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Wednesday, 23 March 2016

किसको 'फॉलो' करते हैं मोदी? आपको क्या?



मैं एक सामान्य व्यक्ति हूं, पेशे से पत्रकार हूं, अपने काम को किसी प्रकार की वैचारिक प्रतिबद्धता के अधीन होकर नहीं करता और मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मैंने नरेन्द्र मोदी के नाम पर बीजेपी को वोट दिया था। मैं स्वयं को हिंदू मानता हूं, सनातन मूल्यों में मेरा पूर्ण विश्वास है, मानवीयता को सर्वश्रेष्ठ गुण मानता हूं, प्राकृतिक संपदाओं के दोहन का विरोध करता हूं, मनुष्य ही नहीं जीवों को भी इस धरती पर अपने बराबर का सहभागी मानता हूं और यह सब मुझे सनातन संस्कृति ने सिखाया है क्योंकि यही वह संस्कृति है जो मुझे यह सिखाती है कि चीटियों को भी आटा खिलाना है और नागों को भी दूध पिलाना है। रही बात हिंदुत्व की तो यह मेरी राष्ट्रीयता का आधार है और मुझे इस पर गर्व है, जिस प्रकार से लोग राष्ट्रीयता को भारतीय कहते हैं उसी के आधार पर मैं हिंदू को राष्ट्रीयता मानता हूं। इसका एक मात्र कारण है कि मेरा मानना है कि हिंदुत्व में सनातन संस्कारों का समावेश है। मैं नहीं मानता कि हिंदू होने के लिए मंदिर जाना जरूरी है या किसी खास पूजा पद्धति का अनुसरण करके ही आप हिंदू हो सकते हैं। लेकिन जो लोग हिंदुत्व को पूजा पद्धति से जोड़ कर स्वयं की राष्ट्रीयता को भारतीय बताते हैं, मैं उनका विरोध भी नहीं करता क्योंकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वास्तव में 'हिंदू' को रिलिजन ही समझा जाता है। जिस प्रकार से मैं विरोध नहीं करता उसी प्रकार से यह अपेक्षा भी करता हूं कि 'हिंदू' शब्द को मैं जिस रूप में लेता हूं यदि उसमें कोई गलत बात नहीं है तो उसका विरोध न किया जाए।

हिन्दुत्व को लेकर बहुत से लोगों के अपने अलग पैमाने हैं, कोई कहता है कि हिंदू वह है जो राम मंदिर की बात करें, कोई कहता है कि हिंदु वह है जो रोज गीता पढ़े, तो कोई कहता है कि मनुस्मृति को जीवन का आधार मानने वाला ही हिंदू है। मैं इन सब में नहीं पड़ना चाहता लेकिन मैं बस इतना मानता हूं कि हिंदू 'वीर' तो हो सकता है लेकिन कभी कट्टर नहीं हो सकता, हिंदू 'परंपरा' को तो मान सकता है लेकिन अंन्धभक्ति नहीं कर सकता, हिंदू अपनी सनातन संस्कृति को सम्मान दे सकता है लेकिन नियमित मंदिर जाने की अनिवार्यता नहीं थोप सकता, हिंदू अपने संस्कारों पर गर्व तो कर सकता है लेकिन दूसरी संस्कृतियों का विरोधी नहीं हो सकता। इस देश का दुर्भाग्य है कि हिॆदुत्व के नाम पर कट्टरता का सहारा लिया जा रहा है लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है।

मैं पहले भी लिख चुका हूं कि आप किसी जमीनी स्तर पर काम करने वाले कांग्रेसी या वामपंथी से पूछेंगे कि देश टूट जाए क्या? या देश किसी का गुलाम हो जाए क्या? तो उसका जवाब नहीं ही होगा। अगर कोई कांग्रेसी या वामपंथी है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह राष्ट्रविरोधी है। बहुत सीधी सी बात है कि व्यक्ति अपने विवेक के आधार पर तय करता है कि सभी विचारधाराओं/पार्टियों में कौन सी विचारधारा/पार्टी सर्वाधिक अच्छी और परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है। इसके लिए यह अनिवार्यता नहीं कि वह व्यक्ति पूरी तरह से उस विचारधारा अथवा पार्टी से सहमत हो। वरिष्ठ पत्रकार श्री नीरेन्द्र नागर जी ने एक दिन मुझसे कहा था कि विश्व गौरव, व्यक्ति का महत्व नहीं उसके विचारों का महत्व होता है। मैं भी यही मानता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति एक विचार है, वह पूरी तरह किसी विचारधारा से सहमत हो ही नहीं सकता, यदि उसमें स्वयं का विवेक है तो। विचारधारा को कई लोगों के विचारों का कॉकटेल कहें तो गलत नहीं होगा। आप किसी के विचारों से सहमत हो सकते हैं और किसी के विचारों से असहमत, इसी आधार पर आप किसी मुद्दे पर किसी विचारधारा से सहमत हो सकते हैं और किसी मुद्दे पर असहमत हो सकते हैं।

मैं एक पत्रकार हूं, पूर्व में छात्र राजनीति में सक्रिय रहा हूं इसी नाते बहुत से लोग सोशल मीडिया पर जुड़े हैं, फेसबुक पर लगभग 14000 लोग जुड़े हैं, 4000-5000 ग्रुप में जुड़ा हूं, कभी किसी पेज पर अच्छा विचार दिख गया तो उसे लाइक कर दिया। अब एक सीधे सवाल का जवाब दे दीजिए, क्या 14000 लोगों में कोई कुछ लिखता है जिससे कि मैं सहमत न हूं तो क्या उसके लिए यह कहना उचित होगा कि इसकी मित्र सूची में एक पत्रकार जुड़ा है और इसका मतलब है कि वह 'कट्टर' अथवा 'अंधभक्त' है? किसी ग्रुप में कोई फर्जी पोस्ट आ जाए तो क्या यह कहना उचित होगा कि इस ग्रुप में एक पत्रकार है यानि कि वह अफवाहों को बढ़ावा देता है, किसी पेज के द्वारा कुछ अपमान जनक कहा जा रहा है तो क्या यह कहा जाना उचित होगा कि इस पेज को एक पत्रकार ने लाइक कर रखा है और इस बात के लिए इस पत्रकार पर मानहानि का केस करना चाहिए। मेरी सहमति इस बात से तय होगी कि मैं कौन सी पोस्ट शेयर करता हूं।

मैं एक बहुत ही सामान्य व्यक्ति हूं, जिस ट्विटर अकाउंट पर मैं लगातार ऐक्टिव रहता हूं उस पर सिर्फ 3 अकाउंट्स फॉलो कर रखे हैं, एक मेरे छोटे भाई का है, एक उस संस्थान का है जहां मैं कार्यरत हूं और एक अकाउंट कुमार विश्वास का है। मैं कुमार विश्वास का प्रशंसक हूं, इसका मतलब यह नहीं कि उसके सभी ट्वीट्स से पूरी तरह सहमत होता हूं, उसके टू लाइनर अच्छे लगते हैं तो फॉलो करता हूं, कोई काम न होते हुए भी मैं इन तीन हैंडल्स द्वारा किए गए सारे ट्वीट्स नहीं देख पाता। मेरी सहमति उस ट्वीट से प्रदर्शित होगी जिसे मैं रीट्वीट करूंगा।

अब आता हूं मुख्य मुद्दे पर, आज एक 'विशेष रिपोर्ट' पढ़ी। उस विशेष रिपोर्ट का शीर्षक था, 'ट्विटर पर आपकी संगति कुछ ठीक नहीं लगती प्रधानमंत्री जी!'। बहुत ही शोधात्मक रिपोर्ट थी। उस रिपोर्ट को आप 'यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।' इस रिपोर्ट में कहा गया कि ‘कट्टर हिन्दू’ लोगों को फॉलो करते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इन कट्टरपंथियों में कोई भी ‘कट्टर मुस्लिम’, ‘कट्टर सिख’, ‘कट्टर जैनी’ या ‘कट्टर ईसाई’ नहीं है, इनमें कभी लोगों से ‘जी न्यूज़’ देखने की मांग की जाती है, तेजिंदर पाल सिंह बग्गा को नरेंद्र मोदी स्वयं भी फॉलो करते हैं। अब आप बताइए इसमें क्या कोई समस्या है, क्या इन सभी लोगों से पीएम मोदी की पूर्ण सहमति की अनिवार्यता है?

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि नरेन्द्र मोदी मायपीएम नमो, नरेंद्र मोदी पीएम, मोदी फॉर पीएम, मोदी यूनाइटेड फैन क्लब, फ़ोर्स नमो, नमो टी पार्टी, नरेंद्र मोदी आर्मी, नमो चाय पार्टी, इंडिया नीड्स मोदी, नरेंद्र मोदीज फैन, मोदीप्लोमैसी, नरेंद्र मोदी फैन, नमो लीग, नमो 2019, नमो शक्ति, माय पीएम नरेंद्र मोदी, मोदी-फाइंग इंडिया, नमो इंडिया, देश भक्त, नमो_गाथा, मोदीफाई यूपी, नमो युग, नमो माय पीएम, भाजपा पथ-नमो पथ जैसे अकाउंट फॉलो करते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्ममुग्धता का परिचय सिर्फ उनके ‘सेल्फी-प्रेम’ या अपने नाम वाला सूट पहनने से ही नहीं बल्कि ट्विटर अकाउंट्स से भी देखा जा सकता है. यहां मोदी दर्जनों ऐसे अकाउंट्स को फॉलो करते हैं जो उनके नाम से और उन्हें महिमामंडित करने के लिए बनाए गए हैं'। मुझे समझ नहीं आता कि आखिर इसमें बुराई क्या है? आखिर जिन लोगों ने प्रत्यक्ष रूप से मोदी के चुनाव में काम किया, पूरा सोशल मीडिया मैनेज किया उनके विचारों से क्या इस देश के प्रधान को अवगत होने का अधिकार नहीं है? लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि देश का प्रधान उनके दिखाए रास्ते पर ही चलेगा। एक नेता का यह अधिकार के साथ साथ कर्तव्य भी है कि उसे कुर्सी देने वालों से या उसे कुर्सी तक पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत करने वालों के विचारों को जाने और उसमें से जो उचित लगे उस विचार को अपनाए। साथ ही उस नेता का यह कर्तव्य भी है कि वह विपक्ष द्वारा चलाई गई उन योजनाओं को भी जारी रखे जो राष्ट्र हित में है। इन दोनों पैमानों में नरेन्द्र मोदी खरे उतरते हैं। एक वेबसाइट के द्वारा ऐसे विषयों पर विशेष रिपोर्ट्स के नाम पर तथाकथित सनसनीखेज खुलासे किए जा रहे हैं यह वास्तव में दुखद स्थिति है। मैं आज इन ट्विटर अकाउंट्स को चेक कर रहा था, वास्तव में इसमें बहुत सी ऐसी पोस्ट डाली गई हैं जो गलत हैं लेकिन क्या आप यह मानकर चल रहे हैं कि ये लोग जो भी पोस्ट डालेंगे उससे मोदी जी की सहमत होंगे।

मैं बहुत से विषयों पर पीएम मोदी का विरोध करता हूं। पहले भी करता था, एक समय था जब मोदी जी गुजरात के सीएम हुआ करते थे। उस दौरान उन्होंने मेरे नाम से मेरे संस्थान के लिए एक शुभकामना संदेश भेजा था। क्या इस शुभकामना संदेश के आधार पर आप यह कह सकते हैं कि मेरे संस्थान की हर खबर के प्रत्येक पक्ष से वह सहमत थे। नहीं, बिलकुल नहीं। उनको कुछ लेख पसंद आए होंगे तो उन्होंने शुभकामनाएं भेजीं, हर दिन तो वह उस समाचारपत्र को पढ़ते भी नहीं होंगे। ठीक उसी प्रकार ट्विटर पर किसी का ट्वीट पसंद आया तो उसे फॉलो कर लिया, अब अगर इसे मुद्दा बनाकर पेश किया जाएगा तो शायद उचित नहीं होगा।

देश में हजारों विषयों के होते हुए ऐसे विषयों को उठाया जा रहा है। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि यदि आप किसी विचारधारा का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करते हैं तो इसका अर्थ यह है कि आप अपनी विपक्षी विचारधारा में कुछ अच्छा देखने की कोशिश ही नहीं करेंगे। मेरी एक साथी स्वाति मिश्रा ने आज फेसबुक पर लिखा, 'UPA सरकार के दूसरे कार्यकाल की बात है। मनमोहन सिंह की सरकार के लिए बहुत कुछ कहा जा रहा था। भ्रष्टाचार के साथ-साथ और भी तमाम मुद्दे थे। ऐसे में भी उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। मीडिया के सवालों का लाइव जवाब दिया। स्थानीय भाषा की मीडिया से भी कई बार बात की। भारत में भी जब कहीं दौरे पर गए, तो ज़्यादातर बार मीडिया के सवालों का जवाब दिया। इधर अपने मोदी को देखिए। ना चुनाव से पहले बोले, ना अब बोलते हैं। कभी बोले भी, तो अपने लोग छांट के उनसे ही बोले। कभी कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, मीडिया के सवाल नहीं। लोग बोलते रहें, लेकिन उनकी सेहत को असर नहीं पड़ता। ऐसा नहीं कि बोलते नहीं, बोलते खूब हैं पर बस अपने मन का।
सोचिए कि मोहल्ले में कोई एक बड़ा लाउडस्पीकर लगाए और जब चाहे उसपर आड़ा-तिरछा चिल्लाए। आप परेशान होते रहें, लेकिन कभी उस लाउडस्पीकर से हैप्पी बर्थडे का गाना आए और कभी खाली-पीली का दर्शन। मोदी इस देश में वही लाउडस्पीकर हैं। बजते हैं, पर किसी काम का नहीं।'
बहुत अच्छी बात है कि स्वाति जी ने अपने मन की बात कह दी। मन की बात कहने का अधिकार हर एक को है, देश के प्रधान को अधिकार है कि अपने मन की बात पूरे देश से करे और यही अधिकार इस लोकतंत्र में एक सामान्य व्यक्ति को भी मिला है। लेकिन स्वाति जी के द्वारा उठाए गए विषय का एक दूसरा पक्ष भी है। इस देश का प्रधानमंत्री यूके जाता है और वहां पर प्रेस वार्ता में एएनआई के पत्रकार को यह सोचकर प्रश्न पूछने के लिए कहता है कि यह मेरे देश का पत्रकार है, यह इस समय मेरे लिए देश की आवाज है और देश के लिए मेरी आवाज, तो यह जो भी पूछेगा देश के हित में पूछेगा लेकिन हमारे पत्रकार साहब मोदी जी के समक्ष असहिष्णुता का मुद्दा उठाते हैं। जिस स्थान पर पूरे विश्व का मीडिया हो वहां पर देश की आतंरिक स्थिति पर देश के प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा कर देना उन पत्रकार महोदय का कैसा दायित्व है। जितना मोदी ने असहिष्णुता के मुद्दे पर वहां बोला कि मेरे लिए हर एक घटना महत्व रखती है उतनी बात अगर यहाँ बोल देते तो शायद आधी समस्याओं का समाधान हो जाता। पत्रकार का काम देश में और देश के बाहर जनता और सत्ता के बीच सकारात्मक सोच के साथ सेतु का काम करना है। एएनआई के पत्रकार यदि भारत में मोदी जी की एक बाइट लेकर चला देते तो शायद आज तथाकथित 'असहिष्णुता' कोई मुद्दा ही ना होता। अब यह मत कहिएगा कि पीएम साहब देश में रहते कब हैं?

यह विषय मात्र पत्रकारों तक ही सीमित नहीं है। प्रत्येक सामान्य व्यक्ति को इस देश के विषय में सोचना होगा, प्रत्येक उस विषय का समर्थन करना होगा जिसमें देश का कल्याण निहित हो। अभी कुछ दिन पहले कानपुर से वापस आते हुए ट्रेन में यात्रा के दौरान सुबह 7 बजे मेरे 2 सहयात्रियों ने नाश्ते में चाय और बिस्किट लिए। वे मेरे परिचित नहीं थे, लगभग 20 और 30 साल की उम्र वाले उन दोनों सहयात्रियों ने बिस्किट का खाली पैकेट वहीं सीट के नीचे फेंक दिया। मैं थोड़ा 'मुंहफट' किस्म का व्यक्ति हूं तो मैंने बड़े भाई से कहा कि भाईसाहब क्या करते हैं? तो वह बोले कि बस काम-धंधा चलता है अपना। मैंने नीचे पड़े बिस्किट के खाली पैकेट उठाकर पास लगी डस्टबिन में फेंकते हुए कहा कि अगर आप यह काम और कर देते तो मुझे बहुत खुशी होती। मैं यह 'हरकत' इसलिए करता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि शायद इससे किसी को शर्म आ जाए और वह आगे से गंदगी करने से पहले एक बार सोचे। लेकिन आप एक सामान्य व्यक्ति की सोच समझिए, उसने अपनी चाय खत्म करते हुए कप उसी तरह नीचे डालते हुए बोला कि भाई ट्रेन साफ करने के पैसे दिए जाते हैं, अगर गंदगी नहीं होगी तो सफाई करने वाले के पास हराम के पैसे जाएंगे। मैं उस पढ़े-लिखे से दिखने वाले आदमी की सोच पर निःशब्द था। क्या सोच थी उसकी। उसके छोटे भाई ने तुरंत नीचे फेंका हुआ अपने भाई का कप उठाया और अपने कप के साथ उसे डस्टबिन में फेंक कर आया।

दोस्तो, यह वह समय है जब इस देश के प्रत्येक वर्ग को एक होना होगा, अपने लिए नहीं बल्कि अपनों के लिए। मोदी हों या केजरीवाल, दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, सभी की अच्छी और समाज के लिए उपयुक्त परंपराओं को एक साथ आना होगा। जब तक 'फर्जी' विषयों से बाहर निकल कर, एकरूपता के प्रभाव को स्थापित करने का प्रयास छोड़कर एकता के लिए प्रयास नहीं किया जाएगा तब तक इस देश को विश्व शक्ति नहीं बनाया जा सकता।

वंदे भारती

Tuesday, 15 March 2016

काश! ये 'फर्जी राष्ट्रवादी' संघ को समझ पाते

कल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह भैया जी जोशी ने कहा कि इस समय संघ अपनी सर्वोच्च स्थिति में है। निश्चित ही संघ अपनी सर्वोच्च स्थिति में है लेकिन देश की राजनीति अपने निम्नतम स्तर पर है। एक ओर जहां संघ पर कांग्रेस और वामपंथियों के द्वारा लगातार आघात होते रहते हैं तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्रवाद को एक रंग विशेष और एक विशेष पूजा पद्धति से जोड़कर देखने वाले फर्जी राष्ट्रवादी देशभक्ति के प्रमाण पत्र बांटते रहते हैं। लोकतंत्र में आलोचना का विशिष्ट स्थान होता है लेकिन आलोचना जब अंधविरोध का रूप ले लेती है तो समाज पर एक नकारात्मक प्रभाव जाता है। कभी कोई संघ की तुलना आईएसआईएस से कर देता है तो कभी कोई भगवा आतंकवाद का राग अलापने लगता है। एक 1993 का दौर था और जब तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने इसी संगठन के एक स्वयंसेवक को एवं उस दौर के विपक्षी नेता अटल बिहारी बाजपेई को जेनेवा में आयोजित यूएन सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का प्रमुख बनाकर भेजा था।

मुझे एक अन्य प्रसंग भी याद आता है। अभी कुछ समय पहले मैं संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक से चर्चा कर रहा था। चर्चा के दौरान मैंने उनसे पूछा कि भाईसाहब, आपकी दृष्टि से इस देश के तीन सबसे अच्छे प्रधानमंत्री कौन हुए? उन्होंने बिना कुछ सोचे उत्तर दिया, ‘लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा जी और अटल जी’। मुझे थोड़ी-सी हैरानी हुई क्योंकि मुझे अपेक्षा थी कि पहला नाम अटल जी का और कम से कम अंतिम नाम नरेन्द्र मोदी का अवश्य होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैंने उनसे इस उत्तर का विस्तृत कारण पूछा तो उन्होंने कहा, ‘छोटे कद और बड़ी इच्छाशक्ति वाले लाल बहादुर शास्त्री जी ने जिस तरह से पाकिस्तान को जवाब दिया था, वह अतुलनीय था। इंदिरा जी ने बांग्लादेश को स्वतंत्र कराने के लिए जिस प्रकार की इच्छाशक्ति का परिचय दिया था वह किसी सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं थी और अटल जी ने समय को आपने स्वयं ही देखा होगा?’ उन्होंने आगे कहा, ‘कौन किस स्तर का राजनेता है यह समय तय करता है। इंदिरा जी ने आपातकाल लगाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कैद करने का प्रयास किया था लेकिन क्या मात्र इसके लिए हम उनके अन्य कार्यों को भूल जाएं?’ प्रचारक महोदय की सकारात्मकता देखकर मैं आश्चर्यचकित था। उस चर्चा के बाद मैंने बहुत सोचा कि क्या इस देश के वामपंथियों और कांग्रेसियों को संघ में कोई सकारात्मकता नहीं दिखती है? इस देश की राजनीति का दुर्भाग्य है कि कोई भगवा (केसरिया) रंग को आतंकवाद से जोड़ता है तो कोई हरे रंग को आतंकवादी बता देता है। कोई कहता है हरा तिलक लगाओ तो कोई किसी इस्लामिक इबादत पद्धति में विश्वास रखने वाले व्यक्ति को जबरदस्ती भगवा ध्वज पकड़ा कर देशभक्त होने का प्रमाण देता है।

मुस्लिम ASI को पीटा, भगवा झंडा हाथ में देकर कराई परेड, ‘जय भवानी’ के नारे भी लगवाए (खबर यहां पढ़ें) इस देश में देशभक्ति के पैमाने रंगों से तय होने लगे हैं। व्यक्तिगत तौर पर लाख बुराइयां होंगी संघ के स्वयंसेवकों में लेकिन क्या उन लोगों की आलोचनाओं के साथ अच्छे कामों की तारीफ नहीं होनी चाहिए?

क्या इस देश के वामपंथी और कांग्रेसी इस बात से इनकार कर सकते हैं कि आजादी के बाद जब पाकिस्तान से शरणार्थी भारत आ रहे थे तो संघ ने 3000 से ज्यादा राहत शिविर लगाए थे?

क्या कांग्रेसी 1962 का युद्ध भूल गए जब सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक सीमा पर पहुंचे थे और पूरे उत्साह से सेना की मदद की थी? क्या यह भी झूठ है कि स्वयंसेवकों के कार्य से प्रभावित होकर जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण दिया था? निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर क्या नेहरू ने नहीं कहा था, ‘संघ को निमंत्रण यह दर्शाने के लिए दिया गया है कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है’?

1965 के पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में क्या घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले और युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का काम करने वाले संघ के स्वयंसेवक नहीं थे? क्या उस दौरान कानून व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद करने वाले और दिल्ली का यातायात नियंत्रण करने में मदद करने वाले संघ के स्वयंसेवक नहीं थे?

आज संघ पर आरोप लगता है कि वह अपने कार्यालय पर तिरंगा नहीं फहराता लेकिन क्या संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह दादरा एवं नगर हवेली की राजधानी सिलवासा में पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा नहीं फहराया था? क्या नेहरू द्वारा गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से इनकार करने के बावजूद जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू नहीं किया था?

क्या संघ के स्वयंसेवक भैरों सिंह शेखावत के विषय में सीपीएम ने यह नहीं कहा था कि राजस्थान में शेखावत प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं? क्या शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे संघ के समवैचारिक संगठन कोई अच्छा काम नहीं करते?

क्या 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चक्रवात में, भोपाल की गैस त्रासदी में, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों में, गुजरात के भूकंप में, सुनामी में, उत्तराखंड की बाढ़ में और करगिल युद्ध में संघ ने राहत और बचाव का कोई काम नहीं किया था? क्या संघ के समवैचारिक संगठन सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर के आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को (38 मुस्लिम और 19 हिंदू) गोद नहीं लिया है? आज जल, जंगल और जमीन की लड़ाई का दावा करने वाले लोग बताएं कि क्या संघ का समवैचारिक संगठन भारतीय मजदूर संघ बिना मजदूरों के समर्थन के विश्व का सबसे बड़ा मजदूर संगठन बन गया?

यह सिर्फ एक पहलू है। इस देश के कुछ फर्जी राष्ट्रवादियों को सारे मुसलमान एक आतंकवादी दिखते हैं। क्या ऐसे तथाकथित हिंदू रक्षकों को शर्म नहीं आते जब वे इस देश को परमाणु संपन्न बनाने वाले एपीजे अब्दुल कलाम की कौम को आतंकवाद से जोड़ देते हैं?

क्या यह झूठ है कि 85 साल का एक बूढ़ा शेर, बहादुर शाह ज़फर जब अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था और अंग्रेजों ने उसके लिए दो पंक्तियां लिखवाकर भेजी थीं कि…
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

और क्या इसके जवाब में बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर जवाब में नहीं लिखा था कि…
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्तान की।

क्या भारत की स्वतंत्रता में 95 वर्ष के जीवन में से 45 वर्ष केवल जेल में बिताने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी)  का कोई योगदान नहीं था? क्या मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हाकिम अजमल खान और रफी अहमद किदवई जैसे राष्ट्रवादियों ने भारत के लिए संघर्ष नहीं किया था? भारत के बाहर जाकर आजाद हिंद फौज के बारे में तो देश के फर्जी राष्ट्रवादी चीख-चीखकर कहते हैं कि उनके लिए कुछ किया जाए लेकिन फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम करने वाले ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत जिन्हें 1915 में फांसी दी गई, उनका देश में कोई योगदान नहीं था। क्या जौनपुर के सैयद मुज़तबा हुसैन के साथ बर्मा में भारत की आजादी की योजना बनाने वाले अली अहमद सिद्दीकी का कोई योगदान नहीं? क्या यह झूठ है कि इन दोनों को 1917 में फांसी पर लटका दिया गया था?

कितनी घटिया स्तर की राजनीति हो गई है इस देश की जिसमें सिर्फ नकारात्मकता है, जिसमें आलोचना नहीं सिर्फ विरोध है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इस देश की एकता, अखंडता और एकात्मता के संरक्षण के लिए सभी विचारधाराएं एक हो जाएं? राष्ट्रवाद और आतंकवाद की कोई पूजा पद्धति नहीं होती। किसी भी पूजा पद्धति को मानने वाला या पूजा पद्धति में विश्वास न रखने वाला व्यक्ति राष्ट्रवादी हो सकता है बशर्ते वह राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास रखते हुए राष्ट्रीय एकता के लिए कार्य करता हो। वह राष्ट्रवादी नहीं हो सकता जो देश में रंगों के आधार बनाकर एकरूपता चाहता हो। ठीक इसी प्रकार से हर वह व्यक्ति जो मानवता में विश्वास न रखता हो, निर्दोषों की हत्या करता हो वह आतंकवादी है।

इस देश में आज सबसे अधिक आवश्यकता है कि देश का प्रत्येक नागरिक अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझे और ऐसे राजनेताओं को सत्ता से दूर रखे जो देश तोड़ने वाली राजनीति करते हों, जो देश को रंगों में बांटते हों। कोई तथाकथित साध्वी जो इस देश के 69 प्रतिशत लोगों को अप्रत्यक्ष तौर पर गाली देती हो या शाही मस्जिद के इमाम से शाही इमाम बन जाने वाला कोई ऐसा व्यक्ति जिसे राष्ट्र की वंदना करना इस्लाम विरोधी लगता हो राष्ट्रवादी अथवा मुसलमान कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...