Monday, 20 September 2021

UP में सच दिखाने की सजा FIR क्यों है? CM योगी आदित्यनाथ के नाम एक पत्रकार का खुला पत्र

 प्रिय योगी आदित्यनाथ जी,
देश में बीते साल जब कोरोना का कहर शुरू हुआ तो सरकार ने बेहद संजीदगी से प्रवासी मजदूरों को मुफ्त में राशन पैकेट और भोजन पैकेट उपलब्ध कराने शुरू किए। फिर जब काम-धंधे रुक गए तो सरकार ने गरीबों को मुफ्त राशन देने की घोषणा कर दी। दुनिया में मुफ्त में राशन वितरण की यह सबसे बड़ी योजना थी। एक भारतीय के तौर पर मेरे लिए ये गर्व का विषय था कि अचानक आई महामारी को लेकर तमाम अव्यवस्थाओं के बीच सरकार कम से कम भूख मिटाने का इंतजाम कर रही है।

इस बीच अचानक पता लगा कि गरीबों के हक पर डाका जा रहा है। सरकारी राशन की दुकानों पर कोटेदार गरीबों के राशन में घटतौली कर रहे हैं। खबर हुई तो कुछ कोटेदारों पर ऐक्शन भी हो गया। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसका संज्ञान लिया। कई फोन आए, लोगों ने बधाइयां दीं, सुकून था कि प्रदेश के अंतिम व्यक्ति को मिलने वाले हक में थोड़ा योगदान मेरा और मेरे संस्थान का भी है।

पढ़ें: एनबीटी के 'ऑपरेशन भूख' का बड़ा असर: सीएम योगी बोले- कतई न होने पाए गरीबों के राशन में कटौती

फिर कोरोना की दूसरी लहर आई, फिर वैसी शिकायतें थीं, लोगों का कहना था कि हमें एकबार फिर से 'ऑपरेशन भूख' को रिएक्टिवेट करना चाहिए। हमने किया।

देखें वीडियो:
https://www.facebook.com/watch/?v=921599678683156


कोटेदारों ने खोली गोदाम की पोल
इसबार कोटेदारों ने साफ कहा कि उन्हें राशन गोदाम से ही कम मिलता है, बोरियों का वजन नहीं दिया जाता, अतिरिक्त वसूली भी होती है। अफसरों से बात की गई तो उन्होंने जांच कराने की बात कही। लेकिन कार्रवाई फिर से कोटेदारों पर हो गई और मामले को खत्म करा दिया गया। हमारे पास लगातार फोन आ रहे थे कि व्यवस्थाएं नहीं सुधरीं। अफसर छोटी मछलियों पर कार्रवाई करके खानापूर्ति कर देते हैं और बड़ी मछलियां आराम से भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगाती रहती हैं। खैर, हमारी टीम बुलाकी अड्डे के पास स्थित FCI के गोदाम पहुंची। यहीं से कोटेदारों को राशन दिया जाता है। वहां जाने से पहले हमने अपने कुछ कोटेदारों को फोन किया और पूछा कि क्या वे वहां आ सकते हैं। किसी ने समय मांगा तो किसी ने मना कर दिया। इसबीच अलका नाम की एक कोटेदार के रिश्तेदार रजनीश ने कहा कि वह आज राशन लेने जा रहे हैं। मैंने उनको गोदाम पर मिलने को कहा।

जब दबाव काम नहीं आया तो मैडम धमकाने लगीं
गोदाम पर मार्केटिंग इंस्पेक्टर शशि सिंह मौजूद नहीं थीं, एक कथित कर्मचारी जिसका नाम मोनू था, वो कोटेदारों को राशन दे रहा था। पहले तो हमने चुपचाप उसके काम और बातचीत की रिकॉर्डिंग की, फिर उसे अपना परिचय देने के बाद उसका परिचय पूछा। वो भड़क गया और कई लोगों से फोन कराकर दबाव डलवाने लगा। इसबीच उसने शशि सिंह से बात कराई, शशि सिंह ने मेरा परिचय पूछने के बाद फो न काट दिया। इसके बाद शशि सिंह ने अपने कई 'रिश्तेदार' पत्रकारों से फोन कराया, लेकिन मेरा साफ स्टैंड था कि मैं अपनी खबर के बीच में किसी को नहीं आने दूंगा।

कुछ देर के बाद शशि सिंह आईं और जब उनसे पूछा गया उनकी अनुपस्थिति में एक आउटसोर्सिंग वाला कर्मचारी कैसे बिना वेरिफिकेशन के राशन कैसे बांट सकता है तो वह भड़क गईं और एफआईआर की धमकी देने लगीं। बाद में विभिन्न धाराओं में मेरे साथ मेरे सहयोगी आशीष सुमित मिश्रा पर FIR हुई और मुख्य आरोपी रजनीश नामक शख्स को बनाया गया। इसकी वजह थी कि वह कैमरे पर वहां की व्यवस्थाओं को नंगा कर रहा था, सच बोल रहा था।

अब मैं कुछ टेक्निकल चीजें समझाता हूं।
1. उत्तर प्रदेश में एक कोटेदार को प्रति क्विंटल 70 रुपये मानदेय मिलता है, राशन बंटवाने के लिए।
2. डोर स्टेप डिलिवरी खत्म होने के बाद सरकार कोटेदारों को लगभग 18 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से अतरिक्त धन दे रही है, गोदाम से कोटे तक लाने के लिए।
यानी कोटेदार को कुल 70+18= 88 रुपये सरकार की ओर से मिलता है।
3. कोटेदार को राशन तौलवाने का पैसा गोदाम पर अलग से देना पड़ता है, उसे खुद गोदाम जाकर राशन लदवाना पड़ता है और इतनी महंगाई में वह कम से कम 35-40 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से राशन को अपने कोटे तक लेकर आता है। अब एक गणित समझिए:

मान लीजिए किसी कोटेदार के पास 200 क्विंटल राशन आ रहा है, इसका मतलब है कि उसे सरकार की ओर से 17,600 रुपये मिल रहा है।
इसके बाद उसके खर्च जोड़िए
गोदाम से कोटे तक राशन लाने का खर्च: 200x40= 8000
दुकान का किराया= 4000 (औसतन)
सहयोगी का खर्च= 8000 (औसतन)
बिजली का बिल= 1000 (औसतन)
स्टेशनरी (पेन, डायरी, बिल)= 1000 (औसतन)
अतिरिक्त खर्चे (राशन लेने जाना, उतरवाना)=1000
कुल= 23000 रुपये
यानी क्या कोटेदार 5400 रुपये अपनी जेब से भरेगा? नहीं वो भ्रष्टाचार करेगा। क्योंकि सिस्टम ऐसा बना हुआ है। और ये जो गणित मैंने समझाया है, ये हर अधिकारी को पता है, इसलिए कठोर कार्रवाई नहीं होती।

कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार
सबसे आसान तरीका ये है कि सरकारी राशन की दुकानों को सरकार सीधे तौर पर अपने अंडर में ले ले और वहां बाकायदा कर्मचारी तैनात करके राशन का वितरण कराए। ऐसे मामलों में जवाबदेही उस सरकारी कर्मचारी की तय होगी।
दूसरा रास्ता यह है कि दिल्ली, हरियाणा जैसे अन्य राज्यों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में कम से कम मानदेय इतना किया जाए कि इन कोटेदारों को गलत करने की जरूरत ना पड़े। फिर गोदाम से लेकर दुकान तक, कड़ाई से व्यवस्था का पालन कराया जाए।  

हो सकता है कि ये कोटेदारों के पक्ष की बात हो, लेकिन असल में ये बात सीधे तौर पर सूबे के गरीबों से जुड़ी हुई है। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान एक पेपर हुआ करता था 'मीडिया रिसर्च'। उसमें खबर के पीछे छिपी खबर निकालना बताया जाता था। मैं जो भी स्टोरी करता हूं, उसकी तह में जाकर पता करता हूं कि असल मसला फंस कहां रहा है। इस मामले में भी वही है। मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। बेहद संजीदगी के साथ अपना काम करता रहूंगा।

मामले में भले ही FIR हुई हो, लेकिन उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं अपना काम कर रहा हूं और व्यवस्था अपना काम करेगी। बस दो छोटे से सवाल हैं
1. एक बच्ची को लगातार अश्लील वीडियो कॉल आते हैं, 4 दिन तक पिता थाने के चक्कर लगाता रहता है, लेकिन एक FIR दर्ज नहीं करती।
दुकान से लूट हो जाती है, दुकानदार से मारपीट होती है, पुलिस कहती है कि 151 में मुकदमा कराना है तो कराओ, लूट का नहीं लिखेंगे। इसके बाद पीड़ित आपको पत्र लिखता है।
किसी के साथ राजधानी के बड़े चौराहे पर मोबाइल लूट होती है, लेकिन पुलिस 3 दिन तक FIR नहीं दर्ज करती।
इतनी संजीदा UP पुलिस कुछ ही घंटों में बिना एक बार भी मेरा पक्ष जाने FIR कैसे दर्ज कर लेती है। क्या इसलिए क्योंकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दबाने की कोशिश में सब हिस्सेदार हैं।

2. ये तेजी अच्छी है, FIR का मतलब होता है- First Information Report यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट। सूचना मिलते ही पुलिस का नैतिक दायित्व है कि FIR दर्ज करे, लेकिन हर मामले में ही ऐसा करे। बाकी मामलों में ऐसा क्यों नहीं होता?

एक राष्टवादी सरकार से मेरी अपेक्षा क्या थी?
FIR हो गई थी, कोई बात नहीं थी। लेकिन 3 दिन बीत जाने के बाद भी एक कामचोर अफसर कुर्सी पर बैठा है, मामले में उच्चस्तरीय जांच क्यों नहीं हुई? हम तो सरकार की मदद कर रहे हैं, बता रहे हैं कि किस तरह से व्यवस्था को खराब किया गया है, किस तरह से अफसरों ने गड़बड़ की है, सरकार को तो हमारा सहयोग करना चाहिए। और हम अपेक्षा भी यही करते हैं।

Wednesday, 15 September 2021

लखनऊ के पत्रकार साथियों के नाम Open Letter

 नमस्ते,
मुझे बताया गया कि लखनऊ की मीडिया के एक वॉट्सऐप ग्रुप में हाल ही में मेरे ऊपर हुई एफआईआर को लेकर कुछ चर्चा हो रही है। उसमें इस पूरे मामले को लेकर कुछ भ्रम जैसी स्थिति है। इसलिए मैं चाहता हूं कि मेरी बात भी लखनऊ के सभी जूनियर-सीनियर पत्रकार मित्रों तक पहुंचे।
सबसे पहले तो अपने बारे में बता दूं, क्योंकि डिजिटल में काम करने की वजह से फील्ड में अधिक नहीं रह पाता और इसी वजह से आप सभी से परिचय भी नहीं हो पाया। मेरा नाम विश्व गौरव है और मैं लखनऊ का ही रहने वाला हूं। 2010 में लखनऊ से ही बहुत छोटे स्तर पर पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर 2013 में दिल्ली गया और 2017 तक वहीं पत्रकारिता की। फिलहाल लखनऊ में हूं और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में काम कर रहा हूं। वैसे तो सामान्य तौर पर डिजिटल में डेस्क पर काम करने वाले लोग स्टोरीज नहीं करते, लेकिन मैंने शुरुआत से ही इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की।
अब आते हैं इस मामले पर।

हमने बीते साल 'ऑपरेशन भूख' नाम से एक सीरीज चलाई थी। काफी प्रभावी सीरीज रही थी।


डीटेल में आप उसके बारे में यहां जान सकते हैं। मुझे जानकारी मिली थी कि सरकारी राशन की दुकानों पर कोटेदार गरीबों के राशन में घटतौली कर रहे हैं। खबर हुई तो कुछ कोटेदारों पर ऐक्शन भी हो गया। फिर कुछ कोटेदारों ने मुझसे मिलकर अपनी समस्याएं बताईं, ऊपर दिए गए लिंक पर आप देख सकते हैं कि उनके पक्ष को भी शामिल करते हुए हमने स्टोरीज कीं। इसके बाद अभी 2-3 महीने पहले हमने फिर से अपनी वही पुरानी सीरीज शुरू की, जिसमें फिर से लोगों को राशन कम दिया जा रहा था। कोटेदारों ने ऑन कैमरा बताया कि उन्हें गोदाम से राशन कम मिलता है।
यहां देखें:




जिसके बाद जिला प्रशासन ने कोटेदारों पर कार्रवाई करके खानापूर्ति कर ली। फिर इस महीने मेरे पास कई कोटेदारों के फोन आए कि गोदाम से राशन कम मिल रहा है और अवैध वसूली हो रही है। उनका कहना था कि डोरस्टेप डिलिवरी खत्म होने के बाद व्यवस्था और खराब हो गई है। जिसके बाद हमारी टीम बुलाकी अड्डे के पास स्थित FCI के गोदाम पहुंची। यहीं से कोटेदारों को राशन दिया जाता है। वहां जाने से पहले हमने अपने कुछ कोटेदारों को फोन किया और पूछा कि क्या वे वहां आ सकते हैं। किसी ने समय मांगा तो किसी ने मना कर दिया। इसबीच अलका नाम की एक कोटेदार के रिश्तेदार रजनीश ने कहा कि वह आज राशन लेने जा रहे हैं। मैंने उनको गोदाम पर मिलने को कहा।

गोदाम पर मार्केटिंग इंस्पेक्टर शशि सिंह मौजूद नहीं थीं, एक कथित कर्मचारी जिसका नाम मोनू था, वो कोटेदारों को राशन दे रहा था। पहले तो हमने चुपचाप उसके काम और बातचीत की रिकॉर्डिंग की, फिर उसे अपना परिचय देने के बाद उसका परिचय पूछा। वो भड़क गया और कई लोगों से फोन कराकर दबाव डलवाने लगा। इसबीच उसने शशि सिंह से बात कराई, शशि सिंह ने मेरा परिचय पूछने के बाद फो न काट दिया। इसके बाद शशि सिंह ने अपने कई 'रिश्तेदार' पत्रकारों से फोन कराया, लेकिन मेरा साफ स्टैंड था कि मैं अपनी खबर के बीच में किसी को नहीं आने दूंगा।

कुछ देर के बाद शशि सिंह आईं और जब उनसे पूछा गया उनकी अनुपस्थिति में एक आउटसोर्सिंग वाला कर्मचारी कैसे बिना वेरिफिकेशन के राशन कैसे बांट सकता है तो वह भड़क गईं और एफआईआर की धमकी देने लगीं। बाद में विभिन्न धाराओं में मेरे साथ मेरे सहयोगी आशीष सुमित मिश्रा पर FIR हुई और मुख्य आरोपी रजनीश नामक शख्स को बनाया गया। इसकी वजह थी कि वह कैमरे पर वहां की व्यवस्थाओं को नंगा कर रहा था, सच बोल रहा था।

शशि सिंह का कहना था कि उनके पास महिलाबाद का भी चार्ज है, और वो वहां गई थीं, लेकिन मेरे सूत्रों ने बताया कि वो उसदिन वहां भी नहीं थीं। रही बात उनके बयान की, तो वीडियो में उन्होंने जो बोला है, उसके बाद मेरा जवाब यही था कि 'आपने जो कह दिया, मैं कोटेदारों के आरोपों के साथ उसे भी चला दूंगा।'

साथियो, हम में से कई 'सिस्टम' वाले या फिर ऐक्सिडेंटल पत्रकार होंगे, लेकिन मैंने बहुत कुछ छोड़कर इसे चुना है। आज तक और आगे भी कोई मुझपर किसी तरह की दलाली प्रमाणित नहीं कर सकता। पूरी जिम्मेदारी के साथ अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर पत्रकारिता करता हूं। सिलिंडर पर मिलने वाली सब्सिडी से लेकर किसी तरह की 'गैरजरूरी' सरकारी सुविधा नहीं ली। कई वर्तमान मंत्री निजी तौर पर काफी पहले से संपर्क में हैं, कई जूनियर इन मंत्रियों के PRO हैं, कई पुराने निजी संबंधों वाले परिचित विभिन्न राजनीतिक दलों में बड़ी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन पत्रकारिता शुरू करने से लेकर आज तक किसी राजनीतिक दल के कार्यालय से लेकर सचिवालय तक में एक चाय तक नहीं पी। पत्रकारिता के इतने बड़े ब्रैंड से जुड़ने के बाद कभी उन लोगों से मिलने नहीं गया। बात की, तो भी बेहद प्रोफेशनल होकर। लोग कहने लगे कि तुम बदल गए हो लेकिन शायद ये बदलाव मेरी जिम्मेदारी के साथ स्वतः ही आ गया था।

मुझे नहीं पता कि मेरी बातों को आप किस तरह से लेंगे, लेकिन मैं बस अंत में इतना कहना चाहता हूं कि मेरी किसी से लड़ाई नहीं है, मुझे किसी से लड़ना भी नहीं है लेकिन ये धर्म युद्ध है और जो इस युद्ध में सत्य के साथ नहीं है, वो निश्चित ही असत्य/अधर्म के साथ है।
बाकी फैसला आप सभी पर है...

आपका
विश्व गौरव

Wednesday, 7 October 2020

वो शख्स... जो इस दौर में भी अपने पेशे की जिम्मेदारी समझता है...

उस रात करीब 11:40 हुआ था... लॉकडाउन का माहौल था... मेरा फोन बजा, उसने बोला- भैया... सरकार कह रही है, सब ठीक है, लोगों को पर्याप्त सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन क्या वाकई ऐसा है?

छत्तीसगढ़ के कुछ मजदूर लखनऊ में 'भूखे-प्यासे' फंसे थे, उनकी दयनीय स्थिति पर एक स्टोरी उसी दिन की थी... सरकारी रेकॉर्ड में सब ठीक था, लेकिन स्टोरी के बाद हकीकत मुख्यमंत्री जी के सामने थी, जिले के सर्वोच्च अधिकारी ने मेरी स्टोरी पर अपने 'अधिकारियों' के सामने सवाल उठाए, लेकिन जब मेरे बारे में पता किया तो समझ गए कि झूठे दावों की पोल खुलते देर नहीं लगेगी... खैर, उस दिन एक नोटिस आते-आते बचा...

रात में जब उसका फोन आया तो उस रात यही कहा कि यार सरकार बहुत काम कर रही है... वो मानने को तैयार नहीं था, पर मैंने कहा था तो भरोसा कर लिया। अगली सुबह 7-7:30 हुआ होगा... मैं लैपटॉप ऑन करके बैठा ही था कि अचानक फिर उसका फोन आया, 'भैया, कुछ देखे क्या?' मैं निःशब्द था... मैंने मजाक में कहा- अबे! सो तो लिया कर... उसका जवाब था- भैया, रोज कमाकर खाने वाले कैसे सो रहे होंगे, सब बंद है भैया... मैंने कहा- चलो देखता हूं... और फोन काट दिया...

करीब 9 बजे घर के गेट तक निकलकर गया, उसी वक्त करीब 70-72 साल की एक महिला, उधर से गुजरीं... वो बड़बड़ा रही थीं कि 'भइया बताइन रहै कि मोदी जी गेंहू-चावल बिना पइसा क दइ रहे, ई तौ भगाय देत हैं... कुरौना कहां ति आय गवा पतै नाई...'

आवाज में आंसू महसूस हुए तो पूछा- दादी क्या हुआ? वो बोलीं- कुछ नाई भइया, राशन ले गए रहन, देबै नाई करिन... लड़िका गांव गवा रहै, हुंवए है... 

मैं हैरान था कि सरकार फ्री राशन के दावे कर रही है, और जमीनी हकीकत ये है... सबसे पहले तो जाकर उन्हें राशन दिलाया और एडीएम को फोन लगाकर उसकी शिकायत की। साथ ही उस कोटेदार को हिदायत भी दी कि अगर कोई भी बिना राशन के वापस गया तो ठीक नहीं होगा। साथ ही यह भी कहा कि अगर कोई और दिक्कत आती है तो मुझे बताए।

खैर, चूंकि वो मेरे छोटे भाई जैसा दोस्त था तो उसे कॉल करके पूरी बात बताई... उसने कहा कि भैया, डिटेल पता करिए... हर जगह ऐसा ही चल रहा होगा। अपने सोर्सेज से पता किया तो पता लगा कि वाकई हकीकत वही थी, जिसका संदेह था... पहली स्टोरी थी वो इस चीज को लेकर... फिर लोगों के फोन आए, कुछ धमकी के लिए तो कुछ परेशानियां बताने के लिए... और उस तरह की समस्याओं को नाम दिया गया 'ऑपरेशन भूख'... लालच दिया गया... स्टोरीज रोकने की कोशिश हुई लेकिन हम करते रहे... 5 स्टोरीज में प्रशासन के भ्रष्टाचार की पूरी पोल खुल गई... आखिरकार मुख्यमंत्री ने संज्ञान लिया। 

आप कल्पना करके देखिए, लाखों लोग... उन लाखों लोगों को राशन देने वाले सैकड़ों कोटेदार आज खुश हैं... हम भी खुश हैं... उसके शब्दों की गहराई, हर पाई-हर मात्रा में छिपा दर्द, हर सांस में गुस्सा, और मेरे प्रति उसकी निष्ठा... वही सब है, जो उसे मेरे जैसे इंसान के भरोसे के काबिल बनाता है... 

तुम हकदार थे हिमांशु इसके... प्रमोशन की बहुत बधाई... अशेष मंगलकामनाएं... लिखते रहो... पढ़ते रहो और बढ़ते रहो...

बस याद रखना, शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है...


एक बार फिर जीवन का रथ, बढ़ा शुक्र के पथ पर,

राजनीति डोरे डालेगी फिर सेवा के व्रत पर !


लक्ष्मण रेखा बड़ी क्षीण है, बड़ी क्रूर है काई,

कदम कदम पर फिसलाएगी रेशम सी चिकनाई !!


काजल के पर्वत पर चढ़ना, चढ़ कर पार उतरना,

बहुत कठिन है निष्कलंक रह करके ये सब करना !!


पर जब जब आप सहारा देते, इनका सर सहलाते,

जब जब इनको अपना कहकर अपने गले लगाते,

तब तब मुझको लगता है,  ये जीवन जी लेंगे,

नीलकंठ कि तरह यहाँ का सारा विष पी लेंगे !!!!"



Monday, 17 August 2020

#MediaMafia : डर और अहंकार का कॉकटेल है ये 'प्रजाति'

मीडियाकर्मियों और पत्रकारों से संपर्क संबंध को लेकर निजी तौर पर मेरा दायरा बहुत छोटा सा है। बहुत अधिक संबंध बनाने का ना ही समय मिलता है और ना ही मीडिया में ऐसा कोई गॉडफादर है, जिसके नाम पर बिना समय दिए संबंध बनाए जा सकें। संस्थानों में क्या हो रहा है, कौन कहां जा रहा है, इससे कोई खास मतलब नहीं रहा। लेकिन अभी हाल में ट्विटर पर एक दिन अचानक टॉप 50 ट्रेंड देख रहा था तो उसमें #MediaMafia दिखा। यह ट्रेंड कुछ  रोचक लगा क्योंकि 'मीडिया में माफिया' जैसा मैंने कभी कुछ महसूस नहीं किया था। और वैसे भी मीडिया जैसे जिम्मेदारी भरे काम में माफिया का क्या काम?

खैर, ट्रेंड देखा तो ट्वीट्स भी देखने की इच्छा हुई।  ट्वीट्स में कई तरह की बातें थीं। किसी को उसके संस्थान में कथित तौर पर लिखने से रोका जा रहा था, किसी को इस वजह से नौकरी नहीं मिल रही थी, क्योंकि उसका कोई 'गॉडफादर' नहीं था। कोई किसी संस्थान पर खबरें रोकने का दबाव बनाने का दावा कर रहा था। कोई किसी संस्थान पर नेताओं की पीआर खबरें चलाने का आरोप लगा रहा था। किसी को इस बात का कष्ट था कि मीडिया गरीबों की खबरें नहीं चलाता, तो कोई किसी संस्थान पर समाचारों की जगह पर विचार थोपने का आरोप लगा रहा था। इन ट्वीट्स में कई ऐसे भी थे जो पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान मेरे सीनियर या जूनियर रहे। उनमें से कई से इस बारे में बात की। सभी के अपने तर्क थे। लेकिन इस बीच बीते कुछ दिनों में निजी तौर पर चिंतन करने के बाद मैं एक निष्कर्ष पर पहुंचा।

क्या होते हैं मीडिया माफिया

#MediaMafia को लेकर मेरा मत है कि यह और कुछ नहीं बल्कि छोटे स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों के मन में अपना निजी अहित होने का डर, मिडिल (मैनेजमेंट से मिलकर) स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का सत्ता से डर और उनमें व्याप्त अहंकार के कॉकटेल से उपजी एक विशिष्ट प्रजाति है। नहीं समझे हैं तो समझिए, किसी एक इलाके में कोई माफिया कब बनता है? जब वहां के स्थानीय लोगों के द्वारा किसी व्यक्ति विशेष को बढ़ावा दिया जाने लगता है। आप किसी गांव में रहते हैं, वहां किसी ने आपके पड़ोसी को दबाने की कोशिश की, वह दब गया, फिर उसका दुस्साहस बढ़ा, वह दूसरे के पास पहुंचा, उसे दबाया... फिर उसका क्षेत्र बढ़ता गया और वह लोगों को दबाता गया। आगे चलकर वह माफिया बन गया। इसमें कुछ अपवाद हो सकते हैं कि वह बहुत दबाया गया हो, उसे व्यवस्था ने बहुत प्रताड़ित किया हो, फिर वह बागी बन गया हो और फिर उसका क्षेत्र बढ़ता जाए। लेकिन इस तरह का अपवाद मीडिया में सामान्य तौर पर नहीं होता।

चाटुकारों को पसंद करते हैं ये लोग
लोगों से हुई बातचीत और अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि मीडिया के एक हिस्से में एक व्यक्ति के नीचे कई लोग काम करते हैं। वह ऊपर वाला व्यक्ति व्यवस्थाओं को अपने तरीके से चलाने की कोशिश करता है। कई बार निजी स्वार्थ में, तो कई बार 'पूंजीपतियों' और 'सत्ताधारी पार्टी/नेताओं/अधिकारियों' से अपना सिस्टम सेट करने के लिए नीचे के लोगों को अपने तरीके से काम करने के लिए मजबूर करता है। वो उसे लिखने से रोकता है, खबरों का ऐंगल तय करता है, जो 'पत्रकारिता' करने की कोशिश करता है, उसे नौकरी से हटा दिया जाता है या हटाने की साजिश रची जाने लगती है। वो समाचार से ज्यादा विचार पर फोकस करता है। वो कई बार तो इस स्तर तक चला जाता है कि एक सामान्य व्यक्ति को भी उसके सामने खड़ा कर दिया जाए तो अपने 'कुकर्मों' का हिसाब नहीं दे पाएगा। वो अपने आसपास ऐसे ही लोगों को रखता है, जो उसके हिसाब से उसके फायदे की बात करें। लेकिन सवाल ये है कि इन्हें बनाता कौन है? क्या इनपर कोई अंकुश नहीं रहता?

इनके निर्माता 'हम' हैं
आपने कई बार ऐसी खबरें सुनी होंगी, खासकर छोटे संस्थानों में, कि कोई व्यक्ति एक संस्थान से गया तो अपने साथ कई लोगों को लेकर चला गया। या किसी ने कोई नया संस्थान जॉइन किया तो वहां पर अपने कई करीबियों को ले आया। ये सब सामान्य बातें हैं। हो सकता है कि जिन्हें वह लाया हो, उसमें से कई वाकई बेहद प्रतिभावान हों, लेकिन अधिकाशतः ये वही लोग होते हैं जिनसे उस व्यक्ति की 'ट्यूनिंग' अच्छी होती है। नए बच्चों में वो उस संस्थान से निकले लोगों को नौकरी देने की कोशिश करता है, जहां उसने खुद पढ़ाई की हो, या फिर जिस संस्थान में उसके अपने संबंध वाले शिक्षक हों। इस तरह के लोगों को 'हम' बनाते हैं। इस 'हम' में हर स्तर के लोग हैं। चाहे वह कॉपी राइटर हों या संपादक...

भूतकाल की कुंठा, अहंकार बन जाती है
मान लीजिए, एक स्थानीय संपादक या रिपोर्टिंग इंचार्ज अपने से छोटे स्तर के पत्रकार को लगातार दबाने की कोशिश करता है, तो जिसे दबाया जाता है, वह चुप क्यों रहता है, क्यों आवाज नहीं उठाता, क्यों मैनेजमेंट से उसकी शिकायत नहीं करता। बहुत परेशान होने के बाद वह नौकरी छोड़ देता है। नई जगह पर भी वही होता है। 20-25 साल बाद किसी तरह जब वह किसी छोटे-बड़े संस्थान में संपादक बन जाता है तो बीते समय में भरी कुंठा को अपने जूनियरों पर उतारता है, उन्हें प्रताड़ित करता है, उसे नौकरी मिलने के टाइम जैसी समस्याएं आई थीं, वैसी ही दिक्कतें वह दूसरों के लिए खड़ी करता है। उसे लगने लगता है कि संपादक बनने के लिए प्राथमिक आर्हता यही है कि आप 'अहंकारी' हो जाएं। उसका दायित्वबोध शून्य हो जाता है, उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि बड़ी शक्तियों के साथ बड़ी जिम्मेदारियां भी आती हैं। हालांकि कई बार कोई किसी विशेष प्रकार के 'डर' और 'अहंकार' के कारण भी 'माफियाई' बीज वृक्षाकार रूप लेने लगता है। इस तरह के लोगों में पुराने अनुभवों का कोई रोल नहीं रहता, वे बस अहंकार में अपना काम करते रहते हैं।

इनसे मीडियाकर्मियों का नहीं, देश का नुकसान है
इस तरह के लोगों को जवाब देना सीखिए, ऐसे लोगों को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाइए, उन्हें बताइए कि अगर आप संपादक, स्थानीय संपादक, बीट इंचार्ज, सेक्शन इंचार्ज कुछ भी हैं, और आप किसी को नौकरी दे रहे हैं तो उसके ज्ञान और काम को देखकर दीजिए, किसी को नौकरी से निकाल रहे हैं तो भी यही देखिए। निजी संबंधों के आधार पर खासकर इस पेशे में नौकरी देना-निकालना इसलिए नहीं ठीक है क्योंकि इस पेशे के साथ सैकड़ों-हजारों जिम्मेदारियां जुड़ी हैं। आम लोग आपसे अपेक्षा रखते हैं, सत्ता के साथ मिलकर, या संबंधों के लिए, या चाटुकारिता के चलते अगर उन आम लोगों की अपेक्षाओं को, उनके सपनों को कुचलने की कोशिश करोगे तो याद रखना वक्त सबका हिसाब लेता है... बाकी निचले स्तर पर जो काम कर रहे हैं, उनकी खामोशी इस तरह के लोगों को बढ़ावा देती है। ये लोग नहीं हैं, ये सिर्फ एक सोच है जिसमें कुछ लोग फंस गए हैं, इस सोच का खत्म होना मीडिया संस्थानों या पत्रकारों के लिए नहीं बल्कि आम लोगों के लिए जरूरी है... भारत के लिए जरूरी है...

हर जगह ये लोग नहीं 'पनपते'
इन सबके बीच अगर आप ऐसा सोचते हैं कि हर मीडिया संस्थान में ऐसा ही होता है तो आप गलत हैं। यह बात मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूं। मैं जिस संस्थान में काम करता हूं, वहां पहले नोएडा में रहा। तत्कालीन संपादक कहते थे कि 'हिंदी की कमाई खा रहे हैं तो हिंदी में गलती नहीं होनी चाहिए।' वह कहते थे कि हम जैसी हिंदी पाठक को देंगे, वह उसे ही सही मानेगा, इसलिए भाषागत अशुद्धियां ना जाएं, तभी बेहतर रहेगा। नोएडा में मैं भी एक टेस्ट पास करके गया था, और बाकियों ने भी टेस्ट पास किए थे। मेरे कॉलेज के एक सीनियर ने तो यहां तक कहा कि वह सिर्फ एक 'बिंदी' की गलती की वजह से उस संस्थान में काम नहीं कर पा रहा है, जहां फिलहाल मैं कर रहा हूं। नोएडा से लखनऊ आया, यहां भी वही तरीका देखा। कुल मिलाकर यहां निजी संबंधों के आधार पर लोगों को नौकरी नहीं, बल्कि उनके ज्ञान के आधार पर मिली। मुझे लगता है कि #MediaMafia वाला खेल उन संस्थानों में नहीं चलता होगा, जहां की व्यवस्थाएं लंबे समय से दुरुस्त हैं। हालांकि यह सिर्फ मेरा मत है, जो मेरे निजी अनुभव पर आधारित है। खैर, आप अगर पत्रकारिता कर रहे हैं और भविष्य में आगे जाइए, तो बस कुछ ऐसा न करिए कि लोग आपके लिए भी वही कहें जो आज आप दूसरों के लिए कह रहे हैं।

अंत में राहत इंदौरी के एक शेर की अधूरी पंक्ति के साथ अलविदा...
बन के इक हादसा बाजार में आ जाएगा, जो नहीं होगा वो अखबार में आ जाएगा

Monday, 27 August 2018

कहानी अपने उस एकलौते 'दोस्त' की...

कल अचानक फेसबुक पर कॉलेज में जूनियर रहे एक मित्र ने मेसेज किया, 'भैया, आपको जामिया में सुना था। आपने और आपकी टीम के दूसरे भैया ने बहुत अच्छा बोला था। आप विषय के विपक्ष में थे और वह पक्ष में लेकिन आप दोनों में से किसी ने भी एक बात भी ऐसी नहीं बोली जो सामने वाले की किसी बात की विरोधाभासी हो। उसके बाद आप लोगों को फेसबुक पर सर्च किया तो पता लगा कि आप दोनों पुराने दोस्त हैं और खास दोस्त हैं। अगर दिल से नजदीकियां ना हों तो किसी के बीच इतनी अच्छी ट्यूनिंग नहीं हो सकती, लेकिन पिछले 2-3 साल से आप दोनों की साथ में एक भी तस्वीर नहीं देखी। कहां चले गए आप दोनों, एक साथ ज्यादा अच्छे लगते थे...'

यह मेसेज देखा तो जवाब देने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, आखिर बताता भी तो क्या? लेकिन इस सवाल के बाद यह लिखने का ख्याल जरूर आया...

'दांत काटी दोस्ती' से भी कहीं आगे थी हमारी दोस्ती, विचारधारा एक जैसी, कार्यशैली एक जैसी, वाकपटुता एक जैसी, परिवार एक जैसा, परिवार का अनुशासन एक जैसा, परिवार के संस्कार एक जैसे, कुल मिलाकर कहूं तो 'फिजिक' छोड़कर सबकुछ एक जैसा... विश्वविद्यालय की क्लासरूम पॉलिटिक्स से लेकर नैशनल लेवल पर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने तक, हम हमेशा साथ रहे और सबसे आगे रहे... अपनी प्रेम कहानी सुनाई तो वह रोया, उसकी प्रेमकहानी का बचपना सुनकर मैं हंसा... होली पर मैं उसके घर गया तो मेरी शादी के लिए जब लड़की वाले आए तो वह मेरे साथ ही मेरे घर आया... संबंध क्लासरूम से निकलकर घर की रसोई तक पहुंच गए थे।

सब अच्छा चल रहा था, जिंदगी में दोस्ती को सिर्फ एक शॉर्ट टर्म फीलिंग समझने वाला मैं, दोस्ती को एक आजीवन चलने वाला रिश्ता समझने लगा था। लेकिन इन सबके बीच उसकी अपनी लाइफ थी और मेरी अपनी, हम एक-दूसरे की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं करते थे। फिर भी हमारे दिन के लगभग 16 घंटे साथ में बीतते थे। लेकिन जौसा सुना था कि लोग आपकी खुशियां नहीं देख सकते, वैसा अब हमारे साथ होने वाला था।

हम अपनी जिंदगी का अधिकतर समय साथ में बिताते थे तो उसकी तथाकथित गर्लफेंड को लगने लगा कि मेरी वजह से वह उसे टाइम नहीं देता है। आखिर उसने चाल चली और मेरे बारे में उसे काफी कुछ कहा... बहुत कुछ ऐसा भी जो पता लगने के बाद मैं शर्म से रोया... कुछ ऐसा भी जिससे मेरी निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लग गया लेकिन उसने मुझसे कभी जिक्र नहीं किया कि उससे कोई मेरे बारे में कुछ गलत कह रहा है, हां दूरियां बढ़ाने की कोशिश जरूर की।

इधर उस लड़की ने मुझसे भी काफी कुछ कहा। उस समय वह लड़का कुछ पारिवारिक कष्ट में था और अपने घर गया था। मैं 15 दिनों तक झेलता रहा और आखिर एक दिन चेतनाशून्य होने के बाद उसे फोन लगाकर कह दिया कि उसकी गर्लफ्रेंड उसके लिए ठीक नहीं है। मैं विश्वास में था, या शायद अंधविश्वास में कि मेरा दोस्त और मेरी दोस्ती, एकलौती दोस्ती बची रहेगी लेकिन प्रेम के मोहपाश में वह इस कदर फंसा हुआ था कि उसे लगा कि मैं उसे दूर कर रहा हूं। जब कुछ समय तक मैंने देखा कि वह नहीं बदल रहा तो मैंने भी किनारा करने की ठान ली और दूर हो गया।

कहते हैं कि जब रिश्ते में दूरियां बढ़ जाती हैं तो 'प्रेम' लगभग खत्म ही हो जाता है, शायद यह सच है... क्योंकि मैं उसे जी रहा हूं। आज वह लड़की उसके साथ नहीं है क्योंकि सच उसके सामने है लेकिन मैं हारा हूं क्योंकि मैंने वह रिश्ता निभाने की कोशिश की जिसमें मैं अंधविश्वास चाहता था लेकिन वह अर्धविश्वास बनकर रह गया। मैं उसकी जगह किसी और को नहीं दे सकता क्योंकि मैं फिर हारना नहीं चाहता....

कोई है जो शायद उसकी जगह ले सके... लेकिन उसमें वह बात नहीं है... या शायद वह उससे बेहतर है और मैं डर रहा हूं उसे, 'उससे' बेहतर जगह देने में... डर है कि कहीं फिर हार ना जाऊं, पूरा 3 साल दे चुका हूं, उस रिश्ते को भूलने की कोशिश में, शायद इससे जल्दी तो कोई अपनी 'एक्स' को भी भूल जाता है लेकिन मैं वैसा नहीं हूं यार... बच्चे की तरह हूं... जो मिले, वो पूरा मिले... बस....

Friday, 22 June 2018

पर्दाफाश: देखें, नैशनल चैनल पर बैठकर कैसे झूठ फैलाते हैं रवीश कुमार

रवीश कुमार, अगर आप न्यूज देखते होंगे या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते होंगे तो आपने यह नाम जरूर सुना होगा। रवीश की एक खास बात है जिसकी वजह से लोग इन्हें या हो बेहद पसंद करते हैं या फिर बुरी तरह से नफरत करते हैं। लेकिन मैं इन्हें ना ही पसंद करता हूं और ना ही नफरत करता हूं। दरअसल में इनकी कथित पत्रकारिता का स्तर मेरे और मूल पत्रकारिता के स्तर से कहीं ऊपर है इसलिए मैं इन्हें इग्नोर करता हूं। शुरुआत में इनकी पत्रकारिता को देखकर लगता था कि यह तो बहुत क्रांतिकारी किस्म के पत्रकार हैं लेकिन जब इन्हें विवेक के साथ समझा तो समझ आया कि यह पत्रकार नहीं बल्कि वामपंथी और कांग्रेसी कॉकटेल के अजेंडे को पत्रकारिता की आड़ में चलाने वाले मात्र एक स्वघोषित बुद्धिजीवी हैं। कभी विक्टिम कार्ड खेलकर तो कभी सोशल मीडिया के कुछ मूर्ख अंधभक्तों की मूर्खता के चलते आरएसएस, बीजेपी सहित पूरी राष्ट्रवादी विचारधारा को कटघरे में खड़ा कर देने वाले रवीश कुमार के मुताबिक देश में कुछ भी हो तो उसके लिए केन्द्र सरकार, पीएम मोदी और आरएसएस जिम्मेदार है। हालांकि कांग्रेस सरकार के दौरान की अगर आप इनकी पत्ररकारिता देखेंगे तो सारी जिम्मेदारी सरकार से हटकर व्यवस्था पर आती जाएगी।

खैर, आप सोच रहे होंगे कि जब मैं रवीश कुमार को इग्नोर करने का दावा करता हूं तो फिर आज उन्हें इतना स्पेस क्यों दे रहा हूं। दरअसल आज मैं आपको उनमें मन में भरी 'कुंठा' को प्रमाणों के साथ आपके सामने रखूंगा कि किस तरह से वह न सिर्फ पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं बल्कि देश में अराजकता और अविश्वास फैलाने की भी कोशिश कर रहे हैं। 2 दिन पहले एक पत्रकार साथी जो कि पूर्व में फैजाबाद के अवध विश्वविद्यालय के छात्र भी रहे हैं, ने रवीश कुमार का एक विडियो भेजा। सबसे पहले यह विडियो देखिए


शुरुआती खबर के मुताबिक यूपी के फैजाबाद स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय में 80 प्रतिशत छात्र फेल हो गए हैं। आज इस लेख के द्वारा मैं इस खबर का पूरा सच और रवीश के झूठ का पर्दाफाश करूंगा। साथ ही मैं आपको यह भी बताऊंगा कि आखिर रिजल्ट के नाम पर इन्होंने इतना बड़ा फर्जी हंगामा क्यों किया। क्या वास्तव में सिर्फ जानकारी के अभाव में इन्होंने अवध यूनिवर्सिटी के रिजल्ट पर एक एपिसोड किया या इसके पीछे भी आरएसएस विरोधी कोई हिडन अजेंडा था? रवीश के हर एक वाक्य के पीछे के असल सच के साथ मेरे कुछ सवाल

रवीश कुमार: जिंदगी बर्बाद करने का कारखाना आपने देखा है? भारत में महानगरों से लेकर जिलों में जिंदगी बर्बाद करने का कारखाना चल रहा है, इसे अंग्रेजी में यूनिवर्सिटी और हिंदी में विश्वविद्यालय कहते हैं। उत्तर प्रदेश के डॉ. राम मनोहर लोहिया यूनिवर्सिटी में इस साल बीए, बीकॉम, बीएससी, एमए तमाम फलाना-ढिमका जितना भी सब्जेक्ट होता है, इसके 80% छात्र फेल हो गए हैं। जिस यूनिवर्सिटी में 400000 से अधिक छात्र फिर हो जाएं, वह दुनिया की सबसे बड़ी खबर होनी चाहिए। 

आगे की बात करने से पहले सबसे पहले तो मुझे रवीश की इस बात से घोर आपत्ति है कि भारत के विश्वविद्यालय जिंदगी बर्बाद करने का कारखाना हैं। और मुझे लगता है कि आप में से कोई भी विवेकपूर्ण व्यक्ति इस बात को स्वीकार नहीं कर सकता। मैं मानता हूं कि बहुत से विश्वविद्यालयों की व्यवस्था, या वहां की फैकल्टी बहुत अच्छी नहीं है, इसके लिए सरकार को कटघरे में खड़ा भी करना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है 'भारत के सारे विश्वविद्यालय जिंदगी बर्बाद करते हैं' जैसा घटिया स्टेटमेंट एक नैशनल टेलिविजन पर बैठकर दे दिया जाए। अब बात करते हैं आंकड़ों की। रवीश ने कहा कि विश्वविद्यालय के सभी कोर्सों के 80 प्रतिशत छात्र फेल हो गए हैं। जिस दिन रवीश ने यह एपिसोड किया था, उस दिन तक विश्वविद्यालय ने सिर्फ 3 लाख 31 हजार छात्रों का रिजल्ट जारी किया था तो फिर रवीश ने 4 लाख छात्रों के फेल होने की बात कैसे कह दी? 

पत्रकारिता की पढ़ाई के शुरुआती दौर से ही हमें सिखाया जाने लगता है कि पत्रकारिता के दौरान अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को काम के बीच में नहीं आने देना है और तथ्यों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं करनी है। साथ ही हमें यह भी सिखाया जाता है कि जब तक अपनी आंख और अपने कान का उपयोग ना हो, तब तक किसी भी सोर्स पर पूरा यकीन न करें। लेकिन यहां पर रवीश ने न सिर्फ तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की बल्कि अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते पत्रकारिता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। इस मामले में वैचारिक प्रतिबद्धता वाला ऐंगल कहां है, वह मैं बाद में बताऊंगा, पहले देखिए असल आंकड़े क्या कहते हैं:

ये हैं असली आंकड़े

100 नंबर लाने का मतलब यह नहीं होता कि पढ़ाई अच्छी हुई
रवीश के मुताबिक, इस रिजल्ट के बाद विश्वविद्यालय इस बात का जश्न मना रहा है कि उसने विडियो कैमरे लगाकर नकल रोक दी। उनके मुतबिक, यह मूर्खता कि हद है कि विश्वविद्यालय इतने छात्रों के फेल होने के बाद इस बात पर खुशी मना रहा है। रवीश जी! विश्वविद्यालय के स्नातक के रिजल्ट की बात करें तो बीए में 72 प्रतिशत, बीकॉम में लगभग 81 प्रतिशत और बीएससी में लगभग 40 प्रतिशत छात्र पास हुए हैं। कुल मिलाकर अगर रिजल्ट की बात करें तो यह रिजल्ट 60 प्रतिशत से ऊपर है, यानी फर्स्ट डिविजन। साइंस का रिजल्ट खराब रहा है  लेकिन उसके लिए विश्वविद्यालय ने ऑपशन्स दे रखे हैं, उनके बारे में आगे बात करेंगे लेकिन रवीश के मुताबिक अगर यह रिजल्ट 100 प्रतिशत होता तो वह मान लेते कि विश्वविद्यालय में बहुत अच्छी पढ़ाई होती है। जैसे इन्होंने यह मान लिया था कि बिहार आर्ट्स (12वीं) की टॉपर रूबी राय, जिसे ना तो तुलसीदास के बारे में पता था और ना ही संज्ञा की परिभाषा पता था, जिसने 12वीं में 'प्रोडिकल सायंस'नामक विषय पढ़ा था, को बिहार बोर्ड ने बहुत बढ़िया शिक्षा दी है।

मतलब मूर्खता की हद तो आपका इस तरह की बातें करना है। मैं आपको बता दूं कि अवध विश्वविद्यालय ने इस बार नकल रोकने के लिए सभी कॉलजों में कैमरे लगवाए थे। इन कैमरों की मदद से विश्वविद्यालय में बैठकर परीक्षा केन्द्रों का न सिर्फ विडियो देखा जा सकता था बल्कि वहां होने वाली हर तरह की आवाज भी सुनी जा सकती थी। इन परीक्षा केन्द्रों पर नजर रखने के लिए बाकायदा एक वॉर रूम बनाया गया था, जहां शिफ्ट के अनुसार काम होता था। इस वॉर रूम में एक समय पर 28 लोग रहते थे, जो परीक्षा केन्द्रों की मॉनिटरिंग का काम करते थे। अवध विश्वविद्यालय यूपी का एक जाना-माना विश्वविद्यालय है, जो एक साल पहले तक नकल के लिए बदनाम था। जिसको कभी क्लास न करनी हो, रेग्युलर मार्कशीट चाहिए और उसमें नंबर भी अच्छे चाहिए तो बस अवध विश्वविद्यालय के कुछ चुनिंदा कॉलेजों में एडमिशन ले लो, इसके लिए बस एक ही शर्त होती थी कि आपको गाइड से छापना आना चाहिए।

रवीश के मुताबिक परीक्षा प्रणाली को ऑप्शनल बनाने के कारण भी रिजल्ट खराब हुआ है। साहब का कहना है कि गणित, भूगोल, फिजिक्स और जीव विज्ञान का छात्र बिना रेखाचित्र बनाए चरण-दर-चरण सवाल का उत्तर कैसे समझा पाएगा पाएगा। वैसे रवीश सर अपनी इस रिपोर्ट में यह तो खुद ही मान चुके हैं कि उनकी गणित कमजोर है लेकिन इस बात से यह भी साबित हो गया कि बाकी विषयों का हाल भी गणित जैसा ही है। एक उदाहरण से समझिए:

थिअरिटिकल रूप में भूगोल का कोई प्रश्न आएगा तो वह कुछ ऐसा होगा: भूमि के विकास को नियंत्रित करने वाले कारकों के बारे में बताएं।

वहीं अगर वैकल्पिक रूप में ऐसा ही कोई प्रश्न आएगा तो वह कुछ ऐसा होगा:

इनमें से कौन सा कारक भूमि के विकास को नियंत्रित नहीं करता है:
a) मृदा
b) वायु
c) भूमि के नीचे उपलब्ध जल
d) आप के पास उपलब्ध धन
और ऐसे ही प्रश्न अन्य विषयों में भी आते हैं। दोनों ही तरह के प्रश्नों का कॉन्सेप्ट बिलकुल अलग होता है, इस बात को समझने की जरूरत है। 

यह एक अच्छा प्रयोग था कि थिअरिटिकल प्रश्नों के साथ में ऑप्शनल प्रश्न भी दिए जाएं। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी प्रश्नपत्र का यही फॉर्मेट रहता है। और ऐसा भी नहीं था कि परीक्षाओं के 2-4 दिन पहले यह योजना बनी थी। सत्र के प्रारंभ होते ही इस पर योजना बन गई थी और कुछ समय के भीतर ही महाविद्यालयों को इसकी जानकारी उपलब्ध करा दी गई थी। 

रवीश ने अपने प्रोग्राम के दौरान एक बात और कही कि अगर परीक्षा में किसी तरह का गड़बड़ी नहीं हुई थी तो परीक्षा नियंत्रक को क्यों हटाया गया? जबकि असलियत यह है अवध विश्वविद्यालय में परीक्षा नियंत्रक कोई है ही नहीं। डेप्युटी रजिस्टार की रैंक का अधिकारी परीक्षा से संबंधित कार्य देखता है और इस साल इस व्यवस्था में एक अन्य व्यक्ति को सहयोगी के तौर पर लगाया गया था।

क्या अवध विश्वविद्यालय को छात्रों की कोई परवाह नहीं
वैसे तो जितने प्रतिशत छात्र फेल हुए हैं, वह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है लेकिन फिर भी मुट्ठीभर छात्रों के प्रदर्शन के बाद कुलपति ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों के साथ एक बैठक की और यह फैसला लिया कि मूल्यांकन व्यवस्था की विश्वसनीयता स्थापित करने के उददेश्य से मूल्यांकन के संदर्भ में छात्रों के स्तर से प्राप्त होने वाले प्रार्थना पत्रों में से सैंपलिंग के आधार पर प्रत्येक विषय की 100-100 उत्तर पुस्तिकाओं को बाहर के विश्वविद्यालयों में भेजकर पुनर्मूल्यांकित कराया जाएगा। इसके बाद आने वाले परीक्षा परिणाम को घोषित किया जाएगा। यानी जिन छात्रों को यह लगता है कि उनकी कॉपी ठीक तरीके से नहीं जांची गई है, वे विश्वविद्यालय में ऐप्लीकेशन दें और फिर उनमें से किन्हीं 100 लोगों की कॉपी को दूसरे विश्वविद्यालय से चेक कराया जाएगा। इसका मतलब समझते हैं आप? कल को पुनर्मूल्यांकन के बाद अगर कोई यह कह दे कि विश्वविद्यालय अपनी बदनामी से बचने के लिए सिर्फ दिखावा कर रहा है तो जाहिर है कि शंका होगी इसलिए विश्वविद्यालय ने तय किया कि इन कॉपियों को दूसरे विश्वविद्यालय में जंचवाया जाएगा। इससे ज्यादा कोई विश्वविद्यालय क्या कर सकता है। छात्रों की मांग के मुताबिक, लगभग चार लाख छात्रों की कॉपियां फिर से चेक कराने का मतलब समझते हैं आप? अगर नहीं समझते तो गणित में कमजोर होने का रोना बंद करके जाइए और विश्वविद्यालय की व्यवस्था से जुड़े किसी व्यक्ति से पता करिए।

गलत कॉपी चेक होने के विश्वास पर क्या करे छात्र?
अवध विश्वविद्यालय के कुछ छात्र कह रहे हैं कि उनकी कॉपियां गलत तरीके से जांची गई हैं। इसके लिए विश्वविद्यालय द्वारा मूल्यांकन व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से 'चैलेन्ज इवैल्यूवेशन' व्यवस्था 06 महीने पहले से ही लागू है। इस सुविधा के तहत विश्वविद्यालय की वेबसाइट के माध्यम से सिर्फ 300 रुपए ऑनलाइन जमा करते हुए छात्र अपनी कॉपी की स्कैन्ड प्रति प्राप्त कर सकते हैं। इसके बाद वह खुद, अपने किसी परिचित टीचर से, अपने सीनियर्स से, जा जिसे भी वे ज्ञानी समझते हों, अपनी कॉपी की जांच कराकर आश्वस्त हो जाएं कि उनके नंबर सही हैं या नहीं। और यदि उनको लगता है कि उन्हें कम नंबर मिले हैं तो फिर से विश्वविद्यालय की वेबसाइट के माध्यम से 3000 रुपए जमा करके मूल्यांकन को चुनौती दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में छात्र की उत्तर पुस्तिका को 03 अलग-अलग परीक्षकों से मूल्यांकित कराया जाएगा और फिर तीनों मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा दिए गए नंबरों के औसत अंक छात्र को दिए जाएंगे। चुनौती की इस प्रक्रिया में यदि छात्र की चुनौती सही सिद्व होती है तो छात्र द्वारा जमा कराई गई धनराशि वापस करते हुए संबंधित शिक्षक को कारण बताओ नोटिस जारी करने के साथ-साथ भविष्य में मूल्यांकन से वंचित भी किया जा सकता है। यानी अगर छात्र को भरोसा है कि उसकी कॉपी गलत चेक हुई है तो उसका सिर्फ 300 रुपए खर्च होगा, बाकी पैसा तो वापस ही हो जाएगा। 

हालांकि विश्वविद्यालय की वेबसाइट के मुताबिक, 'यदि मूल मूल्यांकनकर्ता द्वारा प्रदान किए गए अंकों तथा चैलेंज मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा दिए गए अंकों के औसत का अंतर प्रश्नपत्र के अधिकतम प्राप्तांकों के 15% तक पाया जाएगा तो मूल मूल्यांकनकर्ता द्वारा प्रदान किए गए अंको में परिवर्तन नहीं किया जाएगा तथा छात्र द्वारा जमा धनराशि जब्त कर ली जाएगी।' ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था में यह माना जाता है कि मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा किसी विषय की मूल्यांकन पद्धति में 10 से 15 प्रतिशत का अंतर स्वाभाविक है। कोई भी दो शिक्षक बिल्कुल एक जैसा मूल्यांकन नहीं करते। (यह बात वैकल्पिक प्रश्नों में लागू नहीं होती है।) ऐसे में अगर नए औसत अंकों के हिसाब से पुराने अंकों को बदल दिया जाएगा तो मान लीजिए किसी छात्र को 30 में से 12 अंक मिले हैं और उसने 'चैलेन्ज इवैल्यूवेशन' की व्यवस्था का प्रयोग किया लेकिन अब उसके औसत अंक 10 हो गए तो उस छात्र का तो पूरा साल बर्बाद हो जाएगा। इसलिए 15 प्रतिशत की व्यवस्था रखी गई है।

वेबसाइट के मुताबिक, 'यदि मूल मूल्यांकनकर्ता द्वारा प्रदान किए गए अंकों तथा चैलेंज मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा दिए गए अंकों के औसत का अन्तर प्रश्नपत्र के अधिकतम प्राप्तांकों के 15% से 25% के बीच पाया जाएगा तो मूल मूल्यांकनकर्ता द्वारा प्रदान किए गए अंकों को दोनों चैलेंज मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा दिए गए अंकों से बदल दिया जाएगा। ऐसी स्थिति में छात्र द्वारा जमा शुल्क में से 500 रुपए की कटौती कर शेष राशि उसे वापस कर दी जाएगी तथा मूल्यांकनकर्ता के खिलाफ विश्वविद्यालय द्वारा चेतावनी दी जा सकती है। वहीं यदि मूल मूल्यांकनकर्ता द्वारा प्रदान किए गए अंकों तथा दोनों चैलेंज मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा दिए गए अंकों के औसत का अन्तर प्रश्नपत्र के अधिकतम प्राप्तांकों के 25% से अधिक पाया जाएगा तो ऐसी उत्तर पुस्तिका को माननीय कुलपति जी द्वारा नामित तीसरे चैलेंज मूल्यांकनकर्ता से मूल्यांकित कराया जाएगा। मूल मूल्यांकनकर्ता द्वारा प्रदान किए गए अंकों को तीनों चैलेंज मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा दिए गए अंकों के औसत से बदल दिया जाएगा। ऐसी स्थिति में छात्र द्वारा जमा शुल्क से 500/- रुपए की कटौती कर शेष धनराशि उसे वापस कर दी जाएगी तथा मूल मूल्यांकनकर्ता के खिलाफ विश्वविद्यालय द्वारा कठोर कार्यवाही की जा सकती है।' इस विषय पर यह कहा जा सकता है कि अगर अधिकतम प्राप्तांकों के 15% से अधिक अंक किसी छात्र के बढ़ते हैं तो विश्वविद्यालय उसके द्वारा जमा किए गए कुल 3300 रुपए वापस करे, क्योंकि यहां कमी विश्वविद्यालय की है। लेकिन इस तरह की मांग को छोड़कर सभी कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन की मांग करने मूर्खतापूर्ण लगता है। 

आखिर रवीश कुमार की असल समस्या क्या है?
दरअसल में अवध विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति मनोज दीक्षित राष्ट्रवादी विचारधारा रखने वाले व्यक्ति हैं। भले ही किसी में दूसरे विचारों को स्वीकार करने की कितनी भी क्षमता हो लेकिन रवीश कुमार उसे सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं कर पाते क्योंकि वह राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित होता है। इसका एक और उदाहरण आप काशी हिंदू विश्वविद्यालय में  हुए प्रदर्शनों के दौरान की रवीश की 'स्टूडियो रिपोर्टिंग' में देख सकते हैं। रवीश ने उस समय तो 'संघी वीसी' को अपराधी घोषित कर ही दिया था लेकिन वह तो भला हो जांच कमिटी का, जिसने जांच में बताया कि BHU हिंसा मामले में कुलपति नहीं बल्कि जिला प्रशासन की कमी थी। (पढ़ें पूरी खबर: BHU हिंसा मामले में कुलपति को दी गई क्लीन चिट, जांच समिति ने जिला प्रशासन को माना दोषी) खैर अब आप सोचते रहिए कि असल में रवीश कुमार किस 'कुंठा' से ग्रसित हैं, आखिर वह कौन सी कुंठा है जो किसी को भी सिर्फ इसलिए अपराधी बना देती है क्योंकि वह 'राष्ट्रवादी' होता है, लेकिन जाते-जाते रवीश कुमार को एक शिक्षक का जवाब भी देखते जाइए...

Wednesday, 13 June 2018

रमजान में बेटी की 'कुर्बानी', इस मूर्खता के लिए जिम्मेदार कौन?


राजस्थान के जोधपुर जिले के पीपाड़ कस्बे में नवाब अली नामक शख्स ने अपनी चार साल की बेटी की हत्या (मजहबी लोग 'कुर्बानी' पढ़ें) कर दी। अली ने रमजान के पाक महीने में अल्लाह को खुश करने के लिए, उनकी रहमत पाने के लिए ऐसा किया। 'कुर्बानी' देने से पहले अली अपनी बेटी रिजवाना को मार्केट ले गया, उसे मिठाई दिलाई और फिर कुरान की आयतें पढ़ने के बाद धारदार हथियार से गला रेत दिया। पुलिस ने अली को गिरफ्तार कर लिया है। सोशल मीडिया पर बहुत से लोग अली को हत्यारा और भी न जाने क्या-क्या कह रहे हैं। लेकिन जरा सोचिए, आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? 

इस्लाम के मुताबिक, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के उद्देश्य से अपनी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देने का हुक्म दिया। हजरत इब्राहिम ने जब गहराई से सोचा तो पाया कि उन्हें सबसे प्रिय तो उनका बेटा है इसलिए उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला लिया। हजरत इब्राहिम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली, जब अपना काम पूरा करने के बाद पट्टी हटाई तो उन्होंने अपने बेटे को अपने सामने जिन्‍दा खड़ा हुआ देखा, बेदी पर कटा हुआ दुम्बा (साउदी में पाया जाने वाला भेंड़ जैसा जानवर) पड़ा हुआ था, तभी से इस मौके पर कुर्बानी देने की प्रथा है। लेकिन कुर्बानी अब अपनी सबसे प्यारी चीज की नहीं दी जाती है बल्कि किसी जानवर की दी जाती है, किसी बेजुबान जानवर की, उस जानवर की जिसकी कोई गलती नहीं। 

शायद ऐसा ही कुछ सोचकर अली ने अपनी 'सबसे प्यारी चीज' को कुर्बान कर दिया। लेकिन क्या हजरत इब्राहिम से जुड़ी घटना का उद्देश्य यही संदेश देना था? किसी भी बात को समझने के तरीके होते हैं। हजरत इब्राहीम की उस कुर्बानी में जो संदेश छिपा है, उसे समझने की जरूरत है। संदेश यह है कि इंसान पर अगर कभी ऐसी परीक्षा आ जाए, तो उसे हर कुर्बानी के लिए तैयार रहना चाहिए, उस समय उसके कदम लड़खड़ाएं नहीं। कुर्बानी की यह परीक्षा ईश्वर आपसे कहीं भी ले सकता है, चाहे वह परिवार के लिए हो, समाज के लिए हो, अपने देश के लिए हो या फिर किसी गैर के लिए ही क्यों न हो। और वैसे भी कुर्बानी का असल मतलब तो यही है ना कि दूसरों के लिए अपने सुखों का त्याग। लेकिन यहां तो जानवरों के परिवार को बर्बाद कर दिया जाता है, क्या उन्हें दुख नहीं होता, क्या उन्हें दर्द नहीं होता?

गोश्त, खून जैसी चीजें अल्लाह तक नहीं पहुंचतीं और ना ही उनसे किसी का फायदा होता है। हां, जानवरों को तकलीफ जरूर होती है। कुर्बानी के बाद गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। इनमें एक हिस्सा गरीबों का भी होता है। क्या सारे गरीब मांसाहारी होते हैं? क्या उनका पेट किसी और चीज से नहीं भर सकता? परंपरा के नाम पर किसी जानवर की जान ले लेना किसी भी कुतर्क के साथ जायज नहीं ठहराया जा सकता। हजरत इब्राहिम से जुड़ी घटना से सीखने की जरूरत है, उस घटना में जो मेसेज छिपा है, उसे समझने की जरूरत है। 

राजस्थान के अली ने अपनी प्यारी बेटी की हत्या कर दी लेकिन क्या हजरत इब्राहीम के बेटे की तरह रिजवाना को उसका परिवार जिंदा देख पाएगा? मुसलमान ही क्यों, हिंदुओं में भी अगर वैदिककालीन किसी घटना को आधार बनाकर वैसा ही किया जाए तो क्या उसे सही मान लिया जाएगा? मान लीजिए, एक व्यक्ति बात सुनकर एक पति के रूप में श्रीराम ने माता सीता का परित्याग कर दिया। ऐसे ही अगर किसी के कह देने भर से, कोई निराधार आरोप लगा देने भर से कोई पति अपनी पत्नी को छोड़ दे तो क्या उसे सही ठहराएंगे? ऐसा करने पर क्या वह व्यक्ति 'राम' के समतुल्य हो जाएगा। इन कथानकों के पीछे छिपे रहस्य और तत्कालीन कर्मों का आज के लिए क्या संदेश देने का उद्देश्य था, उसे समझना होगा। 

अली ने उस मासूम के साथ जो किया, उसमें जितनी गलती उसकी है, उससे कहीं ज्यादा गलती उन लोगों की है जो इस्लाम के ठेकेदार बनते हैं। अली से ज्यादा गलती उन मुल्ला, मौलवी और इमामों की है जिनपर आम लोगों को 'इस्लाम' समझाने की जिम्मेदारी है। इस घृणित और मानवताविहीन कुकृत्य के लिए जितना बड़ा अपराधी अली है, उतना ही बड़ा अपराध इस्लाम के ठेकेदारों का भी है और उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

वह समय दूसरा था, आज का समय अलग है। अगर कुर्बानी देनी है तो अपने उस सर्वाधिक प्रिय दुर्गुण की दीजिए जिससे दूसरों को समस्या होती है, परेशानी होती है। अपना अहंकार छोड़िए, महिलाओं को पैर की जूती समझना बंद करिए, लोगों को उनके हिसाब से जीने दीजिए, अपने फैसले को दूसरों पर थोपना बंद करिए, अपनी जीभ के स्वाद के लिए दूसरों की जान लेना बंद करिए, और तब कहिए कि कुर्बानी दी है...

Saturday, 2 September 2017

मासूमों की हत्या, कैसे कहूं 'बकरीद मुबारक!'

क्या खुदा यह कहता है कि मासूम, निरीह और निर्दोष जानवरों की कुर्बानी के नाम पर हत्या करने से वह खुश होता है? अगर खुदा सच में ऐसा कहता है तो वह खुदा नहीं हो सकता। आखिर कोई ‘पिता’ अपने ‘बच्चों’ की हत्या पर खुश कैसे हो सकता है? मैं मानता हूं कि मानव, समाज और पर्यावरण हित में  इको फ्रेंडली होली होनी चाहिए, इको फ्रेंडली दीवाली होनी चाहिए, इको फ़्रेंडली गणपति होने चाहिए  लेकिन फिर इको फ्रेंडली बकरीद क्यों नहीं होनी चाहिए? इको फ्रेंडली बकरीद पर पिछले 2 दिनों से सोशल मीडिया और विभिन्न टीवी चैनलों पर चर्चा हो रही है। इस चर्चा में शामिल लगभग सभी मुस्लिम भाई (कुछ अपवादों को छोड़कर) अपने कुतर्कों के आधार पर निर्दोष जानवरों की कुर्बानी को मजहबी परंपरा करार देते हुए इस मामले से दूर रहने की सलाह देते नजर आ रहे हैं। लेकिन क्या दुनिया में मानवीयता से बड़ा कोई भी मजहब हो सकता है?

पढ़ें: Spirit of sacrifice and not only animals killing is real Qurbani

अल्लाह का नाम लेकर क्या एक निर्दयतापूर्ण कृत्य को जायज ठहराया जा सकता है?  कुतर्क चाहे कोई भी हो लेकिन इसे सही नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया में समाज और मानव हित को ध्यान में रखते हुए बहुत सी कुप्रथाओं को या तो बंद किया जा चुका है या फिर उन्हें बदल दिया गया है। नेपाल का गढ़िमाई त्योहार हो या हिंदुओं के ऐसे मंदिर जहां कभी बलि कुप्रथा अनिवार्य मानी जाती थी, उन पर पाबंदी लगा दी गई है। कहीं पशु बलि के स्थान पर श्रीफल (नारियल) काटा जाने लगा तो कहीं आटे का बना पशु। यदि कहीं आज भी पशु बलि प्रचलन में है तो उस पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। हिंदू मंदिरों में पशु-बलि की पाबंदी पर गौर करने वाली बात यह है कि इसके विरोध में कोई महामंडलेश्वर, कोई पुजारी, कोई शंकराचार्य या कोई ‘हिंदू’ नेता खड़ा नहीं हुआ। लेकिन कल कई टीवी चैनल्स पर देखा कि इमाम, मौलवी और मुस्लिम नेता बकरीद पर होने वाली ‘कुर्बानी’ को खुदा का आदेश बता रहे हैं। उनका तर्क है कि इसका विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि कुछ लोग इस योजना पर काम कर रहे हैं कि इस्लामी परंपराओं पर रोक लगाकर इस्लाम को खत्म कर दिया जाए। ऐसे लोगों से मेरा बस एक ही सवाल है कि जब भारत का प्रधानमंत्री (जो गर्व से कहता है कि मैं हिंदू हूं) अपने मन की बात कार्यक्रम में कहता है कि मिट्टी के गणपति बनाए जाएं तो क्या वह हिंदू विरोधी हो गया, क्या वह सनातन को समाप्त करना चहता है।

आखिर ‘कुर्बानी’ शब्द के सही मायने क्या हैं? मैंने जितनी शिक्षा ली है उसके मुताबिक तो ‘कुर्बानी’ का मतलब ‘त्याग’ होता है। एक निरीह जानवर को खरीदकर उसकी हत्या कर देना कैसा त्याग है, यह समझ से परे है। मेरी जानकारी के मुताबिक पैगम्बर मुहम्मद साहब ने प्रतीकों को न मानने की बात कही है। इसी आधार पर  तो इस्लाम में मूर्ती पूजा की मनाही है। मूर्ती तो ‘प्रतीक’ मात्र है, ईश्वर नहीं, तो इस ‘प्रतीकात्मक’ मान्यता को क्यों जारी रखा गया है?  क्या किसी जानवर की हत्या पर उसे दर्द नहीं होता? क्या यहां पर मानवीयता की बातें मात्र छलावा प्रतीत नहीं होतीं? इस मामले पर एक आधारहीन कुतर्क दिया जाता है कि बकरीद के दौरान कटने वाले बकरों को गर्दन की एक विशेष नस काटकर मारा जाता है, जिससे उस पशु की पहले दिमागी मौत हो जाती है फिर शारीरिक मौत होती है। कहा जाता है कि इस प्रक्रिया में उस पशु को बहुत कम कष्ट होता है। फिर तो फिलीस्तीन के आतंकवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं का तरीका भी मानवाधिकारवादी होता होगा। वे भी बंधकों को एक विशेष प्रकार से गला रेतकर मारते हैं। क्या गजब के कुतर्क हैं साहब....

होली आती है तो पानी बचाओ, पानी बचाओ की मुहिम शुरू हो जाती है... बहुत अच्छी बात है, जिस देश में लोग 20 रुपए प्रति लीटर की दर से पानी खरीदते हों, वहां ऐसी मुहिम होनी भी चाहिए लेकिन मांस उत्पादन में बर्बाद होने वाले लाखों लीटर पानी पर बात क्यों नहीं होती? एक किलो आलू के उत्पादन में 254 लीटर पानी लगता है, एक किलो आटे के उत्पादन में 1362 लीटर पानी लगता है लेकिन 1 किलो मांस के उत्पादन में 18 हजार लीटर पानी लगता है। दीवाली पर पटाखे जलाने से प्रदूषण फैलता है, उसे इको फ्रेंडली होना चाहिए लेकिन जब 31 दिसंबर की रात जब पटाखें जलाए जाते हैं तो उस पर कोई बात नहीं होगी।

हम एक ऐसे देश में रह रहें हैं जहां पशुओं के अधिकारों की बात करने वाली संस्था, पीपुल्स फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल (पेटा) के सदस्यों द्वारा बकरीद पर कुर्बानी न देने की अपील करने पर संस्था के सदस्यों को पीटा जाता है। कहा जाता है कि ऐसी मांग करने वाले लोग मुसलमानों की भावनाएं आहत करते हैं। कुर्बानी या बलि जैसी परंपराएं इंसानियत के नाम पर धब्बा है। हम खुद की उंगली में एक सुई भी चुभाएं तो दर्द होता है और बेजुबान और निरीह पशुओं को सिर्फ इसलिए क़त्ल कर दिया जाए कि वे खाने में बहुत स्वादिष्ट लगते हैं और हमारे शरीर को प्रोटीन आदि प्रदान करते हैं। ऐसे कुतर्कों के आधार पर जीव-हत्या को जायज ठहराने वाले लोगों को शर्म आनी चाहिए।

जिस प्रकार हमें दर्द होता है उसी प्रकार प्रत्येक जीव को भी दर्द होता है, सिर्फ अपनी जीभ के स्वाद के लिए, अल्लाह और मजहब के नाम पर किसी जीव को मारना कैसे जायज़ है? बलि और कुर्बानी जैसी कुप्रथाओं को यदि जारी ही रखना ही चाहते हैं तो अपने बच्चे की बलि दीजिए, अपने बच्चे को खुदा के लिए कुर्बान करिए। शायद तभी आपको उस दर्द का अहसास हो, जो इन बेजुबान, लाचार, निरीह और निर्दोष प्राणियों की हत्याओं के बाद उसकी मां को होता होगा। अपनी जिंदगी को जीने का जितना अधिकार खुदा या भगवान ने हम मनुष्यों को दिया है, उतना ही अधिकार धरती के अन्य जीवों को भी दिया है। अपने स्वार्थ के लिए अगर आप अन्य जीवों की हत्या करेंगे तो विश्वास मानिए आप खुदा और भगवान की तौहीन कर रहे हैं। और अगर यह तर्क दिया जाता है खुदा ने जानवरों को हमारे भोजन के लिए बनाया है तो एक बात तो साफ है कि आपके खुदा का कोई अस्तित्व नहीं है, क्योंकि खुदा कभी दोहरे चरित्र वाला नहीं हो सकता, खुदा कभी यह नहीं चाह सकता कि उसकी बनाई गई एक चीज, उसी के द्वारा बनाई गई दूसरी चीज की उसके नाम पर हत्या दे।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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