Tuesday, 11 October 2016

मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में हैं...

आज दशहरा है। भारत के साथ-साथ दुनिया भर में अनेक स्थानों पर रावण दहन किया जाता है। माना जाता है कि रावण दहन करके प्रतीकात्मक रूप से हम बुराई का दहन करते हैं और समाज को यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि सत्य परेशान हो सकता है, किंतु उसे पराजित नहीं किया जा सकता। 

हम रावण दहन करके यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि बुराई कितनी भी मजबूत हो, बुराई के साथ    कितनी भी बड़ी सेना हो, लेकिन उसका विनाश होना तय है।

आज इस प्रतीकात्मक पर्व के सुअवसर मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं। त्रेतायुग में एक रावण था, उसकी एक बड़ी सेना थी। जब रावण के पापों का घड़ा भरने लगा, तो एक राम ने अपना राज-काज छोड़कर जंगल जाने का निर्णय किया और रावण के संरक्षण में पलने वाले राक्षसों का संहार किया। पिता की आज्ञानुसार जब उन्होंने वनगमन किया और वन में उनकी पत्नी का रावण ने अपहरण कर लिया, तब वह चाहते तो अपने भाई और अयोध्या के राजा भरत से मदद लेकर अयोध्या से सेना मंगाकर रावण के साथ युद्ध कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? मेरे विवेक और अध्ययन के आधार पर शायद उनके स्वाभिमान ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। उन्होंने अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए किसी राजा की मदद नहीं ली बल्कि वनवासियों, वंचितों की मदद ली और उनके सहयोग से एक ऐसी सेना बनाई जिसने रावण की मायावी सेना के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया।

अब सवाल यह उठता है कि इतने हजार सालों से हम हर साल प्रतीकात्मक तौर पर बुराई का पुतला जलाते हैं। लेकिन इतने सालों में हम बुराई को समाप्त क्यों नहीं कर पाए? 

क्या हम इस आस में प्रतीक्षारत हैं कि फिर से इस धरती पर कोई राम जन्म लेगा, जो त्रेतायुग की भांति ही कलियुग में भी धरती से बुराई का सर्वनाश कर देगा। नहीं! आज ऐसा संभव नहीं है क्योंकि तब एक रावण था और आज इस धरती पर अरबों की संख्या में रावण हैं। उन अरबों रावणों का वध करने के लिए सिर्फ एक राम पर्याप्त नहीं होगा। अरबों रावणों का वध करने के लिए अरबों ‘राम’ चाहिए। अब आज के रावणों के सर्वनाश में हमारी भूमिका क्या है? क्या हम राम की सेना का अंग बनकर राम बनना चाहते हैं या फिर स्वयं राम बनकर रावण का वध करें?

विश्व गौरव
इस सवाल का उत्तर खोजने से पहले उन रावणों को खोजने की अनिवार्यता है। आज के रावण हैं कहां? चलिए आपको कुछ परिस्थितियां बताता हूं, उनके आधार पर आप स्वयं रावण को खोजने की कोशिश करिए। मेट्रो में एक लड़की खड़ी है, आपके साथ यात्रा कर रहा आपका मित्र ही आपसे कहता है, ‘देखो यार, क्या गजब का माल है’। आप सड़क पर जा रहे हैं और बगल से एक लड़की स्कूटी लेकर निकलती है, आपके सामने ही दो लड़के उस लड़की पर बेहद भद्दी टिप्पणी करते हैं, लेकिन आप चुपचाप बिना कुछ कहे वहां से चले जाते हैं। आप सड़क पर जा रहे हैं, रास्ते में एक ‘पागल’ लड़का एक लड़की को सरेशाम चाकुओं से गोद रहा है, लेकिन आप कुछ नहीं करते और वहीं खड़े होकर सबकुछ देखते रहते हैं। आप अपने माता-पिता को इसलिए वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं क्योंकि वे आपको ‘टोकते’ हैं। आप अपने बेटे को शादी के नाम पर बेचते हैं। 

आप कुछ जाति विशेष के लोगों को गौरक्षा के नाम पर पीटकर अपनी व्यक्तिगत कुंठा प्रदर्शित करते हैं। आप एक जाति विशेष के लोगों से शादी की खुशियां मनाने का अधिकार भी छीन लेते हैं। आप एक जाति विशेष के लोगों से ईश्वर की पूजा करने का अधिकार भी छीन लेते हैं। आप चंद आतंकियों के नाम के सहारे एक मजहब विशेष के लोगों को आतंकी मान लेते हैं। आप लड़कियों को स्कूल नहीं जाने देंगे। आप उन लड़कियों को उनके मन मुताबिक कपड़े नहीं पहनने देंगे। किसी लड़की को किसी लड़के के साथ घूमते देखकर आप उसके चरित्र की व्याख्या शुरू कर देंगे। आप राजनीतिक विरोध के नाम पर अनजाने में देश का विरोध शुरू कर देंगे।
अब आप खुद ही सोचिए कि रावण कहां है और क्या सच में अपने अंदर के रावण का ‘दहन’ न करके एक पुतले को जला देने भर से हमारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। 

यदि सच में  हम विजयादशमी पर्व की सार्थकता चाहते हैं तो अपने अंदर के रावण को समाप्त करके राम के चरित्र को स्वयं में उतारने का प्रयास करना होगा। राम तो वह हैं जो रावण से युद्ध करने को निकलते हैं, लेकिन एक राजकुमार होते हुए भी किसी राजा का साथ नहीं लेते। वह वंचितों को, वनवासियों को गले लगाते हुए उनसे एक नई सेना का निर्माण करते हैं। भारतीय मानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं, बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टतापूर्वक किया। अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा।

मुझे बहुत हैरानी होती है कि इस देश के ‘बुद्धिजीवी’ कहते हैं, ‘रावण में बहुत सी अच्छाइयां थीं, लेकिन बस एक गलती हो गई कि उसने सीता जी का अपहरण कर लिया। हम उसमें भी अच्छाई देखेंगे। उसमें ज्ञान था, उसने जो किया अपनी बहन के लिए किया, वह एक अच्छा भाई था, शिव भक्त था…और भी बहुत कुछ। इसलिए उन्हीं अच्छाइयों के आधार पर राम के साथ रावण ‘जी’ की भी मूर्ति होनी चाहिए। हम अच्छाई-बुराई का अंतर समाप्त कर देंगे। आप लोग पूजा करते हो, राम के साथ रावण की पूजा क्यों नहीं कर सकते?’ शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को जो बुराई के प्रतीक रावण में भी अपने आराध्य को खोजते हैं। रावण के चरित्र का चित्रण करने से पहले मैं बस एक ही निवेदन करूंगा कि कृपया यहां क्लिक करके रावण से जुड़े तथ्यों का विश्लेषण कर लें।

आज विजयादशमी के पर्व पर संकल्प लें कि स्वयं में बसने वाले राम को जागृत करके अपने ही मन पर कब्जा कर बैठे हुए रावण का विनाश करेंगे। साथ ही यदि हमारे सामने कोई रावण के चरित्र को आत्मसात करने का प्रयास कर रहा होगा, तो मूकदर्शक बनकर किसी और के ‘राम’ बनने की प्रतीक्षा नहीं करेंगे बल्कि स्वयं रावण का विनाश करने के लिए राम के चरित्र को आत्मसात करेंगे।

Monday, 10 October 2016

...इसलिए जरूरी है चीनी सामान का बहिष्कार

एक तर्क दिया जा रहा है कि चीनी सामानों का बहिष्कार इसलिए ना करें क्योंकि बहुत से लोगों ने बिजनस के लिए इनसे अपने गोदाम भर लिए हैं, उनको नुकसान हो जाएगा। बहुत अच्छी बात है, समाज के बारे में सोचना चाहिए। हमारी जिम्मेदारी है कि हम किसी भी पक्ष का समर्थन करते समय समाज के अंतिम व्यक्ति तक की सुरक्षा एवं लाभ के विषय में चिंतन करें। लेकिन…

विश्व गौरव
इस ‘लेकिन’ के मायने क्या हैं, इस बात पर चिंता करने की आवश्यकता है। समाज के अंतिम व्यक्ति तक के बारे में सोचना हमारी जिम्मेदारी है लेकिन उसके साथ-साथ एक जिम्मेदारी राष्ट्र के प्रति भी है, देश के प्रति भी है, उन लोगों के प्रति भी है जो बिना अपनी जान की परवाह किए इसलिए सरहद पर खड़े रहते हैं ताकि आप दीवाली की रात अपने घर में पटाखों के शोर के बीच हाथ में शराब का गिलास लेकर गरीबों पर ज्ञान बांट सकें, उन परिवारों के प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारी है जो हर दिवाली की रात बस एक ही दुआ मांगते हैं कि उनका बेटा सरहद पर खड़ा रहे।

आज देश में ऐसा माहौल बना है कि लोग कह रहे हैं कि कुछ महंगा सही लेकिन स्वदेशी सामान ही खरीदेंगे। इन परिस्थितियों में जब देश को स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता की सर्वाधिक आवश्यकता है, कुछ लोग कह रहे हैं कि जिन्होंने सामान खरीद कर गोदाम भर लिए हैं, उनका नुकसान हो जाएगा।

chineseबहुत स्पष्ट सी बात है कि हम सामान खरीदेंगे लेकिन वह किसी और से खरीदेंगे। अगर दिवाली पर चाइनीज लाइट्स की जगह मिट्टी के दीपक खरीदेंगे तो एक गरीब परिवार को आर्थिक लाभ भी होगा, उसकी भी दिवाली बन जाएगी और स्वदेशीकरण भी होगा। संभव है कि ऐसे में हमारे घर के पड़ोस में गुप्ता इलेक्ट्रिकल्स वालों का चाइनीज लाइट न बिकने के कारण कुछ नुकसान हो जाए लेकिन इस डर से क्या हम उन लोगों के बारे में भी ना सोचें जो धूप में बैठकर दिए बनाते हैं।

हमारा धन किसी जरूरतमंद के पास ही जा रहा है। और अगर कोई है जो सिर्फ यह चाहता है कि उसके घर में दिए नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक लाइट्स ही जलें, तो वह भारतीय इलेक्ट्रिक लाइट्स का उपयोग भी कर सकता है। ऐसा नहीं है कि ये चीजें भारत में बनती नहीं हैं। संभव है कि वे थोड़ा सा महंगी पड़ें लेकिन राष्ट्र निर्माण में, राष्ट्र की आत्मनिर्भरता के लिए, राष्ट्र को फिर से विश्वगुरु के पद पर प्रतिस्थापित करने के लिए, गरीब और ‘बिछड़ों’ में उनके कार्य के प्रति आत्मविश्वास पैदा करने के लिए हम इसे अपने हिस्से का टैक्स मान सकते हैं।

हम इतना संघर्ष क्यों करें? यह सवाल मन में उठना लाजमी है। मैं बताता हूं आपको कम से कम शब्दों में….
lightsएक देश है जो उन लोगों को पाल रहा है, जो सीमा पार करके हमारे घर में घुसकर हमारे बेटों को मार कर चले जाते हैं। हम बहुत ही सहिष्णु देश हैं, हम पर बहुत दबाव है, युद्ध से हमें भी नुकसान होगा। इतना सब होने के बावजूद भी सत्ता का संचालन करने वाले लोगों को इस बात की चिंता तो करनी ही होगी कि इस बिगड़ैल देश का इलाज कैसे किया जाए। करनी भी चाहिए। सरकार ने कूटनीतिक चाल चलकर उस देश को दुनिया से ‘अलग-थलग’ करने का प्रयास किया। बड़े स्तर पर उसे सफलता भी मिली और इसके लिए उसकी पीठ भी ठोंकनी चाहिए कि उसने भारतहित में एक अच्छी विदेशनीति अपनाई। लेकिन इन सबके बीच एक देश है जो उस देश के साथ खड़ा दिख रहा है जिसकी आतंकवादियों के प्रति नीतियां, हमारे देश के बेटों की शहादत के लिए जिम्मेदार हैं। जो विश्व मंच पर सिर्फ एक ही ‘जुगाड़’ में लगा रहता है कि भारत को कैसे हराएं, ऐसे देश को हमें जवाब देना होगा। अगर वह देश ‘आतंक रहित विश्व’ रूपी भारत के स्वप्न को साकार होने में अड़ंगा लगा रहा है तो उसे जवाब देना ही होगा। और देना भी चाहिए।

इस बीच एक बात और बता दूं कि हमने चीन से सकारात्मक संबंध बनाने की बहुत कोशिश की, उनके प्रधान के साथ हमारे प्रधान ने चाय पी, झूला भी झूले। लेकिन उसने सोचा कि भारत पर कब्जा तो कर नहीं सकते, इसलिए पाकिस्तान पर ‘कब्जा’ करके उसे अपने हिसाब से चलाया जाए। चीन यह बात जानता है कि विश्व शक्ति बनने के लिए सबसे पहले उसे एशिया पर राज करना होगा और उसका यह स्वप्न तब तक साकार नहीं हो सकता जब तक भारत को विश्व शक्ति बनने की दौड़ से न हटाया जाए। अपने सपने को साकार करने के लिए वह पाकिस्तान का सहारा ले रहा है।

अब आते हैं कि चीन को जवाब कैसे दिया जाए। युद्ध हम कर नहीं सकते क्योंकि हमारे देश के आंतरिक हालात वैसे नहीं हैं। ऐसे में चीन को जवाब देने का एक ही तरीका है कि चीन को आर्थिक स्तर पर कमजोर किया जाए। चीन को आर्थिक स्तर पर कमजोर करने का एक ही तरीका है कि उसके सबसे बड़े मार्केट को तहस-नहस कर दिया जाए। यदि भारतीय व्यक्ति चीनी सामान न खरीदकर भारतीय सामान खरीदेगा तो चीन का सबसे बड़ा बाजार बंद हो जाएगा। और उसके बाद चीन को पाकिस्तान का साथ छोड़ना ही होगा। लेकिन यह तभी संभव है जब हम इस काम को पूरी जिम्मेदारी के साथ एक राष्ट्रीय दायित्व के रूप में लें।

विश्वास मानिए, परिवर्तन हो रहा है। आज से 5 साल पहले तक भारत का प्रधान अपनी संसद में कहता था कि हम शांति चाहते हैं। लेकिन आज भारत कहता है कि हम आतंक को जवाब देते समय गोलियां नहीं गिनेंगे और पाकिस्तान का प्रधान कहता है, ‘हम शांति चाहते हैं।’ तो संकल्प करें कि आसानी से जितना संभव होगा, भारतीय सामान का ही उपयोग करेंगे। हो सकता है कि थोड़ी सी कठिनाई आए लेकिन मुझे लगता है कि राष्ट्रहित में इतना तो कर ही सकते हैं।

Saturday, 8 October 2016

सर्जिकल स्ट्राइक पर अरविंद केजरीवाल के नाम खुला पत्र

प्रिय अरविंद केजरीवाल जी,
आज बहुत दुखी मन से आपको यह पत्र लिख रहा हूं। सन् 2012 की बात है, मैं लखनऊ में रहा करता था। उस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में जाना हुआ। उस शिविर में कुछ ऐसे युवाओं की तस्वीरें लगी थीं जिनसे आज का युवा प्रेरणा ले सकता है। उस पूरी फोटो गैलरी में कई युवाओं की तस्वीरें थीं। गैलरी की थीम ‘इनसे प्रेरणा लें भारत के युवा’ थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि उस गैलरी में आपकी और कुमार विश्वास की भी तस्वीर थी। मैं कुमार विश्वास को तो पहले सुन चुका था और उनको सुनकर ऐसा लगता भी था कि वह राष्ट्रवादी विचार परिवार से आते हैं लेकिन आपको नहीं सुना था। उसके बाद मैंने आपको सुनना शुरू किया। सच कहूं तो मैं आपके विचारों को ‘सुनकर’ सम्मोहित हो गया। आपने जब अपनी पार्टी बनाई तो मन में ख्याल आया कि अब राष्ट्रवादी वोट ही विभाजित होंगे लेकिन एक उम्मीद थी कि अब निश्चित ही देश की राजनीति में एक सकारात्मक परिवर्तन आएगा। इस उम्मीद का स्तर कश्मीर में जनमत संग्रह कराने को लेकर आपके एक सहयोगी द्वारा दिए गए बयान से काफी ऊंचा था।

vishva gaurav
समय बीता, बहुत लोगों ने आपके बारे में बहुत कुछ कहा, आम आदमी पार्टी को कांग्रेस की ‘बी टीम’ बताया लेकिन मन के एक हिस्से में वही पुराना विश्वास बना हुआ था कि आप लोग राजनीति करने नहीं बल्कि उसे बदलने आए हैं। आपने दिल्ली में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई, कुछ बुरा लगा लेकिन साथ ही कुमार विश्वास के तर्कों ने मेरे मन के विश्वास को डिगने नहीं दिया। और समय बीता, आपके सहयोगियों पर कई तरह के आरोप लगे लेकिन उन आरोपों का स्तर भी उतना नहीं था कि आपके पुराने वक्तव्यों से मेरा सम्मोहन टूट जाए। आप ‘ऑड-ईवन’ का कॉन्सेप्ट लाए और बीजेपी के कुछ नेताओं ने उसका विरोध किया। तब मैंने लिखा: ‘ऑड-ईवन’ पर देश के मन की बात सुनिए मोदीजी!

मैंने यह इसलिए लिखा क्योंकि मेरा विवेक कहता था कि ‘ऑड-ईवन’ योजना आम जनमानस के हित में है। आपके नेता संदीप कुमार की सेक्स सीडी सार्वजनिक हुई और उस पर राजनीति शुरू हुई तो मैंने लिखा: संदीप कुमार की सेक्स सीडी पर इतना हंगामा क्यों? मैंने यह इसलिए लिखा क्योंकि मुझे लगा कि व्यावहारिक रूप से राजनीति का स्तर इतना नहीं गिरना चाहिए कि किसी के व्यक्तिगत जीवन में घुसकर राजनीतिक मुद्दे खोजे जाएं।
फर्जी डिग्री, मारपीट और रेप राजनीतिक आरोप हो सकते हैं। लेकिन आपने सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो दिखाने की बात करके राजनीति की एक नई परिभाषा पेश की। एक ऐसी राजनीति जो देश से भी ऊपर हो गई, एक ऐसी राजनीति जो आतंकियों को मजबूत कर रही है, एक ऐसी राजनीति जो दुनिया भर की मीडिया में आपकी भारत विरोधी छवि बना रही है। मैं जानता हूं कि आपके मन में देश के लिए, सेना के लिए, सैनिकों के लिए, शहीदों के लिए और आम जनमानस की भावनाओं के लिए पूरा सम्मान है लेकिन शब्द चयन तथा प्रस्तुतिकरण में की गई आपकी छोटी सी गलती ने भारतीय मीडिया में आपको विलन बना दिया और पाकिस्तान में हीरो।

मैं यह भी जानता हूं कि आप यह कतई नहीं चाहते कि कश्मीर, भारत से अलग हो, आप यह भी नहीं चाहते कि आपका गुणगान पाकिस्तान में ‘पाकिस्तान परस्त’ के रूप में हो लेकिन मैं यह जरूर जानता हूं कि आपके बचकाने बयान ने भारत की आत्मा को बहुत कष्ट दिया है। आप क्या चाहते हैं कि भारत, सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक कर दे? लोकतंत्र में आपको यह अधिकार है कि आप आपने मन की बात कर सकें, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा पर आपको आत्म चिंतन करने की आवश्यकता है।

*सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से किसको फायदा और किसको नुकसान होगा, क्या आपने बोलने से पहले इस विषय पर सोचा?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को उस ट्रांसपोर्ट तकनीक के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी जिसे भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान उपयोग किया और पाकिस्तान उसे डिटेक्ट नहीं कर पाया?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को उन उपकरणों के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी जो भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान रात में भारतीय सेना ने उपयोग किए थे?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को  उन हथियारों और गोला बारूद के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी जिनका प्रयोग भारत ने किया और उसमें आवाज तक नहीं हुई?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को भारत द्वारा इस्तेमाल किए गए संचार उपकरण और लोकेशन फाइंडर के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को भारत द्वारा इस्तेमाल किए गए हमले के तरीके की जानकारी नहीं मिलेगी?
और क्या ये सारी जानकारियां मिलने के बाद भविष्य में पाकिस्तान को भारत का जवाब देने में सुविधा नहीं हो जाएगी?

क्या आपने एक बार भी इन विषयों के बारे में सोचा? क्या अनजाने में आपने भारत सरकार पर पाकिस्तान की मदद करने का दवाब नहीं डाला? क्या अब भी आपको ऐसा नहीं लग रहा है कि आपने गलत विषय को गलत तरह से उठाया था? इन सवालों के बारे में सोचिएगा जरूर। और अगर अपराध बोध हो तो राजनीति का नया उदाहरण पेश करते हुए देश के सामने सार्वजनिक तौर पर गलती को स्वीकार करिएगा…

Thursday, 6 October 2016

कला की सीमाएं नहीं होतीं, लेकिन देश की होती हैं

इस समय देश में एक नई बहस चल पड़ी है कि कला की सीमाएं होती हैं अथवा नहीं? यदि कोई देश कुछ गलत करता है या गलत का समर्थन करता है तो उस देश के कलाकारों को अन्य स्थानों पर काम करने का अधिकार है अथवा नहीं? एक कलाकार का कला के प्रति समर्पण का पैमाना क्या होना चाहिए?

इस पूरी बहस में मेरा स्पष्ट मत है कि कला की कोई सीमा नहीं होती। लेकिन इसके साथ-साथ एक शाश्वत सत्य यह भी है कि एक कलाकार की कला के प्रशंसक भी बिना किसी राजनीतिक सीमा के होते हैं। वे प्रशंसक उस कलाकार में स्वयं को खोजने लगते हैं। वे उस कलाकार के रोने पर दुखी होते हैं और उसी कलाकार के हंसने पर खुश होते हैं। जब वह कलाकार अपने असल जीवन में हॉस्पिटल में ऐडमिट हो जाता है तो वे प्रशंसक अपना खाना छोड़कर भगवान के मंदिर में घंटों उसकी सलामती की दुआएं मांगते हैं।

धूप नामक फिल्म में जब कोई कलाकार एक शहीद के पिता का किरदार निभाता है तो दर्शक के मन में उस कलाकार की छवि वैसी ही बन जाती है जैसा वह पर्दे पर दिखता है। जब कोई कलाकार पर्दे पर गर्व नामक फिल्म में एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर का किरदार निभाता है तो पुलिस में जाने की तैयारी कर रहा नौजवान उसी आभासीय किरदार को प्रेरणा मान लेता है। लेकिन समस्या यह है कि वह नौजवान दर्शक उस कलाकार की कला का नहीं बल्कि उस व्यक्ति विशेष का प्रशंसक बन जाता है।

एक कलाकार से अपेक्षा की जाती है कि उसमें मानवीय भावना का स्तर आम जनमानस से अधिक होगा क्योंकि उसने पर्दे पर कई किरदार जिए होते हैं। उसने एक फौजी का, एक पुलिसकर्मी का, एक एक आम आदमी तक का किरदार जिया होता है।

हमने तो यही सुना है कि कोई अच्छा अभिनय तभी कर पाता है जब वह अपने आभासीय किरदार में पूरी तरह से उतर जाए। इसी आधार पर हम यह अपेक्षा करते हैं कि एक शहीद के पिता का दर्द, एक आम आदमी का दर्द, एक सैनिक की परिवार से दूर रहने की तड़प, सब कुछ वह हमसे बेहतर तरीके से महसूस कर सकता है। और इसी आधार पर हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि जब किसी आतंकी हमले में देश का कोई बेटा शहीद होता है तो उसके पिता की तरह तो नहीं लेकिन हमसे बेहतर तरीके से एक कलाकार उस परिवार के दर्द को महसूस कर सकता है। वह सही मायने में कला का पुजारी तभी माना जाएगा जब वह सभी सीमाओं को तोड़कर प्रत्येक अमानवीय घटना की निंदा करने की क्षमता रखता हो।

निश्चित ही कला की कोई सीमाएं नहीं होतीं लेकिन दुर्भाग्य से देश की सीमाएं होती हैं। एक कलाकार की प्राथमिक पहचान उसका देश ही होता है। और यदि कोई ऐसा है जो कला को सच में अपने देश से पहले मानता हो तो उसे उस जगह पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देना चहिए, जहां उसे मोहब्बत मिल रही हो, जहां उसकी कला का सम्मान होता हो। और ऐसी जगह पर उसे वहां के कानून के मुताबिक सम्मानपूर्वक रहना चाहिए। भारत के वे लोग जो मेरी तरह ही इस बात को मानते हैं कि हमारे लिए, हमारी खुशी तथा शांति के लिए अपने घर से दूर रहकर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले हमारे शहीद का बलिदान, कला से भी बड़ा है, वे लोग एक बात को कभी मन में ना आने दें कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के सिद्धान्त पर सिर्फ ‘हिंदू’ ही चल रहे हैं।

उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि अनुपम खेर और नाना पाटेकर के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी आपकी लड़ाई उनके बीच लड़ रहे हैं।
यही सलमान खान कुछ महीने पहले जब मोदी के साथ पतंग उड़ा रहे थे तो बड़े राष्ट्रवादी थे, बजरंगी भाईजान लाए तो कहा कि अरे देखो मुसलमान होकर ‘बजरंगी’ नाम रखा। और आज उसी ‘राष्ट्रवादी’ ने कुछ कह दिया तो वह देशद्रोही और पाकिस्तान परस्त हो गया। क्यों?
यह सवाल पूछिएगा अपने आप से…

सच तो यह है कि राष्ट्रवाद और ‘राष्ट्र सर्वोपरि’  के सिद्धान्त के व्यावहारिक रूप का व्यापक चिंतन आपके वर्तमान ‘राष्ट्रद्रोही’ लोगों ने किया ही नहीं था और आप भी इन्हीं में फंसे रह गए, इस नाते आप भी नहीं कर पाए। उनको राष्ट्रवाद नहीं पता और आपका तो कहना ही क्या? आप तो ‘राष्ट्रवाद’ पहचान ही नहीं पाते… सलमान, शाहरुख या ओम पुरी को एक झटके में राष्ट्रद्रोही करार देना पूरी तरह से गलत है।

हर एक कलाकार के दिल में उसका मुल्क रहता है लेकिन वह कलाकार जिसको हमने स्टार बनाया, जिसके गानों और गजलों को सुनकर पता नहीं कितने युवा भारतीयों की मोहब्बत परवान चढ़ी, जिसके ‘मुल्क’ की परवाह किए बिना हम उसके ‘डायलॉग’ पर तालियां बजाते रहे, हूटिंग करते रहे, उससे हम यह अपेक्षा तो करते ही हैं कि जब इस देश के 18 बेटों की हत्या हो तो वह कलाकार इस अमानवीय कुकृत्य की खुले मन से निंदा कर सके। और यह अपेक्षा, हमारा अधिकार भी है। एक कलाप्रेमी के रूप में मानवीयता से परिपूर्ण हृदय रखने के कारण, एक मानव होने के कारण मुझे दुख होता है। और इसी आधार पर जब पेशावर में आतंकी हमला होता है तो भी हमें दुख होता है और हम अपनी फेसबुक टाइमलाइन को आंसुओं और दर्द से भर देते हैं। एक कलाकार होकर भी उनका दिल उड़ी पर क्यों नहीं पसीजा… या उनके लिए कला, उनके मुल्क की सीमाओं में बंधी है?

Wednesday, 5 October 2016

नवदुर्गा के साथ इस 'दुर्गा' को भी याद रखना

durgawatiनवरात्र का पावन पर्व चल रहा है। सनातन पूजा पद्धति में विश्वास रखने वाले सभी लोग विभिन्न उपायों से मां भगवती को प्रसन्न करने में लगे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नवदुर्गा के अलावा एक और दुर्गा थी जिसके शौर्य और पराक्रम से नारी के शक्ति स्वरूपा होने का प्रमाण मिलता है। ऐसा समय और ऐसा स्थान, जहां महिलाओं को घर से निकलने की भी अनुमति नहीं थी, वहां पुरानी परंपराओं को तोड़कर दायित्वबोध और राज्य प्रेम को नए आयाम देने वाली रानी दुर्गावती की अप्रतिम गाथा, भारतीय शौर्य परंपरा का एक मजबूत स्तंभ है।
1542 में दुर्गावती का विवाह गोंड साम्राज्य के संग्राम शाह के बड़े बेटे दलपत शाह के साथ कराया गया। शादी के कुछ वर्षों बाद दुर्गावती को वीर नारायण नामक पुत्ररूपी रत्न की प्राप्ति हुई लेकिन इस खुशी को जल्द ही ग्रहण लग गया और राजा दलपत शाह की मृत्यु हो गई। पति की मौत के बाद गोंड साम्राज्य पर आधिपत्य को लेकर चल रही राजनीति की आहट पाकर रानी ने स्वयं को गोंडवाना की महारानी घोषित कर दिया। एक महिला ने जब राज्य की सत्ता का संचालन अपने हाथों में लिया तो आसपास के राज्यों के पुरुषवादी शासक काफी प्रसन्न हो गए। उनको आशा थी कि महिला होने के नाते गोंड साम्राज्य पर कब्जा करने के लिए उन्हें ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।

vishva gaurav
मालवा गणराज्य के शासक बाज बहादुर ने इसी सोच के साथ गोंडवाना पर हमला किया लेकिन बाज बहादुर की सोच गलत साबित हुई और उसे रानी दुर्गावती ने करारी शिकस्त दी। इस जीत के साथ ही रानी दुर्गावती का यश चारों ओर फैल गया।

इसके कई सालों के बाद गोंडवाना के नजदीकी राज्य मणिकपुर के शासक ख्वाजा अब्दुल मजिद आसफ खान ने रानी दुर्गावती पर आक्रमण करने का विचार बनाया। तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर की आज्ञा लेकर अब्दुल माजिद बड़ी फौज लेकर निकल पड़ा। जब मुगल सेना, दमोह के नजदीक पहुंची तो मुगल सूबेदार ने रानी दुर्गावती से अकबर की अधीनता स्वीकार करने को कहा। रानी दुर्गावती ने उसे जवाब भिजवाते हुए कहा, ‘कलंक के साथ जीने से बेहतर गौरव के साथ मर जाना होता है। मैंने लम्बे समय तक अपनी मातृभूमि की सेवा की है और अब इस तरह मैं अपनी मातृभूमि पर धब्बा नहीं लगने दूंगी। अब युद्ध के अलावा कोई उपाय नही है।’ रानी दुर्गावती ने तीन दिनों तक अकबर की सेना को धूल चटाई। चौथे दिन उनका पुत्र राजा वीर घायल हो गया लेकिन रानी इस वेदना को भी झेल गईं।

24 जून 1564, रानी अब भी अदम्य शौर्य एवं साहस का प्रदर्शन करते हुए बहादुरी के साथ लड़ रही थीं तभी अचानक एक तीर रानी दुर्गावती की गर्दन के एक तरफ घुस गया। रानी ने वह तीर तो बाहर निकाल दिया लेकिन उस जगह पर भारी घाव बन गया। इसी के तुरंत बाद एक और तीर उनकी गर्दन के अंदर घुस गया जिसे भी रानी दुर्गावती ने बाहर निकाल दिया लेकिन इसके बाद वह बेहोश हो गयीं। जब उन्हें होश आया तो पता चला कि उनकी सेना युद्ध हार चुकी है। उन्होंने महावत से कहा, ‘मैंने हमेशा से तुम्हारा विश्वास किया है और हर बार की तरह आज भी तुम्हारा सहयोग चाहिए। आज हार के इस मौके पर तुम मुझे दुश्मनों के हाथ मत लगने दो और वफादार सेवक की तरह इस तेज छुरे से मुझे खत्म कर दो।’

महावत ने कहा, ‘मैं अपने हाथों को आपकी मौत के लिए उपयोग नहीं कर सकता। मैं बस आपको इस रणभूमि से बाहर निकाल सकता हूं, मुझे अपने तेज हाथी पर पूरा भरोसा है।’ यह बात सुनकर रानी दुर्गावती की आंखों में खून उतर आया।
durga वह नाराज हो गईं और बोलीं, ‘क्या तुम मेरे लिए ऐसे अपमान का चयन करते हो? क्या तुम यह चाहते हो कि लोग कहें कि दुर्गावती रणभूमि छोड़ कर भाग गई थी?’ इसी के साथ रानी दुर्गावती ने चाकू निकाला और अपने पेट में घोंप लिया। रानी दुर्गावती ने मध्य प्रदेश की वीरभूमि को अपने रक्त से सींचने में कोई संकोच नहीं किया। दुर्गावती ने 16 सालों तक वीरों की तरह शासन करते हुए भारतवर्ष के गौरवमयी इतिहास को एक नया आयाम प्रदान किया।
आज 5 अक्टूबर है, आज से 492 साल पहले 1524 में दुर्गावती ने जन्म लिया था। आज मैं रानी दुर्गावती पर इसलिए लिख रहा हूं ताकि नारीवाद के नाम पर रिश्तों का मजाक उड़ाने वाले ‘प्रगतिशील’ वर्ग के लोगों की कलम ‘नारीवाद’ का वास्तविक अर्थ बयां कर सके। भारत की इस वीर बेटी की जयंती पर मैं बस इतना चाहता हूं कि देश की बेटियां यदि प्रेरणा लें तो दुर्गावती जैसी महिलाओं से लें। रानी दुर्गावती के जैसा समर्पण और दायित्वबोध, वर्तमान समय की ‘आधुनिक’ नारियों में नहीं पाया जाता।
रानी दुर्गावती को नमन!

Wednesday, 21 September 2016

आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता, तो उन्हें दफनाया क्यों जाता है?


'आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता', यह जुमला तो आपने लगभग हर एक राजनीतिक पार्टी के नेताओं के मुंह से सुना ही होगा। आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं कि मैं इसे जुमला इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वोटबैंक की राजनीति के चलते इसका प्रयोग किया जाता है। कोई भी दल मन से इस बात को मानता नहीं है कि आतंकवादियों का सच में कोई धर्म नहीं होता। मेरा एक छोटा सा सवाल है कि देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां 'कांग्रेस' और 'बीजेपी' दोनों ही अलग-अलग समय में सत्ता में रही हैं? यदि ये दोनों पार्टियां मानती हैं कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता तो फिर उन आतंकियों को इस्लामिक तरीके से दफनाया क्यों जाता है। इससे तो एक ही बात जाहिर होती है कि ये पार्टियां मानती हैं कि आतंकवादी, मुसलमान होते हैं, यानी देश को इस्लामिक आतंकवाद से खतरा है।

मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता, मैं मानता हूं कि देश सिर्फ हिंदुओं का नहीं है। भारत को 'भारत' बनाने की कोशिश मुसलमानों का सहयोग भी रहा है। भारत के गौरवशाली अतीत में अगर मैं महाराणा प्रताप को एक मजबूत स्तंभ मानता हूं तो मुझे उनके सेनापति हकीम खां सूर के शौर्य को अनदेखा करने का अधिकार बिलकुल भी नहीं है। मैं अगर भगत सिंह की शहादत को नमन करता हूं तो मुझे बिलकुल अधिकार नहीं है कि मैं अशफाक उल्ला खां की शहादत को अनदेखा कर दूं। मैं अगर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष को नमन करता हूं तो मुझे यह अधिकार बिलकुल नहीं है कि मैं लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व करने वाली बेगम हजरत महल की देशभक्ति को अनदेखा कर दूं। मैं अनदेशा नहीं कर सकता  85 साल के उस बूढ़े शेर, बहादुर शाह ज़फर को, जो अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था तो अंग्रेजों ने दो पंक्तियां लिखवाकर भेजीं कि,
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

तो बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर दो पंक्तियां जवाब के तौर पर लिखीं:
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्थान की।।

मैं मानता हूं कि इस देश को बनाने में जितना सहयोग हिंदुओं का है उतना ही  अन्य पूजा पद्धतियों में विश्वास रखने वाले लोगों का। और इसी के साथ मैं यह भी मानता हूं कि जो इंसानियत की हत्या करे, जो मासूमों का कत्ल करे, जिसकी मानवीयता शून्य के स्तर से भी नीचे पहुंच गई हो, वह किसी धर्म या मजहब का अनुपालक नहीं हो सकता, क्योंकि कोई भी मजहब यह नहीं कहता कि आतंक फैलाना या निर्दोषों की हत्या करना जायज अथवा धर्मसंगत है।

अब आते हैं मूल बात पर, यदि यह बात सभी मानते हैं कि आतंकियों का कोई धर्म या मजहब नहीं होता तो उनका इस्लामिक पद्धति से अंतिम संस्कार करके क्या हम दुनिया में एक मजहब विशेष की छवि खराब करने की कोशिश नहीं कर रहे? कल उड़ी (जम्मू कश्मीर) में आतंकवादी हमले को अंजाम देने वाले, 18 भारतीय सैनिकों की हत्या करने वाले आतंकियों की लाशों को सेना और पुलिस ने मिलकर दफना(इस्लामिक पद्धति से) दिया। ऐसा करने के पीछे तर्क दिया गया कि इस्लाम के मुताबिक, मौत के बाद शव को नहीं रखा जाना चाहिए। यदि सच में देश की सरकार यह मानती है कि आतंकियों का कोई मजहब नहीं होता तो इस तरह से अंतिम संस्कार करना पूरी तरह से अन्यायोचित है।

मैं भारत का दुर्भाग्य मानता हूं कि इस विषय के पक्ष में जो टीवी चैनल खड़ा होता है, उसके पत्रकार पर कश्मीर में पत्थर चलाए जाते हैं, उसकी ओवी वैन को तोड़ने की कोशिश की जाती है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि कांग्रेस के नेता कहते हैं कि देश में इस विषय को लेकर राष्ट्रीय स्तर की चर्चा होनी चाहिए। क्यों भाई, इसमें कैसी चर्चा-बहस, जिनका कोई धर्म नहीं उनका धार्मिक तरह से अंतिम संस्कार क्यों हो? जिसमें मानवीयता शून्य के स्तर तक पहुंच जाए, वह मानव कहलाने का अधिकारी नहीं और जब वह मानव कहलाने का अधिकारी नहीं है तो उसके लिए मानवाधिकार की बात क्यों हो?

आतंकियों को भ्रमित करते हुए बताया जाता है कि अगर वे तथाकथित जिहाद करेंगे तो मरने के बाद उन्हें जन्नत में 72 हूरें मिलेंगी। इस्लाम की मान्यता है कि दफनाए गए लोगों को कयामत के दिन अल्लाह जन्नत ले जाएगा। विश्वास मानिए अगर हमने आतंकियों के शव को कूड़े के ढेर के साथ जलाना शुरू कर दिया तो भ्रम में फंसकर आतंक का रास्ता अपनाने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी आ जाएगी। इसके अलावा एक भारतीय होने के नाते हम उन लोगों को अपने देश की 2 गज जमीन भी क्यों दें हमारे देश में निर्दोषों की हत्या हैं।

मानवाधिकार की बात सैनिकों के लिए होनी चाहिए, भले ही वह किसी भी देश के हों। युद्ध के दौरान यदि कोई पाकिस्तानी सैनिक यदि शहीद होता है तो उसके शव को ससम्मान पाकिस्तान को वापस किया जाए और यदि पाकिस्तान उस शव को वापस लेने से इनकार करे तो उसका सम्मान सहित मजहबी रीति-रिवाजों के मुताबिक अंतिम संस्कार किया जाए। क्योंकि उसकी मौत अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए हुई है ना कि किसी आधारहीन लालच के कारण।

Monday, 12 September 2016

'न्याय की देवी' के मुंह पर तमाचा है शहाबुद्दीन की जमानत

इस देश में 2 दिन पहले एक ऐसे व्यक्ति को जेल से छोड़ दिया गया जिसे 2 अलग-अलग मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। उस व्यक्ति पर हत्या, रंगदारी और अपहरण जैसे गंभीर अपराधों के 63 मामले दर्ज हैं।

 उस व्यक्ति ने देश में मजलूमों की लड़ाई लड़ रहे चंद्रशेखर प्रसाद नामक एक युवा नेता की हत्या करवा दी ताकि उसके खौफ से कोई उस पर उंगली उठाने की कोशिश न करे। उस व्यक्ति के घर से पाकिस्तान में बने हथियार बरामद हुए थे। उस व्यक्ति पर आईएसआई से संबंध होने का आरोप है। वह व्यक्ति एक सीनियर पुलिस अधिकारी को इसलिए थप्पड़ मारता है क्योंकि वह पुलिस अधिकारी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाते हुए उसके एक करीबी नेता को गिरफ्तार करने पहुंच गया था। उस व्यक्ति पर लोकतात्रिंक व्यवस्था का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले एक पत्रकार की हत्या का आरोप है। इतने ‘बड़े’ व्यक्ति को देश की ‘महान’ न्याय व्यवस्था जमानत दे देती है।


‘मेरे दो बेटों गिरीश और सतीश को मारा गया था, तब एक की उम्र 23 और दूसरे की 18 साल थी। दो बेटों की हत्या का बदला लेने के लिए मेरा बेटा राजीव लड़ रहा था। राजीव मेरा सबसे बड़ा बेटा था, लेकिन 16 जून, 2014 को उसे भी मारकर, मेरे लड़ने की सारी ताकत खत्म कर दी गई। राजीव को शादी के ठीक 18 दिन बाद मार डाला गया।’ ये शब्द हैं एक लाचार पिता के… चंदा बाबू नामक उस पिता की खामोश जुबान बता रही है कि कानून की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी न्यायिक व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा है।

 किस परिस्थिति, किस दबाव, किस डर और किस लालच के चलते एक ऐसे व्यक्ति को जमानत दे दी जाती है जिसके सामने खड़े होने में एक सामान्य व्यक्ति घबराता हो। विक्रमादित्य नाम का एक राजा, जो रात में अपने क्षेत्र में वंचितों की समस्याओं को सुनने के लिए निकलता था, उसके क्षेत्र में एक पिता के भय को नजरंदाज करके, अपराध का दूसरा नाम कहे जाने वाले शहाबुद्दीन की रिहाई पर अहंकार में चूर नीतीश कुमार नामक वर्तमान ‘सम्राट’  खामोश क्यों बैठा है, यह समझ से परे है। क्या आप ऐसी परिस्थितियों में कह सकते हैं कि कोई वंचित अथवा आप स्वयं वर्तमान न्याय व्यवस्था पर भरोसा कर सकते हैं।

मुझे पता है कि याकूब मेमन और अफजल गुरू के समर्थन में आवाज उठाना पूरी तरह से देशद्रोह भी है और राष्ट्रद्रोह भी लेकिन शहाबुद्दीन जैसे अपराधियों के समर्थन में गाड़ियों की रैली निकालना और लिखना देशद्रोह की श्रेणी में क्यों नहीं आता। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सिर्फ देश की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। बहुत अच्छी बात है, सवाल उठना भी चाहिए लेकिन सवाल न्याय व्यवस्था के साथ-साथ उस अवार्ड वापसी गैंग पर क्यों नहीं उठाया जा रहा जो कभी सहिष्णुता और मानवीयता के नाम पर सड़कों पर उतर आए थे।

जेएनयू की जीत पर जश्न मनाने वाले लोग अपनी अग्रज पीढ़ी के उस वास्तविक कॉमरेड के हत्यारे की रिहाई पर खामोश क्यों हैं जिसने वामपंथ की परिभाषा को नए आयाम दिए? डूसू चुनाव की जीत पर राष्ट्रवाद का झंडा उठाकर पटाखे फोड़ने ऐसे लोग जो लखनऊ में एक शिक्षक के पीटे जाने पर ‘शिक्षक के सम्मान में…’ जैसे नारे लगाते हैं और समाजवादी पार्टी को अपराध का प्रणेता बताते हैं, वे भी चुप्पी क्यों साधे हैं? शायद किसी ने सच ही कहा कि सत्ता का नशा अपने ‘परिवार’ पर किए गए जुल्मों को भी भुला देता है। देश आज चुपचाप बैठा है, क्यों? क्योंकि शायद उसे अब भी उम्मीद है कि आप खड़े होंगे, उस व्यवस्था के खिलाफ जिसने आपको अपनों से दूर किया है, उस राजनीति के खिलाफ जिसने पता नहीं कितने मासूमों को पिता विहीन कर दिया, उस तथाकथित नेता के खिलाफ जिसने ‘अपराधवाद’ की एक नई परिभाषा प्रतिस्थापित की, उस न्याय व्यवस्था के खिलाफ जिसमें मानवीयता शून्य के स्तर तक पहुंच गई है।

भले ही वह देश के एक राज्य के एक छोटे से जिले में रहने वाला एक ‘बाहुबली’ हो लेकिन याद रखिएगा, उसके कर्म किसी आतंकी से भी बुरे हैं। आतंकी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिसे वह मारने जा रहा है वह कौन है, लेकिन शहाबुद्दीन जैसे लोग तो घर के अंदर रहकर ही हमारे भाइयों को मार देते हैं, औरतों को विधवा कर देते हैं, पिता से उनका बेटा छीन लेते हैं, मां बच्चों को अनाथ कर देते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ तो आप सड़कों पर उतर आते हैं लेकिन ऐसे ‘हत्यारे’ जब जेल से छूट जाते हैं तो आपका खून क्यों नहीं खौलता? अपनी ताकत को पहचानिए और बताइए सत्ता के सिंहासन पर बैठे राजनेताओं को कि देश, अपराध और अपराधी मुक्त होना चाहता है।

Thursday, 8 September 2016

स्वीकार्यता के सिद्धांत पर वामपंथी सहिष्णुता का दोहरापन

‘मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी हूं, जिसने दुनिया को सहिष्णुता तथा सार्वभौमिक स्वीकार्यता दोनों की ही शिक्षा दी है, हम लोग सभी धर्मों के प्रति ही केवल सहनशीलता में ही विश्वास नहीं करते बल्कि सारे धर्मों को सत्य मान कर स्वीकार करते हैं। हमारा मानना है कि सभी रास्ते अंत में एक ही ईश्वर यानी सत्य तक जाने का मार्ग हैं।’ यह बात शिकागो धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने कही थी। यदि स्वामी विवेकानंद के पूरे भाषण को एक पंक्ति में समझें तो उसका अर्थ यही निकलता है कि भारत की संस्कृति स्वीकार्यता के सिद्धांत पर टिकी है। आज स्वामी विवेकानंद के भाषण के इस अंश को ब्लॉग में सम्मिलित करने का एक कारण है।

कुछ दिन पहले का मामला है, वामपंथी संगठनों द्वारा आयोजित भारत बंद के समर्थन में लखनऊ विश्वविद्यालय में विभिन्न छात्र संगठनों ने विश्वविद्यालय बंद का आह्वान किया। प्रदर्शन के दौरान आइसा और एबीवीपी कार्यकर्ताओं के बीच धक्का-मुक्की भी हुई। (पढ़ें खबर) आइसा कार्यकर्ता पूजा का आरोप है कि एबीवीपी कार्यकर्ताओं के सामने जब पूजा ने ‘हर लड़की है भारत माता’ के नारे लगाए तो जवाब में एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने सिक्के उछालते हुए ‘नाचो भारत माता’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। किसी के साथ भी ऐसा व्यवहार करना पूरी तरह से गलत और निंदनीय है। यह मामला और ज्यादा गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि एबीवीपी का दावा रहता है कि उनके कार्यकर्ता भारतीय संस्कृति के ‘संरक्षक’ हैं।

अपनी मां (भारत माता) को नाचने के लिए कहना, सिर्फ इसलिए एक लड़की का अपमान करना क्योंकि वह दूसरी विचारधारा से आती है, कहीं से भी नारी को देवी मानने वाली संस्कृति को प्रदर्शित नहीं करता। स्वामी विवेकानंद के स्वीकार्यता के सिद्धांत को ताक पर उन लोगों के द्वारा रखा जा रहा है जो स्वामी विवेकानंद को कथित तौर पर अपना आदर्श मानते हैं। जिसने भी ऐसा किया है उस पर संगठन के द्वारा भी और कानूनी रूप से भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि जब लखनऊ विश्वविद्यालय में यह सब हो रहा था, उस दौरान वहां खड़े लोगों के मुताबिक एबीवीपी कार्यकर्ताओं की ओर से ‘नाचो भारत माता’ जैसे नारे नहीं लगाए गए थे लेकिन फिर भी यदि आरोप लगा है तो जांच तो होनी ही चाहिए।

लेकिन इसके साथ एक दूसरे पक्ष पर भी ध्यान देना चाहिए। पूजा की फेसबुक टाइमलाइन पर इस घटना को लेकर बड़ा बवाल मचा हुआ है। राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े लोगों को संघी लंपट, संघी गुंडा, वानर, लड़की छेड़ने वाला इत्यादि संज्ञाओं से नवाजा जा रहा है। मैं फिर कह रहा हूं, जिसने भी ऐसी गंदी हरकत की है, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए, एबीवीपी से ऐसे लोगों को लेकर जवाब मांगा जाना चाहिए लेकिन पूरी विचारधारा को गलत ठहरा देना कहीं से भी ठीक नहीं है।

एबीवीपी को छोड़ दीजिए, मैं राष्ट्रवादी विचारधारा से आता हूं और मुझे ऐसे शब्दों से आपत्ति है। इस आपत्ति का कारण भी है। इन्हीं वामपंथी संगठनों का झंडा लेकर, इनके ही द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होकर कुछ ‘देशद्रोही’ लोग भारत की बर्बादी के नारे लगाते हैं। इस देश के वामपंथी एक सीमा तक उन लोगों का समर्थन भी करते हैं। लेकिन हम अपनी निष्पक्षता और सहिष्णुता दिखाते हैं और सभी वामपंथियों को देशद्रोही नहीं कहते।
इनके संगठन का एक महत्वपूर्ण दायित्वधारी कार्यकर्ता एक छात्रा का रेप करता है लेकिन हम हर एक वामपंथी को बलात्कारी नहीं कहते। इनके ‘बड़े’ लोग इस घटना पर शर्मिंदा होकर अपने अवॉर्ड नहीं वापस करते लेकिन हम इसे मुद्दा नहीं बनाते क्योंकि हम अपनी जिम्मेदारी और इनकी राजनीति समझते हैं। ये छात्रहित में विश्वविद्यालय में आंदोलन करते हैं, बहुत अच्छी बात है। इनके साथ कोई व्यक्ति कोई अवांछित हरकत करे , बहुत बुरी बात है। हम इनका पक्ष पूरी जिम्मेदारी के साथ समाज तक पहुंचाते हैं।

लेकिन ये लोग जब अपनी विचारधारा को केन्द्र में रखकर कोई पोस्ट लिखते हैं तब कोई विपक्षी विचारधारा का व्यक्ति अपनी विचारधारा के समर्थन में कॉमेन्ट करता है तो ये क्या करते हैं? ये उसे संघी लंपट, संघी गुंडा, वानर, लड़की छेड़ने वाले और न जाने कैसी कैसी संज्ञाएं देते हैं। गजब, सहिष्णुता है इनकी। भारत स्वीकार्यता के सिद्धांत पर टिका है। हम इनको स्वीकार करते हैं लेकिन ‘भारत की बर्बादी’ के नारे लगाने वालों और बलात्कार करने वालों का विरोध करते हैं।

स्वीकार्यता के सिद्धांत पर आधारित एक उदाहरण देता हूं। 2012 की बात है, इसी लखनऊ विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं को फेल कर दिया गया था। विश्वविद्यालय का कहना था कि स्क्रूटनी के लिए 1400 रुपए प्रति कॉपी के हिसाब से जमा करना होगा और तब कॉपी दोबारा से जांची जाएगी। अब आप ही सोचिए, स्नातक का एक लड़का जो 10 में से 9 पेपर्स में फेल है वह इतना पैसा कहां से लाएगा और वह भी तब जब इस बात की कोई गारंटी ना हो कि कॉपी ठीक से चेक की जाएगी।

उस दौरान आरटीआई के तहत 10 रुपए में कॉपी दिखाने की मांग की गई। लेकिन विश्वविद्यालय ने इस मांग को मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद सपा छात्रसभा और एनएसयूआई को छोड़कर एबीवीपी, आइसा, एसएफआई सहित सभी छात्र संगठनों ने एक नया मंच बनाया और पूरे 2 महीनों तक संघर्ष किया। आखिरकार छात्रहित में किए गए उस संघर्ष की जीत हुई और छात्रों को अगले वर्ष का परीक्षा फॉर्म भरने से ठीक 5 दिन पहले विश्वविद्यालय ने आरटीआई के तहत 10 रुपए में कॉपी दिखाने की मांग मान ली। हजारों की संख्या में छात्र पास हुए। यह होती है सहिष्णुता, यह होती है स्वीकार्यता।

स्वीकार्यता तो लानी ही होगी…आपको भी और उनको भी… मैं इस बात को जानता भी हूं और मानता भी हूं कि दोनों विचारधाराओं के सिद्धांत का आधार स्वीकार्यता ही है।

Saturday, 3 September 2016

संदीप कुमार की सेक्स सीडी पर इतना हंगामा क्यों?

आम आदमी पार्टी, राजनीति की ‘दशा और दिशा’ सुधारने के दावे के साथ सत्ता के सिंहासन तक पहुंची एक नई पार्टी… उस पार्टी की सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री रहे संदीप कुमार की ‘सेक्स सीडी’ लीक हो जाती है तो भारत के राजनीतिक गलियारों में अजीब सा माहौल बन जाता है… पार्टी अपनी जिम्मेदारी को समझती है और तत्काल कार्रवाई करते हुए आधे घंटे के अंदर आरोपी नेता को पदमुक्त कर देती है। लेकिन सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं की बखिया उधेड़ दी जाती है। इन सबके बीच मेरा एक सीधा सा सवाल है कि क्या किसी के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करना उचित है? मैं मानता हूं कि संदीप ने जो किया वह ठीक नहीं था। किसी महिला के साथ आपत्तिजनक अवस्था में तस्वीरें खींचना – जैसा कि आरोप है – अनैतिक भी है और असंवैधानिक भी लेकिन इसमें उस महिला की क्या गलती है?

सोशल मीडिया के धुरंधर संदीप कुमार के साथ उस महिला की तस्वीरें भी पोस्ट कर रहे हैं।ज़्यादा चिंता की बात यह है कि जो लोग सोशल मीडिया पर उस लड़की की आपत्तिजनक तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं  उनका दावा है कि वे उस परिवार से आते हैं जो नारी को ‘देवी’ मानता है। अपनी ‘देवी’ को बदनाम करना कैसी ‘पूजा’ है यह मेरी समझ से परे है। संदीप एक जनप्रतिनिधि था तो क्या वह अपना व्यक्तिगत जीवन छोड़ दे? बिल्कुल नहीं, लेकिन यह उस जनप्रतिनिधि को पता होना चाहिए कि लोगों ने एक विशेष चरित्र की आड़ में उसे चुन लिया, अब उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह जनता के सामने एक आदर्श स्थिति प्रस्तुत करे। लेकिन अगर वह जनप्रतिनिधि ऐसा नहीं भी करना चाहता है तो क्या समस्या है? भारत में बड़े-बड़े नेताओं की बड़ी-बड़ी करतूतें तो झेल ही रहे हैं ना हम।

हमने जीप घोटाले से लेकर ताज कॉरिडोर से होते हुए 2जी और CWG तक झेला ना, तो फिर इस बात को क्यों नहीं झेल सकते? हम एक ऐसे नेता को झेल सकते हैं जो कहती हो कि भारत में जो उनकी पार्टी को वोट देगा वह रामजादा है और बाकी विपक्षी हरामजादे हैं, हम एक ऐसा नेता झेल सकते हैं जो बच्चों को शिक्षित करने की सलाह देने के बजाय चार बच्चे पैदा करने की सलाह देता हो, हम एक ऐसा नेता झेल सकते हैं जो बलात्कार करने वालों को ‘बच्चा’ करार देते हुए इस कुकर्म को गलती बताता हो, हम एक ऐसा नेता झेल सकते हैं जो एक महिला सांसद को ‘सौ टका टंच माल’ कहता है, हम एक ऐसा नेता को झेल सकते हैं जो देश के प्रधानमंत्री पद के प्रबल उम्मीदवार को अपने क्षेत्र में आने पर बोटी-बोटी करने की धमकी देता है। जब हम इतना कुछ झेल सकते हैं तो फिर अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी ‘गैर’ महिला के साथ सेक्स करने वाले को क्यों नहीं झेल सकते? ‘सेक्स-संबंधों’ पर आगे की बात करने से पहले जरा एक बार भारतीय राजनीति के ऐसे ही कुछ अन्य नेताओं के बारे में भी जान लेते हैं। खास बात यह है कि ऐसे लोग देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों में भी हैं।
मध्य प्रदेश बीजेपी के नेता और वित्त मंत्री रहे राघव जी की 2013 में आई, वह सीडी भी याद कर लीजिए जिसमें 79 वर्षीय राघव जी अपने नौकर के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पाए गए थे। 2009 में आई कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी की वह सीडी याद करिए जिसमें वह तीन महिलाओं के साथ आपत्तिजनक हालत में दिखाई दे रहे थे। इसी पार्टी के राजस्थान के महिपाल मदेरणा और नर्स भंवरी देवी का सेक्स सीडी स्कैंडल याद है ना? उस समय महिपाल भी गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री थे।
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राघव जी (बाएं), एनडी तिवारी (मध्य) और महिपाल मदेरणा (दाएं)।
इनके अलावा भी अन्य कई नेता हैं जिन पर महिलाओं ने रेप के आरोप तक लगाए हैं परंतु उस पर बात नहीं होगी। बात होगी संदीप कुमार के केस की, जिसमें कोई पीड़िता नहीं है और जिसमें किसी ने आकर शोषण की शिकायत तक दर्ज नहीं कराई है, उस पर पूरा सोशल मीडिया इस तरह से कटाक्ष कर रहा है जैसे सहमति से ‘सेक्स’ करना भी अपराध हो। विरोध का स्तर भी इतना गिरा लिया कि अपने पूर्वज तक याद नहीं रहे। यह भी छोड़िए, कुछ तो ऐसे हैं जो अपने को सही साबित करने के लिए गांधी, नेहरू और अटल तक को बीच में ले आए। अटल जी ने कहा था कि मैं कुंवारा हूं लेकिन ब्रह्मचारी नहीं। यहां उन्होंने ब्रह्मचारी शब्द का प्रयोग किन अर्थों में किया था, यह एक अलग विषय है लेकिन भविष्य में उनके इस वाक्य को किस सीमा तक ले जाया जाएगा, यह जानते हुए भी इस वाक्य को बोलने की हिम्मत रखना मामूली बात नहीं थी। ‘सत्य के प्रयोग’ लिखने वाले मोहनदास करमचंद गांधी जी के व्यक्तिगत जीवन में उनकी सोच क्या रही होगी, वह एक अलग विषय है लेकिन उसे लिखने की क्षमता रखना सामान्य श्रेणी में तो नहीं आता।

पार्टी प्रवक्ता की ओर से उदाहरण तो इन लोगों का दिया जा रहा है लेकिन आरोपी अपनी बात स्पष्ट रूप से कहने के बजाय ‘दलित कार्ड’ फेंक रहा है। कैसी राजनीति है! एक महिला के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वह पूर्णरूप से संस्कारविहीन दिखती है। ऐसे लोग जो सोशल मीडिया पर एक लड़की के चरित्र का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं, वे कम से कम एक बार अपनी व्यक्तिगत जीवन के विषय में भी सोचें। मेरा मानना है कि सवाल इस बात पर नहीं उठना चाहिए कि एक ‘जनप्रतिनिधि’ के किसी गैर महिला के साथ संबन्ध थे बल्कि सवाल इस बात पर उठना चाहिए कि संदीप कुमार ने आखिर तस्वीरें क्यों खींची और विडियो क्यों बनाया? सवाल इस बात पर उठना चाहिए कि किसी महिला के सम्मान को लेकर एक व्यक्ति इस हद तक गैरजिम्मेदार कैसे हो सकता है? सवाल इस बात पर उठना चाहिए कि सोशल मीडिया पर एक लड़की के सम्मान से खुलेआम खिलवाड़ करने वालों पर कार्रवाई कब होगी?

विश्वास मानिए, यदि विरोध भी सकारात्मकता की नींव पर टिका होगा तो निश्चित ही देश की राजनीति में परिवर्तन देखने को मिलेगा।

Friday, 26 August 2016

गोरक्षको, दलित तुमसे ज्यादा धर्मनिष्ठ हैं

गोरक्षा की बात हो, गोरक्षा दल बनें…कोई समस्या नहीं। हमें जन्म देकर अपने दूध से हमारी हड्डियों को मजबूती प्रदान करने वाली मां की तरह गाय भी हमारी जीवनदायनी है। लेकिन इस समय भारत में दलितों के साथ जो हो रहा है, उससे उनकी रक्षा के लिए क्या कोई दल नहीं बनना चाहिए? क्या दलितों की रक्षा की जिम्मेदारी हमारी नहीं है? क्या वे हमारे भारत का हिस्सा नहीं हैं? क्या भारत बनाने में उनका कोई योगदान नहीं है? अरे साहब! याद करिए वह मुगलकालीन दौर जब अपने धर्म की रक्षा के लिए इन्होंने अपने जनेऊ को तोड़कर अर्थात ‘भंग’ कर मुगल शासकों के यहां मैला ढोने और उनके द्वारा पात्र में किए गए शौच को सिर पर उठाकर फेंकने का काम तक शुरू कर दिया। याद करिए वह दौर जब हमारी ही अग्रज पीढ़ियां तीन भागों में बंट गईं थीं। एक तो वे जिन्होंने मुगलों के आगे झुककर इस्लाम स्वीकार कर लिया, दूसरे वे जिन्होंने संघर्ष किया या खुद को छिपाते रहे और तीसरे वे जिन्होंने धर्म को नहीं छोड़ा और मुगलों की दृष्टि में जो सबसे गंदा काम था, उसे करना स्वीकार किया।

आज आप उन्हें उनकी शादी में घोड़ी पर नहीं बैठने देते हैं। अरे हिम्मत नहीं है आपकी कि आप उनसे आंख मिलाकर बात कर सकें। आपको तो उनके चरणों को धोकर पीना चाहिए कि जो काम आज आप अपने घर में भी नहीं कर पाते हैं, उस काम को वे बड़ी निष्ठा से करते हैं। एक जानवर के मर जाने पर जब आप अपनी नाक पर कपड़ा रखकर उसके पास से निकलते हैं तो वे हीं हैं जो आपकी सुविधा के लिए खुद को कष्ट देकर उस जानवर को हटाते हैं। हो सकता है कि आप अब कुतर्क करें कि वे अपना काम करते हैं। साहब! यह उनका काम नहीं है बल्कि आपके लिए आईना है कि जो आप नहीं कर सकते वह वे कर सकते हैं। आपको तो शर्म से डूब मरना चाहिए लेकिन आप तो उन्हें पीटेंगे, उन्हें कुएं से पानी नहीं भरने देंगे, उनको मंदिर में नहीं घुसने देंगे। क्या आपके भगवान कहते हैं कि जो मैला उठाएगा या जो उस परिवार में जन्म लेगा, वह उनके मंदिर में नहीं जा सकता? क्या आपके भगवान छुआछूत मानते हैं? क्या वह तुमसे कहते हैं कि छुआछूत मानो और दलितों पर अत्याचार करो? अगर हां, तो एक समय में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा था और आज मैं कहता हूं कि अगर आपका भगवान छुआछूत मानता है तो मैं उसे भगवान नहीं मानता।

याद करिए चंवरवंश का गौरवशाली इतिहास और चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रविदास को, जिन्हें राणा सांगा और उनकी पत्नी झाली रानी ने अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी। जिन्हें आपके पूर्वजों ने गुरु माना, आप उनके वंशजों को अछूत मानते हैं। क्या आपने एक संत का वह शौर्य नहीं पढ़ा कि जब सिकंदर लोधी ने रविदास को कैद करके उनके अनुयायियों को ‘चमार’ कहकर अछूत घोषित किया और उन पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव डाला तो उन्होंने कहा,

वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर मैं क्यों छोड़ू इसे, पढ़ लूं झूठ कुरान।
वेद धर्म छोड़ू नहीं, कोसिस करो हज़ार,
तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार।। (रविदास रामायण)

माफ कीजिएगा लेकिन जो काम सिकंदर लोधी ने किया था, वही काम आप भी कर रहे हैं। हमारे-आपके तथाकथित सनातनी पुरखों ने उन्हें अछूत बनाकर सनातन धर्म के सीने में कटार घोंपने जैसा काम किया। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि आज 21वीं सदी में जब भारत के हर नागरिक को एक सूत्र में पिरोने की आवश्यकता है तो आप अपने पूर्वजों की उसी कुत्सित परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।  हमारे-आपके पूर्वजों ने इन धर्मरक्षकों को अपने ही समाज से बहिष्‍कृत कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदू धर्म कुरीतियों का घर बन गया, जो आज जातिप्रथा के रूप में एक अभिशाप बनकर अपनी जड़ें जमा चुका है।

मछुआरी मां सत्‍यवती की संतान महर्षि व्‍यास की तो आप पूजा करते हैं और आज एक मछुआरे को निम्न स्तर का कहकर उसे अपने साथ खाना भी नहीं खिलाते। हो सकता है आपको बुरा लगे लेकिन मैं इसे दोगला चरित्र ही मानता हूं। आप श्रीकृष्ण की बात करते हैं ना तो गीता के चौथे अध्‍याय का 13वां श्‍लोक भी पढ़ लीजिए, जिसमें श्रीकृष्‍ण ने कहा है, ‘चातुर्वर्ण्य मया सृष्टां गुणकर्मविभागशः’ (महाभारत आदि पर्व 64/8/24-34) अर्थात चारों वर्ण ‘मैंने’ ही बनाए हैं, जो गुण और कर्म के आधार पर है। यह पढ़ने के बावजूद अगर आपके मन में यह प्रश्न न उठे कि जब सभी का निर्माता एक ही है तो मन में दलित, अस्‍पृश्‍य जाति जैसी भावना कैसे आ गई?

याद रखिए, हमारे आराध्य श्रीराम ने भी कभी किसी को स्वयं से अलग नहीं समझा। उन्होंने निषादराज को भी गले लगाया साथ ही शबरी के जूठे बेर भी खाए। आज इन तथाकथित दलितों को खुद से दूर करके आप श्रीराम का अपमान कर रहे हैं। बस इतना ही निवेदन है कि भारत की सांस्कृतिक एकता को मत तोड़िए। गोरक्षा के नाम पर, अपनी झूठी परंपराओं के नाम पर इन्हें खुद से दूर मत करो। याद रखिए, भारत सिर्फ आपसे नहीं बनता। भारत बनाने में हमारे इन भाइयों का भी योगदान है। आज जिस गौरवशाली और शौर्यपूर्ण अतीत की बात करके आप खुद को श्रेष्ठ जताने की कोशिश करते हो, उस अतीत की नींव इनके समर्पण पर ही टिकी है।

Thursday, 25 August 2016

काम-रेड कथा: क्रांतिकारी का चोला ओढ़े बलात्कारी

देश के दिल दिल्ली में स्थित एक विश्वविद्यालय, जहां मेरे-आपके टैक्स के पैसे से वहां पढ़ने वाले छात्रों को सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रसिद्ध है अपनी प्रगतिवादी सोच के लिए... इस विश्वविद्यालय की सबसे खास बात यहा है कि यहां के छात्रों का एक गुट भारत में 'आजादी' चाहता है। भारत में कुछ चीजें सिर्फ हमारे जेएनयू में ही होती हैं। उदाहरण स्वरूप, जब बस्तर में भारतीय सेना के 72 जवानों को नकसलियों द्वारा मार दिया जाता है तो जश्न मनाया जाता है। लोकतंत्र के मंदिर पर हमला करने के दोषी अफजल गुरू को जब देश की सर्वोच्य अदालत फांसी की सजा सुनाती है तो इस जेएनयू में उस फैसले का विरोध होता है, एक आतंकी की फांसी पर यहां मातम मनाया जाता है। इंटरनैशनल फूड फेस्टिवल के बहाने यहां पर कश्मीर का एक अलग स्टॉल लगाकर उसे एक देश के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। इस विश्वविद्यालय के छात्रों का एक गुट मानता है कि भारत ने पूर्वोत्तर राज्यों पर गलत तरीके से 'कब्जा' करके रखा है और उन्हें 'आजाद' कर देना चाहिए। यहां के 'प्रगतिशील' छात्र आतंकी अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने की कसमें खाते हैं। यहां शक्ति की प्रतीक मां दुर्गा को 'वेश्या' और महिषासुर को 'दलित' बताया जाता है। यहां भारत की बर्बादी तक जंग को जारी रखने के नारे लगते हैं। यह है मेरा जेएनयू... 

ऐसा नहीं है कि जेएनयू का मात्र यही रूप है। इसके अलावा जेएनयू का एक रूप भी है जिसने 'भारत' बनाने में अहम योगदान दिया है लेकिन यहां इस सकारात्मक रूप पर नकारात्मक रूप हमेशा प्रभाव स्थापित किए रहता है और इसी मजबूरी के कारण हमारी आंखों के सामने जेएनयू का नकारात्मक स्वरूप ही प्रदर्शित होता है। 2 दिन पहले इस विश्वविद्यालय के एक छात्रनेता ने विश्वविद्यालय की ही एक छात्रा को मराठी फिल्म सैराट दिखाने के बहाने अपने हॉस्टल में बुलाया और फिर उसे शराब पिलाई। इसके बाद छात्र संगठन आइसा के 'अनमोल रतन' ने छात्रा का बलात्कार किया। क्या कहेंगे इसे आप? आधुनिकता, प्रगतिवादिता या फिर आजादी?

इस देश में आजादी के मायने क्या होते जा रहे हैं, यह इन हालातों में समझने की कोशिश करना, व्यवहारिकता को एक कभी न सुलझने वाले जाल में उलझा सकता है। हैरानी की बात तो यह है कि मानवतावाद, नारीवाद और शोषण के विरोध में लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले लोग इस पूरे मामले पर खामोश हैं। उन्हें न तो इसमें किसी महिला का शोषण दिख रहा है और ना ही इसमें उन्हें मानवता की हत्या दिख रही है। इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि अब आधुनिकता के पैमानों पर बहस भी नहीं हो रही है। किसी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उस लड़की की संवेदनाओं की हत्या क्यों की गई? आइसा ने अपने 'अनमोल रतन' की प्राथमिक सदस्यता रद्द करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। अगर वह सामान्य कार्यकर्ता होता तो बात को सामान्य कहकर टाल दिया जाता लेकिन वह दिल्ली प्रदेश का अध्यक्ष रह चुका है। छात्र संगठनों को जितना मैं जानता हूं वे ऐसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी ऐसे ही व्यक्ति को देते हैं जो उनकी विचारधारा को अपने कृतित्व में आत्मसात करता हो। तो क्या यह मानना ठीक नहीं होगा कि वर्तमान वामपंथी विचारधारा ही इस कुत्सित मानसिकता से ग्रसित है।

आज यह बात सामने आ गई है, साथ ही यह भी सामने आया है कि उस छात्रनेता ने छात्रा पर इस घटना का बाहर जिक्र न करने को लेकर दबाव भी बनाया था। तो क्या इस बात को लेकर कोई शंका रह जाती है कि जेएनयू में यह सब आए दिन होता रहता हो और ऐसे ही दबाव के चलते छात्राएं इसका जिक्र बाहर न कर पाती हों। 

बेहतर होता अगर हमारे देश के नेता उस पीड़िता को अपनी बेटी बताकर उसे न्याय दिलाने की बात करते। बेहतर होता कि हमारी राजनीतिक पार्टियां एकमत से रेड झंडे को लेकर 'काम' की आग में जलने वाले कामरेडों की 'आजादी' पर प्रतिबंध लगाने की बात करतीं। बेहतर होता कि 'आजादी' के सिपहसालार इस विषय पर भी अपनी कलम चलाकर ऐसी कुत्सित मानसिकता से प्रेरित हरकत करने वाले व्यक्ति के लिए सजा की मांग करते। बेहतर होता अगर मेरे देश के प्रगतिशील वर्ग के पत्रकार ऐसे विषयों पर भी अपने चैनल की स्क्रीन काली करते। काश! यह सब हो पाता। काश....!!!

वीर सावरकर की प्रेरणा से सुभाष चन्द्र बोस ने बनाई थी आजाद हिंद फौज

वैसे तो अभी तक भारत के वीर सपूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मौत पर रहस्यात्मक प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है लेकिन एक प्रचलित 'तथ्य' यह भी है कि आज से ठीक 71 साल पहले 18 अगस्त 1945 को तोक्यो जाते हुए उनका हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और इस हादसे में नेताजी की मौत हो गई थी। नेताजी की मौत से जुड़ा सच क्या है, यह एक अलग विषय है लेकिन देश के प्रति पूर्ण मनोयोग के समर्पित होकर ब्रिटिश सेना के सामने एक भारतीय सेना खड़ी करने वाले सुभाष बाबू के जीवन के जुड़े कुछ ऐसे अध्याय हैं जिनके बारे में शायद आपको जानकारी न हो। विश्व इतिहास में आजाद हिंद फौज जैसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता जहां 1,50,000 हजार युद्ध बंदियों को संगठित, प्रशिक्षित कर अंग्रेजों के सामने खड़ा किया गया हो।

सन् 1938 में सुभाष चन्द्र बोस, कांग्रेस के अध्यक्ष बने लेकिन अपने कार्यकाल के दौरान गांधी जी तथा उनके सहयोगियों के व्यवहार से दुखी होकर सुभाष चन्द्र बोस ने 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद 3 मई 1939 को उन्होंने कोलकाता में फॉरवर्ड ब्लॉक अर्थात अग्रगामी दल की स्थापना की तथा भारत की स्वतंत्रता और अखंडता के लिए वह तत्कालीन नेताओं एवं क्रांतिकारियों से संपर्क करने लगे।

आपको जानकर हैरानी होगी कि सुभाष बाबू को अंग्रेजों के सामने एक भारतीय सेना खड़ी करने की प्रेरणा विनायक दामोदर सावरकर से मिली थी। 26 जून 1940 को सुभाष चन्द्र बोस, सावरकर के घर गए। वह सावरकर से मिलने मोहम्मद अली जिन्ना के कहने पर गए थे क्योंकि जिन्ना, सावरकर को हिंदुओं का नेता मानता था और खुद को मुस्लिमों का नेता कहता था। मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों के लिए जब अलग देश की मांग की गई तो सुभाष बाबू जिन्ना के पास गए। सुभाष बाबू चाहते थे कि मुस्लिम लीग देश के विभाजन की मांग न करे। जिन्ना के पास पहुंचने पर जिन्ना ने सुभाष बाबू से पूछा कि वह किसकी तरह से उससे बात करने आए हैं? इस पर सुभाष बाबू ने कहा कि वह ने कहा कि वह फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता के तौर पर बात करना चाहते हैं। सुभाष बाबू की इस बात पर जिन्ना ने कहा, 'मैं मुसलमानों का नेता हूं और मुझसे कोई हिंदू नेता ही बात कर सकता है।' जिन्ना की नजर में विनायक दामोदर सावरकर हिन्दुओं के नेता थे। जब सुभाष बाबू, विनायक दामोदर सावरकर से मिलने पहुंचे तो सावरकर ने सुभाष बाबू को महान क्रांतिकारी रायबिहारी बोस के साथ हुए पत्रव्यवहार के बारे में बताया। सावरकर ने उनको बताया कि रायबिहारी बोस, युद्धबंदी भारतीयों को एकत्रित करके एक सेना बनाने का प्लान कर रहे हैं। इसके बाद नेता जी जर्मनी गए। जर्मनी में उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की।

जर्मनी में सुभाष बाबू ने हिटलर से मुलाकात की। नेताजी भारत को आजाद करवाने के लिए दुनिया भर की मदद चाहते थे। हिटलर ने एक सीमा तक नेताजी की मदद भी की। वह सुभाष बाबू से बहुत प्रभावित हुआ। महान देशभक्त रासबिहारी बोस के मार्गदर्शन में नेता जी ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर के वैफथे नामक हॉल में आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) का गठन किया। इस सरकार को जापान, इटली, जर्मनी, रूस, बर्मा, थाईलैंड, फिलीपींस, मलयेशिया सहित नौ देशों ने मान्यता प्रदान की। आजाद हिंद सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री के पद की शपथ लेते हुए सुभाष ने कहा, 'मैं अपनी अंतिम सांस तक स्वतंत्रता यज्ञ को प्रज्वलित करता रहूंगा।'

इसके बाद पूर्व एशिया और जापान पहुंच कर उन्होंने आजाद हिंद फौज का विस्तार करना शुरू किया। पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण करके वहां स्थानीय भारतीय लोगों से आजाद हिन्द फौज में भर्ती होने का और आर्थिक मदद करने का आहृान किया। रंगून के 'जुबली हॉल' में सुभाष चंद्र बोस ने अपने भाषण के दौरान कहा, 'स्वतंत्रता संग्राम के मेरे साथियों! स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आजादी को आज अपने शीश फूल की तरह चढ़ा देने वाले पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सकें। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा। खून भी एक-दो बूंद नहीं बल्कि इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमें में ब्रिटिश साम्राज्य को डुबो दूं।' 

6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गांधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आजाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया। इस भाषण के दौरान, नेताजी ने गांधी जी को पहली बार राष्ट्रपिता बुलाकर अपनी 'जंग' के लिए उनका आशीर्वाद मांगा। हमारा दुर्भाग्य है कि हम आज तक उस महान क्रांतिवीर की मौत के सच का पता नहीं लगा पाए हैं। अगर आज हम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो हमें भारत को सर्वोपरि रखना होगा। 

जो लोग मानवाधिकार के नाम पर याकूब मेमन की फांसी और बुरहान वानी के वध का विरोध करते हैं, जो लोग मनवतावाद के नाम पर 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' जैसे नारों का समर्थन करते हैं, जो लोग 'दलित उद्धार' के नाम पर भारतीय एकता, अखंडता तथा एकात्मता के विपक्ष में खड़े हो जाते हैं, जो लोग गौ रक्षा के नाम पर किसी निर्दोष को पीटकर अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी का बदला लेते हैं और जो लोग 'अधुनिकता' के नाम पर अश्लीलता का समर्थन करते हुए भारतीयता के विरोध में खड़े हो जाते हैं, उनको यह समझना होगा कि  21वीं सदी लिर्फ मेरे भारत की है। भारत को तो हम 'विश्वगुरु' के पद पर पुनः प्रतिष्ठित करके ही रहेंगे। अगर 'उन्होंने' साथ दिया तो उनके साथ, अगर साथ नहीं दिया तो उनके बिना और अगर विरोध किया तो उनके विरोध को 'कुचलकर', मेरा भारत, 'भारत' बनकर ही रहेगा।

बलिदान दिवस: फांसी से पहले मदन लाल ने कहा...

'मेरा विश्वास है की विदेशी संगीनों से पराधीन किया गया राष्ट्र सदैव युद्ध की स्थिति में ही रहता है। चूंकि निःशस्त्र जाति द्वारा खुला युद्ध करना असंभव है इसलिए मैंने अकस्मात हमला किया। मैंने पिस्टल निकली और गोली चला दी। मुझ जैसा निर्धन बेटा खून के अलावा अपनी मां को और क्या दे सकता है? इसीलिए मैंने उसकी बलिवेदी पर अपना बलिदान कर दिया है। आज भारतीयों को जो एकमात्र सबक सीखना है, वह है कि किस तरह मरें और यह सिखाने का एक ही तरीका है, खुद मरकर दिखाना। मेरी भगवान से एक ही प्रार्थना है कि मैं फिर से उसी मां की गोद में पैदा होऊं और जब तक हमारा लक्ष्य पूरा न हो, उसी पावन लक्ष्य के लिए दोबारा मरूं। वन्दे मातरम्।'

एक अंग्रेज अधिकारी के वध के बाद भारत के एक वीर सपूत ने यह बात फांसी के तख्ते पर खड़े होकर कही थी। 17 अगस्त,1909 को सुबह 6 बजे क्रांतिकारी मदन लाल धींगरा को फांसी दे दी गई। जब 11 अगस्त 1908 को भारत में खुदीराम बोस और उसके बाद कन्हाई दत्त सहित कई क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दी गयी तब मदन लाल ने लंदन में विनायक दामोदर सावरकर से पूछा की क्या अपनी मातृभूमि के लिए प्राण देने का यह सही वक्त है? उनके इस सवाल का जवाब देते हुए सावरकर ने कहा, 'अगर तुम सर्वोच्च बलिदान के लिए तैयार हो और तुम्हारे मन ने अंतिम मुक्ति के बारे में सोच लिया है तो निश्चित रूप से अपने राष्ट्र के लिए प्राण देने का यह सही समय है।' सावरकर की प्रेरणा से ही मदनलाल ने तत्कालीन भारत सचिव के सहायक सैनिक अधिकारी कर्जन वायली का वध करने का निर्णय लिया और 1 जुलाई 1909 को वायली का वध कर दिया। इसके बाद धींगरा ने खुद को समाप्त करने की भी कोशिश की लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

23 जुलाई 1909 को ओल्ड बेली कोर्ट में जब मदन लाल धींगरा पर मुकादमा चलाया जा रहा था तो उन्होंने कहा, 'मुझे कर्जन की हत्या का कोई अफसोस नहीं है क्योंकि मैंने ऐसा करके भारत को अमानवीय ब्रिटिश राज की गुलामी से मुक्त कराने में अपना योगदान दिया है। जबकि कावसजी को मारने का मेरा कोई इरादा नहीं था।' कावसजी लाल्काका एक पारसी डॉक्टर था जिसने वायली को बचाने की कोशिश की तो मदनलाल ने उस पर भी दो गोलियां चला दीं।

उन्होंने कोर्ट में कहा, 'मेरा मानना है कि अगर जर्मन, अंग्रेजों पर कब्ज़ा कर लें तो अंग्रेजों का जर्मनों के खिलाफ युद्ध करना ही राष्ट्रभक्ति है। ऐसे में मेरा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना और भी ज्यादा न्यायोचित और देशभक्तिपूर्ण है। पिछले 50 सालों में अंग्रेजों ने 8 करोड़ भारतीयों की हत्या की है और हर साल भारत से 100,000,000 पाउंड (8.7 अरब रुपए) धन लूटा है। मैं अंग्रेजों को अपने देशभक्त देशवासियों को फांसी देने और निर्वासित करने के लिए भी जिम्मेदार मानता हूं, मैंने वही किया था जो यहां अंग्रेज अपने देश के लोगों को करने की सलाह देते हैं। जिस तरह जर्मन्स को इस देश (इंग्लैंड) पर कब्ज़ा करने का कोई अधिकार नहीं है उसी तरह अंग्रेजों को भी हमारे भारत पर कब्ज़ा करने का कोई हक़ नहीं है। इस तरह हमारी ओर से यह पूरी तरह न्यायोचित है कि हम उन अंग्रेजों को मारें जो हमारी पवित्र भूमि को अपवित्र कर रहे हैं। मैं अंग्रेजों के इस भयानक पाखंड, तमाशे और मज़ाक पर आश्चर्यचकित हूं।'

इसके बाद मदन लाल को जज ने दोषी करार देते हुए पूछा कि क्या उन्हें कुछ कहना है कि उन्हें मृत्युदंड क्यों न दिया जाए? इस पर उन्होंने जवाब दिया, 'मैं आपको बार-बार कह चुका हूं कि मैं इस कोर्ट को मान्यता नहीं देता। आप जो चाहें कर सकते हैं मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। आज तुम गोरे लोग सर्व-शक्तिशाली हो लेकिन याद रखो कभी हमारा भी वक्त आयेगा ,तब हम जो चाहेंगे वह करेंगे।' सजा सुनाए जाने के बाद उन्होंने वीरता से कहा ,'धन्यवाद, मुझे गर्व है कि मुझे अपने देश के लिए अपने प्राण देने का सौभाग्य मिला है।'

आज 107 साल बाद मदन लाल धींगरा के बलिदान दिवस पर हम इतना तो कर ही सकते हैं कि राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को समझें। हम कहीं भी रहें, कुछ भी करें लेकिन यह मत भूलें कि जिस धरती पर हमने जन्म लिया है, जिस धरती ने हमें अन्न और जल दिया है, उसके प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारी है। आप सबसे पहले एक इंसान हैं, उसके बाद एक भारतीय और फिर अंत में उस क्षेत्र के प्रतिनिधि, जिसमें आप काम करते हैं।

Saturday, 20 August 2016

कौन हूं मैं....

इस तस्वीर को देखिए, भारत समझ में आ जाएगा।
21 साल की एक लड़की जिससे 130 करोड़ लोगों की उम्मीदें जुड़ी थीं, वह मैच हार गई तो निराश होकर गिरना स्वाभाविक था... वह गिरी...फिर चंद सेकंड बाद वह उठी और उठकर पहुंच गई उसे शुभकामनाएं देने जिससे वह हारी थी... यह है मेरा भारत और यह है मेरी संस्कृति...एक 'आप' हैं, जिससे यदि किसी के विचार न मिलें तो आप उसे 'गाली' देने लगते हैं... उस पर भड़कने लगते हैं... अरे साहब! भारत यूं ही नहीं बनता... ऐसी बेटियां बनाती हैं भारत... आपकी विचारधारा पहुंची होगी कभी बड़े-बड़े देशों तक... जीते होंगे आपने देश... हमने दिलों को जीता है... और दिलों में ही बसते हैं इसीलिए हम आज भी हैं और आप खत्म होनी की कगार पर...


एक वर्ग के लोग मुझसे कहते हैं, आप बहुत अच्छा लिखते हो, बड़े राष्ट्रवादी हो, यह मोहब्बत पर लिखना बंद कर दो, शायरी लिखना बंद कर दो... दूसरे वर्ग के लोग कहते हैं, यार कहां फालतू संस्कृति-देश के चक्कर में पड़े हो, बहुत अच्छी कहानियां लिखते हो, बहुत अच्छी शायरी लिखते हो, #क्वीन पर नॉवेल लिखो, छोड़ो यह सब...

मैं आप सबकी मोहब्बत के विश्वास पर उन दोनों तरह के लोगों को एक ही जवाब देता हूं कि आज जरूरत है कि इस देश के लड़के-लड़की किसी एक चेहरे से मोहब्बत करने के साथ-साथ वतन से भी मोहब्बत करें... आज जरूरत है कि शायरी लिखने वाले लोग भी देश के लिए लिखना सीखें, अपनी शायरी में संस्कार लाएं... आज जरूरत है कि जींस पहनने वाले लोग भी तिलक के वैज्ञानिक महत्व को समझें... आज जरूरत है कि संस्कृति की रक्षा के नाम पर प्रेम विवाह या अंतर जातीय विवाह का विरोध न किया जाए बल्कि इस बात को समझा जाए कि एक दूसरे को जितना ज्यादा बेहतर तरीके से समझने के बाद शादी होगी, जीवन के लिए उतना ही बेहतर होगा....

वतन से मोहब्बत हुई तो राष्ट्रवाद लिखना शुरू किया और जब एक लड़की से मोहब्बत हुई तो मोहब्बत पर लिखने लगा, शायरियां लिखने लगा, कविताएं लिखने लगा... इसमें क्या गलत किया... दोनों को दायित्व के रूप में लिया और आज भी दोनों से पूरी शिद्दत से मोहब्बत करता हूं और उसी समर्पण भाव से अपने मन के भावों को लिख देता हूं... चूंकि वह वास्तविक है, उसमें स्वार्थ नहीं है इसलिए लोगों को पसंद आता है...

मैं राष्ट्रवाद लिखता हूं तो संस्कृति बचाने की कोशिश करता हूं और जब मोहब्बत पर लिखता हूं तो हिंदी के संस्कार बचाने की कोशिश करता हूं। मुझे नहीं पता कि मैं आज तक कितना सफल हुआ लेकिन आप लोगों के भरोसे मैं इतना जरूर जानता हूं कि आज से 15-20 साल के बाद जब मेरी बहन की बेटी मुझसे कहेगी कि मामा जी, आपने अपनी जिंदगी में क्या किया तो मैं उससे नजर मिलाकर कह सकूं कि मैंने उन लोगों तक हिंदी का संस्कार पहुंचाया जो गर्लफ्रेंड द्वारा मेसेज का जवाब न दिए जाने पर रात भर अंग्रेजी गानों को सुनते थे, मैंने उन लोगों का भारत की गौरवशाली संस्कृति पहुंचाई जो किसी 'बुद्धिजीवी' के प्रभाव में अपने भारतीय स्वभाव को भूल गए थे...

मुझे नहीं पता कि वेदों में क्या-क्या लिखा है। मैंने पूरी तरह से वेदों का अध्ययन नहीं किया है। सच तो यह है कि मेरा स्तर ही वह नहीं है कि वेदों के मूल अर्थ को समझ सकूं लेकिन इधर-उधर से वेदों की ऋचाओं का वास्तविक अर्थ पता लगाने का प्रयास करता रहता हूं। अब तक मुझे किसी ने ऐसा न कुछ बताया जो आपत्तिजनक हो और ना ही अब तक मैं ऐसा कुछ खोज पाया। मैंने मनुस्मृति को भी नहीं पढ़ा था लेकिन जब लोग मनुस्मृति की प्रतियां जलाने लगे तो मनुस्मृति का अध्ययन करना शुरू किया। जितना मैंने समझा उसमें कुछ भी ऐसा नहीं मिला जो किसी जाति अथवा लिंग के विरोध में हो।

लेकिन हां, मैंने जिस परिवार में जन्म लिया उसमें परदादी जी,दादा जी और दादी जी रामचरित मानस का पाठ करते थे और फिर मुझे भी राम जैसा बनने को कहते थे, बचपन में मुझे राम और छोटे भाई को लक्ष्मण कहकर बुलाया जाता था। इतना कुछ होने पर बालमन में इच्छा जगती थी कि राम में आखिर ऐसा क्या है कि उनकी तरह बनने को कहा जा रहा है। उत्सुकतावश जब दादा-दादी से पूछता था तो वह सब कुछ बताते थे। जितना जाना, जितना समझा बहुत अच्छा चरित्र लगा और जब चरित्र पसंद आया तो उन्हीं के आदर्शों पर चलने का प्रयास करने लगा...

जिस विद्यालय में शिक्षा पाई, वहां पर गीता के श्लोकों और सुभाषितों से सुबह होती थी। वहां उन श्लोकों को सिर्फ रटाया नहीं जाता था बल्कि उनका अर्थ बताया जाता था, साथ ही उनकी व्यवहारिकता बताते हुए अनुसरण करना भी बताया जाता था। वहां सारी लड़कियां बहनें होती थीं जो एक सगी बहन की तरह ही प्रेम देती थीं।

जिस संगठन से जुड़ा उसने सकारात्मकता दी, उसने बताया कि क्यों अपनी संस्कृति पर गर्व करें। लेकिन वहां मुझे कभी नहीं कहा गया कि दूसरों को गाली दो, वहां मुझे कभी नहीं कहा गया कि सिर्फ हम अच्छे हैं। वहां पर सिर्फ यही कहा गया कि सबका अपना विशिष्ट महत्व है, स्थान के अनुसार प्रासंगिकता बदल जाती है... उनके लिए यह उचित नहीं हो सकता और यहां के लिए वह ठीक नहीं हो सकता।

मुझे जो कुछ मिला, उससे बेहतर नहीं मिल सकता था और शायद इसी कारण आज जब किसी के सामने खड़े होकर बात करता हूं तो नजरें नीचे नहीं करनी पड़ती...  शीशे के सामने खड़े होने पर खुद से नजर मिला पाता हूं और इसी वजह से आपकी झल्लाहट पर भी शांत भाव से आपके बीच में खड़ा रहता हूं। शायद यही वजह है कि मैं 'आप' को पसंद नहीं आता...क्योंकि 'आप' अपने कर्मों की वजह से, अपने विचारों की वजह से लोगों से नजर नहीं मिला पाते और आपको लगता है कि जब मैं लोगों के सामने खड़े होने की क्षमता नहीं रखता तो यह कैसे खड़ा रहता है...

लोग मुझसे कहते हैं तुमने क्या किया है, तुम क्या करोगे? मैंने अब तक जो भी किया है, उससे पूर्ण रूप से संतुष्ट हूं। स्कूल में जब मोहब्बत हुई तो पूरी शिद्दत से की... सिर्फ मोहब्बत की... सब-कुछ छोड़ दिया... मोहब्बत की तो ऐसे की कि जब वह लड़की पहली बार किसी की बाहों में गई तो उससे बोली कि प्यार कर रहे हो तो गौरव की तरह करना। वह बेचारा इतना परेशान हो गया कि मुझे फोन लगाकर हमारे रिश्ते के 'स्तर' के बारे में पूछने लगा... जब सच बताया तो बस यही कह पाया कि 'अजीब' हो दोस्त...वह लड़की अब मेरे साथ नहीं है लेकिन आज भी उसी निष्ठा से प्यार करता हूं... मोहब्बत की तो ऐसे की, कि इतने सालों बाद आज जब #क्वीन पर लिखना शुरू किया तो अगर बीच में कुछ दिन न लिखूं तो पचासों मेसेज यह पूछने के लिए आ जाते हैं कि मैं अपनी #क्वीन के बारे में लिख क्यों नहीं रहा...

यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान निःस्वार्थ भाव से छात्रों के लिए संघर्ष किया, लाठियां खाईं, घरवालों से मार खाई... 'नेतागिरी करते हो' कहकर पापा ने बात करना बंद कर दिया फिर भी मैं वही करता रहा जो कर रहा था... मेरे साथ के लोग एडमिशन के नाम पर, पास कराने के नाम पर छात्रों से खूब पैसे लेते थे, मैं भी वह सब कर सकता था, इतना सक्षम था, लेकिन नहीं किया...

एक दिन मन में आया कि जब इन सब में कोई भविष्य नहीं बनाना है तो फिर क्यूं यह सब कर रहा हूं लेकिन उसी शाम जब विश्वविद्यालय में आरटीआई आंदोलन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जमकर पीटा और गिरफ्तार करके ले जाने लगी तो पुलिस की गाड़ी के सामने वे लड़कियां जिनसे मेरा कोई रिश्ता नहीं था, जिनके मैं नाम तक नहीं जानता था, सैकड़ों की संख्या में लेट गईं... थाने में पुलिस मुझे लेकर पहुंची तो मेरे घरवालों से पहले वे लड़कियां पहुंच कर बैठ गईं...लखनऊ जैसी जगह में थाने में जब उन्होंने चीखना शुरू किया कि जब तक भईया को नहीं छोड़ा जाएगा तब तक नहीं जाएंगे तो अहसास हुआ कि जो कर रहा हूं वह सही है...

सोशल मीडिया पर ऐक्टिव हुआ तो दिन में 14-14 घंटे फेसबुक चलाता था... इतना 'कड़वा' लिखा कि फेसबुक ने आईडी ही बंद कर दी। 2008 का वह दौर जब साथ के लोग फेसबुक के बारे में जानते नहीं थे तब एक-एक पोस्ट पर सैकड़ों की संख्या में लाइक आते थे, मेरी टाइमलाइन से शेयर की गई तस्वीरों पर हजारों की संख्या में शेयर आते थे... लोगों ने साइबर सेल में केस किए... लोगों ने धोखे से बुलाकर पीटा लेकिन हार नहीं मानी, लिखना बंद नहीं किया... कल रात तक 16 बहनें राखियां भेज चुकी हैं... मेरी कलाई पर मेरी सगी बहन की राखी तो सजी लेकिन जिनसे कभी नहीं मिला, सिर्फ सोशल मीडिया पर बात हुई, वे राखी भेजना नहीं भूलीं... ऑफिस और कॉलेज की व्यस्तताओं के चलते पिछले 4 सालों से रक्षाबंधन पर अपनी एकलौती बहन को हर बार बहाने बताकर टाल देता हूं लेकिन इन बहनों की राखियां कभी मुझे अपनी नजरों में 'अपराधी' जैसा महसूस नहीं होने देतीं।

जब किसी लड़की को 'बहन' कहकर संबोधित करता था तो एक बार को तो लड़कियां हैरत में पड़ जाती थीं क्योंकि दिनभर भद्दे-भद्दे कॉमेंट सुनने वाले को अगर उन्हें कोई इस तरह से संबोधित कर रहा है तो निश्चित ही हर लड़के को एक जैसा समझने का उनका भ्रम तो टूट ही जाता था। और क्या कहकर संबोधित करता... किसी को गर्लफ्रेंड तो बना नहीं सकता...एक लड़की को ही  सब कुछ जो मान चुका हूं... उसके बाद 'समर्पित' रिश्ते के नाम पर बस यही एक रिश्ता बचता है। मैं जहां पला-बढ़ा वहां पर तो दुकान वाले को भी चाचा जी और सफाई करने वाली महिला को बुआ जी कहा जाता था... न सिर्फ कहा जाता था बल्कि इसी के अनुरूप सम्मान भी दिया जाता था। अब अगर अपनी पुरातन परंपरा का निर्वहन करते हुए किसी को बहन कहता हूं तो क्या गलत कहता हूं।

लेकिन अब दिल्ली में यह भी गलत लगने लगा... यहां ऐसी लड़कियां भी मिलीं जिनको बहन कह दो तो 'तंज' कसने लगती हैं। उनको आपत्ति इस बात से नहीं होती कि उन्हें किस संबोधन से संबोधित किया जा रहा है बल्कि उन्हें आपत्ति इस बात से होती है कि कोई 'अपना' कैसे बन सकता है...उनको डर लगता है अपनेपन से... पता नहीं अपनेपन से डर लगता है कि इस बात को लेकर परेशान रहती हैं कि इतना सजने संवरने की कोशिश करने के बाद भी कोई 'भाव' क्यों नहीं दे रहा है। रिश्तों को बाजारू घोषित करने में लगी रहती हैं....
पीड़ा होती है यार, आखिर मेरा भारत जा कहां रहा है....

भारत मांगे आजादी, हम ले के रहेंगे आजादी

आजादी, हर एक व्यक्ति के लिए इस शब्द के अलग-अलग मायने हैं? जेल में कैद एक व्यक्ति के लिए जेल से बाहर निकलना आजादी है तो भारत के कुछ प्रगतिशील छात्रों के लिए ‘अफलज के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाना’ आजादी है। लेकिन इन सबके बीच भारत की बेटियां जब आजादी की बात करती हैं तो मन में सवाल उठता है कि आखिर उनके लिए ‘आजादी’ क्या है? यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि इस ‘आजादी’ की मांग करने वाली लड़कियां किसी पिछड़े गांव से ताल्लुक नहीं रखती हैं, जहां उन्हें जींस नहीं पहनने दी जाती है या जहां उन्हें पढ़ने से रोका जाता है या फिर जहां उन्हें ‘संस्कृति’ के नाम पर किसी लड़के से बात करने की भी मनाही होती है बल्कि इस आजादी की मांग वे लड़कियां करती हैं जिन्होंने देश की राजधानी दिल्ली में उच्चस्तरीय शिक्षा पाई है, जो अपने मन मुताबिक कपड़े पहन सकती हैं और किसी भी समय, किसी के भी साथ कहीं भी जा सकती हैं।

उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश में महिलाओं का एक ऐसा वर्ग भी है जिसे पढ़ने नहीं दिया जाता, जिसे सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन समझा जाता है और जो आज भी अपनी शादी से पहले अपने होने वाले पति से बात तक नहीं कर सकती। तो क्या करें? क्या महिलाओं यानी स्त्रियों को ‘आजादी’ दे दी जाए। बिल्कुल, मेरा मानना है कि महिलाओं को आजादी मिलनी चाहिए लेकिन उस आजादी की एक ‘परिधि’ होनी चाहिए ताकि स्वतंत्रता और स्वछंदता का अन्तर बना रहे। इस अंतर का बना रहना भी जरूरी है क्योंकि यदि यह अंतर समाप्त हो गया तो नारी का ‘स्त्रीत्व’ समाप्त हो जाएगा।

लेकिन क्या स्त्रीत्व का अर्थ सिर्फ बच्चे पैदा करना है? क्या महिला बच्चे पैदा करने की मशीन है? बिल्कुल नहीं। बच्चे पैदा करने से सिर्फ स्तनों में दूध आता है। तो फिर आखिर स्त्रीत्व के मायने क्या हैं? एक छोटी सी सच्ची घटना सुनाता हूं।

एक बार मेरी तबीयत बहुत खराब हो गई। घर के सभी लोग तीर्थ यात्रा पर गए हुए थे। सिर्फ पिता जी और मैं घर पर थे। मैं अपनी परीक्षाओं की वजह से और पिता जी अपने काम की वजह से परिवार के साथ नहीं जा सके थे। मेरा और मेरे पिताजी का संवाद बहुत अधिक नहीं होता था। मैं अपने बाबा-दादी जी के अधिक निकट था। माता जी के देहान्त के बाद मुझे मेरी दादी जी से मां का प्रेम मिला था। उस दिन जब मेरी तबियत खराब हुई तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। आखिरकार मैंने पिता जी को फोन कर अपनी स्थिति बताई। वह कहीं बाहर थे तो उन्होंने घर के पास रहने वाली एक लड़की को फोन करके मेरे पास भेजा। वह लड़की मुझसे 4-5 साल बड़ी रही होगी। मैं उन्हें दीदी कहकर बुलाता था।

उस दिन जिस तरह से उन्होंने मुझे संभाला, मुझे लगा जैसे मेरी मां मेरे पास है। उनकी शादी नहीं हुई थी, उनके बच्चे भी नहीं थे और वर्तमान में वह भारतीय सेना में कार्यरत हैं। एक स्त्री के तौर पर उनमें क्या खास था? उनका वात्सल्य… यही उन्हें स्त्री बनाता था।

एक महिला और एक पुरुष में बहुत अंतर होता है। वह अंतर सिर्फ यह नहीं हो सकता कि महिला बच्चे पैदा करती है और पुरुष नहीं कर सकते। वह अंतर होता है, भाव का। मातृत्व भाव होने के लिए, वात्सल्य भाव होने के लिए बच्चे पैदा करना आवश्यक नहीं। लेकिन यदि आप हर वह काम करती हैं जो पुरुष करते हैं और आप में वात्सल्य भाव समाप्त हो गया है तो आप स्त्री कहां बचीं? फिर तो आप पुरुष ही हो गईं। शारीरिक बनावट तो कोई मायने रखती नहीं। क्या आप सिर्फ अपनी शारीरिक बनावट के आधार पर खुद को ‘खास’ बताना और जताना चाहती हैं? ऐसे में सिर्फ एक ही अंतर रह जाता है कि आपको ‘पीरियड्स’ आते हैं और मुझ जैसे पुरुषों को नहीं।

स्त्रीत्व मात्र एक भाव है जो आपको मुझसे श्रेष्ठ बनाता है। आपके समर्पण को प्रणाम करता हूं। परंतु यह समर्पण तब तक ही है जब तक आपमें स्त्रीत्व शेष है, आपमें वात्सल्य शेष है। आजादी के नाम पर यदि आप स्वछंदता चाहती हैं तो विश्वास मानिए आप मुझे या पुरुषों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रही हैं बल्कि आप मेरे ‘भारत’ की अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह लगा रही हैं। माफ कीजिएगा लेकिन भले ही आपको आजादी के नाम पर अश्लीलता पसंद हो लेकिन यह तथाकथित आधुनिकता रूपी अश्लीलता मेरे देश के हित में नहीं है और मेरे साथ-साथ आपकी भी जिम्मेदारी है कि देश के प्रति, देश की संस्कृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें।

मुझे गर्व है कि मेरे देश का प्रधानमंत्री आज बेटियों के लिए इतना कुछ कर रहा है। मुझे गर्व है कि मेरे देश की सरकार उनकी पढ़ाई के लिए, उनकी सुरक्षा के लिए सरकारी योजनाएं ला रही है। लेकिन अगर आप चाहती हैं कि ‘फ्री सेक्‍स’ जैसी चीजों के लिए भी सरकार योजनाएं लाए तो मेरा करबद्ध निवेदन है कि बहुत से देश हैं जहां ये सब सामान्य है, वहां चली जाइए क्योंकि मेरा भारत और मेरे भारत की बेटियां ये नहीं चाहतीं।

यह मेरे देश का दुर्भाग्य है कि मेरे देश के कुछ लोग गरीबी, वंशवाद, रूढ़िवाद, परिवारवाद, जातिवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद और पुरुषवाद से आजादी के नाम पर एक खास ‘विचार’ को देश पर थोपना चाहते हैं। इन सभी ‘वादों’ से आजादी मेरे भारत को भी चाहिए लेकिन वह आजादी अगर अपने साथ वैश्विकता और आधुनिकता के नाम पर एक कुत्सित मानसिकता लेकर आती है तो भले ही कुछ समय के लिए ‘आजाद’ हो जाएं लेकिन वह आजादी भारत की आत्मा को मार देगी।

मेरा भारत ‘आजादी’ चाहता है लेकिन अब वह आजादी किसी ‘वामपंथ’ के कंधे पर सवार होकर नहीं आनी चाहिए। उस आजादी को साथ चाहिए भारतीयता का, क्योंकि मेरे भारत का आधार भारतीयता है, वह भारतीयता जिसमें रिश्ते हैं, रिश्तों में मर्यादा है, मर्यादा में विश्वास है, विश्वास में प्रेम है और प्रेम में समृद्धता है। समृद्ध भारत के लिए ‘भारतीयता’ का बचा रहना बहुत जरूरी है इसलिए आइए और भारतीयता को केन्द्र में रखकर भारत को ‘आजाद’ कराएं।

श्रीराम-रावण मंदिर से ज्यादा भी कुछ है क्या?

मैं फिलहाल गौतमबुद्ध नगर जिले में रहता हूं। मेरे ही जिले में स्थित बिसरख गांव के गणेश मंदिर, राम परिवार मंदिर, राधा कृष्ण मंदिर, मां दुर्गा मंदिर, हनुमान मंदिर, शनि मंदिर और साथ में रावण मंदिर बनने की चर्चाएं नैशनल मीडिया में होती रहती हैं। सामान्य बात थी हमारे लिए, बचपन से सुनते थे कि श्रीलंका में रावण की पूजा होती है। बस यही सोचते थे कि वहां का राजा था, वहां के लोगों के लिए तो अच्छा किया ही होगा। प्रत्येक अच्छे राजा के रूप में उसने भी अपना धर्म निभाया होगा और अपनी जनता को खुश रखा होगा। लेकिन एक बार वास्तविक निष्पक्ष होकर उन चरित्रों का विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं, जिनकी मूर्तियां इस देश में बन रही हैं। दो चरित्र जो समकक्ष हैं, वे हैं राम-रावण। राम वह जिनकी पत्नी का अपहरण हो गया था और रावण वह जिसमें बहुत सी अच्छाइयां थीं लेकिन बस एक गलती हो गई कि सीता जी का अपहरण कर लिया। ऐसा सोच रहे हैं क्या आप?

या फिर यह कि आखिर रावण तो रावण था, उसने अपहरण किया तो श्रीराम ने दंड दे दिया, सृष्टि का विधान है कि इसी जन्म में दंड मिलता है तो मिल गया। अब चूंकि श्रीराम अच्छाई के प्रतीक हैं और उन्होंने कालांतर में रावण का वध किया था तो रावण का मंदिर नहीं बनना चाहिए लेकिन राम मंदिर तो बनवा के रहेंगे। अयोध्या में श्रीराम का मंदिर तो इन्हीं पांच सालों में बनवा लेंगे या फिर अगले चुनाव के बाद फिर उन्हीं पुराने लोगों को इन कुर्सियों पर बैठा देंगे। हम तो गोडसे का मंदिर बनवाएंगे, यही हमारी आजादी है। ऐसा सोचते हैं क्या आप?
या फिर एक बड़े ‘बुद्धिजीवी’ के रूप में सोचकर कहेंगे, ‘राम वह जिनकी पत्नी का अपहरण हो गया था और रावण वह जिसमें बहुत सी अच्छाइयां थीं लेकिन बस एक गलती हो गई कि सीता जी का अपहरण कर लिया। हम उसमें भी अच्छाई देखेंगे। उसमें ज्ञान था, उसने अपनी बहन के लिए जो किया-वह किया, वह एक अच्छा भाई था, शिव भक्त था…और भी बहुत कुछ। इसलिए उसी अच्छाइयों के आधार पर राम के साथ रावण ‘जी’ की भी मूर्ति होनी चाहिए। हम अच्छाई-बुराई का अंतर समाप्त कर देंगे। आप लोग पूजा करते हो राम के साथ रावण की क्यों नहीं कर सकते?’

अगर आप आज इस ब्लॉग को पढ़ते समय इनमें से किसी रूप में भी सोच रहे हैं तो आप इस देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं। आज देश एक नई दिशा में अग्रसर है। जिस विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित होने का स्वप्न भारत की वीर हुतात्माओं ने देखा था, आज लग रहा है हम वह बन सकते हैं। विश्व के सबसे युवा देश को भावी भविष्य अपनी बांहों में भरने के लिए तैयार खड़ा है। अब या तो हम यहां राम मंदिर-रावण मंदिर के लिए लड़ लें या फिर अपने अधिकारों के साथ-साथ दयित्वों का निर्वहन करते हुए नए ‘डिजिटल भारत’ को विश्व पटल पर प्रतिस्थापित करने के लिए अपने स्तर पर योगदान दें। निर्णय हम पर निर्भर करता है। मुझे अपने विवेक के आधार पर लगता है कि अभी भारत इस स्थिति में नहीं है कि वह श्रीराम जैसे मर्यादा का प्रतीक माने जाने वाले चरित्र के मंदिर का बोझ झेल सके।

मैं यह नहीं कहता कि हम अपनी संस्कृति से विमुख होकर मंदिर निर्माण करना या पूजा करना बंद कर दें लेकिन मैं इतना जरूर कह रहा हूं कि उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग पैसे देकर मंदिर में अपने खड़े होने की जगह तय करते हैं। उस देश में श्रीराम मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां आप राम के मूल चरित्र के विपरीत जाकर मंदिर में ही तोड़फोड़ करते हों। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग गौ रक्षा के नाम पर अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी निभातें हों या व्यक्तिगत कुंठा निकालते हों। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग एक जाति को ऊंचा और दूसरी को नीचा समझ कर उसी राम को ठुकरा देते हों जिसके मंदिर के लिए वे तलवारें लेकर तैयार रहते हों। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग एक कौम को सिर्फ इसलिए आतंकवाद से जोड़ देते हैं क्योंकि उसी इबादत पद्धति में तथाकथित विश्वास रखने वाले कुछ लोग आतंकवाद के रास्ते पर हैं। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग मानवाधिकार के नाम पर एक आंतकवादी का जनाजा निकालते हों। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग बुराई के प्रतीक माने जाने व्यक्ति को ‘दलितों’ का मसीहा बताकर उसके नाम पर ‘महिषासुर दिवस’ मनाते हों। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग नारीवाद और आधुनिकतावाद के नाम पर स्वछंदता का समर्थन करते हों।

उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग अपनी मर्यादा भूलकर अपने शब्दों और अपनी भाषा शैली पर नियंत्रण न रख सकें। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग पूरी दुनिया से उल्टा चलते हों और हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजतें हों। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीते हों। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकते हों। उस देश में मंदिर का कोई अर्थ नहीं जहां लोग किसी परमशक्ति के न होने के अंधविश्वास में अपने नश्वर शरीर को ही परमशक्तिशाली मानते हों।

आज आवश्यकता है कि राम-रावण के मंदिर के झगड़े में न पड़कर अपने दायित्व का निर्वहन करें। पहले राम के मूल चरित्र को अपनाएं। हां, अब हो सकता है कि कोई कहे कि हम तो रावण के चरित्र को मानेंगे, वह भी तो ज्ञानी था। ठीक है साहब! अच्छाई ही माननी है तो मानो, लेकिन अभी मंदिर वगैरा के मामले में मत फंसाओ सबको। अभी सिर्फ भारत बनाने दो। मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा-चर्च इत्यादि बाद में बैठकर तय कर लेंगे, हमारे घर के अंदर का मामला सुलझा लेंगे। मंदिर इत्यादि बनने का समय आने तक हमें इन चरित्रों के विश्लेषण का मौका दीजिए और आप भी एक बार निष्पक्ष होकर एक चरित्र के रूप में ठीक से इन चीजों का अध्ययन करिए। और हां, इस अध्ययन के दौरान इस तस्वीर में जिन महान लोगों की तस्वीरें लगी हैं, उनका इतिहास पता कर लें तो शायद आपके आधे से अधिक भ्रम खत्म हो जाएं।
बैनर रावण मंदिर(1)

नारीवाद के नाम पर आपको अश्लीलता चाहिए क्या?

नारीवाद, आखिर इस ‘विचारधारा’ के मायने क्या हैं? क्या नारीवाद का अर्थ यह है कि आप आधुनिकता के नाम पर नग्नता का समर्थन करें या फिर यह कि आप नारी के महत्व को समझें और अपने व्यवहार में नारी के समर्पण के प्रति सम्मान रखें। यदि नारीवाद का अर्थ पिछले वाक्य में लिखा गया पहला भाग है तो विश्वास मानिए वैसा नारीवाद भारत के लिए और भारतीय नारी के अस्तित्व के लिए एक जहर है। और यदि नारीवाद का अर्थ उस वाक्य का दूसरा हिस्सा है तो वह भारतीयता के मूल सिद्धान्त का प्रतिरूप ही तो है। कुछ समय पहले ‘एक गुजारिश है, आधुनिकता अपनाएं लेकिन नग्नता नहीं‘ शीर्षक से एक ब्लॉग लिखा था। इस ब्लॉग को पढ़कर आप समझेंगे कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में वास्तविक नारीवाद क्या होता है।

जब मैं दुनिया समझने वाला हुआ तब मेरी मां मेरे साथ नहीं थीं। मुझे नहीं पता कि मां का प्रेम क्या होता है, लेकिन एक महिला या लड़की के रूप में मुझे यदि सबसे अधिक स्नेह किसी से मिला है तो वह मेरी बहन है। आज भी उसी प्रेम की चाह में मैं हर एक लड़की में अपनी बहन को खोजता हूं। मैं प्रयास करता हूं कि मैं जितना समर्पण भाव अपनी बहन के प्रति रखता हूं, उतना ही अन्य महिलाओं के प्रति रख सकूं। क्या ‘नारीवाद’ का पैमाना यह नहीं हो सकता? क्या ‘नारीवाद’ का पैमाना सिर्फ यह हो सकता है कि आप किसी लड़की को नग्नता के चरम पर पहुंचने में अपना सहयोग करें।

नारीवाद के वर्तमान संरक्षकों को विज्ञापनों में जिस तरह से नारी की देह को बेचा जा रहा है, वह नहीं दिखता। क्यों? क्योंकि उनको तो वही देखना है न! उनको जो देखना है उस पर नारीवाद का चोंगा डालकर देखने के लिए जो भी कर पाएंगे करेंगे ही। लेकिन यदि उस रूप में उनकी पत्नी, बेटी अथवा बहन आना चाहेगी तो फिर बैठकर रोएंगे। उनके विशिष्ट ‘नारीवाद’ के पैमाने तब बदल जाएंगे। आज के टीवी सीरियल्स में जिस तरह से ‘इसकी पत्नी उसके साथ और उसकी पत्नी इसके साथ’ वाली परंपरा को आज के तथाकथित नारीवादी चटखारे लेकर देखते हैं, नारी के उसी रूप को यदि उनकी पत्नी आत्मसात कर ले तो? इस प्रश्न का जवाब संभवतः वे नहीं दे सकते। और देंगे भी कैसे, जब अपने घर का विषय आता है तो फर्जी सिद्धान्त की बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं ध्वस्त हो जाती हैं।

2 दिन पहले संघ के एक समवैचारिक संगठक राष्ट्रीय सेविका समिति के एक कार्यक्रम में वक्ता ने कहा, ‘महिलाओं को अपने अधिकारों अधिक दायित्व के विषय में सोचना चाहिए। उन्हें सीता और द्रौपदी को आदर्श मानना चाहिए।’ स्वाभाविक है कि इस बयान को सुनने के बाद मन में प्रश्न उठेगा कि भाई कोई सीता और द्रौपदी जैसी महिलाओं को आदर्श क्यों माने? मेरा मानना है कि हर एक नारी जिसने कुछ अच्छा किया है, उससे सकारात्मक कर्तव्यों तथा अधिकारों को सीखना चाहिए। इस बात में कोई संदेह नहीं कि मध्यकाल के बाद भारतीय नारी की स्थिति बहुत खराब हो गई थी लेकिन उन कठिन परिस्थितियों में भी जिन नारियों ने संघर्ष करते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत किया क्या उन्हें आदर्श नहीं माना जा सकता?
सीता की बात आई तो क्या हम सिर्फ इसलिए उन्हें नकार दें क्योंकि उनकी चर्चा आरएसएस के विचार परिवार से जुड़े एक संगठन की कार्यकर्ता ने की है? क्या सीता को सिर्फ इसलिए नकार दें कि वह एक विशेष पूजा पद्धति में विश्वास करने वालों द्वारा ‘मां’ अथवा ‘देवी’ मानी जाती हैं। मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं कि जिन्हें एक विशेष वर्ग ‘भगवान’ कहता है, मैं उन्हें एक चरित्र मानता हूं और मैंने उनको जितना पढ़ा है उसके आधार पर वे मुझे मुझसे कई गुना बेहतर लगे।

बात सीता जी की है तो क्या उनमें कुछ भी ऐसा नहीं था जो हम अनुसरण कर सकें। जब श्रीराम वनवास जा रहे थे तब वह चाहते थे सीता जी मां कौशल्या के पास ही रुक जाएं। जबकि सीता श्रीराम के साथ वनवास जाना चाहती थीं। कौशल्या भी चाहती थीं कि सीता वन न जाएं। इस विषय पर सीता की इच्छा और श्रीराम तथा कौशल्या की इच्छा अलग-अलग थी। आज के समय में सास, बहू और बेटा, इन तीनों के बीच मतभेद होते हैं तो परिवार में तनाव बढ़ जाता है, लेकिन रामायण में श्रीराम के धैर्य, सीता जी और कौशल्या जी की समझ से सभी मतभेद दूर हो गए। क्या आज की नारी अपने परिवार में समन्वय स्थापित करने के लिए सीता जी से नहीं सीख सकती?

एक अन्य प्रसंग आता है कि केवट की नाव में जब सीता जी ने श्रीराम के चेहरे पर संकोच के भाव देखे तो यह देखते ही सीता जी समझ गईं कि राम, केवट को कुछ भेंट देना चाहते हैं, लेकिन उनके पास देने के लिए कुछ नहीं था। यह बात समझते ही सीता ने अपनी अंगूठी उतारकर केवट को देने के लिए आगे कर दी। क्या इस बात से यह नहीं सीखा जा सकता कि पति और पत्नी के बीच ठीक समझ कैसी होनी चाहिए? वैवाहिक जीवन में दोनों की आपसी समझ जितनी मजबूत होगी, वैवाहिक जीवन उतना ही ताजगी भरा और आनंददायक बना रहेगा। इस बात से तो कोई नारीवादी इनकार नहीं कर सकता न?

रही बात द्रौपदी की तो मैंने उस चरित्र का बहुत अधिक अध्ययन तो नहीं किया है लेकिन क्या आज के समय में एक महिला अपनी ‘सास’ के प्रति ऐसा समर्पण रख सकती है कि उसके एक बार कहने पर पांच पुरुषों को अपना पति स्वीकार कर ले। मैं यह नहीं कहता कि आज के समय में वह सही रहेगा लेकिन उन जैसे समर्पण भाव का एक सकारात्मक पक्ष तो अपनाया जा सकता है ना।

हर वह काम जो एक पुरुष कर सकता है, उसे स्त्री भी कर सकती है। यह स्त्रियों का अधिकार नहीं उनकी क्षमता है लेकिन यदि स्त्रियों का वात्सल्य खो गया तो विश्वास मानिए स्त्री, स्त्री न रहकर पुरुष बन जाएगी। अपने अधिकारों के साथ भारतीय नारित्व के मूल स्तंभ को भी यदि आपने बचाकर रख लिया तो यह सोने पर सुहागा कहा जाएगा। भारतीय संस्कृति में नारी की विशिष्टता का मूल आधार महिलाओं का सतीत्व और उनकी मर्यादा रही है। यहां संभव है कि आप मेरे ‘सतीत्व’ शब्द को सती प्रथा से जोड़ दें लेकिन सती शब्द का अर्थ भारतीय सनातन परंपरा में अपने कर्म तथा धर्म के प्रति समर्पण होता है। आज घर में रहकर खाना बनाना या बच्चे को संभालना ही कर्म अथवा धर्म नहीं कहा जा सकता। आज आवश्यकता है कि आप हमारे साथ चलें, इसलिए आज धर्म वही है, आखिर इस भारतीय परंपरा में दायित्व ही तो धर्म है। आज जो आप हमारे साथ मिलकर पूरी शिद्दत के साथ कर रही हैं वही आपका धर्म है और मुझे वास्तव में आपके संघर्ष पर गर्व होता है। आपके समर्पण को नमन है लेकिन आप अगर यह भी चाहती हैं कि मेरे साथ-साथ विश्व भी आपके समर्पण को नमन करे तो अनिवार्य रूप से मर्यादा और शक्ति के मूल स्वरूप के बीच का सामन्जस्य बरकरार रखना होगा।

नारी को भले ही देवी न बनाएं लेकिन कम से कम उन्हें पुरुष भी न बनाएं क्योंकि यदि वे पुरुष बन गईं तो सृष्टि समाप्त हो जाएगी।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...