Saturday, 5 November 2016

'कायर' की मौत पर राजनीति करनेवालों की संवेदनहीनता

28 अक्टूबर 2016, दिवाली के 2 दिन पहले…

मनदीप सिंह, भारतीय सेना का एक जवान, पाकिस्तान ने मनदीप का शव क्षत-विक्षत कर दिया। शहादत से पहले मनदीप को दिवाली पर घर जाने की छुट्टी मिली थी लेकिन सीमा पर चल रहे तनाव के कारण बाद में छुट्टी रद्द हो गई। मनदीप ने एक नया मकान बनवाया था और उनकी इच्छा थी कि दिवाली पर इस घर में गृह प्रवेश किया जाए लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जिस घर में वह गृहप्रवेश का सपना देश रहे थे, उसी में उनका शव रखा गया। मनदीप हरियाणा के कुरुक्षेत्र के रहने वाले थे।

पिछले कुछ दिनों में औसतन हर दूसरे-तीसरे दिन में कोई ना कोई भारतीय जवान शहीद हो रहा है। किसके लिए? मेरे और आपके लिए, उन संवेदनहीन नेताओं के लिए जो लाशों पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से परहेज नहीं करते। मनदीप की शहादत के 2 दिन बाद दिवाली थी। दिवाली के एक दिन पहले महाराष्ट्र के निवासी नितिन सुभाष भी पाकिस्तान की फायरिंग में शहीद हो गए। ये तो सिर्फ 2 नाम हैं। पिछले कई दिनों में भारत ने कई बेटे खोए।

vishva gaurav
इस दिवाली पर भी मैं हर बार की तरह मैं अपने घर से दूर एक नई जगह पर था। मुझे दिवाली का बेहद बेसब्री से इंतजार रहता है। कुछ अनजाने और अपरिचित बच्चों के साथ खुशियां बांटने के उद्देश्य से इस बार दिवाली पर मैं जयपुर पहुंच गया। सुबह जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर से कुछ सकारात्मक ऊर्जा लेकर बच्चों के बीच पहुंचा। लेकिन मंदिर में अचानक मेरे मन में एक बात आई। सुबह का 4 बजकर 5 मिनट, भगवान की मूर्ति के सामने हजारों झुके हुए सिर, कोई बच्चों के लिए कुछ कामना लेकर आया होगा, तो कोई परिवार के लिए। किसी की कामना आर्थिक होगी तो किसी की सामाजिक….उन हजारों सिरों में कुछ सिर उनके भी तो रहे होंगे जिनके बच्चे, भाई, बेटे इत्यादि रिश्तेदार हमारे लिए, हमारी रक्षा के लिए, हमारी शांति के लिए उस सुबह सीमा पर तैनात होंगे। मन में यह ख्याल आते ही मैं बस उन सैनिकों की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करके मंदिर से बाहर आ गया।

पता नहीं क्यों, लेकिन इस दिवाली पर बहुत सूनापन लग रहा था। उस रात पटाखों के शोर के बीच होठों पर मुस्कराहट नहीं बल्कि आंखों में उस बेटी का चेहरा था, जिसके पिता का शव दिवाली से 1 दिन पहले तिरंगे में लिपटकर घर आया था। रोशनी में जगमगाते उस गुलाबी शहर में हजारों दीपों के प्रकाश के बीच उन घरों का ख्याल अनायास ही दस्तक दे रहा था, जिनके घर पर चंद रोज पहले ही अमावस की काली घटा छा चुकी थी…
मैं अकेला छत पर बैठकर सोच रहा था कि क्या दिवाली की रात वह मां दीपक से काजल बना पाई होगी, जिसकी आंखें एक दिन पहले ही अपने बेटे के शव को देखकर पथरा चुकी हैं? क्या वह बहन दिवाली के 2 दिन बाद आने वाले भाई दूज के त्योहार के बारे में नहीं सोचकर नहीं रोई होगी, जिसके भाई ने रक्षाबंधन सूनी कलाई को देखते हुए फोन पर अपनी बहन से वादा किया था कि वह भाईदूज पर घर जरूर आएगा, लेकिन उससे पहले उसका शव आ गया? क्या उस रात वह पिता ‘लक्ष्मी’ की कामना कर पाया होगा, जिसका बेटा सेना में जाने के लिए रोज सुबह उठकर मैदान में दौड़ने जाता है? क्या उस दिन वह भाई उन खुशियों में शामिल हो पाया होगा, जिसके भाई ने होली पर वादा किया था कि वह इस बार जमघट पर उसके साथ पतंग जरूर उड़ाएगा।

ऐसे बहुत सारे सवाल थे लेकिन इन सवालों के बीच सड़क पर पटाखे जला रहे लोगों को देखकर एक सवाल यह भी था कि लाखों रुपये पटाखों पर बर्बाद करने वाले क्या इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि उन परिवारों को अकेला छोड़ दें जिनके घर का चिराग इसलिए शहीद हो गया ताकि ये लोग खुशियां मना सकें। नेता से लेकर अभिनेता तक, सभी दिवाली के जश्न में व्यस्त थे, किसी को उनकी परवाह नहीं थी। शायद रही भी हो, शायद उन्होंने भी ईश्वर से उन सैनिकों की सलामती के लिए दुआएं मांगी हों लेकिन पिछले 3 दिनों में ‘शहीद’ की जो व्याख्या की जा रही है, नेता जिस तरह से एक ‘कायर’ के शव के पास, उसके घर पर जमघट लगाए हुए हैं, उससे मन में एक सवाल तो जरूर उठता है कि क्या एक पूर्व सैनिक की आत्महत्या, सीमा पर दुश्मन की गोली से मारे गए सैनिक से बड़ी है?

5 दिन पहले ही मनदीप का अंतिम संस्कार हुआ। दिल्ली से जितनी दूरी भिवानी की थी, उतनी है कुरुक्षेत्र की भी। लेकिन केजरीवाल से लेकर राहुल गांधी तक, किसी को भी मनदीप के अंतिम संस्कार में शामिल होने की फुर्सत नहीं मिली। उस शहीद के घर कोई नहीं गया, क्या इसलिए क्योंकि उससे इनके वोटबैंक को कोई लाभ नहीं होने वाला था?

वैसे इन लोगों से मुझे ऐसे किसी ‘सत्कर्म’ की अपेक्षा भी नहीं थी। क्योंकि इनकी अग्रज पीढ़ियों ने तो बाटला हाउस में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए मोहन चंद शर्मा को शहीद तक नहीं माना था। इनकी माता जी तो आतंकियों के लिए रात भर अपने पल्लू भिगोती रही थीं। आज इनको एक कायरतापूर्ण कदम को शहादत बताने में कोई हिचक नहीं हो रही है लेकिन ये लोग मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित होने वाले 3 सितंबर 2015 में शहीद हुए लांस नायक मोहन नाथ गोस्वामी की विधवा से किए सारे वादे भूल गए। आज भी उत्तराखंड में कांग्रेस की ही सरकार है लेकिन शहीद मोहन नाथ की पत्नी को ना ही नौकरी मिली और ना ही अन्य वादे पूरे किए गए। क्या इन नेताओं की संवेदनशीलता सिर्फ वोट तक ही सीमित है?

शहादत की एक विशेष परिभाषा गढ़कर हमारे-आपके द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे को लुटाकर राजनीति करने वाले लोगों की आत्मज्योति, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को पार चुकी है। इन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि एक ‘कायर’ के परिवार को करोड़ों रुपए देकर ‘आत्महत्या’ जैसे घृणित कार्य को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं, हमने ही तो इन्हें सत्ता के सिंहासन पर बैठाया है, हमने ही तो इन्हें मौका दिया है कि ये हमारी भावनाओं के साथ खेल सकें, हमने ही तो इन्हें ‘संवेदनहीन’ बनाया है।

Friday, 4 November 2016

तुम जिसे 'शहीद' मान बैठे, वह तो 'कायर' था

‘शहीद’ शब्द से आप क्या समझते हैं? मेरे मुताबिक, अपने व्यक्तिगत लाभ तथा स्वार्थ को छोड़कर जो व्यक्ति समाज हित में अपने प्राण न्यौछावर कर दे वह शहीद होता है। मेरी इस परिभाषा के मुताबिक स्व. रामकिशन ने भी ‘वन रैंक वन पेंशन’ के मुद्दे पर अपनी जान दे दी। अपने अंतिम समय में कहे गए शब्दों में रामकिशन ने साफ कहा कि वह देश और सैनिकों के लिए यह कदम उठा रहा है। यानी कि उसकी जान समाज के लिए गई और इस आधार पर उसे शहीद मान लिया जाना चाहिए। लेकिन…

vishwa gaurav
मैं हमेशा कहता हूं कि इस ‘लेकिन’ का दायरा बहुत बड़ा होता है। क्या सच में रामकिशन को शहीद कहना उचित होगा? बिल्कुल नहीं क्योंकि रामकिशन ने आत्महत्या करके एक कायरतापूर्ण कदम उठाया है और एक कायर को शहीद का दर्जा देना कहीं से भी उचित नहीं है। रामकिशन के सहयोगियों और रिश्तेदारों का दावा है कि रामकिशन को जो पेंशन मिल रही थी वह 5000 रुपए कम थी। रामकिशन को डीएससी से रिटायर होने के बाद हर महीने 24,999 रुपये मिल रहे थे। जबकि ओआरओपी के तहत उन्हें 30 हजार रुपये मिलने चाहिए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैंक की गड़बड़ी के कारण रामकिशन को 5 हजार रुपये कम मिल रहे थे। अब सवाल यह उठता है कि क्या एक सैनिक की इच्छा शक्ति इतनी कमजोर हो सकती है कि वह मात्र 5000 रुपए के लिए आत्महत्या कर ले? अगर एक सैनिक की इच्छाशक्ति इतनी कमजोर हो सकती है तो मुझे लगता है कि हमें सेना में भर्ती किए जाने की प्रक्रिया पर चिंतन करने की जरूरत है। आत्महत्या जैसा कदम, चाहे किसी भी कारण से उठाया गया हो, ऐसा कदम उठाने वाले को मैं कायर मानता हूं, शहीद नहीं।

आज सुबह नाइट शिफ्ट के बाद जब ऑफिस से निकला तो एक महिला सहकर्मी से इस विषय पर कुछ देर चर्चा हुई। उन्होंने कहा, ‘अगर आत्महत्या करने के लिए रामकिशन जैसा कारण होना चाहिए तो हर दिन मेरे जीवन में इस तरह के 5 नए कारणों का ‘निर्माण’ हो जाता है लेकिन मैं तो आत्महत्या नहीं करती।’ क्या सच में सिर्फ 5000 रुपये कम मिलने की वजह से कोई व्यक्ति अपने भरे पूरे परिवार को छोड़कर आत्महत्या कर सकता है? अगर मैं अपने विवेक के आधार पर जवाब दूं तो जवाब ‘नहीं’ में ही मिलेगा।

रामकिशन कांग्रेस के कार्यकर्ता थे और कांग्रेस के समर्थन से चुनाव भी लड़ चुके थे। सभी का अपना विशिष्ट मत और विचार होता है, हम उसका सम्मान करते हैं और करना भी चाहिए लेकिन सवाल यह है कि 10 सालों तक जब कांग्रेस की सरकार रही तब ओआरओपी पर वह सामने क्यों नहीं आए? मोदी सरकार द्वारा ओआरओपी को लेकर उठाए गए एक सकारात्मक कदम के बावजूद एक पूर्व सैनिक का आत्महत्या कर लेना, क्या यह किसी बड़ी राजनीतिक साजिश की ओर इशारा नहीं करता?

नियमों के मुताबिक, किसी वर्तमान या पूर्व सैनिक के द्वारा आत्महत्या करने पर उसे शहीद का दर्जा नहीं दिया जाता है। और ना ही इस परिस्थिति में किसी तरह के अलाउंसेज का प्रावधान है। लेकिन लाशों पर राजनीति करने वाले लोग जबरन एक कायर को शहीद साबित करने में लगे हैं। मुझे दुख है कि एक पूर्व सैनिक को अपनी जान देनी पड़ी लेकिन साथ ही मेरे मन में जिज्ञासा भी है कि ऐसे कायरतापूर्ण कदम के पीछे मूल कारण क्या था, जिसकी वजह से रामकिशन ने इतना बड़ा कदम उठाया?

कुछ ऐसे सवाल, जिनके जवाब देश का आम नागरिक जानना चाहता है-
कहीं रामकिशन की आत्महत्या के पीछे कोई राजनीतिक चाल तो नहीं?
कहीं रामकिशन ने ‘सैनिक अधिकार’ के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिए कोई खेल तो नहीं खेला?
कहीं रामकिशन को आत्महत्या के लिए उकसाया तो नहीं गया?
कहीं यह पूरा ‘खेल’ सिर्फ केन्द्र सरकार को बदनाम करने की साजिश तो नहीं?

मुझे नहीं पता कि देश कभी इन सवालों के जवाब जान पाएगा या नहीं। लेकिन एक बात तो साफ है कि एक सैनिक को आगे करके यदि भारत के नेता राजनीति करेंगे तो उससे सिर्फ देश का ही नुकसान होगा। हो सकता है कि मुआवजे के नाम पर आम जनता के करोड़ों रुपए लुटाकर अरविंद केजरीवाल जैसे लोग अपना वोट बैंक मजबूत कर लें लेकिन यह मुआवजा इस तरह के कायरतापूर्ण कदमों को उठाने के लिए प्रोत्साहित करने में उत्प्रेरक का काम करेगा।

Friday, 28 October 2016

दिवाली आ गई, शुरू होगा 'सेक्युलरों' का 'विधवा विलाप'

गुरुवार को अचानक टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए गए तस्लीमा नसरीन के एक इंटरव्यू पर नजर पड़ी। उस इंटरव्यू में तस्लीमा ने एक सवाल के जवाब में कहा था, ‘भारत के अधिकतर सेक्युलर लोग प्रो-मुस्लिम और ऐंटी-हिंदू हैं। वे हिंदू कट्टरपंथियों के कृत्यों का विरोध करते हैं, लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के जघन्य कृत्यों का बचाव करते हैं।’ तस्लीमा द्वारा कही गई इस लाइन को भारत की दलगत राजनीति से न जोड़कर ‘सेक्युलरों’ की मानसिकता से जोड़कर समझने की कोशिश    की। आगे पढ़ने से पहले बेहतर होगा कि अपने मजहबी चश्मे को उतारकर एक बार सही मायनों में सेक्युलर की मूल अवधारणा को आत्मसात करें। यदि आपने ऐसा नहीं किया, तो तय है कि आप मुझे कट्टर अथवा सांप्रदायिक करार देंगे।

2 दिन बाद दिवाली है। सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया तक, सभी का कहना है कि इको-फ्रेंडली दिवाली होनी चाहिए। बिलकुल ठीक बात है, हमारा पर्यावरण है, हमारी जिम्मेदारी है कि उसकी रक्षा करें। मैं मानता हूं कि मानव, समाज और पर्यावरण हित में इको फ्रेंडली दिवाली से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए। लेकिन समस्या इस बात से है कि दुनिया के 200 से अधिक देशों में 31 दिसंबर की रात को अंग्रेजी नववर्ष का ‘जश्न’ मनाया जाता है। पूरी दुनिया में पटाखे जलाए जाते हैं, पर्यावरण को भारी नुकसान होता है और हमारे देश के तथाकथित सेक्युलर उसे ‘जश्न’ का नाम देते हैं। क्या हिंदुओं के एक त्योहार पर होने वाली आतिशबाजी, एक अन्य तथाकथित वैश्विक जश्न पर भारी पड़ रही है। आंकड़े तो यह नहीं कहते…

चलिए मान लिया कि अंग्रेजी नववर्ष एक वैश्विक पर्व है, लेकिन 25 दिसंबर की रात में भी तो यही सब होता है ना, क्या उससे पर्यावरण की हानि नहीं होती? दिवाली पर यदि पटाखे जलाए जाएं, तो हिंदू पर्यावरण का नुकसान कर रहे हैं लेकिन अगर क्रिसमस पर पटाखे जलाए जाएं, तो ईसाई अपने त्योहार का जश्न मना रहे हैं।

‘मानवहित’ की ये बातें सिर्फ दिवाली तक ही सीमित नहीं रहतीं। होली आती है तो ‘पानी बचाओ-पानी बचाओ’ की मुहिम शुरू हो जाती है। बहुत अच्छी बात है, जिस देश में लोग 20 रुपए प्रति लीटर की दर से पानी खरीदते हों, वहां ऐसी मुहिम होनी भी चाहिए। लेकिन बकरीद पर मूक जीवों के काटे जाने पर जो लाखों लीटर पानी व्यर्थ बर्बाद होता है, उस पर बात क्यों नहीं होती? एक किलो आलू के उत्पादन में 254 लीटर पानी लगता है, एक किलो आटे के उत्पादन में 1,362 लीटर पानी लगता है, लेकिन 1 किलो मांस के उत्पादन में 18 हजार लीटर पानी लगता है। लेकिन इन आंकड़ों पर कोई ‘सेक्युलर’ कुछ नहीं बोलेगा।

शिवरात्रि आने पर कहा जाता है, ये कौन लोग हैं जो एक तरफ लाखों लीटर दूध बर्बाद कर देते हैं और दूसरी तरफ बच्चे भूख से मर रहे हैं। ठीक बात है, दूध की बर्बादी किसी भी कुतर्क के सहारे उचित नहीं ठहराई जा सकती है लेकिन फिर जब अपने जीवन में हजारों लीटर दूध देने वाली गाय की हत्या होती है, तो उस समय भी ‘सेक्युलरों’ को अपने मुंह में जमी दही निकालकर बाहर फेंकते हुए गोहत्या रोकने की बात करनी चाहिए। लेकिन नहीं, उस पर बात नहीं होगी। क्योंकि अगर उस पर बात हुई तो हमारे ‘सेक्युलरों’ की ‘निरपेक्षता’ खतरे में पड़ जाएगी और ‘खाने की आजादी’ का हनन हो जाएगा।

दही हांडी की बात आएगी तो छोटे बच्चों को उनकी इच्छा के बावजूद उन्हें हांडी फोड़ने की अनुमति नहीं दी जाती है। ठीक बात है, ‘बड़ों’ की जिम्मेदारी है कि बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखें। लेकिन पीड़ा इस बात पर होती है कि दही हांडी पर तो पत्रकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, सभी बच्चों की सुरक्षा की बात करते हैं लेकिन मुहर्रम के दौरान जब 2-3 साल तक के अबोध बच्चों की चमड़ियां बिना उनकी अनुमति की उधेड़ी जाती हैं, तो कोई कुछ नहीं बोलता। सवाल बस इतना सा है कि आखिर ‘सेक्युलर्स’ ऐसा दोहरा चरित्र क्यों रखते हैं?

Thursday, 27 October 2016

जरा सोचिए! कैसी होगी शहीदों के घर की दिवाली

जगदीश सिंह, पठानकोट में तैनात एक सैनिक, के घर में शादी की तैयारियां चल रही थीं। एयरबेस पर आतंकी हमला हुआ और जगदीश सिंह शहीद हो गए।
गुरसेवक सिंह, पठानकोट में तैनात एक और जवान, की शादी का एक महीना बीता था। आतंकी हमला हुआ और जसप्रीत विधवा हो गईं।
दिवाकर, CRPF का जवान, नक्सलियों से मुठभेड़ में शहीद हो गए। शहादत के 21 दिन पहले ही शादी हुई थी।
लांस नायक आरके यादव की पत्नी गर्भवती थीं। उड़ी में आतंकी हमला हुआ और वह बिना अपने बच्चे का मुंह देखे ही शहीद हो गए।
अशोक सिंह उड़ी हमले में शहीद हो गए। 78 वर्षीय दृष्टिहीन पिता ने उठाई बेटे की अर्थी।

ऐसे हजारों नाम हैं, जिनके बारे में मुझे या आपको पता तक नहीं है। क्या आप कल्पना भी कर सकते हैं कि जब किसी बूढ़े पिता के सामने उसके 25 साल के जवान बेटे का शव रखा जाता होगा तो उस पर क्या बीतती होगी? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब एक मां अपने बेटे की शादी की तैयारियों में लगी होगी और उसी बीच उसके बेटे का शव उसके सामने आ जाता होगा, तो उसे कैसा लगता होगा? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिन हाथों की मेहंदी का रंग तक नहीं उतरा होगा, उन हाथों को अपने मंगलसूत्र को उतारना कैसा लगता होगा? क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब एक बच्चा पैदा होने के बाद अपनी पूरी जिंदगी में पिता का प्यार नहीं पा पाता होगा, तो उसे कैसा लगता लगेगा?

नहीं…. यह सब कुछ हमारी कल्पना से परे है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि वे लोग सीमा पर, जंगलों में, पहाड़ों पर, 50 डिग्री की चिलचिलाती गर्मी में, रेगिस्तान में, -50 डिग्री की जमा देने वाली ठंड में क्यों खड़े रहते हैं? क्या इसलिए कि उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिलती? या इसलिए कि वे कुछ पैसे कमाकर अपना घर चला सकें? नहीं, वे इसलिए कठिनतम परिस्थितियों में संघर्ष करते रहते हैं ताकि हम आसानी से अपने त्योहारों को मना सकें। वे अपने बच्चों से दूर इसलिए रहते हैं ताकि हम अपने बच्चों के साथ खुशी से रह सकें। वे अपने परिवार से दूर इसलिए रहते हैं ताकि हम अपने परिवार के साथ रह सकें। ध्यान रहे, अगर सरहद पर फौज नहीं होगी तो हम मौज से त्योहार नहीं मना सकते।

जरा सोचिए, क्या सीमा पर तैनात एक जवान की मां की इच्छा नहीं होती होगी कि उसका बेटा दिवाली पर उसके साथ हो? क्या एक 7 साल की बच्ची यह नहीं चाहती होगी कि वह भी अपने दोस्तों की तरह ही होली पर, अपने पापा के साथ शॉपिंग करने जाए? एक महिला जिसने दूसरी बार करवा चौथ का व्रत रखा होगा, वह नहीं चाहती होगी कि पिछली बार की तरह उसे अपने पति की तस्वीर देखकर व्रत का परायण पड़े। सबके अपने अरमान होते हैं, सबकी अपनी कामनाएं होती हैं, लेकिन वे इन सबकी परवाह नहीं करते। वे परवाह करते हैं तो उनकी, जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं। वे परवाह करते हैं हमारी और आपकी। उनके लिए जन्म देने वाली माता की इच्छाओं से ज्यादा महत्व हमारी और आपकी खुशियां रखती हैं। और हम, क्या करते हैं उनके लिए? उनकी शहादत पर फेसबुक पर एक पोस्ट डाल देते हैं या फिर ट्विटर पर ट्वीट कर देते हैं। क्या हमारी इतनी ही जिम्मेदारी है? लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं।

vishva gaurav
दोस्तो, पिछले एक साल में हमारी भारत माता ने बहुत बेटे खोए। हम सीमा पर तैनात सैनिकों के लिए कुछ नहीं कर सकते, तो क्या करें? दिवाली आने वाली है। सनातन परंपरा में माना जाता है कि दिवाली की रात दिया जलाकर अगर हम ईश्वर से कुछ मांगते हैं तो ईश्वर हमारी बात जल्दी सुनता है। कम से कम हम इतना तो कर ही सकते हैं कि दिवाली पर जब रात में पूजा करते समय अपने परिवार के सदस्यों की सलामती के लिए प्रार्थना करें, तो साथ में एक दिया जलाकर उनकी सलामती के लिए भी दुआ करें जो हमारे लिए अमावस की उस काली रात में सीमा पर तैनात हैं। कवियत्री जागृति त्रिपाठी लिखती हैं,
अरमानों को न्योछावर कर, जो सब कुछ पाकर खो  जाते हैं,
स्वार्थ भरी इस दुनिया में अमरत्वलीन हो जाते हैं।
जिन भारत के वीर सपूतों का, बस इतना सा ही नारा है,
है शान तिरंगा ये अपना, और राष्ट्र, जान से प्यारा है।
एक दीप जला दिवाली पर, करें शौर्य को निज प्रणाम,
और करें प्रार्थना रब से कि ना कोई सैनिक खोए जान।
मैं इस दिवाली भारतीय सेना के लिए दीया जलाकर सैनिकों की सलामती के लिए दुआ मागूंगा। क्या आप नहीं जलाएंगे इस दिवाली एक दीप भारतीय सेना के नाम?

Monday, 24 October 2016

इस दिवाली एक दीप सेना के नाम भी जलाएं

तेरी-मेरी खातिर वे,सीमा पर कष्ट उठाते हैं,
अपनी नीदें खो करके, हमको बेखौफ सुलाते हैं।
4 दिन पहले एक वॉट्सऐप ग्रुप में एक खास तरह का मेसेज आया। मेसेज था, ‘वंदे मातरम दोस्तो, कल जम्मू से पंजाब वापस आते समय जम्मूतवी रेलवे स्टेशन पर भारतीय सेना के एक जवान से मुलाकात हुई। काफी देर तक हुई बातचीत के बाद उन्होंने एक बात बोली, जो मेरे दिल को छू गई। उन्होंने कहा, ‘हम सीमा पर इसलिए खड़े रहते हैं ताकि आप लोग घर पर दिवाली मना सकें। मैं 5 साल से दिवाली पर घर नहीं जा पाया। पता नहीं आप लोगों में से कितने लोग पूजा करते समय हमारे बारे में सोचते होंगे।’ मेरे पास उनकी बात का कोई जवाब नहीं था, क्योंकि इसी देश में वे लोग भी हैं जो सेना को रेपिस्ट कहते हैं।
खैर, लंबी बातचीत के बाद मैंने उनसे कहा, ‘भाई, अब तक का नहीं पता लेकिन इस साल दिवाली पर आपको पता लगेगा कि देश आपको कितना प्यार करता है।’ दोस्तो, इस दिवाली एक दीपक भारतीय सेना के नाम भी जलाएं और मां लक्ष्मी की पूजा करते समय भारतीय सैनिकों के लिए दुआएं करें। साथ ही यदि संभव हो तो इस दीवाली किसी स्थान पर एकत्रित होकर सार्वजनिक रूप से सेना के शौर्य को नमन करें।’

यह मेसेज पढ़कर मुझे लगा कि शायद भेजने वाला कोई ‘मुहिम’ चला है। यही सोचकर मैंने उसे फोन लगाया। फोन पर उसने बताया कि यह मेसेज उसे भी किसी ने भेजा था और अपनी जिम्मेदारी समझकर उसने अन्य लोगों को भेजा। मैंने तुरंत गूगल पर सर्च किया तो पता लगा कि सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। फेसबुक पर इस दिवाली एक दीप सेना के नाम (https://www.facebook.com/MereBharatKiArmy/) नाम से एक पेज भी है, जिसे समय के हिसाब से ठीक-ठाक समर्थन मिल रहा है। विषय अच्छा है और उससे भी बड़ी बात यह है कि दिवाली के पावन पर्व पर अपने देश की सेना के लिए हमारे मन में आत्मदीप्ति प्रज्जवलित होगी।

विश्व गौरव
आज बहुत लंबी बातें नहीं करूंगा। 2 दिन पहले हमारे पीएम नरेन्द्र मोदी जी ने भी कहा है कि इस दिवाली अपने जवानों को याद किया जाए। इस ब्लॉग के माध्यम से मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि हम सीमा पर जाकर अपनी दिवाली पीएम नरेन्द्र मोदी की तरह सेना के नाम तो नहीं कर सकते, लेकिन अपने घर में एक दीपक जलाकर उनके लिए प्रार्थना तो कर ही सकते हैं जिनकी वजह से हम खुशियां मना पा रहे हैं। व्यक्तिगत इच्छाएं सभी की होती हैं, उनकी पूर्ति के लिए हम ईश्वर से प्रार्थना भी करते हैं, लेकिन क्या उनके प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं जो भारत की रक्षा के लिए, हमारी और हमारे परिवार की रक्षा के लिए अपने परिवार से दूर संघर्ष करते रहते हैं।

जाहिर है, आपके मन में यह सवाल उठा होगा कि इस मुहिम को चला कौन रहा है? वह कौन है जो इतने व्यस्त समय में देश की सेना के बारे में सोच रहा है। जब इस बारे में खोजबीन की तो जो पता लगा, उसे जानकर मन को बहुत संतोष हुआ। मेरा एक बहुत पुराना मित्र है, नितिन मित्तल। काफी समय से मैं उसके संपर्क में नहीं था। उसने ही सबसे पहले इस बारे में सोचा। इस शानदार पहल के लिए इस ब्लॉग के माध्यम से सार्वजनिक तौर पर पूरे देश की तरफ से मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं। साथ ही यह विश्वास भी दिलाता हूं कि मैं इस दिवाली एक दीप सेना के नाम जरूर जलाऊंगा।
ईद दिवाली होती सरहद पर, वे घर ना जाते हैं,
रहे सुरक्षित मुल्क सोच, सीने पर गोली खाते हैं।

Monday, 17 October 2016

मुस्लिमों का संघ से जुड़ना विरोधियों को हजम नहीं हो रहा

मैं लखनऊ के सरस्वती विद्या मंदिर में कक्षा 9 में पढ़ता था। मेरे साथ शेर आलम नाम का एक मुस्लिम छात्र भी पढ़ता था। प्रतिदिन विद्यालय में लगभग 40 मिनट का वंदना का कालांश होता था जिसमें ‘प्रातः स्मरण’, सरस्वती वंदना, गीता, सुभाषित, एकात्मता स्त्रोत, एकता मंत्र, शांति पाठ और गायत्री मंत्र होता था। अन्य विद्यार्थियों की तरह शेर आलम भी वंदना में भाग लेता था और पूर्ण आस्था के साथ वंदना करता था। उसके बाद मध्यावकाश के दौरान हम सभी एक साथ बैठकर भोजन करते थे। भोजन से पहले सभी विद्यार्थी पंक्तिबद्ध होकर बैठते थे और भोजन मंत्र करते थे। उसके बाद विद्यालय से अवकाश के समय हम सभी वंदे मातरम् करते थे और फिर घर जाते थे। प्रारंभिक शिक्षा से लेकर द्वादश तक की शिक्षा मैंने विद्या भारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु विद्या मंदिर में ही प्राप्त की। इस दौर में बहुत से मुस्लिम मित्र मिले। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनसे आज भी बात होती है। इस पूरी ‘कथा’ को बताने का उद्देश्य यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध रखने वाले विद्या भारती द्वारा संचालित विद्यालय में मुझे एक बार भी नहीं कहा गया कि मुस्लिम या इस्लाम, मेरे या भारत के लिए किसी भी तरह से नुकसान पहुंचा सकते हैं।

vishwa gaurav
विद्या भारती के आंकड़ों के मुताबिक, सरस्वती विद्या मंदिर नामक विद्यालयों में फिलहाल लगभग 48 हजार मुस्लिम विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विद्या भारती के विद्यालयों में 12 हजार मुस्लिम छात्र, वहीं मध्य प्रदेश में 10 हजार मुस्लिम शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इन विद्यार्थियों को ना ही गीता पाठ से परहेज है और ना ही सरस्वती वंदना से। दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो इन मुस्लिम विद्यार्थियों के साथ कथित ‘हिंदूवादी’ संगठन से संबंध रखने वाले विद्या भारती द्वारा संचालित विद्यालयों में किसी तरह का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष भेदभाव नहीं किया जाता। यह बात मैं इतने विश्वास से इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैं स्वयं वहां का विद्यार्थी रहा हूं। हाल ही में असम में 10वीं की परीक्षा में टॉप करने वाले सरफराज हुसैन मेरे दावे को और अधिक प्रमाणिकता प्रदान करते हैं। सरफराज ने जब 10वीं की परीक्षा में टॉप किया तो उसके पिता ने कहा कि उनके बच्चे की सफलता के पीछे उसके विद्यालय से मिले संस्कार हैं।

अब आते हैं मूल विषय पर, इस देश में कुछ ऐसे लोग हैं जो आरएसएस पर आरोप लगाते हैं कि वह मुस्लिम विरोधी है। यदि संघ सच में मुस्लिम विरोधी होता तो भले ही अपनी सार्वजनिक शाखाओं में ना सही लेकिन अपने प्रशिक्षण वर्गों में इस बात को जरूर कहता कि स्वयंसेवकों का मूल उद्देश्य मुस्लिम विरोध होना चाहिए। लेकिन मैंने आज तक यह बात नहीं सुनी। मैंने संघ को बहुत नजदीक से देखा और समझा है। शाखा भी गया हूं और प्रशिक्षण वर्गों में भी रहा हूं। लेकिन वहां तो सिर्फ भारत की बात की गई। संघ का स्पष्ट मत है कि भारत ‘हिंदू राष्ट्र’ है। लेकिन इस ‘हिंदू’ शब्द की व्यापकता को समझे बिना संघ की विचारधारा को सांप्रदायिक मान लेना ठीक नहीं है। यदि कोई ये कहे कि भारत में सिर्फ एक विशेष पूजा पद्धति को मानने वाले लोग रह सकते हैं, यह देश सिर्फ उनका है जो ‘इबादत’ या ‘प्रे’ नहीं बल्कि ‘पूजा’ करते हैं तो इस कॉन्सेप्ट पर मेरी कड़ी आपत्ति है। संघ का हिंदुत्व श्रीराम के राजधर्म से शुरू होकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के राष्ट्रधर्म पर समाप्त हो जाता है।
संघ का मूल सिद्धांत कहता है कि ‘हिंदुस्तान’ में रहने वाला हर एक व्यक्ति जो गाय, गंगा, गीता और गायत्री के प्रति समर्पण रखता है, भारत की मिट्टी से प्रेम करता है, वह हिंदू है।

अब हो सकता है कि गाय, गंगा, गीता और गायत्री पर कुछ लोगों को आपत्ति हो। लेकिन आपत्ति करने से पूर्व बेहतर होगा कि गाय, गंगा, गीता और गायत्री को समझ लें। गाय एक ऐसी प्राणी है जो मां के बाद एक बालक के जीवन को सर्वाधिक पोषित करती है। विज्ञान कहता है कि मां के पीले दूध के बाद आसानी से उपलब्ध होने वाले पदार्थों में गाय का दूध एक बच्चे के लिए सर्वाधिक लाभकारी होता है। गंगा के जल की निर्मलता किसी से छिपी नहीं है। गीता में जीवन के प्रत्येक पक्ष के दायित्व और उनके निर्वहन के सिद्धांत दिए गए हैं। गायत्री की महत्ता संपूर्ण ब्रह्मांड को एक सूत्र में पिरोकर रखने वाले  ‘ॐ’ के बराबर है। हालांकि वर्तमान समय में ना ही गाय के दूध में पूर्व की विशिष्टता रह गई है और ना ही गंगाजल में निर्मलता। क्योंकि अब ना ही वैसी गाय उपलब्ध हैं और गंगा को तो हमने स्वयं मैला कर दिया है। लेकिन बात मूल सिद्धांत की हो रही है और उस मूल सिद्धांत में कहीं कोई दुर्भावना नजर नहीं आती।

संघ का हिंदुत्व किसी विशेष पूजा पद्धति में विश्वास रखने वाले व्यक्ति से संबंध नहीं रखता बल्कि वह संबंध रखता है एक सांस्कृतिक धरोहर के गौरव को उठाकर चलने वाले प्रत्येक राष्ट्रवादी से। जो भारत से प्रेम करता है, भारत की संस्कृति से प्रेम करता है वह हिंदू है। इसके लिए इस बात की कोई अनिवार्यता नहीं है कि आप संघ के स्वयंसेवक हों या रोज सुबह मंदिर जाकर आरती करते हों। रही बात उन लोगों की जो मुसलमानों से जबरन ‘भारत माता की जय’ का नारा लगवाना चाहते हैं, वे क्या इस बात की गारंटी ले सकते हैं कि इस नारे को लगाने वाला हर व्यक्ति भारत की आत्मा का सम्मान कर सकता है? एक मुसलमान दिन में 5 बार सजदा करते वक्त इस मुल्क की जमीन को चूमता है, उसकी इबादत करता है। उसे किसी सर्टिफिकेट की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन इसके साथ ही यह भी नहीं चलेगा कि कोई कहे कि मैं भारत को मां के समान सम्मान नहीं दूंगा। ‘भारत माता की जय’ बोलने वाला प्रत्येक व्यक्ति देशभक्त नहीं हो सकता और भारत माता की जय न बोलने वाला प्रत्येक व्यक्ति देशद्रोही नहीं हो सकता। लेकिन जबरन किसी एक नारे के आधार पर देशभक्त होने का सर्टिफिकेट बांटने वाला अतिवादी और बेवकूफ जरूर होगा। साथ ही ‘भारत माता की जय’ का विरोध करने वाला ‘देशद्रोही’ और ‘कुंठित’ भी होगा। आसान शब्दों में ऐसे समझिए कि अगर कोई ‘भारत जिंदाबाद’ नहीं कह रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह भारतद्रोही हो लेकिन अगर कोई किसी भी कुतर्क के सहारे ‘भारत जिंदाबाद’ का विरोध कर रहा है तो वह भारतद्रोही ही होगा।

इन सारी चीजों में संघ का इस्लाम विरोध कहां से प्रदर्शित होता है, यह समझ से परे है। समस्या यह नहीं है कि संघ के मूल सिद्धांतों को गलत तरह से समझा जा रहा है। बल्कि मूल समस्या यह है कि विरोधियों को हजम नहीं हो रहा है कि अब मुसलमान संघ से जुड़ने लगे हैं। अब वे तीन तलाक का विरोध करने लगे हैं, अब उन्हें वंदे मातरम बोलने से आपत्ति नहीं, अब वे बकरीद पर केक रूपी बकरा काटने लगे हैं, अब वे रूढ़ियों से बाहर निकलकर भारत को सर्वोपरि मानने लगे हैं। संघ के समवैचारिक राजनीतिक संगठन की भी मुसलमानों में स्वीकार्यता बढ़ रही है। 67% मुस्लिम जनसंख्या के साथ जम्मू और कश्मीर भारत का सबसे ज्यादा मुसलमान आबादी वाला राज्य है। वहां सत्ता में बीजेपी गठबंधन है। इस बात को कतई नहीं स्वीकार किया जा सकता कि बिना मुस्लिमों के समर्थन के जम्मू और कश्मीर में बीजेपी को इतना बड़ा जनमत मिला। असम में मुस्लिम जनसंख्या 34% है, वहां बीजेपी 60 सीटों के साथ सत्ता पर काबिज है। यह भी संभव नहीं है कि 2014 में हुए लोकसभा चुनाव को बीजेपी बिना मुस्लिम समर्थन के जीत लेती। अब जब सब कुछ ठीक होने लगा है तो कुछ लोगों की विभाजनकारी नीतियां काम नहीं कर रही हैं तो कुंठा में वे संघ और उसके समवैचारिक संगठनों को बिना किसी प्रमाण के ‘इस्लाम विरोधी’ करार देने में लगे हुए हैं।

वर्तमान केन्द्र सरकार की अब तक की कार्यपद्धति को देखकर मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, वह यह है कि केन्द्र सरकार का भारत विकास मॉडल किसी भी सम्प्रदाय और धर्म में भेदभाव नहीं करता है बल्कि सबके समान विकास की कल्पना को साकार करने में लगा हुआ है। अगर कमी है तो मात्र यह कि बीजेपी के कुछ छोटे नेता फिजूल की बयानबाजी करके अनजाने में देश की एकता, अखंडता और एकात्मता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। रही बात मुसलमानों की तो जिस तरह से लोकसभा चुनाव के 1 साल पहले मुसलमानों के मन में नरेन्द्र मोदी को लेकर ‘डर’ था, वह समाप्त हो गया है। वर्तमान सरकार के दौरान देश के मुसलमान पूरी तरह सुरक्षित हैं और मुस्लिमों को केवल वोट समझकर देखने वाली पार्टियां और उनके अल्पकालिक तथा वैचारिक कार्यकर्ता फालतू की भ्रान्ति इसलिए फैलाते हैं क्योंकि वे वास्तव में मुसलमानों का और देश का विकास चाहते ही नहीं हैं और मुसलमानों को डराकर हमेशा अपना वोट बैंक बनाये रखना चाहते हैं।

Thursday, 13 October 2016

महिलाओं को निखारे बिना पूजने का कोई अर्थ नहीं

मेरे घर में हर साल कोई ना कोई बड़ा धार्मिक अनुष्ठान होता है। अनुष्ठान का समापन कन्याभोज से ही होता है। कन्याभोज कार्यक्रम के दौरान कन्याओं के पैर धुलकर उनका पूजन करने और भोज के उपरांत पैर छूकर उन्हें दक्षिणा स्वरूप कुछ धन देने की परंपरा है। जब पहली बार कन्या पूजन और पैर छूकर दक्षिणा देने की जिम्मेदारी मुझे दी गई तो मुझे लगा कि अब मैं बड़ा हो गया हूं, क्योंकि उससे पहले यह काम मेरे पिता जी करते थे। उस समय मैं कक्षा 5 में पढ़ता था। कन्या पूजन से ठीक पहले मैंने देखा कि वहां पर मेरे ही विद्यालय में मेरे साथ पढ़ने वाली कुछ कन्याएं हैं। बाल मन था, पता नहीं क्या सोचकर मैं भागकर अपने बाबा जी के पास गया और उनसे कहा, ‘मैं उनके चरण स्पर्श नहीं करूंगा क्योंकि उनमें से बहुत सी लड़कियां मुझसे छोटी हैं और मेरे ही विद्यालय में पढ़ती हैं। अगर मैं उनके चरण स्पर्श करूंगा तो बाद में वे विद्यालय में मेरा मजाक उड़ाएंगी।’ मेरे बाबा जी ने मुझे घूरकर देखा और कहा, ‘जितना कहा जा रहा है उतना करो।’ आखिरकार मैंने वह सब कुछ किया जो कहा गया। उसी रात मेरे बाबा जी ने मुझे अपने पास लिटाया और कहा कि कन्याएं मां सरस्वती का रूप होती हैं, उनका पूजन करने से तुम्हारे ज्ञान में वृद्धि होगी इसलिए आगे से कभी इन चीजों पर सवाल मत उठाना। मैंने भी उनकी बात सुनी और उसे उसी रूप में मान लिया।

ऐसी बातें और ऐेसे विचार भारत के लगभग हर एक परिवार में होते हैं। लेकिन इसके साथ एक और पहलू भी है जिसे हम इस पहलू के चलते नकार नहीं सकते। मेरे एक मित्र एनजीओ चलाते हैं। उन्होंने 2016 के लिए कार्यक्रम तय किया था कि गांवों में जाकर लोगों के साथ मिलकर भोजन बनाएंगे और फिर उन्हीं के साथ खाएंगे। इसी कार्यक्रम के तहत मेरा भी जनवरी 2016 में उत्तर प्रदेश के एक गांव में जाना हुआ। वहां जिस परिवार में भोजन तय हुआ था, उसमें एक लगभग 13 साल की बच्ची थी। मैंने उस बच्ची से पूछा, ‘बाबू, आप किस क्लास में पढ़ते हो।’ उसने बताया कि वह कक्षा 6 में पढ़ती है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह थी कि वहीं पर बैठे एक ग्राम पंचायत सदस्य ने उस बच्ची की बात पूरी होते-होते कहा, ‘भाईसाहब, इनको पढ़ने की क्या जरूरत है? 3-4 साल में शादी हो जाएगी और फिर घर में जाकर खाना ही तो बनाना है।’ इसके बाद उन महाशय से काफी लंबी बहस हुई लेकिन उनकी इस एक लाइन ने मेरे सामने सवाल खड़ा कर दिया कि जिस कन्या के पूजन से हमारी अपेक्षा रहती है कि हमें ज्ञान मिलेगा, उस कन्या को ज्ञान और शिक्षा से दूर रखना कहां तक ठीक है?
अभी 3 दिन पहले दुर्गाष्टमी का पर्व बीता। मैं जहां रहता हूं, वहां रहने वाले लोग दुर्गाष्टमी की सुबह पूजन के लिए कन्याओं के लिए खोज रहे थे। समस्या इस तरह के दोहरे रवैये से है। लड़कियों को गर्भ में मार देना, उन्हें पढ़ने से रोकना, उन्हें उनके मन मुताबिक कपड़े ना पहनने देना, उन्हें उनके मन मुताबिक शादी ना करने देना और फिर सड़क पर पूजन के लिए उन्हें ही खोजना। कैसा समाज बनाकर रख दिया है हमने। परिवार में जब कोई महिला गर्भवती होती है तो परिवार के सभी सदस्य ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि श्रीराम जैसा पुत्र जन्म ले लेकिन कभी इस बात के लिए प्रार्थना नहीं करते कि सीता जैसी बेटी जन्म ले।

vishwa gaurav
हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां पर यदि एक व्यक्ति की किसी दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है तो उसकी पत्नी को डायन कहकर जिंदा जला दिया जाता है। एक महिला पर डायन होने का आरोप लगाकर उसे निवस्त्र करके पूरे गांव में घुमाया जाता है। कल तक जो कन्या मां सरस्वती और मां लक्ष्मी का रूप थी, महिला बनते ही वह डायन बन गई। गजब की थिअरी है आपकी। एक व्यक्ति अगर किसी की हत्या करके भाग जाता है तो उसकी बेसहारा पत्नी को 2 बच्चों के साथ गांव से निकाल दिया जाता है। एक आदमी के कुकर्मों की सजा उसकी पत्नी को देना कहां तक उचित है? और यह सब उस देश में हो रहा है, जिसकी सनातन परंपरा में माता सीता के साथ-साथ रावण की पत्नी मंदोदरी को भी पंच कन्याओं में रखा गया है।

एक लड़की शादी के बाद अपना घर, माता-पिता, भाई-बहन यहां तक कि अपने सपने, अपना भविष्य भी अपने ससुराल वालों के लिए छोड़ देती है। वह पूरा दिन घर में काम करती है, उसके लिए उसे कोई पैसे नहीं मिलते और वह पैसों की कोई कामना भी नहीं रखती। वह हर सांचे में खुद को ढाल लेती है। वह शादी के बाद अपने ससुराल वालों के रंग-ढंग में रच-बस जाती है। और वह ये सब कुछ अपने एक पुरुष, सिर्फ एक पुरुष की खुशी के लिए करती है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर किसी पुरुष या लड़के को अपने परिवार को, अपने सपनों को छोड़ने के लिए कहा जाए तो क्या वह छोड़ देगा? यह कदाचित संभव नहीं है। वह ऐसा कभी भी नहीं करेगा।

लोगों का तर्क होता है कि एक लड़की अपने वंश को आगे नहीं बढ़ा सकती। क्या एक पुरुष बिना किसी महिला के अपने वंश को आगे बढ़ा सकता है? जब वह छोटी होती है तो माता-पिता सोचते हैं कि इसे पढ़ाने-लिखाने में पैसा खर्च करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि इसे तो शादी करके ससुराल ही जाना है। वहां अपना घर बसाना है। शादी के बाद भी उसे दहेज न लाने पर या कम दहेज लाने पर मारा-पीटा जाता है। उसके साथ जानवरों से भी बुरा बर्ताव किया जाता है। यहां तक कि उसे जान से भी मार दिया जाता है और अगर वह पढ़-लिख भी जाए तब भी इस समाज ने उनके लिए कुछ सीमाएं निर्धारित कर दी हैं। उन्हें उस सीमा में ही रहना पड़ता है। आखिर क्यों हमेशा एक लड़की या एक औरत को ही अपना सब कुछ त्याग देना पड़ता है?

हम क्यों महिलाओं की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाकर मूकदर्शक बन जाते हैं। हम क्यों भूल जाते हैं कि जब एक महिला राजसत्ता के संचालन का संकल्प लेती है तो रानी लक्ष्मीबाई बनकर विदेशी आक्रांताओं के छक्के छुड़ा देती है, जब वह सेवा करने पर आती है तो सेवा की प्रतिमूर्ति बनकर मदर टेरेसा के नाम से प्रख्यात हो जाती है, जब वह राजनीति करने पर आती है तो इंदिरा गांधी बनकर शेरनी की तरह वह कर जाती है जिसकी उस समय तक कोई पुरुष नेता कल्पना भी नहीं कर सकता था, जब वह गीत गाने पर आती है तो सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर बन जाती है, जब वह बैडमिंटन का रैकेट उठाती है तो साइना नेहवाल बनकर पूरे विश्व में भारत का नाम रोशन कर देती है और जब वह दौड़ने पर आती है तो मैरीकॉम बनकर इतना दौड़ती है कि पुरुषार्थ की नई परिभाषा गढ़ जाती है।

अरे छोड़िए सब, इसी साल कुछ समय पहले ओलिंपिक में एक मेडल के लिए जब भारत तरस रहा था तो वे देश की बेटियां ही थीं जिन्होंने भारत की झोली में मेडल डाले। उनके लिए इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं। हमें उनके हौसले को नमन करना चाहिए और उनकी योग्यता, क्षमता और प्रतिभा को निखारने में जितना योगदान दे सकते हैं, देना चाहिए। विश्वास मानिए, अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो कन्या पूजन का कोई अर्थ नहीं और ना ही नवरात्र का।

Tuesday, 11 October 2016

रावण 'प्रेमियों', दिल से तो तुम भी राम ही बनना चाहोगे...

आज कुछ लोगों को रावण का चरित्र स्वयं से भी अच्छा लग रहा है। उनका तर्क है कि लंबे समय तक माता सीता को अपने यहां रखने के बावजूद रावण ने माता सीता का बलात्कार नहीं किया। 

वे लोग यह मान बैठे हैं कि रावण ने एक महिला से प्रेम किया, उसका अपहरण किया, लेकिन जबरन उसका शरीर हासिल करने की    कोशिश नहीं की। वाह! क्या सभ्यता थी रावण की…. अब जरा इसको आज के परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश करते हैं।

मुझसे किसी ने एक विवाहित महिला के शारीरिक सौन्दर्य का बखान किया। मैं स्वयं में विवाहित हूं। ऐसे में यदि मेरा चरित्र ‘अच्छा’ होगा तो क्या मुझे उस महिला से प्रेम हो जाएगा। और मान लीजिए कि उस महिला के सौन्दर्य का बखान करने वाले की संप्रेषण क्षमता मंत्रमुग्ध कर देने वाली भी है तो क्या मैं अपने विवेक को प्रयोग ना करके उस महिला को किडनैप कर लूंगा। यदि मैं ऐसा करता हूं तो क्या मेरी सभ्यता को अनुकरणीय मान लिया जाएगा?

विश्व गौरव
इस बात में दो राय नहीं कि आज रावण दहन के लिए मुख्य अतिथि बनकर आए लोगों में अधिकतम का चरित्र रावण से भी गिरा है, लेकिन क्या इस तर्क के आधार पर रावण का महिमामंडन करना ठीक है? निश्चित ही आज रावण जलाने वालों के चरित्र पर सवाल उठाना न्यायसंगत है, लेकिन रावण का महिमामंडन करना हमारी छोटी सोच का परिचायक है। मैं राम, सीता, लक्ष्मण, रावण, कृष्ण, कंस, द्रौपदी को मात्र एक चरित्र के रूप में लेता हूं। मैं मानता हूं कि हर एक चरित्र में कुछ अच्छाइयां होती हैं और कुछ बुराइयां। हमें जहां से भी अच्छाई मिले, उसे अंगीकार करना चाहिए। रावण  में अगर किसी को अच्छाई दिख रही है, तो उसे आत्मसात करे। लेकिन इसके साथ-साथ इस बात पर भी चिंतन करना अनिवार्य हो जाता है कि रावण के समकालीन जो अन्य चरित्र थे क्या उनमें कुछ भी ‘अच्छा’ नहीं था।

जब कभी मेरे मुंह से अचानक ‘श्रीराम’ निकलता है, तो मेरे कुछ मित्र हैं जो कहते हैं कि राम ने तो ‘यह किया था, वह किया था’ फिर ऐसे व्यक्ति का नाम लेने का क्या मतलब है। मुझे समझ में नहीं आता कि रावण  के विषय में तो वे लोग बहुत ही सकारात्मक सोच रखते हैं, लेकिन श्रीराम का नाम आते ही उनकी नकारात्मकता अपने चरम पर पहुंच जाती है। 

मैं रावण को नहीं मानता क्योंकि मैंने रावण के चरित्र अध्ययन के दौरान यह भी पढ़ा है कि रावण ने बलपूर्वक कभी माता सीता को हाथ नहीं लगाया तो इसलिए नहीं कि वह बहुत संयमी था, बल्कि उसने माता सीता को बलपूर्वक इसलिए हाथ नहीं लगाया क्योंकि उसे कुबेर के पुत्र नलकुबेर ने श्राप दिया था कि यदि रावण ने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छुआ या अपने महल में रखा तो उसे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे। इसी डर के कारण रावण ने ना तो सीता को कभी बलपूर्वक छूने का प्रयास किया और ना ही उन्हें अपने महल में रखा।
 
मैं रावण को नहीं मानता क्योंकि उसने अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए माता सीता का हरण नहीं किया था, बल्कि उसने शूर्पनखा द्वारा किए गए माता सीता के सौन्दर्य चित्रण पर कामांध होकर सीता का हरण किया था। मैं ऐसे कामान्ध व्यक्ति में किसी भी कुतर्क के सहारे अपना आराध्य नहीं तलाश सकता। मैंने रावण के विषय में यह भी पढ़ा है उसने कई महिलाओं का शील भंग किया था। मैं रावण को नहीं मानता क्योंकि रावण विद्वान जरूर था, लेकिन उसने अपने ज्ञान को कभी व्यवहारिक जीवन में नहीं उतारा। उसने लाखों ऋषियों की हत्या की, कई यज्ञों को ध्वंस किया और कई महिलाओं का बलात्कार किया। रावण ने रंभा नामक अप्सरा से भी दुराचार किया था। रावण ने वेदवती नाम की एक ब्राह्मणी के रूप से प्रभावित होकर उसके बाल पकड़ अपने साथ चलने के लिए कहा था। तब वेदवती ने आत्मदाह कर रावण को श्राप दे दिया था।

किसी के चरित्र का इतना गिरा स्तर जानने के बाद मुझमें हिम्मत नहीं है कि मैं उसमें कुछ ‘अच्छा’ खोज सकूं। इसके बावजूद जो लोग रावण के विषय में संपूर्ण जानकारी किए बिना उसकी अच्छाइयां देखते हैं तो वे उसी से प्रेरणा लें, लेकिन एक छोटा सा निवेदन है कि अपने अल्पज्ञान के आधार पर रावण को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के समकक्ष ना रखें। रावण के महिमामंडन से हमें कुछ भी हासिल नहीं होने वाला, बल्कि हम कहीं ना कहीं बुराई के प्रतीक का समर्थन ही कर रहे हैं। बेहतर होगा कि निष्पक्ष रूप से एक सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ दोनों चरित्रों का विश्लेषण करके जिसमें अच्छाइयां ज्यादा हैं, उस चरित्र को आत्मसात करें और अपना आदर्श बनाएं। मन में छिपकर बैठे रावण को मारें। अनुचित को किसी भी तर्क के सहारे उचित नहीं प्रदर्शित किया जा सकता।

मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में हैं...

आज दशहरा है। भारत के साथ-साथ दुनिया भर में अनेक स्थानों पर रावण दहन किया जाता है। माना जाता है कि रावण दहन करके प्रतीकात्मक रूप से हम बुराई का दहन करते हैं और समाज को यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि सत्य परेशान हो सकता है, किंतु उसे पराजित नहीं किया जा सकता। 

हम रावण दहन करके यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि बुराई कितनी भी मजबूत हो, बुराई के साथ    कितनी भी बड़ी सेना हो, लेकिन उसका विनाश होना तय है।

आज इस प्रतीकात्मक पर्व के सुअवसर मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं। त्रेतायुग में एक रावण था, उसकी एक बड़ी सेना थी। जब रावण के पापों का घड़ा भरने लगा, तो एक राम ने अपना राज-काज छोड़कर जंगल जाने का निर्णय किया और रावण के संरक्षण में पलने वाले राक्षसों का संहार किया। पिता की आज्ञानुसार जब उन्होंने वनगमन किया और वन में उनकी पत्नी का रावण ने अपहरण कर लिया, तब वह चाहते तो अपने भाई और अयोध्या के राजा भरत से मदद लेकर अयोध्या से सेना मंगाकर रावण के साथ युद्ध कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? मेरे विवेक और अध्ययन के आधार पर शायद उनके स्वाभिमान ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। उन्होंने अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए किसी राजा की मदद नहीं ली बल्कि वनवासियों, वंचितों की मदद ली और उनके सहयोग से एक ऐसी सेना बनाई जिसने रावण की मायावी सेना के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया।

अब सवाल यह उठता है कि इतने हजार सालों से हम हर साल प्रतीकात्मक तौर पर बुराई का पुतला जलाते हैं। लेकिन इतने सालों में हम बुराई को समाप्त क्यों नहीं कर पाए? 

क्या हम इस आस में प्रतीक्षारत हैं कि फिर से इस धरती पर कोई राम जन्म लेगा, जो त्रेतायुग की भांति ही कलियुग में भी धरती से बुराई का सर्वनाश कर देगा। नहीं! आज ऐसा संभव नहीं है क्योंकि तब एक रावण था और आज इस धरती पर अरबों की संख्या में रावण हैं। उन अरबों रावणों का वध करने के लिए सिर्फ एक राम पर्याप्त नहीं होगा। अरबों रावणों का वध करने के लिए अरबों ‘राम’ चाहिए। अब आज के रावणों के सर्वनाश में हमारी भूमिका क्या है? क्या हम राम की सेना का अंग बनकर राम बनना चाहते हैं या फिर स्वयं राम बनकर रावण का वध करें?

विश्व गौरव
इस सवाल का उत्तर खोजने से पहले उन रावणों को खोजने की अनिवार्यता है। आज के रावण हैं कहां? चलिए आपको कुछ परिस्थितियां बताता हूं, उनके आधार पर आप स्वयं रावण को खोजने की कोशिश करिए। मेट्रो में एक लड़की खड़ी है, आपके साथ यात्रा कर रहा आपका मित्र ही आपसे कहता है, ‘देखो यार, क्या गजब का माल है’। आप सड़क पर जा रहे हैं और बगल से एक लड़की स्कूटी लेकर निकलती है, आपके सामने ही दो लड़के उस लड़की पर बेहद भद्दी टिप्पणी करते हैं, लेकिन आप चुपचाप बिना कुछ कहे वहां से चले जाते हैं। आप सड़क पर जा रहे हैं, रास्ते में एक ‘पागल’ लड़का एक लड़की को सरेशाम चाकुओं से गोद रहा है, लेकिन आप कुछ नहीं करते और वहीं खड़े होकर सबकुछ देखते रहते हैं। आप अपने माता-पिता को इसलिए वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं क्योंकि वे आपको ‘टोकते’ हैं। आप अपने बेटे को शादी के नाम पर बेचते हैं। 

आप कुछ जाति विशेष के लोगों को गौरक्षा के नाम पर पीटकर अपनी व्यक्तिगत कुंठा प्रदर्शित करते हैं। आप एक जाति विशेष के लोगों से शादी की खुशियां मनाने का अधिकार भी छीन लेते हैं। आप एक जाति विशेष के लोगों से ईश्वर की पूजा करने का अधिकार भी छीन लेते हैं। आप चंद आतंकियों के नाम के सहारे एक मजहब विशेष के लोगों को आतंकी मान लेते हैं। आप लड़कियों को स्कूल नहीं जाने देंगे। आप उन लड़कियों को उनके मन मुताबिक कपड़े नहीं पहनने देंगे। किसी लड़की को किसी लड़के के साथ घूमते देखकर आप उसके चरित्र की व्याख्या शुरू कर देंगे। आप राजनीतिक विरोध के नाम पर अनजाने में देश का विरोध शुरू कर देंगे।
अब आप खुद ही सोचिए कि रावण कहां है और क्या सच में अपने अंदर के रावण का ‘दहन’ न करके एक पुतले को जला देने भर से हमारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। 

यदि सच में  हम विजयादशमी पर्व की सार्थकता चाहते हैं तो अपने अंदर के रावण को समाप्त करके राम के चरित्र को स्वयं में उतारने का प्रयास करना होगा। राम तो वह हैं जो रावण से युद्ध करने को निकलते हैं, लेकिन एक राजकुमार होते हुए भी किसी राजा का साथ नहीं लेते। वह वंचितों को, वनवासियों को गले लगाते हुए उनसे एक नई सेना का निर्माण करते हैं। भारतीय मानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं, बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टतापूर्वक किया। अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा।

मुझे बहुत हैरानी होती है कि इस देश के ‘बुद्धिजीवी’ कहते हैं, ‘रावण में बहुत सी अच्छाइयां थीं, लेकिन बस एक गलती हो गई कि उसने सीता जी का अपहरण कर लिया। हम उसमें भी अच्छाई देखेंगे। उसमें ज्ञान था, उसने जो किया अपनी बहन के लिए किया, वह एक अच्छा भाई था, शिव भक्त था…और भी बहुत कुछ। इसलिए उन्हीं अच्छाइयों के आधार पर राम के साथ रावण ‘जी’ की भी मूर्ति होनी चाहिए। हम अच्छाई-बुराई का अंतर समाप्त कर देंगे। आप लोग पूजा करते हो, राम के साथ रावण की पूजा क्यों नहीं कर सकते?’ शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को जो बुराई के प्रतीक रावण में भी अपने आराध्य को खोजते हैं। रावण के चरित्र का चित्रण करने से पहले मैं बस एक ही निवेदन करूंगा कि कृपया यहां क्लिक करके रावण से जुड़े तथ्यों का विश्लेषण कर लें।

आज विजयादशमी के पर्व पर संकल्प लें कि स्वयं में बसने वाले राम को जागृत करके अपने ही मन पर कब्जा कर बैठे हुए रावण का विनाश करेंगे। साथ ही यदि हमारे सामने कोई रावण के चरित्र को आत्मसात करने का प्रयास कर रहा होगा, तो मूकदर्शक बनकर किसी और के ‘राम’ बनने की प्रतीक्षा नहीं करेंगे बल्कि स्वयं रावण का विनाश करने के लिए राम के चरित्र को आत्मसात करेंगे।

Monday, 10 October 2016

...इसलिए जरूरी है चीनी सामान का बहिष्कार

एक तर्क दिया जा रहा है कि चीनी सामानों का बहिष्कार इसलिए ना करें क्योंकि बहुत से लोगों ने बिजनस के लिए इनसे अपने गोदाम भर लिए हैं, उनको नुकसान हो जाएगा। बहुत अच्छी बात है, समाज के बारे में सोचना चाहिए। हमारी जिम्मेदारी है कि हम किसी भी पक्ष का समर्थन करते समय समाज के अंतिम व्यक्ति तक की सुरक्षा एवं लाभ के विषय में चिंतन करें। लेकिन…

विश्व गौरव
इस ‘लेकिन’ के मायने क्या हैं, इस बात पर चिंता करने की आवश्यकता है। समाज के अंतिम व्यक्ति तक के बारे में सोचना हमारी जिम्मेदारी है लेकिन उसके साथ-साथ एक जिम्मेदारी राष्ट्र के प्रति भी है, देश के प्रति भी है, उन लोगों के प्रति भी है जो बिना अपनी जान की परवाह किए इसलिए सरहद पर खड़े रहते हैं ताकि आप दीवाली की रात अपने घर में पटाखों के शोर के बीच हाथ में शराब का गिलास लेकर गरीबों पर ज्ञान बांट सकें, उन परिवारों के प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारी है जो हर दिवाली की रात बस एक ही दुआ मांगते हैं कि उनका बेटा सरहद पर खड़ा रहे।

आज देश में ऐसा माहौल बना है कि लोग कह रहे हैं कि कुछ महंगा सही लेकिन स्वदेशी सामान ही खरीदेंगे। इन परिस्थितियों में जब देश को स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता की सर्वाधिक आवश्यकता है, कुछ लोग कह रहे हैं कि जिन्होंने सामान खरीद कर गोदाम भर लिए हैं, उनका नुकसान हो जाएगा।

chineseबहुत स्पष्ट सी बात है कि हम सामान खरीदेंगे लेकिन वह किसी और से खरीदेंगे। अगर दिवाली पर चाइनीज लाइट्स की जगह मिट्टी के दीपक खरीदेंगे तो एक गरीब परिवार को आर्थिक लाभ भी होगा, उसकी भी दिवाली बन जाएगी और स्वदेशीकरण भी होगा। संभव है कि ऐसे में हमारे घर के पड़ोस में गुप्ता इलेक्ट्रिकल्स वालों का चाइनीज लाइट न बिकने के कारण कुछ नुकसान हो जाए लेकिन इस डर से क्या हम उन लोगों के बारे में भी ना सोचें जो धूप में बैठकर दिए बनाते हैं।

हमारा धन किसी जरूरतमंद के पास ही जा रहा है। और अगर कोई है जो सिर्फ यह चाहता है कि उसके घर में दिए नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक लाइट्स ही जलें, तो वह भारतीय इलेक्ट्रिक लाइट्स का उपयोग भी कर सकता है। ऐसा नहीं है कि ये चीजें भारत में बनती नहीं हैं। संभव है कि वे थोड़ा सा महंगी पड़ें लेकिन राष्ट्र निर्माण में, राष्ट्र की आत्मनिर्भरता के लिए, राष्ट्र को फिर से विश्वगुरु के पद पर प्रतिस्थापित करने के लिए, गरीब और ‘बिछड़ों’ में उनके कार्य के प्रति आत्मविश्वास पैदा करने के लिए हम इसे अपने हिस्से का टैक्स मान सकते हैं।

हम इतना संघर्ष क्यों करें? यह सवाल मन में उठना लाजमी है। मैं बताता हूं आपको कम से कम शब्दों में….
lightsएक देश है जो उन लोगों को पाल रहा है, जो सीमा पार करके हमारे घर में घुसकर हमारे बेटों को मार कर चले जाते हैं। हम बहुत ही सहिष्णु देश हैं, हम पर बहुत दबाव है, युद्ध से हमें भी नुकसान होगा। इतना सब होने के बावजूद भी सत्ता का संचालन करने वाले लोगों को इस बात की चिंता तो करनी ही होगी कि इस बिगड़ैल देश का इलाज कैसे किया जाए। करनी भी चाहिए। सरकार ने कूटनीतिक चाल चलकर उस देश को दुनिया से ‘अलग-थलग’ करने का प्रयास किया। बड़े स्तर पर उसे सफलता भी मिली और इसके लिए उसकी पीठ भी ठोंकनी चाहिए कि उसने भारतहित में एक अच्छी विदेशनीति अपनाई। लेकिन इन सबके बीच एक देश है जो उस देश के साथ खड़ा दिख रहा है जिसकी आतंकवादियों के प्रति नीतियां, हमारे देश के बेटों की शहादत के लिए जिम्मेदार हैं। जो विश्व मंच पर सिर्फ एक ही ‘जुगाड़’ में लगा रहता है कि भारत को कैसे हराएं, ऐसे देश को हमें जवाब देना होगा। अगर वह देश ‘आतंक रहित विश्व’ रूपी भारत के स्वप्न को साकार होने में अड़ंगा लगा रहा है तो उसे जवाब देना ही होगा। और देना भी चाहिए।

इस बीच एक बात और बता दूं कि हमने चीन से सकारात्मक संबंध बनाने की बहुत कोशिश की, उनके प्रधान के साथ हमारे प्रधान ने चाय पी, झूला भी झूले। लेकिन उसने सोचा कि भारत पर कब्जा तो कर नहीं सकते, इसलिए पाकिस्तान पर ‘कब्जा’ करके उसे अपने हिसाब से चलाया जाए। चीन यह बात जानता है कि विश्व शक्ति बनने के लिए सबसे पहले उसे एशिया पर राज करना होगा और उसका यह स्वप्न तब तक साकार नहीं हो सकता जब तक भारत को विश्व शक्ति बनने की दौड़ से न हटाया जाए। अपने सपने को साकार करने के लिए वह पाकिस्तान का सहारा ले रहा है।

अब आते हैं कि चीन को जवाब कैसे दिया जाए। युद्ध हम कर नहीं सकते क्योंकि हमारे देश के आंतरिक हालात वैसे नहीं हैं। ऐसे में चीन को जवाब देने का एक ही तरीका है कि चीन को आर्थिक स्तर पर कमजोर किया जाए। चीन को आर्थिक स्तर पर कमजोर करने का एक ही तरीका है कि उसके सबसे बड़े मार्केट को तहस-नहस कर दिया जाए। यदि भारतीय व्यक्ति चीनी सामान न खरीदकर भारतीय सामान खरीदेगा तो चीन का सबसे बड़ा बाजार बंद हो जाएगा। और उसके बाद चीन को पाकिस्तान का साथ छोड़ना ही होगा। लेकिन यह तभी संभव है जब हम इस काम को पूरी जिम्मेदारी के साथ एक राष्ट्रीय दायित्व के रूप में लें।

विश्वास मानिए, परिवर्तन हो रहा है। आज से 5 साल पहले तक भारत का प्रधान अपनी संसद में कहता था कि हम शांति चाहते हैं। लेकिन आज भारत कहता है कि हम आतंक को जवाब देते समय गोलियां नहीं गिनेंगे और पाकिस्तान का प्रधान कहता है, ‘हम शांति चाहते हैं।’ तो संकल्प करें कि आसानी से जितना संभव होगा, भारतीय सामान का ही उपयोग करेंगे। हो सकता है कि थोड़ी सी कठिनाई आए लेकिन मुझे लगता है कि राष्ट्रहित में इतना तो कर ही सकते हैं।

Saturday, 8 October 2016

सर्जिकल स्ट्राइक पर अरविंद केजरीवाल के नाम खुला पत्र

प्रिय अरविंद केजरीवाल जी,
आज बहुत दुखी मन से आपको यह पत्र लिख रहा हूं। सन् 2012 की बात है, मैं लखनऊ में रहा करता था। उस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में जाना हुआ। उस शिविर में कुछ ऐसे युवाओं की तस्वीरें लगी थीं जिनसे आज का युवा प्रेरणा ले सकता है। उस पूरी फोटो गैलरी में कई युवाओं की तस्वीरें थीं। गैलरी की थीम ‘इनसे प्रेरणा लें भारत के युवा’ थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि उस गैलरी में आपकी और कुमार विश्वास की भी तस्वीर थी। मैं कुमार विश्वास को तो पहले सुन चुका था और उनको सुनकर ऐसा लगता भी था कि वह राष्ट्रवादी विचार परिवार से आते हैं लेकिन आपको नहीं सुना था। उसके बाद मैंने आपको सुनना शुरू किया। सच कहूं तो मैं आपके विचारों को ‘सुनकर’ सम्मोहित हो गया। आपने जब अपनी पार्टी बनाई तो मन में ख्याल आया कि अब राष्ट्रवादी वोट ही विभाजित होंगे लेकिन एक उम्मीद थी कि अब निश्चित ही देश की राजनीति में एक सकारात्मक परिवर्तन आएगा। इस उम्मीद का स्तर कश्मीर में जनमत संग्रह कराने को लेकर आपके एक सहयोगी द्वारा दिए गए बयान से काफी ऊंचा था।

vishva gaurav
समय बीता, बहुत लोगों ने आपके बारे में बहुत कुछ कहा, आम आदमी पार्टी को कांग्रेस की ‘बी टीम’ बताया लेकिन मन के एक हिस्से में वही पुराना विश्वास बना हुआ था कि आप लोग राजनीति करने नहीं बल्कि उसे बदलने आए हैं। आपने दिल्ली में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई, कुछ बुरा लगा लेकिन साथ ही कुमार विश्वास के तर्कों ने मेरे मन के विश्वास को डिगने नहीं दिया। और समय बीता, आपके सहयोगियों पर कई तरह के आरोप लगे लेकिन उन आरोपों का स्तर भी उतना नहीं था कि आपके पुराने वक्तव्यों से मेरा सम्मोहन टूट जाए। आप ‘ऑड-ईवन’ का कॉन्सेप्ट लाए और बीजेपी के कुछ नेताओं ने उसका विरोध किया। तब मैंने लिखा: ‘ऑड-ईवन’ पर देश के मन की बात सुनिए मोदीजी!

मैंने यह इसलिए लिखा क्योंकि मेरा विवेक कहता था कि ‘ऑड-ईवन’ योजना आम जनमानस के हित में है। आपके नेता संदीप कुमार की सेक्स सीडी सार्वजनिक हुई और उस पर राजनीति शुरू हुई तो मैंने लिखा: संदीप कुमार की सेक्स सीडी पर इतना हंगामा क्यों? मैंने यह इसलिए लिखा क्योंकि मुझे लगा कि व्यावहारिक रूप से राजनीति का स्तर इतना नहीं गिरना चाहिए कि किसी के व्यक्तिगत जीवन में घुसकर राजनीतिक मुद्दे खोजे जाएं।
फर्जी डिग्री, मारपीट और रेप राजनीतिक आरोप हो सकते हैं। लेकिन आपने सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो दिखाने की बात करके राजनीति की एक नई परिभाषा पेश की। एक ऐसी राजनीति जो देश से भी ऊपर हो गई, एक ऐसी राजनीति जो आतंकियों को मजबूत कर रही है, एक ऐसी राजनीति जो दुनिया भर की मीडिया में आपकी भारत विरोधी छवि बना रही है। मैं जानता हूं कि आपके मन में देश के लिए, सेना के लिए, सैनिकों के लिए, शहीदों के लिए और आम जनमानस की भावनाओं के लिए पूरा सम्मान है लेकिन शब्द चयन तथा प्रस्तुतिकरण में की गई आपकी छोटी सी गलती ने भारतीय मीडिया में आपको विलन बना दिया और पाकिस्तान में हीरो।

मैं यह भी जानता हूं कि आप यह कतई नहीं चाहते कि कश्मीर, भारत से अलग हो, आप यह भी नहीं चाहते कि आपका गुणगान पाकिस्तान में ‘पाकिस्तान परस्त’ के रूप में हो लेकिन मैं यह जरूर जानता हूं कि आपके बचकाने बयान ने भारत की आत्मा को बहुत कष्ट दिया है। आप क्या चाहते हैं कि भारत, सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक कर दे? लोकतंत्र में आपको यह अधिकार है कि आप आपने मन की बात कर सकें, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा पर आपको आत्म चिंतन करने की आवश्यकता है।

*सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से किसको फायदा और किसको नुकसान होगा, क्या आपने बोलने से पहले इस विषय पर सोचा?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को उस ट्रांसपोर्ट तकनीक के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी जिसे भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान उपयोग किया और पाकिस्तान उसे डिटेक्ट नहीं कर पाया?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को उन उपकरणों के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी जो भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान रात में भारतीय सेना ने उपयोग किए थे?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को  उन हथियारों और गोला बारूद के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी जिनका प्रयोग भारत ने किया और उसमें आवाज तक नहीं हुई?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को भारत द्वारा इस्तेमाल किए गए संचार उपकरण और लोकेशन फाइंडर के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी?
*क्या सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो सार्वजनिक करने से पाकिस्तान को भारत द्वारा इस्तेमाल किए गए हमले के तरीके की जानकारी नहीं मिलेगी?
और क्या ये सारी जानकारियां मिलने के बाद भविष्य में पाकिस्तान को भारत का जवाब देने में सुविधा नहीं हो जाएगी?

क्या आपने एक बार भी इन विषयों के बारे में सोचा? क्या अनजाने में आपने भारत सरकार पर पाकिस्तान की मदद करने का दवाब नहीं डाला? क्या अब भी आपको ऐसा नहीं लग रहा है कि आपने गलत विषय को गलत तरह से उठाया था? इन सवालों के बारे में सोचिएगा जरूर। और अगर अपराध बोध हो तो राजनीति का नया उदाहरण पेश करते हुए देश के सामने सार्वजनिक तौर पर गलती को स्वीकार करिएगा…

Thursday, 6 October 2016

कला की सीमाएं नहीं होतीं, लेकिन देश की होती हैं

इस समय देश में एक नई बहस चल पड़ी है कि कला की सीमाएं होती हैं अथवा नहीं? यदि कोई देश कुछ गलत करता है या गलत का समर्थन करता है तो उस देश के कलाकारों को अन्य स्थानों पर काम करने का अधिकार है अथवा नहीं? एक कलाकार का कला के प्रति समर्पण का पैमाना क्या होना चाहिए?

इस पूरी बहस में मेरा स्पष्ट मत है कि कला की कोई सीमा नहीं होती। लेकिन इसके साथ-साथ एक शाश्वत सत्य यह भी है कि एक कलाकार की कला के प्रशंसक भी बिना किसी राजनीतिक सीमा के होते हैं। वे प्रशंसक उस कलाकार में स्वयं को खोजने लगते हैं। वे उस कलाकार के रोने पर दुखी होते हैं और उसी कलाकार के हंसने पर खुश होते हैं। जब वह कलाकार अपने असल जीवन में हॉस्पिटल में ऐडमिट हो जाता है तो वे प्रशंसक अपना खाना छोड़कर भगवान के मंदिर में घंटों उसकी सलामती की दुआएं मांगते हैं।

धूप नामक फिल्म में जब कोई कलाकार एक शहीद के पिता का किरदार निभाता है तो दर्शक के मन में उस कलाकार की छवि वैसी ही बन जाती है जैसा वह पर्दे पर दिखता है। जब कोई कलाकार पर्दे पर गर्व नामक फिल्म में एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर का किरदार निभाता है तो पुलिस में जाने की तैयारी कर रहा नौजवान उसी आभासीय किरदार को प्रेरणा मान लेता है। लेकिन समस्या यह है कि वह नौजवान दर्शक उस कलाकार की कला का नहीं बल्कि उस व्यक्ति विशेष का प्रशंसक बन जाता है।

एक कलाकार से अपेक्षा की जाती है कि उसमें मानवीय भावना का स्तर आम जनमानस से अधिक होगा क्योंकि उसने पर्दे पर कई किरदार जिए होते हैं। उसने एक फौजी का, एक पुलिसकर्मी का, एक एक आम आदमी तक का किरदार जिया होता है।

हमने तो यही सुना है कि कोई अच्छा अभिनय तभी कर पाता है जब वह अपने आभासीय किरदार में पूरी तरह से उतर जाए। इसी आधार पर हम यह अपेक्षा करते हैं कि एक शहीद के पिता का दर्द, एक आम आदमी का दर्द, एक सैनिक की परिवार से दूर रहने की तड़प, सब कुछ वह हमसे बेहतर तरीके से महसूस कर सकता है। और इसी आधार पर हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि जब किसी आतंकी हमले में देश का कोई बेटा शहीद होता है तो उसके पिता की तरह तो नहीं लेकिन हमसे बेहतर तरीके से एक कलाकार उस परिवार के दर्द को महसूस कर सकता है। वह सही मायने में कला का पुजारी तभी माना जाएगा जब वह सभी सीमाओं को तोड़कर प्रत्येक अमानवीय घटना की निंदा करने की क्षमता रखता हो।

निश्चित ही कला की कोई सीमाएं नहीं होतीं लेकिन दुर्भाग्य से देश की सीमाएं होती हैं। एक कलाकार की प्राथमिक पहचान उसका देश ही होता है। और यदि कोई ऐसा है जो कला को सच में अपने देश से पहले मानता हो तो उसे उस जगह पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देना चहिए, जहां उसे मोहब्बत मिल रही हो, जहां उसकी कला का सम्मान होता हो। और ऐसी जगह पर उसे वहां के कानून के मुताबिक सम्मानपूर्वक रहना चाहिए। भारत के वे लोग जो मेरी तरह ही इस बात को मानते हैं कि हमारे लिए, हमारी खुशी तथा शांति के लिए अपने घर से दूर रहकर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले हमारे शहीद का बलिदान, कला से भी बड़ा है, वे लोग एक बात को कभी मन में ना आने दें कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के सिद्धान्त पर सिर्फ ‘हिंदू’ ही चल रहे हैं।

उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि अनुपम खेर और नाना पाटेकर के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी आपकी लड़ाई उनके बीच लड़ रहे हैं।
यही सलमान खान कुछ महीने पहले जब मोदी के साथ पतंग उड़ा रहे थे तो बड़े राष्ट्रवादी थे, बजरंगी भाईजान लाए तो कहा कि अरे देखो मुसलमान होकर ‘बजरंगी’ नाम रखा। और आज उसी ‘राष्ट्रवादी’ ने कुछ कह दिया तो वह देशद्रोही और पाकिस्तान परस्त हो गया। क्यों?
यह सवाल पूछिएगा अपने आप से…

सच तो यह है कि राष्ट्रवाद और ‘राष्ट्र सर्वोपरि’  के सिद्धान्त के व्यावहारिक रूप का व्यापक चिंतन आपके वर्तमान ‘राष्ट्रद्रोही’ लोगों ने किया ही नहीं था और आप भी इन्हीं में फंसे रह गए, इस नाते आप भी नहीं कर पाए। उनको राष्ट्रवाद नहीं पता और आपका तो कहना ही क्या? आप तो ‘राष्ट्रवाद’ पहचान ही नहीं पाते… सलमान, शाहरुख या ओम पुरी को एक झटके में राष्ट्रद्रोही करार देना पूरी तरह से गलत है।

हर एक कलाकार के दिल में उसका मुल्क रहता है लेकिन वह कलाकार जिसको हमने स्टार बनाया, जिसके गानों और गजलों को सुनकर पता नहीं कितने युवा भारतीयों की मोहब्बत परवान चढ़ी, जिसके ‘मुल्क’ की परवाह किए बिना हम उसके ‘डायलॉग’ पर तालियां बजाते रहे, हूटिंग करते रहे, उससे हम यह अपेक्षा तो करते ही हैं कि जब इस देश के 18 बेटों की हत्या हो तो वह कलाकार इस अमानवीय कुकृत्य की खुले मन से निंदा कर सके। और यह अपेक्षा, हमारा अधिकार भी है। एक कलाप्रेमी के रूप में मानवीयता से परिपूर्ण हृदय रखने के कारण, एक मानव होने के कारण मुझे दुख होता है। और इसी आधार पर जब पेशावर में आतंकी हमला होता है तो भी हमें दुख होता है और हम अपनी फेसबुक टाइमलाइन को आंसुओं और दर्द से भर देते हैं। एक कलाकार होकर भी उनका दिल उड़ी पर क्यों नहीं पसीजा… या उनके लिए कला, उनके मुल्क की सीमाओं में बंधी है?

Wednesday, 5 October 2016

नवदुर्गा के साथ इस 'दुर्गा' को भी याद रखना

durgawatiनवरात्र का पावन पर्व चल रहा है। सनातन पूजा पद्धति में विश्वास रखने वाले सभी लोग विभिन्न उपायों से मां भगवती को प्रसन्न करने में लगे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नवदुर्गा के अलावा एक और दुर्गा थी जिसके शौर्य और पराक्रम से नारी के शक्ति स्वरूपा होने का प्रमाण मिलता है। ऐसा समय और ऐसा स्थान, जहां महिलाओं को घर से निकलने की भी अनुमति नहीं थी, वहां पुरानी परंपराओं को तोड़कर दायित्वबोध और राज्य प्रेम को नए आयाम देने वाली रानी दुर्गावती की अप्रतिम गाथा, भारतीय शौर्य परंपरा का एक मजबूत स्तंभ है।
1542 में दुर्गावती का विवाह गोंड साम्राज्य के संग्राम शाह के बड़े बेटे दलपत शाह के साथ कराया गया। शादी के कुछ वर्षों बाद दुर्गावती को वीर नारायण नामक पुत्ररूपी रत्न की प्राप्ति हुई लेकिन इस खुशी को जल्द ही ग्रहण लग गया और राजा दलपत शाह की मृत्यु हो गई। पति की मौत के बाद गोंड साम्राज्य पर आधिपत्य को लेकर चल रही राजनीति की आहट पाकर रानी ने स्वयं को गोंडवाना की महारानी घोषित कर दिया। एक महिला ने जब राज्य की सत्ता का संचालन अपने हाथों में लिया तो आसपास के राज्यों के पुरुषवादी शासक काफी प्रसन्न हो गए। उनको आशा थी कि महिला होने के नाते गोंड साम्राज्य पर कब्जा करने के लिए उन्हें ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।

vishva gaurav
मालवा गणराज्य के शासक बाज बहादुर ने इसी सोच के साथ गोंडवाना पर हमला किया लेकिन बाज बहादुर की सोच गलत साबित हुई और उसे रानी दुर्गावती ने करारी शिकस्त दी। इस जीत के साथ ही रानी दुर्गावती का यश चारों ओर फैल गया।

इसके कई सालों के बाद गोंडवाना के नजदीकी राज्य मणिकपुर के शासक ख्वाजा अब्दुल मजिद आसफ खान ने रानी दुर्गावती पर आक्रमण करने का विचार बनाया। तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर की आज्ञा लेकर अब्दुल माजिद बड़ी फौज लेकर निकल पड़ा। जब मुगल सेना, दमोह के नजदीक पहुंची तो मुगल सूबेदार ने रानी दुर्गावती से अकबर की अधीनता स्वीकार करने को कहा। रानी दुर्गावती ने उसे जवाब भिजवाते हुए कहा, ‘कलंक के साथ जीने से बेहतर गौरव के साथ मर जाना होता है। मैंने लम्बे समय तक अपनी मातृभूमि की सेवा की है और अब इस तरह मैं अपनी मातृभूमि पर धब्बा नहीं लगने दूंगी। अब युद्ध के अलावा कोई उपाय नही है।’ रानी दुर्गावती ने तीन दिनों तक अकबर की सेना को धूल चटाई। चौथे दिन उनका पुत्र राजा वीर घायल हो गया लेकिन रानी इस वेदना को भी झेल गईं।

24 जून 1564, रानी अब भी अदम्य शौर्य एवं साहस का प्रदर्शन करते हुए बहादुरी के साथ लड़ रही थीं तभी अचानक एक तीर रानी दुर्गावती की गर्दन के एक तरफ घुस गया। रानी ने वह तीर तो बाहर निकाल दिया लेकिन उस जगह पर भारी घाव बन गया। इसी के तुरंत बाद एक और तीर उनकी गर्दन के अंदर घुस गया जिसे भी रानी दुर्गावती ने बाहर निकाल दिया लेकिन इसके बाद वह बेहोश हो गयीं। जब उन्हें होश आया तो पता चला कि उनकी सेना युद्ध हार चुकी है। उन्होंने महावत से कहा, ‘मैंने हमेशा से तुम्हारा विश्वास किया है और हर बार की तरह आज भी तुम्हारा सहयोग चाहिए। आज हार के इस मौके पर तुम मुझे दुश्मनों के हाथ मत लगने दो और वफादार सेवक की तरह इस तेज छुरे से मुझे खत्म कर दो।’

महावत ने कहा, ‘मैं अपने हाथों को आपकी मौत के लिए उपयोग नहीं कर सकता। मैं बस आपको इस रणभूमि से बाहर निकाल सकता हूं, मुझे अपने तेज हाथी पर पूरा भरोसा है।’ यह बात सुनकर रानी दुर्गावती की आंखों में खून उतर आया।
durga वह नाराज हो गईं और बोलीं, ‘क्या तुम मेरे लिए ऐसे अपमान का चयन करते हो? क्या तुम यह चाहते हो कि लोग कहें कि दुर्गावती रणभूमि छोड़ कर भाग गई थी?’ इसी के साथ रानी दुर्गावती ने चाकू निकाला और अपने पेट में घोंप लिया। रानी दुर्गावती ने मध्य प्रदेश की वीरभूमि को अपने रक्त से सींचने में कोई संकोच नहीं किया। दुर्गावती ने 16 सालों तक वीरों की तरह शासन करते हुए भारतवर्ष के गौरवमयी इतिहास को एक नया आयाम प्रदान किया।
आज 5 अक्टूबर है, आज से 492 साल पहले 1524 में दुर्गावती ने जन्म लिया था। आज मैं रानी दुर्गावती पर इसलिए लिख रहा हूं ताकि नारीवाद के नाम पर रिश्तों का मजाक उड़ाने वाले ‘प्रगतिशील’ वर्ग के लोगों की कलम ‘नारीवाद’ का वास्तविक अर्थ बयां कर सके। भारत की इस वीर बेटी की जयंती पर मैं बस इतना चाहता हूं कि देश की बेटियां यदि प्रेरणा लें तो दुर्गावती जैसी महिलाओं से लें। रानी दुर्गावती के जैसा समर्पण और दायित्वबोध, वर्तमान समय की ‘आधुनिक’ नारियों में नहीं पाया जाता।
रानी दुर्गावती को नमन!

Wednesday, 21 September 2016

आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता, तो उन्हें दफनाया क्यों जाता है?


'आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता', यह जुमला तो आपने लगभग हर एक राजनीतिक पार्टी के नेताओं के मुंह से सुना ही होगा। आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं कि मैं इसे जुमला इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वोटबैंक की राजनीति के चलते इसका प्रयोग किया जाता है। कोई भी दल मन से इस बात को मानता नहीं है कि आतंकवादियों का सच में कोई धर्म नहीं होता। मेरा एक छोटा सा सवाल है कि देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां 'कांग्रेस' और 'बीजेपी' दोनों ही अलग-अलग समय में सत्ता में रही हैं? यदि ये दोनों पार्टियां मानती हैं कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता तो फिर उन आतंकियों को इस्लामिक तरीके से दफनाया क्यों जाता है। इससे तो एक ही बात जाहिर होती है कि ये पार्टियां मानती हैं कि आतंकवादी, मुसलमान होते हैं, यानी देश को इस्लामिक आतंकवाद से खतरा है।

मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता, मैं मानता हूं कि देश सिर्फ हिंदुओं का नहीं है। भारत को 'भारत' बनाने की कोशिश मुसलमानों का सहयोग भी रहा है। भारत के गौरवशाली अतीत में अगर मैं महाराणा प्रताप को एक मजबूत स्तंभ मानता हूं तो मुझे उनके सेनापति हकीम खां सूर के शौर्य को अनदेखा करने का अधिकार बिलकुल भी नहीं है। मैं अगर भगत सिंह की शहादत को नमन करता हूं तो मुझे बिलकुल अधिकार नहीं है कि मैं अशफाक उल्ला खां की शहादत को अनदेखा कर दूं। मैं अगर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष को नमन करता हूं तो मुझे यह अधिकार बिलकुल नहीं है कि मैं लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व करने वाली बेगम हजरत महल की देशभक्ति को अनदेखा कर दूं। मैं अनदेशा नहीं कर सकता  85 साल के उस बूढ़े शेर, बहादुर शाह ज़फर को, जो अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था तो अंग्रेजों ने दो पंक्तियां लिखवाकर भेजीं कि,
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

तो बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर दो पंक्तियां जवाब के तौर पर लिखीं:
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्थान की।।

मैं मानता हूं कि इस देश को बनाने में जितना सहयोग हिंदुओं का है उतना ही  अन्य पूजा पद्धतियों में विश्वास रखने वाले लोगों का। और इसी के साथ मैं यह भी मानता हूं कि जो इंसानियत की हत्या करे, जो मासूमों का कत्ल करे, जिसकी मानवीयता शून्य के स्तर से भी नीचे पहुंच गई हो, वह किसी धर्म या मजहब का अनुपालक नहीं हो सकता, क्योंकि कोई भी मजहब यह नहीं कहता कि आतंक फैलाना या निर्दोषों की हत्या करना जायज अथवा धर्मसंगत है।

अब आते हैं मूल बात पर, यदि यह बात सभी मानते हैं कि आतंकियों का कोई धर्म या मजहब नहीं होता तो उनका इस्लामिक पद्धति से अंतिम संस्कार करके क्या हम दुनिया में एक मजहब विशेष की छवि खराब करने की कोशिश नहीं कर रहे? कल उड़ी (जम्मू कश्मीर) में आतंकवादी हमले को अंजाम देने वाले, 18 भारतीय सैनिकों की हत्या करने वाले आतंकियों की लाशों को सेना और पुलिस ने मिलकर दफना(इस्लामिक पद्धति से) दिया। ऐसा करने के पीछे तर्क दिया गया कि इस्लाम के मुताबिक, मौत के बाद शव को नहीं रखा जाना चाहिए। यदि सच में देश की सरकार यह मानती है कि आतंकियों का कोई मजहब नहीं होता तो इस तरह से अंतिम संस्कार करना पूरी तरह से अन्यायोचित है।

मैं भारत का दुर्भाग्य मानता हूं कि इस विषय के पक्ष में जो टीवी चैनल खड़ा होता है, उसके पत्रकार पर कश्मीर में पत्थर चलाए जाते हैं, उसकी ओवी वैन को तोड़ने की कोशिश की जाती है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि कांग्रेस के नेता कहते हैं कि देश में इस विषय को लेकर राष्ट्रीय स्तर की चर्चा होनी चाहिए। क्यों भाई, इसमें कैसी चर्चा-बहस, जिनका कोई धर्म नहीं उनका धार्मिक तरह से अंतिम संस्कार क्यों हो? जिसमें मानवीयता शून्य के स्तर तक पहुंच जाए, वह मानव कहलाने का अधिकारी नहीं और जब वह मानव कहलाने का अधिकारी नहीं है तो उसके लिए मानवाधिकार की बात क्यों हो?

आतंकियों को भ्रमित करते हुए बताया जाता है कि अगर वे तथाकथित जिहाद करेंगे तो मरने के बाद उन्हें जन्नत में 72 हूरें मिलेंगी। इस्लाम की मान्यता है कि दफनाए गए लोगों को कयामत के दिन अल्लाह जन्नत ले जाएगा। विश्वास मानिए अगर हमने आतंकियों के शव को कूड़े के ढेर के साथ जलाना शुरू कर दिया तो भ्रम में फंसकर आतंक का रास्ता अपनाने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी आ जाएगी। इसके अलावा एक भारतीय होने के नाते हम उन लोगों को अपने देश की 2 गज जमीन भी क्यों दें हमारे देश में निर्दोषों की हत्या हैं।

मानवाधिकार की बात सैनिकों के लिए होनी चाहिए, भले ही वह किसी भी देश के हों। युद्ध के दौरान यदि कोई पाकिस्तानी सैनिक यदि शहीद होता है तो उसके शव को ससम्मान पाकिस्तान को वापस किया जाए और यदि पाकिस्तान उस शव को वापस लेने से इनकार करे तो उसका सम्मान सहित मजहबी रीति-रिवाजों के मुताबिक अंतिम संस्कार किया जाए। क्योंकि उसकी मौत अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए हुई है ना कि किसी आधारहीन लालच के कारण।

Monday, 12 September 2016

'न्याय की देवी' के मुंह पर तमाचा है शहाबुद्दीन की जमानत

इस देश में 2 दिन पहले एक ऐसे व्यक्ति को जेल से छोड़ दिया गया जिसे 2 अलग-अलग मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। उस व्यक्ति पर हत्या, रंगदारी और अपहरण जैसे गंभीर अपराधों के 63 मामले दर्ज हैं।

 उस व्यक्ति ने देश में मजलूमों की लड़ाई लड़ रहे चंद्रशेखर प्रसाद नामक एक युवा नेता की हत्या करवा दी ताकि उसके खौफ से कोई उस पर उंगली उठाने की कोशिश न करे। उस व्यक्ति के घर से पाकिस्तान में बने हथियार बरामद हुए थे। उस व्यक्ति पर आईएसआई से संबंध होने का आरोप है। वह व्यक्ति एक सीनियर पुलिस अधिकारी को इसलिए थप्पड़ मारता है क्योंकि वह पुलिस अधिकारी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाते हुए उसके एक करीबी नेता को गिरफ्तार करने पहुंच गया था। उस व्यक्ति पर लोकतात्रिंक व्यवस्था का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले एक पत्रकार की हत्या का आरोप है। इतने ‘बड़े’ व्यक्ति को देश की ‘महान’ न्याय व्यवस्था जमानत दे देती है।


‘मेरे दो बेटों गिरीश और सतीश को मारा गया था, तब एक की उम्र 23 और दूसरे की 18 साल थी। दो बेटों की हत्या का बदला लेने के लिए मेरा बेटा राजीव लड़ रहा था। राजीव मेरा सबसे बड़ा बेटा था, लेकिन 16 जून, 2014 को उसे भी मारकर, मेरे लड़ने की सारी ताकत खत्म कर दी गई। राजीव को शादी के ठीक 18 दिन बाद मार डाला गया।’ ये शब्द हैं एक लाचार पिता के… चंदा बाबू नामक उस पिता की खामोश जुबान बता रही है कि कानून की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी न्यायिक व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा है।

 किस परिस्थिति, किस दबाव, किस डर और किस लालच के चलते एक ऐसे व्यक्ति को जमानत दे दी जाती है जिसके सामने खड़े होने में एक सामान्य व्यक्ति घबराता हो। विक्रमादित्य नाम का एक राजा, जो रात में अपने क्षेत्र में वंचितों की समस्याओं को सुनने के लिए निकलता था, उसके क्षेत्र में एक पिता के भय को नजरंदाज करके, अपराध का दूसरा नाम कहे जाने वाले शहाबुद्दीन की रिहाई पर अहंकार में चूर नीतीश कुमार नामक वर्तमान ‘सम्राट’  खामोश क्यों बैठा है, यह समझ से परे है। क्या आप ऐसी परिस्थितियों में कह सकते हैं कि कोई वंचित अथवा आप स्वयं वर्तमान न्याय व्यवस्था पर भरोसा कर सकते हैं।

मुझे पता है कि याकूब मेमन और अफजल गुरू के समर्थन में आवाज उठाना पूरी तरह से देशद्रोह भी है और राष्ट्रद्रोह भी लेकिन शहाबुद्दीन जैसे अपराधियों के समर्थन में गाड़ियों की रैली निकालना और लिखना देशद्रोह की श्रेणी में क्यों नहीं आता। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सिर्फ देश की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। बहुत अच्छी बात है, सवाल उठना भी चाहिए लेकिन सवाल न्याय व्यवस्था के साथ-साथ उस अवार्ड वापसी गैंग पर क्यों नहीं उठाया जा रहा जो कभी सहिष्णुता और मानवीयता के नाम पर सड़कों पर उतर आए थे।

जेएनयू की जीत पर जश्न मनाने वाले लोग अपनी अग्रज पीढ़ी के उस वास्तविक कॉमरेड के हत्यारे की रिहाई पर खामोश क्यों हैं जिसने वामपंथ की परिभाषा को नए आयाम दिए? डूसू चुनाव की जीत पर राष्ट्रवाद का झंडा उठाकर पटाखे फोड़ने ऐसे लोग जो लखनऊ में एक शिक्षक के पीटे जाने पर ‘शिक्षक के सम्मान में…’ जैसे नारे लगाते हैं और समाजवादी पार्टी को अपराध का प्रणेता बताते हैं, वे भी चुप्पी क्यों साधे हैं? शायद किसी ने सच ही कहा कि सत्ता का नशा अपने ‘परिवार’ पर किए गए जुल्मों को भी भुला देता है। देश आज चुपचाप बैठा है, क्यों? क्योंकि शायद उसे अब भी उम्मीद है कि आप खड़े होंगे, उस व्यवस्था के खिलाफ जिसने आपको अपनों से दूर किया है, उस राजनीति के खिलाफ जिसने पता नहीं कितने मासूमों को पिता विहीन कर दिया, उस तथाकथित नेता के खिलाफ जिसने ‘अपराधवाद’ की एक नई परिभाषा प्रतिस्थापित की, उस न्याय व्यवस्था के खिलाफ जिसमें मानवीयता शून्य के स्तर तक पहुंच गई है।

भले ही वह देश के एक राज्य के एक छोटे से जिले में रहने वाला एक ‘बाहुबली’ हो लेकिन याद रखिएगा, उसके कर्म किसी आतंकी से भी बुरे हैं। आतंकी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिसे वह मारने जा रहा है वह कौन है, लेकिन शहाबुद्दीन जैसे लोग तो घर के अंदर रहकर ही हमारे भाइयों को मार देते हैं, औरतों को विधवा कर देते हैं, पिता से उनका बेटा छीन लेते हैं, मां बच्चों को अनाथ कर देते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ तो आप सड़कों पर उतर आते हैं लेकिन ऐसे ‘हत्यारे’ जब जेल से छूट जाते हैं तो आपका खून क्यों नहीं खौलता? अपनी ताकत को पहचानिए और बताइए सत्ता के सिंहासन पर बैठे राजनेताओं को कि देश, अपराध और अपराधी मुक्त होना चाहता है।

Thursday, 8 September 2016

स्वीकार्यता के सिद्धांत पर वामपंथी सहिष्णुता का दोहरापन

‘मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी हूं, जिसने दुनिया को सहिष्णुता तथा सार्वभौमिक स्वीकार्यता दोनों की ही शिक्षा दी है, हम लोग सभी धर्मों के प्रति ही केवल सहनशीलता में ही विश्वास नहीं करते बल्कि सारे धर्मों को सत्य मान कर स्वीकार करते हैं। हमारा मानना है कि सभी रास्ते अंत में एक ही ईश्वर यानी सत्य तक जाने का मार्ग हैं।’ यह बात शिकागो धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने कही थी। यदि स्वामी विवेकानंद के पूरे भाषण को एक पंक्ति में समझें तो उसका अर्थ यही निकलता है कि भारत की संस्कृति स्वीकार्यता के सिद्धांत पर टिकी है। आज स्वामी विवेकानंद के भाषण के इस अंश को ब्लॉग में सम्मिलित करने का एक कारण है।

कुछ दिन पहले का मामला है, वामपंथी संगठनों द्वारा आयोजित भारत बंद के समर्थन में लखनऊ विश्वविद्यालय में विभिन्न छात्र संगठनों ने विश्वविद्यालय बंद का आह्वान किया। प्रदर्शन के दौरान आइसा और एबीवीपी कार्यकर्ताओं के बीच धक्का-मुक्की भी हुई। (पढ़ें खबर) आइसा कार्यकर्ता पूजा का आरोप है कि एबीवीपी कार्यकर्ताओं के सामने जब पूजा ने ‘हर लड़की है भारत माता’ के नारे लगाए तो जवाब में एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने सिक्के उछालते हुए ‘नाचो भारत माता’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। किसी के साथ भी ऐसा व्यवहार करना पूरी तरह से गलत और निंदनीय है। यह मामला और ज्यादा गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि एबीवीपी का दावा रहता है कि उनके कार्यकर्ता भारतीय संस्कृति के ‘संरक्षक’ हैं।

अपनी मां (भारत माता) को नाचने के लिए कहना, सिर्फ इसलिए एक लड़की का अपमान करना क्योंकि वह दूसरी विचारधारा से आती है, कहीं से भी नारी को देवी मानने वाली संस्कृति को प्रदर्शित नहीं करता। स्वामी विवेकानंद के स्वीकार्यता के सिद्धांत को ताक पर उन लोगों के द्वारा रखा जा रहा है जो स्वामी विवेकानंद को कथित तौर पर अपना आदर्श मानते हैं। जिसने भी ऐसा किया है उस पर संगठन के द्वारा भी और कानूनी रूप से भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि जब लखनऊ विश्वविद्यालय में यह सब हो रहा था, उस दौरान वहां खड़े लोगों के मुताबिक एबीवीपी कार्यकर्ताओं की ओर से ‘नाचो भारत माता’ जैसे नारे नहीं लगाए गए थे लेकिन फिर भी यदि आरोप लगा है तो जांच तो होनी ही चाहिए।

लेकिन इसके साथ एक दूसरे पक्ष पर भी ध्यान देना चाहिए। पूजा की फेसबुक टाइमलाइन पर इस घटना को लेकर बड़ा बवाल मचा हुआ है। राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े लोगों को संघी लंपट, संघी गुंडा, वानर, लड़की छेड़ने वाला इत्यादि संज्ञाओं से नवाजा जा रहा है। मैं फिर कह रहा हूं, जिसने भी ऐसी गंदी हरकत की है, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए, एबीवीपी से ऐसे लोगों को लेकर जवाब मांगा जाना चाहिए लेकिन पूरी विचारधारा को गलत ठहरा देना कहीं से भी ठीक नहीं है।

एबीवीपी को छोड़ दीजिए, मैं राष्ट्रवादी विचारधारा से आता हूं और मुझे ऐसे शब्दों से आपत्ति है। इस आपत्ति का कारण भी है। इन्हीं वामपंथी संगठनों का झंडा लेकर, इनके ही द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होकर कुछ ‘देशद्रोही’ लोग भारत की बर्बादी के नारे लगाते हैं। इस देश के वामपंथी एक सीमा तक उन लोगों का समर्थन भी करते हैं। लेकिन हम अपनी निष्पक्षता और सहिष्णुता दिखाते हैं और सभी वामपंथियों को देशद्रोही नहीं कहते।
इनके संगठन का एक महत्वपूर्ण दायित्वधारी कार्यकर्ता एक छात्रा का रेप करता है लेकिन हम हर एक वामपंथी को बलात्कारी नहीं कहते। इनके ‘बड़े’ लोग इस घटना पर शर्मिंदा होकर अपने अवॉर्ड नहीं वापस करते लेकिन हम इसे मुद्दा नहीं बनाते क्योंकि हम अपनी जिम्मेदारी और इनकी राजनीति समझते हैं। ये छात्रहित में विश्वविद्यालय में आंदोलन करते हैं, बहुत अच्छी बात है। इनके साथ कोई व्यक्ति कोई अवांछित हरकत करे , बहुत बुरी बात है। हम इनका पक्ष पूरी जिम्मेदारी के साथ समाज तक पहुंचाते हैं।

लेकिन ये लोग जब अपनी विचारधारा को केन्द्र में रखकर कोई पोस्ट लिखते हैं तब कोई विपक्षी विचारधारा का व्यक्ति अपनी विचारधारा के समर्थन में कॉमेन्ट करता है तो ये क्या करते हैं? ये उसे संघी लंपट, संघी गुंडा, वानर, लड़की छेड़ने वाले और न जाने कैसी कैसी संज्ञाएं देते हैं। गजब, सहिष्णुता है इनकी। भारत स्वीकार्यता के सिद्धांत पर टिका है। हम इनको स्वीकार करते हैं लेकिन ‘भारत की बर्बादी’ के नारे लगाने वालों और बलात्कार करने वालों का विरोध करते हैं।

स्वीकार्यता के सिद्धांत पर आधारित एक उदाहरण देता हूं। 2012 की बात है, इसी लखनऊ विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं को फेल कर दिया गया था। विश्वविद्यालय का कहना था कि स्क्रूटनी के लिए 1400 रुपए प्रति कॉपी के हिसाब से जमा करना होगा और तब कॉपी दोबारा से जांची जाएगी। अब आप ही सोचिए, स्नातक का एक लड़का जो 10 में से 9 पेपर्स में फेल है वह इतना पैसा कहां से लाएगा और वह भी तब जब इस बात की कोई गारंटी ना हो कि कॉपी ठीक से चेक की जाएगी।

उस दौरान आरटीआई के तहत 10 रुपए में कॉपी दिखाने की मांग की गई। लेकिन विश्वविद्यालय ने इस मांग को मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद सपा छात्रसभा और एनएसयूआई को छोड़कर एबीवीपी, आइसा, एसएफआई सहित सभी छात्र संगठनों ने एक नया मंच बनाया और पूरे 2 महीनों तक संघर्ष किया। आखिरकार छात्रहित में किए गए उस संघर्ष की जीत हुई और छात्रों को अगले वर्ष का परीक्षा फॉर्म भरने से ठीक 5 दिन पहले विश्वविद्यालय ने आरटीआई के तहत 10 रुपए में कॉपी दिखाने की मांग मान ली। हजारों की संख्या में छात्र पास हुए। यह होती है सहिष्णुता, यह होती है स्वीकार्यता।

स्वीकार्यता तो लानी ही होगी…आपको भी और उनको भी… मैं इस बात को जानता भी हूं और मानता भी हूं कि दोनों विचारधाराओं के सिद्धांत का आधार स्वीकार्यता ही है।

Saturday, 3 September 2016

संदीप कुमार की सेक्स सीडी पर इतना हंगामा क्यों?

आम आदमी पार्टी, राजनीति की ‘दशा और दिशा’ सुधारने के दावे के साथ सत्ता के सिंहासन तक पहुंची एक नई पार्टी… उस पार्टी की सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री रहे संदीप कुमार की ‘सेक्स सीडी’ लीक हो जाती है तो भारत के राजनीतिक गलियारों में अजीब सा माहौल बन जाता है… पार्टी अपनी जिम्मेदारी को समझती है और तत्काल कार्रवाई करते हुए आधे घंटे के अंदर आरोपी नेता को पदमुक्त कर देती है। लेकिन सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं की बखिया उधेड़ दी जाती है। इन सबके बीच मेरा एक सीधा सा सवाल है कि क्या किसी के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करना उचित है? मैं मानता हूं कि संदीप ने जो किया वह ठीक नहीं था। किसी महिला के साथ आपत्तिजनक अवस्था में तस्वीरें खींचना – जैसा कि आरोप है – अनैतिक भी है और असंवैधानिक भी लेकिन इसमें उस महिला की क्या गलती है?

सोशल मीडिया के धुरंधर संदीप कुमार के साथ उस महिला की तस्वीरें भी पोस्ट कर रहे हैं।ज़्यादा चिंता की बात यह है कि जो लोग सोशल मीडिया पर उस लड़की की आपत्तिजनक तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं  उनका दावा है कि वे उस परिवार से आते हैं जो नारी को ‘देवी’ मानता है। अपनी ‘देवी’ को बदनाम करना कैसी ‘पूजा’ है यह मेरी समझ से परे है। संदीप एक जनप्रतिनिधि था तो क्या वह अपना व्यक्तिगत जीवन छोड़ दे? बिल्कुल नहीं, लेकिन यह उस जनप्रतिनिधि को पता होना चाहिए कि लोगों ने एक विशेष चरित्र की आड़ में उसे चुन लिया, अब उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह जनता के सामने एक आदर्श स्थिति प्रस्तुत करे। लेकिन अगर वह जनप्रतिनिधि ऐसा नहीं भी करना चाहता है तो क्या समस्या है? भारत में बड़े-बड़े नेताओं की बड़ी-बड़ी करतूतें तो झेल ही रहे हैं ना हम।

हमने जीप घोटाले से लेकर ताज कॉरिडोर से होते हुए 2जी और CWG तक झेला ना, तो फिर इस बात को क्यों नहीं झेल सकते? हम एक ऐसे नेता को झेल सकते हैं जो कहती हो कि भारत में जो उनकी पार्टी को वोट देगा वह रामजादा है और बाकी विपक्षी हरामजादे हैं, हम एक ऐसा नेता झेल सकते हैं जो बच्चों को शिक्षित करने की सलाह देने के बजाय चार बच्चे पैदा करने की सलाह देता हो, हम एक ऐसा नेता झेल सकते हैं जो बलात्कार करने वालों को ‘बच्चा’ करार देते हुए इस कुकर्म को गलती बताता हो, हम एक ऐसा नेता झेल सकते हैं जो एक महिला सांसद को ‘सौ टका टंच माल’ कहता है, हम एक ऐसा नेता को झेल सकते हैं जो देश के प्रधानमंत्री पद के प्रबल उम्मीदवार को अपने क्षेत्र में आने पर बोटी-बोटी करने की धमकी देता है। जब हम इतना कुछ झेल सकते हैं तो फिर अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी ‘गैर’ महिला के साथ सेक्स करने वाले को क्यों नहीं झेल सकते? ‘सेक्स-संबंधों’ पर आगे की बात करने से पहले जरा एक बार भारतीय राजनीति के ऐसे ही कुछ अन्य नेताओं के बारे में भी जान लेते हैं। खास बात यह है कि ऐसे लोग देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों में भी हैं।
मध्य प्रदेश बीजेपी के नेता और वित्त मंत्री रहे राघव जी की 2013 में आई, वह सीडी भी याद कर लीजिए जिसमें 79 वर्षीय राघव जी अपने नौकर के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पाए गए थे। 2009 में आई कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी की वह सीडी याद करिए जिसमें वह तीन महिलाओं के साथ आपत्तिजनक हालत में दिखाई दे रहे थे। इसी पार्टी के राजस्थान के महिपाल मदेरणा और नर्स भंवरी देवी का सेक्स सीडी स्कैंडल याद है ना? उस समय महिपाल भी गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री थे।
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राघव जी (बाएं), एनडी तिवारी (मध्य) और महिपाल मदेरणा (दाएं)।
इनके अलावा भी अन्य कई नेता हैं जिन पर महिलाओं ने रेप के आरोप तक लगाए हैं परंतु उस पर बात नहीं होगी। बात होगी संदीप कुमार के केस की, जिसमें कोई पीड़िता नहीं है और जिसमें किसी ने आकर शोषण की शिकायत तक दर्ज नहीं कराई है, उस पर पूरा सोशल मीडिया इस तरह से कटाक्ष कर रहा है जैसे सहमति से ‘सेक्स’ करना भी अपराध हो। विरोध का स्तर भी इतना गिरा लिया कि अपने पूर्वज तक याद नहीं रहे। यह भी छोड़िए, कुछ तो ऐसे हैं जो अपने को सही साबित करने के लिए गांधी, नेहरू और अटल तक को बीच में ले आए। अटल जी ने कहा था कि मैं कुंवारा हूं लेकिन ब्रह्मचारी नहीं। यहां उन्होंने ब्रह्मचारी शब्द का प्रयोग किन अर्थों में किया था, यह एक अलग विषय है लेकिन भविष्य में उनके इस वाक्य को किस सीमा तक ले जाया जाएगा, यह जानते हुए भी इस वाक्य को बोलने की हिम्मत रखना मामूली बात नहीं थी। ‘सत्य के प्रयोग’ लिखने वाले मोहनदास करमचंद गांधी जी के व्यक्तिगत जीवन में उनकी सोच क्या रही होगी, वह एक अलग विषय है लेकिन उसे लिखने की क्षमता रखना सामान्य श्रेणी में तो नहीं आता।

पार्टी प्रवक्ता की ओर से उदाहरण तो इन लोगों का दिया जा रहा है लेकिन आरोपी अपनी बात स्पष्ट रूप से कहने के बजाय ‘दलित कार्ड’ फेंक रहा है। कैसी राजनीति है! एक महिला के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वह पूर्णरूप से संस्कारविहीन दिखती है। ऐसे लोग जो सोशल मीडिया पर एक लड़की के चरित्र का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं, वे कम से कम एक बार अपनी व्यक्तिगत जीवन के विषय में भी सोचें। मेरा मानना है कि सवाल इस बात पर नहीं उठना चाहिए कि एक ‘जनप्रतिनिधि’ के किसी गैर महिला के साथ संबन्ध थे बल्कि सवाल इस बात पर उठना चाहिए कि संदीप कुमार ने आखिर तस्वीरें क्यों खींची और विडियो क्यों बनाया? सवाल इस बात पर उठना चाहिए कि किसी महिला के सम्मान को लेकर एक व्यक्ति इस हद तक गैरजिम्मेदार कैसे हो सकता है? सवाल इस बात पर उठना चाहिए कि सोशल मीडिया पर एक लड़की के सम्मान से खुलेआम खिलवाड़ करने वालों पर कार्रवाई कब होगी?

विश्वास मानिए, यदि विरोध भी सकारात्मकता की नींव पर टिका होगा तो निश्चित ही देश की राजनीति में परिवर्तन देखने को मिलेगा।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...