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Saturday, 28 June 2025

वैदिक तथ्यों-तर्कों के आधार पर महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण थे?

 महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण थे? 

एक शब्द में इसका जवाब है- हां। इसपर ना किसी तरह का विवाद है, ना ही होना चाहिए। असल मुद्दा यह है कि क्या उनके ब्राह्मण होने के पीछे उनका किसी व्यक्ति विशेष के यहां जन्म लेना कारण है? जवाब है- नहीं। आज वैदिक तर्कों के साथ इसी पर बात करेंगे। जन्मजाति के अंहकार में डूबे कुछ लोगों को मेरा यह लेख पसंद नहीं आएगा। उसका कारण भी स्पष्ट है कि लोगों ने धर्म की, परंपराओं की, व्यवस्थाओं की, अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या कर ली है और उसे व्यावहारिक बना लिया है। 

एक और समस्या है। जिनकी सैकड़ों-हजारों पीढ़ियों ने अध्ययन करने और कराने का काम पूरी जिम्मादारी से किया, उन जन्म आधारित ब्राह्मणों ने दूसरों को दीक्षित करने की जिम्मेदारी तो छोड़िेए, खुद भी अध्ययन करना छोड़ दिया है। गूगल बाबा और वॉट्सऐप विश्वविद्यालय के क्रैश कोर्स में जो आधी-अधूरी जानकारी मिलती है, उसी को सत्य मान लेते हैं। तो आज ऐसे कुपढ़ ‘ब्राह्मणों’ पर भी बात करना बेहद जरूरी हो गया है। यह ब्लॉग लिखने की जरूरत क्यों महसूस हुई, वह भी जान लीजिए। 

दरअसल एक बालक ने सुप्रसिद्ध कवि और वक्ता डॉ. कुमार विश्वास जी के वक्तव्य को शेयर करते हुए कुछ लिखा, मेरी पत्नी को आपत्ति हुई तो उसने जवाब दिया। इसके बाद उस बालक ने मेरी पत्नी से कहा- ‘आप मुझे नहीं जानतीं भाभी जी, गौरव भैया से मेरे बारे में पूछिएगा।’ मेरी पत्नी ने जिज्ञासावश मुझसे पूछा तो मेरे ध्यान में नहीं आया कि वह कौन है। मेरी पत्नी ने नंबर पता करके दिया तो मैंने फोन किया। बातचीत में पता लगा कि कभी किसी विषय को लेकर बात हुई होगी तो वह मुझे जानता होगा। लेकिन जब उसने बताया कि उसने लिखा क्या था तो सामान्य तौर पर मैंने पूछा कि ’वेदव्यास’ तो उपाधि है, उनका असली नाम क्या था? जवाब था- नहीं पता। मैंने पूछा कि उनके पिता का नाम क्या था? जवाब था- मुझे यह सब नहीं पता लेकिन हमारे सप्तऋषि ब्राह्मण ही थे। मुझे बेहद दुःख हुआ कि सोशल मीडिया पर ब्राह्मणों की आवाज बुलंद करने वाला एक 25-26 साल का लड़का अपने खुद के इतिहास के बारे में शून्य है। उसे यह तक नहीं पता कि महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास सप्तऋषियों में तो सम्मिलित ही नहीं हैं। खैर, मुझे लगा कि संक्षेप में इस विषय पर बात करना बेहद जरूरी है।

 

पहले बात करते हैं महर्षि वाल्मीकि पर। महर्षि वाल्मीकि के जन्म को लेकर दो मान्यतायें प्रचलित हैं। एक वर्ग स्कन्द पुराण के आधार पर कहता है कि महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिये इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है। उपनिषद के विवरण के अनुसार ये भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे। एक बार ध्यान में बैठे हुए इनके शरीर को दीमकों ने अपना ढूह (बाँबी) बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब ये दीमक-ढूह से, जिसे वाल्मीकि कहते हैं, बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे। 

अब यदि स्कंद पुराण के आधार पर महर्षि वाल्मीकि के जन्म को प्रमाणिक मानें तो उसी पुराण में एक बात और भी कही गई है- 

'जन्मना जायते शूद्रः संस्कारवान् द्विज उच्यते ॥' (स्कन्द 6.239.31)

स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम् उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद जी को बताया गया है कि जन्म से (प्रत्येक) मनुष्य शूद्र, संस्कार से द्विज बनता है। माना जाता है कि उपनयन संस्कार के बाद व्यक्ति का दूसरा जन्म होता है। ‘उपनयन’ का अर्थ है, ‘पास या सन्निकट ले जाना।’ किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। वेदाध्ययन के लिए जब बालक गुरु के सन्निकट जाता है, तब वह पूर्ण रूप से परिवार का मोह त्यागकर सिर्फ शिक्षा के लिए, ज्ञान के लिए, ब्रह्म के लिए समर्पित होता है- तब वह ब्राह्मण बनता है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि जन्म से ‘ब्राह्मण’ कोई नहीं होता, वह ज्ञान-सिद्धि के आधार पर ब्राह्मण बनता है। यानि जन्म किसी भी परिवार में हुआ हो, यदि कोई ब्रह्म के प्रति समर्पित है, ईश्वर के प्रति समर्पित है, ज्ञान के प्रति समर्पित है तो वह ब्राह्मण ही है। अब जन्म से रामनरेश यादव हो या शिवकुमार पासवान, यज्ञोपवीत संस्कार के बाद उसका उपनाम उसकी शिक्षा के आधार पर तय होता है। हमारी वैदिक परंपरा जो आज भी आपको संस्कृत शिक्षा में मिल जाएगी, उसमें शास्त्री जैसी उपाधियां शिक्षा के आधार मिलती हैं, जिन्हें उपनाम की तरह उपयोग में लाया जाता है। इसी उपनाम से पता लग जाता है कि सामने वाले व्यक्ति ने कितना अध्ययन किया है। वैदिक काल में ये उपाधियां थोड़ा विस्तृत थीं, जो कि ज्ञान और अध्ययन परंपरा के अनुसार दी जाती थीं। हालांकि ये सिर्फ ब्राह्मणों को ही मिलती थीं, और ब्राह्मण वही होता था जो अध्ययन करके फिर उसके विस्तार का दायित्व लेता था।


अब आते हैं महर्षि वाल्मीकि के जन्म को लेकर प्रचलित दूसरी मान्यता पर। उसके मुताबिक वाल्मीकि पहले ‘रत्नाकर’ नामक डाकू हुआ करते थे। यहां एक बात और बता दूं कि कुछ जगह पर जिक्र मिलता है कि वह डाकू बनने से पहले एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, लेकिन बाद में एक शिकारी जोड़े के साथ रहने लगे। कुछ जगहों पर यह भी जिक्र आता है कि वह एक भील राजा थे। हालांकि हम इस विवाद में ना जाते हुए मूल विषय पर ही रहेंगे। रत्नाकर नामक डाकू लोगों पर हमला करके जबरन उनसे उनकी संपत्ति छीनने का काम करता था। ऐसा करते काफी समय हो गया, इसी बीच एक दिन अचानक नारद मुनि उसके सामने आए। रत्नाकर ने उन्हें डराने की कोशिश की लेकिन नारदजी बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए। नारदजी ने उससे एक प्रश्न किया कि तुम यह दूसरों को लूटने का जो काम करते हो, वह किसके लिए करते हो। रत्नाकर ने जवाब दिया- अपने परिवार को सुविधाएं देने और उनका भरण पोषण करने के लिए। नारदजी का अगला सवाल था- 'तुम अपने परिवार को लोगों से धन लूटकर दे रहे हो, क्या जब इस कर्म का परिणाम आने पर भी वो परिवार तुम्हारा साथ देगा। क्या इस डकैती के कर्म में तुम्हारा परिवार तुम्हारा सहभागी है?'


रत्नाकर के मन में भी जिज्ञासा उठी और वह नारदजी को एक पेड़ से बांधकर अपने परिवार से सवाल करने गया। तब उसके परिजनों यानी पत्नी और पिता दोनों ने साफ इनकार कर दिया कि वह भले ही लूट के धन से सुख-सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं लेकिन डकैती के कर्म का फल रत्नाकर को अकेले ही भोगना होगा, वह इस काम में उसके सहभागी नहीं हो सकते। परिवार के जवाब से हताश-निराश रत्नाकर नारद के पास वापस लौटा। उसको अहसास हुआ कि वह व्यर्थ के कामों में जीवन नष्ट कर रहा है, और जिनके लिए कर रहा है वह भी उसके साथी नहीं। उसके अंदर बदलाव की चाह जगी और तब नारद मुनि ने डाकू रत्नाकर को ‘राम’ नाम के विषय में बताया। और फिर रत्नाकर ‘राम नाम’ में इतना रमे कि वाल्मीकि बन गए।

अब यहां प्रश्न यह है कि अगर वाल्मीकि का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में भी हुआ होता, तो भी क्या आप उन्हें पूजते? नहीं। आप उन्हें इसलिए ही पूजते हैं क्योंकि उन्होंने राम को समझा, उन्होंने ब्रह्म को समझा और हमें रामायण दी। यानी यहां भी कर्म ही प्रधान है। 


अब बात करते हैं महर्षि वेद व्यास की। हिन्दू शास्त्रों की मान्यता है कि प्रत्येक युग में स्वयं ईश्वर अवतार ग्रहण कर वेदों का युगानुरूप विस्तार करते हैं। एक गणना के अनुसार अब तक 28 व्यास हो चुके हैं। जिस मनवंतर में हम हैं, उसमें द्वापर युग में यह गौरव श्रीकृष्ण द्वैपायन को मिला। पुराणों के अनुसार वह व्यास ऋषि पराशर और सत्यवती के पुत्र थे। सत्यवती एक मछुवारे की पुत्री थीं। अब एक ब्राह्मण और मछुआरिन के बेटे को जन्म के आधार पर तो वर्णसंकर माना जाएगा, फिर उन्हें महर्षि क्यों कहा गया, वेदव्यास की उपाधि क्यों दी गई? अब आप कहेंगे कि वो तो पिता के आधार पर तय होता है। अच्छा? अगर ऐसा है तो फिर तो वर्णसंकर की अवधारणा को भी स्वीकार करते हुए उन्हें स्वीकृति ही नहीं मिलनी चाहिए। वैदिक परंपरा में तो वर्णसंकर की व्यवस्था तो स्वीकार ही नहीं थी। तो असल धारणा मैं आपको बताता हूं। 


दरअसल सनातन परंपरा में प्रत्येक व्यवस्था बेहद वैज्ञानिक और व्यवहारिक है। वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर तय होती थी। अपने वर्ण में विवाह की परंपरा को सही और दूसरे वर्ण में इसलिए उचित माना गया था, ताकि पति-पत्नी का कर्म एक ही रहे, जिससे परिवार में समन्वय बना रहे। यह तो हम आज भी महसूस करते हैं ना! पति और पत्नी एक ही पेशे में होते हैं तो व्यवस्था ठीक बनी रहती है।  

श्रीकृष्ण द्वैपायन ने वेद का प्रतिभाग करके श्रौतयज्ञ की आवश्यकता के अनुसार चार वेदों में सम्पादित किया, इसलिए वे ‘वेदव्यास’ कहलाते हैं। पुराणों के द्वारा वेद का उपबृंहण या व्याख्यात्मक विस्तार करने का कारण उन्हें व्यास कहा गया। वे 18 पुराणों और श्रीमद्‌भगवद्‌गीता के सहित महाभारत, ब्रह्मसूत्र (जो भारतीय दर्शन की वेदान्त धारा के सीमान्त प्रस्थानों का शाश्वत स्रोत है) और पतंजलि कृत सूत्रों पर व्यासभाष्य के भी प्रणेता माने जाते है। वेदों के परमार्थ को, जो उपनिषदों में प्रतिष्ठित है, सूत्रबद्ध कर ‘ब्रह्मसूत्र’ की रचना करके उन्होंने भारतीय दार्शनिक चिन्तन का आधार प्रस्तुत कर दिया, जिसकी शताब्दियों तक विभिन्न दार्शनिक प्रस्थान अपनी-अपनी तरह से व्याख्या करते रहे। ‘व्यास-स्मृति’ के प्रणेता के रूप में वे स्मृतिकार हैं। हमारे लिए वह पूज्यनीय हैं। 


महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण हैं, लेकिन इसका उनके जन्म से कोई लेना-देना नहीं है। ढेर सारे ऋषि-महर्षि हैं, जिनके जन्म पर बात ही नहीं होती, होनी भी नहीं चाहिए लेकिन हम उनके ज्ञान के कारण उन्हें पूजते हैं। एक और तर्क है। वर्तमान मनवंतर के सप्तऋषियों में प्रथम कश्यप ऋषि को समस्त देवताओं एवं मानवों का पूर्वज माना गया है। वह तो ऋषि यानी ब्राह्मण हैं, ऐसे में तो समस्त मानव जन्म से तो ब्राह्मण ही हुए। इसके आधार पर भी यह प्रमाणित होता है कि समस्त मनुष्य ब्राह्मण ही हुए। उन्हीं सप्तऋषियों में से एक महर्षि विश्वामित्र का जन्म तो क्षत्रिय कुल में हुआ था। जन्म के आधार पर यदि ब्राह्मण ही ऋषि अथवा महर्षि हो सकता तो विश्वामित्र महर्षि कैसे हुए? सोचिएगा।


ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वालों से अंत में एक ही बात कहूंगा। आपके पूर्वज ज्ञान परंपरा के आधार रहे हैं। आज के समय में हो सकता है कि आप कर्मकांड और अध्यापन ना कर पा रहे हों लेकिन कम से कम अध्ययन तो कर ही सकते हैं। पढ़ेंगे तभी मन में जिज्ञासा उठेगी, और फिर उस जिज्ञासा के समाधान के लिए और पढ़ेंगे। जन्म से मिले ‘ब्राह्मणत्व’ की रक्षा सोशल मीडिया पर कुतर्क करके नहीं होगी, ज्ञान से होगी। सोशल मीडिया के चक्कर में पड़ेंगे तो ब्राह्मणवंशी रावण को पूजना पड़ेगा और रावण को पूजने वाला रामभक्त हो ही नहीं सकता।


Saturday, 4 January 2025

मनुष्यता के हत्यारे संग इतनी सहानुभूति! ‘तैमूर’ प्रशंसकों की मति ‘लंग’ है

जाते साल के साथ देश के जाने माने कवि डॉ. कुमार विश्वास ने एक कवि सम्मेलन के दौरान एक ऐसा सवाल उठाया, जिससे सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया। कुमार विश्वास के परिवार को, उनकी बेटियों को, उन्हें, उनकी विचारधारा को, सबको टारगेट किया जाने लगा। मीम्स बनने लगे, गंदी और भद्दी बातें होने लगीं लेकिन इन सबके बीच असल मुद्दा तो कहीं दूर ही रह गया। असल मुद्दा वह था जो डॉ. कुमार विश्वास ने उठाया था।

क्या गलत कहा था कुमार विश्वास ने? यही तो कहा था- मायानगरी में बैठने वाले लोगों को समझना पड़ेगा कि देश क्या चाहता है। अब ये चलेगा नहीं कि लोकप्रियता हमसे लोगे, पैसा हम देंगे, टिकट हम खरीदेंगे, हीरो-हीरोइन हम बनाएंगे। फिर तुम्हारी तीसरी शादी से औलाद होगी तो उसका नाम तुम बाहर से आने वाले किसी आक्रमणकारी पर रखोगे। ये चलेगा नहीं, इतने नाम पड़े हैं यार, कुछ भी रख लेते तुम. रिजवान रख लेते, उस्मान रख लेते, यूनुस रख लेते, हुजूर के नाम पर कोई नाम रख लेते. तुम्हें एक ही नाम मिला। जिस बदतमीज, लंगड़े आदमी ने हिंदुस्तान में आकर हमारी मां-बहनों का रेप किया, आप लोगों को अपने बेटे का नाम रखने के लिए वो लफंगा ही मिला. अब अगर इसे हीरो बनाओगे तो इसे खलनायक तक नहीं बनने देंगे, ये याद रखना। ये नया भारत है।

क्या गलत था इसमें? क्यों इस बयान को ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे डॉ. कुमार विश्वास कट्टर हो गए हैं? क्यों इसे ऐसे पेश किया गया जैसे डॉ. कुमार विश्वास मुस्लिम विरोध की बात कर रहे हैं? क्या कुमार विश्वास ने यह कहा था कि उस बच्चे का नाम ‘राम स्वरूप’ या ‘शिवकुमार’ होना चाहिए था? उन्होंने तो यही कहा था कि भई, हुजूर के नाम पर रख लेते, उस्मान, यूनुस, रिजवान कुछ भी रख लेते। लेकिन उस बात पर बात ही नहीं की गई। 30 सेकेंड का वीडियो काटकर फिर से एक राष्ट्रवादी को मुस्लिम विरोधी दिखाने की कोशिश की गई। मजेदार बात यह है कि अपने खुद के इतिहास और अस्तित्व की हत्या करके बाहर से आई एक अवैज्ञानिक, असामाजिक, अनैतिक वैचारिकी के पोषक अपने बिलों से बाहर निकले और लग गए मानवता के एक हत्यारे के महिमामंडन में।  

एक पत्रकार के तौर पर, एक भारतीय पत्रकार के तौर पर मेरी मुखरतम आवाज इस विषय पर उठनी चाहिए कि एक शख्स जो दिल्ली को लूटने की नीयत से समरकंद से हिंदुकुश की पहाड़ियों के रास्ते देश में दाखिल हुआ, जिसने करीब एक लाख हिंदुओं को कटवा दिया, हमारे देश के नागरिकों को कटवा दिया, इंसानों को कटवा दिया, उस मनुष्यता के हत्यारे शख्स के नाम पर इस देश में छोड़िए, दुनिया में किसी भी चीज का नाम क्यों होना चाहिए?

दिल्ली में दाखिल होते ही जिसने अपने सैनिकों को खुली छूट दे दी कि जाओ और धन से लेकर महिलाओं की इज्जत तक की लूट करो, वह हमारा हीरो बनेगा? मोहम्मद क़ासिम फ़ेरिश्ता अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द राइज़ ऑफ़ मोहमडन पावर इन इंडिया में' तैमूर के सैनिकों के आतंक के बारे में लिखते हैं, "हिंदुओं ने जब देखा कि उनकी महिलाओं की बेइज़्ज़ती की जा रही है और उनके धन को लूटा जा रहा है तो उन्होंने दरवाज़ा बंद कर अपने ही घरों में आग लगा दी। यही नहीं वो अपनी पत्नियों और बच्चों की हत्या कर तैमूर के सैनिकों पर टूट पड़े।"

आपको शर्म नहीं आती कि किसी ने अपने बच्चे का नाम उस क्रूर आक्रांता के नाम पर रख लिया और आप खामोश बैठे रहे! तुम मुसलमान हो? तैमूर के सैनिकों ने एक मस्जिद पर हमला करके वहां पर शरण लिए एक-एक शख्स को मौत के घाट उतार दिया था। तैमूर के सैनिकों ने काटे हुए सिरों की मीनार खड़ी कर दी और कटे हुए शरीर के टुकडों को चील और कौवों को खाने के लिए छोड़ दिया। यह कत्लेआम लगातार तीन दिनों तक चला था। जिस शख्स ने तुम्हारे इबादतगाह तक की मर्यादा की हत्या कर दी, उसकी पवित्रता की हत्या कर दी, तुम उसका महिमामंडन करने में लगे हो!

सोचकर देखो, एक शख्स ने 15 दिन में इतनी तबाही मचा दी थी कि उससे उबरने में दिल्ली को 100 साल लग गए थे, और आप उस शख्स को लेकर यह कह रहे हैं कि वह दुनिया का सबसे ताकतवर शासक था! 

कुछ लोग हैं, जो कह रहे हैं कि नाम में क्या रखा है? अजब-गजब से तर्क दे रहे हैं कि किसी रमेश नामक शख्स ने किसी रमेश नामक शख्स का बलात्कार कर दिया हो तो क्या लोगों को ‘रमेश’ नाम से नफरत करनी चाहिए। अरे भई! इतनी समझदारी भरी बातें कर रहे हो तो हिंदू होकर रख लो अपने बेटे का नाम रावण, बेटी का नाम शूर्पणखा और मुस्लिम होकर रख लो अपने बेटे का नाम इब्लीस। नहीं रख पाओगे! क्योंकि तुम भी जानते हो कि नाम से बहुत कुछ होता है, तुम्हें बस एक अजेंडा सेट करना है। अजेंडा- जिसमें सनातन को, राष्ट्रवाद को पीछे खड़ा किया जा सके। लेकिन इस अजेंडे के साथ काम करने वाले नेता, अभिनेता, पत्रकार, एक्टिविस्ट याद रखें कि अब यह नहीं चलेगा। दरअसल इसे चलने नहीं दिया जाएगा। बात हिंदू-मुसलमान की ना कभी थी और ना कभी होगी, बात सिर्फ देश की है, बात इतिहास की है, बात सही और गलत के नजरिये की है।

Friday, 8 January 2016

आप का 'राग'- आशुतोष के साथ

आमिर खान के साथ भारत सरकार के 'अतुल्य भारत' अभियान का कॉन्ट्रैक्ट समाप्त होने के बाद जब हवा यह उड़ी कि अमिताभ बच्चन को इस अभियान का ब्रैंड ऐंबैसडर बनाया जा सकता है तो आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने ट्वीट कर अमिताभ बच्चन को राय दे डाली कि उन्हें भारत सरकार के इस अभियान से नहीं जुड़ना चाहिए क्योंकि आमिर को हटाना भारत सरकार का बदले की भावना से प्रेरित कदम है। इस ट्वीट से ऐसा लगा जैसे एक दिया(दीपक) सूर्य को रोशनी देने की बात कर रहा हो। उन्होंने राय दी, अच्छी बात है लेकिन क्या एक राजनीतिक पार्टी के नेता को इस तरह की बातें करने से पहले उसके प्रभाव या दुष्प्रभाव के विषय में नहीं सोचना चाहिए।

संभव है कि मंत्रालय का यह कदम आमिर के प्रति किसी तथाकथित बदले की भावना से प्रेरित हो और उसे बदल पाना किसी विपक्षी पार्टी के बस की बात भी नहीं है। इन सबमें न पड़ते हुए मैं 'आप' से मात्र इतना पूछना चाहता हूं कि मान लीजिए यदि अमिताभ बच्चन ने आपकी बात मानते हुए 'अतुल्य भारत' से ना जुड़ने का फैसला कर लिया तो क्या भारत सरकार के इस अभियान को कोई ब्रैंड ऐंबैसडर नहीं मिलेगा? निश्चित रूप से इस अभियान से जुड़ने के लिए बहुत से लोग तैयार खड़े हैं और मिल भी जाएंगे लेकिन सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ के जुड़ने से इस अभियान को जितना लाभ होगा उतना शायद किसी अन्य बॉलीवुड अभिनेता के जुड़ने से नहीं होगा। आमिर और अमिताभ के अलावा भी शाहरुख खान और सलमान खान जैसे कई विकल्प पर्यटन मंत्रालय से अनुबंधित एजेंसी के सामने खुले हैं लेकिन अमिताभ इस सूची में सबसे ऊपर हैं इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता।

आम आदमी पार्टी की ओर से इस तरह की राय दिए जाने का कारण मुझे समझ नहीं आया। हो सकता है कि आशुतोष की इस राय को उनकी पार्टी व्यक्तिगत कहने लगे लेकिन क्या आशुतोष जैसा व्यक्ति जो एक प्रतिष्ठित चैनल में पत्रकार रहा है, उससे इस प्रकार की अपेक्षा की जाती है। मैं व्यक्तिगत रूप से आम आदमी पार्टी का समर्थक नहीं हूं लेकिन उनके कुछ काम, उनकी कार्यपद्धति और स्पष्टवादिता बहुत पसंद है। देश में यह एकमात्र ऐसी राजनीतिक पार्टी है जिसके सभी बड़े नेता पढ़े-लिखे हैं और ऐसी राजनीतिक पार्टी से सामान्य व्यक्ति की कुछ अपेक्षाएं तो रहती हैं। आपकी लाख लड़ाइयां होंगी नरेन्द्र मोदी से, आपको लगता होगा कि पर्यटन मंत्रालय का निर्णय 'बदले की भावना' के चलते लिया गया है लेकिन क्या आपकी राजनीतिक रंजिशें राष्ट्र से भी बड़ी हो गईं, कल को आप पूरी दुनिया के सामने कहना शुरू कर दो कि भारत सरकार ने आमिर खान को हटाकर बदला लिया है इसलिए किसी को भारत घूमने नहीं आना चाहिए। इन सबसे हानि किसकी होगी, क्या आशुतोष ने इस बारे में सोचा?



आशुतोष जी, आप एक केन्द्र शासित प्रदेश की सरकार चलाने वाली पार्टी के नेता हैं। कल जब इस देश के पास बजट नहीं होगा तो आप कहेंगे कि केन्द्र सरकार आपकी मदद नहीं कर रही। महोदय, इस देश को 'आप' से बहुत उम्मीदें हैं, लोग इस बार एक नए तरह की राजनीति देखना चाहते हैं। पुरानी घिसी-पिटी बयानबाजी के आधार पर कहीं ऐसा ना हो कि आपको आम आदमी पार्टी का दिग्विजय सिंह घोषित कर दिया जाए।




इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...