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Tuesday, 15 March 2016

काश! ये 'फर्जी राष्ट्रवादी' संघ को समझ पाते

कल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह भैया जी जोशी ने कहा कि इस समय संघ अपनी सर्वोच्च स्थिति में है। निश्चित ही संघ अपनी सर्वोच्च स्थिति में है लेकिन देश की राजनीति अपने निम्नतम स्तर पर है। एक ओर जहां संघ पर कांग्रेस और वामपंथियों के द्वारा लगातार आघात होते रहते हैं तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्रवाद को एक रंग विशेष और एक विशेष पूजा पद्धति से जोड़कर देखने वाले फर्जी राष्ट्रवादी देशभक्ति के प्रमाण पत्र बांटते रहते हैं। लोकतंत्र में आलोचना का विशिष्ट स्थान होता है लेकिन आलोचना जब अंधविरोध का रूप ले लेती है तो समाज पर एक नकारात्मक प्रभाव जाता है। कभी कोई संघ की तुलना आईएसआईएस से कर देता है तो कभी कोई भगवा आतंकवाद का राग अलापने लगता है। एक 1993 का दौर था और जब तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने इसी संगठन के एक स्वयंसेवक को एवं उस दौर के विपक्षी नेता अटल बिहारी बाजपेई को जेनेवा में आयोजित यूएन सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का प्रमुख बनाकर भेजा था।

मुझे एक अन्य प्रसंग भी याद आता है। अभी कुछ समय पहले मैं संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक से चर्चा कर रहा था। चर्चा के दौरान मैंने उनसे पूछा कि भाईसाहब, आपकी दृष्टि से इस देश के तीन सबसे अच्छे प्रधानमंत्री कौन हुए? उन्होंने बिना कुछ सोचे उत्तर दिया, ‘लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा जी और अटल जी’। मुझे थोड़ी-सी हैरानी हुई क्योंकि मुझे अपेक्षा थी कि पहला नाम अटल जी का और कम से कम अंतिम नाम नरेन्द्र मोदी का अवश्य होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैंने उनसे इस उत्तर का विस्तृत कारण पूछा तो उन्होंने कहा, ‘छोटे कद और बड़ी इच्छाशक्ति वाले लाल बहादुर शास्त्री जी ने जिस तरह से पाकिस्तान को जवाब दिया था, वह अतुलनीय था। इंदिरा जी ने बांग्लादेश को स्वतंत्र कराने के लिए जिस प्रकार की इच्छाशक्ति का परिचय दिया था वह किसी सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं थी और अटल जी ने समय को आपने स्वयं ही देखा होगा?’ उन्होंने आगे कहा, ‘कौन किस स्तर का राजनेता है यह समय तय करता है। इंदिरा जी ने आपातकाल लगाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कैद करने का प्रयास किया था लेकिन क्या मात्र इसके लिए हम उनके अन्य कार्यों को भूल जाएं?’ प्रचारक महोदय की सकारात्मकता देखकर मैं आश्चर्यचकित था। उस चर्चा के बाद मैंने बहुत सोचा कि क्या इस देश के वामपंथियों और कांग्रेसियों को संघ में कोई सकारात्मकता नहीं दिखती है? इस देश की राजनीति का दुर्भाग्य है कि कोई भगवा (केसरिया) रंग को आतंकवाद से जोड़ता है तो कोई हरे रंग को आतंकवादी बता देता है। कोई कहता है हरा तिलक लगाओ तो कोई किसी इस्लामिक इबादत पद्धति में विश्वास रखने वाले व्यक्ति को जबरदस्ती भगवा ध्वज पकड़ा कर देशभक्त होने का प्रमाण देता है।

मुस्लिम ASI को पीटा, भगवा झंडा हाथ में देकर कराई परेड, ‘जय भवानी’ के नारे भी लगवाए (खबर यहां पढ़ें) इस देश में देशभक्ति के पैमाने रंगों से तय होने लगे हैं। व्यक्तिगत तौर पर लाख बुराइयां होंगी संघ के स्वयंसेवकों में लेकिन क्या उन लोगों की आलोचनाओं के साथ अच्छे कामों की तारीफ नहीं होनी चाहिए?

क्या इस देश के वामपंथी और कांग्रेसी इस बात से इनकार कर सकते हैं कि आजादी के बाद जब पाकिस्तान से शरणार्थी भारत आ रहे थे तो संघ ने 3000 से ज्यादा राहत शिविर लगाए थे?

क्या कांग्रेसी 1962 का युद्ध भूल गए जब सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक सीमा पर पहुंचे थे और पूरे उत्साह से सेना की मदद की थी? क्या यह भी झूठ है कि स्वयंसेवकों के कार्य से प्रभावित होकर जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण दिया था? निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर क्या नेहरू ने नहीं कहा था, ‘संघ को निमंत्रण यह दर्शाने के लिए दिया गया है कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है’?

1965 के पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में क्या घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले और युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का काम करने वाले संघ के स्वयंसेवक नहीं थे? क्या उस दौरान कानून व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद करने वाले और दिल्ली का यातायात नियंत्रण करने में मदद करने वाले संघ के स्वयंसेवक नहीं थे?

आज संघ पर आरोप लगता है कि वह अपने कार्यालय पर तिरंगा नहीं फहराता लेकिन क्या संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह दादरा एवं नगर हवेली की राजधानी सिलवासा में पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा नहीं फहराया था? क्या नेहरू द्वारा गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से इनकार करने के बावजूद जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू नहीं किया था?

क्या संघ के स्वयंसेवक भैरों सिंह शेखावत के विषय में सीपीएम ने यह नहीं कहा था कि राजस्थान में शेखावत प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं? क्या शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे संघ के समवैचारिक संगठन कोई अच्छा काम नहीं करते?

क्या 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चक्रवात में, भोपाल की गैस त्रासदी में, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों में, गुजरात के भूकंप में, सुनामी में, उत्तराखंड की बाढ़ में और करगिल युद्ध में संघ ने राहत और बचाव का कोई काम नहीं किया था? क्या संघ के समवैचारिक संगठन सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर के आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को (38 मुस्लिम और 19 हिंदू) गोद नहीं लिया है? आज जल, जंगल और जमीन की लड़ाई का दावा करने वाले लोग बताएं कि क्या संघ का समवैचारिक संगठन भारतीय मजदूर संघ बिना मजदूरों के समर्थन के विश्व का सबसे बड़ा मजदूर संगठन बन गया?

यह सिर्फ एक पहलू है। इस देश के कुछ फर्जी राष्ट्रवादियों को सारे मुसलमान एक आतंकवादी दिखते हैं। क्या ऐसे तथाकथित हिंदू रक्षकों को शर्म नहीं आते जब वे इस देश को परमाणु संपन्न बनाने वाले एपीजे अब्दुल कलाम की कौम को आतंकवाद से जोड़ देते हैं?

क्या यह झूठ है कि 85 साल का एक बूढ़ा शेर, बहादुर शाह ज़फर जब अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था और अंग्रेजों ने उसके लिए दो पंक्तियां लिखवाकर भेजी थीं कि…
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

और क्या इसके जवाब में बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर जवाब में नहीं लिखा था कि…
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्तान की।

क्या भारत की स्वतंत्रता में 95 वर्ष के जीवन में से 45 वर्ष केवल जेल में बिताने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी)  का कोई योगदान नहीं था? क्या मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हाकिम अजमल खान और रफी अहमद किदवई जैसे राष्ट्रवादियों ने भारत के लिए संघर्ष नहीं किया था? भारत के बाहर जाकर आजाद हिंद फौज के बारे में तो देश के फर्जी राष्ट्रवादी चीख-चीखकर कहते हैं कि उनके लिए कुछ किया जाए लेकिन फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम करने वाले ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत जिन्हें 1915 में फांसी दी गई, उनका देश में कोई योगदान नहीं था। क्या जौनपुर के सैयद मुज़तबा हुसैन के साथ बर्मा में भारत की आजादी की योजना बनाने वाले अली अहमद सिद्दीकी का कोई योगदान नहीं? क्या यह झूठ है कि इन दोनों को 1917 में फांसी पर लटका दिया गया था?

कितनी घटिया स्तर की राजनीति हो गई है इस देश की जिसमें सिर्फ नकारात्मकता है, जिसमें आलोचना नहीं सिर्फ विरोध है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इस देश की एकता, अखंडता और एकात्मता के संरक्षण के लिए सभी विचारधाराएं एक हो जाएं? राष्ट्रवाद और आतंकवाद की कोई पूजा पद्धति नहीं होती। किसी भी पूजा पद्धति को मानने वाला या पूजा पद्धति में विश्वास न रखने वाला व्यक्ति राष्ट्रवादी हो सकता है बशर्ते वह राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास रखते हुए राष्ट्रीय एकता के लिए कार्य करता हो। वह राष्ट्रवादी नहीं हो सकता जो देश में रंगों के आधार बनाकर एकरूपता चाहता हो। ठीक इसी प्रकार से हर वह व्यक्ति जो मानवता में विश्वास न रखता हो, निर्दोषों की हत्या करता हो वह आतंकवादी है।

इस देश में आज सबसे अधिक आवश्यकता है कि देश का प्रत्येक नागरिक अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझे और ऐसे राजनेताओं को सत्ता से दूर रखे जो देश तोड़ने वाली राजनीति करते हों, जो देश को रंगों में बांटते हों। कोई तथाकथित साध्वी जो इस देश के 69 प्रतिशत लोगों को अप्रत्यक्ष तौर पर गाली देती हो या शाही मस्जिद के इमाम से शाही इमाम बन जाने वाला कोई ऐसा व्यक्ति जिसे राष्ट्र की वंदना करना इस्लाम विरोधी लगता हो राष्ट्रवादी अथवा मुसलमान कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।

Saturday, 5 March 2016

'भारत में आजादी' के मायने और वामपंथियों का 'खेल'

देश की संवैधानिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले को इसी व्यवस्था ने आज एक मौका और दिया कि वह 'आजादी' के अर्थ को समझ सके। हिरासत से छूटने के बाद कन्हैया का एक बदला हुआ रूप देखने को मिला। उसके भाषण को सुनकर ऐसा लगा जैसे अपनी मूल विचारधारा से कहीं भटक सा गया है। हालांकि उसके इस भटकाव से मुझे खुशी हुई लेकिन मैं फिर भी कन्हैया कुमार को लेकर कुछ लिखने की इच्छा हुई।

आज कन्हैया ने अपनी विचारधारा को स्पष्ट करते हुए कहा कि हम पेटेंट के खिलाफ हैं, अखंड भारत किसी का पेटेंट नहीं, हम कश्मीर को भारत का अंग मानते हैं। इस बात से मुझे कोई आपत्ति नहीं। मैं भी यही मानता हूं, लेकिन साथ ही मैं कन्हैया से पूछना चाहता हूं कि जब वह जेल में था उस दौरान उसके विचार परिवार के समर्थकों ने खुलेआम यह लिखना और बोलना शुरू कर दिया था कि कश्मीर में जनमत संग्रह करा देना चाहिए, कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए। ऐसा कहने वालों में सिर्फ कन्हैया की विचारधारा के राजनीतिक समर्थक ही नहीं थे बल्कि उनके साथ-साथ देश की प्रबुद्ध माडिया के साथी भी थे। जिनका तर्क था कि आंबेडकर ने भी तो कश्मीर के विषय में 'ऐसा' कहा था।

कन्हैया ने कहा कि देश की सरकार एक पार्टी की सरकार बन गई है, एक दफ्तर की सरकार बन गई है। उनको यह याद दिलाना है कि आप देश के पीएम हैं, शिक्षा मंत्री हैं। कन्हैया ने  साफ किया कि पीएम मोदी से उसका मतभेद है, मनभेद नहीं है। यहां तक बात बहुत अच्छी थी। मतभेद बुद्दिजीवियों के बीच होते हैं, कन्हैया भी एक अच्छा बुद्धिजीवी है, एक नामी संस्थान में पढ़ रहा है, देश की राजधानी में रह रहा है और निसंदेह पढ़ाई भी की होगी। लेकिन मेरा सवाल यह है कि अगर आप मात्र मतभेद रखते हैं तो यदि देश की सरकार एक पार्टी की सरकार बन गई है और आपके मत को स्वीकार नहीं किया जा रहा है तो क्या आप देश की जनता के प्रेम और विश्वास द्वारा दिए गए पुरस्कारों को लौटाने की शुरुआत कर दोगे? यदि आप वास्तव में बुद्धिजीवी हो तो सर्वप्रथम देश की जनता के मन में विश्वास पैदा करो और अपने मत को लोकतंत्रिक मंदिर यानि संसद में प्रतिस्थापित करो।

कन्हैया ने कहा कि देश की न्याय प्रक्रिया में जेएनयू को भरोसा है। कन्हैया ने कहा, 'संविधान विडियो नहीं है, जिसे बदल दोगे। संविधान एक दस्तावेज है। इसे देश की महिलाओं, दलित, किसानों, मजदूरों ने आजादी के आंदोलन के अनुभवों से सींच कर बनाया है। संविधान की प्रस्तावना दुनिया का एक बेहतरीन दस्तावेज है। जो संविधान के साथ खिलवाड़ कर रहा है उन्हें नकारना है। समानता, भाईचारा, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद इन आदर्शों के लिए लड़ना है।' कोई समस्या नहीं है मुझे कन्हैया के इस स्टैंड के साथ। बहुत अच्छी बात है। लेकिन कन्हैया साहब मैंनें भी थोड़ा बहुत भगत सिंह को पढ़ा है लेकिन साथ ही समझने की भी कोशिश की है। भगत सिंह का इशारा उस व्यवस्था की ओर था जो अंग्रेज चला रहे थे। और मुझे इस बात को मानने में कोई संकोच नहीं है कि इस देश की वर्तमान व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। मैं भी मानता हूं कि व्यवस्था में परिवर्तन चाहिए। जब तक व्यवस्था ही नहीं बदलेगी तब तक समानता, सद्भाव जैसे विषय समाज में स्थापित हो ही नहीं सकते। जातिवाद से आजादी मुझे भी चाहिए यद्यपि इस देश को जातिवाद से आजादी चाहिए और इस आजादी को पाने के लिए हमें संविधान में परिवर्तन करना ही होगा लेकिन उससे पहले हमें अपने विचारों में परिवर्तन करना होगा, आपको अपने विचारों में परिवर्तन करना होगा। आपको यह तय करना होगा कि देश में यदि कोई छात्र व्यवस्था से परेशान होकर आत्महत्या करता है तो कुर्तकों के सहारे उसे जातिवादी जंजीरों में जकड़ कर 'दलित' न बनाएं बल्कि एक मेधावी छात्र ने ऐसा कदम क्यों उठाया उस पर चिंतन करें और यदि आवश्यक हो तो व्यवस्था परिवर्तन के लिए आंदोलन करें। हम आपके साथ हैं लेकिन यह तब तक नहीं हो सकता जब तक आप अपना दोहरा चरित्र ना छोड़ दें।

कन्हैया ने कहा, 'जेएनयू वर्तमान में लड़ रहा है भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए। देश को बताना चाहते हैं कि आप जब टैक्स देते हैं उसकी सब्सिडी से हम यहां पढ़ते हैं। आपको आश्वस्त करना चाहते हैं कि यहां के स्टूडेंट्स देशद्रोही नहीं हो सकते।' मुझे भी यही अपेक्षा है लेकिन जब देखता हूं कि उसी जेएनयू में उमर खालिद जैसे लोग भी पढ़ते हैं, जब देखता हूं कि उस विश्वविद्यालय में ऐसे लोग भी पढ़ते हैं जो एक आतंकी अफजल की सजा को न्यायिक हत्या बताते हैं तो मुझे लगता कि हमारा पैसा किसी गलत जगह पर जा रहा है। और कन्हैया साहब, आप कितना भी कह लें कि आप संविधान भक्त हो गए लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि आप अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए ऐसा कर रहे हो। इसमें भी कोई बुराई नहीं है, राजनीति करो लेकिन देश के साथ, देश के विरोध में जाकर करोगे तो उसे देश स्वीकार नहीं करेगा। मुझे खुशी है कि एक रंग वाले झंडे की 'लाल गुलामी' को तोड़कर आज तुम्हारे साथी तिरंगे को भी साथ लेकर खड़े थे।  

कन्हैया ने कहा, 'इतना भी फर्क नहीं समझे कि आरोपी और आरोप सिद्ध में क्या फर्क है। सीधे आतंकवादी बना दिया। हम भी आप जैसे किसी मां-बाप के बच्चे हैं। कोई आतंकवादी नहीं हैं। इसलिए हमें गलत मत समझिए। हक की लड़ाई लड़ते हैं यही अपराध है। अगर आप गलत मानेंगे तो लड़ाई बंद कर देंगे। सरकार गलत कहेगी तो और लड़ेंगे।' बहुत अच्छी बात है। सत्ता को निरंकुश नहीं होने देना चाहिए, आलोचना होनी चाहिए लेकिन कन्हैया यदि विरोध और आलोचना के अंतर को समझने की कोशिश करोगे साथ ही अगर सकारात्मकता और नकारात्मकता के विचारों से बाहर निकलोगे तब जानोगे हक की लड़ाई क्या होती है। जल-जंगल-जमीन के नाम पर किसी सीआरपीएफ जवान की हत्या कर देना अगर हक की लड़ाई है तो मैं ऐसी लड़ाई लड़ने वालों को आतंकवादी से कम नहीं मानता। आतंकवादियों को मारने समय शायद सैनिक न सोचता हो लेकिन एक नक्सली को मारते समय जरूर सोचता होगा। कन्हैया तुमको क्या लगता है कि जब सैनिक की किसी नक्सली के साथ मुठभेड़ होती होगी तो क्या वह निर्ममता से तत्काल उस नक्सली को मारने के लिए तैयार हो जाता होगा। नहीं, उसके हाथ एक बार जरूर कांपते हैं, एक बार उसके मन में तो यह जरूर आता है कि ये लोग यह सब छोड़कर शांति के साथ मिल-जुल कर क्यों नहीं रहते लेकिन नक्सली, पूरी तरह से आतंकवादी कृत्यों से सुसज्जित बस उद्देश्य का अंतर रहता है।

कन्हैया ने कहा, 'मेरा आदर्श अफजल गुरु नहीं, आज मेरा आदर्श रोहित वेमुला है।' अच्छी बात है कि आपका आदर्श रोहित है लेकिन रोहित से पहले आपका आदर्श कौन था? क्या आपके समर्थकों ने कभी अफजल का समर्थन नहीं किया। आज आप कहने लगे कि हर घर से रोहित निकलेगा, बिलकुल निकलना चाहिए लेकिन क्या आप कुछ समय पहले हर घर से अफजल को नहीं निकाल रहे थे।

कन्हैया ने कहा, 'हम अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा जानते हैं। हम आजादी का मतलब जानते हैं। इसीलिए देश से नहीं बल्कि देश में आजादी चाहते हैं।' कन्हैया जी इस देश में आपको कौन सी आजादी नहीं मिली है? आप शायद स्वच्छंदता को स्वतंत्रता मान बैठे हैं। आपको कोई संघ का स्वयंसेवक बनाने नहीं आ रहा, आपको कोई जबरदस्ती बीजेपी के पक्ष में मतदान करने को नहीं कह रहा, आपको कोई जबरदस्ती मनुवादी नहीं बना रहा, सामंतवाद, साम्राज्यवाद यहां है नहीं, कर्म आधारित व्यवस्था है, जो जितनी मेहनत करेगा उसे उतना ही मिलेगा हालांकि इस व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए परंतु फिर भी आवश्यकता के अनुरूप आजादी मिली हुई है। हमें पता है देश में बहुत सी कुरीतियां हैं लेकिन उनको समाप्त ना ही तुम अकेले कर सकते हो और ना ही मैं। एक साथ मिलकर उन्हें दूर करने की कोशिश करो लेकिन अगर समाज बनाने की ही ठानी है तो फिर अपने उद्देश्य में राजनीति मत करो। अगर तुम भारत में ऐसी आजादी चाहते हो कि तुम एक आतंकी की सजा के विरोध में सभाएं करो, तुम नक्सलियों द्वारा मारे गए शहीदों की चिताग्नि ठंडी होने से पहले उनकी हत्या का जश्न मनाना शुरू कर दो, तुम इस देश का अलग इतिहास बनाकर लोगों को बताओ और अगर कोई सही इतिहास बताने की कोशिश करे तो उसे भगवाकरण का नाम दे दो तो यह नहीं चलेगा। अगर तुम भारत में ऐसी आजादी चाहते हो तो बेहतर होगा कि तुम भारत से ही आजादी ले लो। इस देश के शौर्यपूर्ण इतिहास और संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार किसी को भी नहीं है। इस देश को रंगों से ढकने की जरूरत नहीं है। भगवा भी इस देश का है और लाल-हरा भी, उसे पूजा पद्धतियों से जोड़कर, उसे राजनीतिक विचारधाराओं से जोड़कर, उसे संप्रदायों से जोड़कर समाज के सामने प्रदर्शित करने से मात्र देश के टुकड़े होंगे और उन टुकड़ों में कहीं तुम्हारे अपने ही दूर ना हो जाएं इस बारे में भी सोच लो और अगर इस दर्द को व्यवहारिक रूप से समझना है तो कभी जाकर उनके पास बैठो जिनको कश्मीर से भगा दिया गया था या फिर उनके पास जिनको लाहौर से भगा दिया गया था।

Sunday, 3 January 2016

मोदी जी! देश जीत गया लेकिन आप हार गए

नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले इंडिया टीवी के शो 'आप की अदालत' का एक एपिसोड आज अनायास ही याद आ गया। उस शो को मैंने अभी ऑफिस से वापस आकर फिर से देखा। उस शो का एक हिस्सा आप सभी से शेयर करना कर रहा हूं।

रजत शर्मा(होस्ट)- 26/11 की घटना के समय अगर आप इन्चार्ज होते तो क्या करते?
नरेन्द्र मोदी: जो मैंने गुजरात में किया वो कर के दिखाता, मुझे देर नहीं लगती। मैं आज भी कहता हूं, पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए, ये लव लेटर लिखना बंद कर देना चाहिए। प्रणव मुखर्जी(तत्कालीन रक्षा मंत्री) रोज एक चिट्टठी भेज रहे और वो सवाल भेज रहे, ये जवाब देते फिरते हैं। गुनाह वो करें और जवाब भारत सरकार दे रही है।
रजत शर्मा- लेकिन इंटरनैशनल प्रेशर है, उसका भी तो ख्याल रखना पड़ेगा भारत सरकार को।
नरेन्द्र मोदी: इंटरनैशनल प्रेशर पैदा करने की ताकत आज हिंदुस्तान में है, 100 करोड़ का देश है। पूरी दुनिया पर प्रेशर आज हम पैदा कर सकते हैं जी। मैं तो हैरान हूं जी, पाकिस्तान हमको मार कर चला गया, पाकिस्तान ने हम पर हमला बोल दिया मुंबई में और हमारे मंत्री जी अमेरिका गए और रोने लगे, ओबामा, ओबामा...पाकिस्तान हमको मार कर चला गया, बचाओ...बचाओ...ये कोई तरीका होता है क्या? पड़ोसी मार कर चला जाए और अमेरिका जाते हो, अरे पाकिस्तान जाओ ना।
रजत शर्मा- क्या तरीका होता है?
नरेन्द्र मोदी: पाकिस्तान जिस भाषा में समझे, समझाना चाहिए।

दोस्तों, मैं अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी का स्वयंसेवक हूं, मेरी शिक्षा भी विद्या भारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु/ विद्या मंदिर में हुई है लेकिन मैंने अपने जीवन में सिर्फ एक बार बीजेपी को वोट दिया है। मैं लखनऊ महानगर का एकमात्र ऐसा स्वयंसेवक था जो संघ के प्रचारकों के साथ मेरे आराध्य श्रीराम का राजनीतिकरण करने वाली बीजेपी के सिद्धान्तों पर बहस करता था। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने जवानी को जिया तो ऐसा कि राजसी सुखों को छोड़कर समाज के लिए कार्य करने वाले एक ऋषि के साथ वन को चले गए और वन जाते वक्त जब पिता दशरथ ने कहा कि राक्षसों से लड़ने के लिए सेना लेते जाओ तो कहा कि सेना ले गया तो क्या फायदा? वहां जाकर वहां के लोगों की सेना बनाऊंगा ताकि मेरे बाद भी उनमें राक्षसों से युद्ध करने का आत्मविश्वास बना रहे। मैं बहस करता था उन राम के लिए लिए जिन्होंने अपनी पीढ़ियों की परंपरा को तोड़ते हुए एकपत्नीव्रत लिया और एक ऐसी महिला से विवाह किया जिसका कुल तक ज्ञात नहीं था। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने पितृ भक्ति में अपने पिता के एक वचन को इस तरह से निभाया कि 14 सालों तक अयोध्या का सिंहासन फुटबॉल की तरह उछलता रहा। मैं बहस करता था तो उन राम के लिए तो उन राम के लिए जिन्होंने अपने प्रेम के लिए नदियों को छोड़िए, समुद्र पर भी पुल बना दिया। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने राजधर्म निभाया तो ऐसा कि राक्षसों का वध करके जीते गए क्षेत्र को वहीं के मूल निवासियों के हवाले कर दिया और अपने राज्य के एक सामान्य व्यक्ति की बात सुनकर अपनी धर्म पत्नी स्वयं से दूर कर दिया। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने मातृभूमि से प्रेम किया तो ऐसा कि सोने की लंका को छोड़ कर सामान्य जनमानस के बीच अयोध्या पहुंच गए।

मेरे उन श्रीराम को राजनीतिक गलियारों में बेचने वाले तथाकथित भक्तों को मैंने मोदी के भाषणों की वजह से लोकसभा चुनाव में वोट दिया। मेरे सांसद महोदय आज देश के गृहमंत्री हैं लेकिन कल पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकवादी हमले के समय उनकी हिम्मत नहीं थी कि वे देश की जनता का सामना कर सकें। देश के जवानों ने जब आतंकियों को मार गिराते हुए विजय पताका लहराई तब वे मीडिया के सामने आने की हिम्मत जुटा पाए। अरे राजनाथ जी, देश के जवान तो तब भी आतंकियों के सामने अपनी जान की बाजी लगा कर संघर्ष कर रहे थे जब हमारे सांसद कुर्सियों के नीचे छिपने की जगह ढ़ूंढ रहे थे, उस वक्त आप कहते थे कि भारत को उन्हें जवाब देना चहिए लेकिन आज जब आपके हाथ में सब कुछ है तो आप चुप-चाप बस सैनिकों को शाबासी देकर चल दिए।

मुझे खुशी है कि आज पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकी हमले के बाद हमारे देश के सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सभी आतंकियों को मार गिराया लेकिन मुझे दुःख भी है कि एक के बदले 10 सिर लाने का दंभ भरने वाली सरकार का प्रधान जब कर्नाटक के एक कार्यक्रम में भाषण देता है तो मात्र उसी पुरानी जुमले बाजी के सहारे देश के मन में खुद को प्रतिस्थापित करने की करने की कोशिश करता है जिनके भरोसे आज वह देश की सत्ता के सिंहासन पर काबिज है।  माननीय प्रधानमंत्री महोदय, इस गलतफहमी में मत रहिएगा कि देश ने अगर एक इतिहास को रचते हुए अगर आपको पूर्ण बहुमत वाली कुर्सी दी है तो वह इसलिए नहीं दी कि देश कांग्रेस से परेशान था, देश की जनता ने आपको देश की सत्ता का संचालन इसलिए सौंपा है ताकि आप देश के स्वाभिमान की रक्षा कर सकें। साड़ियां और शालें तो आती-जाती जाती रहेंगी लेकिन अगर आप सत्ता के अहंकार में देश के दिल से निकल गए तो फिर दुबारा वापस आने का मौका नहीं मिलेगा।

केन्द्र में बीजेपी सरकार आने से पहले नरेन्द्र मोदी ने एक निजी चैलन को दिए गए साक्षात्कार में कहा था, 'लादेन का पाकिस्तान की धरती पर मारा जाना इस बात की पुष्टि करता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों का एक बहुत बड़ा अड्डा बना हुआ है, भारत सरकार को इस विषय को तत्काल संज्ञान में लेना चाहिए और विश्व की मानवतावादी शक्तियों को एकजुट करते हुए अमेरिका पर भी दबाव डालना चाहिए कि वह ढ़ुलमुल नीति ना अपनाए। यह दुर्भाग्य है कि सुबह ओबामा के वक्तव्य में पाकिस्तान के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा गया है। भारत सरकार को इसे गंभीरता से लेते हुए मानवतावादी शक्तियों को एकजुट करना चाहिए।'

मोदी जी, तब हमारे तत्कालीन पीएम अमेरिका के सामने खड़े नहीं हो पाते थे, शायद इस लिए क्योंकि उन्हें भारत की युवा शक्ति पर विश्वास नहीं था लेकिन आप तो देश की शक्ति  को जानते हैं, बराक सहित विश्व के सभी बड़े नेता आपके मित्र हैं, अब बनाइए इंटरनैशनल प्रेशर और घर में घुसकर मारिए मौलाना मसूद अजहर को। अब तो नवाज से भी आपकी अच्छी दोस्ती है, वह भी साथ देंगे आपका, कोशिश तो करिए। मोदी जी, मैं अब भी आशाहीन नहीं हुआ हूं, मुझे उम्मीद है कि आपका पौरुष जागेगा और 17 साल पहले की गई गलती को सुधार लिया जाएगा। पता नहीं क्यों उम्मीद का दिया मेरे मन में जल रहा है? वो भी उन परिस्थितियों में जब हमले के बाद खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली पार्टी की ओर से यह बयान आता है कि सिर्फ एक हमले की वजह से पाकिस्तान के साथ चल रही वार्ता रद्द नहीं की जाएगी। अब देश जुमलेबाजी में फंसने वाला नहीं है और इस बात को दिल्ली तथा बिहार की जनता ने प्रमाणित भी कर दिया है। यदि पीएम साहब फ्लाइट मोड और साइलंट मोड में फंसे रहे तो यह तय है कि इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा। उम्मीद है कि खुद को प्रधानसेवक कहने वाले मोदी जी जनरल मोड पर आ जाएंगे और पाकिस्तान को उसी की भाषा में रिटर्न गिफ्ट देंगे।

Thursday, 31 December 2015

उस साल की वो आखिरी रात...

31 दिसंबर 2006, की सुबह 10 बजे मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा आयोजित प्राथमिक शिक्षा वर्ग (ITC) पूर्ण करके घर पहुंचा। 8 दिनों तक बिना किसी बाहरी संपर्क के बस 283 लोगों के साथ अपना एक अलग समाज बन गया था। वर्ग स्थल से निकलते समय आंखों में आंसू थे लेकिन घर पहुंचते पहुंचते सब सामान्य हो गया। घर पहुंचते ही सबसे पहले मोबाइल ऑन किया और उसे चार्जिंग पर लगाया। उन दिनों संघ के कैंप में मोबाइल पूरी तरह से प्रतिबंधित था और मेरे पास Bird का मोबाइल हुआ करता था जिसमें एयरटेल का सिम था। 1.99 रुपए कॉलरेट के उस दौर में पिता जी महीने में 50 रुपए का रिचार्ज कराते थे यानि बात करने के लिए मिलते थे 21 मिनट। उनके अनुसार मुझे कहीं बात करने की जरूरत ही नहीं थी क्यों कि परिवार के सभी सदस्य मेरी कॉल को काट कर कॉल बैक करते थे। मिसकॉल के उस दौर में मैंने शाम पांच बजे उसे कॉल की तो उसकी मां ने फोन उठाया। उसकी मां से मैंने कहा कि मुझे राहुल से बात करनी है तो उन्होंने रॉन्ग नंबर कहते हुए फोन काट दिया। उसी कॉल के साथ मेरा बैलेंस भी खत्म हो गया।






उन दिनों जब भी उसकी मां या पापा फोन उठाते थे तो मन में जो भी नाम आता था उसे ले लेता था। क्या प्यार था, यही सोचता था कि अगर उसका नाम लिया तो उसके सामने कई सवाल खड़े हो जाएंगे। पिछले 5 महीने में ऐसा पहली बार हुआ था जब मैं उससे लगातार 8 दिन मिला नहीं था। मिलना तो छोड़िए उसकी आवाज भी नहीं सुनी थी। 31 की शाम को शाखा पर अंग्रेजी नववर्ष और वर्ष प्रतिपदा (भारतीय नववर्ष) पर एक लंबा चौड़ा भाषण दिया और शाखा खत्म होते ही अपनी अंग्रजी की ट्यूशन पढ़ने के लिए निकला लेकिन वहां ना जाकर उसके घर के नीचे खड़ा हो गया इस उम्मीद के साथ कि शायद वह बॉलकनी में आ जाए और उसका चेहरा मुझे दिख जाए लेकिन 1 घंटे के इंतजार के बाद भी वह नहीं आई। बैलेंसहीन मोबाइल होने की वजह से मिसकॉल भी नहीं कर सकता था। अंधेरा भी काफी हो गया था और पिताजी का फोन भी आ चुका था तो वापस जाना ही बेहतर समझा। वापस पहुंचने पर उसकी पसंदीदा फिल्म मोहब्बतें लगाई और देखने लगा।

मेरे घर पर रात 9 बजे के बात टीवी देखने की अनुमति नहीं थी। उस दिन भी दादी जी ने आकर कहा कि अब इसे बंद करके खाना खा लो तो मैंने कहा कि आप सब लोग खाकर सो जाओ मैं देर से खाऊंगा क्यों कि 8 दिनों तक टीवी से दूर रहा हूं तो आज देखने की बहुत इच्छा है। क्या बहाने थे...खैर.... रात में फिल्म खत्म होने के बाद दुबारा से लगा ली। कई सारी शंकाएं मन में आ रही थीं कि कहीं ऐसी कौन सी वजह है जिसकी वजह से वह बात नहीं कर रही? कहीं मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई, कहीं वह नाराजगी के चलते हमेशा के लिए बात करना ना बंद कर दे... यही सब सोचते सोचते कब नींद आ गई पता ही नहीं लगा। अगली सुबह बाबा जी ने 5 बजे जगाया लेकिन नींद पूरी ना होने के कारण मैं सर दर्द का बहाना बनाकर फिर से सो गया। उस दौरान शीतकालीन अवकाश चल रहा था तो कॉलेज की परेशानी भी नहीं थी

सुबह साढ़े 10 बजे नींद पूरी हुई... तो फ्रेश होने के बाद मोबाइल चेक किया तो देखा कि उसके नंबर से 3 मिसकॉल पड़ी हैं। अब बैलेंस ना होने की वजह से ना ही मैं कॉल कर सकता था और ना ही मेरे पास पैसे थे। और अचानक किसी नई किताब के लिए भी पैसे नहीं ले सकता था तो एक नया बहाना बनाया। मैंने घर पर कहा कि मैम का फोन आया है आज अभी ट्यूशन पढ़ने जाना है और नीचे जाकर साइकल की हवा निकाल दी फिर वापस आकर बाबा से कहा कि बाबा साइकल पंचर है और कोचिंग जाना बहुत जरूरी है तो 10 रुपए देकर बोले कि जाओ रास्ते में साइकल सही कराकर चले जाना। मैंने उनसे पैसे लिए और रास्ते में जाकर खुद से हवा भरी। रास्ते भर क्वाइन बॉक्स वाला पीसीओ ढ़ूढता रहा सिससे कि 1 रुपए में बात हो जाए। उसकी कॉलोनी के पास में ही एक पीसीओ मिला। वहां से मैंने उसे डरते डरते कॉल की। उसने जैसे ही फोन उठाकर हेल्लो बोला... ऐसा लगा जैसे दुनिया कि सारी खुशियां मिल गईं। उस दौर में मैं यह नहीं समझता था कि ऐसी खुशियां क्षणिक होती हैं जिनमें कोई स्थायित्व नहीं होता।

जब मैंने हेलो बोला तो उसने कहा, 'गौरव कहां हो तुम? मैं कब से तुम्हें कॉल कर रही हूं... ऐसा कौन सा कैंप होता है जहां बात भी नहीं की जा सकती।' मैं कुछ बोलता इससे पहले ही उसने कहा, 'सब लोग न्यू ईयर पर 1 घंटे में चंद्रिका देवी मंदिर जा रहे हैं.. तुम घर आ जाओ.. हम लोग बैठ कर ढ़ेर सारी बातें करेंगे।' यह सुनते ही लगा जैसे रात को मेरी आंखों में आई नमी को मेरे श्रीराम ने महसूस कर लिया।

मैं तुरंत वापस गया और कपड़े बदलने लगा। बाबा ने पूछा कि क्या हुआ तो मैंने बोला कि ठंड लग रही थी इस लिए सोचा कि एक स्वेटर और पहन लूं। कुछ ही मिनटों में मैं उसके गेट पर था। बेल बजाने पर उसने दरवाजा खोला और अंदर आकर बैठने को कहा और खुद पानी लेने चली गई... कुछ पलों के बाद सोफे पर मेरे ठीक बगल में वह बैठी थी। मैं उठकर उसके सामने बैठ गया और उससे कहा कि, आज मैं तुम्हें जी भरकर देखना चाहता हूं।

वह बार-बार बालकनी ले नीचे अपने मां-पापा को देखने जा रही थी। हम लोग एक साथ लगभग 3 घंटे बैठे रहे। उसने कई सवाल पूछे लेकिन मेरे पास किसी का जवाब नहीं था। मैं उसे नहीं बस उसे देखता जा रहा था। मैं उसे 'संघ' समझाने की स्थिति में नहीं था। मैं उसे यह नहीं बता सकता था कि मैं इतने दिनों तक कहां था। मैं उसमें खोया था कि अचानक सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आवाज आई, वह दौड़कर बालकनी में गई और वापस आकर बोली कि गौरव सब लोग आ गए, अब क्या होगा। मैं तुरंत उठा और उसके घर के ऊपर वाले फ्लोर पर चला गया। फिर लगभग 10 मिनट के इंतजार के बाद नीचे आकर देखा तो उसके घर का दरवाजा बंद था। सबसे सुकून भरा दिन था वह... ऐसा लगा जैसे उन 3 घंटों में सारी जिन्दगी जी ली हो। उसके साथ बिताए उन लम्हों के बारे में सोचते सोचते मैं घर पहुंचा और फिर से 'मोहब्बतें' लगा कर देखने लगा लेकिन इस बार वह फिल्म कुछ अलग लग रही थी। मेरे लिए 2007 की इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती थी।

पिछले साल 31 दिसंबर 2014 को मैं अपने दोस्तों के साथ 'क्वीन ऑफ हिल्स' कहे जाने वाली मसूरी में था। उन हसीन वादियों में अपनी क्वीन के बारे में सोच रहा था कि काश वह भी हमारे साथ होती। 31 की रात तो दीपक, सिद्धार्थ, शशिकांत और उत्कर्ष के साथ बीत गई लेकिन मैं अपनी जिन्दगी के नए साल यानी 2016 की शुरुआत अपनी क्वीन की आवाज सुनकर करना चाहता था। मैंने उसे कॉल किया लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। पूरी रात सुबह के इंतजार में बीत रही थी। मैं अपने साथ-साथ अन्य दोस्तों को भी जागने पर मजबूर कर रहा था। उनको लग रहा था कि मैं उन लोगों के साथ नए साल के मजे लेना चाहता था लेकिन सच तो कुछ और ही था। मैं बस इतना चाहता था कि जल्दी से सुबह हो जाए और मैं उसे कॉल करके उसकी आवाज सुनूं। सुबह के 6 बजते-बजते सब सो गए और मैं होटल के बाहर टहलने निकल गया। सुबह का 8 बजा और उसका फोन भी... उसने फोन उठाते ही कहा 'इतनी रात में कॉल क्यों किया था?' मेरे पास कोई जवाब नहीं था, मेरा काम हो गया था। नए साल की शुरुआत में उसके द्वारा इस तरह के प्रश्न की अपेक्षा नहीं थी.... लेकिन आवाज सुन ली तो मन को सांत्वना दे दी कि यह साल बहुत ही बेहतर जाने वाला है... और सच में पिछला साल बहुत ही बेहतर गया... बहुत से चेहरे बेनकाब हो गए... उन बेनकाब चेहरों में एक चेहरा उसका भी था...

Thursday, 22 October 2015

संघ क्यों है और क्यों रहेगा?

दोस्तों, आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 साल का हो चुका है। 1925 में दशहरे के दिन, उस दिन की सार्थकता को प्रमाणित करते हुए डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। सांप्रदायिक,हिंदूवादी, फासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ अपने उद्देश्य से नहीं भटका। मैं इस लेख को इस लिए नहीं लिख रहा क्यों कि मैं एक स्वयंसेवक हूं अपितु अपने पत्रकारिता धर्म को निभाते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ देश के सामने उस संगठन के बारे में लिख रहा हूं जिसकी तुलना आईएसआईएस से करके आतंकवादी करार दिया जाता है।

दोस्तों, स्वतंत्रता के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नजर रखी। यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार। उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे। विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज्यादा राहत शिविर लगाए थे।

1962 में हुए युद्ध के समय सेना की मदद के लिए देशभर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी। संघ ने सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता भी की। जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए। निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- 'यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।'

आज जिस कश्मीर के लिए हम पाकिस्तान से वार्ता कर रहे हैं। वह कश्मीर कभी यह कहता था कि हम भारत के साथ नहीं आएंगे। कश्मीर के महाराजा हरिसिंह विलय का फैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार तो- हम क्या करें वाली मुद्रा में- मुंह बिचकाए बैठी थी। उस समय सरदार पटेल और संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर की इच्छा शक्ति के कारण कश्मीर का भारत में विलय हुआ।

1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया था। शास्त्रीजी ने कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था।

इतना ही नहीं दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे। गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा
आज़ाद हुआ।

भारत का काला अध्याय कहे जाने वाले 1975 से 1977 के बीच लगे आपातकाल के खिलाफ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताजा है। सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन चलाना शुरू किया। आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने संभाला। जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं।

1955 में बना भारतीय मजदूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मजदूर संगठन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था। कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मजदूर संघ ने ही शुरू किया था। आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मजदूर संगठन है। जहां बड़ी संख्या में जमींदार थे उस राजस्थान में खुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं। संघ के स्वयंसेवक शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने।

भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे संगठनों की स्थापना संघ के स्वयंसेवकों ने संघ से प्रेरित होकर ही की। विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है। केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं। संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं। अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज्यादा काम कर रहा है। लगभग 35 हजार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू और कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम और 19 हिंदू बच्चे हैं।

1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक- संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है। भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में संघ के स्वयंसेवकों ने संघ की विचारधारा का मूर्त रूप प्रस्तुत किया।

दोस्तों संघ एक संगठन है, जिसमें विभिन्न प्रकार के लोग जुड़े हैं। संभव है कि संघ के किसी स्वयंसेवक की व्यक्तिगत विचारधारा से आपकी सहमति ना हो लेकिन संघ की मूल विचारधारा से असहमति का विषय किसी के मन में नहीं आ सकता। सैकड़ों आरोपों के बावजूद यदि संघ आज खड़ा है तो उसका एकमात्र कारण है कि संघ ने कभी बांटने की कोशिश नहीं की। राष्ट्रीय एकात्मता के आधारभूत स्तंभ के रूप में संघ आज भी खड़ा है। मित्रों, जब तक संघ का मूल विचार संघ के स्वयंसेवकों के मन में स्थापित रहेगा तब तक संघ इस धरती पर रहेगा और जिस दिन संघ के स्वयंसेवक ने राजनीति में 'अनावश्यक' हस्तक्षेप शुरू कर दिया उस दिन संघ समाप्त हो जाएगा।

वंदे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...