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Thursday, 16 June 2016

क्या सच में 'भगवान' नहीं है? जवाब है यहां

कल फेसबुक पर एक पोस्ट देखी। इस ब्लॉग को पढ़ने से पहले यदि आप यहां क्लिक करके उस पोस्ट को पढ़ लेंगे तो इस ब्लॉग को लिखने का उद्देश्य समझ में आ जाएगा। वैसे उस फेसबुक पोस्ट को लिखने वाले महाशय का सार यह था कि 'भगवान' जैसी कोई शक्ति इस सृष्टि में नहीं है। अपने इस विषय को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने कुछ प्रश्न भी उठाए थे। तो मैंने सोचा कि उनकी जिज्ञासाओं का समाधान ब्लॉग के माध्यम से करूं। एक बात पहले ही स्पष्ट कर दूं कि मेरे 'भगवान' कोई क्षीर सागर में शेषनाग पर लेटे हुए पुरुष नहीं हैं बल्कि मेरे लिए भगवान का अर्थ है सकारात्मक ऊर्जा का एक अथाह सागर। चलिए, अब अपने विषय पर आते हैं।

यदि मैं यह मानता हूं कि इस दुनिया में अच्छाई है तो मुझे यह भी मानना होगा कि इस दुनिया में बुराई का भी अस्तित्व है। बहुत सीधा और सामान्य सा अन्तर है कि अच्छाई का प्रतिनिधित्व 'भगवान' और बुराई का प्रतिनिधित्व 'दानव' करते हैं। ये मात्र दो शक्तियां हैं। आगे बढ़ने से पहले एक छोटी सी कहानी है, उसे पढ़ लीजिए।

एक गांव में बहुत पुराना मंदिर हुआ करता था। उस मंदिर में एक वृद्ध पुजारी अपने परिवार के साथ रहता था। वह पुजारी सपरिवार पूरे दिन ईश्वर भक्ति में लीन रहता था। आस-पास के गरीब लोगों को दान में मिले अन्न से भरपेट भोजन कराने के पश्चात बचा हुआ भोजन अपने परिवार के साथ करता था। भगवान पर उसका अटूट विश्वास और श्रद्धा थी। स्वयं के कर्मों से वह संतुष्ट भी था।  एक बार गांव के समीप की नदी में बाढ़ आ गई। गांव के लोग गांव छोड़कर भागने लगे। जब नदी का पानी अपने विकराल रूप को धारण करने लगा तो पुजारी के परिवार के सदस्यों ने पुजारी से कहा कि आप भी हमारे साथ चलिए। लेकिन पुजारी ने यह कहकर मना कर दिया कि मुझे भगवान बचाने आएंगे। एक दिन और बीता। गांव में पानी बढ़ता ही जा रहा था लेकिन पुजारी, मंदिर छोड़ने को तैयार नहीं था। फिर उसी शाम एक गरीब आदमी जिसको वह पुजारी नियमित रूप से भोजन कराता था, पुजारी के पास आया और बोला कि पुजारी जी, हमारे साथ चलिए नहीं तो आज आपकी मृत्यु सुनिश्चित है, क्योंकि आज रात तक पूरा गांव डूब जाएगा। लेकिन पुजारी ने उसे भी यह कहकर मना कर दिया कि तुम जाओ, मुझे मेरे भगवान बचाने आएंगे। पुजारी के जवाब को सुनकर वह आदमी भी वहां से चला गया। रात हुई और पुजारी की मृत्यु हो गई। जब वह पुजारी स्वर्ग में पहुंचा तो उसने भगवान से कहा, 'मैंने तो आजीवन आपकी सेवा की, गरीबों की सेवा की, कभी किसी के साथ गलत नहीं किया तो फिर आप मुझे बचाने क्यों नहीं आए?' पुजारी के इस प्रश्न पर भगवान ने जवाब दिया कि वह व्यक्ति जो मृत्यु से पहले वाली शाम को तुम्हारे पास आया था, वह मैं ही तो था।

वैसे तो यह एक कहानी है लेकिन मेरा एक छोटा सा सवाल है कि इस पूरे घटनाक्रम को आप क्या कहेंगे? आप कुछ भी कहें, मैं तो इसे अन्धभक्ति कहूंगा। यजुर्वेद का सार है 'अहम् ब्रह्मास्मि' अर्थात् मैं ब्रह्म हूं या आत्मा ही ब्रह्म है यानी जीव ही ब्रह्म (जिसे आप भगवान कह रहे हैं) है। साथ ही सामवेद का कथन है 'तत्वमसि' अर्थात वह तुम हो। ब्रह्म यानी भगवान मैं और आप ही तो हैं। मेरे कुछ वामपंथी परिचित कहते हैं कि राम हुए होंगे लेकिन वह भगवान नहीं मात्र एक चरित्र थे। मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में एक चरित्र होता है, प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में एक विचार होता है। रही बात भगवान की तो भगवान जिसे मैं ईश्वर कहता हूं, उसका सीधी सा अर्थ है सद्चरित्र और दानव का अर्थ है दुश्चरित्र, इस सामान्य सी व्याख्या को समझने में क्या समस्या आती है यह मेरी समझ से परे है।

मेरी समझ के अनुरूप भगवान शब्द की व्याख्या कुछ इस प्रकार है-
भ = भूमि
अ = अग्नि
ग = गगन
वा = वायु
न = नीर

शाब्दिक आधार पर भगवान यानी पंच तत्वों से बना हुआ। हमारा अथवा किसी भी जीव का शरीर भी तो इन्हीं पंच तत्वों से निर्मित है। हम अपने कर्मों के आधार पर सकारात्मता अथवा नकारात्मकता की ओर जाते हैं। यदि सकारात्मकता को आधार बनाया तो कहा जा सकता है कि हम ईश्ववरीय गुणों की ओर जा रहे हैं और अगर नकारात्मकता को आधार बनाया तो उसे दानवी प्रवृत्ति वाली श्रेणी में माना जा सकता है। कर्म ही तो भारतीय संस्कृति का आधार रहा है। और इस कर्म के सिद्धान्त का सबसे बड़ा उदाहरण मेरे आराध्य श्रीराम हैं। जब तक वह अयोध्या में थे तब तक मात्र राजकुमार राम थे और जब वह वनवास से वापस आए तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कहलाए। 14 वर्षों के कर्मों के आधार पर ही वह मर्यादा पुरुषोत्तम बने। अब बात करते हैं उस पोस्ट की जो उस सकारात्मक शक्ति पर  प्रश्नचिन्ह लगाने का प्रयास कर रही है।

उस पोस्ट में लिखा गया कि अगर कण-कण में भगवान हैं तो कण-कण में भ्रष्टाचार क्यों है?
इस सवाल का जवाब यदि वह महाशय खुद से पूछ लेते तो शायद ज्यादा संतुष्टि मिलती। भ्रष्टाचार हम और आप करते हैं और जब तक हम यह करते रहेंगे या इसे स्वीकार करते रहेंगे तब तक नहीं कहा जा सकता कि कण-कण में भगवान हैं। भ्रष्टाचार तो एक नकारात्मक प्रवृत्ति है यानि जिस तथाकथित कण में भ्रष्टाचार है, वहां भगवान नहीं दानव वास करते हैं।

उन्होंने लिखा, 'लोग कहते हैं कि बगैर भगवान की मर्जी के पत्ता भी नहीं हिलता, तो क्या भगवान चोरी भी करवाता है? जब सब कुछ भगवान की मर्जी से होता है तो भगवान बलात्कार भी करवाता होगा ? डकैती भी डलवाता होगा? अगर यह सब भगवान ही करवाता है तो कितना निर्दयी है भगवान!'
बिलकुल सही लिखा है उन्होंने। ऐसे दुष्कर्म करने वाला निश्चित ही घोर निर्दयी है। लेकिन क्या ये कर्म भगवान के हैं। कुतर्क चाहे कुछ भी हो लेकिन जवाब नहीं ही है। क्योंकि इन नकारात्मक कर्मों को कोई सकारात्मक प्रवृत्ति वाला व्यक्ति आधार कैसे बना सकता है। जो ऐसे कर्म करे वह निश्चित ही दानवी प्रवृत्ति से प्रेरित है।

उन्होंने आगे लिखा, 'लोग कहते हैं कि भगवान गरीबों, मजलूमों, असहायों की रक्षा करता है। तो हिन्दुस्तान की आधे से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने के लिए मजबूर क्यों है? भगवान क्यों नहीं इन्हें अमीर बना देता? दुनिया में हर कहीं असहाय, मजलूम ही प्रताड़ित हो रहा है , भगवान क्यों नहीं इनकी मदद करता?' इसके अलावा भी उन्होंने कई सारे बेतुके प्रश्न उठाए हैं। इन प्रश्नों को पढ़कर ही पता लगता है कि उन्होंने भारतीय साहित्य को पढ़ने की और समझने की जरा सी भी कोशिश नहीं की। भगवान किसी को गरीब या अमीर नहीं बनाता। हमारे कर्म और हमारी व्यवस्था लोगों को अमीर-गरीब बनाती है। एसी कमरे में बैठकर मजलूमों के अधिकार की बातें अपने ऐपल आईफोन से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लिखने से गरीबी नहीं जाएगी। और ना ही इस गरीबी को दूर करने के लिए कोई अवतरित होगा। हमें अपनी व्यवस्थाओं में परिवर्तन लाना होगा। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ कुछ अच्छा करने का प्रयास करना होगा। इसके बाद जिसके साथ अच्छा करें, उससे पूछिएगा कि 'भगवान' जैसी कोई चीज है क्या? तो भले ही वह नास्तिक हो लेकिन उसका जवाब यही होगा, 'मेरे लिए तो भगवान आप ही हो।'

बस स्वयं में भगवान की मूल परिकल्पना को आत्मसात करने का प्रयास करिए, देखिएगा सच में अच्छा लगेगा। आपको भी और जिसके साथ अच्छा करेंगे उसको भी। मुझे लगता है कि 'भगवान' के इस रूप की स्वीकार्यता से किसी तथाकथित वामपंथी को आपत्ति नहीं होगी। और यदि अभी भी आपत्ति है तो विश्वास मानिए आप तर्कशीलता के निम्नतम स्तर पर पहुंच कर कुतर्क को ही तर्क समझने लगे हैं।

Tuesday, 15 March 2016

काश! ये 'फर्जी राष्ट्रवादी' संघ को समझ पाते

कल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह भैया जी जोशी ने कहा कि इस समय संघ अपनी सर्वोच्च स्थिति में है। निश्चित ही संघ अपनी सर्वोच्च स्थिति में है लेकिन देश की राजनीति अपने निम्नतम स्तर पर है। एक ओर जहां संघ पर कांग्रेस और वामपंथियों के द्वारा लगातार आघात होते रहते हैं तो वहीं दूसरी ओर राष्ट्रवाद को एक रंग विशेष और एक विशेष पूजा पद्धति से जोड़कर देखने वाले फर्जी राष्ट्रवादी देशभक्ति के प्रमाण पत्र बांटते रहते हैं। लोकतंत्र में आलोचना का विशिष्ट स्थान होता है लेकिन आलोचना जब अंधविरोध का रूप ले लेती है तो समाज पर एक नकारात्मक प्रभाव जाता है। कभी कोई संघ की तुलना आईएसआईएस से कर देता है तो कभी कोई भगवा आतंकवाद का राग अलापने लगता है। एक 1993 का दौर था और जब तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने इसी संगठन के एक स्वयंसेवक को एवं उस दौर के विपक्षी नेता अटल बिहारी बाजपेई को जेनेवा में आयोजित यूएन सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का प्रमुख बनाकर भेजा था।

मुझे एक अन्य प्रसंग भी याद आता है। अभी कुछ समय पहले मैं संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक से चर्चा कर रहा था। चर्चा के दौरान मैंने उनसे पूछा कि भाईसाहब, आपकी दृष्टि से इस देश के तीन सबसे अच्छे प्रधानमंत्री कौन हुए? उन्होंने बिना कुछ सोचे उत्तर दिया, ‘लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा जी और अटल जी’। मुझे थोड़ी-सी हैरानी हुई क्योंकि मुझे अपेक्षा थी कि पहला नाम अटल जी का और कम से कम अंतिम नाम नरेन्द्र मोदी का अवश्य होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैंने उनसे इस उत्तर का विस्तृत कारण पूछा तो उन्होंने कहा, ‘छोटे कद और बड़ी इच्छाशक्ति वाले लाल बहादुर शास्त्री जी ने जिस तरह से पाकिस्तान को जवाब दिया था, वह अतुलनीय था। इंदिरा जी ने बांग्लादेश को स्वतंत्र कराने के लिए जिस प्रकार की इच्छाशक्ति का परिचय दिया था वह किसी सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं थी और अटल जी ने समय को आपने स्वयं ही देखा होगा?’ उन्होंने आगे कहा, ‘कौन किस स्तर का राजनेता है यह समय तय करता है। इंदिरा जी ने आपातकाल लगाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कैद करने का प्रयास किया था लेकिन क्या मात्र इसके लिए हम उनके अन्य कार्यों को भूल जाएं?’ प्रचारक महोदय की सकारात्मकता देखकर मैं आश्चर्यचकित था। उस चर्चा के बाद मैंने बहुत सोचा कि क्या इस देश के वामपंथियों और कांग्रेसियों को संघ में कोई सकारात्मकता नहीं दिखती है? इस देश की राजनीति का दुर्भाग्य है कि कोई भगवा (केसरिया) रंग को आतंकवाद से जोड़ता है तो कोई हरे रंग को आतंकवादी बता देता है। कोई कहता है हरा तिलक लगाओ तो कोई किसी इस्लामिक इबादत पद्धति में विश्वास रखने वाले व्यक्ति को जबरदस्ती भगवा ध्वज पकड़ा कर देशभक्त होने का प्रमाण देता है।

मुस्लिम ASI को पीटा, भगवा झंडा हाथ में देकर कराई परेड, ‘जय भवानी’ के नारे भी लगवाए (खबर यहां पढ़ें) इस देश में देशभक्ति के पैमाने रंगों से तय होने लगे हैं। व्यक्तिगत तौर पर लाख बुराइयां होंगी संघ के स्वयंसेवकों में लेकिन क्या उन लोगों की आलोचनाओं के साथ अच्छे कामों की तारीफ नहीं होनी चाहिए?

क्या इस देश के वामपंथी और कांग्रेसी इस बात से इनकार कर सकते हैं कि आजादी के बाद जब पाकिस्तान से शरणार्थी भारत आ रहे थे तो संघ ने 3000 से ज्यादा राहत शिविर लगाए थे?

क्या कांग्रेसी 1962 का युद्ध भूल गए जब सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक सीमा पर पहुंचे थे और पूरे उत्साह से सेना की मदद की थी? क्या यह भी झूठ है कि स्वयंसेवकों के कार्य से प्रभावित होकर जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण दिया था? निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर क्या नेहरू ने नहीं कहा था, ‘संघ को निमंत्रण यह दर्शाने के लिए दिया गया है कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है’?

1965 के पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में क्या घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले और युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का काम करने वाले संघ के स्वयंसेवक नहीं थे? क्या उस दौरान कानून व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद करने वाले और दिल्ली का यातायात नियंत्रण करने में मदद करने वाले संघ के स्वयंसेवक नहीं थे?

आज संघ पर आरोप लगता है कि वह अपने कार्यालय पर तिरंगा नहीं फहराता लेकिन क्या संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह दादरा एवं नगर हवेली की राजधानी सिलवासा में पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा नहीं फहराया था? क्या नेहरू द्वारा गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से इनकार करने के बावजूद जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू नहीं किया था?

क्या संघ के स्वयंसेवक भैरों सिंह शेखावत के विषय में सीपीएम ने यह नहीं कहा था कि राजस्थान में शेखावत प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं? क्या शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे संघ के समवैचारिक संगठन कोई अच्छा काम नहीं करते?

क्या 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चक्रवात में, भोपाल की गैस त्रासदी में, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों में, गुजरात के भूकंप में, सुनामी में, उत्तराखंड की बाढ़ में और करगिल युद्ध में संघ ने राहत और बचाव का कोई काम नहीं किया था? क्या संघ के समवैचारिक संगठन सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर के आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को (38 मुस्लिम और 19 हिंदू) गोद नहीं लिया है? आज जल, जंगल और जमीन की लड़ाई का दावा करने वाले लोग बताएं कि क्या संघ का समवैचारिक संगठन भारतीय मजदूर संघ बिना मजदूरों के समर्थन के विश्व का सबसे बड़ा मजदूर संगठन बन गया?

यह सिर्फ एक पहलू है। इस देश के कुछ फर्जी राष्ट्रवादियों को सारे मुसलमान एक आतंकवादी दिखते हैं। क्या ऐसे तथाकथित हिंदू रक्षकों को शर्म नहीं आते जब वे इस देश को परमाणु संपन्न बनाने वाले एपीजे अब्दुल कलाम की कौम को आतंकवाद से जोड़ देते हैं?

क्या यह झूठ है कि 85 साल का एक बूढ़ा शेर, बहादुर शाह ज़फर जब अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था और अंग्रेजों ने उसके लिए दो पंक्तियां लिखवाकर भेजी थीं कि…
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

और क्या इसके जवाब में बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर जवाब में नहीं लिखा था कि…
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्तान की।

क्या भारत की स्वतंत्रता में 95 वर्ष के जीवन में से 45 वर्ष केवल जेल में बिताने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी)  का कोई योगदान नहीं था? क्या मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हाकिम अजमल खान और रफी अहमद किदवई जैसे राष्ट्रवादियों ने भारत के लिए संघर्ष नहीं किया था? भारत के बाहर जाकर आजाद हिंद फौज के बारे में तो देश के फर्जी राष्ट्रवादी चीख-चीखकर कहते हैं कि उनके लिए कुछ किया जाए लेकिन फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम करने वाले ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत जिन्हें 1915 में फांसी दी गई, उनका देश में कोई योगदान नहीं था। क्या जौनपुर के सैयद मुज़तबा हुसैन के साथ बर्मा में भारत की आजादी की योजना बनाने वाले अली अहमद सिद्दीकी का कोई योगदान नहीं? क्या यह झूठ है कि इन दोनों को 1917 में फांसी पर लटका दिया गया था?

कितनी घटिया स्तर की राजनीति हो गई है इस देश की जिसमें सिर्फ नकारात्मकता है, जिसमें आलोचना नहीं सिर्फ विरोध है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इस देश की एकता, अखंडता और एकात्मता के संरक्षण के लिए सभी विचारधाराएं एक हो जाएं? राष्ट्रवाद और आतंकवाद की कोई पूजा पद्धति नहीं होती। किसी भी पूजा पद्धति को मानने वाला या पूजा पद्धति में विश्वास न रखने वाला व्यक्ति राष्ट्रवादी हो सकता है बशर्ते वह राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास रखते हुए राष्ट्रीय एकता के लिए कार्य करता हो। वह राष्ट्रवादी नहीं हो सकता जो देश में रंगों के आधार बनाकर एकरूपता चाहता हो। ठीक इसी प्रकार से हर वह व्यक्ति जो मानवता में विश्वास न रखता हो, निर्दोषों की हत्या करता हो वह आतंकवादी है।

इस देश में आज सबसे अधिक आवश्यकता है कि देश का प्रत्येक नागरिक अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझे और ऐसे राजनेताओं को सत्ता से दूर रखे जो देश तोड़ने वाली राजनीति करते हों, जो देश को रंगों में बांटते हों। कोई तथाकथित साध्वी जो इस देश के 69 प्रतिशत लोगों को अप्रत्यक्ष तौर पर गाली देती हो या शाही मस्जिद के इमाम से शाही इमाम बन जाने वाला कोई ऐसा व्यक्ति जिसे राष्ट्र की वंदना करना इस्लाम विरोधी लगता हो राष्ट्रवादी अथवा मुसलमान कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।

Monday, 14 March 2016

वामपंथियों के नाम एक 'खुला' पत्र

मेरे वामपंथी भाइयों, 

जिस संविधान के अनुच्छेद 19(ए) के तहत आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं. उसी संविधान के अनुच्छेद 51(ए) में 11 मौलिक दायित्व भी दिए हैं। वे निम्न हैं-

प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह-
1. संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करे।
2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे।
3. भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे।
4. देश की रक्षा करे।
5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे।
6. हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका निर्माण करे।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करे।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे।
9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे।
10. व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे।
11. माता-पिता या संरक्षक द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों हेतु प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना (86वां संशोधन)।

अब आप स्वयं तय करिए कि आप इनमें से कितने दायित्वों का पालन करते हैं।
संविधान और संवैधानिक व्यवस्था में आपका यकीन नहीं। आप एकरूपता के पक्षधर हो । क्यों कि अगर आप समानता चाहते तो “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम” - “हम सब एक साथ चलें,
एक साथ बोलें, हमारे मन एक हों।”
का विचार रखने वाली संस्कृति का विरोध ना करते।

इस देश के उच्च आदर्श आपको कल्पना लगते हैं अथवा उनमें बुराइयां दिखने लगती हैं या फिर उनको देखने के लिए आपमें ग्लोबल दृष्टि आ जाती है और आप कहने लगते हैं कि वे 'अंग्रेजों की दृष्टि में तो आतंकवादी ही थे।' आप इसमें अपनी वैश्विकता दिखाकर विदेशियों को महान बनाने लगते हैं। एक तरफ तो आप समानता की बात करते हैं दूसरी ओर दलित राजनीति करते हैं। रही बात प्रभुता, एकता और अखंडता की तो आप खुले तौर देश को खंडित करने की बात करते हो। कभी आप कश्मीर में जनमत संग्रह कराने लगते हो तो कभी भारत की संस्कृति को 'फालतू' बताकर उनका अनुसरण करने लगते हो जिनको बिना सिले कपड़े पहनना नहीं आया। (बिना सिले कपड़े पहनना सबसे आसान है क्योंकि उन्हें पहनने के लिए कपड़े के सिवा किसी कृत्रिम चीज की आवश्यकता नहीं होती, मैं मानता हूं कि कपड़े सिलना भी एक बड़ी कला है लेकिन बिना सिले एक ही कपड़े को कई तरह से पहन लेना भी किसी कला से कम तो नहीं है। )

देश की रक्षा करने वाले सैनिक आपको बलात्कारी लगते हैं। (किसी व्यक्ति विशेष का उदाहरण न दें क्योंकि इस कुतर्क के साथ आप उनके द्वारा किए गए सेवा एवं संघर्ष कार्यों को नकार नहीं सकते।) समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना में आपका विश्वास है नहीं क्योंकि अगर ऐसा होता हो तो आप 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। यह धरती हमारी माता है, हम सब इसकी सन्तान हैं।' पर तो कम से कम हमारे साथ होते। क्यों कि इससे ज्यादा आप भ्रातृत्व क्या लेंगे कि एक मां के सब बेटे हैं, पूरी धरती मां। कोई सीमा ही नहीं।

इस पंक्ति को लिखने से पहले मां शारदे से क्षमा मांगता हूं। सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझने और उसका निर्माण करने का तो प्रश्न ही नहीं क्यों कि आपको औरंगजेब महान और दुर्गा जी 'वेश्या' लगती हैं। सार्वजनिक संपत्ति को तो अपने बाप का समझकर तुम इसी संविधान के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम लेकर देश को तोड़ने वाले नारे लगाते हो।
अरे यार क्या लिखूं तुम्हारे बारे में.... बस निवेदन करता हूं कि स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के अंतर को समझो और कम से कम इन दायित्वों का तो निर्वहन करो।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...