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Wednesday, 28 August 2024

पहले पूतिन, फिर ज़ेलेंस्की से भी गले मिले PM मोदी, दो-गले से बात क्यों कर रहे वामपंथी?

पहले पूतिन, फिर ज़ेलेंस्की से भी गले मिले PM मोदी, दो-गले से बात क्यों कर रहे वामपंथी?

बहुत लंबे समय से किसी विषय पर चर्चा नहीं कर पाया। कई परिचितों के मैसेज आए कि कुछ लिख नहीं रहे, दरअसल एक, कुछ तो समय का अभाव था और दूसरा कोई ऐसा विषय नहीं मिल रहा था कि कुछ विमर्श किया जाए। हालांकि आज जिस विषय पर चर्चा करने वाला हूं, वह विषय तो सामान्य है, लेकिन कुछ बौद्धिकतावादी लोगों ने विषय को विशिष्ट बना दिया है। बीते दिनों फेसबुक पर एक पोस्ट देखी। यह पोस्ट थी, मेरे प्रथम पूर्णकालिक संपादक रहे नीरेन्द्र नागर जी की। उन्होंने लिखा था-


मोदी पूतिन के बाद अब ज़ेलेंस्की से भी गले मिल लिए। यानी बता दिया कि भारत आक्रांता के साथ भी हैं और आक्रांत के साथ भी। थप्पड़ मारने वाले के साथ भी और थप्पड़ खाने वाले के साथ भी।

अंग्रेज़ी में इसे कहते हैं - Running with the hare and hunting with the hounds. हिंदी में शालीन भाषा में कहें तो गंगा गए गंगाराम, जमुना गए जमुनादास। अशालीन भाषा में एक शब्द है जिसका मैं प्रयोग नहीं करना चाहता। आप ख़ुद ही समझ जाएँ।

वैसे मोदी के लिए यह कोई नई बात नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही है कि भाषणों में नारी सुरक्षा की दुहाई देना और ज़मीन पर आततायियों का साथ देना चाहे वह राम रहीम हो या गुजरात के संस्कारी।

मेरे पिता कहा करते थे कि कोई क्या 'कहता' है, यह उसकी असल पहचान नहीं होती। असल पहचान इससे होती है कि वह क्या 'करता' है।

और मोदी क्या 'करते' हैं, यह हम सब जानते हैं। भक्त भी।


एक तरफ वसुधैव कुटुंबकम् का जाप, दूसरी तरफ़ मेरे देश, मेरे लोगों का हित। अजीब दोगलापन है। इसी को मैं स्वार्थप्रेरित कायरता कहता हूँ।

राम-रावण युद्ध में भी दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क थे। तो क्यों राम का समर्थन करते हो? महाभारत युद्ध में भी कौरवों का अपना पक्ष था। फिर क्यों पांडवों का पक्ष लेते हो?


इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाया। दरअसल बात सिर्फ नीरेन्द्र नागर जी की नहीं है, कई अन्य लोग भी, विशेषकर वामपंथी, सोशल मीडिया पर ऐसी ही बातें कर रहे हैं, इसलिए विषय की गहराई में जाना बहुत जरूरी है। नरेन्द्र मोदी का विरोध अपनी जगह है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों का वैचारिक विरोध होता रहना चाहिए, लेकिन किसी भी व्यवस्था में यदि आप मुल्क को, मनुष्यता को किसी भी अन्य चीज से ऊपर रखते हैं तो मेरी इसपर आपत्ति है। रूस और यूक्रेन का क्या मामला है, कौन सही है, कौन गलत है, इस प्रश्न पर दोनों पक्षों की अपनी राय है औऱ यह दोनों देशों के बीच का मामला है, इसमें किसी तीसरे का हस्तक्षेप तब तक नहीं होना चाहिए, जबतक वह मामला आपको या आपके मुल्क के एक भी व्यक्ति को प्रभावित ना कर रहा हो। 


किसी एक पक्ष को आक्रांता कहना और किसी दूसरे पक्ष को आक्रांत कहना, निश्चित तौर पर दो देशों के बीच की निजता में हस्तक्षेप है। एक तीसरे मुल्क के नागरिक के तौर पर मेरे लिए तो गर्व का विषय यही है कि उन दो देशों के युद्ध के बीच जब भारत के बेटे-बेटियों को यूक्रेन से बाहर आना था तो मेरे देश के बच्चे जब तिरंगा लेकर निकले तो दोनों देशों की सेनाओं ने अपने हथियार नीचे किए और उन्हें रास्ता दिया। और सिर्फ इतना ही नहीं, मेरे मुल्क के बच्चों के साथ उस मुल्क के बच्चे भी तिरंगे की छत्रछाया में बाहर आ गए, जो हमारा सामाजिक दुश्मन किंतु पड़ोसी था। मेरे लिए तो यही गर्व का विषय है कि मेरे मुल्क की मनुष्यता ने मेरे सामाजिक दुश्मन देश के बच्चों को भी जिंदगी दी।


मैं विदेश नीति का पंडित नहीं हूं, लेकिन यदि दो दुश्मन देशों से हमारे अपने संबंध अच्छे हैं और हम उसके निजी मामलों में ‘मनुष्यता’ के नाम पर किसी एक का समर्थन ना करते हुए हिंसक कार्यपद्धति का सहारा न लेते हुए पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कह सकते हैं कि रास्ता शांति से ही निकलेगा, बातचीत से ही निकलेगा और दोनों में एक भी देश हमारी बात पर प्रतिउत्तर नहीं करता है तो हमें इसे अपनी विदेश नीति की विजय क्यों नहीं मानना चाहिए?

बाकी राजनीति हो या असल जीवन, कोई क्या 'कहता' है, यह उसकी असल पहचान नहीं होती। असल पहचान इससे होती है कि वह क्या 'करता' है। शून्यता के गर्त में पहुंच चुकी वैचारिकी को जीवित रखने के लिए ‘कुछ भी’ लिख देना और कह देना तो बहुत आसान होता है, लेकिन करना बहुत मुश्किल। किसी वाममार्गी से मिलिए, उसके लिए बहुत आसान होता है यह कहना कि ब्राह्मणों ने दलितों का खूब शोषण किया, उनकी जमीनें छीन लीं, मेरे दादा-परदादा ने भी ली थीं, लेकिन इस प्रश्न पर मौन हो जाते हैं कि जब आपको पता है कि आपके दादा-परदादा ने किसी दलित-शोषित की जमीन पर कब्जा किया था, छल से उसकी जमीन ले ली थी, तो आपको जानकारी मिलने के बाद आपने वापस क्यों नहीं की? तब आप कह देते हैं कि मुझे क्या पता कि 70-80 साल पहले वो जमीन किसकी थी। अरे नहीं पता है तो उस जमीन को किसी दलित-शोषित को दान कर दीजिए, लेकिन वो नहीं कर पाएंगे।
इस पूरी वाममार्गी वैचारिकी के लिए अशालीन भाषा में एक शब्द है जिसका मैं प्रयोग नहीं करना चाहता। पाठक ख़ुद ही समझ जाएँगे।

यह विषय कूटनीति का है, उसमें संस्कार और संस्कृति को लाने की आवश्यकता ही क्या है। लेकिन मेरे लिए प्रसन्नता का विषय यह है कि कम से कम अपना विषय तर्कयुक्त सिद्ध करने के लिए नीरेन्द्र नागर जी ने उन पात्रों का उदाहरण दिया, जो उनकी वैचारिकी के ऐतिहासिक कोश में अस्तित्वहीन थे। देने को तो वह शक्तिमान और तमराज किलविष का उदाहरण भी दे सकते थे, लेकिन नहीं, उन्होंने राम-रावण और पांडव-कौरवों का जिक्र किया। नीरेन्द्र नागर जी के प्रश्नों का उत्तर देने में मुझे बहुत खुशी होगी, क्योंकि श्रीराम मेरा प्रिय विषय हैं, लेकिन उससे पहले एक अन्य विषय को समझना भी बहुत जरूरी है। मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी हूं। मनोविज्ञान की दृष्टि से बताता हूं कि नीरेन्द्र नागर जी ने शक्तिमान-तमराज की जगह श्रीराम-श्रीकृष्ण का उदाहरण क्यों दिया। दरअसल 2014 की भाजपा की 282 सीटें, 2019 की 303 सीटें जीतना और फिर 2024 में 240 सीटों पर आना उनकी पराजय नहीं है, उनकी विजय तो इसी बात में है कि उन्होंने वामपंथ की Anti Theist वैचारिकी को 10-15 सालों में Anti Modi बना दिया है। यह बात आपको सामान्य लग सकती है, लेकिन मनोवैज्ञानिक नजरिये से देखेंगे तो पता लगेगा कि जिस वैचारिकी की स्वीकार्यता लंबे समय तक पूरी दुनिया में रही, उसे BJP ने खत्म नहीं किया, बल्कि उसे बदल दिया, और यह बहुत बड़ी बात है।


अब आते हैं नीरेन्द्र नागर जी के प्रश्न पर। हम कहते हैं वसुधैव कुटुंबकम्। इसे स्वीकार भी करते हैं लेकिन अगर समय/काल/परिस्थिति के अनुसार कोई अपने व्यवहार में बदलाव को लेकर उचित निर्णय नहीं लेगा तो वह समाप्त हो जाएगा। उदाहरण से समझिए- उपनिवेशवाद के विरोध के नाम पर खड़ी हुई वामपंथी वैचारिकी इसीलिए समाप्त हो गई क्योंकि उन्होंने समयानुरूप सामाजिक परिवेश के अनुसार आवश्यकता को स्वीकार नहीं किया। और जिन वामपंथियों ने स्वीकार किया, उन्होंने अलग-अलग संस्थानों में नौकरी की, वहां अपनी वैचारिकी को स्थापित करने का प्रयास किया, अब इसे आप ‘दोगलापन’ कहिए या स्वार्थप्रेरित वैचारिक आत्महत्या, आपकी समझ है। मेरे हिसाब से तो यह उचित था। कोई वामपंथी अगर किसी कॉर्पोरेट मीडिया संस्थान में संपादक बन जाए, उसका कार्यालय जंगलों को काटकर बसाई गई किसी फिल्म सिटी में हो और उस संस्थान में उपनिवेशवाद के समर्थन वाले विज्ञापन चलते रहें, और उसी से उसका वेतन आए तो इसे आपके तर्क के हिसाब से तो गलत कहा जाएगा। फिर तो आप भी समझ सकते हैं कि कौन कितना गलत है।


वसुधैव कुटुंबकम् की वैचारिकी हमारे अपने मन और शरीर से शुरू होती है, फिर वह ब्रह्मांड तक जाती है। पहले यह वैचारिकी हमें अपने शरीर रूपी कुटुंब में स्थापित करनी होगी कि शरीर का प्रत्येक अंग बराबर है, प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है। फिर इसे अपने परिवार, मोहल्ले, समाज और देश में स्थापित करना होगा। अभी हम अपने शरीर और मन में तो स्थापित कर नहीं पाए, बात करेंगे दुनिया की। गालियां इस बात पर देते हैं कि वर्ण व्यवस्था के एक वर्ग को पैरों से निकला हुआ क्यों दिखाया, अरे जब सारे अंग बराबर हैं तो पैर कौन सी खराब चीज हो गए?


राम-रावण युद्ध हो या कौरव-पांडव युद्ध, समय और परिस्थिति के हिसाब से हमारे इतिहास में फैसले लिए गए हैं। त्रेतायुग में बड़ा भाई दुनिया के सबसे बड़े सिंहासन को ठोकर मारकर एक वल्कल पहनकर 14 वर्षों के लिए वन को चला जाता है, तो उसका सौतेला भाई बड़े भाई की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राज्य का संचालन करता है। राम और रावण का इतिहास स्वीकार कर रहे हैं और उसका उदाहरण दे रहे हैं तो इसे भी स्वीकार करिए कि वह इतिहास था और भविष्य में इतिहास का मूल्यांकन होता है। उस काल में दोनों पक्षों के अपने तर्क थे, लोगों ने अपनी समझ के अनुसार एक पक्ष चुना, एक पक्ष हारा और दूसरा जीता। हजारों सालों के बाद जब इतिहास का मूल्यांकन हुआ तो श्रीराम और पांडवों का पक्ष न्यायोचित लगा तो हम उस पक्ष के समर्थन में रहते हैं। जिसे रावण या कौरव का पक्ष न्यायोचित लगता है, वह उसके समर्थन में रहते हैं। इसमें कौन सी गलत बात है?

त्रेतायुग में परिस्थितियां अलग थीं, इसलिए वहां कूटनीति भी कम थी। द्वापर में परिस्थितियां बदलीं, युद्ध की नीतियां बदलीं तो कूटनीति भी बदल गई। आज कलियुग में परिस्थितियां और अलग हैं तो कूटनीति भी अलग स्तर की होनी चाहिए, जो कि है भी।

पड़ोसी मुल्क पूर्वी पाकिस्तान में जब उसके अपने ही लोग अत्याचार कर रहे थे, और वहां से जब शरणार्थी बंगाल में आने लगे और उससे हमारे मुल्क का हित प्रभावित होने लगा तो भारत की शेेरनी इंदिरा गांधी ने उनकी औकात दिखा दी थी, आज चाहे यूक्रेन हो या इजरायल, अगर कोई मदद मांगे और दूसरा प्रेम से बात समझने को तैयार ना हो तो निश्चित ही सत्ताधीशों को वही करना चाहिए जो मैडम इंदिरा ने किया था। लेकिन, उस परिस्थिति में भी तो वामपंथी यही कहेंगे कि युद्ध गलत है? है ना?


Tuesday, 19 July 2022

सावरकर पर सवाल उठाते हो? मतलब तुम गांधी को भी नहीं मानते हो

 27 फरवरी 2002, गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के कोच एस 6 पर एक हमला होता है और कोच में बैठे कारसेवकों को जिंदा जला दिया जाता है। इस हमले में 59 लोगों की दर्दनाक मौत हो जाती है। गोधरा पुलिस मामले में 103 लोगों को गिरफ्तार करती है। केस चलता है, कुछ को फांसी की सजा होती है और कुछ को उम्रकैद की। लेकिन इस फैसले का सबसे अहम किरदार वे 67 लोग होते हैं, जिन्हें मामले में बरी कर दिया जाता है।


अब मेरा सवाल यह है कि क्या उन 67 लोगों और उनके परिवार से देश को संबंध खत्म कर लेना चाहिए? इस सवाल का जवाब सोचिए।

अगर आप भारत की न्याय व्यवस्था में विश्वास रखते होंगे, विश्वास छोड़िए, अगर आप भारत की संवैधानिक व्यवस्था का सम्मान ही करते होंगे तो आप इस सवाल का जवाब 'नहीं' में ही देंगे। लेकिन जरा रुकिए!


30 जनवरी 1948, महात्मा गांधी की हत्या हो जाती है। ठीक छह दिन बाद विनायक दामोदर सावरकर को गांधी की हत्या के षणयंत्र में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है। केस चलता है। फरवरी 1949 में सावरकर को बरी कर दिया जाता है। लेकिन करीब 73 साल बीत जाने के बाद भी क्या हर बात में देश के संविधान की दुहाई देने वाले लोग उस फैसले का सम्मान करने की हिम्मत जुटा पाए हैं?

अगर आप अपने दिल पर हाथ रखकर इस सवाल का जवाब पूछेंगे तो उत्तर मिलेगा - 'नहीं'


लेकिन क्यों?


हमारे देश के तथाकथित प्रगतिवादी, न्यायवादी, मानवतावादी, समाजवादी, बहुजनवादी, वामपंथी... ये सारे वाद आखिर सावरकर के नाम पर संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ अप्रत्यक्ष रूप से क्यों खड़े हो जाते हैं? 


क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि सावरकर का विचार उनके राष्ट्रवाद विरोधी अजेंडे में फिट नहीं बैठता? या फिर वाकई सावरकर में खामियां थीं?


एक मिनट! इस सवाल को पूछने का अधिकार क्या मैं या कोई और रखता है? और अगर यह सवाल पूछा जाना चाहिए तो क्या यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि क्या मोहनदास करमचंद गांधी में कोई खामी नहीं थी? क्या जवाहरलाल नेहरू ने अपने जीवन में जो कुछ भी किया, वह सब ठीक था?


मुझे लगता है कि हमें इस तरह के विमर्श से बचना चाहिए। ध्यान दें, मैं यह नहीं कह रहा कि उनमें खामियां नहीं थीं, मैं बस यह कह रहा हूं कि हमें इस तरह के सवाल नहीं उठाने चाहिए। लाख कमियां हों गांधी में लेकिन अपने देश के लोगों की हालत देखकर अगर कोई आजीवन एक कपड़े में रहने का व्रत ले लेता है तो बस उसका संकल्प ही है जो पूरे राष्ट्र का मार्ग प्रदर्शित करता है, उसका अलावा सब नगण्य है। खुद एसी कमरों से बाहर निकलकर चार कदम पैदल चलने तक की हिम्मत ना रखने वाले लड़के दो-दो आजीवन कारावास की सजा पाने के बाद भी मुस्कुराने वाले सावरकर पर सवाल उठाते हैं तो कष्ट होता है। गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की पत्रिका 'अंतिम जन' के ताजा अंक में सावरकर के योगदान को गांधी के बराबर बताया गया है। अब कुछ लोग उसपर सवाल उठा रहे हैं, क्यों भाई?


चलो, आप गांधी को मानते हो। गांधी किसको मानते थे? मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को। आइए, इस पूरे विवाद का हल श्रीराम से जुड़ी एक कथा से समझते हैं:


माता सीता का हरण होने के बाद, भगवान राम को लंका तक पहुंचने के लिए उनकी वानर सेना जंगल को लंका से जोड़ने के लिए समुद्र के ऊपर पुल बनाने के काम में लग जाती है। भगवान राम पुल बनाने में उस गिलहरी के योगदान की तारीफ करते हुए उसे अपने हाथों में उठा लेते हैं और कहते हैं कि पुल बनाने में पूरी सेना के साथ बराबर का योगदान गिलहरी का भी है। 


क्या आपने कहीं ऐसा पढ़ा कि कभी ऐसा कहा गया हो कि गिलहरी का योगदान कम था? या नल-नील का योगदान अधिक था?


नहीं। ऐसा कभी और कहीं नहीं सुना-पढ़ा होगा।


किसी पुण्य काम में बस उद्देश्य देखा जाता है। यह नहीं देखा जाता कि किसने कम मेहनत की, किसने किस रास्ते से मेहनत की। यही बात बस गांधी और सावरकर के विवाद में समझनी है। गांधी हों या सावरकर, बिस्मिल हों या अशफाक उल्ला खां, दुर्गा भाभी हों या लक्ष्मीबाई, किसी के योगदान को कम नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह बात बस उन्हें समझाई जा सकती है, जो समझना चाहते हों। कोई महापुरुष अथवा क्रांतिकारी किसी ‘दल’ विशेष का नहीं होता और महापुरुष वही होता है जो सामान्य व्यक्ति से बेहतर तरीके से समाज के प्रति स्वयं को समर्पित करे। हो सकता है उस ‘महापुरुष’ की विचारधारा हमसे 100 प्रतिशत ना मिलती हो, लेकिन क्या ऐसे में आप उससे 100 प्रतिशत असहमत हो सकते हैं?


आपका तर्क कुछ भी हो लेकिन इसका जवाब ‘नहीं’ में ही मिलेगा। समाज के विषय में सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में एक विशिष्ट विचार है। यदि आप किसी विचार से 100 प्रतिशत असहमत हैं तो इसका साफ तौर पर मतलब है कि आप उसका विरोध अज्ञानतावश अथवा द्वेषवश कर रहे हैं, और यदि आप किसी से 100 प्रतिशत सहमत होने का दावा कर रहे हैं तो इसका भी अर्थ यही है कि या तो आप अज्ञानी हैं अथवा अंधभक्त हैं। 


अब बात सावरकर की हो रही है, तो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि सावरकर ही नहीं, देश की स्वतंत्रता के लिए सबकुछ न्योछावर करने वाले हजारों-लाखों क्रांतिकारियों के साथ हमारी सरकारों ने बहुत नाइंसाफी की है लेकिन आज बात करते हैं सावरकर की। और बात सावरकर की कर रहे हैं तो शुरुआत करते हैं उस शख्स से, जिसने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ भारत की सेना खड़ी कर दी थी। 


वैसे तो अभी तक भारत के वीर सपूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मौत पर रहस्यात्मक प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है लेकिन एक प्रचलित ‘तथ्य’ यह भी है कि आज से ठीक 71 साल पहले 18 अगस्त 1945 को तोक्यो जाते हुए उनका हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और इस हादसे में नेताजी की मौत हो गई थी। नेताजी की मौत से जुड़ा सच क्या है, यह एक अलग विषय है लेकिन देश के प्रति पूर्ण मनोयोग के समर्पित होकर ब्रिटिश सेना के सामने एक भारतीय सेना खड़ी करने वाले सुभाष बाबू के जीवन के जुड़े कुछ ऐसे अध्याय हैं जिनके बारे में शायद आपको जानकारी न हो। विश्व इतिहास में आजाद हिंद फौज जैसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता जहां 1,50,000 युद्ध बंदियों को संगठित, प्रशिक्षित कर अंग्रेजों के सामने खड़ा किया गया हो।


सन् 1938 में सुभाष चन्द्र बोस, कांग्रेस के अध्यक्ष बने लेकिन अपने कार्यकाल के दौरान गांधी जी तथा उनके सहयोगियों के व्यवहार से दुखी होकर सुभाष चन्द्र बोस ने 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद 3 मई 1939 को उन्होंने कोलकाता में फॉरवर्ड ब्लॉक अर्थात अग्रगामी दल की स्थापना की तथा भारत की स्वतंत्रता और अखंडता के लिए वह तत्कालीन नेताओं एवं क्रांतिकारियों से संपर्क करने लगे।


आपको जानकर हैरानी होगी कि सुभाष बाबू को अंग्रेजों के सामने एक भारतीय सेना खड़ी करने की प्रेरणा विनायक दामोदर सावरकर से मिली थी। 26 जून 1940 को सुभाष चन्द्र बोस, सावरकर के घर गए। वह सावरकर से मिलने मोहम्मद अली जिन्ना के कहने पर गए थे क्योंकि जिन्ना, सावरकर को हिंदुओं का नेता मानता था और खुद को मुस्लिमों का नेता कहता था। मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों के लिए जब अलग देश की मांग की गई तो सुभाष बाबू जिन्ना के पास गए। सुभाष बाबू चाहते थे कि मुस्लिम लीग देश के विभाजन की मांग न करे।


जिन्ना के पास पहुंचने पर जिन्ना ने सुभाष बाबू से पूछा कि वह किसकी तरफ से उससे बात करने आए हैं? इस पर सुभाष बाबू ने कहा कि वह फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता के तौर पर बात करना चाहते हैं। सुभाष बाबू की इस बात पर जिन्ना ने कहा, ‘मैं मुसलमानों का नेता हूं और मुझसे कोई हिंदू नेता ही बात कर सकता है।’ जिन्ना की नजर में विनायक दामोदर सावरकर हिन्दुओं के नेता थे। जब सुभाष बाबू, विनायक दामोदर सावरकर से मिलने पहुंचे तो सावरकर ने सुभाष बाबू को महान क्रांतिकारी रायबिहारी बोस के साथ हुए पत्रव्यवहार के बारे में बताया। सावरकर ने उनको बताया कि रायबिहारी बोस, युद्धबंदी भारतीयों को एकत्रित करके एक सेना बनाने का प्लान बना रहे हैं। इसके बाद नेता जी जर्मनी गए। जर्मनी में उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की।


जर्मनी में सुभाष बाबू ने हिटलर से मुलाकात की। नेताजी भारत को आजाद करवाने के लिए दुनिया भर की मदद चाहते थे। हिटलर ने एक सीमा तक नेताजी की मदद भी की। वह सुभाष बाबू से बहुत प्रभावित हुआ। महान देशभक्त रासबिहारी बोस के मार्गदर्शन में नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर के वैफथे नामक हॉल में आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) का गठन किया। इस सरकार को जापान, इटली, जर्मनी, रूस, बर्मा, थाईलैंड, फिलीपींस, मलयेशिया सहित नौ देशों ने मान्यता प्रदान की। आजाद हिंद सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री के पद की शपथ लेते हुए सुभाष ने कहा, ‘मैं अपनी अंतिम सांस तक स्वतंत्रता यज्ञ को प्रज्वलित करता रहूंगा।’ लेकिन बात सिर्फ नेताजी तक ही सीमित नहीं है। 


एक राजनीतिक दल यह आरोप लगाता है कि पोर्ट ब्लेयर (अंडमान द्वीप) जेल से अपनी ‘काले पानी’ की सजा से रिहाई के लिए अंग्रेजों से क्षमा याचना की थी। हो सकता है ऐसा हो, लेकिन क्या ऐसा करने का उद्देश्य यह नहीं हो सकता कि सावरकर ने भी वही सोचा हो जो एक समय श्रीकृष्ण ने सोचा था, जिसकी वजह से वह रणछोड़ कहलाए। परिस्थिति का विवेचन एक सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ करें तो पाएंगे कि अपने-अपने समय में इन व्यक्तित्वों ने जो निर्णय लिए वे एकमात्र विकल्प थे। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं इसका एक कारण है, यदि हम स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान की सोच को उस दौर के क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ कर समझने का प्रयास करेंगे तो सामने आएगा कि उस दौर के अधिकतर क्रांतिकारी जान देने के पक्ष में नहीं थे। इसका कारण यह नहीं था कि वह जान देने से डरते थे, बल्कि इसका कारण यह था कि उनको पता था कि देश की स्वतंत्रता के लिए जीवित रहकर संघर्ष करना अतिआवश्यक है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के बीच का अंसेबली में बम फेंकने से पहले का संवाद है।


शहीद भगत सिंह से जुड़े साहित्य को पढ़ने पर पता लगता है कि जब भगत सिंह ने सांडर्स को मारकर लालाजी की मौत का बदला लेने के बाद असेंबली में बम फेंकने का निर्णय लिया तब चंद्रशेखर आजाद ने पूरी योजना तैयार की कि किसी तरह और किन रास्तों से बम विस्फोट करने के बाद निकालकर भागा जा सकता है। उन्होंने यह योजना भगत सिंह को बताई लेकिन भगत सिंह ने इस पर अमल करने से साफ तौर से मना कर दिया। भगत सिंह गिरफ्तार होना चाहते थे। इस मुद्दे पर आजाद से भगत सिंह की गर्मागर्म बहस भी हुई। भगत सिंह का कहना था, ‘हम असेंबली में बम किसी की जान लेने के लिए नहीं फेंकने वाले हैं। हमारा उद्देश्य है, लोगों को जगाना और उस उद्देश्य को मैं गिरफ्तार होकर ज्यादा बेहतर तरीके से पूरा कर सकता हूं। केस चलेगा, जिरह होगी और उस जिरह हमें अपनी बात देशवासियों तक पहुंचाने का मौका मिलेगा।’


इस पर आज़ाद का कहना था कि केस का मतलब होगा मौत की सजा। इसके बाद भगत सिंह ने आजाद से कहा, ‘मैं जान देने के लिए ही गिरफ्तार होना चाहता हूं, मैं जीवित रहकर आजादी के आंदोलन में उतना योगदान नहीं दे पाऊंगा जितना मरकर दे सकता हूं।’ भगत सिंह बोले, ‘मेरी मौत कई भगत सिंह पैदा कर देगी।’ दोनों महान क्रांतिकारियों के बीच लंबी बहस हुई लेकिन भगतसिंह अपनी जिद के पक्के थे। आखिरकार आजाद को उनके आगे हार माननी पड़ी। फिर वही हुआ जो भगतसिंह चाहते थे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़े व्यक्ति द्वारा जीवन को व्यर्थ नष्ट कर देने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। भगत सिंह तथा उनके साथी क्रांतिकारियों का उद्देश्य साफ था कि उनकी मौत एक नए आंदोलन को खड़ा करेगी लेकिन सभी क्रांतिकारी सिर्फ अपनी जान कुर्बान कर देते तो शायद आज हम स्वतंत्र देश में सांस नहीं ले रहे होते।  कुछ ऐसे ही विचार विनायक दामोदर सावरकर के भी बन गए थे। और यह विचार क्यों बने होंगे, इस बात का अंदाजा आप तब तक नहीं लगा सकते जब तक उस दौर की स्थितियों के विषय में अध्ययन न कर लें।


10 मई, 1907 को सावरकर ने इंडिया हाउस, लन्दन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाई। इस अवसर पर विनायक सावरकर ने अपने ओजस्वी भाषण में प्रमाणों सहित 1857 के संग्राम को गदर नहीं, अपितु भारत के स्वातन्त्र्य का प्रथम संग्राम सिद्ध किया। सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का ‘स्वाधीनता संग्राम’ बताते हुए लगभग एक हजार पृष्ठों का इतिहास लिखा। जून 1908 में तैयार हो चुकी पुस्तक ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857’ में सावरकर ने इस लड़ाई को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आजादी की पहली लड़ाई घोषित किया था। इस पुस्तक से भारत में भगत सिंह सहित कई लोगों ने प्रेरणा ली।


हो सकता है कि अब कोई यह तर्क दे कि भगत सिंह तो सावरकर के हिंदुत्व के विरोधी थे। बिलकुल थे, क्योंकि उन्होंने सावरकर के हिंदुत्व को समझा नहीं था। जब सावरकर की पुस्तक भारत में कोहराम मचा रही थी तब भगत सिंह अपने शैशव काल में थे और सावरकर उस दौर में अंग्रेजों के गढ़ में रहकर मां भारती के चरणों की जंजीरों को तोड़ने के लिए प्रयास कर रहे थे। इसे आयु आधारित अनुभव कहें तो गलत न होगा। आगे जिस रूप में भगत सिंह ने सावरकर के हिंदुत्व को समझा, अगर मैं भी वैसा ही मान लूं तो मैं भी विरोध करूंगा लेकिन वास्तविकता यह है कि सावरकर के हिंदुत्व की व्यापकता उतनी सीमित नहीं जितना प्रचारित की गई। यह बिलकुल वैसा ही था जैसे एक 13-14 साल का छोटा सा बच्चा गांधी- गांधी करते हुए एक बुजुर्ग नेता के पीछे घूमता रहता है और फिर जब वह नेता अहिंसा के नाम पर अपने आंदोलन को वापस लेने की घोषणा करता है तो बच्चा उस नेता के रास्ते को नकार कर उसके विपरीत सिद्धांत आधारित रास्ते का चुनाव कर लेता है। इस विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि महात्मा गांधी ने अपने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को वापस लेकर कुछ गलत किया था। इसी आधार पर सावरकर को भी सिर्फ एक व्यक्ति के दृष्टिकोण के चलते गलत नहीं माना जा सकता।


आइए, सावरकर से जुड़े कुछ विषयों का विश्लेषण करते हैं:

क्या बंगाल विभाजन के दौरान 1905 में पुणे में अभिनव भारत संगठन द्वारा विदेशी कपड़ों की होली जलाना कोई सामान्य कदम था, उस समय जब हम गुलाम थे और सोशल मीडिया जैसी कोई चीज नहीं होती थी।


क्या यह झूठ है कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सावरकर की योग्यता, क्षमता और प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें छात्रवृत्ति दी थी।


क्या यह भी झूठ है कि भगत सिंह, राजाराम शास्त्री से कहा करते थे मुझे सावरकर जी के जीवन प्रसंगों, जैसे लंदन में रहते हुए मदनलाल ढींगरा को क्रांति की ओर प्रेरित करना, गिरफ्तारी के दौरान भारत लाए जाते समय जहाज से समुद्र में कूद पड़ऩा आदि ने बहुत प्रभावित किया है। (काशी विद्यापीठ के युवा राजाराम शास्त्री को लाला लाजपतराय जी ने द्वारका दास पुस्तकालय का प्रबंधक मनोनीत किया था। भगत सिंह से राजाराम के मैत्रीपूर्ण संबंध बन गये थे। राजाराम शास्त्री ने कई जगह अपने और भगत सिंह के संवाद का जिक्र किया है।)


क्या यह भी झूठ है कि सावरकर की प्रेरणा से ही जर्मनी में संपन्न होने वाली इंटरनैशनल सोशलिस्ट कांग्रेस में सरदार सिंह राणा और श्रीमती भीखाजी ने भारत का प्रतिनिधि बनकर वन्दे मातरम् लिखित ध्वज को फहराया।


क्या यह भी झूठ है कि वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दो आजीवन कारावास की सजा पाने वाले एकमात्र क्रांतिकारी हैं।


क्या यह भी झूठ है कि सावरकर ने अंडमान जेल में रहते हुए, अंग्रेजों के कानूनों के जाल में उनको ही फंसाकर कैदियों को सामान्य सुविधाएं उपलब्ध कराई थीं।


क्या यह भी झूठ है कि ‘सवर्ण’ होते हुए भी दलितों को सम्मान दिलाने के लिए उन्होंने रत्नागिरी में प्रथम प्रयास किया।


क्या यह भी झूठ है कि अस्पृश्यता निवारण के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करते हुए सावरकर ने अपने ब्राह्मणत्व कर्म का प्रतिपालन किया।


क्या यह भी झूठ है कि ‘भाषा शुद्धि’ यानी हिंदी तथा देवनागरी के संरक्षण हेतु उन्होंने प्रयास किए।


ऐसे बहुत सारे विषय हैं जो अटल जी द्वारा की गई सावरकर की व्याख्या को प्रमाणित करते हैं। स्वातंत्र्य वीर विनायक सावरकर के सिद्धांतों की वर्तमान समाज में एक विशिष्ट प्रासंगिकता इसलिए भी है क्योंकि आज भी कानूनों के आधार पर देश के प्रधान की तस्वीर के साथ छेड़छाड़ करने वाले को जेल हो जाती है और भारत की बर्बादी के नारे लगाने वाले जेल के सीकचों से बाहर ही रहते हैं। उन सिद्धांतों की प्रासंगिकता इसलिए भी है क्योंकि हमारे गांवों में आज भी ‘बिछड़े जनों’ को स्वयं से अलग ही समझा जाता है।


मेरा मानना है कि रानी लक्ष्मीबाई हों या रानी चेन्नमा, चन्द्रशेखर आजाद हों या भगत सिंह, अशफाक उल्ला खां हों या बहादुर शाह जफर, जवाहर लाल नेहरू हों या महात्मा गांधी, सभी ने अपने स्तर पर कुछ ना कुछ तो अच्छा किया है। जो अच्छा है, जो सकारात्मक है, जो अनुकरणीय है, उसे आत्मसात करने अथवा उसकी प्रशंसा करने में क्या बुराई है? हिंदुत्व शब्द से परेशानी है तो स्पष्ट समझ लें कि ‘श्रीराम को पूजना हिंदुत्व नहीं बल्कि श्रीराम को आत्मसात करना हिंदुत्व है।’

Thursday, 16 June 2022

'पत्थरवार' और 'अग्निवार' के जाहिल एक जैसे, कार्रवाई में भेदभाव क्यों कर रहीं 'रामराज्य' वाली राष्ट्रवादी सरकारें?

 10 जून 2022, दिन शुक्रवार

कुछ मुसलमान, किसी हिंदू की बयान से इस कदर नाराज हो गए कि जमकर तोड़फोड़ की, मंदिरों पर हमले किए, आम लोगों पर पत्थर चलाए, यहां तक की व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश में जुटे यानी संविधान बचाने का प्रयास कर रहे पुलिसवालों को पीटा। पुलिस अफसरों के रोते हुए चेहरे दिखे, आम लोगों की आंखों में भय दिखा, टूटे मंदिर दिखे, हमारी-आपकी यानी देश की संपत्ति का नुकसान दिखा। 


11 जून 2022, दिन शनिवार

लोगों को हिरासत में लिया गया, पुलिसवालों ने जमकर खातिरदारी की। हिंसा करने वालों की 'अवैध' संपत्तियों पर बुलडोजर चलने का आदेश हुआ। एक दिन पहले मेरे मन में जो गुस्सा था, वो अब दूर हो रहा था। मैंने सोशल मीडिया पर लिखा भी कि जो जिस भाषा में समझे, उसे उसी भाषा में समझाना चाहिए। यह लाइन गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में बोली थी। 


श्रीराम ने भी ऐसा ही किया था

मैं बिना शंका के इस बात को मानता हूं कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जीवन से आप काफी कुछ सीख सकते हैं। इतना ही नहीं, मैं यह भी मानता हूं कि अगर किसी राष्ट्र या 'State' को न्याय आधारित व्यवस्था बनानी है तो वह किसी किसी व्यक्ति द्वारा बनाए गए सिद्धांतों के संकलन को पुस्तक का रूप देने से नहीं आ सकती, वह रामराज्य से ही आ सकती है। मैं राष्ट्र में 'सम विधान' चाहता हूं, यानी ऐसी व्यवस्था जो सबके लिए समान हो। सिर्फ ऊपर से नहीं मन से, और यह व्यवस्था हमारी व्यवस्था का हिस्सा रही है:

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। 

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।


एक छोटा सा प्रसंग याद दिलाता हूं। मेरे राम, अपनी पत्नी को एक तत्कालीन आतंकी से आजादी दिलाने के लिए निकले, रास्ते में समुद्र पड़ा, तीन दिन तक समुद्र से राह देने की गुहार लगाई, बार-बार आग्रह करते रहे लेकिन समुद्र ने एक ना सुनी। तब श्रीराम समझ गए कि मामला ऐसे नहीं जमेगा, और फिर उन्होंने दूसरा तरीका अपनाया। इस प्रसंग को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ यूं लिखा है:


विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।


लक्ष्मण तीन दिन पहले से ही आग्रह के पक्ष में नहीं थे। वह जानते थे कि समुद्र को चंद क्षणों में सुखाया जा सकता है। लेकिन राम ने तीन दिनों का अवसर दिया, आग्रह किया और फिर जब समुद्र ने नहीं सुनी तो अपने महा-अग्निपुंज-शर का संधान किया, जिससे समुद्र के अन्दर ऐसी आग लग गई कि उसमें वास करने वाले जीव-जन्तु जलने लगे। इसके बाद समुद्र देव ने अपनी रक्षा के लिए याचना की। श्रीराम चाहते तो तीन दिन पहले भी वही कर सकते थे जो बाद में किया, लेकिन उन्हें पता था कि उससे समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं को पीड़ा होगी, इसलिए उन्होंने वह नहीं किया। लेकिन जब अंतिम विकल्प ही बचा तो व्यक्ति क्या ही करे।


10 जून की जहालत क्यों?

अब जरा इसे 10 जून की घटना से जोड़िए। नुपुर शर्मा ने कुछ कहा। कहां से पढ़ा, उसमें कितना सच है, किस बात के रिएक्शन में कहा, वह सब बाद की बात है, मैं मानता हूं कि हम सामने वाले से अलग इसीलिए हैं क्योंकि हमारी संस्कृति हमें इसकी अनुमति नहीं देती। मुझे लगता है कि नहीं कहना चाहिए था, संयम रखना चाहिए था, खासकर तब जब देश आपको देख रहा हो। लेकिन कहा! फिर? देर से ही सही, ऐक्शन हुआ। निजी तौर पर मुझे लगता है कि नहीं होना चाहिए था लेकिन हुआ। फिर एफआईआर हुई, निजी तौर पर मुझे लगता है कि यह ठीक था। मामला न्यायालय में जाएगा और सामने आएगा कि भई, नुपुर ने क्या और कहां से पढ़कर कहा। अब और क्या किया जा सकता था? न्यायालय आज के संविधान के मुताबिक सर्वोच्च व्यवस्था है ना? वहां मामला पहुंच गया, बात खत्म। लेकिन नहीं! इसके बाद 10 जून इतिहास बन गया।


व्यवस्था का आधार है पर्सेप्शन!

लोगों ने सोशल मीडिया पर नुपुर के समर्थन में बहुत कुछ लिखा लेकिन भाजपा के किसी आधिकारिक प्रवक्ता ने उसके बाद नुपुर के कृतित्व का समर्थन नहीं किया। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि देश जलाया जाए? खूब बवाल काटा गया। फिर पुलिस/प्रशासन/सरकार ने उन्हें सीख देने के लिए बल का प्रयोग किया। मैं मानता हूं कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह बिलकुल वैसा ही था, जैसे श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करते वक्त किया था। मुझे लगता है कि यह बिलकुल सही फैसला था। जो प्यार से/ समझाने से ना माने, उसे डराकर/धमकाकर ही रखना चाहिए। और वैसे भी किसी राज्य की व्यवस्था पर्सेप्शन पर ही चलती है। पर्सेप्शन ठीक रहना चाहिए। 


जरा सोचकर देखिए!

इस पूरी घटना को एक सप्ताह भी नहीं बीता कि केन्द्र की मोदी सरकार 'अग्निपथ योजना' ले आई। यह कितनी बेहतर है और इसमें क्या खामियां हैं, यह अलग विषय है। एक भारतीय नागरिक के तौर पर मुझे लगता है कि किसी सरकार को जनता के रोजगार को लेकर गंभीरता से काम करना चाहिए, उस लिहाज से मैं इसे सही मानता हूं। लेकिन एक राष्ट्रवादी के तौर पर मुझे लगता है कि नोटबंदी की तरह ही देश का प्रधान एक बार फिर से आत्मचेतना विहीन जनता पर एकबार फिर से जरूरत से अधिक भरोसा कर रहा है और यह देश के लिए घातक हो सकता है। खैर, इसपर फिर कभी बात कर लेंगे, अभी विषय है कि अगर सरकार के किसी फैसले से आप खुश नहीं हैं तो क्या करेंगे? आप विरोध दर्ज करा सकते हैं, आप उस योजना में हिस्सा नहीं ले सकते हैं, लेकिन आपने क्या किया? वही जहालत दिखाई जो 10 जून को 'मुसलमानों' ने दिखाई थी। 


10 जून और 16 जून वाले जाहिलों में अंतर क्यों?

अब मेरा सीधा सवाल सरकार से है। इस देश का हिस्सा बिहार भी है, राजस्थान भी, मध्य प्रदेश भी, उत्तर प्रदेश भी और अन्य राज्य भी। 10 जून को प्रदर्शन के नाम पर जो नंगापन दिखाया गया, क्या वह 16 जून 2022 को हुई जहालत से कम था? हां, बस इतना अंतर था कि वह मजहबी जहालत थी और यह राजनीति से प्रेरित जहालत। लेकिन ना मजहब बुरा है और ना ही राजनीति, गलत तो जहालत है ना? फिर जहालत करने वालों में भेदभाव क्यों? मैं राजस्थान, बिहार या किसी अन्य गैर भाजपा शासित राज्य से अपेक्षा नहीं करता, लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की सरकार चलाने वाली पार्टी तो राम राज्य की बात करती है ना? राम तो भेदभाव नहीं करते थे। श्रीराम ने तो अपने उस अनुज को भी व्यवस्था तोड़ने पर सजा दी थी, जिसने 14 साल तक निद्रा देवी को अपने पास तक नहीं फटकने दिया। फिर आप क्यों वैसी ही कार्रवाई नहीं करते? क्यों बुलडोजर वाली कार्रवाई 16 जून को जहालत करने वालों पर होने की बात नहीं कर रहे? वजह कोई भी हो, विद्वेष कैसा भी हो, लेकिन विश्वास मानिए यह रामराज्य नहीं है, यह न्याय नहीं है!

Saturday, 14 May 2022

मनुस्मृति ने मुझे क्या सिखाया और मौलवी ने क्या बताया? 'जन्म' जाति के अहंकार में डूबे लोग जरूर पढ़ें

भारत की सामाजिक परंपरा ने व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए दो तरह के संगठन बनाए। एक था वर्ण और दूसरा आश्रम। वर्ण यानी कर्म की प्रकृति और आश्रम यानी वर्ण के लिए प्रशिक्षण। कौन किसका बेटा है, कौन किस जगह पर पैदा हुआ, इसकी जगह पर कौन किस विषय में रुचि रखता है, कौन किस विषय में 'कुशलता' प्राप्त करना चाहता है, इसे चुनने का अधिकार दिया गया। आसान शब्दों में कहें तो आज जिस स्किल डिवेलपमेंट की बात सरकार कर रही है, वह तो हमारी परंपरा का हिस्सा था। 


थोड़ा विस्तार से समझते हैं। हम जब कोई व्यवस्था बनाते हैं तो उसकी कुशलता में कोई कमी नहीं छोड़ते। सब बेहतर रखने की कोशिश करते हैं। इसी व्यवस्था के तहत चार वर्ण बने और कर्मों के आधार पर उनका नामकरण कर दिया गया। यह वर्ण व्यवस्था विभेद रहे, इसके लिए सभी की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा के शरीर से ही बताई गई। ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल के 90वें सूक्त की 12वीं ऋचा में कहा गया:


ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायतः ॥


अर्थात

जो समाज को ज्ञान देने का काम करे, लोगों को शिक्षित करे, नैतिकता का पाठ पढ़ाए... वह मुख से उत्पन्न हुआ ब्राह्मण

जो अपने भुजबल से समाज की रक्षा करे, वह भुजाओं से उत्पन्न हुआ क्षत्रिय

जो समाज का पेट पाले, उनके जीवन यापन के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए, वह उदर यानी पेट से उत्पन्न हुआ वैश्य

जो समाज के लिए श्रम साधना करे, वह पैरों से उत्पन्न हुआ शूद्र


अब यहां से दो विषय लेकर चलते हैं। पहला विषय यह है कि भाई शूद्रों को लिस्ट में सबसे नीचे रखा और फिर पैरों से उत्पत्ति करा दी। मतलब इतनी नाइंसाफी! यह मैं नहीं कह रहा, यह हमारे नवबौद्ध कहते हैं। अब उन मूर्खों को कौन समझाए कि भाई, पैर कौन सी खराब चीज है। एक-एक काम बंट रहा था, कोई नीचे रहा, कोई ऊपर, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी काम का महत्व कम आंका गया। अगर ऐसा होता तो कह देते कि शूद्र नौकर हैं, उनका छुआ नहीं खाना है, उनकी उत्पत्ति तो ब्रह्मा जी ने की ही नहीं। कोई कहानी बना देते, जैसे बहुत से नवबौद्धों ने बना रखी है। कह देते कि वो ब्रह्मा जी के वाहन हंस का मन किया कि किसी को परेशान किया जाए तो बस परेशान करने के लिए हंस ने 'शूद्र' की उत्पत्ति कर दी। मतलब अजब ही मूर्खता चल रही है।


कोई ऊपर नीचे नहीं, सभी का अपना महत्व है। इन चारों कामों से एक भी काम ना हो तो हो सकता है कि आप जिंदा रह लें लेकिन सामाजिक तानाबाना नहीं चल सकता था। हमने व्यवस्था बनाई, इसीलिए आज हमारे पास हजारों लाखों सालों का इतिहास है। हमने दायित्वों का वर्गीकरण किया, लोगों की योग्यता, क्षमता और प्रतिभा को निखरने का अवसर दिया, इसलिए हम विश्वगुरु कहलाए, इसीलिए सबसे प्रतापी राजा हमारे पास हुए, इसलिए पूरी दुनिया में सबसे बड़े निर्यातक हम रहे, इसीलिए हमारा हर काम व्यवस्थित रहा। 


सब परफेक्ट था तो समस्या कैसे हुई?

जैसा मैंने पहले भी कहा कि हम जब कोई व्यवस्था बनाते हैं तो उसकी कुशलता में कोई कमी नहीं छोड़ते। हमारी वर्ण और आश्रम व्यवस्था भी परफेक्ट थी, जैसे जब भारत का संविधान बना तो वह भी सभी के बारे में सोचकर एकदम परफेक्ट बनाया गया, उस समय के हिसाब से। लेकिन फिर विसंगतियां आनी शुरू हो गईं, लोग निजी लाभ के लिए उनका दुरुपयोग करने लगे। बिलकुल वैसे ही, जैसे कई बार आज पड़ोसी से कूड़ा डालने को लेकर झगड़ा हो जाए तो SC-ST एक्ट लगवा दिया जाता है, या पत्नी अपनी सास को खाना ना दे और पति इसे लेकर डांटे तो दहेज उत्पीड़न का केस लगवा दिया जाता है। उसी तरह से लोगों ने उस वर्ण व्यवस्था का भी दुरुपयोग किया, उसके सहारे लोगों का शोषण भी किया, उनके मानवीय अधिकारों का हनन भी किया। लेकिन क्या इसके लिए आप वर्ण व्यवस्था को दोषी ठहराएंगे? नहीं! दोषी वह है, जिसने दुरुपयोग किया, जैसे संविधान का होता है। फर्जी केस लगवाने वालों की वजह से हम संविधान को गलत नहीं कह सकते। बदलते वक्त के साथ मल्टिटास्किंग उपयुक्त व्यवस्था है। अब कोई 'वैश्य' आपका पेट पालने के लिए नहीं बैठा है, अब आपको अपना पेट पालने के लिए कभी ब्राह्मण वाला, तो कभी क्षत्रिय वाला, तो कभी शूद्र वाला काम करना पड़ेगा। जब काम दूसरे वर्ण वाला कर रहे हैं तो जन्म को लेकर अहंकार क्यों? और यह कहने का अधिकार मैं तब रखता हूं, जब पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कहूं कि बदलते वक्त के साथ जब हम बिना किसी की जाति पूछे उसके साथ ऑफिस में खाना खाते हैं, साथ में  डेस्क शेयर करते हैं, एक ही रूम में शेयरिंग करते हैं, एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, तो जाति आधारित कानूनों को खत्म करके 'समान नागरिक संहिता' लागू की जाए। 


जब ऊपर के पैराग्राफ के अंतिम हिस्से का पहला भाग कहता हूं तो जन्म आधारित जाति के अहंकार में डूबे मूर्खों को मैं ब्राह्मण विरोधी लगने लगता हूं, और जब दूसरा हिस्सा कहता हूं तो आरक्षण विरोधी हो जाता हूं। मेरा स्पष्ट मानना है कि जाति व्यवस्था इस देश में नहीं होनी चाहिए, आज हमें उसकी आवश्यकता ही नहीं है। इसके साथ ही कहीं पर भी जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था भी नहीं होनी चाहिए।


अब तक तो ज्ञान की बातें हुईं। अब मैं आपको बताता हूं कि आज सालों बाद मेरा मन क्यों किया कि 'ब्राह्मण' रूप में आया जाए। दरअसल कुछ दिन पहले एक राजनीतिक दल की महिला नेता ने ट्वीट किया, 'ब्राह्मण समाज को अपने पुत्र-पुत्रियों को ब्राह्मणों में ही विवाह करने के लिए प्रेरित, संस्कारित और शिक्षित करना ही चाहिए। जिससे ब्राह्मण संस्कार चिरायु हों। रोटी सबके साथ मिल बाँटकर खाओ, पर बेटी अपने ब्राह्मण कुल में ही दो और अपने ब्राह्मण कुल से ही लो।'


https://twitter.com/RoliTiwariMish1/status/1523863999519277058


इस ट्वीट के बाद मैं बड़ा आश्चर्यचकित हुआ कि समाजवादी पार्टी की नेता होकर ब्राह्मणों की इतनी चिंता कैसे? फिर नाम देखा, उसमें पंडित भी था, तिवारी भी और मिश्रा भी। वंशावली की बात करूं तो मैं विश्व गौरव, कश्यप गोत्र, वेद-सामवेद, उपवेद- गंधर्ववेद, शिखा-वाम, पाद-वाम, शाखा-कौथुमी, सूत्र-गोभिल, देवता-विष्णु और छंद-जगति होने के बाद सैकड़ों धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करने के उपरांत भी इस तरह का ज्ञानार्जन नहीं कर पाया। जिस मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जन्मस्थान के लिए के लिए देश का लगभग पूरा हिंदू मन से एकमत था, उस राम की पत्नी का कुल-गोत्र किसी को नहीं पता था। ऐसे राम को पूजने वाले देश में जाति को लेकर ऐसी बातें। कितने ऋषियों ने राक्षसों की कन्याओं से विवाह किया, क्यों? ताकि उनकी आने वाली पीढ़ी की प्रवृत्ति बदले। कुछ की बदली, तो कुछ की नहीं बदली। लेकिन जब पंडित डॉ. रोली तिवारी मिश्रा ने यह पोस्ट की तो अपने उपरोक्त ज्ञान के आधार पर मैंने जवाब दिया, 'कर्म के आधार पर बनी वर्ण व्यवस्था को आज की व्यवस्था में कैसे स्थापित कर सकती हैं आप? आपके परिवार का एक सदस्य भी क्या आज 'ब्राह्मण' रह गया है? नाम के आगे पंडित लगाने से कोई ब्राह्मण नहीं होता, इस अहंकार से बाहर निकलिए।'


मेरे इस कॉमेंट के साथ ही दो तरह के लोग फुल मूड में आ गए। अलग-अलग कॉमेंट किए। मैं कोशिश करूंगा कि इस ब्लॉग में सभी के सवालों का जवाब दूं और जिज्ञासा का समाधान करूं। इनमें से कुछ को तो भ्रम है, यानी वे समय के अभाव में अध्ययन नहीं कर पाए, और जो सुना, उसे मान लिया। दूसरे हैं कुपढ़, जिन्होंने वही पढ़ा जो विकृत साहित्य उन्हें पढ़ाया गया। ऐसे लोगों को समझाना लगभग नामुमकिन है, लेकिन फिर भी इनका जवाब देना इसलिए जरूरी है, ताकि कम से कम अनपढ़ों को ये कुपढ़ अपने वश में ना कर पाएं।


अल्पज्ञान से भरे मेरे अनुज राशिद के सवाल और उनके जवाब

जब मैं नवभारत टाइम्स डिजिटल में कार्यरत था, तो मैंने मेरठ से एक बालक को अपनी टीम में रखा था। राशिद नाम था उसका। मैंने किसी के चुनाव के लिए जो मानक तय किया था, उसमें वह फिट बैठता था। जब उसका चुनाव किया तो बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया, क्योंकि वह सोशल मीडिया पर काफी कुछ अनर्गल लिखता था। लेकिन वह मेरा विषय नहीं था, इसलिए मैं अपने फैसले पर अडिग रहा। चूंकि वह मेरी टीम का हिस्सा रहा है, इसलिए उसकी जिज्ञासा का समाधान बेहद जरूरी है।


राशिद ने लिखा, 'कर्म के आधार पर बनी वर्ण व्यवस्था को क्या ये कहना चाहिए की शूद्र आपकी सेवा के लिए बने हैं, उन्हें चाहे जैसे इस्तेमाल करो, और यदि किसी शूद्र के कानो में गीता के शब्द पड़ जाए तो उसके कानों में सीसा पिघला कर डाल दो।' मैंने पूछा कि यह जवाब कहां से मिला तो राशिद ने 2-4 ग्रंथों के साथ उनकी तथाकथित सूक्तियां लिख डालीं।


शूद्र किस लिए बने थे, वह मैं ऊपर स्पष्ट कर चुका हूं और गीता में तो भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥' अब ऐसे में अगर कोई यह कहे कि गीता सुनने वाले के कान में सीसा पिघलाकर डाल दो तो हास्यास्पद लगता है। कौन सी बात किस प्रसंग में कही गई, किसने कही, बिना इसे समझे कुछ भी कह देना गलत होगा। वाल्मीकी रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने रावण से भी बहुत कुछ कहलवाया है, अगर आप उस एक श्लोक को पढ़कर यह कह देंगे कि यह तो रामायण में लिखा है, तो गलत होगा। खैर, राशिद ने मनुस्मृति की एक तथाकथित सूक्ति बताई- 'अनिष्टेषु वर्तन्ते सर्व कर्मसु। सर्वथा ब्राह्मणा पूज्या: परमं दैवतं हितत्।। मनु-स्मृति-९/३१९' बड़े धड़ल्ले से ऐसी सूक्तियां, श्लोक और बातें बिना प्रसंग के और भावहीन विषय को केन्द्र में रखकर फैलाई जाती हैं। 


ऊपर की तरह ही श्रीरामचरित मानस की एक तथाकथित चौपाई का जिक्र किया जाता है, 'पूजहि विप्र सकल गुण हीना। शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।', इसका जिक्र भी राशिद ने किया है। 

ऐसे और भी सूक्तियों/ चौपाइयों/श्लोकों के साथ इस बात को प्रमाणित करने की कोशिश की जाती है कि सनातन परंपरा में ब्राह्मण जाति को सबसे ऊपर रखा गया, शूद्रों को दबाया गया। अरे साहब! सनातन पर सवाल उठाने से पहले सनातन को समझ तो लो। सनातन में जब कर्म आधारित व्यवस्था है तो उसमें ब्राह्मण जन्म से कोई कैसे हो गया। श्रीरामचरितमानस की जिस  चौपाई का ऊपर जिक्र किया गया है, उसके साथ कितनी चालाकी से छेड़छाड़ की गई है, उसे समझिए। असल चौपाई है:

पूजिय विप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ज्ञान प्रवीना।

लेकिन इस चौपाई को इतना स्पष्ट कर दिया गया कि लोग आसानी से समझ सकें कि शूद्रों के साथ तो सनातन में बड़ा भेदभाव हुआ है। खैर, हम आपको अरण्यकांड की इस चौपाई का अर्थ बताते हैं। पूरा प्रसंग समझाएंगे तो बहुत समय लगेगा, लेकिन इतना समझ लीजिए कि राक्षस कबंध से भगवान श्रीराम यह कह रहे हैं और बात हो रही है ऋषि दुर्वासा के बारे में। ऋषि दुर्वाषा के क्रोध के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन उनके ज्ञान और कर्म के बारे में कोई पश्नचिह्न नहीं लगा सकता। इस चौपाई को दो हिस्सों में तोड़कर समझते हैं:

पहला हिस्सा: पूजिय विप्र सील गुन हीना।

पूजिए+ विप्र (साधु) को+ सील का गुन (कोमल हृदय के गुण से रहित)

अर्थात- 


दूसरा हिस्सा: सूद्र न गुन गन ज्ञान प्रवीना

सूद्र न गुन (शूद्र यानी तपस्या से हीन मत समझ)+ गन ज्ञान प्रवीना (ज्ञानी मानो)


पूरी चौपाई का अर्थ समझें तो वहां किसी ब्राह्मण और शूद्र की बात ही नहीं हो रही है, वहां तो बस दुर्वासा ऋषि के बारे में राम बता रहे हैं कबंध को। 

इसका अर्थ होगा- वह विप्र जिसमें भले ही कोमलता ना हो, जो भले ही डांटता-फटकारता हो, दंडित करता हो, लेकिन फिर भी वह पूज्य है। उसे उसके व्यवहार के आधार पर शूद्र यानी तपस्या से हीन मत समझो, बल्कि उनके तप, त्याग, गुण और विशेषताओं के आधार पर उन्हें ज्ञानी समझो।


अब इस चौपाई में ब्राह्मण व्यभिचारी होने पर भी पूज्य है, यह कहां से आ गया? यह सिर्फ एक उदाहरण है। भारतीय परंपराओं और साहित्य के साथ लगातार ऐसा हुआ। साहित्य में विकृति आती है तो परंपरा और समाज स्वतः विकृत हो जाता है, यही हमारे साथ हुआ। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस विकृति से हमारी संस्कृति खत्म होती जा रही है। लेकिन इसका जिम्मेदार कोई व्यक्ति, कोई जाति, कोई संप्रदाय या कोई विशेष वर्ग नहीं है। हर जाति/संप्रदाय/वर्ग में ऐसे लोग हैं, जो बिना पढ़े सिर्फ उसी को सत्य मान लेते हैं, जो उन्हें बताया जाता है। ऐसी ही एक और सूक्ति राशिद ने लिखी


शतं ब्राह्मण माक्रश्य क्षत्रियो दण्डं अर्हति।

वैश्योप्यर्ध शतं द्वेवा शूद्रस्तु वधम् अर्हसि।।

(मनु-स्मृति-- ८/२६७/)


कुपढ़ का अर्थ समझिए। राशिद के अनुसार इसका अर्थ है कि मनु-स्मृति में वर्णित है कि ब्राह्मण बुरे कर्म करे, तब भी पूज्य है, क्योंकि वह भू- मण्डल का परम देवता है।


जब मैंने इसे पढ़ा तो हंसी आई। क्योंकि ऊपर जो सूक्ति लिखी है, उसका इस अर्थ से कोई लेना देना नहीं है। उस सूक्ति में बताया गया है कि यदि किसी ब्राह्मण (उस समय के हिसाब से कर्म वाला) को दुष्ट वचन कहे तो उसे क्या सजा मिलेगी। यानि अगर क्षत्रिय कुछ कहेगा तो उसे क्या दंड मिलेगा, वैश्य को क्या दंड मिलेगा और शूद्र को क्या दंड मिलेगा। यह सामान्य सा दंड विधान था। इस सूक्ति के विषय में जब एक आचार्य से बात कर रहा था तो उन्होंने बहुत शानदार उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, 'मान लीजिए, किसी कक्षा में 40 बच्चे हैं, उन्हें तीन कैटिगरी में बांटिए, पहली जो पढ़ने में बहुत होशियार हैं और शिक्षक की सारी बातें मानते हैं, दूसरी जो कम होशियार हैं और कभी-कभी गड़बड़ कर देते हैं तथा तीसरी में वे छात्र जो अधिक गड़बड़ करते हैं। अब अगर कोई छात्र शिक्षक की अवज्ञा करे तो शिक्षक हर कैटिगरी के छात्र को उसके पुराने रेकॉर्ड के हिसाब से ही दंड देगा।' यह उस समय का एक दंडविधान था। खास बात यह है कि अगर कोई ब्राह्मण किसी ब्राह्मण को कुछ कहता है तो उसपर राजदरबार में राजा के समक्ष शास्त्रार्थ का विधान था। उनके जवाब पर मैंने पूछा कि ऐसा क्योंकि किसी और वर्ण का व्यक्ति एक ब्राह्मण को कुछ नहीं कह सकता? उनका जवाब था, 'एक व्यक्ति सुबह भोजन करता है, उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि शाम को भोजन कहां से मिलेगा। लोगों को शिक्षित करने का काम करता है, कुटिया में रहता है, लालच शून्य है। उसे कोई कुछ कहेगा तो कष्ट तो होगा।'


इस्लाम आतंकवाद सिखाता है?

इसी तरह सैकड़ों सूक्तियां, श्लोक मार्केट में तैर रहे हैं, जिनका अर्थ विकृत रूप में फैलाकर समाज में विद्वेष फैलाया जा रहा है। अब हो सकता है कि किसी के मन में सवाल उठे कि हम ये कैसे सही मानें कि मनुस्मृति या अन्य किसी ग्रंथ में किसी जाति के लिए विद्वेष नहीं है। मैं इसका जवाब एक उदाहरण से देता हूं। एक बार मेरे एक परिचित ने पूछा कि आपके मुसलमान दोस्त क्यों हैं, उनको तो आतंकवाद सिखाया जाता है, जिहाद सिखाया जाता है। मैंने पूछा कि यह किसने कहा कि मुसलमानों को आतंकवाद सिखाया जाता है? उसने कहा, वे जिहाद के नाम पर कत्लेआम करते हैं, ये तो आतंकवाद ही है और उन्हें यह सब कुरान सिखाती है।


मौलवी साहब ने समझाया इस्लाम

सवाल में दम था, लेकिन मैं सनातनी इस्लाम के बारे में क्या ही जानता। लेकिन मैं अपने उन मित्रों को तो जानता था, जो मेरे साथ रहते थे, मेरे साथ जिन्होंने दामिनी के लिए तिरंगा उठाया था, जिन्होंने शिक्षा के व्यापारीकरण के खिलाफ मेरे छात्र जीवन के दौरान एबीवीपी का भगवा झंडा भी उठाया था, फिर मैं कैसे मान लेता कि उनको आतंकवाद सिखाया जाता है। इसके बाद मैं एक मौलवी साहब के पास गया। उनसे यही सवाल रखे, तो उन्होंने सबसे पहले तो जिहाद का मतलब बताया। उन्होंने कहा कि 'जिहाद का मतलब है अपने अंदर के राक्षस से लड़ना। अपने अंदर की बुराइयों से लड़ना और सिर्फ लड़ना नहीं बल्कि उस लड़ाई में अत्यधिक प्रयास करना मतलब जीतकर ही दम लेना। अब अगर कोई जिहाद के नाम पर एक कौम को बुराई बताकर उसकी हत्या कर रहा है, तो वह कुछ भी हो सकता है, सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता।' 


बात बस इतनी सी है। इस दुनिया में आपका मानस तय करने वाले बहुत से लोग हैं। आपने उनके हिसाब से अपना मानस बना लिया तो किसी का कोई नुकसान हो या ना हो, 'आप' में से 'आप' खत्म हो जाएंगे। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं कि कोई किसी चीज की कैसी भी व्याख्या करे, लेकिन उसमें जो आपके साथ आपके पड़ोसी और आपके समाज के लिए हितकारी हो, उसे स्वीकार करो। 


नारी के विषय में मनुस्मृति

मनुस्मृति के विषय में कहा जाता है कि वह नारी स्वतंत्रता के खिलाफ है। लेकिन जितना मैंने पढ़ा है, मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 56वें श्लोक में वर्णित है, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:, यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:’, अर्थात जहां पर स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं और जहां उनकी पूजा नहीं होती, वहां सब काम निष्फल होते हैं। नारी के लिए ऐसा भाव भारतीय परंपरा को छोड़कर किसी अन्य परंपरा में नहीं दिखता और यह परंपरा मनुस्मृति आधारित है। तो बताइए आखिर किस आधार पर मनुस्मृति का विरोध किया जाए।


दहेज इत्यादि पर मनुस्मृति

मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के 138वें श्लोक का अर्थ मुझे बताया गया कि स्त्री, रोगी, भारवाहक, अधिक आयुवाले, विद्यार्थी, वर और राजा को पहले रास्ता देना चाहिए। इसी मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 52वें श्लोक में कहा गया कि जो वर के पिता, भाई, रिश्तेदार आदि लोभवश, कन्या या कन्या पक्ष से धन, संपत्ति, वाहन या वस्त्रों को लेकर उपभोग करके जीते हैं वे महानीच लोग हैं। क्या दहेज प्रथा का इससे बड़ा विरोध कोई कर सकता है? विश्वास मानिए, किसी और वजह से नहीं, बल्कि एक सनातनी होने का गर्व अनुभव करने के लिए मैंने अपने विवाह कतो पूर्ण रूप से दहेज रहित रखा। मेरे कई 'अपने' इस बात से आज तक मुझसे नाराज हैं, लेकिन मैं गर्वित हूं कि जिस गौरवशाली परंपरा का इतिहास हजारों-लाखों वर्ष पुराना है, उसे संरक्षित करने में थोड़ा सा योगदान मेरा भी है। 


मुझे टैग करते हुए सोशल मीडिया पर आरक्षण व्यवस्था से प्रताड़ित एक नवयुवक ने लिखा, 'मेरे माता-पिता दोनों जन्म से ब्राह्मण हैं, मैं दिन-रात साफ सफाई का काम कर लूंगा, मुझे SC-ST का सर्टिफिकेट कैसे मिल सकता है?' 


कुल/गोत्र का अहंकार! मनुस्मृति पढ़ लो आज के ब्राह्मणो

आज इस देश में भ्रष्टाचार से भी बड़ी कोई बीमारी है तो वह जातिवाद है। मैं मानता हूं कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था इस देश की एकात्मता, अखंडता और एकता के लिए खतरा है लेकिन इस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराना गलत होगा। नीति की स्पष्ट व्याख्या मनुस्मृति में मिलती है, आज जब पूरा दलित आंदोलन मनुवाद के विरोध पर टिका है, ऐसे समय में मैं बताना चाहता हूं कि वर्ण व्यव्स्था को जन्म के आधार पर नहीं अपितु कर्म के आधार पर शुरू किया गया था। वर्ण अर्थात वरण करने वाला यानी चुनाव करने वाला, अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्म को चुनने का अधिकार था। उस गुण, कर्म, स्वभाव आधारित व्यवस्था को आज जन्म आधारित बनाकर एक पुण्य संस्कृति का विरोध करना वास्तव में दुखद है। मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 109वें श्लोक में साफ तौर पर कहा गया है कि अपने गोत्र या कुल की दुहाई देकर भोजन करने वाले को स्वयं का उगलकर खाने वाला माना जाए। अतः मनुस्मृति के अनुसार जो जन्म से ब्राह्मण या ऊंची जाति वाले अपने गोत्र या वंश का हवाला देकर स्वयं को बड़ा कहते हैं और मान-सम्मान की अपेक्षा रखते हैं उन्हें तिरस्कृत किया जाना चाहिए। अब अगर कोई अल्पज्ञानी 'ब्राह्मण' खुद को सिर्फ इसलिए 'बड़ा' मानने लगे कि उसका कुल/गोत्र क्या है तो उसका तिरस्कार करने का आदेश स्वयं मनुस्मृति देती है।


आज की व्यवस्था बेहतर है, या तब की थी?

मनुस्मृति के 10वें अध्याय के 65वें श्लोक में कहा गया है कि ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र, ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं। मनुस्मृति के अनेक श्लोक कहते हैं कि उच्च वर्ण का व्यक्ति भी यदि श्रेष्ठ कर्म नहीं करता, तो वह शूद्र (अशिक्षित) बन जाता है। अब अगर आप उस शूद्र शब्द को जन्म आधारित जाति से जोड़ दें तो गलत होगा। इस तरह से वर्ण बदलने का व्यवस्था आज का संविधान देता है क्या? लेकिन उस समय के विधान यानी मनुस्मृति में ऐसी व्यवस्था थी। 


....फिर भी, इसे समझना जरूरी है

इतना कुछ होने के बावजूद संभव है कि मनुस्मृति में कुछ ऐसी बातें हों जो आज के परिपेक्ष्य में आत्मसात करने के लिए उपयुक्त न हों अथवा यह भी संभव है कि जिस उद्देश्य के साथ वे बातें लिखी गई हों, वह उद्देश्य हमारी समझ से परे हों लेकिन इस तर्क के साथ पूरी मनुस्मृति को नकार देना अनुचित होगा। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, सभी को परिवर्तित होना चाहिए लेकिन उस परिवर्तन की दिशा सकारात्मक होनी चाहिए। सकारात्मक सोचें, सकारात्मक समझें और सकारात्मक करें……हमें तो गर्व करना चाहिए कि हमारे देश में 2000 से अधिक सालों का इतिहास रखने वाली सेवा समर्पित ईसाईयत है, 1400 से अधिक सालों का इतिहास रखने वाला शांतिप्रिय इस्लाम है, लगभग 500 सालों का गौरवशाली इतिहास रखने वाला सिख पंथ है, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी और आदि काल से चला आ रहा पूर्ण सनातन भी है। जिस परंपरा (रिलिजन) में जो भी उचित हो, जो भी वर्तमान परिपेक्ष्य में अनुकरणीय हो, उसे ससम्मान आत्मसात करने में क्या बुराई है?


अध्ययन का वक्त नहीं है तो मेल करें

और अंत में बस इतना ही कहूंगा कि आप अपने जन्मजातीय ब्राह्मण होने के अहंकार में हैं या बाप-दादाओं की कहानियों के आधार पर आज सक्षम होने के बावजूद एक वर्ग विशेष को अपने उस शोषण का जिम्मेदार मानते हैं, जो आज हो नहीं रहा, या फिर आपको किसी भी भारतीय साहित्य में कोई खामी दिखती है और आपको उसकी पुष्टि करने के लिए अध्ययन का समय नहीं है  तो प्लीज मुझे news.vgaurav@gmail.com पर मेल करें। मैं उपनिषद परंपरा का पालन करते हुए अध्ययन करूंगा और आपकी जिज्ञासा का समाधान करूंगा। और एक और बात, विश्वास मानिए, अगर कुछ गलत हुआ तो वह भी बताऊंगा और अपने पूर्वजों की तरफ से क्षमा भी मांगूंगा। पर अगर आप फर्जी ज्ञान बाटेंगे तो उससे मेरा कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन आपका कोई लाभ भी नहीं होने वाला। शुभकामनाएं...

Monday, 20 September 2021

UP में सच दिखाने की सजा FIR क्यों है? CM योगी आदित्यनाथ के नाम एक पत्रकार का खुला पत्र

 प्रिय योगी आदित्यनाथ जी,
देश में बीते साल जब कोरोना का कहर शुरू हुआ तो सरकार ने बेहद संजीदगी से प्रवासी मजदूरों को मुफ्त में राशन पैकेट और भोजन पैकेट उपलब्ध कराने शुरू किए। फिर जब काम-धंधे रुक गए तो सरकार ने गरीबों को मुफ्त राशन देने की घोषणा कर दी। दुनिया में मुफ्त में राशन वितरण की यह सबसे बड़ी योजना थी। एक भारतीय के तौर पर मेरे लिए ये गर्व का विषय था कि अचानक आई महामारी को लेकर तमाम अव्यवस्थाओं के बीच सरकार कम से कम भूख मिटाने का इंतजाम कर रही है।

इस बीच अचानक पता लगा कि गरीबों के हक पर डाका जा रहा है। सरकारी राशन की दुकानों पर कोटेदार गरीबों के राशन में घटतौली कर रहे हैं। खबर हुई तो कुछ कोटेदारों पर ऐक्शन भी हो गया। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसका संज्ञान लिया। कई फोन आए, लोगों ने बधाइयां दीं, सुकून था कि प्रदेश के अंतिम व्यक्ति को मिलने वाले हक में थोड़ा योगदान मेरा और मेरे संस्थान का भी है।

पढ़ें: एनबीटी के 'ऑपरेशन भूख' का बड़ा असर: सीएम योगी बोले- कतई न होने पाए गरीबों के राशन में कटौती

फिर कोरोना की दूसरी लहर आई, फिर वैसी शिकायतें थीं, लोगों का कहना था कि हमें एकबार फिर से 'ऑपरेशन भूख' को रिएक्टिवेट करना चाहिए। हमने किया।

देखें वीडियो:
https://www.facebook.com/watch/?v=921599678683156


कोटेदारों ने खोली गोदाम की पोल
इसबार कोटेदारों ने साफ कहा कि उन्हें राशन गोदाम से ही कम मिलता है, बोरियों का वजन नहीं दिया जाता, अतिरिक्त वसूली भी होती है। अफसरों से बात की गई तो उन्होंने जांच कराने की बात कही। लेकिन कार्रवाई फिर से कोटेदारों पर हो गई और मामले को खत्म करा दिया गया। हमारे पास लगातार फोन आ रहे थे कि व्यवस्थाएं नहीं सुधरीं। अफसर छोटी मछलियों पर कार्रवाई करके खानापूर्ति कर देते हैं और बड़ी मछलियां आराम से भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगाती रहती हैं। खैर, हमारी टीम बुलाकी अड्डे के पास स्थित FCI के गोदाम पहुंची। यहीं से कोटेदारों को राशन दिया जाता है। वहां जाने से पहले हमने अपने कुछ कोटेदारों को फोन किया और पूछा कि क्या वे वहां आ सकते हैं। किसी ने समय मांगा तो किसी ने मना कर दिया। इसबीच अलका नाम की एक कोटेदार के रिश्तेदार रजनीश ने कहा कि वह आज राशन लेने जा रहे हैं। मैंने उनको गोदाम पर मिलने को कहा।

जब दबाव काम नहीं आया तो मैडम धमकाने लगीं
गोदाम पर मार्केटिंग इंस्पेक्टर शशि सिंह मौजूद नहीं थीं, एक कथित कर्मचारी जिसका नाम मोनू था, वो कोटेदारों को राशन दे रहा था। पहले तो हमने चुपचाप उसके काम और बातचीत की रिकॉर्डिंग की, फिर उसे अपना परिचय देने के बाद उसका परिचय पूछा। वो भड़क गया और कई लोगों से फोन कराकर दबाव डलवाने लगा। इसबीच उसने शशि सिंह से बात कराई, शशि सिंह ने मेरा परिचय पूछने के बाद फो न काट दिया। इसके बाद शशि सिंह ने अपने कई 'रिश्तेदार' पत्रकारों से फोन कराया, लेकिन मेरा साफ स्टैंड था कि मैं अपनी खबर के बीच में किसी को नहीं आने दूंगा।

कुछ देर के बाद शशि सिंह आईं और जब उनसे पूछा गया उनकी अनुपस्थिति में एक आउटसोर्सिंग वाला कर्मचारी कैसे बिना वेरिफिकेशन के राशन कैसे बांट सकता है तो वह भड़क गईं और एफआईआर की धमकी देने लगीं। बाद में विभिन्न धाराओं में मेरे साथ मेरे सहयोगी आशीष सुमित मिश्रा पर FIR हुई और मुख्य आरोपी रजनीश नामक शख्स को बनाया गया। इसकी वजह थी कि वह कैमरे पर वहां की व्यवस्थाओं को नंगा कर रहा था, सच बोल रहा था।

अब मैं कुछ टेक्निकल चीजें समझाता हूं।
1. उत्तर प्रदेश में एक कोटेदार को प्रति क्विंटल 70 रुपये मानदेय मिलता है, राशन बंटवाने के लिए।
2. डोर स्टेप डिलिवरी खत्म होने के बाद सरकार कोटेदारों को लगभग 18 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से अतरिक्त धन दे रही है, गोदाम से कोटे तक लाने के लिए।
यानी कोटेदार को कुल 70+18= 88 रुपये सरकार की ओर से मिलता है।
3. कोटेदार को राशन तौलवाने का पैसा गोदाम पर अलग से देना पड़ता है, उसे खुद गोदाम जाकर राशन लदवाना पड़ता है और इतनी महंगाई में वह कम से कम 35-40 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से राशन को अपने कोटे तक लेकर आता है। अब एक गणित समझिए:

मान लीजिए किसी कोटेदार के पास 200 क्विंटल राशन आ रहा है, इसका मतलब है कि उसे सरकार की ओर से 17,600 रुपये मिल रहा है।
इसके बाद उसके खर्च जोड़िए
गोदाम से कोटे तक राशन लाने का खर्च: 200x40= 8000
दुकान का किराया= 4000 (औसतन)
सहयोगी का खर्च= 8000 (औसतन)
बिजली का बिल= 1000 (औसतन)
स्टेशनरी (पेन, डायरी, बिल)= 1000 (औसतन)
अतिरिक्त खर्चे (राशन लेने जाना, उतरवाना)=1000
कुल= 23000 रुपये
यानी क्या कोटेदार 5400 रुपये अपनी जेब से भरेगा? नहीं वो भ्रष्टाचार करेगा। क्योंकि सिस्टम ऐसा बना हुआ है। और ये जो गणित मैंने समझाया है, ये हर अधिकारी को पता है, इसलिए कठोर कार्रवाई नहीं होती।

कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार
सबसे आसान तरीका ये है कि सरकारी राशन की दुकानों को सरकार सीधे तौर पर अपने अंडर में ले ले और वहां बाकायदा कर्मचारी तैनात करके राशन का वितरण कराए। ऐसे मामलों में जवाबदेही उस सरकारी कर्मचारी की तय होगी।
दूसरा रास्ता यह है कि दिल्ली, हरियाणा जैसे अन्य राज्यों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में कम से कम मानदेय इतना किया जाए कि इन कोटेदारों को गलत करने की जरूरत ना पड़े। फिर गोदाम से लेकर दुकान तक, कड़ाई से व्यवस्था का पालन कराया जाए।  

हो सकता है कि ये कोटेदारों के पक्ष की बात हो, लेकिन असल में ये बात सीधे तौर पर सूबे के गरीबों से जुड़ी हुई है। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान एक पेपर हुआ करता था 'मीडिया रिसर्च'। उसमें खबर के पीछे छिपी खबर निकालना बताया जाता था। मैं जो भी स्टोरी करता हूं, उसकी तह में जाकर पता करता हूं कि असल मसला फंस कहां रहा है। इस मामले में भी वही है। मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। बेहद संजीदगी के साथ अपना काम करता रहूंगा।

मामले में भले ही FIR हुई हो, लेकिन उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं अपना काम कर रहा हूं और व्यवस्था अपना काम करेगी। बस दो छोटे से सवाल हैं
1. एक बच्ची को लगातार अश्लील वीडियो कॉल आते हैं, 4 दिन तक पिता थाने के चक्कर लगाता रहता है, लेकिन एक FIR दर्ज नहीं करती।
दुकान से लूट हो जाती है, दुकानदार से मारपीट होती है, पुलिस कहती है कि 151 में मुकदमा कराना है तो कराओ, लूट का नहीं लिखेंगे। इसके बाद पीड़ित आपको पत्र लिखता है।
किसी के साथ राजधानी के बड़े चौराहे पर मोबाइल लूट होती है, लेकिन पुलिस 3 दिन तक FIR नहीं दर्ज करती।
इतनी संजीदा UP पुलिस कुछ ही घंटों में बिना एक बार भी मेरा पक्ष जाने FIR कैसे दर्ज कर लेती है। क्या इसलिए क्योंकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दबाने की कोशिश में सब हिस्सेदार हैं।

2. ये तेजी अच्छी है, FIR का मतलब होता है- First Information Report यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट। सूचना मिलते ही पुलिस का नैतिक दायित्व है कि FIR दर्ज करे, लेकिन हर मामले में ही ऐसा करे। बाकी मामलों में ऐसा क्यों नहीं होता?

एक राष्टवादी सरकार से मेरी अपेक्षा क्या थी?
FIR हो गई थी, कोई बात नहीं थी। लेकिन 3 दिन बीत जाने के बाद भी एक कामचोर अफसर कुर्सी पर बैठा है, मामले में उच्चस्तरीय जांच क्यों नहीं हुई? हम तो सरकार की मदद कर रहे हैं, बता रहे हैं कि किस तरह से व्यवस्था को खराब किया गया है, किस तरह से अफसरों ने गड़बड़ की है, सरकार को तो हमारा सहयोग करना चाहिए। और हम अपेक्षा भी यही करते हैं।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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