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Friday, 1 April 2016

मजाक के नाम पर खिलवाड़ का दिन है अप्रैल 'फूल्स डे'

साल 2003 की बात है, मैं कक्षा 7 का छात्र था। बहुत अधिक समझदार नहीं था लेकिन उस उम्र के बच्चे को पूर्णतया अबोध भी नहीं कहा जा सकता। मेरे साथ कक्षा 12 में पढ़ने वाले नितिन पांडे नाम के एक भैया भी स्कूल जाते थे। वह मेरे घर के पास किराए पर रहते थे और उसी स्कूल के छात्र थे जिसमें मैं पढ़ता था। नितिन भैया मूल रूप से भागलपुर के रहने वाले थे, उनके पिता जी, यूपी के सीतापुर में रहते थे और वहीं एक बैंक में काम करते थे। नितिन भैया की माता जी बीमार होने के कारण भागलपुर में ही रहती थीं।  उस दौरान मोबाइल का प्रचलन आज की तुलना में नगण्य था। पढ़ाई के लिए नितिन भैया लखनऊ में अकेले रहा करते थे। 1 अप्रैल 2003 को हर दिन की तरह हम दोनों साइकल से स्कूल गए। उस दौरान मेरी उम्र के बच्चों के बीच में 'देखो, तुम्हारे पीछे सांप है', 'तुम्हारी ममी बुला रही हैं' जैसे ही मजाक प्रचलन में थे। थोड़ी बहुत मस्ती हम लोग भी करते थे लेकिन वह मस्ती सिर्फ एक खास दिन तक सीमित नहीं थी। मुझे कुछ ऐसा लगता था कि 'अप्रैल फूल' वाले दिन मस्ती करने का अधिकारिक लाइसेंस मिल जाता है। इससे ज्यादा ना ही मैं कुछ जानता था और ना ही कुछ जानना जरूरी समझता था। बस रोज होने वाली मस्ती 1 अप्रैल के दिन कुछ ज्यादा हो जाती थी।

उस दिन भी रोज की तरह ही हम दोनों कॉलेज पहुंचे। दोपहर के समय नितिन भैया के मकान मालिक का स्कूल में फोन आया और उन्होंने बताया कि गांव में नितिन भैया की माता जी का स्वर्गवास हो गया है। नितिन भैया को यह बात पता लगी तो वह मेरे पास आए और अपना स्कूल बैग मुझे देते हुए नम आंखों से बोले, 'इसे घर लिए जाना।' इसके अलावा वह कुछ भी न कह सके और अगने गांव के लिए निकल गए। जब मैं घर वापस आया तो मैंने अपने घर में बताया कि किस तरह से नितिन भैया बिना कुछ बताए गांव चले गए। मेरे बाबा जी ने जब नितिन भैया के मकान मालिक से पता किया तो पता लगा कि नितिन भैया की माता जी का निधन हो गया है और उनके गांव से किसी ने यह जानकारी फोन पर दी है। नितिन भैया से मेरे परिवार का लगाव कुछ ज्यादा ही था इसलिए बाबा जी ने तय किया कि वह भी उनके गांव जाएंगे। फिर बाबा जी ने नितिन भैया के मकान मालिक से उनके पिता जी का फोन नंबर लिया और कॉल की। वहां से मिली जानकारी हैरान कर देने वाली थी। नितिन भैया के पिता जी ने बताया कि नितिन की माता जी पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं और जिसने भी कॉल किया था उसने 'अप्रैल फूल' बनाने के लिए ऐसा भद्दा मजाक किया था।

अब जरा एक बार आप कल्पना कर के देखिए कि 800 किमी दूर रह रहे उस लड़के की क्या स्थिति हुई होगी जब उसने इस परिस्थिति का सामना किया होगा। 'उत्सवधर्मिता' के नाम पर 'अप्रैल फूल डे' जैसे दिनों को मनाने का प्रचलन कितना खतरनाक है, इस बात का अंदाजा हम सिर्फ एक उदाहरण से मना सकते हैं। कुछ लोगों का तर्क हो सकता है कि दीवाली और होली पर भी तो लोगों की जान जाती है तो क्या उसे भी मनाना बंद कर देना चाहिए? दोस्तो, विषय जान जाने या किसी को मानसिक प्रताड़ना देने का नहीं है बल्कि विषय है कि उत्सव के पीछे की मानसिकता क्या है? क्या किसी को मूर्ख (फूल) बनाना बहुत अच्छी बात है? कुतर्क चाहे कुछ भी हो लेकिन सही मायनों में जवाब 'नहीं' ही है।

इस 'दिन' को मनाने के पीछे सर्वाधिक प्रचलित मान्यता ब्रिटेन के लेखक चॉसर की पुस्तक द कैंटरबरी टेल्स की एक कहानी पर बेस्ड है। चॉसर ने अपनी इस पुस्तक में कैंटरबरी का उल्लेख किया है जहां 13वीं सदी में इंग्लैंड के राजा रिचर्ड सेकेंड और बोहेमिया की रानी एनी की सगाई 32 मार्च 1381 को आयोजित किए जाने की घोषणा की जाती है। कैंटरबरी के आम नागरिक इसे सही मानकर मूर्ख बन जाते हैं, तभी से एक अप्रैल को मूर्ख दिवस अर्थात अप्रैल फूल डे मनाया जाने लगा। एक अन्य मान्यता है कि 1564 से पहले यूरोप के अधिकांश देशों मे एक जैसा कैलेंडर प्रचलित था जिसमें नया साल 1 अप्रैल से आरंभ होता था। 1564 में राजा चार्ल्स नवम् (CHARLES IX) ने एक बेहतर कैलेंडर को अपनाने का आदेश दिया। नए कैलेंडर में 1 जनवरी को वर्ष का प्रथम दिन माना गया था। लोगों ने इस नए कैलेंडर को अपना लिया, लेकिन कुछ लोगों ने इसे अपनाने से इनकार कर दिया तथा वे 1 जनवरी को नया साल न मानकर 1 अप्रैल को ही वर्ष का पहला दिन मानते थे। नया कैलेंडर अपनाने वालों ने इन लोगों को मूर्ख मानकर उपहास उड़ाना शुरू कर दिया। तभी से 1 अप्रैल को 'फूल्स डे' के रूप मे मनाने का प्रचलन हो गया।

इन दो मान्यताओं के अलावा एक और तर्क दिया जाता है कि भारतीय संस्कृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष का प्रारंभ माना जाता है। अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति के विषय में हमेशा कहा कि यह पिछड़ी संस्कृति है, इसको मानने वाले 'पागल' हैं और इन बातों के हजारों भी प्रमाण मिल जाएंगे। चूंकि भारत में तो सभी पर्व और त्योहार 'तिथि' यानि नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार मनाए जाते थे, इस प्रकार की गणना अंग्रेजों की समझ के परे थी तो उन्होंने मान लिया कि ये लोग 1 अप्रैल को नया साल मनाते हैं। और फिर भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नीचा दिखाने के लिए 1 अप्रैल को 'फूल डे' मनाने लगे।

इन तर्कों में कोई भी तर्क सही हो सकता है लेकिन इस तथाकथित 'डे' का आधार कहीं से भी आज के परिप्रेक्ष्य में उचित नहीं लगता। कल भी एक अप्रैल था, क्या खास था कल? शायद कुछ नहीं, फिर क्यों मजाक के नाम पर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करा गया? क्यों एक आधारहीन तर्क के साथ अव्यवहारिक 'दिवस' हमने जोर शोर से मनाया? किसी के साथ मजाक करने और किसी को परेशान करने में अंतर होता है। जिस 'डे' के आरंभ होने में ही नकारात्मकता हो उसे आप किस आधार पर तर्कसंगत कह सकते हैं? भारतीय संस्कृति एक उत्सवधर्मी संस्कृति है, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिस उत्सव को हम आत्मसात कर रहे हैं वह पाश्चात्य देशों से आया है या कहीं और से, फर्क इस बात से पड़ता है कहीं हम उत्सवधर्मिता के नाम पर ठगे तो नहीं जा रहे।

सनातन संस्कृति में योग का विशेष महत्व है और 'हास्य' योग के विषय में भी आपने सुना ही होगा। जिस संस्कृति में 'हास्य' को योग की श्रेणी में माना गया हो उसमें 'फूल डे' जैसे दिनों को मनाना क्या कहा जाएगा, आप स्वयं तय कर लीजिए....

Thursday, 31 December 2015

उस साल की वो आखिरी रात...

31 दिसंबर 2006, की सुबह 10 बजे मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा आयोजित प्राथमिक शिक्षा वर्ग (ITC) पूर्ण करके घर पहुंचा। 8 दिनों तक बिना किसी बाहरी संपर्क के बस 283 लोगों के साथ अपना एक अलग समाज बन गया था। वर्ग स्थल से निकलते समय आंखों में आंसू थे लेकिन घर पहुंचते पहुंचते सब सामान्य हो गया। घर पहुंचते ही सबसे पहले मोबाइल ऑन किया और उसे चार्जिंग पर लगाया। उन दिनों संघ के कैंप में मोबाइल पूरी तरह से प्रतिबंधित था और मेरे पास Bird का मोबाइल हुआ करता था जिसमें एयरटेल का सिम था। 1.99 रुपए कॉलरेट के उस दौर में पिता जी महीने में 50 रुपए का रिचार्ज कराते थे यानि बात करने के लिए मिलते थे 21 मिनट। उनके अनुसार मुझे कहीं बात करने की जरूरत ही नहीं थी क्यों कि परिवार के सभी सदस्य मेरी कॉल को काट कर कॉल बैक करते थे। मिसकॉल के उस दौर में मैंने शाम पांच बजे उसे कॉल की तो उसकी मां ने फोन उठाया। उसकी मां से मैंने कहा कि मुझे राहुल से बात करनी है तो उन्होंने रॉन्ग नंबर कहते हुए फोन काट दिया। उसी कॉल के साथ मेरा बैलेंस भी खत्म हो गया।






उन दिनों जब भी उसकी मां या पापा फोन उठाते थे तो मन में जो भी नाम आता था उसे ले लेता था। क्या प्यार था, यही सोचता था कि अगर उसका नाम लिया तो उसके सामने कई सवाल खड़े हो जाएंगे। पिछले 5 महीने में ऐसा पहली बार हुआ था जब मैं उससे लगातार 8 दिन मिला नहीं था। मिलना तो छोड़िए उसकी आवाज भी नहीं सुनी थी। 31 की शाम को शाखा पर अंग्रेजी नववर्ष और वर्ष प्रतिपदा (भारतीय नववर्ष) पर एक लंबा चौड़ा भाषण दिया और शाखा खत्म होते ही अपनी अंग्रजी की ट्यूशन पढ़ने के लिए निकला लेकिन वहां ना जाकर उसके घर के नीचे खड़ा हो गया इस उम्मीद के साथ कि शायद वह बॉलकनी में आ जाए और उसका चेहरा मुझे दिख जाए लेकिन 1 घंटे के इंतजार के बाद भी वह नहीं आई। बैलेंसहीन मोबाइल होने की वजह से मिसकॉल भी नहीं कर सकता था। अंधेरा भी काफी हो गया था और पिताजी का फोन भी आ चुका था तो वापस जाना ही बेहतर समझा। वापस पहुंचने पर उसकी पसंदीदा फिल्म मोहब्बतें लगाई और देखने लगा।

मेरे घर पर रात 9 बजे के बात टीवी देखने की अनुमति नहीं थी। उस दिन भी दादी जी ने आकर कहा कि अब इसे बंद करके खाना खा लो तो मैंने कहा कि आप सब लोग खाकर सो जाओ मैं देर से खाऊंगा क्यों कि 8 दिनों तक टीवी से दूर रहा हूं तो आज देखने की बहुत इच्छा है। क्या बहाने थे...खैर.... रात में फिल्म खत्म होने के बाद दुबारा से लगा ली। कई सारी शंकाएं मन में आ रही थीं कि कहीं ऐसी कौन सी वजह है जिसकी वजह से वह बात नहीं कर रही? कहीं मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई, कहीं वह नाराजगी के चलते हमेशा के लिए बात करना ना बंद कर दे... यही सब सोचते सोचते कब नींद आ गई पता ही नहीं लगा। अगली सुबह बाबा जी ने 5 बजे जगाया लेकिन नींद पूरी ना होने के कारण मैं सर दर्द का बहाना बनाकर फिर से सो गया। उस दौरान शीतकालीन अवकाश चल रहा था तो कॉलेज की परेशानी भी नहीं थी

सुबह साढ़े 10 बजे नींद पूरी हुई... तो फ्रेश होने के बाद मोबाइल चेक किया तो देखा कि उसके नंबर से 3 मिसकॉल पड़ी हैं। अब बैलेंस ना होने की वजह से ना ही मैं कॉल कर सकता था और ना ही मेरे पास पैसे थे। और अचानक किसी नई किताब के लिए भी पैसे नहीं ले सकता था तो एक नया बहाना बनाया। मैंने घर पर कहा कि मैम का फोन आया है आज अभी ट्यूशन पढ़ने जाना है और नीचे जाकर साइकल की हवा निकाल दी फिर वापस आकर बाबा से कहा कि बाबा साइकल पंचर है और कोचिंग जाना बहुत जरूरी है तो 10 रुपए देकर बोले कि जाओ रास्ते में साइकल सही कराकर चले जाना। मैंने उनसे पैसे लिए और रास्ते में जाकर खुद से हवा भरी। रास्ते भर क्वाइन बॉक्स वाला पीसीओ ढ़ूढता रहा सिससे कि 1 रुपए में बात हो जाए। उसकी कॉलोनी के पास में ही एक पीसीओ मिला। वहां से मैंने उसे डरते डरते कॉल की। उसने जैसे ही फोन उठाकर हेल्लो बोला... ऐसा लगा जैसे दुनिया कि सारी खुशियां मिल गईं। उस दौर में मैं यह नहीं समझता था कि ऐसी खुशियां क्षणिक होती हैं जिनमें कोई स्थायित्व नहीं होता।

जब मैंने हेलो बोला तो उसने कहा, 'गौरव कहां हो तुम? मैं कब से तुम्हें कॉल कर रही हूं... ऐसा कौन सा कैंप होता है जहां बात भी नहीं की जा सकती।' मैं कुछ बोलता इससे पहले ही उसने कहा, 'सब लोग न्यू ईयर पर 1 घंटे में चंद्रिका देवी मंदिर जा रहे हैं.. तुम घर आ जाओ.. हम लोग बैठ कर ढ़ेर सारी बातें करेंगे।' यह सुनते ही लगा जैसे रात को मेरी आंखों में आई नमी को मेरे श्रीराम ने महसूस कर लिया।

मैं तुरंत वापस गया और कपड़े बदलने लगा। बाबा ने पूछा कि क्या हुआ तो मैंने बोला कि ठंड लग रही थी इस लिए सोचा कि एक स्वेटर और पहन लूं। कुछ ही मिनटों में मैं उसके गेट पर था। बेल बजाने पर उसने दरवाजा खोला और अंदर आकर बैठने को कहा और खुद पानी लेने चली गई... कुछ पलों के बाद सोफे पर मेरे ठीक बगल में वह बैठी थी। मैं उठकर उसके सामने बैठ गया और उससे कहा कि, आज मैं तुम्हें जी भरकर देखना चाहता हूं।

वह बार-बार बालकनी ले नीचे अपने मां-पापा को देखने जा रही थी। हम लोग एक साथ लगभग 3 घंटे बैठे रहे। उसने कई सवाल पूछे लेकिन मेरे पास किसी का जवाब नहीं था। मैं उसे नहीं बस उसे देखता जा रहा था। मैं उसे 'संघ' समझाने की स्थिति में नहीं था। मैं उसे यह नहीं बता सकता था कि मैं इतने दिनों तक कहां था। मैं उसमें खोया था कि अचानक सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आवाज आई, वह दौड़कर बालकनी में गई और वापस आकर बोली कि गौरव सब लोग आ गए, अब क्या होगा। मैं तुरंत उठा और उसके घर के ऊपर वाले फ्लोर पर चला गया। फिर लगभग 10 मिनट के इंतजार के बाद नीचे आकर देखा तो उसके घर का दरवाजा बंद था। सबसे सुकून भरा दिन था वह... ऐसा लगा जैसे उन 3 घंटों में सारी जिन्दगी जी ली हो। उसके साथ बिताए उन लम्हों के बारे में सोचते सोचते मैं घर पहुंचा और फिर से 'मोहब्बतें' लगा कर देखने लगा लेकिन इस बार वह फिल्म कुछ अलग लग रही थी। मेरे लिए 2007 की इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती थी।

पिछले साल 31 दिसंबर 2014 को मैं अपने दोस्तों के साथ 'क्वीन ऑफ हिल्स' कहे जाने वाली मसूरी में था। उन हसीन वादियों में अपनी क्वीन के बारे में सोच रहा था कि काश वह भी हमारे साथ होती। 31 की रात तो दीपक, सिद्धार्थ, शशिकांत और उत्कर्ष के साथ बीत गई लेकिन मैं अपनी जिन्दगी के नए साल यानी 2016 की शुरुआत अपनी क्वीन की आवाज सुनकर करना चाहता था। मैंने उसे कॉल किया लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। पूरी रात सुबह के इंतजार में बीत रही थी। मैं अपने साथ-साथ अन्य दोस्तों को भी जागने पर मजबूर कर रहा था। उनको लग रहा था कि मैं उन लोगों के साथ नए साल के मजे लेना चाहता था लेकिन सच तो कुछ और ही था। मैं बस इतना चाहता था कि जल्दी से सुबह हो जाए और मैं उसे कॉल करके उसकी आवाज सुनूं। सुबह के 6 बजते-बजते सब सो गए और मैं होटल के बाहर टहलने निकल गया। सुबह का 8 बजा और उसका फोन भी... उसने फोन उठाते ही कहा 'इतनी रात में कॉल क्यों किया था?' मेरे पास कोई जवाब नहीं था, मेरा काम हो गया था। नए साल की शुरुआत में उसके द्वारा इस तरह के प्रश्न की अपेक्षा नहीं थी.... लेकिन आवाज सुन ली तो मन को सांत्वना दे दी कि यह साल बहुत ही बेहतर जाने वाला है... और सच में पिछला साल बहुत ही बेहतर गया... बहुत से चेहरे बेनकाब हो गए... उन बेनकाब चेहरों में एक चेहरा उसका भी था...

अंग्रेजी नववर्ष का विरोध क्यों? इस तरह मनाएं इसे.....

इस बार मैं अपने जीवन का दूसरा अंग्रेजी नववर्ष मनाऊंगा, जी हां, सही पढ़ा, दूसरा। 1 साल पहले तक मैं अंग्रेजी नववर्ष के उत्सव को नहीं मनाता था लेकिन जब दिसंबर 2014 में इस विषय पर चिंतन किया तो कोई ऐसा कारण नजर नहीं आया जिसके कारण अंग्रेजी नववर्ष का बहिष्कार किया जाए। जब हम अंग्रेजी तिथियों के अनुसार अब तक का अपना पूरा जीवन जी रहे हैं तो उस नववर्ष को मनाने में क्या बुराई है? यह बात मेरी समझ से परे है। रही बात प्रकृति की तो दीवाली भी ठंड में होती है, उसे पूरी ऊर्जा के साथ मनाते हैं तो 31 दिसंबर को या 1 जनवरी को क्यों इतनी ठंड लगती है? यह मुझे समझ में नहीं आ रहा। मैं इसे गुलामी के पर्व के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे दिन के रूप में लेता हूं जिस दिन पूरी दुनिया, शराब और शबाब के नशे में डूबी होती है उस दिन हम भारत के लोग कुछ अच्छा करने का संकल्प ले रहे होते हैं। पिछले साल की तरह ही इस बार भी 31 दिसंबर की रात आगामी अंग्रेजी नववर्ष के लिए एक संकल्प लेने की रात होगी।

जैसा कि मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं कि मैं बहुत ही स्वार्थी किस्म का व्यक्ति हूं और अंग्रेजी नववर्ष के उत्सव को मनाना के पीछे भी मेरा एक स्वार्थ है। प्रत्येक वर्ष भारतीय नववर्ष के प्रारम्भ में मैं एक संकल्प लेता हूं और प्रयास करता हूं कि उस संकल्प को पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से पूर्ण कर सकूं। लेकिन पिछले साल से वैसा ही एक संकल्प अंग्रेजी नववर्ष पर लेना शुरू किया। इससे अब एक साल में मेरे दो-दो संकल्प हो जाते हैं। दोस्तों, भारत में बहुत ही उत्सवधर्मी प्रकृति के लोग रहते हैं। छोटी छोटी बातों में खुशियां ढ़ूढना हमारी खासियत है। अपने जीवन में हर दिन हम खुश रहने के बहाने ढूढ़ते हैं तो अंग्रेजी नववर्ष में हम अपनी खुशियां क्यों नहीं ढ़ूढ सकते? क्यों हम इस दिन कुछ नया और समाज के लिए अच्छा करने का संकल्प नहीं कर सकते? मैंने तो सोच लिया है कि मैं इस साल आने वाले हर पर्व पर अपने आस पास के एक बच्चे को खुशी देने की कोशिश करूंगा। बहुत छोटी सी कोशिश है लेकिन मैं इसी में अपनी खुशी खोजने की कोशिश करूंगा। कुछ अच्छा करने के लिए हमें एक बहाना चाहिए होता है। उस बहाने के रूप में मेरा यह संकल्प काम करेगा।



मैंने पिछले वर्ष संकल्प किया था कि पूरे साल में सिर्फ एक व्यक्ति की नकारात्मकता दूर करूंगा और जब उसकी नकारात्मकता दूर हो जाएगी तो मैं उससे निवेदन करूंगा कि अपने किसी परिचित की नकारात्मकता दूर करे। इसके लिए मैंने एक ऐसे लड़के को चुना था जो अपने आगे किसी की नहीं सुनता था। बहुत बचपना था उसमें, उम्मीद थी कि एक साल में मैं जरूर सफल हो जाऊंगा। लेकिन मुझे खुशी है कि ईश्वर की कृपा से मैं 8 महीनों में ही सफल हो गया। यह बात आज भी उस लड़के को नहीं पता है कि उससे संबन्धित मैंने अपने जीवन में कोई संकल्प किया था। आज वह एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में कार्यरत है, मेरे साथ ही पढ़ता था। बहुत सी क्षमताएं थी उसमें लेकिन बस नकारात्मकता के कारण अपनी क्षमताओं को समझ नहीं पा रहा था। पिछली बार जब उससे 6 महीने के बाद मिला तो लगा कि चलो अंग्रेजी नववर्ष के कारण अपनी जिंदगी में कुछ तो अच्छा किया।
इस साल भी एक संकल्प लिया है औऱ मुझे पता है कि मैं उसे पूरा कर लूंगा। आप भी कुछ अच्छा करें तो अंग्रेजी नववर्ष को भारतीयता का रूप दे सकते हैं। तो आईए साथ मिलकर मनाते हैं अंग्रेजों के इस नए साल का जश्न, अपनों के साथ और अपनों के लिए.....लेकिन रुकिए इस नए साल के जश्न के चक्कर में भारतीय नए साल को भूल मत जाना....उस दिन भी कुछ अलग करना है और उस समय तो और अच्छे से कर पाएंगे क्यों कि प्रकृति भी हमारे साथ होगी...

वन्दे भारती...

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...