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Thursday, 3 September 2015

तेरी याद आई है....

तेरी वो प्यारी सी मुस्कराहट याद आई है
खुद रोकर मुझे हँसाने की आदत याद आई है
तू नहीं है मेरे साथ अब शायद इसीलिए आज
अपनी वो बचपन वाली चाहत याद आई है।

तेरी हर एक अदा,तेरी एक एक बात
मुझे आज फिर से याद आई है
तेरी दोस्ती का वो वादा और फिर वादे से मुकर जाना
तेरी खुली जुल्फों की याद दिलाने आज ये रात आई है।

तू थी तो सब कुछ था पास मेरे
अब तू नहीं तो कुछ भी नहीं सिवाय मेरे
आज ही के दिन तू मिली थी मुझे 
उस लम्हे का एहसास दिलाने 
 मेरी जेब से तेरी तस्वीर निकल आई है।

तुझे बिना लालच के चाहा मैंने
और तुझे उस चाहत पर विश्वास नहीं है।
तेरा जिस्म ,तेरी बातें और तेरा गुरुर है कुछ खास
पर इसमें से कुछ भी स्थाई नहीं है...

तब तू भी थी पर तुझे एहसास नहीं था
अब एहसास है पर तेरा साथ नहीं है
तेरी कसमों पर तो यकीं न रहा
पर अपने राम पर विश्वास आज भी है।

मेरे विश्वास से आंख मिलाने तेरी याद आई है,
मेरे शब्दों को कविता बनाने तेरी याद आई है....

Tuesday, 4 August 2015

यूं ही नहीं मैं तिरंगा हो जाता हूं....

'तिरंगा' एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही हर एक भारतवासी के मन में ऊर्जा का प्रवाह एवं संचार बढ़ जाता है। तिरंगे को देखकर स्वतः ही हमारा सिर उसके सम्मान में झुक जाता है और ऐसा इस लिए होता है क्यों कि हमें पता है कि इस राष्ट्रीय ध्वज की संप्रभुता के संरक्षण के लिए देश के क्रातिकारियों ने समर्पण की पराकाष्ठा को पार किया। भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज की अभिकल्‍पना को स्वीकार किया गया।  इसके वर्तमान स्‍वरूप की अभिकल्पना पिंगली वैंकैयानन्‍द ने की थी। प्रत्‍येक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र का अपना एक ध्‍वज होता है जो कि एक संकेत होता है कि अमुख देश स्‍वतंत्र है।  वर्तमान भारतीय राष्‍ट्रीय ध्वज ‘’तिरंगे’’ के नाम से जाना जाता है।


भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की प‍ट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्‍वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्‍य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्‍तंभ पर बना हुआ है। इसका व्‍यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।

समय समय पर इस देश में अनेक ध्वजों को राष्ट्रीय ध्वज माना गया। प्रथम राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।
द्वितीय ध्‍वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्‍वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्‍तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
तृतीय ध्‍वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया । यह ध्‍वज जो वर्तमान स्‍वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। तथापि यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं था और इसकी व्‍याख्‍या इस प्रकार की जानी थी।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा। केवल ध्‍वज में चलते हुए चरखे के स्‍थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्‍वज अंतत: स्‍वतंत्र भारत का तिरंगा ध्‍वज बना।

भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्‍य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है। ध्वज के मध्य में बने धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्‍यु है।

26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया और स्‍वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्‍ट‍री में न केवल राष्‍ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्‍ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते है। बशर्ते कि वे ध्‍वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्‍वज संहिता, 2002 को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्‍थानों आदि के सदस्‍यों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्‍द्रीय और राज्‍य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।

26 जनवरी 2002 विधान पर आधारित कुछ नियम और विनियमन हैं कि ध्‍वज को किस प्रकार फहराया जाए

राष्‍ट्रीय ध्‍वज को शैक्षिक संस्‍थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्‍काउट शिविरों आदि) में ध्‍वज को सम्‍मान देने की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्‍वज आरोहण में निष्‍ठा की एक शपथ शामिल की गई है। किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्‍थान के सदस्‍य द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज का अरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्‍यथा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के मान सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है। नई संहिता की धारा 2 में सभी निजी नागरिकों अपने परिसरों में ध्‍वज फहराने का अधिकार देना स्‍वीकार किया गया है।

इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए। इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता। किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।

तिरंगे से जुड़े सभी विषयों को न सिर्फ समझें अपितु इस परम पवित्र तिरंगे को अपने भावों में, विचारों में, उद्देश्यों में, चरित्र में तथा आत्मा में उतारें।

वन्दे भारती

Saturday, 1 August 2015

हां आप बेच रहे हैं देश....

हां मैं करता हूं इन 'डे' का विरोध
कल शाम को स्टेशनरी की एक दुकान पर एक पेन लेने के लिए जाना हुआ। वहां जाकर कुछ अलग लग रहा था.... उस दुकान पर भीड़ कुछ ज्यादा ही लग रही थी और उस भीड़ का एक बड़ा हिस्सा कार्ड के सेक्शन में दिख रहा था। नोएडा की संस्कृति कुछ ऐसी है कि रक्षाबंधन तथा दीपावली पर भी कार्ड दिए जाते हैं। लेकिन रक्षाबंधन तथा दीपावली में अभी बदुत समय था, दिमाग पर थोड़ा जोड़ डाला तो ध्यान आया कि दो दिन बाद फ्रेंडशिप डे है।




पूरी शिद्दत से निभाई मित्रता
अगस्त माह के प्रथम रविवार को युवा वर्ग द्वारा ‘फ्रेंडशिप डे’ मनाया जाता है । इस वर्ष 2 अगस्त को ‘फ्रेंडशिप डे’ मनाया जाएगा । फ्रेंडशिप डे के नाम पर इस दिन मित्रों को प्रीतिभोज देना, मैत्री के प्रतीक के रूप में एक-दूसरे के हाथ में फ्रेंडशिप बैंड बांधना आदि घटनाएं भारी मात्रा में होती हैं । विद्यालय एवं महाविद्यालयों में इसका प्रमाण लक्षणीय है । क्या वास्तव में कोई एक बैंड बांधकर मैत्री में वृद्धि होती है ? एक-दूसरे को संकट के समय सहायता करने एवं मित्र का कदम अयोग्य दिशा से जाते समय उसे सहायता करने को खरी मैत्री कहते हैं । एक-दूसरे को अड़चन के समय सहायता करने के अनेक उदाहरण हिन्दुओं के प्राचीन इतिहास में देखने को मिलते हैं, जिसमें एक है श्रीकृष्ण-सुदामा ! परंतु वर्तमान समय के युवा पाश्‍चात्त्य सभ्यता के अधीन जाकर ऐसी मैत्री का केवल प्रदर्शन करने में बड़प्पन मानते हैं । वास्तव में राष्ट्र पर जब संकट छाया हो, तो ऐसे बेकार दिन मनाने की अपेक्षा सभी मित्रों के साथ बैठकर राष्ट्र के वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा करना ज्यादा उचित लगता है।

मित्रों के साथ बैठकर शराब के पेग बनाना और उस के बाद दिल की बातों के नाम एक दूसरे को गालियां देना और भी बहुत सारी हरकतें करना मुझे व्यक्तिगत रूप से उचित नहीं लगता। लेकिन ‘फ्रेंडशिप डे’ का विरोध मैं मात्र इस लिए नहीं करता क्यों कि इससे हमारा सांस्कृतिक क्षरण होता है...इस प्रकार के सभी तथाकथित उत्सवों के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है....
हमने तो कभी बैंड नहीं बांधे...

"एक ग्रीटिंग कार्ड बनाने वाली कंपनी 'Hallmark Cards' के मालिक 'जॉइस सी॰ हॉल' द्वारा 1910 में अपनी कंपनी में ग्रीटिंग की बिक्री बढ़ाने के लिए एक दिन बनाया गया, जिसे 'Friendship-Day ' का नाम दिया गया और आज स्पष्ट रूप से बधाई कार्ड को बढ़ावा देने के लिए एक वाणिज्यिक नौटंकी को पूरी दुनिया (खासकर एशियाई देश) मना रही है..!" Friendship-Day (मित्रता-दिवस) अमेरीकी कंपनियों द्वारा शुरू किया गया 'व्यावसायीकरण' का एक विपणन (Marketing) नाटक है..!
भारतीयों के इसी उतावलेपन का फायदा उठाकर कंपनियां 'चॉकलेट-डे', 'टेडी-डे', 'फादर्स-डे', 'मदर्स-डे', 'वेलेन्टाइन-डे, आदि फालतू के दिनों को व्यावसायीकरण के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं..! दुनिया हमारी अच्छाइयों को पेटेंट कर रही है और हम उनके त्यागे हुए मूल्यों को अपने जीवन में उतार रहें हैं..! ऐसा लगता है कि भारतीयों के जीवन में समय की इतनी कमी होने लगी है कि उन्हें 'फ्रेंडशिप-डे' का सहारा लेना पड़ रहा है..!
साथ हों या न हों लेकिन वो यादें तो हैं

मैं इन तमाम 'डे' का विरोध लाठी लेकर नहीं करता..! मेरा बस इतना कहना है कि मित्रता का व्यवहार हो, मित्रता का व्यापार नहीं..! प्यार का सम्मान किया जाए, प्यार का व्यापार नहीं..! मित्रता को, प्यार को हम किसी एक विशेष
दिन की परिधि में न बाँधेँ..! मेरे इस पोस्ट को अन्यथा न लिया जाए, मैं सिर्फ मित्रता तथा प्यार जैसे रिश्तोँ के व्यवसायीकरण का विरोध करता हूँ..!

ऐसे तमाम डे का प्रचार-प्रसार करके विदेशी कंपनियाँ और उनके दलाल इस देश से अरबों रुपये लूट कर हर साल ले जाते हैं, जिससे इस देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है..! इन तमाम डे को मनाने के चक्कर में हमारे देश का युवा-वर्ग 'गिफ्ट तथा कार्ड' पर अपने पैसे को बर्बाद कर रहा है और विदेशी बनियोँ (व्यवसायियों) के हाथों को मजबूत कर रहा है, जो कहाँ तक उचित है..!

हमें इन अंतर्राष्ट्रीय साजिशों को भी समझना चाहिए..! हो सकता है कि आपको सांस्कृतिक क्षरण से कोई फर्क न पड़ता हो लेकिन मुझे पता है कि आप देश को बेचने में आप सहयोग नहीं करेंगे...

"वन्दे-मातरम्"
वन्दे भारती

Friday, 31 July 2015

हां मैं पत्रकार हूं, और राष्ट्रवादी हिन्दू भी...

आज मेरे पास एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय का फोन आया, संभवतः उन्होंने मेरा मोबाइल नंबर फेसबुक से लिया होगा (उनकी बातों से अनुमान लगाया)। उन्होंने मुझसे पहला प्रश्न पूछा कि विश्व गौरव जी आपने अपना फेसबुक पेज कब बनाया था। मैनें उनसे कहा महोदय पहले अपना परिचय दीजिए..तब उन्होंने कहा कि वो एक निजी चैनल में वरिष्ठ पत्रकार हैं...इतना बताने के बाद उन्होंने फिर से अपना प्रश्न दोहरा दिया...उनके प्रश्न को सामान्य रूप से लेते हुए मैंने बताया कि 6 साल पहले बनाया था...मेरे जवाब देने के बाद वो बोले अच्छा अच्छा उस समय छात्र जीवन में रहे होंगे...मैंने कहा हां...तो उन्होंने कहा विश्व गौरव जी अब तो आप व्यावसायिक जीवन में आ चुके हैं फेसबुक पेज का नाम तो नहीं बदल सकता लेकिन फेसबुक प्रोफाइल से राष्ट्रवादी शब्द हटा दीजिए...उनके इतना कहते ही मुझे उनके पूरा विषय समझ आ गया दरअसल में उनके अन्दर मेरे पेज पर मेरे नाम के साथ राष्ट्रवादी हिन्दू देखकर सेक्लुरिज्म का कीड़ा जाग उठा था। 



मित्रों जब मैंने वो फेसबुक पेज बनाया था उस समय मेरी उम्र 18 साल थी लेकिन इस का मतलब ये नहीं मैंने राष्ट्रवादी हिन्दू शब्द का प्रयोग भावावेश में किया था। मैंने पूरे विवेक के साथ उस शब्द को अपने नाम के साथ जोड़ा था। मैंने उन पत्रकार महोदय से 1 घंटे तक बात की तब वो मेरे विषय से सहमत हुए। मुझे लगा कि ऐसे विषय पर ब्लाग लिखना चाहिए जिससे कि यदि कोई मुझे ऐसी राय दे तो मैं अपना समय व्यर्थ नष्ट न करते हुए अपने ब्लॉग का लिंक देकर अपना विषय स्पष्ट कर सकूं।

मित्रों मेरे लिए राष्ट्रवादी और हिन्दू दोनों शब्दों के मायने थोड़े अलग हैं... भारत के अतरिक्त किसी भी अन्य देश का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह देशभक्त नहीं हो सकता। राष्ट्रवाद की मूल परिकल्पना को समझने के लिए देश, राज्य तथा राष्ट्र की परिकल्पना को अलग अलग समझना आवश्यक है। 
देश एक भौगोलिक ईकाई है तथा राज्य देश का राजकीय अथवा शासकीय घटक है । देश मे एक अथवा एक से अधिक राज्य भी हो सकते है । जबकि राष्ट्र एक सांस्कृतिक ईकाई है , जिसके लिए मात्र भूमि ,लोगो ,एवं शासन पर्याप्त नहीं है अपितु सांस्कृतिक एकता की अनुभूति आवश्यक है । देश राष्ट्र के शरीर का एक भाग हो सकता है ,जबकि संस्कृति राष्ट्र की आत्मा है । राष्ट्र स्थिर व चिरंतर है जबकि राज्य अस्थिर हो सकता है अथवा बदल भी सकता है । 

अपने देश एवं उनकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , उसकी सुरक्षा एवं समृद्धि के प्रति जिसकी अव्यभिचारी एवं एकांतिक निष्ठा हो वही लोग राष्ट्रीय अथवा राष्ट्रवादी कहे जाते हैं। 

मैंने अभी लिखा कि भारत के अतरिक्त किसी भी अन्य देश का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता वो इस लिए क्योंकि किसी भी अन्य देश के पास उनकी स्थायी संस्कृति ही नहीं है। इस लिए वो अपनी भौगोलिक ईकाई के प्रति समर्पित तो हो सकते हैं लेकिन उनसे राष्ट्रवादी होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। मेरे लिए भौगोलिक संरक्षण से अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संरक्षण है, क्योंकि मुझे पता है कि परम पवित्र भारतवर्ष का आधार यहां की संमृद्ध संस्कृति है ।

ये विषय तो हो गया राष्ट्रवादी शब्द के मूल भाव का अब विषय आता है हिन्दू शब्द का....

हमारे पौराणिक ग्रन्थों में कहीं हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म का उल्लेख नहीं है।पुराणों में कर्इ कथाएं हैं, पर किसी कथा में हिन्दू धर्म की व्याख्या नहीं की गयी है। रामायण और महाभारत संसार के वहृततम और श्रेष्ठतम महाकाव्य है, जिनके महानायक राम और कृष्ण हैं, किन्तु इनकी महता देवताओं के रुप में नहीं की गयी हैं। इन्हें विष्णु का मनुष्य रुप में अवतार माना गया है। भग्वदगीता को धर्म का चश्मा उतार कर पढ़ने से इसमें छुपा हुआ गूढ आध्यात्मिक अर्थ समझ में आता है। भग्वद गीता धर्म, दर्शन और आध्यात्म का अनुपम ग्रन्थ है, जो हमारी राष्ट्रीय निधि  है। शताब्दियों पूर्व लिखा गया यह ग्रन्थ विश्व का पहला और अंतिम ऐसा ग्रन्थ हैं, जैसा न कभी लिखा गया था और न लिखा जायेगा। किन्तु गीता के किसी श्लोक में हिन्दू, हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व की व्याख्या नहीं की गयी है।

हिन्दू और हिन्दुत्व शब्द को सियासत मे लपेट कर जो व्याख्या की जा रही है, वह जानबूझ कर वातावरण को विषाक्त करने का प्रयास है। हमारा राष्ट्र भारत था, भारत है और भारत ही रहेगा। मुगलो ने इसे हिन्दुस्तान बनाया और अंग्रेजों ने इंड़िया। अंग्रेज इंड़िया में रहते थे, किन्तु अपने आपको ब्रिटिश कहते थे, किन्तु मुगल हिन्दुस्तानी कहते थे, क्योंकि हिन्दुस्तान को ही वे अपना मुल्क मानते थे। उन्हें हिन्दू शब्द से न तो घृणा थी और न ही इस विशेषण को अपनी पहचान के आगे लगाने से अपने आपको अपमानित महसूस करते थे। पाकिस्तान बनने के पहले सारे मुसलमान हिन्दुस्तानी मुसलमान कहलाते थे, किन्तु अब वे पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी कहलाते हैं। स्पष्ट है, हिन्दु धर्म नहीं, पहचान है, फिर इसे धर्म से क्यों जोड़ा जा रहा है ?

हमारी संस्कृति शांति और सहिष्णुता का पाठ पढाती है। हमने तलवार के बल पर नहीं, दिलों को जोड़ कर दुनिया जीती हैं । पूरी दक्षिण -पूर्वी ऐशिया में हज़ारों वर्षों से हमारी सांस्कृतिक विरासत आज भी अक्षुण्ण हैं। हमने हिंसा से नहीं, शांति के पाठ से संसार को बोद्धमय बनाया। कभी खून खराबे से दुनिया को जीतने की योजनाएं नहीं बनायी। इतिहास गवाह है कि जो तलवार ले कर दुनिया फतह करने निकले थे, वे मिट गये, किन्तु हमारी धर्म पताका विश्व में आज भी फहरा रही है।

सामान्य शब्दों में यदि समझें तो अटक से कटक तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति जो गाय, गंगा ,गीता और गायत्री का सम्मान करता है भले ही वह किसी भी पूजा पद्धति को मानता हो, हिन्दू है।जो व्यक्ति श्री राम की मूर्ति के सामने बैठकर पूजा करता हो किन्तु गायत्री के रहस्य को न जानता हो वह हिन्दू नहीं हो सकता और जो भले ही नमाज अदा करता हो लेकिन गंगा की पवित्रता को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हो वह हिन्दू है।

राष्ट्रवादी तथा हिन्दू शब्द की मूल परिकल्पना को यदि हमने समझकर स्वीकार कर लिया तो निश्चय ही हमारी 90 प्रतिशत समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

वन्दे भारती

Saturday, 20 June 2015

कुछ लिखते लिखते भटक गया

20 जून, मेरी ज़िन्दगी का बेहद खास दिन
एक ऐसा दिन जब मैं इस धरती पर आया।कभी कभी मैं सोचता हूँ कि उस दिन से आज तक कितना कुछ सिखा दिया इन 23 सालों ने।

मेरे लिए 20 जून से ज्यादा 19 की रात महत्त्व रखती है। क्यों कि उस रात किसी न किसी ऐसे व्यक्ति का फोन जरूर आता है जिससे आपको अपेक्षा न हो।
हो सकता है कि आपके साथ ऐसा न होता हो लेकिन मेरे साथ होता है।

इस बार भी 19 की रात कुछ खास बन जाए बस यही सोच रहा था और अपने सबसे अच्छे दोस्त को याद कर रहा था कि आज पहली कॉल उसी की आएगी। लेकिन सच कुछ और होने वाला था । मैं शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त नही कर सकता कि आज मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ।और ऐसी स्थिति का कारण भी है वो कारण ये कि 28 अगस्त की रात को मैं जो महसूस कर रहा था वो शायद कभी नहीं कर पाउँगा।उस रात मैं खुद रोते हुए किसी को हँसाने की कोसिस कर रहा था।और 19 जून की रात कोई मुझसे सामने खड़े होकर बात करने वाला भी नहीं था।
क्या किया था 28 की रात को उसे सोचकर आज भी रो देता हूँ।
खैर यही तो नए नए अनुभव मिले अब तक के जीवन में।सुबह या यूँ कहें अभी ये सोचा कि ये सब मैं क्यों लिख रहा हूँ और क्यों अपने दिमाग को उन बातों तक ले जा रहा हूँ? क्यों सोचता हूँ इसका जवाब तो नहीं है लेकिन एक सच ये भी है कि क्या अपने स्वाभिमान और सिद्धांतों से समझौता करते हुए उस व्यक्ति से बात करना मैं पसंद करूँगा।
नहीं मैं नहीं चाहता कि वो अब मुझसे बात करे। क्यों कि उस श्रेणी के लोगों को मैं अपने जीवन में स्थान देना नहीं चाहता।
मुझे ऐसा लग रहा है आज उसने इस विषय में चर्चा अवश्य की होगी लेकिन यदि ईश्वर ने नहीं चाहा है तो उससे बात करना भी मेरे सिद्धांतों से समझौता करना होगा।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...