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Saturday, 28 June 2025

वैदिक तथ्यों-तर्कों के आधार पर महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण थे?

 महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण थे? 

एक शब्द में इसका जवाब है- हां। इसपर ना किसी तरह का विवाद है, ना ही होना चाहिए। असल मुद्दा यह है कि क्या उनके ब्राह्मण होने के पीछे उनका किसी व्यक्ति विशेष के यहां जन्म लेना कारण है? जवाब है- नहीं। आज वैदिक तर्कों के साथ इसी पर बात करेंगे। जन्मजाति के अंहकार में डूबे कुछ लोगों को मेरा यह लेख पसंद नहीं आएगा। उसका कारण भी स्पष्ट है कि लोगों ने धर्म की, परंपराओं की, व्यवस्थाओं की, अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या कर ली है और उसे व्यावहारिक बना लिया है। 

एक और समस्या है। जिनकी सैकड़ों-हजारों पीढ़ियों ने अध्ययन करने और कराने का काम पूरी जिम्मादारी से किया, उन जन्म आधारित ब्राह्मणों ने दूसरों को दीक्षित करने की जिम्मेदारी तो छोड़िेए, खुद भी अध्ययन करना छोड़ दिया है। गूगल बाबा और वॉट्सऐप विश्वविद्यालय के क्रैश कोर्स में जो आधी-अधूरी जानकारी मिलती है, उसी को सत्य मान लेते हैं। तो आज ऐसे कुपढ़ ‘ब्राह्मणों’ पर भी बात करना बेहद जरूरी हो गया है। यह ब्लॉग लिखने की जरूरत क्यों महसूस हुई, वह भी जान लीजिए। 

दरअसल एक बालक ने सुप्रसिद्ध कवि और वक्ता डॉ. कुमार विश्वास जी के वक्तव्य को शेयर करते हुए कुछ लिखा, मेरी पत्नी को आपत्ति हुई तो उसने जवाब दिया। इसके बाद उस बालक ने मेरी पत्नी से कहा- ‘आप मुझे नहीं जानतीं भाभी जी, गौरव भैया से मेरे बारे में पूछिएगा।’ मेरी पत्नी ने जिज्ञासावश मुझसे पूछा तो मेरे ध्यान में नहीं आया कि वह कौन है। मेरी पत्नी ने नंबर पता करके दिया तो मैंने फोन किया। बातचीत में पता लगा कि कभी किसी विषय को लेकर बात हुई होगी तो वह मुझे जानता होगा। लेकिन जब उसने बताया कि उसने लिखा क्या था तो सामान्य तौर पर मैंने पूछा कि ’वेदव्यास’ तो उपाधि है, उनका असली नाम क्या था? जवाब था- नहीं पता। मैंने पूछा कि उनके पिता का नाम क्या था? जवाब था- मुझे यह सब नहीं पता लेकिन हमारे सप्तऋषि ब्राह्मण ही थे। मुझे बेहद दुःख हुआ कि सोशल मीडिया पर ब्राह्मणों की आवाज बुलंद करने वाला एक 25-26 साल का लड़का अपने खुद के इतिहास के बारे में शून्य है। उसे यह तक नहीं पता कि महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास सप्तऋषियों में तो सम्मिलित ही नहीं हैं। खैर, मुझे लगा कि संक्षेप में इस विषय पर बात करना बेहद जरूरी है।

 

पहले बात करते हैं महर्षि वाल्मीकि पर। महर्षि वाल्मीकि के जन्म को लेकर दो मान्यतायें प्रचलित हैं। एक वर्ग स्कन्द पुराण के आधार पर कहता है कि महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिये इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है। उपनिषद के विवरण के अनुसार ये भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे। एक बार ध्यान में बैठे हुए इनके शरीर को दीमकों ने अपना ढूह (बाँबी) बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब ये दीमक-ढूह से, जिसे वाल्मीकि कहते हैं, बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे। 

अब यदि स्कंद पुराण के आधार पर महर्षि वाल्मीकि के जन्म को प्रमाणिक मानें तो उसी पुराण में एक बात और भी कही गई है- 

'जन्मना जायते शूद्रः संस्कारवान् द्विज उच्यते ॥' (स्कन्द 6.239.31)

स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम् उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद जी को बताया गया है कि जन्म से (प्रत्येक) मनुष्य शूद्र, संस्कार से द्विज बनता है। माना जाता है कि उपनयन संस्कार के बाद व्यक्ति का दूसरा जन्म होता है। ‘उपनयन’ का अर्थ है, ‘पास या सन्निकट ले जाना।’ किसके पास? ब्रह्म (ईश्वर) और ज्ञान के पास ले जाना। वेदाध्ययन के लिए जब बालक गुरु के सन्निकट जाता है, तब वह पूर्ण रूप से परिवार का मोह त्यागकर सिर्फ शिक्षा के लिए, ज्ञान के लिए, ब्रह्म के लिए समर्पित होता है- तब वह ब्राह्मण बनता है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि जन्म से ‘ब्राह्मण’ कोई नहीं होता, वह ज्ञान-सिद्धि के आधार पर ब्राह्मण बनता है। यानि जन्म किसी भी परिवार में हुआ हो, यदि कोई ब्रह्म के प्रति समर्पित है, ईश्वर के प्रति समर्पित है, ज्ञान के प्रति समर्पित है तो वह ब्राह्मण ही है। अब जन्म से रामनरेश यादव हो या शिवकुमार पासवान, यज्ञोपवीत संस्कार के बाद उसका उपनाम उसकी शिक्षा के आधार पर तय होता है। हमारी वैदिक परंपरा जो आज भी आपको संस्कृत शिक्षा में मिल जाएगी, उसमें शास्त्री जैसी उपाधियां शिक्षा के आधार मिलती हैं, जिन्हें उपनाम की तरह उपयोग में लाया जाता है। इसी उपनाम से पता लग जाता है कि सामने वाले व्यक्ति ने कितना अध्ययन किया है। वैदिक काल में ये उपाधियां थोड़ा विस्तृत थीं, जो कि ज्ञान और अध्ययन परंपरा के अनुसार दी जाती थीं। हालांकि ये सिर्फ ब्राह्मणों को ही मिलती थीं, और ब्राह्मण वही होता था जो अध्ययन करके फिर उसके विस्तार का दायित्व लेता था।


अब आते हैं महर्षि वाल्मीकि के जन्म को लेकर प्रचलित दूसरी मान्यता पर। उसके मुताबिक वाल्मीकि पहले ‘रत्नाकर’ नामक डाकू हुआ करते थे। यहां एक बात और बता दूं कि कुछ जगह पर जिक्र मिलता है कि वह डाकू बनने से पहले एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, लेकिन बाद में एक शिकारी जोड़े के साथ रहने लगे। कुछ जगहों पर यह भी जिक्र आता है कि वह एक भील राजा थे। हालांकि हम इस विवाद में ना जाते हुए मूल विषय पर ही रहेंगे। रत्नाकर नामक डाकू लोगों पर हमला करके जबरन उनसे उनकी संपत्ति छीनने का काम करता था। ऐसा करते काफी समय हो गया, इसी बीच एक दिन अचानक नारद मुनि उसके सामने आए। रत्नाकर ने उन्हें डराने की कोशिश की लेकिन नारदजी बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए। नारदजी ने उससे एक प्रश्न किया कि तुम यह दूसरों को लूटने का जो काम करते हो, वह किसके लिए करते हो। रत्नाकर ने जवाब दिया- अपने परिवार को सुविधाएं देने और उनका भरण पोषण करने के लिए। नारदजी का अगला सवाल था- 'तुम अपने परिवार को लोगों से धन लूटकर दे रहे हो, क्या जब इस कर्म का परिणाम आने पर भी वो परिवार तुम्हारा साथ देगा। क्या इस डकैती के कर्म में तुम्हारा परिवार तुम्हारा सहभागी है?'


रत्नाकर के मन में भी जिज्ञासा उठी और वह नारदजी को एक पेड़ से बांधकर अपने परिवार से सवाल करने गया। तब उसके परिजनों यानी पत्नी और पिता दोनों ने साफ इनकार कर दिया कि वह भले ही लूट के धन से सुख-सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं लेकिन डकैती के कर्म का फल रत्नाकर को अकेले ही भोगना होगा, वह इस काम में उसके सहभागी नहीं हो सकते। परिवार के जवाब से हताश-निराश रत्नाकर नारद के पास वापस लौटा। उसको अहसास हुआ कि वह व्यर्थ के कामों में जीवन नष्ट कर रहा है, और जिनके लिए कर रहा है वह भी उसके साथी नहीं। उसके अंदर बदलाव की चाह जगी और तब नारद मुनि ने डाकू रत्नाकर को ‘राम’ नाम के विषय में बताया। और फिर रत्नाकर ‘राम नाम’ में इतना रमे कि वाल्मीकि बन गए।

अब यहां प्रश्न यह है कि अगर वाल्मीकि का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में भी हुआ होता, तो भी क्या आप उन्हें पूजते? नहीं। आप उन्हें इसलिए ही पूजते हैं क्योंकि उन्होंने राम को समझा, उन्होंने ब्रह्म को समझा और हमें रामायण दी। यानी यहां भी कर्म ही प्रधान है। 


अब बात करते हैं महर्षि वेद व्यास की। हिन्दू शास्त्रों की मान्यता है कि प्रत्येक युग में स्वयं ईश्वर अवतार ग्रहण कर वेदों का युगानुरूप विस्तार करते हैं। एक गणना के अनुसार अब तक 28 व्यास हो चुके हैं। जिस मनवंतर में हम हैं, उसमें द्वापर युग में यह गौरव श्रीकृष्ण द्वैपायन को मिला। पुराणों के अनुसार वह व्यास ऋषि पराशर और सत्यवती के पुत्र थे। सत्यवती एक मछुवारे की पुत्री थीं। अब एक ब्राह्मण और मछुआरिन के बेटे को जन्म के आधार पर तो वर्णसंकर माना जाएगा, फिर उन्हें महर्षि क्यों कहा गया, वेदव्यास की उपाधि क्यों दी गई? अब आप कहेंगे कि वो तो पिता के आधार पर तय होता है। अच्छा? अगर ऐसा है तो फिर तो वर्णसंकर की अवधारणा को भी स्वीकार करते हुए उन्हें स्वीकृति ही नहीं मिलनी चाहिए। वैदिक परंपरा में तो वर्णसंकर की व्यवस्था तो स्वीकार ही नहीं थी। तो असल धारणा मैं आपको बताता हूं। 


दरअसल सनातन परंपरा में प्रत्येक व्यवस्था बेहद वैज्ञानिक और व्यवहारिक है। वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर तय होती थी। अपने वर्ण में विवाह की परंपरा को सही और दूसरे वर्ण में इसलिए उचित माना गया था, ताकि पति-पत्नी का कर्म एक ही रहे, जिससे परिवार में समन्वय बना रहे। यह तो हम आज भी महसूस करते हैं ना! पति और पत्नी एक ही पेशे में होते हैं तो व्यवस्था ठीक बनी रहती है।  

श्रीकृष्ण द्वैपायन ने वेद का प्रतिभाग करके श्रौतयज्ञ की आवश्यकता के अनुसार चार वेदों में सम्पादित किया, इसलिए वे ‘वेदव्यास’ कहलाते हैं। पुराणों के द्वारा वेद का उपबृंहण या व्याख्यात्मक विस्तार करने का कारण उन्हें व्यास कहा गया। वे 18 पुराणों और श्रीमद्‌भगवद्‌गीता के सहित महाभारत, ब्रह्मसूत्र (जो भारतीय दर्शन की वेदान्त धारा के सीमान्त प्रस्थानों का शाश्वत स्रोत है) और पतंजलि कृत सूत्रों पर व्यासभाष्य के भी प्रणेता माने जाते है। वेदों के परमार्थ को, जो उपनिषदों में प्रतिष्ठित है, सूत्रबद्ध कर ‘ब्रह्मसूत्र’ की रचना करके उन्होंने भारतीय दार्शनिक चिन्तन का आधार प्रस्तुत कर दिया, जिसकी शताब्दियों तक विभिन्न दार्शनिक प्रस्थान अपनी-अपनी तरह से व्याख्या करते रहे। ‘व्यास-स्मृति’ के प्रणेता के रूप में वे स्मृतिकार हैं। हमारे लिए वह पूज्यनीय हैं। 


महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास ब्राह्मण हैं, लेकिन इसका उनके जन्म से कोई लेना-देना नहीं है। ढेर सारे ऋषि-महर्षि हैं, जिनके जन्म पर बात ही नहीं होती, होनी भी नहीं चाहिए लेकिन हम उनके ज्ञान के कारण उन्हें पूजते हैं। एक और तर्क है। वर्तमान मनवंतर के सप्तऋषियों में प्रथम कश्यप ऋषि को समस्त देवताओं एवं मानवों का पूर्वज माना गया है। वह तो ऋषि यानी ब्राह्मण हैं, ऐसे में तो समस्त मानव जन्म से तो ब्राह्मण ही हुए। इसके आधार पर भी यह प्रमाणित होता है कि समस्त मनुष्य ब्राह्मण ही हुए। उन्हीं सप्तऋषियों में से एक महर्षि विश्वामित्र का जन्म तो क्षत्रिय कुल में हुआ था। जन्म के आधार पर यदि ब्राह्मण ही ऋषि अथवा महर्षि हो सकता तो विश्वामित्र महर्षि कैसे हुए? सोचिएगा।


ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वालों से अंत में एक ही बात कहूंगा। आपके पूर्वज ज्ञान परंपरा के आधार रहे हैं। आज के समय में हो सकता है कि आप कर्मकांड और अध्यापन ना कर पा रहे हों लेकिन कम से कम अध्ययन तो कर ही सकते हैं। पढ़ेंगे तभी मन में जिज्ञासा उठेगी, और फिर उस जिज्ञासा के समाधान के लिए और पढ़ेंगे। जन्म से मिले ‘ब्राह्मणत्व’ की रक्षा सोशल मीडिया पर कुतर्क करके नहीं होगी, ज्ञान से होगी। सोशल मीडिया के चक्कर में पड़ेंगे तो ब्राह्मणवंशी रावण को पूजना पड़ेगा और रावण को पूजने वाला रामभक्त हो ही नहीं सकता।


Saturday, 4 January 2025

मनुष्यता के हत्यारे संग इतनी सहानुभूति! ‘तैमूर’ प्रशंसकों की मति ‘लंग’ है

जाते साल के साथ देश के जाने माने कवि डॉ. कुमार विश्वास ने एक कवि सम्मेलन के दौरान एक ऐसा सवाल उठाया, जिससे सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया। कुमार विश्वास के परिवार को, उनकी बेटियों को, उन्हें, उनकी विचारधारा को, सबको टारगेट किया जाने लगा। मीम्स बनने लगे, गंदी और भद्दी बातें होने लगीं लेकिन इन सबके बीच असल मुद्दा तो कहीं दूर ही रह गया। असल मुद्दा वह था जो डॉ. कुमार विश्वास ने उठाया था।

क्या गलत कहा था कुमार विश्वास ने? यही तो कहा था- मायानगरी में बैठने वाले लोगों को समझना पड़ेगा कि देश क्या चाहता है। अब ये चलेगा नहीं कि लोकप्रियता हमसे लोगे, पैसा हम देंगे, टिकट हम खरीदेंगे, हीरो-हीरोइन हम बनाएंगे। फिर तुम्हारी तीसरी शादी से औलाद होगी तो उसका नाम तुम बाहर से आने वाले किसी आक्रमणकारी पर रखोगे। ये चलेगा नहीं, इतने नाम पड़े हैं यार, कुछ भी रख लेते तुम. रिजवान रख लेते, उस्मान रख लेते, यूनुस रख लेते, हुजूर के नाम पर कोई नाम रख लेते. तुम्हें एक ही नाम मिला। जिस बदतमीज, लंगड़े आदमी ने हिंदुस्तान में आकर हमारी मां-बहनों का रेप किया, आप लोगों को अपने बेटे का नाम रखने के लिए वो लफंगा ही मिला. अब अगर इसे हीरो बनाओगे तो इसे खलनायक तक नहीं बनने देंगे, ये याद रखना। ये नया भारत है।

क्या गलत था इसमें? क्यों इस बयान को ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे डॉ. कुमार विश्वास कट्टर हो गए हैं? क्यों इसे ऐसे पेश किया गया जैसे डॉ. कुमार विश्वास मुस्लिम विरोध की बात कर रहे हैं? क्या कुमार विश्वास ने यह कहा था कि उस बच्चे का नाम ‘राम स्वरूप’ या ‘शिवकुमार’ होना चाहिए था? उन्होंने तो यही कहा था कि भई, हुजूर के नाम पर रख लेते, उस्मान, यूनुस, रिजवान कुछ भी रख लेते। लेकिन उस बात पर बात ही नहीं की गई। 30 सेकेंड का वीडियो काटकर फिर से एक राष्ट्रवादी को मुस्लिम विरोधी दिखाने की कोशिश की गई। मजेदार बात यह है कि अपने खुद के इतिहास और अस्तित्व की हत्या करके बाहर से आई एक अवैज्ञानिक, असामाजिक, अनैतिक वैचारिकी के पोषक अपने बिलों से बाहर निकले और लग गए मानवता के एक हत्यारे के महिमामंडन में।  

एक पत्रकार के तौर पर, एक भारतीय पत्रकार के तौर पर मेरी मुखरतम आवाज इस विषय पर उठनी चाहिए कि एक शख्स जो दिल्ली को लूटने की नीयत से समरकंद से हिंदुकुश की पहाड़ियों के रास्ते देश में दाखिल हुआ, जिसने करीब एक लाख हिंदुओं को कटवा दिया, हमारे देश के नागरिकों को कटवा दिया, इंसानों को कटवा दिया, उस मनुष्यता के हत्यारे शख्स के नाम पर इस देश में छोड़िए, दुनिया में किसी भी चीज का नाम क्यों होना चाहिए?

दिल्ली में दाखिल होते ही जिसने अपने सैनिकों को खुली छूट दे दी कि जाओ और धन से लेकर महिलाओं की इज्जत तक की लूट करो, वह हमारा हीरो बनेगा? मोहम्मद क़ासिम फ़ेरिश्ता अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द राइज़ ऑफ़ मोहमडन पावर इन इंडिया में' तैमूर के सैनिकों के आतंक के बारे में लिखते हैं, "हिंदुओं ने जब देखा कि उनकी महिलाओं की बेइज़्ज़ती की जा रही है और उनके धन को लूटा जा रहा है तो उन्होंने दरवाज़ा बंद कर अपने ही घरों में आग लगा दी। यही नहीं वो अपनी पत्नियों और बच्चों की हत्या कर तैमूर के सैनिकों पर टूट पड़े।"

आपको शर्म नहीं आती कि किसी ने अपने बच्चे का नाम उस क्रूर आक्रांता के नाम पर रख लिया और आप खामोश बैठे रहे! तुम मुसलमान हो? तैमूर के सैनिकों ने एक मस्जिद पर हमला करके वहां पर शरण लिए एक-एक शख्स को मौत के घाट उतार दिया था। तैमूर के सैनिकों ने काटे हुए सिरों की मीनार खड़ी कर दी और कटे हुए शरीर के टुकडों को चील और कौवों को खाने के लिए छोड़ दिया। यह कत्लेआम लगातार तीन दिनों तक चला था। जिस शख्स ने तुम्हारे इबादतगाह तक की मर्यादा की हत्या कर दी, उसकी पवित्रता की हत्या कर दी, तुम उसका महिमामंडन करने में लगे हो!

सोचकर देखो, एक शख्स ने 15 दिन में इतनी तबाही मचा दी थी कि उससे उबरने में दिल्ली को 100 साल लग गए थे, और आप उस शख्स को लेकर यह कह रहे हैं कि वह दुनिया का सबसे ताकतवर शासक था! 

कुछ लोग हैं, जो कह रहे हैं कि नाम में क्या रखा है? अजब-गजब से तर्क दे रहे हैं कि किसी रमेश नामक शख्स ने किसी रमेश नामक शख्स का बलात्कार कर दिया हो तो क्या लोगों को ‘रमेश’ नाम से नफरत करनी चाहिए। अरे भई! इतनी समझदारी भरी बातें कर रहे हो तो हिंदू होकर रख लो अपने बेटे का नाम रावण, बेटी का नाम शूर्पणखा और मुस्लिम होकर रख लो अपने बेटे का नाम इब्लीस। नहीं रख पाओगे! क्योंकि तुम भी जानते हो कि नाम से बहुत कुछ होता है, तुम्हें बस एक अजेंडा सेट करना है। अजेंडा- जिसमें सनातन को, राष्ट्रवाद को पीछे खड़ा किया जा सके। लेकिन इस अजेंडे के साथ काम करने वाले नेता, अभिनेता, पत्रकार, एक्टिविस्ट याद रखें कि अब यह नहीं चलेगा। दरअसल इसे चलने नहीं दिया जाएगा। बात हिंदू-मुसलमान की ना कभी थी और ना कभी होगी, बात सिर्फ देश की है, बात इतिहास की है, बात सही और गलत के नजरिये की है।

Wednesday, 28 August 2024

पहले पूतिन, फिर ज़ेलेंस्की से भी गले मिले PM मोदी, दो-गले से बात क्यों कर रहे वामपंथी?

पहले पूतिन, फिर ज़ेलेंस्की से भी गले मिले PM मोदी, दो-गले से बात क्यों कर रहे वामपंथी?

बहुत लंबे समय से किसी विषय पर चर्चा नहीं कर पाया। कई परिचितों के मैसेज आए कि कुछ लिख नहीं रहे, दरअसल एक, कुछ तो समय का अभाव था और दूसरा कोई ऐसा विषय नहीं मिल रहा था कि कुछ विमर्श किया जाए। हालांकि आज जिस विषय पर चर्चा करने वाला हूं, वह विषय तो सामान्य है, लेकिन कुछ बौद्धिकतावादी लोगों ने विषय को विशिष्ट बना दिया है। बीते दिनों फेसबुक पर एक पोस्ट देखी। यह पोस्ट थी, मेरे प्रथम पूर्णकालिक संपादक रहे नीरेन्द्र नागर जी की। उन्होंने लिखा था-


मोदी पूतिन के बाद अब ज़ेलेंस्की से भी गले मिल लिए। यानी बता दिया कि भारत आक्रांता के साथ भी हैं और आक्रांत के साथ भी। थप्पड़ मारने वाले के साथ भी और थप्पड़ खाने वाले के साथ भी।

अंग्रेज़ी में इसे कहते हैं - Running with the hare and hunting with the hounds. हिंदी में शालीन भाषा में कहें तो गंगा गए गंगाराम, जमुना गए जमुनादास। अशालीन भाषा में एक शब्द है जिसका मैं प्रयोग नहीं करना चाहता। आप ख़ुद ही समझ जाएँ।

वैसे मोदी के लिए यह कोई नई बात नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही है कि भाषणों में नारी सुरक्षा की दुहाई देना और ज़मीन पर आततायियों का साथ देना चाहे वह राम रहीम हो या गुजरात के संस्कारी।

मेरे पिता कहा करते थे कि कोई क्या 'कहता' है, यह उसकी असल पहचान नहीं होती। असल पहचान इससे होती है कि वह क्या 'करता' है।

और मोदी क्या 'करते' हैं, यह हम सब जानते हैं। भक्त भी।


एक तरफ वसुधैव कुटुंबकम् का जाप, दूसरी तरफ़ मेरे देश, मेरे लोगों का हित। अजीब दोगलापन है। इसी को मैं स्वार्थप्रेरित कायरता कहता हूँ।

राम-रावण युद्ध में भी दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क थे। तो क्यों राम का समर्थन करते हो? महाभारत युद्ध में भी कौरवों का अपना पक्ष था। फिर क्यों पांडवों का पक्ष लेते हो?


इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाया। दरअसल बात सिर्फ नीरेन्द्र नागर जी की नहीं है, कई अन्य लोग भी, विशेषकर वामपंथी, सोशल मीडिया पर ऐसी ही बातें कर रहे हैं, इसलिए विषय की गहराई में जाना बहुत जरूरी है। नरेन्द्र मोदी का विरोध अपनी जगह है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों का वैचारिक विरोध होता रहना चाहिए, लेकिन किसी भी व्यवस्था में यदि आप मुल्क को, मनुष्यता को किसी भी अन्य चीज से ऊपर रखते हैं तो मेरी इसपर आपत्ति है। रूस और यूक्रेन का क्या मामला है, कौन सही है, कौन गलत है, इस प्रश्न पर दोनों पक्षों की अपनी राय है औऱ यह दोनों देशों के बीच का मामला है, इसमें किसी तीसरे का हस्तक्षेप तब तक नहीं होना चाहिए, जबतक वह मामला आपको या आपके मुल्क के एक भी व्यक्ति को प्रभावित ना कर रहा हो। 


किसी एक पक्ष को आक्रांता कहना और किसी दूसरे पक्ष को आक्रांत कहना, निश्चित तौर पर दो देशों के बीच की निजता में हस्तक्षेप है। एक तीसरे मुल्क के नागरिक के तौर पर मेरे लिए तो गर्व का विषय यही है कि उन दो देशों के युद्ध के बीच जब भारत के बेटे-बेटियों को यूक्रेन से बाहर आना था तो मेरे देश के बच्चे जब तिरंगा लेकर निकले तो दोनों देशों की सेनाओं ने अपने हथियार नीचे किए और उन्हें रास्ता दिया। और सिर्फ इतना ही नहीं, मेरे मुल्क के बच्चों के साथ उस मुल्क के बच्चे भी तिरंगे की छत्रछाया में बाहर आ गए, जो हमारा सामाजिक दुश्मन किंतु पड़ोसी था। मेरे लिए तो यही गर्व का विषय है कि मेरे मुल्क की मनुष्यता ने मेरे सामाजिक दुश्मन देश के बच्चों को भी जिंदगी दी।


मैं विदेश नीति का पंडित नहीं हूं, लेकिन यदि दो दुश्मन देशों से हमारे अपने संबंध अच्छे हैं और हम उसके निजी मामलों में ‘मनुष्यता’ के नाम पर किसी एक का समर्थन ना करते हुए हिंसक कार्यपद्धति का सहारा न लेते हुए पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कह सकते हैं कि रास्ता शांति से ही निकलेगा, बातचीत से ही निकलेगा और दोनों में एक भी देश हमारी बात पर प्रतिउत्तर नहीं करता है तो हमें इसे अपनी विदेश नीति की विजय क्यों नहीं मानना चाहिए?

बाकी राजनीति हो या असल जीवन, कोई क्या 'कहता' है, यह उसकी असल पहचान नहीं होती। असल पहचान इससे होती है कि वह क्या 'करता' है। शून्यता के गर्त में पहुंच चुकी वैचारिकी को जीवित रखने के लिए ‘कुछ भी’ लिख देना और कह देना तो बहुत आसान होता है, लेकिन करना बहुत मुश्किल। किसी वाममार्गी से मिलिए, उसके लिए बहुत आसान होता है यह कहना कि ब्राह्मणों ने दलितों का खूब शोषण किया, उनकी जमीनें छीन लीं, मेरे दादा-परदादा ने भी ली थीं, लेकिन इस प्रश्न पर मौन हो जाते हैं कि जब आपको पता है कि आपके दादा-परदादा ने किसी दलित-शोषित की जमीन पर कब्जा किया था, छल से उसकी जमीन ले ली थी, तो आपको जानकारी मिलने के बाद आपने वापस क्यों नहीं की? तब आप कह देते हैं कि मुझे क्या पता कि 70-80 साल पहले वो जमीन किसकी थी। अरे नहीं पता है तो उस जमीन को किसी दलित-शोषित को दान कर दीजिए, लेकिन वो नहीं कर पाएंगे।
इस पूरी वाममार्गी वैचारिकी के लिए अशालीन भाषा में एक शब्द है जिसका मैं प्रयोग नहीं करना चाहता। पाठक ख़ुद ही समझ जाएँगे।

यह विषय कूटनीति का है, उसमें संस्कार और संस्कृति को लाने की आवश्यकता ही क्या है। लेकिन मेरे लिए प्रसन्नता का विषय यह है कि कम से कम अपना विषय तर्कयुक्त सिद्ध करने के लिए नीरेन्द्र नागर जी ने उन पात्रों का उदाहरण दिया, जो उनकी वैचारिकी के ऐतिहासिक कोश में अस्तित्वहीन थे। देने को तो वह शक्तिमान और तमराज किलविष का उदाहरण भी दे सकते थे, लेकिन नहीं, उन्होंने राम-रावण और पांडव-कौरवों का जिक्र किया। नीरेन्द्र नागर जी के प्रश्नों का उत्तर देने में मुझे बहुत खुशी होगी, क्योंकि श्रीराम मेरा प्रिय विषय हैं, लेकिन उससे पहले एक अन्य विषय को समझना भी बहुत जरूरी है। मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी हूं। मनोविज्ञान की दृष्टि से बताता हूं कि नीरेन्द्र नागर जी ने शक्तिमान-तमराज की जगह श्रीराम-श्रीकृष्ण का उदाहरण क्यों दिया। दरअसल 2014 की भाजपा की 282 सीटें, 2019 की 303 सीटें जीतना और फिर 2024 में 240 सीटों पर आना उनकी पराजय नहीं है, उनकी विजय तो इसी बात में है कि उन्होंने वामपंथ की Anti Theist वैचारिकी को 10-15 सालों में Anti Modi बना दिया है। यह बात आपको सामान्य लग सकती है, लेकिन मनोवैज्ञानिक नजरिये से देखेंगे तो पता लगेगा कि जिस वैचारिकी की स्वीकार्यता लंबे समय तक पूरी दुनिया में रही, उसे BJP ने खत्म नहीं किया, बल्कि उसे बदल दिया, और यह बहुत बड़ी बात है।


अब आते हैं नीरेन्द्र नागर जी के प्रश्न पर। हम कहते हैं वसुधैव कुटुंबकम्। इसे स्वीकार भी करते हैं लेकिन अगर समय/काल/परिस्थिति के अनुसार कोई अपने व्यवहार में बदलाव को लेकर उचित निर्णय नहीं लेगा तो वह समाप्त हो जाएगा। उदाहरण से समझिए- उपनिवेशवाद के विरोध के नाम पर खड़ी हुई वामपंथी वैचारिकी इसीलिए समाप्त हो गई क्योंकि उन्होंने समयानुरूप सामाजिक परिवेश के अनुसार आवश्यकता को स्वीकार नहीं किया। और जिन वामपंथियों ने स्वीकार किया, उन्होंने अलग-अलग संस्थानों में नौकरी की, वहां अपनी वैचारिकी को स्थापित करने का प्रयास किया, अब इसे आप ‘दोगलापन’ कहिए या स्वार्थप्रेरित वैचारिक आत्महत्या, आपकी समझ है। मेरे हिसाब से तो यह उचित था। कोई वामपंथी अगर किसी कॉर्पोरेट मीडिया संस्थान में संपादक बन जाए, उसका कार्यालय जंगलों को काटकर बसाई गई किसी फिल्म सिटी में हो और उस संस्थान में उपनिवेशवाद के समर्थन वाले विज्ञापन चलते रहें, और उसी से उसका वेतन आए तो इसे आपके तर्क के हिसाब से तो गलत कहा जाएगा। फिर तो आप भी समझ सकते हैं कि कौन कितना गलत है।


वसुधैव कुटुंबकम् की वैचारिकी हमारे अपने मन और शरीर से शुरू होती है, फिर वह ब्रह्मांड तक जाती है। पहले यह वैचारिकी हमें अपने शरीर रूपी कुटुंब में स्थापित करनी होगी कि शरीर का प्रत्येक अंग बराबर है, प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है। फिर इसे अपने परिवार, मोहल्ले, समाज और देश में स्थापित करना होगा। अभी हम अपने शरीर और मन में तो स्थापित कर नहीं पाए, बात करेंगे दुनिया की। गालियां इस बात पर देते हैं कि वर्ण व्यवस्था के एक वर्ग को पैरों से निकला हुआ क्यों दिखाया, अरे जब सारे अंग बराबर हैं तो पैर कौन सी खराब चीज हो गए?


राम-रावण युद्ध हो या कौरव-पांडव युद्ध, समय और परिस्थिति के हिसाब से हमारे इतिहास में फैसले लिए गए हैं। त्रेतायुग में बड़ा भाई दुनिया के सबसे बड़े सिंहासन को ठोकर मारकर एक वल्कल पहनकर 14 वर्षों के लिए वन को चला जाता है, तो उसका सौतेला भाई बड़े भाई की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राज्य का संचालन करता है। राम और रावण का इतिहास स्वीकार कर रहे हैं और उसका उदाहरण दे रहे हैं तो इसे भी स्वीकार करिए कि वह इतिहास था और भविष्य में इतिहास का मूल्यांकन होता है। उस काल में दोनों पक्षों के अपने तर्क थे, लोगों ने अपनी समझ के अनुसार एक पक्ष चुना, एक पक्ष हारा और दूसरा जीता। हजारों सालों के बाद जब इतिहास का मूल्यांकन हुआ तो श्रीराम और पांडवों का पक्ष न्यायोचित लगा तो हम उस पक्ष के समर्थन में रहते हैं। जिसे रावण या कौरव का पक्ष न्यायोचित लगता है, वह उसके समर्थन में रहते हैं। इसमें कौन सी गलत बात है?

त्रेतायुग में परिस्थितियां अलग थीं, इसलिए वहां कूटनीति भी कम थी। द्वापर में परिस्थितियां बदलीं, युद्ध की नीतियां बदलीं तो कूटनीति भी बदल गई। आज कलियुग में परिस्थितियां और अलग हैं तो कूटनीति भी अलग स्तर की होनी चाहिए, जो कि है भी।

पड़ोसी मुल्क पूर्वी पाकिस्तान में जब उसके अपने ही लोग अत्याचार कर रहे थे, और वहां से जब शरणार्थी बंगाल में आने लगे और उससे हमारे मुल्क का हित प्रभावित होने लगा तो भारत की शेेरनी इंदिरा गांधी ने उनकी औकात दिखा दी थी, आज चाहे यूक्रेन हो या इजरायल, अगर कोई मदद मांगे और दूसरा प्रेम से बात समझने को तैयार ना हो तो निश्चित ही सत्ताधीशों को वही करना चाहिए जो मैडम इंदिरा ने किया था। लेकिन, उस परिस्थिति में भी तो वामपंथी यही कहेंगे कि युद्ध गलत है? है ना?


Tuesday, 9 January 2024

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Thursday, 16 June 2022

'पत्थरवार' और 'अग्निवार' के जाहिल एक जैसे, कार्रवाई में भेदभाव क्यों कर रहीं 'रामराज्य' वाली राष्ट्रवादी सरकारें?

 10 जून 2022, दिन शुक्रवार

कुछ मुसलमान, किसी हिंदू की बयान से इस कदर नाराज हो गए कि जमकर तोड़फोड़ की, मंदिरों पर हमले किए, आम लोगों पर पत्थर चलाए, यहां तक की व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश में जुटे यानी संविधान बचाने का प्रयास कर रहे पुलिसवालों को पीटा। पुलिस अफसरों के रोते हुए चेहरे दिखे, आम लोगों की आंखों में भय दिखा, टूटे मंदिर दिखे, हमारी-आपकी यानी देश की संपत्ति का नुकसान दिखा। 


11 जून 2022, दिन शनिवार

लोगों को हिरासत में लिया गया, पुलिसवालों ने जमकर खातिरदारी की। हिंसा करने वालों की 'अवैध' संपत्तियों पर बुलडोजर चलने का आदेश हुआ। एक दिन पहले मेरे मन में जो गुस्सा था, वो अब दूर हो रहा था। मैंने सोशल मीडिया पर लिखा भी कि जो जिस भाषा में समझे, उसे उसी भाषा में समझाना चाहिए। यह लाइन गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में बोली थी। 


श्रीराम ने भी ऐसा ही किया था

मैं बिना शंका के इस बात को मानता हूं कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जीवन से आप काफी कुछ सीख सकते हैं। इतना ही नहीं, मैं यह भी मानता हूं कि अगर किसी राष्ट्र या 'State' को न्याय आधारित व्यवस्था बनानी है तो वह किसी किसी व्यक्ति द्वारा बनाए गए सिद्धांतों के संकलन को पुस्तक का रूप देने से नहीं आ सकती, वह रामराज्य से ही आ सकती है। मैं राष्ट्र में 'सम विधान' चाहता हूं, यानी ऐसी व्यवस्था जो सबके लिए समान हो। सिर्फ ऊपर से नहीं मन से, और यह व्यवस्था हमारी व्यवस्था का हिस्सा रही है:

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। 

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।


एक छोटा सा प्रसंग याद दिलाता हूं। मेरे राम, अपनी पत्नी को एक तत्कालीन आतंकी से आजादी दिलाने के लिए निकले, रास्ते में समुद्र पड़ा, तीन दिन तक समुद्र से राह देने की गुहार लगाई, बार-बार आग्रह करते रहे लेकिन समुद्र ने एक ना सुनी। तब श्रीराम समझ गए कि मामला ऐसे नहीं जमेगा, और फिर उन्होंने दूसरा तरीका अपनाया। इस प्रसंग को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ यूं लिखा है:


विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।


लक्ष्मण तीन दिन पहले से ही आग्रह के पक्ष में नहीं थे। वह जानते थे कि समुद्र को चंद क्षणों में सुखाया जा सकता है। लेकिन राम ने तीन दिनों का अवसर दिया, आग्रह किया और फिर जब समुद्र ने नहीं सुनी तो अपने महा-अग्निपुंज-शर का संधान किया, जिससे समुद्र के अन्दर ऐसी आग लग गई कि उसमें वास करने वाले जीव-जन्तु जलने लगे। इसके बाद समुद्र देव ने अपनी रक्षा के लिए याचना की। श्रीराम चाहते तो तीन दिन पहले भी वही कर सकते थे जो बाद में किया, लेकिन उन्हें पता था कि उससे समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं को पीड़ा होगी, इसलिए उन्होंने वह नहीं किया। लेकिन जब अंतिम विकल्प ही बचा तो व्यक्ति क्या ही करे।


10 जून की जहालत क्यों?

अब जरा इसे 10 जून की घटना से जोड़िए। नुपुर शर्मा ने कुछ कहा। कहां से पढ़ा, उसमें कितना सच है, किस बात के रिएक्शन में कहा, वह सब बाद की बात है, मैं मानता हूं कि हम सामने वाले से अलग इसीलिए हैं क्योंकि हमारी संस्कृति हमें इसकी अनुमति नहीं देती। मुझे लगता है कि नहीं कहना चाहिए था, संयम रखना चाहिए था, खासकर तब जब देश आपको देख रहा हो। लेकिन कहा! फिर? देर से ही सही, ऐक्शन हुआ। निजी तौर पर मुझे लगता है कि नहीं होना चाहिए था लेकिन हुआ। फिर एफआईआर हुई, निजी तौर पर मुझे लगता है कि यह ठीक था। मामला न्यायालय में जाएगा और सामने आएगा कि भई, नुपुर ने क्या और कहां से पढ़कर कहा। अब और क्या किया जा सकता था? न्यायालय आज के संविधान के मुताबिक सर्वोच्च व्यवस्था है ना? वहां मामला पहुंच गया, बात खत्म। लेकिन नहीं! इसके बाद 10 जून इतिहास बन गया।


व्यवस्था का आधार है पर्सेप्शन!

लोगों ने सोशल मीडिया पर नुपुर के समर्थन में बहुत कुछ लिखा लेकिन भाजपा के किसी आधिकारिक प्रवक्ता ने उसके बाद नुपुर के कृतित्व का समर्थन नहीं किया। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि देश जलाया जाए? खूब बवाल काटा गया। फिर पुलिस/प्रशासन/सरकार ने उन्हें सीख देने के लिए बल का प्रयोग किया। मैं मानता हूं कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह बिलकुल वैसा ही था, जैसे श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करते वक्त किया था। मुझे लगता है कि यह बिलकुल सही फैसला था। जो प्यार से/ समझाने से ना माने, उसे डराकर/धमकाकर ही रखना चाहिए। और वैसे भी किसी राज्य की व्यवस्था पर्सेप्शन पर ही चलती है। पर्सेप्शन ठीक रहना चाहिए। 


जरा सोचकर देखिए!

इस पूरी घटना को एक सप्ताह भी नहीं बीता कि केन्द्र की मोदी सरकार 'अग्निपथ योजना' ले आई। यह कितनी बेहतर है और इसमें क्या खामियां हैं, यह अलग विषय है। एक भारतीय नागरिक के तौर पर मुझे लगता है कि किसी सरकार को जनता के रोजगार को लेकर गंभीरता से काम करना चाहिए, उस लिहाज से मैं इसे सही मानता हूं। लेकिन एक राष्ट्रवादी के तौर पर मुझे लगता है कि नोटबंदी की तरह ही देश का प्रधान एक बार फिर से आत्मचेतना विहीन जनता पर एकबार फिर से जरूरत से अधिक भरोसा कर रहा है और यह देश के लिए घातक हो सकता है। खैर, इसपर फिर कभी बात कर लेंगे, अभी विषय है कि अगर सरकार के किसी फैसले से आप खुश नहीं हैं तो क्या करेंगे? आप विरोध दर्ज करा सकते हैं, आप उस योजना में हिस्सा नहीं ले सकते हैं, लेकिन आपने क्या किया? वही जहालत दिखाई जो 10 जून को 'मुसलमानों' ने दिखाई थी। 


10 जून और 16 जून वाले जाहिलों में अंतर क्यों?

अब मेरा सीधा सवाल सरकार से है। इस देश का हिस्सा बिहार भी है, राजस्थान भी, मध्य प्रदेश भी, उत्तर प्रदेश भी और अन्य राज्य भी। 10 जून को प्रदर्शन के नाम पर जो नंगापन दिखाया गया, क्या वह 16 जून 2022 को हुई जहालत से कम था? हां, बस इतना अंतर था कि वह मजहबी जहालत थी और यह राजनीति से प्रेरित जहालत। लेकिन ना मजहब बुरा है और ना ही राजनीति, गलत तो जहालत है ना? फिर जहालत करने वालों में भेदभाव क्यों? मैं राजस्थान, बिहार या किसी अन्य गैर भाजपा शासित राज्य से अपेक्षा नहीं करता, लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की सरकार चलाने वाली पार्टी तो राम राज्य की बात करती है ना? राम तो भेदभाव नहीं करते थे। श्रीराम ने तो अपने उस अनुज को भी व्यवस्था तोड़ने पर सजा दी थी, जिसने 14 साल तक निद्रा देवी को अपने पास तक नहीं फटकने दिया। फिर आप क्यों वैसी ही कार्रवाई नहीं करते? क्यों बुलडोजर वाली कार्रवाई 16 जून को जहालत करने वालों पर होने की बात नहीं कर रहे? वजह कोई भी हो, विद्वेष कैसा भी हो, लेकिन विश्वास मानिए यह रामराज्य नहीं है, यह न्याय नहीं है!

Monday, 20 September 2021

UP में सच दिखाने की सजा FIR क्यों है? CM योगी आदित्यनाथ के नाम एक पत्रकार का खुला पत्र

 प्रिय योगी आदित्यनाथ जी,
देश में बीते साल जब कोरोना का कहर शुरू हुआ तो सरकार ने बेहद संजीदगी से प्रवासी मजदूरों को मुफ्त में राशन पैकेट और भोजन पैकेट उपलब्ध कराने शुरू किए। फिर जब काम-धंधे रुक गए तो सरकार ने गरीबों को मुफ्त राशन देने की घोषणा कर दी। दुनिया में मुफ्त में राशन वितरण की यह सबसे बड़ी योजना थी। एक भारतीय के तौर पर मेरे लिए ये गर्व का विषय था कि अचानक आई महामारी को लेकर तमाम अव्यवस्थाओं के बीच सरकार कम से कम भूख मिटाने का इंतजाम कर रही है।

इस बीच अचानक पता लगा कि गरीबों के हक पर डाका जा रहा है। सरकारी राशन की दुकानों पर कोटेदार गरीबों के राशन में घटतौली कर रहे हैं। खबर हुई तो कुछ कोटेदारों पर ऐक्शन भी हो गया। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसका संज्ञान लिया। कई फोन आए, लोगों ने बधाइयां दीं, सुकून था कि प्रदेश के अंतिम व्यक्ति को मिलने वाले हक में थोड़ा योगदान मेरा और मेरे संस्थान का भी है।

पढ़ें: एनबीटी के 'ऑपरेशन भूख' का बड़ा असर: सीएम योगी बोले- कतई न होने पाए गरीबों के राशन में कटौती

फिर कोरोना की दूसरी लहर आई, फिर वैसी शिकायतें थीं, लोगों का कहना था कि हमें एकबार फिर से 'ऑपरेशन भूख' को रिएक्टिवेट करना चाहिए। हमने किया।

देखें वीडियो:
https://www.facebook.com/watch/?v=921599678683156


कोटेदारों ने खोली गोदाम की पोल
इसबार कोटेदारों ने साफ कहा कि उन्हें राशन गोदाम से ही कम मिलता है, बोरियों का वजन नहीं दिया जाता, अतिरिक्त वसूली भी होती है। अफसरों से बात की गई तो उन्होंने जांच कराने की बात कही। लेकिन कार्रवाई फिर से कोटेदारों पर हो गई और मामले को खत्म करा दिया गया। हमारे पास लगातार फोन आ रहे थे कि व्यवस्थाएं नहीं सुधरीं। अफसर छोटी मछलियों पर कार्रवाई करके खानापूर्ति कर देते हैं और बड़ी मछलियां आराम से भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगाती रहती हैं। खैर, हमारी टीम बुलाकी अड्डे के पास स्थित FCI के गोदाम पहुंची। यहीं से कोटेदारों को राशन दिया जाता है। वहां जाने से पहले हमने अपने कुछ कोटेदारों को फोन किया और पूछा कि क्या वे वहां आ सकते हैं। किसी ने समय मांगा तो किसी ने मना कर दिया। इसबीच अलका नाम की एक कोटेदार के रिश्तेदार रजनीश ने कहा कि वह आज राशन लेने जा रहे हैं। मैंने उनको गोदाम पर मिलने को कहा।

जब दबाव काम नहीं आया तो मैडम धमकाने लगीं
गोदाम पर मार्केटिंग इंस्पेक्टर शशि सिंह मौजूद नहीं थीं, एक कथित कर्मचारी जिसका नाम मोनू था, वो कोटेदारों को राशन दे रहा था। पहले तो हमने चुपचाप उसके काम और बातचीत की रिकॉर्डिंग की, फिर उसे अपना परिचय देने के बाद उसका परिचय पूछा। वो भड़क गया और कई लोगों से फोन कराकर दबाव डलवाने लगा। इसबीच उसने शशि सिंह से बात कराई, शशि सिंह ने मेरा परिचय पूछने के बाद फो न काट दिया। इसके बाद शशि सिंह ने अपने कई 'रिश्तेदार' पत्रकारों से फोन कराया, लेकिन मेरा साफ स्टैंड था कि मैं अपनी खबर के बीच में किसी को नहीं आने दूंगा।

कुछ देर के बाद शशि सिंह आईं और जब उनसे पूछा गया उनकी अनुपस्थिति में एक आउटसोर्सिंग वाला कर्मचारी कैसे बिना वेरिफिकेशन के राशन कैसे बांट सकता है तो वह भड़क गईं और एफआईआर की धमकी देने लगीं। बाद में विभिन्न धाराओं में मेरे साथ मेरे सहयोगी आशीष सुमित मिश्रा पर FIR हुई और मुख्य आरोपी रजनीश नामक शख्स को बनाया गया। इसकी वजह थी कि वह कैमरे पर वहां की व्यवस्थाओं को नंगा कर रहा था, सच बोल रहा था।

अब मैं कुछ टेक्निकल चीजें समझाता हूं।
1. उत्तर प्रदेश में एक कोटेदार को प्रति क्विंटल 70 रुपये मानदेय मिलता है, राशन बंटवाने के लिए।
2. डोर स्टेप डिलिवरी खत्म होने के बाद सरकार कोटेदारों को लगभग 18 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से अतरिक्त धन दे रही है, गोदाम से कोटे तक लाने के लिए।
यानी कोटेदार को कुल 70+18= 88 रुपये सरकार की ओर से मिलता है।
3. कोटेदार को राशन तौलवाने का पैसा गोदाम पर अलग से देना पड़ता है, उसे खुद गोदाम जाकर राशन लदवाना पड़ता है और इतनी महंगाई में वह कम से कम 35-40 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से राशन को अपने कोटे तक लेकर आता है। अब एक गणित समझिए:

मान लीजिए किसी कोटेदार के पास 200 क्विंटल राशन आ रहा है, इसका मतलब है कि उसे सरकार की ओर से 17,600 रुपये मिल रहा है।
इसके बाद उसके खर्च जोड़िए
गोदाम से कोटे तक राशन लाने का खर्च: 200x40= 8000
दुकान का किराया= 4000 (औसतन)
सहयोगी का खर्च= 8000 (औसतन)
बिजली का बिल= 1000 (औसतन)
स्टेशनरी (पेन, डायरी, बिल)= 1000 (औसतन)
अतिरिक्त खर्चे (राशन लेने जाना, उतरवाना)=1000
कुल= 23000 रुपये
यानी क्या कोटेदार 5400 रुपये अपनी जेब से भरेगा? नहीं वो भ्रष्टाचार करेगा। क्योंकि सिस्टम ऐसा बना हुआ है। और ये जो गणित मैंने समझाया है, ये हर अधिकारी को पता है, इसलिए कठोर कार्रवाई नहीं होती।

कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार
सबसे आसान तरीका ये है कि सरकारी राशन की दुकानों को सरकार सीधे तौर पर अपने अंडर में ले ले और वहां बाकायदा कर्मचारी तैनात करके राशन का वितरण कराए। ऐसे मामलों में जवाबदेही उस सरकारी कर्मचारी की तय होगी।
दूसरा रास्ता यह है कि दिल्ली, हरियाणा जैसे अन्य राज्यों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में कम से कम मानदेय इतना किया जाए कि इन कोटेदारों को गलत करने की जरूरत ना पड़े। फिर गोदाम से लेकर दुकान तक, कड़ाई से व्यवस्था का पालन कराया जाए।  

हो सकता है कि ये कोटेदारों के पक्ष की बात हो, लेकिन असल में ये बात सीधे तौर पर सूबे के गरीबों से जुड़ी हुई है। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान एक पेपर हुआ करता था 'मीडिया रिसर्च'। उसमें खबर के पीछे छिपी खबर निकालना बताया जाता था। मैं जो भी स्टोरी करता हूं, उसकी तह में जाकर पता करता हूं कि असल मसला फंस कहां रहा है। इस मामले में भी वही है। मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। बेहद संजीदगी के साथ अपना काम करता रहूंगा।

मामले में भले ही FIR हुई हो, लेकिन उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं अपना काम कर रहा हूं और व्यवस्था अपना काम करेगी। बस दो छोटे से सवाल हैं
1. एक बच्ची को लगातार अश्लील वीडियो कॉल आते हैं, 4 दिन तक पिता थाने के चक्कर लगाता रहता है, लेकिन एक FIR दर्ज नहीं करती।
दुकान से लूट हो जाती है, दुकानदार से मारपीट होती है, पुलिस कहती है कि 151 में मुकदमा कराना है तो कराओ, लूट का नहीं लिखेंगे। इसके बाद पीड़ित आपको पत्र लिखता है।
किसी के साथ राजधानी के बड़े चौराहे पर मोबाइल लूट होती है, लेकिन पुलिस 3 दिन तक FIR नहीं दर्ज करती।
इतनी संजीदा UP पुलिस कुछ ही घंटों में बिना एक बार भी मेरा पक्ष जाने FIR कैसे दर्ज कर लेती है। क्या इसलिए क्योंकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दबाने की कोशिश में सब हिस्सेदार हैं।

2. ये तेजी अच्छी है, FIR का मतलब होता है- First Information Report यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट। सूचना मिलते ही पुलिस का नैतिक दायित्व है कि FIR दर्ज करे, लेकिन हर मामले में ही ऐसा करे। बाकी मामलों में ऐसा क्यों नहीं होता?

एक राष्टवादी सरकार से मेरी अपेक्षा क्या थी?
FIR हो गई थी, कोई बात नहीं थी। लेकिन 3 दिन बीत जाने के बाद भी एक कामचोर अफसर कुर्सी पर बैठा है, मामले में उच्चस्तरीय जांच क्यों नहीं हुई? हम तो सरकार की मदद कर रहे हैं, बता रहे हैं कि किस तरह से व्यवस्था को खराब किया गया है, किस तरह से अफसरों ने गड़बड़ की है, सरकार को तो हमारा सहयोग करना चाहिए। और हम अपेक्षा भी यही करते हैं।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...