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Friday, 4 November 2016

तुम जिसे 'शहीद' मान बैठे, वह तो 'कायर' था

‘शहीद’ शब्द से आप क्या समझते हैं? मेरे मुताबिक, अपने व्यक्तिगत लाभ तथा स्वार्थ को छोड़कर जो व्यक्ति समाज हित में अपने प्राण न्यौछावर कर दे वह शहीद होता है। मेरी इस परिभाषा के मुताबिक स्व. रामकिशन ने भी ‘वन रैंक वन पेंशन’ के मुद्दे पर अपनी जान दे दी। अपने अंतिम समय में कहे गए शब्दों में रामकिशन ने साफ कहा कि वह देश और सैनिकों के लिए यह कदम उठा रहा है। यानी कि उसकी जान समाज के लिए गई और इस आधार पर उसे शहीद मान लिया जाना चाहिए। लेकिन…

vishwa gaurav
मैं हमेशा कहता हूं कि इस ‘लेकिन’ का दायरा बहुत बड़ा होता है। क्या सच में रामकिशन को शहीद कहना उचित होगा? बिल्कुल नहीं क्योंकि रामकिशन ने आत्महत्या करके एक कायरतापूर्ण कदम उठाया है और एक कायर को शहीद का दर्जा देना कहीं से भी उचित नहीं है। रामकिशन के सहयोगियों और रिश्तेदारों का दावा है कि रामकिशन को जो पेंशन मिल रही थी वह 5000 रुपए कम थी। रामकिशन को डीएससी से रिटायर होने के बाद हर महीने 24,999 रुपये मिल रहे थे। जबकि ओआरओपी के तहत उन्हें 30 हजार रुपये मिलने चाहिए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैंक की गड़बड़ी के कारण रामकिशन को 5 हजार रुपये कम मिल रहे थे। अब सवाल यह उठता है कि क्या एक सैनिक की इच्छा शक्ति इतनी कमजोर हो सकती है कि वह मात्र 5000 रुपए के लिए आत्महत्या कर ले? अगर एक सैनिक की इच्छाशक्ति इतनी कमजोर हो सकती है तो मुझे लगता है कि हमें सेना में भर्ती किए जाने की प्रक्रिया पर चिंतन करने की जरूरत है। आत्महत्या जैसा कदम, चाहे किसी भी कारण से उठाया गया हो, ऐसा कदम उठाने वाले को मैं कायर मानता हूं, शहीद नहीं।

आज सुबह नाइट शिफ्ट के बाद जब ऑफिस से निकला तो एक महिला सहकर्मी से इस विषय पर कुछ देर चर्चा हुई। उन्होंने कहा, ‘अगर आत्महत्या करने के लिए रामकिशन जैसा कारण होना चाहिए तो हर दिन मेरे जीवन में इस तरह के 5 नए कारणों का ‘निर्माण’ हो जाता है लेकिन मैं तो आत्महत्या नहीं करती।’ क्या सच में सिर्फ 5000 रुपये कम मिलने की वजह से कोई व्यक्ति अपने भरे पूरे परिवार को छोड़कर आत्महत्या कर सकता है? अगर मैं अपने विवेक के आधार पर जवाब दूं तो जवाब ‘नहीं’ में ही मिलेगा।

रामकिशन कांग्रेस के कार्यकर्ता थे और कांग्रेस के समर्थन से चुनाव भी लड़ चुके थे। सभी का अपना विशिष्ट मत और विचार होता है, हम उसका सम्मान करते हैं और करना भी चाहिए लेकिन सवाल यह है कि 10 सालों तक जब कांग्रेस की सरकार रही तब ओआरओपी पर वह सामने क्यों नहीं आए? मोदी सरकार द्वारा ओआरओपी को लेकर उठाए गए एक सकारात्मक कदम के बावजूद एक पूर्व सैनिक का आत्महत्या कर लेना, क्या यह किसी बड़ी राजनीतिक साजिश की ओर इशारा नहीं करता?

नियमों के मुताबिक, किसी वर्तमान या पूर्व सैनिक के द्वारा आत्महत्या करने पर उसे शहीद का दर्जा नहीं दिया जाता है। और ना ही इस परिस्थिति में किसी तरह के अलाउंसेज का प्रावधान है। लेकिन लाशों पर राजनीति करने वाले लोग जबरन एक कायर को शहीद साबित करने में लगे हैं। मुझे दुख है कि एक पूर्व सैनिक को अपनी जान देनी पड़ी लेकिन साथ ही मेरे मन में जिज्ञासा भी है कि ऐसे कायरतापूर्ण कदम के पीछे मूल कारण क्या था, जिसकी वजह से रामकिशन ने इतना बड़ा कदम उठाया?

कुछ ऐसे सवाल, जिनके जवाब देश का आम नागरिक जानना चाहता है-
कहीं रामकिशन की आत्महत्या के पीछे कोई राजनीतिक चाल तो नहीं?
कहीं रामकिशन ने ‘सैनिक अधिकार’ के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिए कोई खेल तो नहीं खेला?
कहीं रामकिशन को आत्महत्या के लिए उकसाया तो नहीं गया?
कहीं यह पूरा ‘खेल’ सिर्फ केन्द्र सरकार को बदनाम करने की साजिश तो नहीं?

मुझे नहीं पता कि देश कभी इन सवालों के जवाब जान पाएगा या नहीं। लेकिन एक बात तो साफ है कि एक सैनिक को आगे करके यदि भारत के नेता राजनीति करेंगे तो उससे सिर्फ देश का ही नुकसान होगा। हो सकता है कि मुआवजे के नाम पर आम जनता के करोड़ों रुपए लुटाकर अरविंद केजरीवाल जैसे लोग अपना वोट बैंक मजबूत कर लें लेकिन यह मुआवजा इस तरह के कायरतापूर्ण कदमों को उठाने के लिए प्रोत्साहित करने में उत्प्रेरक का काम करेगा।

Thursday, 27 October 2016

जरा सोचिए! कैसी होगी शहीदों के घर की दिवाली

जगदीश सिंह, पठानकोट में तैनात एक सैनिक, के घर में शादी की तैयारियां चल रही थीं। एयरबेस पर आतंकी हमला हुआ और जगदीश सिंह शहीद हो गए।
गुरसेवक सिंह, पठानकोट में तैनात एक और जवान, की शादी का एक महीना बीता था। आतंकी हमला हुआ और जसप्रीत विधवा हो गईं।
दिवाकर, CRPF का जवान, नक्सलियों से मुठभेड़ में शहीद हो गए। शहादत के 21 दिन पहले ही शादी हुई थी।
लांस नायक आरके यादव की पत्नी गर्भवती थीं। उड़ी में आतंकी हमला हुआ और वह बिना अपने बच्चे का मुंह देखे ही शहीद हो गए।
अशोक सिंह उड़ी हमले में शहीद हो गए। 78 वर्षीय दृष्टिहीन पिता ने उठाई बेटे की अर्थी।

ऐसे हजारों नाम हैं, जिनके बारे में मुझे या आपको पता तक नहीं है। क्या आप कल्पना भी कर सकते हैं कि जब किसी बूढ़े पिता के सामने उसके 25 साल के जवान बेटे का शव रखा जाता होगा तो उस पर क्या बीतती होगी? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब एक मां अपने बेटे की शादी की तैयारियों में लगी होगी और उसी बीच उसके बेटे का शव उसके सामने आ जाता होगा, तो उसे कैसा लगता होगा? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिन हाथों की मेहंदी का रंग तक नहीं उतरा होगा, उन हाथों को अपने मंगलसूत्र को उतारना कैसा लगता होगा? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब एक बच्चा पैदा होने के बाद अपनी पूरी जिंदगी में पिता का प्यार नहीं पा पाता होगा, तो उसे कैसा लगता लगेगा?

नहीं…. यह सब कुछ हमारी कल्पना से परे है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि वे लोग सीमा पर, जंगलों में, पहाड़ों पर, 50 डिग्री की चिलचिलाती गर्मी में, रेगिस्तान में, -50 डिग्री की जमा देने वाली ठंड में क्यों खड़े रहते हैं? क्या इसलिए कि उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिलती? या इसलिए कि वे कुछ पैसे कमाकर अपना घर चला सकें? नहीं, वे इसलिए कठिनतम परिस्थितियों में संघर्ष करते रहते हैं ताकि हम आसानी से अपने त्योहारों को मना सकें। वे अपने बच्चों से दूर इसलिए रहते हैं ताकि हम अपने बच्चों के साथ खुशी से रह सकें। वे अपने परिवार से दूर इसलिए रहते हैं ताकि हम अपने परिवार के साथ रह सकें। ध्यान रहे, अगर सरहद पर फौज नहीं होगी तो हम मौज से त्योहार नहीं मना सकते।

जरा सोचिए, क्या सीमा पर तैनात एक जवान की मां की इच्छा नहीं होती होगी कि उसका बेटा दिवाली पर उसके साथ हो? क्या एक 7 साल की बच्ची यह नहीं चाहती होगी कि वह भी अपने दोस्तों की तरह ही होली पर, अपने पापा के साथ शॉपिंग करने जाए? एक महिला जिसने दूसरी बार करवा चौथ का व्रत रखा होगा, वह नहीं चाहती होगी कि पिछली बार की तरह उसे अपने पति की तस्वीर देखकर व्रत का परायण पड़े। सबके अपने अरमान होते हैं, सबकी अपनी कामनाएं होती हैं, लेकिन वे इन सबकी परवाह नहीं करते। वे परवाह करते हैं तो उनकी, जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं। वे परवाह करते हैं हमारी और आपकी। उनके लिए जन्म देने वाली माता की इच्छाओं से ज्यादा महत्व हमारी और आपकी खुशियां रखती हैं। और हम, क्या करते हैं उनके लिए? उनकी शहादत पर फेसबुक पर एक पोस्ट डाल देते हैं या फिर ट्विटर पर ट्वीट कर देते हैं। क्या हमारी इतनी ही जिम्मेदारी है? लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं।

vishva gaurav
दोस्तो, पिछले एक साल में हमारी भारत माता ने बहुत बेटे खोए। हम सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए कुछ नहीं कर सकते, तो क्या करें? दिवाली आने वाली है। सनातन परंपरा में माना जाता है कि दिवाली की रात दिया जलाकर अगर हम ईश्वर से कुछ मांगते हैं तो ईश्वर हमारी बात जल्दी सुनता है। कम से कम हम इतना तो कर ही सकते हैं कि दिवाली पर जब रात में पूजा करते समय अपने परिवार के सदस्यों की सलामती के लिए प्रार्थना करें, तो साथ में एक दिया जलाकर उनकी सलामती के लिए भी दुआ करें जो हमारे लिए अमावस की उस काली रात में सीमा पर तैनात हैं। कवियत्री जागृति त्रिपाठी लिखती हैं,
अरमानों को न्योछावर कर, जो सब कुछ पाकर खो  जाते हैं,
स्वार्थ भरी इस दुनिया में अमरत्वलीन हो जाते हैं।
जिन भारत के वीर सपूतों का, बस इतना सा ही नारा है,
है शान तिरंगा ये अपना, और राष्ट्र, जान से प्यारा है।
एक दीप जला दिवाली पर, करें शौर्य को निज प्रणाम,
और करें प्रार्थना रब से कि ना कोई सैनिक खोए जान।
मैं इस दिवाली भारतीय सेना के लिए दीया जलाकर सैनिकों की सलामती के लिए दुआ मागूंगा। क्या आप नहीं जलाएंगे इस दिवाली एक दीप भारतीय सेना के नाम?

Wednesday, 21 September 2016

आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता, तो उन्हें दफनाया क्यों जाता है?


'आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता', यह जुमला तो आपने लगभग हर एक राजनीतिक पार्टी के नेताओं के मुंह से सुना ही होगा। आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं कि मैं इसे जुमला इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वोटबैंक की राजनीति के चलते इसका प्रयोग किया जाता है। कोई भी दल मन से इस बात को मानता नहीं है कि आतंकवादियों का सच में कोई धर्म नहीं होता। मेरा एक छोटा सा सवाल है कि देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां 'कांग्रेस' और 'बीजेपी' दोनों ही अलग-अलग समय में सत्ता में रही हैं? यदि ये दोनों पार्टियां मानती हैं कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता तो फिर उन आतंकियों को इस्लामिक तरीके से दफनाया क्यों जाता है। इससे तो एक ही बात जाहिर होती है कि ये पार्टियां मानती हैं कि आतंकवादी, मुसलमान होते हैं, यानी देश को इस्लामिक आतंकवाद से खतरा है।

मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता, मैं मानता हूं कि देश सिर्फ हिंदुओं का नहीं है। भारत को 'भारत' बनाने की कोशिश मुसलमानों का सहयोग भी रहा है। भारत के गौरवशाली अतीत में अगर मैं महाराणा प्रताप को एक मजबूत स्तंभ मानता हूं तो मुझे उनके सेनापति हकीम खां सूर के शौर्य को अनदेखा करने का अधिकार बिलकुल भी नहीं है। मैं अगर भगत सिंह की शहादत को नमन करता हूं तो मुझे बिलकुल अधिकार नहीं है कि मैं अशफाक उल्ला खां की शहादत को अनदेखा कर दूं। मैं अगर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष को नमन करता हूं तो मुझे यह अधिकार बिलकुल नहीं है कि मैं लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व करने वाली बेगम हजरत महल की देशभक्ति को अनदेखा कर दूं। मैं अनदेशा नहीं कर सकता  85 साल के उस बूढ़े शेर, बहादुर शाह ज़फर को, जो अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था तो अंग्रेजों ने दो पंक्तियां लिखवाकर भेजीं कि,
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

तो बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर दो पंक्तियां जवाब के तौर पर लिखीं:
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्थान की।।

मैं मानता हूं कि इस देश को बनाने में जितना सहयोग हिंदुओं का है उतना ही  अन्य पूजा पद्धतियों में विश्वास रखने वाले लोगों का। और इसी के साथ मैं यह भी मानता हूं कि जो इंसानियत की हत्या करे, जो मासूमों का कत्ल करे, जिसकी मानवीयता शून्य के स्तर से भी नीचे पहुंच गई हो, वह किसी धर्म या मजहब का अनुपालक नहीं हो सकता, क्योंकि कोई भी मजहब यह नहीं कहता कि आतंक फैलाना या निर्दोषों की हत्या करना जायज अथवा धर्मसंगत है।

अब आते हैं मूल बात पर, यदि यह बात सभी मानते हैं कि आतंकियों का कोई धर्म या मजहब नहीं होता तो उनका इस्लामिक पद्धति से अंतिम संस्कार करके क्या हम दुनिया में एक मजहब विशेष की छवि खराब करने की कोशिश नहीं कर रहे? कल उड़ी (जम्मू कश्मीर) में आतंकवादी हमले को अंजाम देने वाले, 18 भारतीय सैनिकों की हत्या करने वाले आतंकियों की लाशों को सेना और पुलिस ने मिलकर दफना(इस्लामिक पद्धति से) दिया। ऐसा करने के पीछे तर्क दिया गया कि इस्लाम के मुताबिक, मौत के बाद शव को नहीं रखा जाना चाहिए। यदि सच में देश की सरकार यह मानती है कि आतंकियों का कोई मजहब नहीं होता तो इस तरह से अंतिम संस्कार करना पूरी तरह से अन्यायोचित है।

मैं भारत का दुर्भाग्य मानता हूं कि इस विषय के पक्ष में जो टीवी चैनल खड़ा होता है, उसके पत्रकार पर कश्मीर में पत्थर चलाए जाते हैं, उसकी ओवी वैन को तोड़ने की कोशिश की जाती है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि कांग्रेस के नेता कहते हैं कि देश में इस विषय को लेकर राष्ट्रीय स्तर की चर्चा होनी चाहिए। क्यों भाई, इसमें कैसी चर्चा-बहस, जिनका कोई धर्म नहीं उनका धार्मिक तरह से अंतिम संस्कार क्यों हो? जिसमें मानवीयता शून्य के स्तर तक पहुंच जाए, वह मानव कहलाने का अधिकारी नहीं और जब वह मानव कहलाने का अधिकारी नहीं है तो उसके लिए मानवाधिकार की बात क्यों हो?

आतंकियों को भ्रमित करते हुए बताया जाता है कि अगर वे तथाकथित जिहाद करेंगे तो मरने के बाद उन्हें जन्नत में 72 हूरें मिलेंगी। इस्लाम की मान्यता है कि दफनाए गए लोगों को कयामत के दिन अल्लाह जन्नत ले जाएगा। विश्वास मानिए अगर हमने आतंकियों के शव को कूड़े के ढेर के साथ जलाना शुरू कर दिया तो भ्रम में फंसकर आतंक का रास्ता अपनाने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी आ जाएगी। इसके अलावा एक भारतीय होने के नाते हम उन लोगों को अपने देश की 2 गज जमीन भी क्यों दें हमारे देश में निर्दोषों की हत्या हैं।

मानवाधिकार की बात सैनिकों के लिए होनी चाहिए, भले ही वह किसी भी देश के हों। युद्ध के दौरान यदि कोई पाकिस्तानी सैनिक यदि शहीद होता है तो उसके शव को ससम्मान पाकिस्तान को वापस किया जाए और यदि पाकिस्तान उस शव को वापस लेने से इनकार करे तो उसका सम्मान सहित मजहबी रीति-रिवाजों के मुताबिक अंतिम संस्कार किया जाए। क्योंकि उसकी मौत अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए हुई है ना कि किसी आधारहीन लालच के कारण।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...