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Saturday, 2 September 2017

मासूमों की हत्या, कैसे कहूं 'बकरीद मुबारक!'

क्या खुदा यह कहता है कि मासूम, निरीह और निर्दोष जानवरों की कुर्बानी के नाम पर हत्या करने से वह खुश होता है? अगर खुदा सच में ऐसा कहता है तो वह खुदा नहीं हो सकता। आखिर कोई ‘पिता’ अपने ‘बच्चों’ की हत्या पर खुश कैसे हो सकता है? मैं मानता हूं कि मानव, समाज और पर्यावरण हित में  इको फ्रेंडली होली होनी चाहिए, इको फ्रेंडली दीवाली होनी चाहिए, इको फ़्रेंडली गणपति होने चाहिए  लेकिन फिर इको फ्रेंडली बकरीद क्यों नहीं होनी चाहिए? इको फ्रेंडली बकरीद पर पिछले 2 दिनों से सोशल मीडिया और विभिन्न टीवी चैनलों पर चर्चा हो रही है। इस चर्चा में शामिल लगभग सभी मुस्लिम भाई (कुछ अपवादों को छोड़कर) अपने कुतर्कों के आधार पर निर्दोष जानवरों की कुर्बानी को मजहबी परंपरा करार देते हुए इस मामले से दूर रहने की सलाह देते नजर आ रहे हैं। लेकिन क्या दुनिया में मानवीयता से बड़ा कोई भी मजहब हो सकता है?

पढ़ें: Spirit of sacrifice and not only animals killing is real Qurbani

अल्लाह का नाम लेकर क्या एक निर्दयतापूर्ण कृत्य को जायज ठहराया जा सकता है?  कुतर्क चाहे कोई भी हो लेकिन इसे सही नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया में समाज और मानव हित को ध्यान में रखते हुए बहुत सी कुप्रथाओं को या तो बंद किया जा चुका है या फिर उन्हें बदल दिया गया है। नेपाल का गढ़िमाई त्योहार हो या हिंदुओं के ऐसे मंदिर जहां कभी बलि कुप्रथा अनिवार्य मानी जाती थी, उन पर पाबंदी लगा दी गई है। कहीं पशु बलि के स्थान पर श्रीफल (नारियल) काटा जाने लगा तो कहीं आटे का बना पशु। यदि कहीं आज भी पशु बलि प्रचलन में है तो उस पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। हिंदू मंदिरों में पशु-बलि की पाबंदी पर गौर करने वाली बात यह है कि इसके विरोध में कोई महामंडलेश्वर, कोई पुजारी, कोई शंकराचार्य या कोई ‘हिंदू’ नेता खड़ा नहीं हुआ। लेकिन कल कई टीवी चैनल्स पर देखा कि इमाम, मौलवी और मुस्लिम नेता बकरीद पर होने वाली ‘कुर्बानी’ को खुदा का आदेश बता रहे हैं। उनका तर्क है कि इसका विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि कुछ लोग इस योजना पर काम कर रहे हैं कि इस्लामी परंपराओं पर रोक लगाकर इस्लाम को खत्म कर दिया जाए। ऐसे लोगों से मेरा बस एक ही सवाल है कि जब भारत का प्रधानमंत्री (जो गर्व से कहता है कि मैं हिंदू हूं) अपने मन की बात कार्यक्रम में कहता है कि मिट्टी के गणपति बनाए जाएं तो क्या वह हिंदू विरोधी हो गया, क्या वह सनातन को समाप्त करना चहता है।

आखिर ‘कुर्बानी’ शब्द के सही मायने क्या हैं? मैंने जितनी शिक्षा ली है उसके मुताबिक तो ‘कुर्बानी’ का मतलब ‘त्याग’ होता है। एक निरीह जानवर को खरीदकर उसकी हत्या कर देना कैसा त्याग है, यह समझ से परे है। मेरी जानकारी के मुताबिक पैगम्बर मुहम्मद साहब ने प्रतीकों को न मानने की बात कही है। इसी आधार पर  तो इस्लाम में मूर्ती पूजा की मनाही है। मूर्ती तो ‘प्रतीक’ मात्र है, ईश्वर नहीं, तो इस ‘प्रतीकात्मक’ मान्यता को क्यों जारी रखा गया है?  क्या किसी जानवर की हत्या पर उसे दर्द नहीं होता? क्या यहां पर मानवीयता की बातें मात्र छलावा प्रतीत नहीं होतीं? इस मामले पर एक आधारहीन कुतर्क दिया जाता है कि बकरीद के दौरान कटने वाले बकरों को गर्दन की एक विशेष नस काटकर मारा जाता है, जिससे उस पशु की पहले दिमागी मौत हो जाती है फिर शारीरिक मौत होती है। कहा जाता है कि इस प्रक्रिया में उस पशु को बहुत कम कष्ट होता है। फिर तो फिलीस्तीन के आतंकवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं का तरीका भी मानवाधिकारवादी होता होगा। वे भी बंधकों को एक विशेष प्रकार से गला रेतकर मारते हैं। क्या गजब के कुतर्क हैं साहब....

होली आती है तो पानी बचाओ, पानी बचाओ की मुहिम शुरू हो जाती है... बहुत अच्छी बात है, जिस देश में लोग 20 रुपए प्रति लीटर की दर से पानी खरीदते हों, वहां ऐसी मुहिम होनी भी चाहिए लेकिन मांस उत्पादन में बर्बाद होने वाले लाखों लीटर पानी पर बात क्यों नहीं होती? एक किलो आलू के उत्पादन में 254 लीटर पानी लगता है, एक किलो आटे के उत्पादन में 1362 लीटर पानी लगता है लेकिन 1 किलो मांस के उत्पादन में 18 हजार लीटर पानी लगता है। दीवाली पर पटाखे जलाने से प्रदूषण फैलता है, उसे इको फ्रेंडली होना चाहिए लेकिन जब 31 दिसंबर की रात जब पटाखें जलाए जाते हैं तो उस पर कोई बात नहीं होगी।

हम एक ऐसे देश में रह रहें हैं जहां पशुओं के अधिकारों की बात करने वाली संस्था, पीपुल्स फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल (पेटा) के सदस्यों द्वारा बकरीद पर कुर्बानी न देने की अपील करने पर संस्था के सदस्यों को पीटा जाता है। कहा जाता है कि ऐसी मांग करने वाले लोग मुसलमानों की भावनाएं आहत करते हैं। कुर्बानी या बलि जैसी परंपराएं इंसानियत के नाम पर धब्बा है। हम खुद की उंगली में एक सुई भी चुभाएं तो दर्द होता है और बेजुबान और निरीह पशुओं को सिर्फ इसलिए क़त्ल कर दिया जाए कि वे खाने में बहुत स्वादिष्ट लगते हैं और हमारे शरीर को प्रोटीन आदि प्रदान करते हैं। ऐसे कुतर्कों के आधार पर जीव-हत्या को जायज ठहराने वाले लोगों को शर्म आनी चाहिए।

जिस प्रकार हमें दर्द होता है उसी प्रकार प्रत्येक जीव को भी दर्द होता है, सिर्फ अपनी जीभ के स्वाद के लिए, अल्लाह और मजहब के नाम पर किसी जीव को मारना कैसे जायज़ है? बलि और कुर्बानी जैसी कुप्रथाओं को यदि जारी ही रखना ही चाहते हैं तो अपने बच्चे की बलि दीजिए, अपने बच्चे को खुदा के लिए कुर्बान करिए। शायद तभी आपको उस दर्द का अहसास हो, जो इन बेजुबान, लाचार, निरीह और निर्दोष प्राणियों की हत्याओं के बाद उसकी मां को होता होगा। अपनी जिंदगी को जीने का जितना अधिकार खुदा या भगवान ने हम मनुष्यों को दिया है, उतना ही अधिकार धरती के अन्य जीवों को भी दिया है। अपने स्वार्थ के लिए अगर आप अन्य जीवों की हत्या करेंगे तो विश्वास मानिए आप खुदा और भगवान की तौहीन कर रहे हैं। और अगर यह तर्क दिया जाता है खुदा ने जानवरों को हमारे भोजन के लिए बनाया है तो एक बात तो साफ है कि आपके खुदा का कोई अस्तित्व नहीं है, क्योंकि खुदा कभी दोहरे चरित्र वाला नहीं हो सकता, खुदा कभी यह नहीं चाह सकता कि उसकी बनाई गई एक चीज, उसी के द्वारा बनाई गई दूसरी चीज की उसके नाम पर हत्या दे।

Thursday, 22 October 2015

संघ क्यों है और क्यों रहेगा?

दोस्तों, आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 साल का हो चुका है। 1925 में दशहरे के दिन, उस दिन की सार्थकता को प्रमाणित करते हुए डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। सांप्रदायिक,हिंदूवादी, फासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ अपने उद्देश्य से नहीं भटका। मैं इस लेख को इस लिए नहीं लिख रहा क्यों कि मैं एक स्वयंसेवक हूं अपितु अपने पत्रकारिता धर्म को निभाते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ देश के सामने उस संगठन के बारे में लिख रहा हूं जिसकी तुलना आईएसआईएस से करके आतंकवादी करार दिया जाता है।

दोस्तों, स्वतंत्रता के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नजर रखी। यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार। उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे। विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज्यादा राहत शिविर लगाए थे।

1962 में हुए युद्ध के समय सेना की मदद के लिए देशभर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी। संघ ने सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता भी की। जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए। निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- 'यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।'

आज जिस कश्मीर के लिए हम पाकिस्तान से वार्ता कर रहे हैं। वह कश्मीर कभी यह कहता था कि हम भारत के साथ नहीं आएंगे। कश्मीर के महाराजा हरिसिंह विलय का फैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार तो- हम क्या करें वाली मुद्रा में- मुंह बिचकाए बैठी थी। उस समय सरदार पटेल और संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर की इच्छा शक्ति के कारण कश्मीर का भारत में विलय हुआ।

1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया था। शास्त्रीजी ने कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था।

इतना ही नहीं दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे। गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा
आज़ाद हुआ।

भारत का काला अध्याय कहे जाने वाले 1975 से 1977 के बीच लगे आपातकाल के खिलाफ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताजा है। सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन चलाना शुरू किया। आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने संभाला। जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं।

1955 में बना भारतीय मजदूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मजदूर संगठन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था। कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मजदूर संघ ने ही शुरू किया था। आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मजदूर संगठन है। जहां बड़ी संख्या में जमींदार थे उस राजस्थान में खुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं। संघ के स्वयंसेवक शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने।

भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे संगठनों की स्थापना संघ के स्वयंसेवकों ने संघ से प्रेरित होकर ही की। विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है। केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं। संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं। अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज्यादा काम कर रहा है। लगभग 35 हजार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू और कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम और 19 हिंदू बच्चे हैं।

1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक- संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है। भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में संघ के स्वयंसेवकों ने संघ की विचारधारा का मूर्त रूप प्रस्तुत किया।

दोस्तों संघ एक संगठन है, जिसमें विभिन्न प्रकार के लोग जुड़े हैं। संभव है कि संघ के किसी स्वयंसेवक की व्यक्तिगत विचारधारा से आपकी सहमति ना हो लेकिन संघ की मूल विचारधारा से असहमति का विषय किसी के मन में नहीं आ सकता। सैकड़ों आरोपों के बावजूद यदि संघ आज खड़ा है तो उसका एकमात्र कारण है कि संघ ने कभी बांटने की कोशिश नहीं की। राष्ट्रीय एकात्मता के आधारभूत स्तंभ के रूप में संघ आज भी खड़ा है। मित्रों, जब तक संघ का मूल विचार संघ के स्वयंसेवकों के मन में स्थापित रहेगा तब तक संघ इस धरती पर रहेगा और जिस दिन संघ के स्वयंसेवक ने राजनीति में 'अनावश्यक' हस्तक्षेप शुरू कर दिया उस दिन संघ समाप्त हो जाएगा।

वंदे भारती

Tuesday, 18 August 2015

संघ की मूल अनुभूति...


राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ जिसे आर.एस.एस (R.S.S.) जाना जाता है ।मुझे नही लगता कि किसी को संघ की पहचान बताने की जरूरत है। आज यह कहना ही उचित होगा कि इसके आलोचक ही इसकी मुख्य पहचान है। जब आलोचक संघ की कटु आलोचना करते नज़र आते है तब तब संघ और मजबूत होता हुआ दिखाई पड़ता है। छद्म धर्मनिरपेक्षवादी लोगों को यही लगता है कि भारत उन्ही के भरोसे चल रहा होता है किन्‍तु जानकर भी पागलो की भांति हरकत करते है जैसे उन्‍हे पता ही न हो कि संघ की वास्‍तविक गतिविधि क्‍या है ?

संघ के बारे थोड़ा बताना चाहूँगा उन धर्मनिरपेक्ष बंदरो को जो अपने आकाओ के इसारे पर नाचने की हमेशा नाटक करते रहते है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्‍थापना सन् 27 सितंबर 1925 को विजय दशमी के दिन मोहिते के बाड़े नामक स्‍थान पर डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य डॉक्टर जी ने की थी। संघ के 5 स्‍वयंसेवको के साथ शुरू हुई विश्व की पहली शाखा आज 50 हजार से अधिक शाखाओ में बदल गई और ये 5 स्‍वयंसेवक आज करोड़ो स्‍वयंसेवको के रूप में हमारे समाने है। संघ की विचार धारा में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, राम जन्मभूमि, अखंड भारत, समान नागरिक संहिता जैसे विजय है जो देश की समरसता की ओर ले जाता है। कुछ लोग संघ की सोच को राष्ट्र विरोधी मानते है क्‍योकि उनका काम ही है यह मानना, नही मानेगे तो उनकी राजनीतिक गतिविधि खत्‍म हो जाती है।



राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की हमेशा अवधारणा रही है कि 'एक देश में दो दप्रधान, दो विधान, दो निशान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे' बात सही भी है। जब समूचे राष्ट्र और राष्ट्र के नागरिकों को एक सूत्र मे बाधा गया है तो धर्म के नाम पर कानून की बात समझ से परे हो जाती है, संघ द्वारा समान नागरिक संहिता की बात आते ही संघ को सामप्रदायिक होने की संज्ञा दी जाती है। अगर देश के समस्‍त नागरिको के लिये एक नियम की बात करना साम्प्रदायिकता है तो मेरी नज़र में इस साम्प्रदायिकता से बड़ी देशभक्ति और नही हो सकती है।



संघ ने हमेशा कई मोर्चो पर अपने आपको स्‍थापित किया है। राष्ट्रीय आपदा के समय संघ का स्यंवसेवक यह नहीं देखता‍ कि आपदा मे फंसा हुआ व्‍यक्ति किस पूजा पद्धति को मानने वाला है। आपदा के समय संघ केवल और केवल राष्ट्र धर्म का पालन करता है कि आपदा मे फसा हुआ अमुख भारत माता का बेटा है। गुजरात में आए भूकम्प और सुनामी जैसी घटनाओं के समय सबसे आगे अगर किसी ने निःस्वार्थ भाव से कार्य किया तो वह संघ का स्‍वयंसेवक था। संघ के प्रकल्पों ने देश को नई गति दी है। दीन दयाल शोध संस्थान ने गांवों को स्वावलंबी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। संघ के इस संस्‍थान ने अपनी योजना के अंतगत करीब 80 गांवों में यह लक्ष्य हासिल कर लिया और करीब 500 गांवों तक विस्‍तार किया जाना है। दीन दयाल शोध संस्थान के इस प्रकल्प में संघ के हजारों स्‍वयंसेवक बिना कोई वेतन लिए मिशन मानकर अपने अभियान मे लगे हैं। सम्‍पूर्ण राष्‍ट्र में संघ के विभिन्‍न अनुसांगिक संगठनों राष्ट्रीय सेविका समिति, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, भारतीय मजदूर संघ, हिंदू स्वयंसेवक संघ, हिन्दू विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, दुर्गा वाहिनी, सेवा भारती, भारतीय किसान संघ, बालगोकुलम, विद्या भारती, भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम सहित ऐसे संगठन कार्यरत है जो करीब 1 लाख प्रकल्‍पों को चला रहे है।



संघ की प्रार्थना भी भारत माता की शान को चार चाँद लगता है, संघ की प्रार्थना की एक एक लाईन राष्‍ट्र के प्रति अपनी सच्‍ची श्रद्धा प्रस्‍तुत करती है। संघ को गाली देने से संघ का कुछ बिगड़ने वाला नही है अप‍ितु गंदे लोगो की जुब़ान की गन्‍दगी ही परिलक्षित होती है।


इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...