के पेड़ को सजाने से बेहतर है कि क्यों ना हम तुलसी, अशोक या पीपल का पूजन करें। पूजन हमारी परंपरा भी है और इन पेड़ों से मानव जाति को लाभ भी होता है, तो क्यों ना इस खास दिन हम इन विशिष्ट पौधों या पेड़ों को धन्यवाद दें। हम पढ़े लिखे हैं, क्रिसमस पर हम अपने परिचितों को, अपने परिवार के सदस्यों को, अपने दोस्तों को गिफ्ट देते हैं। हम दूसरों के सैंटा क्लॉज बनते हैं। क्यों ना क्रिसमस पर हम उनके सैंटा क्लॉज बनें, जो इस कड़कड़ाती ठंड में सड़क के किनारे बनी झोपड़पट्टियों में, स्टेशनों के बाहर, अस्पतालों के बाहर ठिठुर रहे हैं। क्यों ना हम एक निर्जीव चीज को सजाने के लिए बर्बाद होने वाले धन से किसी की जिंदगी को कुछ गर्माहट दें। एक बार सोचिएगा जरूर…

ऐसे 'निष्पक्ष' हिंदुस्तान पर शर्मिंदा हूँ!


मिलाद-उन-नबी के अगले दिन कोलकाता से 28 किलोमीटर दूर स्थित हावड़ा के धूलागढ़ में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों के द्वारा एक मंदिर पर बम फेंके गए, हिंदुओं की दुकानें जला दी गईं, उनके घरों में घुसकर मारपीट की गई। पुलिस और धूलागढ़ के मुस्लिमों का कहना है कि मुस्लिमों के जुलूस पर कुछ हिन्दुओं ने घात लगाकर हमला किया और जुलूस को बाधित करने की कोशिश की जिसके जवाब में अगले दिन प्रतिक्रिया स्वरूप दंगे भड़के। इसमें गलती किसकी? निश्चित तौर पर प्रशासन की... लेकिन आज बात करते हैं मीडिया की...

इस मामले में एक समाचार संस्थान यह तो लिखता है कि मोहम्मद साहब के जुलूस पर हमला हुआ लेकिन वह ये लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता कि वहां हिंदुओं के घर और दुकानें जलाए जा रहे हैं, वह यह नहीं लिख पाता कि हिंदू मंदिर तोड़े गए। एक अन्य प्रतिष्ठित समाचार चैनल ने अपनी वेबसाइट पर यह तो बताया गया कि मोहम्मद साहब के जुलूस पर हमला किया गया लेकिन उसके बाद किस समुदाय के लोगों ने बम तक से हमला किया।

कोलकाता में रहने वाले कुछ परिचितों से बात की तो उनका साफ तौर पर कहना है कि टीएमसी, सीपीएम और बीजेपी, किसी भी पार्टी से जुड़ा हिंदू हो, वह सिर्फ हिंदू होता है और उन्हें दंगाइयों के आक्रोश को झेलना ही पड़ता है। निष्पक्षता का बाजा बजाने वाले लोगों में तो इतनी भी हिम्मत नहीं है कि वे खुलकर ऐसी घटनाओं के बारे में बता सकें कि किस समुदाय विशेष से जुड़े लोगों ने किस समुदाय विशेष के लोगों को अपना निशाना बनाया। क्योंकि अगर वे बता देंगे कि मुस्लिमों ने हिंदुओं को मारा है तो वे सांप्रदायिक हो जाएंगे और उनकी निष्पक्षता खतरे में पड़ जाएगी। क्या आपको शर्म नहीं आती कि आप एक ऐसे देश में रहते हैं जहां का मीडिया भी निष्पक्षता के नाम पर तुष्टीकरण करता है?

इन सबके बीच एक सवाल मन में यह भी आता है कि जिस पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित 350 हिंदू और 20 मुस्लिम परिवारों वाले कांगला पहाड़ी गांव में हिंदुओं को दुर्गा पूजा की अनुमति नहीं दी जाती है। उसी पश्चिम बंगाल के हिंदुओं में इतनी हिम्मत कहां से आएगी कि वे मुस्लिमों के जुलूस पर घात लगाकर हमला करें। क्या वे सीएम साहिबा की 'मुस्लिम ममता' से अनजान थे? क्या उन्हें इस बात का बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि यदि वे लोग ऐसा कुछ भी करेंगे तो उसके परिणामस्वरूप उन्हें क्या भुगतना पड़ेगा। मेरे मन में यह सवाल इसलिए भी उठा क्योंकि कोलकाता के आसपास के हिस्से में 2 साल पहले मैं एक सप्ताह रहकर आया और वहां जाने का उद्देश्य भी यही था कि वहां कि सांप्रदायिक स्थिति को समझा जाए। मैंने वहां मुस्लिम तुष्टीकरण की पराकाष्ठा को देखा है।

जानी-मानी अमेरिकी पत्रकार जेनेट लेवी ने अमेरिकन थिंकर नामक पत्रिका में 'The Muslim Takeover of West Bengal'  शीर्षक से लिखे गए लेख में लेखिका ने 2013 के उस दौर का जिक्र भी किया था जब पहली बार बंगाल के कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने अलग ‘मुगलिस्तान’ की मांग शुरू कर दी थी। उसी साल बंगाल में हुए दंगों में सैकड़ों हिंदुओं के घर तथा दुकानें लूटी गईं और कई मंदिरों को तोड़ दिया गया। ममता बनर्जी पर आरोप भी लगा था कि सरकार की तरफ से ऑर्डर दिया गया था कि दंगाई मुसलमानों पर कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। आरोप के मुताबिक, ममता को डर था कि मुसलमानों को रोका गया तो वे नाराज हो जाएंगे और वोट नहीं देंगे। इस आरोप में सच्चाई इसलिए नजर आती है क्योंकि उन दंगों के आरोपियों को अब तक किसी तरह की सजा नहीं हुई है।

जेनेट ने लेख में बताया गया था कि पश्चिम बंगाल के जिन जिलों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है वहां पर वे हिंदू कारोबारियों का बॉयकॉट करते हैं। मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर जिलों में मुसलमान हिंदुओं की दुकानों से सामान तक नहीं खरीदते। इसी कारण बड़ी संख्या में हिंदुओं को घर और कारोबार छोड़कर दूसरी जगहों पर जाना पड़ा। ये वो जिले हैं जहां हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं। लेकिन इन विषयों पर ना तो हमारी मीडिया बोलेगी और ना ही हमारे नेता...

जून 2014 में ममता बनर्जी ने अहमद हसन इमरान नामक प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी के सह-संस्थापक को अपनी पार्टी के टिकट पर राज्यसभा भेजा। उस पर आरोप था कि उसने शारदा चिटफंड घोटाले का पैसा बांग्लादेश के जिहादी संगठन जमात-ए-इस्लामी तक पहुंचाया, ताकि वे बांग्लादेश में दंगे भड़का सके। हसन इमरान के खिलाफ अभी एनआईए और सीबीआई की जांच चल रही है। हालांकि प्राथमिक रिपोर्ट में जांच एजेंसियों ने कहा है कि उनकी अब तक की जांच में ऐसा कोई लिंक नहीं मिला है और आगे की जांच जारी है। इसके अलावा पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी उसके रिश्ते होने के आरोप लगते रहे हैं। क्या ऐसे लोगों को राज्यसभा भेजने वाली पार्टी और उस पार्टी की कार्यपद्धति पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी मीडिया की नहीं है?


इन सबके बावजूद अगर मैं किसी एक समुदाय को गालियां दूं तो गलत होगा। क्योंकि मेरा हिंदुस्तान मंदिरों में तोड़फोड़ करने वाले मुस्लिमों और कथित तौर पर जुलूसों पर हमला करने वाले हिंदुओं से नहीं बनता। मेरा हिंदुस्तान तो तब बनता है जब सुबह घर में बजने वाले राधा के भजन को शकील बदायुनी द्वारा लिखा जाता है, उसी भजन को नौशाद साहब द्वारा संगीत दिया जाता है, मोहम्मद रफी साहब उसे अपनी आवाज देते हैं और जब फिल्माने की बारी आती है तो उसे युसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार पर फिल्माया जाता है।

मेरा हिंदुस्तान तो तब बनता है जब ईद उल मिलाद के जुलूस के दौरान हिंदू परिवार बाहर निकल कर मुस्लिम भाईयों को पानी और चाय पिलाते हैं। हां! मुझे शर्म आती है कि मैं एक ऐसे देश में रहता हूं जहां मजहब के नाम पर वोट तो लिए जाते हैं लेकिन मजहब की बुराईयों के बारे में बोलने से डर लगता है। लेकिन इस शर्म के बीच मुझे एक गर्व भी होता है कि मैं एक ऐसे देश में रहता हूं जहां पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में स्थिति धारन गांव में वर्षों से बंद पड़ी दुर्गा पूजा को वहां के बहुसंख्यक मुस्लिम यह कहकर शुरू करवाते हैं कि वे दुर्गा पूजा के दौरान हिंदू भाइयों के दुखी चेहरे नहीं देख पा रहे।

Thursday, 22 December 2016

नोटबंदी: लंबी लाइनों से छुटकारे का यही एक रास्ता

देश में एटीएम और बैंकों के बाहर लाइनें छोटी होने का नाम नहीं ले रही हैं। इन लाइनों से कैसे निपटा जाएगा? 8 नवंबर की शाम को पीएम नरेंद्र मोदी ने देश से वादा किया था कि दिसंबर अंत तक सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन अभी तक का माहौल देखकर तो नहीं लगता कि इतनी जल्दी सबकुछ सामान्य हो पाएगा। आपको क्या लगता है कि सरकार नोट छापती जाएगी और फिर सरकार ने जिस उद्देश्य के साथ विमुद्रीकरण का फैसला लिया था, वह उद्देश्य पूरा हो जाएगा? बिलकुल नहीं। सरकार जितने ज्यादा नोट छापेगी, उससे नुकसान हमें और आपको होगा। क्योंकि यदि पुरानी मात्रा में ही नोट छपते गए तो फिर उनका भंडारण शुरू हो जाएगा और स्थिति जैसी थी, उससे भी बदतर हो जाएगी, क्योंकि अब तो 2000 का नोट भी है।
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किसी से भी पूछो कि भाई विमुद्रीकरण का फैसला कैसा है? जवाब यही मिलता है कि फैसला बहुत अच्छा है लेकिन सरकार को नोट ज्यादा छापने चाहिए, सरकार ने तैयारियां नहीं की। लेकिन जब उनसे कहो कि इसमें हम क्या कर सकते हैं तो वे मौन हो जाते हैं। हमने व्यक्तिगत रूप से देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में कभी सोचा ही नहीं। हम तो यह मानकर बैठे हैं कि सरकार तो है ही सबकुछ करने के लिए लेकिन हमें समझना होगा कि सरकार तब तक कुछ नहीं कर सकती जब तक हम खुद सरकार के साथ खड़े होकर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें।

RBI के अनुसार 31 मार्च 2016 तक भारत में 16.42 लाख करोड़ रूपये मूल्य के नोट बाजार में थे जिसमें से करीब 14.18 लाख रुपये 500 और 1000 के नोटों के रूप में थे। RBI की रिपोर्ट के अनुसार देश में तब तक मौजूद कुल 9026 करोड़ नोटों में करीब 24 प्रतिशत नोट (करीब 2203 करोड़ रुपये) ही प्रचलन में थे।

एक अनुमान के अनुसार देश की कुल मुद्रा प्रसार में 25 प्रतिशत तक नकली करंसी है। इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट और नैशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी की ओर से किये गए संयुक्त अध्ययन में यह पाया गया कि लगभग 70 करोड़ रुपये की नकली मुद्रा हर साल चलन में आ जाती है। इसमें से सिर्फ एक तिहाई जाली मुद्रा ही पकड़ी जाती है और बाकी हमारी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन जाती है। इन सबसे नुकसान किसका होता है? सिर्फ और सिर्फ हमारे देश की अर्थव्यवस्था का? नहीं…. हमें समझना होगा कि इससे अप्रत्यक्ष रूप से हमारा नुकसान होता है और इस नुकसान से बचने के लिए हमें अपनी जिम्मेदारी तय करनी ही होगी।

आज जरूरत है कि हम कैशलेस इकॉनमी की ओर चलने की कोशिश करें। सरकार के इनकम टैक्स का बड़ा स्त्रोत नौकरीपेशा वाला वर्ग है जबकि कारोबारी समुदाय अपनी आय छिपाने में काफी हद तक कामयाब हो जाते हैं। जब लोगों के आय-व्यय की जानकारी ऑनलाइन हो जायेगी तो निश्चित ही सरकार के राजस्व में बड़ी बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा भी कैशलेस इकॉनमी के बहुत से फायदे हैं।

हम जितना अधिक कैश का उपयोग करते हैं, ब्लैकमनी के जमा होने की संभावना उतनी ही अधिक रहती है। ब्लैकमनी से हमारी अर्थव्यवस्था के समानांतर एक और अर्थव्यवस्था तैयार हो जाती है, जिसका सरकार के पास कोई हिसाब नहीं होता। ऐसे में टैक्स चोरी भी काफी ज्यादा होती है। यदि हमारी अर्थव्यवस्था कम से कम कैश वाली होगी तो सरकारी कोष में टैक्स के रूप में अधिकतम पैसा पहुंचेगा और उसका सीधा फायदा हमें यानी आम आदमी को होगा।

कैशलेस व्यवस्था अपनाने से नोट छापने पर होने वाला खर्च बचेगा, नकली नोट का व्यापार खत्म होगा, कागज की बचत होगी, भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, आतंकवाद और नक्सलवाद कम होगा। इसके अलावा इस व्यवस्था को अपनाने से हमें और भी कई फायदे होंगे।

मैं मानता हूं कि भारत एक झटके में कैशलेस नहीं हो सकता क्योंकि असली भारत तो गांव में बसता है। भारत में वे लोग भी हैं जो इंटरनेट छोड़िए, मोबाइल चलाने भी नहीं जानते। लेकिन हम तो उस श्रेणी में नहीं आते। हम तो मोबाइल, इंटरनेट का भरपूर उपयोग अपने दैनिक जीवन में करते हैं। क्या हम व्यक्तिगत स्तर पर यह प्रयास कर सकते हैं कि अपने परिवार में, अपने परिचितों में और दैनिक जीवन में मिलने वाले लोगों को कम से कम कैश प्रयोग करने के तरीके और उसके फायदे बता सकें? क्या हम अपने व्यक्तिगत जीवन में यह संकल्प कर सकते हैं कि जहां तक संभव होगा बिना कैश के ही जीवन जीने का प्रयास करेंगे? विश्वास मानिए, पिछले 43 दिनों के अनुभव के आधार पर बता रहा हूं कि यह बहुत आसान है।

भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली जी ने भी कह दिया है कि बैन की गई करंसी के बराबर की रकम के नोट दोबारा से नहीं छापे जाएंगे। यहां क्लिक कर पढ़ें जेटली का पूरा बयान। ऐसे में पहले जैसी स्थितियां कभी नहीं आने वालीं। इन लंबी लाइनों से निपटने का एक रास्ता है कि हम मिनिमम कैश का प्रयोग करें। कैश को घर में संचित करके ना रखें। क्योंकि अगर आपने ऐसा किया तो इसका सीधा नुकसान उसे हो रहा है जो दिन भर मजदूरी करके शाम को उसी पैसे से रोटी खरीदता है, उसके पास ना ही बैंक अकाउंट है और ना ही मोबाइल। अब जरूरत है कि हम अपनी जिम्मेदारी समझें और यह मानकर चलें कि आज आप गरीबों के लिए कुछ करने की स्थिति में आए हैं।

मेरे बहुत से परिचित हैं जिन्होंने लाखों रुपये के नए नोट जमा करके रखें हैं। हालांकि वह पूरी तरह से पाक-साफ पैसा है लेकिन फिर भी कैश को संग्रहित करना व्यक्तिवादिता और ‘सिर्फ मैं’ की प्रवृत्ति को प्रदर्शित करता है। वे पढ़े-लिखे भी हैं लेकिन अपना पूरा काम कैश से ही कर रहे हैं। समस्या बस इतनी है कि हमने कभी अपनी जिम्मेदारी समझी ही नहीं। हम गरीबी हटाओ के नारे तो लगाते रहे लेकिन कभी इस बारे में सोचने की कोशिश नहीं की कि हम गरीबों और पिछड़ों के लिए क्या कर सकते हैं।

आज हर एक पढ़े-लिखे व्यक्ति के पास एक मौका है कि वह पिछड़ों के लिए कुछ कर सके। कम से कम इतना तो जरूर कि लोगों को ऑनलाइन और कैशलेस व्यवस्था के बारे में जागरुक करें…साथ ही अपनी आर्थिक यात्रा को लेस कैश से कैशलेस तक ले जाएं…. इन लंबी-लंबी लाइनों से निपटने का और कोई रास्ता नहीं…

Tuesday, 13 December 2016

नोटबंदी के बाद लंबी लाइनों के लिए मोदी नहीं, हम जिम्मेदार हैं

15 अगस्त 1947 को हम आजाद हुए थे लेकिन आज 2016 के हालात ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम सचमुच आजादी के अधिकारी थे? आइए, आज उन परिस्थितियों पर बात करते हैं जिन्हें महसूस करके मुझे अपनी ‘आजादी’ पर सवाल उठाना पड़ रहा है:

1000 और 500 के पुराने नोट बैन हुए 1 महीने से अधिक का समय बीत चुका है। जब विमुद्रीकरण का यह फैसला आया था तो मन में उम्मीद थी कि लगभग 1 महीने में सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन हालात जैसे तब थे, आज भी वैसे ही हैं। वही लंबी-लंबी लाइनें, अपनी सब्जी की दुकान बंद करके बैंकों के बाहर सुबह से शाम तक खड़ा रहने के बावजूद खाली हाथ वापस लौटने वाला वही मायूस बुजुर्ग, कैश की कमी के चलते अपनी दुकान के लिए सामान न खरीद पाने के कारण दुकान बंद करके घर में बैठकर सुबगती वह विधवा महिला…. सब कुछ वैसा ही। लेकिन इन सबके लिए जिम्मेदार कौन है? नरेन्द्र मोदी? भारत सरकार? रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया? उर्जित पटेल? या फिर सरकार को विमुद्रीकरण की राय देने वाले लोग? सही मायनों में देखा जाए तो आज के हालातों के लिए इनमें से कोई भी जिम्मेदार नहीं है। आज के हालातों के लिए ‘हम’ यानी आम आदमी जिम्मेदार है। बताता हूं ऐसा क्यों और कैसे।

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क्या आपने कभी सोचा है कि जिन लोगों के पास से करोड़ों रुपए के नए नोट पकड़े जा रहे हैं, उनके पास ये नए नोट आए कहां से? उन तक नए नोट नरेन्द्र मोदी या आरबीआई ने तो नहीं पहुंचाए होंगे। तो फिर उन लोगों के पास नए नोट आ कहां से रहे हैं? नए नोट सरकार ने मुख्य रूप से बैंकों और पोस्ट ऑफिसों को उपलब्ध कराए थे। यानी सीधी सी बात है कि नए नोटों को आम आदमी तक ना पहुंचा कर चंद पैसों या संबंधों के कारण बैंक और पोस्ट ऑफिस वाले गलत हाथों में पहुंचा रहे हैं। इस बात का अनुभव मैंने खुद किया है।

9 नवंबर को रुद्राभिषेक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए घर जाना हुआ। कार्यक्रम में होने वाले खर्चों के लिए घर में कैश की व्यवस्था की गई थी। 10 को एक भंडारे का भी आयोजन था। इस तरह के कार्यक्रमों में बहुत छोटी-छोटी चीजें खरीदनी होती हैं। लेकिन पुराने नोट बैन होने की वजह से उन चीजों को संबंधों के आधार पर उधार ही खरीदना पड़ा। इन सभी खर्चों को लेकर मेरे बाबा जी काफी परेशान थे। 11 नवंबर को आयोजित भंडारे में शामिल होने के लिए मेरे एक दूर के रिश्तेदार जो कि एक पोस्ट ऑफिस में पोस्टमास्टर हैं, वह भी आए हुए थे।
उनके सामने जब इस विषय को लेकर चर्चा होने लगी तो वह बाबा जी से बोले, ‘अरे चाचा, आप बताइए कि कितने के नए नोट चाहिए। कल से आज तक में 40 लाख रुपए अपने परिचितों को बदल कर दे चुका हूं।’ उनके अलावा बैंक में कार्यरत मेरे कई मित्रों सहित रिश्तेदार तक इसी तरह के ऑफर्स दे चुके हैं। एक बात तो साफ है कि जिन लोगों ने कैश के रूप में अपना ब्लैकमनी घर में रखा था उन्होंने साम, दाम, दंड का प्रयोग करके उसे वाइट कर लिया है और लगातार कर रहे हैं। नए नोटों को वे पुरानी तरह से ही अपने घर में छिपाकर रखेंगे और आप एटीएम और बैंक की लाइन में लगे रहेंगे।

note

जो लोग इस तरह के गलत कामों में शामिल हैं (बैंक और पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी) वे भी आम आदमी ही हैं। लेकिन वे आपका हक मारकर अपनी पॉकेट भरने और संबंध बनाने में लगे हैं। लेकिन हम पीएम को जिम्मेदार मानते हैं। एक बार कल्पना करिए कि हम पर अंग्रेजों का शासन था, भारत उनका देश नहीं लेकिन उनका बनाया हावड़ा ब्रिज आज तक वैसे ही खड़ा है। लेकिन जो पुल भारत सरकार ने अपने ही देश के ठेकेदारों से बनवाए उनके टूटने की खबर हमें मीडिया के माध्यम से मिलती ही रहती है। हमने और आपने व्यक्ति के रूप में भले ही कितना ही विकास कर लिया हो लेकिन एक राष्ट्र के रूप में, एक देश के रूप में हम जहां थे, उससे और भी पीछे चले गए और यही कारण है कि कतारों में आम लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। भले ही आप किसी तरह का भ्रष्टाचार ना कर रहे हों लेकिन हमारे आपके ‘अपने’ ही देश को पीछे, बहुत पीछे ले जाने में लगे हैं।
मेरा देश बदल रहा है लेकिन वह सकारात्मक दिशा में नहीं जा रहा। मेरे देश को पीछे ले जाने में हमारे अपने लोग ही लगे हुए हैं और हम चुपचाप देखते रहते हैं। आखिर हम कर भी क्या सकते हैं? हम सिर्फ सरकार को, उसकी नीतियों को गलत बताकर गालियां दे सकते हैं। याद रखिएगा, जब तक मैं और आप नहीं बदलेंगे, तब तक ‘अच्छे दिन’ नहीं आने वाले।

Tuesday, 22 November 2016

नोटबंदी का अंधसमर्थन और अंधविरोध दोनों ही संवेदनहीन

आज 14वां दिन है नोटबंदी का… वही लंबी-लंबी लाइनें… गिरता व्यापार और परेशान लोग…तो क्या नोटबंदी का फैसला गलत था? क्या 1000 और 500 रुपए के नोटों पर बैन लगाकर नरेन्द्र मोदी ने अपनी दायित्वविहीन सामाजिक अपरिपक्वता का परिचय दिया है? इस सवाल का उत्तर समझने से पहले कुछ अन्य बिंदुओं पर भी ध्यान देते हैं।

क्या नोटबंदी का विरोध करने वाला हर एक व्यक्ति वही है, जिसने ब्लैकमनी छिपा रखा है? अगर आप इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि हर एक देशभक्त आंखें बंद करके नोटबंदी का समर्थन कर रहा है या उसे कोई परेशानी नहीं हो रही है तो निश्चित ही आप ‘अन्धभक्त’ ही कहे जाएंगे। क्योंकि रिक्शा चलाने वाले से लेकर और दिहाड़ी पर मजदूरी करने वाले भी इस फैसले से परेशान दिख रहे हैं और उनके पास ना ही ब्लैकमनी है और ना ही वे भ्रष्टाचारी हैं। वे परेशान नोटबंदी के फैसले से नहीं बल्कि इसके क्रियान्वयन से हैं। अगर आप किसी भी सामान्य व्यक्ति से बात करेंगे और उससे पूछेंगे कि अगर इस फैसले से भविष्य में देश का या आम आदमी का फायदा होता है तो क्या यह फैसला ठीक है? इस प्रश्न के जवाब में कोई ‘नहीं’ में जवाब नहीं देगा। हालांकि वह अपनी परेशानी बताएगा, अपने ज्ञान और विवेक के आधार पर कुछ सुधाव देगा लेकिन केन्द्र सरकार को ‘संवेदनहीन’, ‘बेवकूफ’, या ‘पागलों का झुंड’ नहीं कहेगा।

vishva gaurav
दूसरी ओर इस फैसले के क्रियान्वयन में जो नुकसान हुए हैं या हो रहे हैं, यदि उनका मजाक उड़ाया जाए या उनका अपमान किया जाए तो इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा। इस फैसले से जिनको सच में नुकसान हुआ है, उनके दर्द की आवाज को हथियार बनाकर राजनीति भी की जा रही है और की भी जाएगी क्योंकि हमारे अपने नेताओं की राजनीतिक दायित्व की शुचिता शून्य तक पहुंच गई है। हमने जिनको चुना है, हम जिनके पीछे चलते हैं, इस विश्वास के साथ कि वे सही रास्ते पर ही चलेंगे, ऐसे लोग बिना प्रमाणिकता के एक चोर को गरीब जनता का प्रतिनिधि घोषित करके उस चोर की आत्महत्या को ‘शहादत’ जैसा बताने की कोशिश करते हैं और प्रधानमंत्री को इसके लिए जिम्मेदार बताकर कटघरे में खड़ा कर देते हैं। ऐसा कोई नहीं है जिसे इस फैसले से परेशानी ना उठानी पड़ी हो। एक कट्टर मोदीभक्त से लेकर एक कट्टर मोदी विरोधी तक, सभी को परेशानी उठानी पड़ रही है, लेकिन लोग एक उम्मीद के साथ ये परेशानियां सहने को तैयार हैं। ये लोग जो लंबी-लंबी लाइनों में खड़े दिखते हैं, और नोटबंदी से हो रही परेशानियों के बारे में पूछने पर बहुत खुश होकर यह जताने की कोशिश करते हैं कि उन्हें कोई परेशानी नहीं हैं, ये लोग नोट बदलने के लिए नहीं बल्कि देश बदलने के लिए इन परेशानियों को सह रहे हैं।


नोटबंदी के फैसले के क्रियान्वयन की कमियों पर सामान्य जनमानस की परेशानियों पर सवाल जरूर उठने चाहिए लेकिन साथ ही सवाल उन लोगों पर भी उठने चाहिए जो एक समय बाबा रामदेव के साथ 1000 और 500 के नोटों पर तत्काल प्रतिबंध की मांग का समर्थन कर रहे हैं, वे आज आखिर क्यों इस फैसले पर विरोधी सुर अपनाकर ‘छोटीगंगा’ बहा रहे हैं? आज अरविंद केजरीवाल को देश की जनता को बताना चाहिए कि 2012 वाला वह अरविंद केजरीवाल असली था या आज का अरविंद केजरीवाल असली है। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर तो यही लगता है कि केजरीवाल साहब उस समय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का चेहरा बनकर अपना राजनीतिक करियर चमकाना चाह रहे थे, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली और आज सिर्फ विरोध की राजनीति करके अपने अस्तित्व को लोगों के मानस में बचाए रहना चाहते हैं।

इन 14 दिनों में संवेदनशीलता की एक नई परिभाषा को चरितार्थ होते हुए देखा। हमने देखा कि 4 घंटे से लाइन में लगे एक छोटे से किसान, एक मजदूर और एक महिला की परेशानी के लिए हमारे नेता सड़क पर उतरें हैं। अच्छा लगा कि वे आम आदमी के दर्द को महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पीड़ा तब होती है जब वही लोग सवा सौ करोड़ के प्रधान की आंखों के आंसुओं को नौटंकी बताते हैं। राजनीति को नकारात्मकता के चरम तक पहुंचाने वाले ये लोग अगर ऐसा सोचते हैं कि देश उन्हें समझ नहीं रहा, तो यह उनकी भूल है क्योंकि देश सब देख रहा है। मैं नहीं जानता कि इस नोटबंदी का परिणाम क्या होगा लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूं कि देश की सत्ता के सिंहासन पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जो बड़े फैसले लेने की हिम्मत रखता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ समस्या यह थी कि उनमें ऐसे निर्णय लेने की इच्छाशक्ति नहीं थी। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस राजनीतिक दल से वह आते हैं, उसने उन्हें इतने अधिकार ही नहीं दिए थे।

एक बात और, ऐसा नहीं है कि नोटबंदी का फैसला, बीजेपी का फैसला है। बीजेपी के कई नेता, सरकार में बैठे कई लोग, ‘राष्ट्रवादी विचारधारा’ के होने का दावा करने वाले कई संगठन इस फैसले से घबराए हुए हैं क्योंकि भ्रष्टाचार पर कांग्रेस का ‘कॉपीराइट’ तो था नहीं। कहीं से तो शुरुआत करनी ही थी। शुरुआत हुई है, भविष्य में लिखा जाने वाला इतिहास तय करेगा कि इस फैसले से हमें और आपको कितना फायदा हुआ। लेकिन इन सबके बीच आपको एक आम नागरिक होने के नाते, एक भारतीय होने के नाते ऐसा फैसला लेने के लिए दिखाई गई इच्छाशक्ति की सराहना तो करनी ही चाहिए।

लोग कह रहे हैं कि यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला है, सरकार ने तैयारी नहीं की, सरकार ने समय नहीं दिया, सरकार को नोट बदलने के लिए समय दिया जाना चाहिए था। परेशानी मुझे भी हो रही है लेकिन मैनेज करने की कोशिश कर रहा हूं क्योंकि मैं समझ रहा हूं कि यदि नोटबैन करने से 2 महीने या 1 महीने पहले बता दिया जाता तो जितनी देर में आप 10-20 हजार रुपये के नोट बदलते, उतनी देर में ब्लैकमनी संचित करके रखे हुए लोग हजारों करोड़ रुपये बदल लेते। रही बात जल्दबाजी और सरकार की तैयारी की तो मुझे लगता है कि सरकार द्वारा लगातार उठाए जा रहे कदम तथा नीतियों में लगातार हो रहे बदलाव इस बात को प्रदर्शित करते हैं कि सरकार ने आगे की योजना का पूरा ‘ब्लू प्रिंट’ तैयार कर रखा है। ऐसे कदमों का कोई सही समय नहीं होता। जिस समय सरकार ने ऐसी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया, वह अपने आप में बिल्कुल सही समय है।

यह बात सच है कि हमारे देश में जितना ब्लैक मनी है उससे कई गुना ज्यादा ब्लैक मनी स्विस बैंक में भरा पड़ा है। सरकार के नियंत्रण में हमारा अपना देश है, सफाई की शुरुआत अपने घर से ही की जाती है। स्विस बैंक के ब्लैक मनी को निकालने के और कई रास्ते हैं, सरकार आगे क्या कदम उठाएगी वह तो बाद में ही पता लगेगा लेकिन उन कदमों के इंतजार में घर की सफाई भी ना की जाए, यह तो पूर्ण रूप से अव्यावहारिक है।

सरकार के इस कदम से निश्चित ही मुझे मेरे जैसे सभी आम नागरिकों को परेशानी हो रही है लेकिन हमें यह भी पता होना चाहिए कि इससे नकली नोट छापने वालों को, आतंकियों को, नक्सलियों को, कश्मीर में पत्थरबाजों को पैसा देने वालों को, टैक्स चोरों को, बिस्तर और तकियों में नोट भरकर रखने वालों को बड़ा नुकसान हुआ है और उनके नुकसान का हमें भले ही तत्कालिक लाभ ना हो लेकिन दीर्घकालिक लाभ अवश्य होगा।

Tuesday, 15 November 2016

प्रधानसेवक जी! आपका 'राजकुमार' कहीं खो गया है

पीएम नरेन्द्र मोदी ने जनता से पूछा कि क्या मुसलमान बहनों को समानता का अधिकार मिलना चाहिए? उन्होंने पूछा कि क्या मुसलमान माताओं-बहनों की रक्षा होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए? निश्नित ही कोई भी पीएम मोदी के सवालों पर ‘नहीं’ नहीं कह सकता। लेकिन उस रैली के 9 दिन पहले 15 अक्टूबर को एक बेटा गायब हो जाता है। कोई बड़ी बात नहीं। बहुत से लोग गुमशुदा होते हैं। हर दिन थानों में गुमशुदगी की सैकड़ों शिकायतें दर्ज की जाती हैं। लेकिन साहब, आज यानी 15 नवंबर 2016 को 1 महीना हो चुका है। किस बात का 1 महीना?

vishva gaurav
बताता हूं, लेकिन उससे पहले यह जान लीजिए कि जिस बेटे की बात हो रही है, वह कौन है। नजीब अहमद नाम है उसका, उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले का रहने वाला है, जेएनयू के माही मांडवी हॉस्टल के रूम नंबर 106 में रहता था और एमएससी बायॉटेक्नोलॉजी का छात्र था। आज 1 महीना हो चुका है नजीब की मां फातिमा नफीस को अपने बेटे की आवाज सुने। आज 1 महीना हो चुका है दिल्ली पुलिस की नाकामी का। आज 1 महीना हो चुका है उन वादों के झूठे लगने का जो 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान किए गए थे। आज 1 महीना हो चुका है उस विश्वास में पड़ रही दरार का, जिस विश्वास को आधार मानकर देश ने जनमत एक ऐसे व्यक्ति के हाथों में सौंप दिया था जिसके पास उस समय तक मात्र अपने शब्दों से सम्मोहित करने की शक्ति थी। आज मेरा मन कर रहा है कि मैं अपने प्रधानसेवक को याद दिलाऊं कि आपका राजकुमार कहीं खो गया है और राजमाता पिछले 1 महीने से रो रही है। कैसे सेवक हैं आप साहब कि आपको एक मां के आंसू नहीं दिख रहे।

मैं यह सवाल इसलिए भी पूछ रहा हूं क्योंकि मैंने नरेन्द्र मोदी जी की पार्टी के शासन की वह पुलिस भी देखी है जो चंद घंटों में जेल से भागे आतंकियों (यदि इस शब्द पर आपत्ति है तो कृपया उन सभी का इतिहास पढ़ लें) को खोज कर गोली मार देती है, और आज दिल्ली की पुलिस तो उसी पार्टी की सरकार के ‘क्षेत्र’ में आती है। आखिर क्यों, 1 महीने के बाद भी आज तक पुलिस उस एक लड़के को नहीं खोज पाई। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह लड़का किस विचारधारा या राजनीतिक विचार परिवार से आता है, मुझे फर्क पड़ता है तो उस मां के आंसुओं से जिन्हें मैं पिछले 1 महीने से देख रहा हूं।

मोदी जी ने कहा था कि मुस्लिम महिलाओं के साथ न्याय करना सरकार का फर्ज है। अगर वह सच में इसे फर्ज मानते थे तो उसे निभाया क्यों नहीं? सवाल तो उठता है और उठना भी चाहिए कि आखिर क्यों अपने घर से 500 किलोमीटर दूर साहब, फर्ज और अधिकारों की बातें करते हैं लेकिन अपने घर से चंद किलोमीटर दूर रोती मां की आवाज उनके कानों में क्यों नहीं पड़ती? यही दिल्ली पुलिस आम आदमी पार्टी के विधायकों को तो एक छोटी सी शिकायत पर भी खोज लाती है लेकिन उस नजीब को क्यों नहीं खोज पा रही? इस सवाल के दो ही जवाब हो सकते हैं।

पहला- या तो दिल्ली पुलिस नजीब को खोजना नहीं चाहती।
दूसरा- या फिर दिल्ली पुलिस को नजीब को खोजने नहीं दिया जा रहा।

इन दोनों में सच क्या है, इसे पता करना सरकार का काम है क्योंकि हमने हमारी सुरक्षा के लिए, हमारा ध्यान रखने के लिए उसे चुना है। आखिर ऐसी कौन सी जगह है जहां नजीब को छिपाकर रखा गया है। आखिर ऐसी कौन सी जगह है जहां पुलिस की पहुंच तक नहीं है। वैसे एक जगह है जहां अब तक पुलिस नहीं गई है और वह है जेएनयू। संभव है कि एबीवीपी के जिन कार्यकर्ताओं से नजीब की गायब होने से एक दिन पहले मारपीट हुई थी, उन लोगों ने नजीब को जेएनयू के ही किसी हॉस्टल में छिपाया हो। नजीब के साथ जो भी हुआ है, वह देश के सामने आना चाहिए क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह देश, वर्तमान सरकार को कभी माफ नहीं करेगा।

Tuesday, 8 November 2016

क्यों वामपंथियो! बगिया में बहार है?

4 दिन पहले केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक न्यूज चैनल (एनडीटीवी इंडिया) पर देश की सुरक्षा के साथ समझौता करने के आरोप में 24 घंटे का बैन लगाया। साथ ही मंत्रालय ने चैनल को एक शो कॉज नोटिस भेजा। नोटिस के जवाब में चैनल की ओर से प्रणव राय ने कल मंत्रालय के सामने अपना पक्ष रखा। चैनल का पक्ष सुनने के बाद मंत्रालय ने अपने ही फैसले पर रोक लगा दी। मंत्रालय के फैसले पर उसी के द्वारा रोक लगाए जाने के बाद सोशल मीडिया की बगिया में एक ‘बहार’ देखने को मिली। किसी ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट से डरकर सरकार ने अपने ही फैसले को होल्ड पर डाला’ तो किसी ने कहा, ‘सोशल मीडिया की ताकत की वजह से सरकार को अपना फैसला बदलने पर मजबूर होने लगा।’ लेकिन इन सबके बीच एक विशेष बात जिसने मुझे सबसे ज्यादा सम्मोहित किया, वह यह थी कि जो लोग अफजल के मुद्दे पर कोर्ट को घेरने से, न्यायिक व्यवस्था को घेरने से नहीं चूक रहे थे, उनमें एक ‘गजब’ तरह का परिवर्तन दिखा।

4 दिन पहले एक सुप्रसिद्ध चैनल के प्राइम टाइम ऐंकर द्वारा उनके इंट्रो में हमने बालक नचिकेता की कहानी सुनी। निश्चित ही अथॉरिटी का अर्थ जवाबदेही ही होता है लेकिन वह जवाबदेही किसके प्रति होती है? अपने देश और उसके नागरिकों के प्रति या फिर दुश्मन मुल्क के प्रति? मेरा स्पष्ट मत है कि सवाल पूछने की आजादी और अपनी बात रखने की आजादी यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर एक व्यक्ति का अधिकार है। उस मौलिक अधिकार को छीनना, उसका हनन करना अनैतिक भी है और गैर संवैधानिक भी। लेकिन क्या संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के विषय में पढ़ने वालों ने अनुच्छेद 51 के ‘अ’ खंड में बताए गए मौलिक कर्तव्यों के बारे में नहीं पढ़ा?

चलिए, अगर बात इतिहास की हो रही है तो आपको एक किस्से का छोटा सा हिस्सा बताता हूं। विभीषण, रावण के राज्य में रहने वाले एक ऐसा व्यक्ति थे, जिनके सहयोग के बिना श्रीराम को माता सीता वापस नहीं मिलतीं, जिनके सहयोग के बिना लक्ष्मण जी जीवित नहीं बचते, जिनके सहयोग के बिना रावण के राज्य की गोपनीय बातें हनुमान-श्रीराम को पता नहीं लगतीं। एक लाइन में कहें तो ‘सत्य और न्याय के लिए रिश्ते तक न्योछावर करने वाले एक व्यक्ति’, लेकिन… इतना कुछ होते हुए भी, आज उस घटना के हजारों सालों के बाद भी किसी पिता ने अपने बेटे का नाम ‘विभीषण’ नहीं रखा। जानते हैं क्यों? क्योंकि इस संस्कृति में आप राम भक्ति करें या ना करें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर राष्ट्रभक्ति नहीं की तो कभी माफ नहीं किए जाएंगे।

राष्ट्र के प्रति हर एक नागरिक की अपनी विशिष्ट जिम्मेदारी है और यदि कोई भी व्यक्ति या संस्था उस जिम्मेदारी से बचने की, उस जिम्मेदारी को बोझ समझने की या उस जिम्मेदारी का विरोध करने की कोशिश करे और इस पर सरकार कुछ करे या ना करे, अन्य जिम्मेदार लोग उसे सबक जरूर सिखा देंगे।

कुछ मीडिया संस्थानों ने पत्रकारिता के पेशे को देश से भी ऊपर रख लिया और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भुला दिया। इन मीडिया संस्थानों ने निष्पक्षता के नाम पर अजेंडा चलाने का काम शुरू कर दिया। कुछ साल पहले तक मीडिया खबरें परोसता था, साधन ना होने के कारण आम जनता सवाल नहीं कर पाती थी लेकिन सोशल मीडिया ने इनकी पकड़ कमजोर कर दी। कुछ संस्थानों ने समय और टेक्नॉलजी में हुए इस परिवर्तन को स्वीकार किया लेकिन कुछ अपने पुराने ढर्रे पर ही चलते रहे। उन्हीं तटस्थ संस्थानों को बर्दाश्त ही नहीं हुआ कि जनता इनके द्वारा परोसी गयी खबर पर सवाल करे। वास्तविकता यह थी कि इन्होंने खुद में सवाल का जवाब देने की आदत ही नहीं पनपने दी। यही वजह है कि अचानक से इन्हें देश में असहिष्णुता नजर आने लगी थी।

मैं जब पढ़ता था तो रवीश की रिपोर्ट को जरूर देखता था। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि रवीश की पत्रकारिता से यदि उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को निकाल दिया जाए तो आजादी के बाद की विशुद्ध पत्रकारिता को नए आयाम देने वाले चुनिंदा लोगों में वह सबसे ऊपर ही दिखेंगे। लेकिन समस्या मात्र अजेंडा बेस्ड पत्रकारिता से है। कैसा अजेंडा? जब देश रोष में था, आम आदमी सड़कों पर उतरकर कसाब की फांसी की मांग कर रहा था, जब देश कह रहा था कि हम एक आतंकी को अपनी मेहनत की कमाई से ‘अय्याशी’ नहीं करने देंगे, तब उस आतंकी के मानवाधिकार की बात करने वाले कुछ चुनिंदा संस्थान ही थे। और ये मीडिया संस्थान किस विचारधारा से ‘प्रतिबद्ध’ थे, यह भी किसी से छिपा नहीं है। मानवीयताविहीन और संवेदना शून्य लोगों के लिए ना ही मैं किसी मानवाधिकार की आवश्यकता समझता हूं और ना ही किसी धार्मिक अधिकार की। ज्यादा पुरानी बात हो गई क्या? चलिए कुछ हालिया घटनाएं बताता हूं।

जब दादरी हुआ तो हर एक संवेदनशील व्यक्ति दोषी को सजा दिए जाने की मांग कर रहा था, तब इन ‘मानवतावादी’ चैनलों ने भी अच्छी रिपोर्टिंग की, 16-16 घंटे एक ही मसाला चलाया, सरकार को भी खूब सुनाया लेकिन तब जवाबदेही आरएसएस और केन्द्र सरकार की नहीं बल्कि प्रदेश सरकार की बनती थी। खैर, कोई बात नहीं, पूछ लो केन्द्र सरकार से भी सवाल लेकिन जब दिल्ली में डॉ. नारंग की हत्या हो जाती है तो उसे महज रोडरेज क्यों बताया जाता है? आखिर क्यों, पश्चिम बंगाल में एक समुदाय विशेष के कुछ उत्पाती लोगों के द्वारा हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचार की खबर को उन ‘प्रतिबद्ध’ चैनलों द्वारा मात्र खानापूर्ति के लिए दिखाया जाता है?

जेएनयू में जब कुछ लफंगे भारत तोड़ने के नारे लगाते हैं, तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी बताकर यदि सबसे पहले किसी ने देश की आवाज को बांटने की कोशिश की, तो वे यही ‘प्रतिबद्ध’ मीडिया संस्थान थे। क्या स्वतंत्रता और स्वछंदता में कोई अंतर नहीं रह गया?

जब भारत के इतिहास में पहली बार कोई सरकार घाटी में पनप रहे घरेलू आतंकवाद का विनाश करने के लिए कठोर कदम उठाती है, तो इन ‘प्रतिबद्ध’ मीडिया संस्थानों को पैलेट गन्स के छर्रे तो दिखते हैं लेकिन हमारे-आपके लिए पत्थर खाकर भी राशन पहुंचाने वाले सैनिकों का दर्द नहीं दिखता? संवेदनशीनता में यह दोहरापन क्यों?

उड़ी में जब भारत माता ने अपने 19 बेटे खोए तो पूरा देश गुस्से में आंखे लाल किए रो रहा था तो यही ‘प्रतिबद्ध’ मीडिया संस्थान वाले अपने ‘ट्रोलर्स’ के सहारे इतिहास के आइने से मोदी को कोस रहे थे। और जब सेना ने राजनीतिक इच्छाशक्ति के बलबूते पर पीओके में घुसकर मारा, सर्जिकल स्ट्राइक की तो पूरा देश भारतीय जवानों के शौर्य पर जश्न मना रहा था लेकिन ये लोग सेना से सबूत मांगने का काम कर रहे थे। अरे साहब! जवाबदेही में यह दोहरा चरित्र क्यों? देश तुमसे पूछे कि तुमने दादरी पर तो ‘भयंकर’ रिपोर्टिंग की लेकिन ‘मालदा’ पर क्यूं चुप हो तो तुम कहोगे कि हमारा चैनल है, जो चाहेंगे दिखाएंगे? ऐसे तो नहीं चलता है साहब।

मेरे एक पत्रकार मित्र ने कुछ दिनों पहले फेसबुक पर लिखा, ‘अब तो खबर लिखने की अदा भी बताने लगी है कि खबर लिखने वाला वामपंथी है या संघी…’ बात सुनने में सच्ची तो लगती है लेकिन अच्छी नहीं लगती। सवाल यह है कि एक पत्रकार के लिए पहले पत्रकारिता धर्म है या पहले राष्ट्रधर्म… यह सवाल आज इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि कश्मीर के बारामूला में जब कुछ आतंकी हमला करते हैं तो हमारी रक्षा के लिए अपनी शहादत देने वाले नितिन के लिए देश के कुछ नामी चैनल्स और वेबसाइट्स ‘killed’ जैसे शब्द का प्रयोग करते हैं। क्या यह मान लिया जाए कि उन्हें ‘killed’ और ‘martyred’ में अंतर नहीं पता? या फिर यह मान लिया जाए कि उन मीडिया संस्थानों के लिए किसी के मारे जाने और किसी सैनिक की शहादत में कोई अंतर है ही नहीं? संभव है कि यह मात्र एक गलती हो लेकिन अगर यह मात्र एक गलती है तो देश को एक पत्रकार से ऐसी ‘गलतियां’ अपेक्षित नहीं हैं।

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि लोग तथाकथित निष्पक्षता के लिए अपने दायित्व को भी भूल गए हैं। उनका वह दायित्व जो उनकी मातृभूमि के प्रति है, देश की जनता के प्रति है। पिछले कई सालों से सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है कि एनडीटीवी चैनल देशद्रोही है, पाकिस्तान परस्त है, वामपंथी है। वामपंथी होना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन क्या वामपंथ को शहादत का अर्थ नहीं पता? क्या वामपंथ के लिए एक सैनिक की शहादत और आतंकी की मौत में कोई अंतर नहीं लगता। केन्द्र सरकार द्वारा एनडीटीवी बैन पर जो फैसला लिया गया है, वह स्वागत योग्य है। वह फैसला इस बात को प्रमाणित करता है कि सरकार अपनी जवाबदेही से बच नहीं रही है। सोशल मीडिया के रुख को देखकर और चैनल के जवाब से, सरकार ने अपने फैसला का रिव्यू उचित समझा। सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा सरकार को भी है लेकिन पीड़ा तब होती है जब उसी सोशल मीडिया के यूजर्स किसी मीडिया संस्थान की ‘प्रतिबद्धता’ पर सवाल उठाते हैं तो उन्हें भक्त करार दिया जाता है। साहब! जवाबदेही तो बनती है। सरकार की भी और मीडिया की भी।

बात बस इतनी सी है कि अब ‘प्रतिबद्ध’ मीडिया संस्थानों की बगिया की बहार जाने लगी है। मेरा स्पष्ट मत है कि स्वतंत्रता के नाम पर स्वछंदता नहीं चलने दी जानी चाहिए। पेशे को कभी देश, देश के नागरिक और देश की सुरक्षा से ऊपर नहीं रखने दिया जाना चाहिए। और हां, ब्लॉग के शीर्षक में ‘बगिया’ शब्द का प्रयोग इसलिए किया है क्योंकि ये ‘प्रतिबद्ध’  मीडिया संस्थान तो ‘नारीवाद यानी फेमनिस्ट’ विचारधारा के अग्रदूत हैं, अब अगर ‘बाग’ लिखते तो उनको बुरा लगता। तभी तो हम लिख डाले बगिया…

Monday, 7 November 2016

रवीश जी! आपातकाल की बगिया में 'बहार' देखे थे?

प्रिय रवीश जी,
नमस्ते

‘खुला खत’ के माध्यम स संवाद करने की आपकी शैली का मैं पुराना प्रशंसक हूं। आज सोचा कि आपसे आपकी ही शैली में बात करूं… मैं यह बिलकुल नहीं कहता कि सरकार द्वारा किसी भी मीडिया संस्थान पर प्रतिबंध लगाना उचित है। लेकिन मुझे लगता है कि प्रतिबंध और दंडात्मक कार्रवाई के बीच के अंतर को समझने की जरूरत है। यह पूरा मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। मुझे पूरा विश्वास है कि आप देश की न्यायव्यवस्था पर पूरा विश्वास रखते हैं। कोर्ट का जो भी फैसला होगा, वह सभी को स्वीकार्य होगा। मैं इस बहस में नहीं पड़ूंगा कि एनडीटीवी की रिपोर्टिंग गलत थी या सही। इस बात का फैसला कोर्ट करेगा। यदि वह रिपोर्टिंग गलत थी तो निश्चित ही दंड मिलना चाहिए, लेकिन वह दंड उन सभी मीडिया संस्थानों को मिलना चाहिए, जिन्होंने कुछ ऐसी ही रिपोर्टिंग की थी। मेरा मुद्दा कुछ और है, आपने अपने हालिया प्राइम टाइम शो में देश की स्थिति को आपातकाल जैसा बताया।

vishva gaurav
वर्तमान स्थिति को आपातकाल जैसा बताकर आप जताना क्या चाहते हैं? चलिए आपको इंदिरा जी के काल के समय वाले ‘आपातकाल’ की याद दिलाता हूं। वैसे तो आप मुझसे बहुत बड़े हैं, 1975 के आपातकाल के पहले आपका जन्म भी हो चुका था तो निश्चित है जिनसे आपने उस समय को जाना होगा, उनकी स्मृतियां उन लोगों से ज्यादा अच्छी रही होंगी जिनसे मैंने आपातकाल को जाना है। लेकिन फिर भी जितना पढ़ा है, और जितना सुना है उसे आपकी स्मृति में पुनर्स्थापित करके ‘आपातकाल’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करना चाहता हूं।

लोकतंत्र सत्याग्रही जितेंद्र अग्रवाल इंदिरा के आपातकाल को कभी न भूलने वाली त्रासदी कहते हैं। उनके मुताबिक, ‘उसमें न कोई दलील थी और न कोई सुनवाई, सीधे जेल भेज दिया जाता था। लोगों को घरों से पकड़ कर उनकी नसबंदी कर दी जा रही थी। लिहाजा तमाम लोग डर और दहशत से खेतों में छुप कर दिन बिता रहे थे। जिसने भी इस काले कानून के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की उसे पकड़ कर जेल में ठूंस दिया जा रहा था।’

आगरा शहर के पुरुषोत्तम खंडेलवाल और अशोक कोटिया कई महीने जेल में बंद थे और उनके मुताबिक, ‘आपातकाल के दौरान जेलों में सीवर की कोई व्यवस्था नहीं थी और मीसा में बंद कैदियों के शौचालयों में दरवाजे नहीं होते थे। उनके गुप्तांगों में पेट्रोल डाल दिया जाता था, पेचकस और प्लास द्वारा नाखूनों को उखड़ा जाता था।’

महाराष्ट्र से विधायक एवं समाज सेवी मिडाल गोरे को अकोला जेल में चूहों से भरे सेल में रखा गया था। उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी मालती चौधरी को गिरफ्तार कर मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के साथ वाली सेल में रखा गया। अरे साहब! कल्पना करिए उस आपातकाल की जब बेंगलुरु में एक गर्भवती महिला कार्यकर्ता श्रीमती नर्सम्या गरुयप्पा को जंजीरों में बांधकर रखा गया था।

आपातकाल वह था जिसमें सरकार की तानाशाही नीतियों के कारण महंगाई दर 20 गुना बढ़ गई थी। आप तो बड़े आराम से तथाकथित आपातकाल में सरकार पर ‘कटाक्ष’ कर ले रहे हैं लेकिन साहब याद करिए, वह समय जब रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर देश में न पहुंचे इसलिए, दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के कार्यालयों की बिजली रात में ही काट दी गई।

उस दौर के सूचना प्रसारण मंत्री इन्द्र कुमार गुजराल को हटाकर विद्या चरण शुक्ला को नई जिम्मेदारी दी गई, जिन्होंने फिल्मकारों को सरकार की प्रशंसा में गीत लिखने-गाने पर मजबूर किया, ज्यादातर लोग झुक गए, लेकिन किशोर कुमार ने आदेश नहीं माना। उनके गाने रेडियो पर बजने बंद हो गए-उनके घर पर इनकम टैक्स के छापे पड़े। अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सी कुर्सी का’ को सरकार विरोधी मानकर उसके सारे प्रिंट जला दिए गए। गुलजार की आंधी पर भी पाबंदी लगाई गई। उस समय कई अखबारों ने मीडिया पर सेंसरशिप के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, पर उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया गया। उस समय देश के 50 जाने माने पत्रकारों को नौकरी से निकलवाया गया, तो अनगिनत पत्रकारों को जेलों में ठूंस दिया गया।

आपातकाल के बारे में कहने के लिए और भी बहुत कुछ है लेकिन आपने तो आपातकाल की परिभाषा ही बदल दी। आप तो खुद ही आपातकाल घोषित करके अपने चैनल की स्क्रीन काली कर देते हैं। आपको सवाल पूछने से कोई नहीं रोक रहा, यदि कोई रोकता है तो वह आप पर नहीं बल्कि पूरी मीडिया पर हमला कर रहा है। मीडिया के प्रति अथॉरिटी की जवाबदेही होनी चाहिए लेकिन साहब मीडिया की भी आम जनता के प्रति जवाबदेही बनती है। ‘दादरी’ पर आपके चैनल ने खूब ‘विलाप’ किया था और उसके बाद ‘मालदा’ पर मुंह में दही जमा लिया था, तब कहां गई थी जवाबदेही? आपके चैनल के ऑफिस में हजारों लोगों ने सवाल पूछे, सोशल मीडिया पर आपके चानल से सवाल पूछे गए लेकिन तब तो सवाल पूछने वाले ‘गुंडे’ हो गए थे, तब तो उनसे कहा जाता था कि हमारा चैनल है और हमारा जो मन करेगा वह दिखाएंगे।

एक मिनट, कहीं ऐसा तो नहीं था कि उस दिन एक अरनब गोस्वामी, एक दीपक चौरसिया, एक रोहित सरदाना ने आपको अपनी टीवी की स्क्रीन काली करने पर मजबूर कर दिया था?  नीरा राडिया और बरखा दत्त, 26/11 के दौरान एनडीटीवी की रिपोर्टिंग इत्यादि ऐसे आपके एनडीटीवी से जुड़े बहुत से ‘कांड’ हैं, जिन पर लिखने लगूंगा तो समय कम पड़ जाएगा। आज आपको और आपके साथियों को लगता है कि मीडिया का एक तबका खुद न्यायालय बनकर किसी को भी आरोपी से दोषी बना देता है लेकिन साहब, आप भी उनसे अलग कहां हैं, इशरत जहां और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की अपने चैनल की रिपोर्टिंग और याद करिए, आपने भी तो टीवी स्टूडियो में इशरत को मासूम, निर्दोष और शहीद करार दिया था।

खैर छोड़िए यह सब, मुझे बस इतना बता दीजिए कि यदि एक लोकतांत्रिक देश में, जहां हजारों अखबार, चैनल और तमाम संचार माध्यम मौजूद हों, वहां अगर एक कोई भी मीडिया संस्थान कुछ गलत करे, कुछ ऐसा करे जो किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं अपितु पूरे देश के लिए घातक हो, तो ऐसे में उस संस्थान के साथ क्या किया जाना चाहिए? क्या ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर उसे दंड नहीं मिलना चाहिए? संभव है कि आपको ‘गलत’ शब्द की व्याख्या की आवश्यकता पड़े? सीधे शब्दों में हर वह चीज गलत है जो राष्ट्रहित में ना हो, जनहित में ना हो?

मैं मीडिया की स्वतंत्रता के साथ हूं लेकिन वह स्वतंत्रता किसी विशेषाधिकार के साथ नहीं होनी चाहिए। जितनी स्वतंत्रता इस देश के अंतिम व्यक्ति को है, उतनी ही मीडिया को भी।

निश्चित ही अथॉरिटी की जवाबदेही मीडिया के प्रति होनी चाहिए लेकिन साथ ही मीडिया की जवाबदेही भी जनता के प्रति, देश के प्रति होनी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने पर जिस तरह से एक आम नागरिक दंड का अधिकारी है, वैसे ही मीडिया भी। फिर चाहे वह मीडिया संस्थान कोई भी हो।

आपका यह कहना है कि जिस अपराध के लिए NDTV इंडिया को सज़ा दी जा रही है, वह अपराध दूसरे चैनलों ने भी किया है बल्कि रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता तक ने वे बातें उजागर की थीं जो आतंकवादियों के काम की हो सकती थीं। (पढ़ें यह ब्लॉग ) यदि यह सच है तो यह वाकई भेदभाव है जो कि नहीं होना चाहिए। लेकिन यह सच है या नहीं, इसका फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया जाए। मैं अपने इस ब्लॉग में केवल इतना कहना चाहता हूं कि यदि कोई मीडिया संस्थान – कोई भी मीडिया संस्थान चाहे वह सरकार समर्थक हो या सरकार विरोधी –  राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने का अपराध करता है तो उसे सज़ा मिलनी ही चाहिए। किसी एक मीडिया संस्थान पर सिर्फ इसलिए कार्रवाई की जाए कि वह सत्ता या किसी खास विचारधारा का आलोचक रहा है  और दूसरे को छोड़ दिया जाए कि वह सत्ता या किसी खास विचारधारा का समर्थक है तो विश्वास मानिए देश का कोई भी पत्रकार जो अपनी जिम्मेदारी से समझौता नहीं कर सकता, वह सत्ता के अहंकार को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।
धन्यवाद

Saturday, 5 November 2016

'कायर' की मौत पर राजनीति करनेवालों की संवेदनहीनता

28 अक्टूबर 2016, दिवाली के 2 दिन पहले…

मनदीप सिंह, भारतीय सेना का एक जवान, पाकिस्तान ने मनदीप का शव क्षत-विक्षत कर दिया। शहादत से पहले मनदीप को दिवाली पर घर जाने की छुट्टी मिली थी लेकिन सीमा पर चल रहे तनाव के कारण बाद में छुट्टी रद्द हो गई। मनदीप ने एक नया मकान बनवाया था और उनकी इच्छा थी कि दिवाली पर इस घर में गृह प्रवेश किया जाए लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जिस घर में वह गृहप्रवेश का सपना देश रहे थे, उसी में उनका शव रखा गया। मनदीप हरियाणा के कुरुक्षेत्र के रहने वाले थे।

पिछले कुछ दिनों में औसतन हर दूसरे-तीसरे दिन में कोई ना कोई भारतीय जवान शहीद हो रहा है। किसके लिए? मेरे और आपके लिए, उन संवेदनहीन नेताओं के लिए जो लाशों पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से परहेज नहीं करते। मनदीप की शहादत के 2 दिन बाद दिवाली थी। दिवाली के एक दिन पहले महाराष्ट्र के निवासी नितिन सुभाष भी पाकिस्तान की फायरिंग में शहीद हो गए। ये तो सिर्फ 2 नाम हैं। पिछले कई दिनों में भारत ने कई बेटे खोए।

vishva gaurav
इस दिवाली पर भी मैं हर बार की तरह मैं अपने घर से दूर एक नई जगह पर था। मुझे दिवाली का बेहद बेसब्री से इंतजार रहता है। कुछ अनजाने और अपरिचित बच्चों के साथ खुशियां बांटने के उद्देश्य से इस बार दिवाली पर मैं जयपुर पहुंच गया। सुबह जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर से कुछ सकारात्मक ऊर्जा लेकर बच्चों के बीच पहुंचा। लेकिन मंदिर में अचानक मेरे मन में एक बात आई। सुबह का 4 बजकर 5 मिनट, भगवान की मूर्ति के सामने हजारों झुके हुए सिर, कोई बच्चों के लिए कुछ कामना लेकर आया होगा, तो कोई परिवार के लिए। किसी की कामना आर्थिक होगी तो किसी की सामाजिक….उन हजारों सिरों में कुछ सिर उनके भी तो रहे होंगे जिनके बच्चे, भाई, बेटे इत्यादि रिश्तेदार हमारे लिए, हमारी रक्षा के लिए, हमारी शांति के लिए उस सुबह सीमा पर तैनात होंगे। मन में यह ख्याल आते ही मैं बस उन सैनिकों की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करके मंदिर से बाहर आ गया।

पता नहीं क्यों, लेकिन इस दिवाली पर बहुत सूनापन लग रहा था। उस रात पटाखों के शोर के बीच होठों पर मुस्कराहट नहीं बल्कि आंखों में उस बेटी का चेहरा था, जिसके पिता का शव दिवाली से 1 दिन पहले तिरंगे में लिपटकर घर आया था। रोशनी में जगमगाते उस गुलाबी शहर में हजारों दीपों के प्रकाश के बीच उन घरों का ख्याल अनायास ही दस्तक दे रहा था, जिनके घर पर चंद रोज पहले ही अमावस की काली घटा छा चुकी थी…
मैं अकेला छत पर बैठकर सोच रहा था कि क्या दिवाली की रात वह मां दीपक से काजल बना पाई होगी, जिसकी आंखें एक दिन पहले ही अपने बेटे के शव को देखकर पथरा चुकी हैं? क्या वह बहन दिवाली के 2 दिन बाद आने वाले भाई दूज के त्योहार के बारे में नहीं सोचकर नहीं रोई होगी, जिसके भाई ने रक्षाबंधन सूनी कलाई को देखते हुए फोन पर अपनी बहन से वादा किया था कि वह भाईदूज पर घर जरूर आएगा, लेकिन उससे पहले उसका शव आ गया? क्या उस रात वह पिता ‘लक्ष्मी’ की कामना कर पाया होगा, जिसका बेटा सेना में जाने के लिए रोज सुबह उठकर मैदान में दौड़ने जाता है? क्या उस दिन वह भाई उन खुशियों में शामिल हो पाया होगा, जिसके भाई ने होली पर वादा किया था कि वह इस बार जमघट पर उसके साथ पतंग जरूर उड़ाएगा।

ऐसे बहुत सारे सवाल थे लेकिन इन सवालों के बीच सड़क पर पटाखे जला रहे लोगों को देखकर एक सवाल यह भी था कि लाखों रुपये पटाखों पर बर्बाद करने वाले क्या इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि उन परिवारों को अकेला छोड़ दें जिनके घर का चिराग इसलिए शहीद हो गया ताकि ये लोग खुशियां मना सकें। नेता से लेकर अभिनेता तक, सभी दिवाली के जश्न में व्यस्त थे, किसी को उनकी परवाह नहीं थी। शायद रही भी हो, शायद उन्होंने भी ईश्वर से उन सैनिकों की सलामती के लिए दुआएं मांगी हों लेकिन पिछले 3 दिनों में ‘शहीद’ की जो व्याख्या की जा रही है, नेता जिस तरह से एक ‘कायर’ के शव के पास, उसके घर पर जमघट लगाए हुए हैं, उससे मन में एक सवाल तो जरूर उठता है कि क्या एक पूर्व सैनिक की आत्महत्या, सीमा पर दुश्मन की गोली से मारे गए सैनिक से बड़ी है?

5 दिन पहले ही मनदीप का अंतिम संस्कार हुआ। दिल्ली से जितनी दूरी भिवानी की थी, उतनी है कुरुक्षेत्र की भी। लेकिन केजरीवाल से लेकर राहुल गांधी तक, किसी को भी मनदीप के अंतिम संस्कार में शामिल होने की फुर्सत नहीं मिली। उस शहीद के घर कोई नहीं गया, क्या इसलिए क्योंकि उससे इनके वोटबैंक को कोई लाभ नहीं होने वाला था?

वैसे इन लोगों से मुझे ऐसे किसी ‘सत्कर्म’ की अपेक्षा भी नहीं थी। क्योंकि इनकी अग्रज पीढ़ियों ने तो बाटला हाउस में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए मोहन चंद शर्मा को शहीद तक नहीं माना था। इनकी माता जी तो आतंकियों के लिए रात भर अपने पल्लू भिगोती रही थीं। आज इनको एक कायरतापूर्ण कदम को शहादत बताने में कोई हिचक नहीं हो रही है लेकिन ये लोग मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित होने वाले 3 सितंबर 2015 में शहीद हुए लांस नायक मोहन नाथ गोस्वामी की विधवा से किए सारे वादे भूल गए। आज भी उत्तराखंड में कांग्रेस की ही सरकार है लेकिन शहीद मोहन नाथ की पत्नी को ना ही नौकरी मिली और ना ही अन्य वादे पूरे किए गए। क्या इन नेताओं की संवेदनशीलता सिर्फ वोट तक ही सीमित है?

शहादत की एक विशेष परिभाषा गढ़कर हमारे-आपके द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे को लुटाकर राजनीति करने वाले लोगों की आत्मज्योति, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को पार चुकी है। इन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि एक ‘कायर’ के परिवार को करोड़ों रुपए देकर ‘आत्महत्या’ जैसे घृणित कार्य को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं, हमने ही तो इन्हें सत्ता के सिंहासन पर बैठाया है, हमने ही तो इन्हें मौका दिया है कि ये हमारी भावनाओं के साथ खेल सकें, हमने ही तो इन्हें ‘संवेदनहीन’ बनाया है।

Friday, 4 November 2016

तुम जिसे 'शहीद' मान बैठे, वह तो 'कायर' था

‘शहीद’ शब्द से आप क्या समझते हैं? मेरे मुताबिक, अपने व्यक्तिगत लाभ तथा स्वार्थ को छोड़कर जो व्यक्ति समाज हित में अपने प्राण न्यौछावर कर दे वह शहीद होता है। मेरी इस परिभाषा के मुताबिक स्व. रामकिशन ने भी ‘वन रैंक वन पेंशन’ के मुद्दे पर अपनी जान दे दी। अपने अंतिम समय में कहे गए शब्दों में रामकिशन ने साफ कहा कि वह देश और सैनिकों के लिए यह कदम उठा रहा है। यानी कि उसकी जान समाज के लिए गई और इस आधार पर उसे शहीद मान लिया जाना चाहिए। लेकिन…

vishwa gaurav
मैं हमेशा कहता हूं कि इस ‘लेकिन’ का दायरा बहुत बड़ा होता है। क्या सच में रामकिशन को शहीद कहना उचित होगा? बिल्कुल नहीं क्योंकि रामकिशन ने आत्महत्या करके एक कायरतापूर्ण कदम उठाया है और एक कायर को शहीद का दर्जा देना कहीं से भी उचित नहीं है। रामकिशन के सहयोगियों और रिश्तेदारों का दावा है कि रामकिशन को जो पेंशन मिल रही थी वह 5000 रुपए कम थी। रामकिशन को डीएससी से रिटायर होने के बाद हर महीने 24,999 रुपये मिल रहे थे। जबकि ओआरओपी के तहत उन्हें 30 हजार रुपये मिलने चाहिए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैंक की गड़बड़ी के कारण रामकिशन को 5 हजार रुपये कम मिल रहे थे। अब सवाल यह उठता है कि क्या एक सैनिक की इच्छा शक्ति इतनी कमजोर हो सकती है कि वह मात्र 5000 रुपए के लिए आत्महत्या कर ले? अगर एक सैनिक की इच्छाशक्ति इतनी कमजोर हो सकती है तो मुझे लगता है कि हमें सेना में भर्ती किए जाने की प्रक्रिया पर चिंतन करने की जरूरत है। आत्महत्या जैसा कदम, चाहे किसी भी कारण से उठाया गया हो, ऐसा कदम उठाने वाले को मैं कायर मानता हूं, शहीद नहीं।

आज सुबह नाइट शिफ्ट के बाद जब ऑफिस से निकला तो एक महिला सहकर्मी से इस विषय पर कुछ देर चर्चा हुई। उन्होंने कहा, ‘अगर आत्महत्या करने के लिए रामकिशन जैसा कारण होना चाहिए तो हर दिन मेरे जीवन में इस तरह के 5 नए कारणों का ‘निर्माण’ हो जाता है लेकिन मैं तो आत्महत्या नहीं करती।’ क्या सच में सिर्फ 5000 रुपये कम मिलने की वजह से कोई व्यक्ति अपने भरे पूरे परिवार को छोड़कर आत्महत्या कर सकता है? अगर मैं अपने विवेक के आधार पर जवाब दूं तो जवाब ‘नहीं’ में ही मिलेगा।

रामकिशन कांग्रेस के कार्यकर्ता थे और कांग्रेस के समर्थन से चुनाव भी लड़ चुके थे। सभी का अपना विशिष्ट मत और विचार होता है, हम उसका सम्मान करते हैं और करना भी चाहिए लेकिन सवाल यह है कि 10 सालों तक जब कांग्रेस की सरकार रही तब ओआरओपी पर वह सामने क्यों नहीं आए? मोदी सरकार द्वारा ओआरओपी को लेकर उठाए गए एक सकारात्मक कदम के बावजूद एक पूर्व सैनिक का आत्महत्या कर लेना, क्या यह किसी बड़ी राजनीतिक साजिश की ओर इशारा नहीं करता?

नियमों के मुताबिक, किसी वर्तमान या पूर्व सैनिक के द्वारा आत्महत्या करने पर उसे शहीद का दर्जा नहीं दिया जाता है। और ना ही इस परिस्थिति में किसी तरह के अलाउंसेज का प्रावधान है। लेकिन लाशों पर राजनीति करने वाले लोग जबरन एक कायर को शहीद साबित करने में लगे हैं। मुझे दुख है कि एक पूर्व सैनिक को अपनी जान देनी पड़ी लेकिन साथ ही मेरे मन में जिज्ञासा भी है कि ऐसे कायरतापूर्ण कदम के पीछे मूल कारण क्या था, जिसकी वजह से रामकिशन ने इतना बड़ा कदम उठाया?

कुछ ऐसे सवाल, जिनके जवाब देश का आम नागरिक जानना चाहता है-
कहीं रामकिशन की आत्महत्या के पीछे कोई राजनीतिक चाल तो नहीं?
कहीं रामकिशन ने ‘सैनिक अधिकार’ के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिए कोई खेल तो नहीं खेला?
कहीं रामकिशन को आत्महत्या के लिए उकसाया तो नहीं गया?
कहीं यह पूरा ‘खेल’ सिर्फ केन्द्र सरकार को बदनाम करने की साजिश तो नहीं?

मुझे नहीं पता कि देश कभी इन सवालों के जवाब जान पाएगा या नहीं। लेकिन एक बात तो साफ है कि एक सैनिक को आगे करके यदि भारत के नेता राजनीति करेंगे तो उससे सिर्फ देश का ही नुकसान होगा। हो सकता है कि मुआवजे के नाम पर आम जनता के करोड़ों रुपए लुटाकर अरविंद केजरीवाल जैसे लोग अपना वोट बैंक मजबूत कर लें लेकिन यह मुआवजा इस तरह के कायरतापूर्ण कदमों को उठाने के लिए प्रोत्साहित करने में उत्प्रेरक का काम करेगा।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...