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Friday, 5 August 2016

भारतीय साहित्य व परंपराओं को गलत पेश न करें

बहुत जगह पढ़ता था, बहुत जगह सुनता था और बहुत जगह उस सुने हुए को बोलता भी था कि भारत के इतिहास को वामपंथी और अंग्रेजी लेखकों ने ध्वस्त कर दिया है। आज इस बात को मीडिया में काम करते हुए प्रत्यक्ष देख रहा हूं। कल नवभारत टाइम्स डॉट कॉम पर एक ब्लॉग पढ़ा। मेरा आपसे आग्रह है कि मेरे इस ब्लॉग को पढ़ने से पहले कृपया यहां क्लिक करके  उस ब्लॉग को पढ़ लें। उनका विषय बहुत अच्छा था लेकिन उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से जिस चीज को भारत में हो रहे बलात्कारों के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया था, वह ठीक नहीं था। ब्लॉग में दिए गए उदाहरण पूरी तरह से निराधार हैं। महाभारत के जिस अनुशासन पर्व का लेखक ने अपने ब्लॉग में उल्लेख किया है, उसके विषय में तो मुझे जानकारी नहीं है लेकिन  हितोपदेश के विषय में जो लिखा है उसमें मुझे कुछ भी गलत नहीं लगता क्योंकि विज्ञान भी यह मानता है कि मासिक धर्म के कारण महिलाओं में काम प्रवृत्ति पुरुषों की तुलना में अधिक होती है।
आगे लेखक ने लिखा है कि
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः ।
नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥
यह श्लोक विदुर नीति के 40वें अध्याय से लिया गया है। इसका अर्थ होता है, ‘लकड़ियां आग को तृप्त नहीं कर सकतीं, नदियां समुद्र को तृप्त नहीं कर सकतीं, सभी प्राणियों की मृत्यु यम को तृप्त नहीं कर सकती तथा पुरुषों से कामी स्त्री की तृप्ति नहीं हो सकती।’ अर्थात तृप्ति के पीछे भागना व्यर्थ ही है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ‘स्त्री, पुरुष से कभी तृप्त नहीं हो सकती।’
सत्यकेतु द्वारा अनुवादित विदुर नीति को सर्वाधिक प्रमाणिक माना जाता है। इसके पेज नंबर 123 पर यह बात एकदम स्पष्ट लिखी हुई है।
आगे लेखक ने रामचरित मानस का जिक्र किया है। हालांकि मैं व्यक्तिगत रूप से श्रीराम के मूल चरित्र को गोस्वामी तुलसीदास के नजरिए से न देखकर महार्षि वाल्मीकि की दृष्टि से देखता हूं। लेकिन फिर भी गोस्वामी तुलसीदास के ज्ञान पर संदेह नहीं कर सकता। उनके लेखन से कुछ स्थानों पर असहमत रहता हूं लेकिन जिस चौपाई का उदाहरण लेखक ने दिया है वह पूरी तरह से गलत है।
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।
इस चौपाई में काकभुशुण्डि जी कहते हैं कि हे गरुड़जी! (शूर्पणखा- जैसी राक्षसी, धर्मज्ञान शून्य कामान्ध) स्त्री मनोहर पुरुष को देखकर, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मन को नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्य को देखकर द्रवित हो जाती है (ज्वाला से पिघल जाती है)।
इसमें सामान्य स्त्रियों के विषय में बात नहीं हो रही है। इसके लिए इस चौपाई के ठीक पहले की चौपाई से बहुत कुछ स्पष्ट हो सकता है।
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥2॥
अर्थात: शूर्पणखा नामक रावण की एक बहन थी, जो नागिन के समान भयानक और दुष्ट हृदय की थी। वह एक बार पंचवटी में गई और दोनों राजकुमारों को देखकर विकल (काम से पीड़ित) हो गई।
किसी के द्वारा लिखे गए साहित्य को यदि हमें समझना है तो उसे उसी लेखक/ कवि के दृष्टिकोण से ही समझना पड़ता है अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो जाता है। हम किसी के साहित्य को तब तक नहीं समझ सकते जब तक हम उस समय की मूल परिस्थितियों की अनुभूति न करें। लेकिन आज के दौर में तो भारतीयता को गाली देना फैशन बन गया है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे बीच में ऐसे भी लोग हैं जो शूर्पणखा जैसे चरित्र को भी जस्टिफ़ाइ करने लगते हैं। श्रीराम की बात आती है तो उन लोगों को सिर्फ बुराइयां दिखती हैं और रावण अथवा शूर्पणखा की बात आने पर उन लोगों के मन में ‘मानवाधिकार’ जाग जाता है। वैसे तो वे राम, लक्ष्मण, दुर्गा सहित प्रत्येक सद्चरित्र के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं लेकिन रावण, महिषासुर और शूर्पणखा जैसों का नाम आते ही वे उसके दुष्कर्मों को जस्टिफाइ करने लगते हैं। वे लोग यहां तक कहने लगते हैं कि देखो, रावण एक महिला को उठाकर लाया लेकिन उसे छुआ तक नहीं, वे कहने लगते हैं कि रावण ने तो सीता अपहरण अपनी बहन के लिए किया। इतना ही नहीं वे लोग महिषासुर को दलितों का पूर्वज बताकर, वहां भी दलित-सवर्ण मामला खोज लेते हैं। इन खास ‘प्रजाति’ के लोगों को दुनिया के एकमात्र पूर्ण पुरुष श्रीकृष्ण में कोई अच्छाई नहीं दिखती लेकिन इनको यह दिख जाता है कि द्रौपदी ने दुर्योधन का मजाक उड़ाया था। इनको द्रौपदी की वह हंसी तो दिख जाती है लेकिन अभिमन्यु के साथ जो अन्याय हुआ वह नहीं दिखता।
इनको भारतीय सनातन इतिहास में कोई वीर नहीं दिखता लेकिन ये अकबर को, घास की रोटियां खाकर भी एक हमलावर के सामने न झुकने वाले महाराणा प्रताप से महान बताने लगते हैं। ये एकलव्य में एक दलित खोज लेते हैं लेकिन इनको श्रीराम का शबरी और निषादराज के प्रति प्रेम नहीं दिखता। मुझे पता है कि इस ब्लॉग के बाद कुछ बुद्धिजीवी राम चरित मानस, मनुस्मृति या किसी और ग्रंथ से कुछ सूक्तिवाक्य ले आएंगे। तो चलिए कुछ दिनों तक ऐसे ही श्लोकों की खोज और उनका अध्ययन शुरू करता हूं। अगले ब्लॉग में कुछ ऐसी जानकारियों के साथ मिलूंगा जिनको आज ये तथाकथित बुद्धिजीवी अपने ढंग से पेश करते हैं और गौरवशाली भारतीय साहित्य एवं परंपराओं को भी गलत प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं।
विश्व गौरव को ट्विटर पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें

Friday, 15 April 2016

राम मंदिर की बात करने से पहले श्रीराम के चरित्र को समझें

सर्वप्रथम आपको सपरिवार श्रीराम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं!
इस देश में वर्तमान समय में एक नई बहस छिड़ी है। लोग मोदी सरकार से उम्मीद करके बैठे हैं कि वह अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण कराएगी। सवाल है कि क्या वर्तमान भारत इस अवस्था में है कि इसकी एकात्मता के आधारभूत स्तंभ श्रीराम का मंदिर बनाया जाए? वैसे इस सवाल के मूल मायनों का उन लोगों से कोई संबंध नहीं है जो मंदिर के नाम पर मात्र एक इमारत चाहते हैं। इस सवाल का सीधा संबंध उन लोगों से है जो श्रीराम को इस देश का सांस्कृतिक आधार मानते हुए रामराज्य को पुनः प्रतिस्थापित कर आदर्श भारत निर्माण करना चाहते हैं।
श्रीराम भारत की अस्मिता के आधार हैं। राम तो वह हैं जो रावण से युद्ध करने को निकलते हैं तो एक राजकुमार होते हुए भी किसी राजा का साथ नहीं लेते बल्कि वंचितों को, वनवासियों को गले लगाते हुए उनसे एक नई सेना का निर्माण करते हैं। भारतीय मानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टतापूर्वक किया। अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा। मैंने श्रीराम को विश्व का एकमात्र पूर्ण पुरुष मानता हूं और इसका कारण यह है कि मैंने राम को किसी मूर्ति या चित्र में न देखकर एक चरित्र के रूप में देखा, एक ऐसा चरित्र जो स्वयं में पूर्ण है।
दरअसल, राम की पूजा इसलिए नहीं की जाती कि हमारी भौतिक इच्छाएं पूरी हो जाएं, मकान बन जाए, प्रमोशन हो जाए, व्यापार में लाभ हो जाए। बल्कि राम की पूजा हम उनसे यह प्रेरणा लेने के लिए करते हैं कि मुश्किल क्षणों का सामना, धैर्यपूर्वक, बिना विचलित हुए किस प्रकार से किया जाए। राम ने अपने जीवन की परिस्थितियों को सहेजने की काफी कोशिश की, लेकिन वह हमेशा ऐसा कर नहीं सके। उन्होंने कठिन परिस्थतियों में ही अपना जीवन बिताया, जिसमें चीजें लगातार उनके नियंत्रण से बाहर निकलती रहीं, लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने हमेशा खुद को संयमित और मर्यादित रखा। आध्यात्मिक रूप से व्यावहारिक बनने का यही तो सार है।
संत कबीर कहते हैं कि
राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप।
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप।।
अर्थात् राम नाम को महत्व जाने बिना उसे जपना तो न जपने जैसा ही है क्योंकि जब तक मस्तिष्क पर देहाभिमान की छाया है तब तक अपने पापों से छुटकारा नहीं मिल सकता।
Ram
इस संसार में चार राम हैं-
एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट घट में बैठा।
एक राम का सकल पसारा, एक राम है सबसे न्यारा।।
संसार में चार राम हैं ! जिनमें से तीन को हम जगत व्यवहार में जानते हैं पर चौथा अज्ञात राम ही सार है । उसका विचार करना चाहिए। एक दशरथ पुत्र राम को सभी जानते हैं और एक जो प्रत्येक जीवात्मा के घट (शरीर) में विराजमान हैं तथा एक जो समस्त (सकल) दृश्य-अदृश्य सृष्टि हैं, वह राम ही है अथवा राम में ही है । लेकिन इन सबसे परे जो चौथा (आत्मा) राम है, वही हमारा और इन सबका सार है। अतः उसी चौथे राम को जानना उत्तम है।
जिस देश में लोग भूख से मर रहे हों, जिस देश में लोग अशिक्षित हों, जिस देश में महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता हो और जिस देश में अपने बुजुर्ग माता-पिता को लोग वृद्धाश्रम में छोड़ आते हों वहां एक मंदिर बनाकर क्या हासिल होने वाला है, यह मेरी समझ से परे है। अन्य मंदिरों की तरह से तथाकथित ब्राह्मणों के लिए धनार्जन का एक साधन और बन जाएगा। देश की मूल समस्याओं का समाधान क्या राम मंदिर से संभव होगा? मेरा मत यह है कि यदि वास्तव में हम अपने आराध्य का मंदिर बनाना चाहते हैं तो उसके लिए उनके चरित्र को अपने चरित्र में उतारना होगा। श्रीराम के काल में जैसी समानता, निस्वार्थ राष्ट्रप्रेम, पितृभक्ति, राजनीति और धर्मनिष्ठा थी, उसे जीवन का आधार बनाइए। जब इतना कर लें तो बनाइए एक भव्य श्रीराम मंदिर और पूरे विश्व को संदेश दीजिए कि अपने ईष्ट को हमने अपने जीवन का आधार बनाया है। मात्र एक इमारत और खड़ी कर देने से कुछ भी नहीं होने वाला है।
राम मंदिर के भव्य निर्माण की बात करने से पहले हमें यह समझना होगा कि राम कौन हैं, राम कोई और नहीं हम स्वयं हैं। जब हमारी आंखों के सामने कुछ गलत हो रहा हो और हम उसके खिलाफ संघर्ष करें तो समझ लेना चाहिए कि राम आ गए और जब हम स्वयं कुछ गलत करें अथवा गलत का विरोध न करें तो समझ लेना हम पर रावण हावी हो रहा है।
जब हमारे परिवारों में किसी बच्चे का जन्म होता है तो घर की महिलाएं कुछ गीत गाती हैं। उस गीत में यही कहा जाता है कि राम को कौशल्या ने जन्म दिया है न कि यह कहा जाता है विश्व गौरव या फलाने ने जन्म लिया है। राम किसी उपन्यास के पात्र नहीं हैं, यदि वह किसी उपन्यास के पात्र होते तो यह नाम कब का मिट गया होता। राम तो राष्ट्र की संस्कृति के आधार हैं और इसीलिए जब भारत में किसी का विवाह होता है तो महिलाएं जो गीत गाती हैं उसमें भी यही कहती हैं कि राम और सीता का विवाह हो रहा है।
दोस्तो, आज हम उस देश में रह रहे हैं जहां एक बेटी/बहन के बलात्कारी को नाबालिग करार देते हुए छोड़ दिया जाता है। क्या से क्या हो गए हैं हम? जिस देश में नारी को पूजा समझा जाता था और जिस देश में नारी के सम्मान की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने समुद्र पर पुल बना दिया था उस देश में नारी के साथ ऐसा व्यवहार… बातें राम मंदिर की हो रही हैं…कैसा राम मंदिर, जब आप अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहे तो क्या राम आएंगे….नहीं, हमें ही राम बनना होगा…बदलनी होगी यह व्यवस्था… इस देश की परंपरा को आगे ले जाने के लिए स्वयं में परिवर्तन लाकर राम के चरित्र को अपनाना होगा और अगर हम इस व्यवस्था को नहीं बदल सकते तो हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम किसी श्रीराम मंदिर की बात करें…इस भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि देवताओं का वास तो वहां होता है, जहां महिलाओं का सम्मान होता है। यदि हम नारी का सम्मान नहीं कर सकते तो ईंट पत्थर की इमारत तो खड़ी कर सकते हैं लेकिन उसे मंदिर नहीं कह सकते।
श्रीराम सिर्फ सनातनियों की आस्था के कारण ही पूर्ण पुरुष नहीं कहे जाते हैं बल्कि वह अपने कर्मों की वजह से पूज्य माने जाते हैं और पुरुषोत्तम कहलाते हैं। आइए कुछ विषयों पर आप भी विचार करिए।
भगवान राम द्वारा सीता को यह वचन दिया जाना कि मैं अपने जीवन में सिर्फ एक ही विवाह करूंगा और तुम मेरी एकमात्र पत्नी रहोगी, यह दर्शाता है कि वह बहुविवाह के विरोधी थे जो कि उस समय बहुत ही आम बात थी (श्रीराम से पूर्व की पीढ़ियों का इतिहास इस बात का साक्षी है)।
क्या आज हम प्रेम के उस स्वरूप को मानते हैं?
जंगल में निषादराज से गले मिलकर भगवान राम ने ऊंच-नीच की भावना पर कुठाराघात किया और हमें यह सन्देश दिया कि जाति अथवा धन आधारित विभेद नहीं होना चाहिए। शबरी जो कि एक अछूत जाति से मानी जाती है, उसके हाथों के जूठे बेर खा कर उन्होंने जाति या वर्ण व्यवस्था को कर्म आधारित प्रमाणित कर दिया और हमें यह सन्देश दिया कि मोल व्यक्तियों और उसकी भावनाओं का होता है ना कि उसके कुल या जाति का।
क्या आज हम उस प्रकार का भेदभाव रहित आचरण करते हैं?
जंगल में ही अहिल्या को शापमुक्त कर उन्होंने यह सन्देश दिया कि अनजाने में हुए गलती, गलती नहीं कहलाती है और बेहतर भविष्य के लिए उसे माफ कर देना ही उचित है। बाली वध का सार यह है कि अगर आपका मित्र सही है तो किसी भी हालत में आपको आपके मित्र की सहायता करनी चाहिए साथ ही येन-केन-प्रकारेण पृथ्वी पर से दुष्टों का संहार जरूरी है ताकि सज्जन चैन से जी सकें।
क्या हमने कभी किसी की गलती पर इतना बड़ा दिल दिखाया?
सीता जी के अपहरण के पश्चात् पहले समुद्र से विनय पूर्वक रास्ता मांगना फिर उस पर ब्रह्मास्त्र से प्रहार को उत्तेजित होना यह दर्शाता है कि शक्तिसंपन्न होने के बाद भी लोगों को अपनी मर्यादा नहीं भुलानी चाहिए, समुद्र को मात्र एक बाण से सुखा देने कि क्षमता होने के बावजूद भी समुद्र पर राम सेतु का बनाना हमें यह सिखाता है कि अगर काम बन जाए तो बिना वजह शक्ति प्रदर्शन अनुचित है। अपने लिए तथा मानव जाति के लिए भी यदि कुछ किया जा रहा है तो अन्य जीवों के विषय में न सोचना अनुचित होगा।
क्या हमने अपनी शक्ति और अपने दायित्व में सामन्जस्य स्थापित करने का प्रयास किया?
रावण वध के पश्चात् लक्ष्मण को उसके पास शिक्षा ग्रहण करने को भेजना हमें सिखाता है कि ज्ञान जिस से भी मिले जरूर ग्रहण करना चाहिए और मनुष्य को कभी भी यह नहीं समझना चाहिए कि वह स्वयं में सम्पूर्ण है।
क्या हम अपने विरोधियों अथवा शत्रुओं से कुछ सीखने की क्षमता रखते हैं?
सीता की अग्नि परीक्षा पर श्रीराम कहते हैं कि आज यह सीता की अग्नि परीक्षा, अंतिम अग्नि परीक्षा है और दुनिया में फिर किसी नारी को ऐसी प्रताड़ना नहीं दी जाएगी, मनुष्य को अपनी अर्धांगिनी पर विश्वास करना चाहिए क्योंकि माता सीता उतने वर्ष रावण जैसे व्यक्ति के पास रह कर भी पवित्र ही थीं। ठीक उसी प्रकार आधुनिक नारी को भी घर में अथवा बाहर अकेला छोड़ देने के बाद उसकी बातों और उसकी पवित्रता पर अविश्वास प्रकट नहीं करना चाहिए क्योंकि नारी वह शक्ति है जो रावण जैसे नराधम के पार अकेली रह कर भी अपनी लाज की रक्षा करने में सक्षम है। यदि अग्नि परीक्षा नहीं हुई होती तो नारी की सच्चाई संदिग्ध हो जाती परन्तु अग्नि परीक्षा ने यह साबित कर दिया कि नारी के प्रति अविश्वास रखने का कोई कारण नहीं है।
क्या आज हम नारी पर इतना विश्वास करते हैं?
एक धोबी के कहने पर श्रीराम द्वारा माता सीता का परित्याग, उनका राजधर्म था। जहां उन्होंने माता सीता का परित्याग कर यह सन्देश दिया कि राजा की अपनी कोई खुशी अथवा गम नहीं होना चाहिए। अगर राज्य का एक भी व्यक्ति, भले ही वह एक धोबी जैसा निर्धन, निर्बल ही क्यों ना हो, उसका मत और उसकी राय भी महत्वपूर्ण है। कोई भी काम सर्वसम्मति के साथ करना चाहिए और सर्वसम्मति बनाने के लिए अगर राजा को अपनी व्यक्तिगत खुशी का बलिदान भी करना पड़े तो राजा को कर देना चाहिए क्योंकि राजा बनने के बाद व्यक्ति खुद का या परिवार का नहीं रह जाता है बल्कि वह राज्य का हो जाता है। प्रजा की खुशी में ही राजा की खुशी होनी चाहिए और प्रजा के दुख में ही राजा का भी दुख निहित होना चाहिए।
क्या आज के राजनेता ऐसी राजनीति और ऐसा राजधर्म निभाने की क्षमता रखते हैं?
इसलिए मैं तब तक श्रीराम का मंदिर नहीं चाहता हूं जब तक हम राम राज्य स्थापित करने में सक्षम न हो जाएं। जब इस देश का प्रत्येक ‘भारतीय’ यह कहेगा कि मंदिर बने तब मंदिर बनना चाहिए। शब्द पर ध्यान दीजिएगा मात्र प्रत्येक ‘भारतीय’।

Sunday, 6 December 2015

कैसे राम, और कैसा मंदिर?


दोस्तों, आज से 23 साल पहले बाबरी ढ़ांचे जिसे कुछ अज्ञानी मस्जिद भी कहते हैं, उसे देश की जनता के एक वर्ग ने गिरा दिया। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि एक स्वतंत्र देश में गुलामी की कोई निशानी नहीं होनी चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि देश की सारी मस्जिदें तोड़ दो..अरे मस्जिद भी इस देश के नागरिकों की, हमारे भाइयों की इबादतगाह है, उसका सम्मान होना चाहिए। और इस देश के प्रत्येक नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि इस देश के नागरिकों के पूजन स्थल की, इबादतगाह की सुरक्षा करे। अब संभव है कि आपके मन में सवाल उठे कि जब आप मानते हैं कि मस्जिद नहीं टूटनी चाहिए तो फिर बाबरी के गिरने को सही कैसे ठहरा सकते हैं? तो दोस्तों, मैं आपको बता दूं कि पहली बात तो यह कि यह देश राम का देश है, बाबर का नहीं...अब इसे यह मत कहना कि मैं मुस्लिम विरोधी हूं... मैं चाहता हूं कि इस देश के लोगों के बीच चर्चाएं बाबर पर नहीं बल्कि इस देश के सबसे बड़े मुसलमान, एपीजे अब्दुल कलाम पर चर्चा पर हो, अशफाक उल्ला खां पर चर्चा हो। उन पर कोई उंगली उठाएगा तो इस देश के मुसलमानों के साथ नहीं बल्कि उनसे आगे खड़ा होकर उनका विरोध करूंगा जो इस देश की एकात्मता के आधार कलाम जैसे मुस्लिमों पर उंगली उठाएंगे और मैं ऐसा इस लिए करूंगा क्यों कि कलाम साहब सिर्फ मुसलमानों के नहीं अपितु इस देश के प्रत्येक नागरिक के हैं। ठीक इसी प्रकार राम सिर्फ हिंदुओं के नहीं अपितु प्रत्येक हिंदुस्थानी के हैं।

यह भी पढ़ें: कब बनेगा राम मंदिर

सांस्कृतिक आधार पर इस देश के मुसलमान जिन्ना के नहीं अशफाक उल्ला खां के वंसज हैं। जिनको इस भारत मां से प्यार नहीं था वे 1947 में ही यह देश छोड़कर जा चुके हैं। अब जो यहां पर हैं वे हमारे अपने हैं। अगर आप उन पर प्रश्नचिन्ह लगाना पूरी तरह से गलत होगा। मेरे इस कथन को इस रूप में ना लिया जाए कि मैं याकूब की शवयात्रा को निकालने वालों का समर्थन करता हूं। वे भटके हुए लोग हैं जो याकूब की शवयात्रा निकालते हैं। उन्हें सत्य से अवगत कराना होगा और वे यदि इस भारत भूमि के प्रति सम्मान ना रखें तो उन्हें पाकिस्तान मत भेजो बल्कि चौराहे पर खड़े करके गोली मार दो। राम तो हमारी अस्मिता के आधार हैं, राम तो वह हैं जो वनवास के समय जब दुनिया और मानवता के सबसे बड़े दुश्मन, रावण से युद्ध करने निकलते हैं तो एक राजकुमार होते हुए भी वे किसी राजा का साथ नहीं लेते बल्कि वंचितों को, वनवासियों को गले लगाते हैं।

राम का तो पूरा जीवन ही त्रासदीपूर्ण रहा। इसके बावजूद लोग राम की पूजा करते हैं। भारतीय मानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं; बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टता पूर्वक किया। अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा। मैंने ने राम को इसलिए पसंद किया, क्योंकि मैंने राम के आचरण में निहित सूझबूझ को समझा।

दरअसल, राम की पूजा इसलिए नहीं की जाती कि हमारी भौतिक इच्छाएं पूरी हो जाएं-मकान बन जाए, प्रमोशन हो जाए, सौदे में लाभ मिल जाए। बल्कि राम की पूजा हम उनसे यह प्रेरणा लेने के लिए करते हैं कि मुश्किल क्षणों का सामना कैसे धैर्य पूर्वक बिना विचलित हुए किया जाए। राम ने अपने जीवन की परिस्थितियों को सहेजने की काफी कोशिश की, लेकिन वे हमेशा ऐसा कर नहीं सके। उन्होंने कठिन परिस्थतियों में ही अपना जीवन बिताया, जिसमें चीजें लगातार उनके नियंत्रण से बाहर निकलती रहीं, लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने हमेशा खुद को संयमित और मर्यादित रखा। आध्यात्मिक बनने का यही सार है।

संत कबीर कहते हैं कि
राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप


अर्थात राम नाम को महत्व जाने बिना उसे जपना तो न जपने जैसा ही है क्योंकि जब तक मस्तिष्क पर देहाभिमान की छाया है तब तक अपने पापों से छुटकारा नहीं मिल सकता।

इस संसार में चार राम हैं-

एक राम दशरथ का बेटा , एक राम घट घट में बैठा !
एक राम का सकल पसारा , एक राम है सबसे न्यारा !


संसार में चार राम हैं ! जिनमें से तीन को हम जगत व्यवहार में जानते हैं पर चौथा अज्ञात राम ही सार है । उसका विचार करना चाहिये । एक दशरथ पुत्र राम को सभी जानते हैं और एक जो प्रत्येक जीवात्मा के घट ( शरीर ) में विराजमान है तथा एक ये जो समस्त ( सकल ) दृश्य अदृश्य सृष्टि है , ये ( विराट पुरुष ) राम ही है - राम में ही है । लेकिन इन सबसे परे जो चौथा ( आत्मा ) राम है । वही हमारा और इन सबका सार है । अतः उसी को जानना उत्तम है।



इसलिए मैं उस राम का मंदिर चाहता हूं जो हिंदुओं के नहीं बल्कि प्रत्येक भारतीय के हैं। भाजपा ने तो हमारे राम को भरे बाजार बेच दिया और आज भी उन्ही राम पर राजनीति करना चाहती है, लेकिन यह देश सब समझता है। इस देश की जनता को जब मंदिर बनाना होगा, मंदिर बन जाएगा। मंदिर बनाने के लिए इस देश के 125 करोड़ भारतीयों को किसी 'दल' की जरूरत नहीं लेकिन हां 'दल' को अवश्य इस देश के लोगों की जरूरत होगी। जब इस देश का प्रत्येक 'भारतीय' यह कहेगा कि मंदिर बने तब मंदिर बनना चाहिए और जिसे राम स्वीकार नहीं उसे स्वयं को भारतीय कहलाने का भी अधिकार नहीं। शब्द पर ध्यान दीजिएगा मात्र प्रत्येक 'भारतीय'।

यह भी पढ़ें: कब बनेगा राम मंदिर

वंदे भारती

Tuesday, 18 August 2015

संघ की मूल अनुभूति...


राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ जिसे आर.एस.एस (R.S.S.) जाना जाता है ।मुझे नही लगता कि किसी को संघ की पहचान बताने की जरूरत है। आज यह कहना ही उचित होगा कि इसके आलोचक ही इसकी मुख्य पहचान है। जब आलोचक संघ की कटु आलोचना करते नज़र आते है तब तब संघ और मजबूत होता हुआ दिखाई पड़ता है। छद्म धर्मनिरपेक्षवादी लोगों को यही लगता है कि भारत उन्ही के भरोसे चल रहा होता है किन्‍तु जानकर भी पागलो की भांति हरकत करते है जैसे उन्‍हे पता ही न हो कि संघ की वास्‍तविक गतिविधि क्‍या है ?

संघ के बारे थोड़ा बताना चाहूँगा उन धर्मनिरपेक्ष बंदरो को जो अपने आकाओ के इसारे पर नाचने की हमेशा नाटक करते रहते है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्‍थापना सन् 27 सितंबर 1925 को विजय दशमी के दिन मोहिते के बाड़े नामक स्‍थान पर डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य डॉक्टर जी ने की थी। संघ के 5 स्‍वयंसेवको के साथ शुरू हुई विश्व की पहली शाखा आज 50 हजार से अधिक शाखाओ में बदल गई और ये 5 स्‍वयंसेवक आज करोड़ो स्‍वयंसेवको के रूप में हमारे समाने है। संघ की विचार धारा में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, राम जन्मभूमि, अखंड भारत, समान नागरिक संहिता जैसे विजय है जो देश की समरसता की ओर ले जाता है। कुछ लोग संघ की सोच को राष्ट्र विरोधी मानते है क्‍योकि उनका काम ही है यह मानना, नही मानेगे तो उनकी राजनीतिक गतिविधि खत्‍म हो जाती है।



राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की हमेशा अवधारणा रही है कि 'एक देश में दो दप्रधान, दो विधान, दो निशान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे' बात सही भी है। जब समूचे राष्ट्र और राष्ट्र के नागरिकों को एक सूत्र मे बाधा गया है तो धर्म के नाम पर कानून की बात समझ से परे हो जाती है, संघ द्वारा समान नागरिक संहिता की बात आते ही संघ को सामप्रदायिक होने की संज्ञा दी जाती है। अगर देश के समस्‍त नागरिको के लिये एक नियम की बात करना साम्प्रदायिकता है तो मेरी नज़र में इस साम्प्रदायिकता से बड़ी देशभक्ति और नही हो सकती है।



संघ ने हमेशा कई मोर्चो पर अपने आपको स्‍थापित किया है। राष्ट्रीय आपदा के समय संघ का स्यंवसेवक यह नहीं देखता‍ कि आपदा मे फंसा हुआ व्‍यक्ति किस पूजा पद्धति को मानने वाला है। आपदा के समय संघ केवल और केवल राष्ट्र धर्म का पालन करता है कि आपदा मे फसा हुआ अमुख भारत माता का बेटा है। गुजरात में आए भूकम्प और सुनामी जैसी घटनाओं के समय सबसे आगे अगर किसी ने निःस्वार्थ भाव से कार्य किया तो वह संघ का स्‍वयंसेवक था। संघ के प्रकल्पों ने देश को नई गति दी है। दीन दयाल शोध संस्थान ने गांवों को स्वावलंबी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। संघ के इस संस्‍थान ने अपनी योजना के अंतगत करीब 80 गांवों में यह लक्ष्य हासिल कर लिया और करीब 500 गांवों तक विस्‍तार किया जाना है। दीन दयाल शोध संस्थान के इस प्रकल्प में संघ के हजारों स्‍वयंसेवक बिना कोई वेतन लिए मिशन मानकर अपने अभियान मे लगे हैं। सम्‍पूर्ण राष्‍ट्र में संघ के विभिन्‍न अनुसांगिक संगठनों राष्ट्रीय सेविका समिति, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, भारतीय मजदूर संघ, हिंदू स्वयंसेवक संघ, हिन्दू विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, दुर्गा वाहिनी, सेवा भारती, भारतीय किसान संघ, बालगोकुलम, विद्या भारती, भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम सहित ऐसे संगठन कार्यरत है जो करीब 1 लाख प्रकल्‍पों को चला रहे है।



संघ की प्रार्थना भी भारत माता की शान को चार चाँद लगता है, संघ की प्रार्थना की एक एक लाईन राष्‍ट्र के प्रति अपनी सच्‍ची श्रद्धा प्रस्‍तुत करती है। संघ को गाली देने से संघ का कुछ बिगड़ने वाला नही है अप‍ितु गंदे लोगो की जुब़ान की गन्‍दगी ही परिलक्षित होती है।


Wednesday, 12 August 2015

भगवान को कैसे देखें...


एक बार अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा कि भगवान मै आपके विराट स्वरूप का दर्शन करना चाहता हूँ | 
श्री कृष्ण ने कहा -
इन पंच तत्वों से बनी आँखो से केवल पंचतत्व की बनी चीज ही देख सकते हो | इन आँखो से मिट्टी देख सकते हो ,हाँड़ माँस से बनी चीजें देख सकते हो , इनसे भगवान को नही देख सकते | भगवान चमड़े की आँखो का विषय नही है, भगवान का शरीर सच्चिदानंद है दिव्य है। इसी लिए भगवान ने कहा ----दिब्यं ददामि ते चक्छुः " अर्थात् मै तुम्हे दिब्य दृष्टि दूँगा | तब तुम मेरे दिव्य स्वरुप को देख सकोगे |
क्या आपने कभी ठंडक देखी ? क्या आपने कभी गर्मी देखी ? क्या आपने कभी प्यार देखा ?? अच्छा आप बताइये ज्ञान को देखा ? सबका उत्तर है नही | तो फिर जब आप इन चीजों को नही देख पाये तो भगवान को देख लोगे ???

भगवान ने अपना स्वरुप जब अर्जुन को दिखाया तो वे देख पाये , माँ यसोदा को जब दिखाया तो वे देख सकीं |
अतः भगवान को देखने के लिए एक योग्यता चाहिए "प्रेमांजना छुरित भक्ति विलोचनेना संतः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति" अर्थात जिनकी आखों में भगवान के प्रति शुद्ध प्रेम का अंजन(काजल) लगा है वे शुद्ध भक्त भगवान का दर्शन हर क्षण करते हैं। शुद्ध भक्त प्रकृति के तीन गुणों से ऊपर दिव्य गुण में स्थित होते हैं।
तो अगर भगवान को देखना है तो इस योग्य बनिए। हरे कृष्ण महामंत्र का जप कलियुग में भगवद प्राप्ति का सर्वोत्तम एवं सरल साधन है। इसका जप करने से हमारे ह्रदय में भगवान के प्रति सुप्तावस्था में पड़ा प्रेम जागृत होता है और हमे परम पद की ओर ले जाता है।
प्रतिदिन कम से कम १० मिनट जरूर जप करें।
नशा, मांसाहार, अवैध सम्बन्ध, जुआ, इन सब कुकर्मों से दूर रहे।
हरे कृष्ण।

सावन,भारतीय संस्कृति और एक रहस्य


यहाँ दो पात्र हैं : एक है भारतीय और एक है इंडियन ! आइए देखते हैं दोनों में क्या बात होती है !

इंडियन : ये शिव रात्रि पर जो तुम इतना दूध चढाते हो शिवलिंग पर, इस से अच्छा तो ये हो कि ये दूध जो बहकर नालियों में बर्बाद हो जाता है, उसकी बजाए गरीबों मे बाँट दिया जाना चाहिए ! तुम्हारे शिव जी से ज्यादा उस दूध की जरुरत देश के गरीब लोगों को है. दूध बर्बाद करने की ये कैसी आस्था है ?




भारतीय : सीता को ही हमेशा अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है, कभी रावण पर
प्रश्नचिन्ह क्यूँ नहीं लगाते तुम ?

इंडियन : देखा ! अब अपने दाग दिखने लगे तो दूसरों पर ऊँगली उठा रहे हो ! जब अपने बचाव मे कोई उत्तर नहीं होता, तभी लोग दूसरों को दोष देते हैं. सीधे-सीधे क्यूँ नहीं मान लेते कि ये दूध चढाना और नालियों मे बहा देना एक बेवकूफी से ज्यादा कुछ नहीं है !

भारतीय : अगर मैं आपको सिद्ध कर दूँ की शिवरात्री पर दूध चढाना बेवकूफी नहीं समझदारी है तो ?

इंडियन : हाँ बताओ कैसे ? अब ये मत कह देना कि फलां वेद मे ऐसा लिखा है इसलिए हम ऐसा ही करेंगे, मुझे वैज्ञानिक तर्क चाहिए।

भारतीय : ओ अच्छा, तो आप विज्ञान भी जानते हैं ? कितना पढ़े हैं आप ?

इंडियन : जी, मैं ज्यादा तो नहीं लेकिन काफी कुछ जानता हूँ, एम् टेक किया है, नौकरी करता हूँ. और मैं अंध विशवास मे बिलकुल भी विशवास नहीं करता, लेकिन भगवान को मानता हूँ.

भारतीय : आप भगवान को मानते तो हैं लेकिन भगवान के बारे में जानते नहीं कुछ भी. अगर जानते होते, तो ऐसा प्रश्न ही न करते ! आप ये तो जानते ही होंगे कि हम लोग त्रिदेवों को मुख्य रूप से मानते हैं : ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शिवजी (ब्रह्मा विष्णु महेश) ?

इंडियन : हाँ बिलकुल मानता हूँ.

भारतीय : अपने भारत मे भगवान के दो रूपों की विशेष पूजा होती है : विष्णु जी की और शिव जी की ! ये शिव जी जो हैं, इनको हम क्या कहते हैं – भोलेनाथ, तो भगवान के एक रूप को हमने भोला कहा है तो दूसरा रूप क्या हुआ ?

इंडियन (हँसते हुए) : चतुर्नाथ !

भारतीय : बिलकुल सही ! देखो, देवताओं के जब प्राण संकट मे आए तो वो भागे विष्णु जी के पास, बोले “भगवान बचाओ ! ये असुर मार देंगे हमें”. तो विष्णु जी बोले अमृत पियो. देवता बोले अमृत कहाँ मिलेगा ? विष्णु जी बोले इसके लिए समुद्र मंथन करो !
तो समुद्र मंथन शुरू हुआ, अब इस समुद्र मंथन में कितनी दिक्कतें आई ये तो तुमको पता ही होगा, मंथन शुरू किया तो अमृत निकलना तो दूर विष निकल आया, और वो भी सामान्य विष नहीं हलाहल विष ! भागे विष्णु जी के पास सब के सब ! बोले बचाओ बचाओ !
तो चतुर्नाथ जी, मतलब विष्णु जी बोले, ये अपना डिपार्टमेंट नहीं है, अपना तो अमृत का डिपार्टमेंट है और भेज दिया भोलेनाथ के पास ! भोलेनाथ के पास गए तो उनसे भक्तों का दुःख देखा नहीं गया, भोले तो वो हैं ही, कलश उठाया और विष पीना शुरू कर दिया ! ये तो धन्यवाद देना चाहिए पार्वती जी का कि वो पास में बैठी थी, उनका गला दबाया तो ज़हर नीचे नहीं गया और नीलकंठ बनके रह गए.

इंडियन : क्यूँ पार्वती जी ने गला क्यूँ दबाया ? 

भारतीय : पत्नी हैं ना, पत्नियों को तो अधिकार होता है ..:P किसी गण की हिम्मत होती क्या जो शिव जी का गला दबाए……अब आगे सुनो फिर बाद मे अमृत निकला ! अब विष्णु जी को किसी ने invite किया था ???? मोहिनी रूप धारण करके आए और अमृत लेकर चलते बने.
और सुनो – तुलसी स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती है, स्वादिष्ट भी, तो चढाई जाती है कृष्ण जी को (विष्णु अवतार).
लेकिन बेलपत्र कड़वे होते हैं, तो चढाए जाते हैं भगवान भोलेनाथ को !
हमारे कृष्ण कन्हैया को 56 भोग लगते हैं, कभी नहीं सुना कि 55 या 53 भोग लगे हों, हमेशा 56 भोग ! और हमारे शिव जी को ? राख , धतुरा ये सब चढाते हैं, तो भी भोलेनाथ प्रसन्न ! कोई भी नई चीज़ बनी तो सबसे पहले विष्णु जी को भोग ! दूसरी तरफ शिव रात्रि आने पर हमारी बची हुई गाजरें शिव जी को चढ़ा दी जाती हैं……

अब मुद्दे पर आते हैं……..इन सबका मतलब क्या हुआ ???

विष्णु जी हमारे पालनकर्ता हैं, इसलिए जिन चीज़ों से हमारे प्राणों का
रक्षण-पोषण होता है वो विष्णु जी को भोग लगाई जाती हैं !
और शिव जी?
शिव जी संहारकर्ता हैं, इसलिए जिन चीज़ों से हमारे प्राणों का नाश होता है,
मतलब जो विष है, वो सब कुछ शिव जी को भोग लगता है !

इंडियन : ओके ओके, समझा !

भारतीय : आयुर्वेद कहता है कि वात-पित्त-कफ इनके असंतुलन से बीमारियाँ होती हैं और श्रावण के महीने में वात की बीमारियाँ सबसे ज्यादा होती हैं. श्रावण के महीने में ऋतू परिवर्तन के कारण शरीर मे वात बढ़ता है. इस वात को कम करने के लिए क्या करना पड़ता है ? ऐसी चीज़ें नहीं खानी चाहिएं जिनसे वात बढे, इसलिए पत्ते वाली सब्जियां नहीं खानी चाहिएं !और उस समय पशु क्या खाते हैं ?

इंडियन : क्या ?

भारतीय : सब घास और पत्तियां ही तो खाते हैं. इस कारण उनका दूध भी वात को बढाता है ! इसलिए आयुर्वेद कहता है कि श्रावण के महीने में (जब शिवरात्रि होती है !!) दूध नहीं पीना चाहिए. इसलिए श्रावण मास में जब हर जगह शिव रात्रि पर दूध चढ़ता था तो लोग समझ जाया करते थे कि इस महीने मे दूध विष के सामान है, स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है, इस समय दूध पिएंगे तो वाइरल इन्फेक्शन से बरसात की बीमारियाँ फैलेंगी और वो दूध नहीं पिया करते थे ! इस तरह हर जगह शिव रात्रि मनाने से पूरा देश वाइरल की बीमारियों से बच जाता था ! समझे कुछ ?
इंडियन : omgggggg !!!! यार फिर तो हर गाँव हर शहर मे शिव रात्रि मनानी चाहिए, इसको तो राष्ट्रीय पर्व घोषित होना चाहिए !

भारतीय : हम्म….लेकिन ऐसा नहीं होगा भाई कुछ लोग साम्प्रदायिकता देखते हैं, विज्ञान नहीं ! और सुनो. बरसात में भी बहुत सारी चीज़ें होती हैं लेकिन हम उनको दीवाली के बाद अन्नकूट में कृष्ण भोग लगाने के बाद ही खाते थे (क्यूंकि तब वर्षा ऋतू समाप्त हो चुकी होती थी). एलोपैथ कहता है कि गाजर मे विटामिन ए होता है आयरन होता है लेकिन आयुर्वेद कहता है कि शिव रात्रि के बाद गाजर नहीं खाना चाहिए इस ऋतू में खाया गाजर पित्त को बढाता है ! तो बताओ अब तो मानोगे ना कि वो शिव रात्रि पर दूध चढाना समझदारी है ?

इंडियन : बिलकुल भाई, निःसंदेह ! ऋतुओं के खाद्य पदार्थों पर पड़ने वाले प्रभाव को ignore करना तो बेवकूफी होगी.

भारतीय : ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है ! ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते !
जिस संस्कृति की कोख से मैंने जन्म लिया है वो सनातन (=eternal) है, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें ! -

Thursday, 6 August 2015

अच्छा तो मैं भी नक्सली हूं.... लेकिन ऐसा नक्सली होने पर गर्व है...

कुछ दिन पहले अपने एक छोटे भाई प्रीतम दुबे के साथ राष्ट्रीय एकात्मता के विषय पर चर्चा हो रही थी, तो उसने किसी विषय पर बोला कि हमारे संविधान में ऐसा लिखा है...तो मेरे मुंह से अचानक निकला कि मैं संविधान को नहीं मानता। मेरे मुंह से संविधान के विषय में ऐसा पहली बार निकला था। उस रात मेरे लिए चिंतन का विषय यही था कि मेरे मुंह से संविधान को लेकर ऐसी बात क्यों निकली। इसका मतलब यह नहीं कि मैं हमेशा से संविधान का पूर्ण रूप से समर्थन करता था। मैं पहले भी संविधान का विरोध करता रहा हूं लेकिन वो विरोध इस लिए होता था क्यों कि मैनें संविधान की बहुत सी धाराओं  तथा कानूनों के विषय में विस्तार पूर्वक अध्ययन किया था। अंग्रेजों द्वारा बनाए गए उन कानूनों के पीछे के मूल उद्देश्यों को मैं समझता था इस नाते मैं संविधान का विरोध करता था लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा कि संविधान को पूर्ण रूप से नकारना उचित होगा।

उस दिन प्रीतम से बात करते हुए जब मेरे मुंह से निकला कि मैं संविधान को नहीं मानता तो मेरे स्वयं के वाक्य ने मुझे चिंतन की स्थिति में ले जाकर खड़ा कर दिया और ऐसा इस लिए हुआ क्यों कि ये विचार मेरे मूल विचार नहीं थे। ऐसा लगा कि किसी और के विचार मुझ पर हावी हो रहे हैं। फिर जब इस विषय पर सकारात्मक चिंतन किया तो समझ आया कि मैं इतना कमजोर नहीं कि किसी और के विचार मुझ पर हावी हो जाएं। ये वाक्य जो मेरे मुंह से निकला था उसे यह मानकर सत्य मान लिया कि ये ईश्वर की सोच है और मुझे चलाने वाले, मुझे जन्म देने वाले परमपिता परमेश्वर ने मेरे मन में ये विचार डाला।

आज ऑफिस में बैठे समय कुछ लिख रहा था तभी अचानक मेरी नजर बाबा सत्यनारायण मौर्य की एक कविता पर पड़ी। कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं...

भारत माँ के सब बेटे हैं, सबको माँ का प्यार मिले।
एक रहे कानून व्यवस्था, सबको सम अधिकार मिले॥
जाति भाषा पंथ भेद तो, रूप रंग खुशबू भाई
इन बातों को लेकर ना, इस धरती पर हथियार चले॥
समरस भावों से भारत माँ, पुत्रों तुम्हें निहारती।
वन्दे मातरम् गाकर लो, भारत माँ की आरती॥ 

इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे समझ आया कि सांस्कृतिक आधार पर हमें संविधान की नहीं अपितु सम विधान की आवश्यकता है। ऐसी व्यवस्था जो सभी के लिए समान हो अर्थात भेदभाव रहित व्यवस्था।

इस विषय पर एक अन्य मित्र से चर्चा हुई तो उन्होंने कहा कि नक्सली भी संविधान नहीं मानते तो तुममें और उनमें क्या अंतर है? यदि नक्सली इस विषय को लेकर नक्सली कहे जाते हैं तो मुझे भी नक्सली कहलाने में गर्व होगा।

मित्रों एक बार सोच कर देखिए कि जब ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया तो उसने ऐसा नहीं किया कि अमुख पेड़ से प्राप्त ऑक्सीजन का प्रयोग केवल महिलाएं करेंगी तथा अमुख पेड़ से पुरुष.... इस नदी से प्राप्त जल का प्रयोग केवल 14 वर्ष तक के बच्चे कर सकते हैं।लिखने को ऐसे बहुत से विषय हैं लेकिन इसे संकेत समझ कर एक बार आप भी चिंतन करें कि क्या हम स्वयं को भगवान से भी ऊपर समझने लगे हैं? जब ईश्वर ने कोई भेदभाव नहीं किया तो हम क्यों कर रहे हैं?

आज इसी प्रश्न के साथ......

वन्दे भारती

Wednesday, 5 August 2015

राम मंदिर कब बनेगा?


कल शाम कुछ वामपंथी मित्रों के साथ बैठा हुआ था, उन सभी के साथ चर्चा का विषय था मोदी सरकार का एक साल...जैसा कि वामपंथी परंपरा रही है कि जब उनके पास मूल तथ्य या तार्किक विषय नहीं रहता है तो वो विषय से चर्चा से भटका देते हैं। ऐसा ही कुछ कल भी हुआ, एक मित्र ने कहा कि तुम्हारे राम का मंदिर कब बनेगा?
उनके इस प्रश्न को सुनकर मैं समझ गया कि अब उनके पास कोई तर्क नहीं बचा है...लेकिन उनके प्रश्न ने मुझे ब्लॉग लिखने का एक विषय दे दिया..मैं इस ब्लॉग के माध्यम से राम मंदिर के विषय में अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूं।

प्रश्न था कि तुम्हारे राम का मंदिर कब बनेगा?
मेरे राम का मंदिर तो बना हुआ है, मेरे राम मेरे मन में बसते हैं और मेरे राम का मंदिर पूर्ण रूप से पूर्ण भव्यता के साथ बना हुआ है। जहां तक बात है अयोध्या के राम मंदिर की तो वो मेरे राम का नहीं हमारे राम का मंदिर है। राम जिस दिन मेरे तुम्हारे से हटकर अपने हो गए उसी दिन भव्य राम मंदिर का निर्माण हो जाएगा। दिस राम की मैं वन्दना करता हूं वो राष्ट्रदेव राम हैं। वो राष्ट्रदेव राम एक ऐसे चेतन तत्व हैं जो दुनिया के कण कण में समाए हुए हैं। राम मंदिर के भव्य निर्माण से पहले हमें यह समझना होगा कि राम कौन हैं, राम कोई और नहीं हम स्वयं हैं। जब हमारी आखों के सामने कुछ गलत हो रहा हो और हम उसके खिलाफ संघर्ष करें तो समझ लेना कि राम आ गए और जब हम उसका विरोध न करें तो समझ लेना हम पर रावण हावी हो रहा है।
जब हमारे यहां किसी बच्चे का जन्म होता है तो यही कहा जाता है कि राम को कौशल्या ने जन्म दिया है न कि ये कहा जाता है विश्व गौरव या फलाने ने जन्म लिया है। राम किसी उपन्यास के पात्र नहीं हैं, यदि वह किसी उपन्यास के पात्र होते तो यह नाम कब का मिट गया होता। राम राष्ट्र की संस्कृति के आधार हैं, और इसी लिए जब भारत में किसी का विवाह होता है तो महिलाएं जो गीत गाती हैं उसमें यही कहती हैं कि राम और सीता का विवाह हो रहा है।
हमारे यहां कहा भी गया है कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।




दृष्टि के बदलते ही सृष्टि बदल जाती है, क्योंकि दृष्टि का परिवर्तन मौलिक परिवर्तन है। अतः दृष्टि को बदलें सृष्टि को नहीं, दृष्टि का परिवर्तन संभव है, सृष्टि का नहीं। दृष्टि को बदला जा सकता है, सृष्टि को नहीं। हाँ, इतना जरूर है कि दृष्टि के परिवर्तन में सृष्टिभी बदल जाती है। इसलिए तो सम्यकदृष्टि की दृष्टि में सभी कुछ सत्य होता है और मिथ्या दृष्टि बुराइयों को देखता है। अच्छाइयाँ और बुराइयाँ हमारी दृष्टि पर आधारित हैं।
श्री राम के रूप को लेकर संटों में मटभेद हो सकते हैं कोई सगुण राम को मानता है तो कोई निर्गुण राम को, कोई प्रेम मार्गी है तो कोई अन्य किसी रूप में लेकिन सभी के राम का चरित्र एक जैसा ही है।
हमारे राम का मंदिर मुझे या नरेन्द्र मोदी को नहीं बनाना है वो मंदिर हमें बनाना पड़ेगा। 6 दिसंबर को जब हमारा स्वाभिमान जागा और ढ़ांचा गिराया गया तो एक प्रश्न उठा कि प्रेम की प्रतिमूर्ति श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए आन्दोलन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

इस बात का उत्तर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने बहुत पहले ही दे दिया था। उन्होंने कहा था कि
"शस्त्र नहीं हैं वहाँ.. शास्त्र सिर धुनते और रोते हैं,
ऋषियों को भी सिद्धि तभी मिलती है
जब पहरे पर स्वयं धनुर्धर राम खड़े होते हैं."
मेरे एक पूर्वज ने कहा था कि जो कायर होते हैं उनके देवता भी कायर होते हैं। इसी कारण राम मंदिर टूट गया। जब हमने कायरता धारण की तो बाबर ने हमारे राम का मंदिर तोड़ दिया तब श्री राम भी कुछ नहीं कर पाए और जब हमने कायरता का परित्याग किया तो ढ़ांचा गिर गया। हमने भक्ति योग को तो ध्यान में रखा लेकिन शक्ति का प्रयोग करना भूल गए।
घर में बैठकर राम की पूजा करने से धरती स्वर्ग नहीं बनेगी, धरती को स्वर्ग बनाने के लिए हमें राम के चरित्र को स्वयं में उतारना पड़ेगा। बिना शक्ति के भक्ति का कोई महत्व नहीं रहता।

कुछ लोग कहते हैं कि एक नहीं बनेगा तो क्या हो जाएगा, आज तक 3000 से अधिक मंदिरों को तोड़ कर मस्जिद का निर्माण किया गया लेकिन हम उन 3000 मंदिरों के लिए आंदोलन नहीं कर रहे। हमारी आस्था के आधार मंदिरों में 3 प्रमुख मंदिर आते हैं, एक- अयोध्या का राम मंदिर दूसरा काशी का बाबा विश्वनाथ का मंदिर तथा तीसरा मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि। और इन मंदिरों के लिए नियमित संघर्ष चल रहा है।

मित्रों मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि बाबरी ढ़ांचा गिराकर राष्ट्रवादियों ने मुस्लिमों का अपमान हुआ है। मैं उनसे मात्र एक प्रश्न पूछना चाहता हूं कि हम हजारों सालों से रावण का पुतला जलाते हैं तो उससे नाराज होकर क्या ब्राह्मणों ने कभी कहा कि इससे हमारा अपमान हो रहा है। इस देश का सच्चा मुस्लिम कभी स्वयं को बाबर की औलाद नहीं मान सकता।

राम मंदिर निर्माण के लिए एकजुट हों और सभी मुस्लिम भाइयों से निवेदन है कि राम मंदिर को किसी मजहब से न जोड़ें । राम सिर्फ हिन्दुओं के न होकर इस देश की अस्मिता के आधार हैं।

भगवान राम सिर्फ हिन्दुओं के आस्था के कारण ही भगवान नहीं हैं बल्कि वे अपने कर्मों की वजह से पूजे जाते हैं और, पुरुषोत्तम कहलाते हैं-

  • भगवान राम द्वारा सीता को यह वचन दिया जाना कि मैं अपने जीवन में सिर्फ एक ही विवाह करूँगा, और तुम मेरी एकमात्र पत्नी रहोगी यह दर्शाता है कि वे बहुविवाह के विरोधी थे जो कि उस समय बहुत ही आम बात थी ( आज भी हिन्दुओं में भगवान् राम की तरह एक विवाह की ही मान्यता है)। 
  • जंगल में निषादराज से गले मिलकर भगवान राम ने उंच-नीच की भावना पर कुठाराघात किया और हमें यह सन्देश दिया कि जाति अथवा धन आधारित विभेद नहीं होना चाहिए !, सबरी जो कि एक अछूत जाति से थी उसके हाथों के जूते बेर खा कर उन्होंने जाति या वर्ण व्यवस्था को कर्म  आधारित प्रमाणित कर दिया और हमें यह सन्देश दिया कि मोल व्यक्तियों और उसकी भावनाओं का होता है ना कि उसके कुल या जाति का !
  • जंगल में ही अहिल्या को शापमुक्त कर उन्होंने यह सन्देश दिया कि अनजाने में हुए गलती गलती नहीं कहलाती है और, बेहतर भविष्य के लिए उसे माफ़ कर देना ही उचित है !, बाली वध का सार यह है कि अगर आपका मित्र सही है तो किसी भी हालत में आपको आपके मित्र की सहायता करनी चाहिए और, येन-केन-प्रकारेण पृथ्वी पर से दुष्टों का संहार जरुरी है ताकि सज्जन चैन से जी सकें !, 
  • सीता जी के अपहरण के पश्चात् पहले समुद्र से विनय पूर्वक रास्ता मांगना फिर उस पर ब्रह्मास्त्र से प्रहार को उत्तेजित होना यह दर्शाता है कि शक्तिसंपन्न होने के बाद भी लोगों को अपनी मर्यादा नहीं भुलानी चाहिए.!, समुद्र को मात्र एक बाण से सुखा देने कि क्षमता होने के वाबजूद भी समुद्र पर राम सेतु का बनाना हमें यह सिखाता है कि अगर कम बन जाए तो बिना वजह शक्ति प्रदर्शन अनुचित है और, अपने से कमजोर को ताकत के बल पर अपना पसंदीदा काम करवाना सर्वथा अनुचित है !
  • रावण वध के पश्चात् लक्ष्मण को उसके पास शिक्षा ग्रहण करने को भेजना हमें सिखाता है कि ज्ञान जिस से भी मिले जरुर ग्रहण करना चाहिए और, मनुष्य ये कभी भी नहीं समझना चाहिए कि वो सम्पूर्ण है !, 
  • सीता की अग्नि परीक्षा पर भगवन राम कहते हैं कि ""आज ये सीता की अग्नि परीक्षा अंतिम अग्नि परीक्षा है और, दुनिया में फिर किसी नारी को ऐसी प्रताड़ना नहीं दी जाएगी, मनुष्य को अपनी अर्धागिनी पर विश्वास करना चाहिए क्योंकि माता सीता उतने वर्ष रावण जैसे व्यक्ति के पास रह कर भी पवित्र ही थी !, ठीक उसी प्रकार आधुनिक नारी को भी घर में अथवा बाहर अकेला छोड़ देने के बाद उसकी बातों और उसकी पवित्रता पर विश्वास करना चाहिए क्योंकि, नारी वो शक्ति है जो रावण जैसे नराधम के पार अकेली रह कर भी अपनी लाज की रक्षा करने में सक्षम है !, यदि अग्नि परीक्षा नहीं हुई होती तो नारी की सच्चाई संदिग्ध ही जाती और, वो विश्वास का मामला होता परन्तु अग्नि परीक्षा ने यह साबित कर दिया कि नारी पर शक करने का कोई कारण नहीं है खास कर जब वो आपकी अर्धांगिनी हो !
     
  • एक धोबी के कहने पर भगवान् राम द्वारा माता सीता का परित्याग भगवान राम का राजधर्म था जहाँ उन्होंने माता सीता का परित्याग कर यह सन्देश दिया कि राजा की अपनी कोई ख़ुशी अथवा गम नहीं होना चाहिए !, अगर राज्य का एक भी व्यक्ति भले ही वो एक धोबी जैसा निर्धन, निर्बल ही क्यों ना हो उसका मत भी महत्वपूर्ण है और, उसके राय भी महत्वपूर्ण हैं !, कोई भी काम सर्वसम्मति के करना चाहिए और, सर्वसम्मति बनाने के लिए अगर राजा को अपनी निजी खुशी को यदि बलिदान भी करना पड़े तो राजा को कर देना चाहिए क्योंकि राजा बनने के व्यक्ति खुद का या परिवार का नहीं रह जाता है बल्कि वो राज्य का हो जाता है ! प्रजा की ख़ुशी में ही राजा की ख़ुशी होनी चाहिए और, प्रजा के दुःख में ही राजा का भी दुःख निहित है ! 


भगवान राम के हर काम में हमारे लिए अहम् सन्देश है...! तो कहने का मूल तात्पर्य यह है कि राम के चरित्र को अपनाओ तभी राम राज्य आएगा और उस चरित्र को अपनाने के लिए राम मंदिर का भव्य निर्माण परम आवश्यक है वो भी प्रत्येक नागरिक के सहयोग से।

वन्दे मातरम

Friday, 31 July 2015

हां मैं पत्रकार हूं, और राष्ट्रवादी हिन्दू भी...

आज मेरे पास एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय का फोन आया, संभवतः उन्होंने मेरा मोबाइल नंबर फेसबुक से लिया होगा (उनकी बातों से अनुमान लगाया)। उन्होंने मुझसे पहला प्रश्न पूछा कि विश्व गौरव जी आपने अपना फेसबुक पेज कब बनाया था। मैनें उनसे कहा महोदय पहले अपना परिचय दीजिए..तब उन्होंने कहा कि वो एक निजी चैनल में वरिष्ठ पत्रकार हैं...इतना बताने के बाद उन्होंने फिर से अपना प्रश्न दोहरा दिया...उनके प्रश्न को सामान्य रूप से लेते हुए मैंने बताया कि 6 साल पहले बनाया था...मेरे जवाब देने के बाद वो बोले अच्छा अच्छा उस समय छात्र जीवन में रहे होंगे...मैंने कहा हां...तो उन्होंने कहा विश्व गौरव जी अब तो आप व्यावसायिक जीवन में आ चुके हैं फेसबुक पेज का नाम तो नहीं बदल सकता लेकिन फेसबुक प्रोफाइल से राष्ट्रवादी शब्द हटा दीजिए...उनके इतना कहते ही मुझे उनके पूरा विषय समझ आ गया दरअसल में उनके अन्दर मेरे पेज पर मेरे नाम के साथ राष्ट्रवादी हिन्दू देखकर सेक्लुरिज्म का कीड़ा जाग उठा था। 



मित्रों जब मैंने वो फेसबुक पेज बनाया था उस समय मेरी उम्र 18 साल थी लेकिन इस का मतलब ये नहीं मैंने राष्ट्रवादी हिन्दू शब्द का प्रयोग भावावेश में किया था। मैंने पूरे विवेक के साथ उस शब्द को अपने नाम के साथ जोड़ा था। मैंने उन पत्रकार महोदय से 1 घंटे तक बात की तब वो मेरे विषय से सहमत हुए। मुझे लगा कि ऐसे विषय पर ब्लाग लिखना चाहिए जिससे कि यदि कोई मुझे ऐसी राय दे तो मैं अपना समय व्यर्थ नष्ट न करते हुए अपने ब्लॉग का लिंक देकर अपना विषय स्पष्ट कर सकूं।

मित्रों मेरे लिए राष्ट्रवादी और हिन्दू दोनों शब्दों के मायने थोड़े अलग हैं... भारत के अतरिक्त किसी भी अन्य देश का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह देशभक्त नहीं हो सकता। राष्ट्रवाद की मूल परिकल्पना को समझने के लिए देश, राज्य तथा राष्ट्र की परिकल्पना को अलग अलग समझना आवश्यक है। 
देश एक भौगोलिक ईकाई है तथा राज्य देश का राजकीय अथवा शासकीय घटक है । देश मे एक अथवा एक से अधिक राज्य भी हो सकते है । जबकि राष्ट्र एक सांस्कृतिक ईकाई है , जिसके लिए मात्र भूमि ,लोगो ,एवं शासन पर्याप्त नहीं है अपितु सांस्कृतिक एकता की अनुभूति आवश्यक है । देश राष्ट्र के शरीर का एक भाग हो सकता है ,जबकि संस्कृति राष्ट्र की आत्मा है । राष्ट्र स्थिर व चिरंतर है जबकि राज्य अस्थिर हो सकता है अथवा बदल भी सकता है । 

अपने देश एवं उनकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , उसकी सुरक्षा एवं समृद्धि के प्रति जिसकी अव्यभिचारी एवं एकांतिक निष्ठा हो वही लोग राष्ट्रीय अथवा राष्ट्रवादी कहे जाते हैं। 

मैंने अभी लिखा कि भारत के अतरिक्त किसी भी अन्य देश का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता वो इस लिए क्योंकि किसी भी अन्य देश के पास उनकी स्थायी संस्कृति ही नहीं है। इस लिए वो अपनी भौगोलिक ईकाई के प्रति समर्पित तो हो सकते हैं लेकिन उनसे राष्ट्रवादी होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। मेरे लिए भौगोलिक संरक्षण से अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संरक्षण है, क्योंकि मुझे पता है कि परम पवित्र भारतवर्ष का आधार यहां की संमृद्ध संस्कृति है ।

ये विषय तो हो गया राष्ट्रवादी शब्द के मूल भाव का अब विषय आता है हिन्दू शब्द का....

हमारे पौराणिक ग्रन्थों में कहीं हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म का उल्लेख नहीं है।पुराणों में कर्इ कथाएं हैं, पर किसी कथा में हिन्दू धर्म की व्याख्या नहीं की गयी है। रामायण और महाभारत संसार के वहृततम और श्रेष्ठतम महाकाव्य है, जिनके महानायक राम और कृष्ण हैं, किन्तु इनकी महता देवताओं के रुप में नहीं की गयी हैं। इन्हें विष्णु का मनुष्य रुप में अवतार माना गया है। भग्वदगीता को धर्म का चश्मा उतार कर पढ़ने से इसमें छुपा हुआ गूढ आध्यात्मिक अर्थ समझ में आता है। भग्वद गीता धर्म, दर्शन और आध्यात्म का अनुपम ग्रन्थ है, जो हमारी राष्ट्रीय निधि  है। शताब्दियों पूर्व लिखा गया यह ग्रन्थ विश्व का पहला और अंतिम ऐसा ग्रन्थ हैं, जैसा न कभी लिखा गया था और न लिखा जायेगा। किन्तु गीता के किसी श्लोक में हिन्दू, हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व की व्याख्या नहीं की गयी है।

हिन्दू और हिन्दुत्व शब्द को सियासत मे लपेट कर जो व्याख्या की जा रही है, वह जानबूझ कर वातावरण को विषाक्त करने का प्रयास है। हमारा राष्ट्र भारत था, भारत है और भारत ही रहेगा। मुगलो ने इसे हिन्दुस्तान बनाया और अंग्रेजों ने इंड़िया। अंग्रेज इंड़िया में रहते थे, किन्तु अपने आपको ब्रिटिश कहते थे, किन्तु मुगल हिन्दुस्तानी कहते थे, क्योंकि हिन्दुस्तान को ही वे अपना मुल्क मानते थे। उन्हें हिन्दू शब्द से न तो घृणा थी और न ही इस विशेषण को अपनी पहचान के आगे लगाने से अपने आपको अपमानित महसूस करते थे। पाकिस्तान बनने के पहले सारे मुसलमान हिन्दुस्तानी मुसलमान कहलाते थे, किन्तु अब वे पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी कहलाते हैं। स्पष्ट है, हिन्दु धर्म नहीं, पहचान है, फिर इसे धर्म से क्यों जोड़ा जा रहा है ?

हमारी संस्कृति शांति और सहिष्णुता का पाठ पढाती है। हमने तलवार के बल पर नहीं, दिलों को जोड़ कर दुनिया जीती हैं । पूरी दक्षिण -पूर्वी ऐशिया में हज़ारों वर्षों से हमारी सांस्कृतिक विरासत आज भी अक्षुण्ण हैं। हमने हिंसा से नहीं, शांति के पाठ से संसार को बोद्धमय बनाया। कभी खून खराबे से दुनिया को जीतने की योजनाएं नहीं बनायी। इतिहास गवाह है कि जो तलवार ले कर दुनिया फतह करने निकले थे, वे मिट गये, किन्तु हमारी धर्म पताका विश्व में आज भी फहरा रही है।

सामान्य शब्दों में यदि समझें तो अटक से कटक तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति जो गाय, गंगा ,गीता और गायत्री का सम्मान करता है भले ही वह किसी भी पूजा पद्धति को मानता हो, हिन्दू है।जो व्यक्ति श्री राम की मूर्ति के सामने बैठकर पूजा करता हो किन्तु गायत्री के रहस्य को न जानता हो वह हिन्दू नहीं हो सकता और जो भले ही नमाज अदा करता हो लेकिन गंगा की पवित्रता को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हो वह हिन्दू है।

राष्ट्रवादी तथा हिन्दू शब्द की मूल परिकल्पना को यदि हमने समझकर स्वीकार कर लिया तो निश्चय ही हमारी 90 प्रतिशत समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

वन्दे भारती

Monday, 27 July 2015

एक मांग पीएम मोदी के नाम

ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के समय चलने वाले सिक्कों पर ॐ हुआ करता था क्योंकि उनको पता था कि भारत का आधार भारत की संस्कृति है तथा भारत की संस्कृति का आधार आध्यात्म है। कंपनी की सरकार ने अपनी महारानी की फोटो के भी सिक्के चलाए लेकिन श्री राम, हनुमान और गणेश जी से दूर नहीं हो पाए।


एक बार कल्पना करिए कि आज के समय में अगर सिक्कों पर भगवान् श्रीराम लक्ष्मण जानकी जी और हनुमान जी के चित्र हों तो देश में क्या होगा। देश की तथाकथित स्वतंत्रता के बाद हमने अपनी विरासत को गंवाया और तो और हमने देश की सत्ता उनके हाथों में दी जिनको इस देश की संस्कृति से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था।

कभी कभी लगता है ऐसी आज़ादी से तो अच्छा था कि हम गुलाम रहते लेकिन फिर सोचता हूं कि देश की ऐसी स्थिति के लिए मूल रूप से तो हम ही जिम्मेदार हैं, हम ही तो चुनते हैं सरकार.... हम ही तो चलाते हैं सिस्टम....

मात्र नेताओं को गाली देने से कुछ नहीं होगा..हमें बोलना पड़ेगा....हमें ये बताना पड़ेगा कि हम चाहते हैं कि देश फिर से विश्व गुरू बने...पिछले लोकसभा चुनाव में एक उम्मीद के साथ हम सभी ने देश की सत्ता का संचालन एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में दिया जो कहता था कि देश नहीं झुकने दिया जाएगा, इतनी जल्दी उसका विरोध करना  भी ठीक नहीं। लेकिन हमारा शांत बैठना भी तो ठीक नहीं है।

मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं कि 1000 रुपए के नोट पर महात्मा गांधी का चित्र रहता है, निश्चित रूप से देश हित में उनका भी योगदान रहा है...लेकिन मेरा मूल विषय यह है कि यदि 1000 रुपए के नोट पर महात्मा गांधी का चित्र हो सकता है तो 500 रुपए के नोट पर चन्द्रशेखर आजाद का , 100 रुपए के नोट पर भगत सिंह का, 50 रुपए के नोट पर रानी लक्ष्मीबाई का चित्र क्यों नहीं हो सकता। क्या देश की स्वतंत्रता में इनका कोई योगदान नहीं था? और यह प्रश्न मैं आज अपने इस ब्लॉग के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री महोदय से पूछना चाहता हूं। हो सकता है भगवान् श्रीराम को आप एक वर्ग विशेष का मानते हों, हो सकता है कि तथाकथित सांप्रदायिक सौहार्द के संरक्षण के लिए आप श्रीराम का चित्र सिक्कों पर न छपवा सकते हों लेकिन मैं इतना तो मानकर चल रहा हूं कि आप कांग्रेस सरकार की भांति हमारे शहीदों को आतंकवादी तो नहीं मानते होंगे.....

वन्दे भारती

Thursday, 13 December 2012

किससे सीखें विनम्रता: एक जवाब

वर्तमान समय में परिस्थियाँ कुछ ऐसी हैं कि यदि किसी को जरा सी ताकत मिल जाती है तो वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है। वह ये भूल जाता है कि यदि उसे ईश्वर ने अन्य से कुछ भी अतरिक्त दिया है तो निश्चित ही कुछ अच्छा करने के लिए दिया है। मुझे एक अंग्रेजी फ़िल्म का वाक्य याद आता है कि 'आपके पास आई प्रत्येक शक्ति कुछ जिम्मेदारियां भी साथ लाती है।' सत्ता,ताकत,पद,वैभव,पैसा,प्रतिष्ठा यदि मिल रही है तो इसका अर्थ ये है कि ईश्वर ने अपने हिस्से की कुछ जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए आपको चुना है। कुछ भी मिल जाए लेकिन हमें विनम्रता नहीं छोड़नी चाहिए। और मित्रों विनम्रता यदि सीखनी है तो विश्व के सर्वाधिक वीर व्यक्ति से सीखो।

 हमारे इतिहास में एक प्रसंग आता है जब लक्ष्मण जी मूर्क्षित हो जाते हैं तो श्री राम चंद्र जी हनुमान जी से संजीवनी बूटी लाने को कहते हैं। हनुमान जी उन्हें अपने सहयोगियों में सर्वाधिक शक्तिशाली लगे होंगे इसी नाते इतनी बड़ी जिम्मेदारी श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी को सौंपी। एक भाई अपने छोटे भाई के जीवन की रक्षा के लिए स्वयं से अधिक विश्वास किसी पर नहीं कर सकता तो एक बार सोच कर देखिए कि हनुमान पर कितना भरोसा रहा होगा श्री रामचन्द्र जी को।  आपको ज्ञात होगा कि लक्ष्मण जी को तभी बचाया जा सकता था जब संजीवनी बूटी सूर्योदय से पहले लाई जाए।उस समय के सबसे बड़े वीर हनुमान जी की विनम्रता देखिए। उस हनुमान की विनम्रता जिसने बचपन में सूर्य देव को अपने मुख में रख लिया था।
क्या विनती की हनुमान ने सूर्य देव से....


हे सूरज बस इतना याद रहे कि संकट एक सूरज वंश पे है,
लंका के नीच रावण द्वारा आघात दिनेश वंश पे है।
इसलिए छिपे रहना भगवन जब तक न जड़ी पहुंचा दूं मैं,
बस तभी प्रकट होना दिनकर जब संकट निशा मिटा दूं मैं।

मेरे आने से पहले यदि किरणों का चमत्कार होगा,
तो सूर्यवंश में सूर्य देव निश्चित ही अंधकार होगा।
आशा है स्वल्प प्रार्थना यह, सच्चे जी से स्वीकारोगे,
लक्ष्मण की क्षतिग्रस्त अवस्था को होकर करुणार्ध निहारोगे।



ये थी विनम्रता की पराकाष्ठा ऐसी विनम्रता आज प्रत्येक मनुष्य में होनी चाहिए...लेकिन हनुमान जी की प्रार्थना यहीं समाप्त नहीं हुई...इस विनम्र प्रार्थना के बाद सूर्य देव के समक्ष हनुमान बोलता है...वो हनुमान जिसने उन्हें अपने मुंह में बन्द कर लिया था।
कैसे देते हैं अपना परिचय वीर हनुमान...

अन्यथा क्षमा करना दिनकर, अंजनी तनय से पाला है,
बचपन से जान रहे हो तुम हनुमत कितना मतवाला है।
मुख में तुमको धर रखने का फिर वही क्रूर साधन होगा,
बंदी मोचन तब होगा,जब लक्ष्मण का दुःख भंजन होगा।

ये विनम्रता हमें अपने हनुमान से सीखने की आवश्यकता है। आपकी शक्ति की सार्थकता तभी है जब आप विनम्र रहें। और मित्रों सूर्य देव को धमकी देने के बाद यहीं पर बात समाप्त नहीं होती। फिर हनुमान कहते हैं ये तो राम का काम है। इसमें तो आपका सहयोग होना ही चाहिए और फिर वो उनसे अपने साथ आने को कहते हैं। क्या कहते हैं हनुमान...

हे मित्र देव इस याचक की याचना न अस्विकार करो
राघव के दिल की पीड़ा का  मिलकर अब संहार करो
उनके जीवन का तमस नहीं अब मुझसे देखा जाता है
मेरी इस अभिलाषा में बस एक दीप्ति निर्माण करो।

ये सब सामान्य बातें नहीं हैं। हमें आवश्यकता है कि हम हनुमान का अनुसरण करें। हनुमान की तरह ही कार्यपद्धति अपनाएं और राष्ट्रहित में एकजुट होकर कार्य करें।

वंदे भारती



इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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