Saturday, 9 July 2022

उदयपुर में इस्लाम के नाम पर एक हिंदू की हत्या के लिए जिम्मेदार कौन? हिम्मत है तो जवाब सोचिए


 राजस्थान का उदयपुर जिला

'एक हिंदू दर्जी को दो मुसलमान बेरहमी से मार देते हैं।' 


यहां बात हिंदू-मुसलमान की इसलिए हो रही है क्योंकि हत्या के पीछे वजह वही थी। लेकिन दोषी किसे मानना चाहिए? 

इस्लाम को? राजस्थान की कांग्रेस सरकार को? नुपुर शर्मा को? भारत के कानून को? सोशल मीडिया को? या खुद को?


दोषी किसे ठहराना चाहिए, उसपर बाद में आते हैं। पहले यह देखिए कि दोषी ठहराया किसे पर जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणियों की मानें तो दोषी ठहराने की कोशिश हो रही है नुपुर शर्मा को। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता, वजह समझने के लिए यहां क्लिक कर पढ़ें: नुपुर शर्मा ने क्या गलत किया? हिंदू-मुस्लिम-राष्ट्रवादी-वामपंथी.... सभी के लिए कुछ सवाल


एक छोटी सी कहानी से समझिए

नुपुर के साथ उदयपुर में जो हुआ, उसके लिए पाकिस्तानी आतंकी संगठनों को दोषी ठहराया जा रहा है। एक छोटा सा लिंक मिला और मिल गई क्लीन चिट हर उस दोषी को, जिसकी लापरवाह कार्यशैली ने इंसानियत की सरेआम हत्या कर दी। अगर किसी को मेरी बात आज बुरी लगे तो माफ करिएगा, लेकिन मेरी कलम का आक्रोश आपकी नाराजगी से रुकने वाला नहीं है। आगे की बात करने से पहले मैं एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं।


अमेरिका में वेदांत का प्रचार करके भारत लौटते हुए स्वामी रामतीर्थ जापान गए। वहां उनका भव्य स्वागत हुआ। उन्हें वहां एक विद्यालय में आमंत्रित किया गया। विद्यालय में एक विद्यार्थी से स्वामी जी ने सप्रेम पूछा, ‘बच्चे, तुम किस धर्म को मानते हो? छात्र ने उत्तर दिया, ‘बौद्ध धर्म को।’ स्वामी जी ने फिर पूछा, ‘बुद्ध के विषय में तुम्हारे क्या विचार हैं?’ विद्यार्थी ने उत्तर दिया, ‘बुद्ध भगवान हैं।’ इतना कह कर उसने ध्यान करके अपने देश की प्रथा के अनुसार भगवान बुद्ध को सम्मान के साथ प्रणाम किया। स्वामी जी ने उस विद्यार्थी से फिर पूछा, ‘अच्छा बताओ, कन्फ्यूशियस के बारे में तुम क्या जानते हो?’ विद्यार्थी ने बड़ी बुद्धिमानी से स्वामी जी के प्रश्न का उत्तर दिया, ‘कन्फ्यूशियस एक महान संत हैं।’ और उसने पूर्ववत बुद्ध की तरह कन्फ्यूशियस का ध्यान करके उन्हें भी सादर प्रणाम किया।


अंत में स्वामी जी ने सवाल किया, ‘बेटा, सुनो। अगर किसी दूसरे देश से जापान को जीतने के लिए एक भारी सेना आए और उसके सेनापति बुद्ध या कन्फ्यूशियस हों तो उस समय तुम क्या करोगे?’ स्वामी रामतीर्थ का इतना कहना था कि छात्र का चेहरा तमतमा उठा। स्वामी जी की बात सुनकर वह सहसा खड़ा हो गया और क्रोध से भर उठा। अपनी लाल-लाल आंखों से घूरते हुए जोश के साथ उसने कहा, ‘तब मैं अपनी तलवार से बुद्ध का सिर काट दूंगा और कन्फ्यूशियस को पैरों से रौंद डालूंगा।’


यह एक बच्चे के विचार थे। अपने 'भगवान' से पहले देश की रक्षा का विचार उसे किसने दिया? यह विचार उसे उसके समाज/घर के संस्कारों से मिला। आज आतंकी संगठनों पर सवाल उठ रहे हैं। जिस देश की संस्कृति किसी निरीह जीव पर गलती से पैर पड़ जाने पर भी आत्मा को झकझोर देने वाली है, वहां एक इंसान का गला बेरहमी से काट डाला गया। अब निकाला जा रहा है उन हत्यारों का आतंकी कनेक्शन। 


एक उदाहरण से आत्मावलोकन कीजिए

इसमे कोई दो राय नहीं कि पूरी दुनिया में इस तरह की आतंकी विचारधारा फैलाने वाले संगठन कई हैं। उनका दोष कम नहीं हो जाता। लेकिन मैं बस एक सवाल पूछना चाहता हूं। हमारे घर में एक मासूम बच्चा है। हमारे घर के पड़ोस में एक गंदा आदमी रहता है, वह उसी जाति का है, जिस जाति के आप हैं। वह शख्स बहुत गंदी-गंदी गालियां देता है। हमारा बच्चा रोज उसके पास जाकर बैठता है। हमें पता है कि वह वहां क्या सीखता होगा, लेकिन फिर भी हम उसके पास अपने बच्चे को जाने से नहीं रोकते। अरे, रोकना तो छोड़िए, हम तो उसे रोज भेजते हैं। हम कहते हैं कि जाओ उसके पास बैठो। फिर कुछ दिन बीतते हैं और हमारा बच्चा घर में आने वाले हर शख्स को गालियां देने लगता है। बच्चा बड़ा हो जाता है। उसकी आदत नहीं बदलती। अब गलती किसकी देंगे। क्या यहां पर यह उचित होगा कि आज आपका बच्चा जो कर रहा है, उसके लिए आप बस पड़ोसी को जिम्मेदार ठहराकर अपनी जिम्मेदारी से पलड़ा झाड़ लें?


नहीं! बिल्कुल नहीं! कतई नहीं!

गलती आपकी थी कि आपने अपने बच्चे को नहीं रोका। गलती उस बच्चे की थी, जिसने बड़ा होने के बाद भी समाज के बीच रहकर अच्छा और बुरा समझने की कोशिश नहीं की। इसके अलावा गलती किसी की नहीं है।


यही हाल आज मुसलमानों का है। जिहाद जैसे पवित्र शब्द की निर्मम हत्या करके उसके नाम पर आतंक सीखने जब आपके समुदाय का बच्चा किसी के पास जा रहा था, और आपने उसे नहीं रोका, तो इसमें गलती आपके समुदाय की है। हर उस शख्स की है, जो खुद को उस समुदाय का रहनुमा बताता है। गलती उस शख्स की है, जिसने भारत में रहकर, भारत को समझने की कोशिश नहीं की। पहली अपनी गलतियों पर खुद को सजा दीजिए, फिर दोषी ठहराइए उन आतंकी संगठनों को, जिनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़कर आपके समुदाय के लड़के आतंक सीख रहे हैं। 

Sunday, 3 July 2022

बेटी लक्ष्मी स्वरूपा ही क्यों होती है... सरस्वती या सीता जैसी क्यों नहीं?

 
बीते कुछ वक्त से हर शुक्रवार की शाम को मां पीतांबरा के दर्शन के लिए दतिया से निकल जाता था। नौकरी से छुट्टी लेना संभव नहीं था तो शुक्रवार की शाम को शिफ्ट खत्म होने के बाद करीब 8 घंटे का सफर करता था। शनिवार को सुबह करीब 1-2 बजे दतिया पहुंचने के बाद सुबह चार बजे माई के दर्शन करता था और फिर शनिवार और रविवार की नौकरी वहीं दतिया से ही होती थी। फिर रविवार को देर रात लखनऊ के लिए वापसी होती थी। बीते कुछ सप्ताह से लगातार यही क्रम चल रहा था। 


एक जुलाई 2022 को भी शुक्रवार का दिन था। पत्नी को अचानक से दोपहर में प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। वैसे तो बच्चे भगवान देता है और वे प्रतिरूप भी उसी के होते हैं लेकिन मेरी और मेरी पत्नी की इच्छा थी की इसबार बेटी ही हो। शाम के 4-5 बजे होंगे। दतिया से महाराज जी का फोन आया। उन्होंने पूछा- निकल चुके वत्स? (पहली भेंट के समय से ही वह मुझे वत्स ही कहते थे।) मैंने उन्हें अपनी परिस्थिति बताई और कहा कि इसबार माई के दर्शन नहीं हो पाएंगे। उन्होंने कहा- ऐसा हो ही नहीं सकता। आपको दर्शन जरूर होंगे। मैंने फिर कहा- महाराज जी! इच्छा तो बहुत थी लेकिन क्या ही बताया जाए। उन्होंने कहा, 'वत्स! गुप्त नवरात्रि चल रहे हैं। माई दर्शन जरूर देंगी, इसे कोई नहीं टाल सकता। आप ध्यान रखिए।' रात 9:55 पर प्यारी सी बिटिया ने जन्म लिया। घर पर फोन करके बता ही रहा था कि महाराज जी की वेटिंग आने लगी। करीब दो मिनट के बाद कॉलबैक किया तो उनका पहला वाक्य था, 'आप माई के दर्शन करने नहीं आ पाए तो माई खुद आपको दर्शन देने और आपके साथ रहने आ रही हैं।' मैंने जवाब दिया, 'आ गईं।'


इसके बाद शुरू हुआ बधाइयों का सिलसिला। हजारों की संख्या सोशल मीडिया पर पोस्ट-मैसेज और लगातार फोन की बजती घंटियों के बीच एक बात ने बहुत कष्ट दिया। क्षमा के साथ कहना चाहूंगा कि बेटी के आने पर शुभकामनाओं के लिए मिले संदेशों में एक तिहाई से अधिक संदेशों से मेरे मानस को आपत्ति हुई। उन सभी की शुभकामनाओं के लिए हृदय से आभारी हूं लेकिन एक बार फिर क्षमा के साथ कहूंगा कि उन शुभकामनाओं में 'भारतीयता' नहीं थी। लोगों ने फोन पर, मैसेज में कहा कि 'मां लक्ष्मी आई हैं।' 


मेरा सवाल है कि 'मां लक्ष्मी' ही क्यों?

भारतीय सनातन परंपरा के 33 कोटि देवता लाखों-करोड़ों स्वरूप में धरा पर उपस्थित हैं। हर स्वरूप का एक संदेश है। कोई सृष्टि का पालक है तो किसी ने सृष्टि की व्यवस्था बनाए रखने के लिए संहारक की जिम्मेदारी उठाई है। कोई देवी समर्पण की प्रतिरूप हैं तो कोई धन-धान्य की। ऐसे में मेरी बेटी को लक्ष्मी स्वरूपा कहा जा रहा है। ऐसा कहने वालों में अधिकांश मुझे निजी तौर पर जानते हैं, मेरी प्राथमिकताएं भी समझते हैं। धन मेरी प्राथमिकता कभी नहीं रही, आज भी नहीं है और ईश्वर की कृपा रही तो आगे भी नहीं होगी। नौकरी के बाद बचने वाले समय का आधा हिस्सा मैं आज भी किताबों के साथ बिताता हूं। फिर भी मुझे लगता है कि कितनी भी कोशिश कर लूं, बहुत कुछ पढ़ना/समझना छूट जाएगा। लोग कहते हैं कि एक पिता अपने बच्चों के लिए वे सपने देखता है, जो वह खुद नहीं कर पाता है। मेरे साथ भी ऐसा ही है। मैं चाहता हूं कि मेरा बेटा/बेटी, मुझसे अधिक अध्ययन करें। लेकिन फिर जब कोई कहता है कि लक्ष्मी आई तो मुझे लगता है कि हमने प्राथमिकताएं बदल दी हैं।


भारत की परंपरा तो सर्वदा ज्ञान आधारित रही है। हमारी परंपरा में ज्ञान के बाद संस्कार आते हैं, और फिर आता है दायित्वबोध। धन को तो हमने प्रथम तीन स्थान में भी नहीं रखा है। फिर आज हमारी प्राथमिकताएं क्यों बदलीं? क्यों किसी बेटी के जन्म पर हम यह नहीं कहते हैं कि देखो वैदेही आई हैं। क्या आप अपनी बेटी में मां सीता के जैसा त्याग और प्रेम नहीं चाहते? हम यह क्यों नहीं कहते कि देखो मां वगेश्वरी आई हैं। क्या आप नहीं चाहते कि आपकी बेटी में ज्ञान का भंडार हो? ऐसे बहुत से स्वरूप हो सकते हैं, लेकिन हमारी मति के केन्द्र में धन आ गया है, मुझे आपत्ति इस बात से है। हमारा आंगन तपस्या, करुणा, ममता, दया और क्षमा जैसे दीपों से रोशन हुआ है, मुझे अपने आंगन में सिर्फ धन नहीं चाहिए था। मेरा विश्वास है, जिसे जितनी आवश्यकता होती है, और मन/कर्म द्वेष रहित होते हैं, ईश्वर उतना उपलब्ध करा देता है।


खैर, बेटी आई है तो एक पिता के तौर पर मेरा विश्वास क्या है, उसे पढ़िए...

तुम हमारी साधना की, परम तप की चेतना हो

दिव्य हो तुम विश्व दीप्ति, तुम प्रथम संवेदना हो

उस निशा की उस विजय का, हो परम उपहार हो तुम

स्वप्न पूर्णित किए तुमने, कामना विस्तार हो तुम


गतिशील जीवन की तरह, सतत तुम बढ़ती रहो

आत्म चेतन भाव भरकर, तुम सदा चलती रहो

लक्ष्य अनुपम हो सदा, स्थिर रहे संपूर्णता

दृढ़ रहे विश्वास तेरा, शून्य हो संकीर्णता  


तुम सनातन शक्ति जैसी, आत्मनिर्भर ही बनो

तुम जियो यह प्रण लिए, प्रतिकार बन तम से ठनो

उस दिवस में यह धरा, चरणों में तेरे झुक जाएगी

प्रेम पोषित अपराजिता जब, दिनकर को पथ दिखलाएगी 

Friday, 1 July 2022

नुपुर शर्मा ने क्या गलत किया? हिंदू-मुस्लिम-राष्ट्रवादी-वामपंथी.... सभी के लिए कुछ सवाल


 राजस्थान का उदयपुर जिला

'एक हिंदू दर्जी को दो मुसलमान बेरहमी से मार देते हैं।' 


वैसे तो अपराधी और पीड़ित के धर्म को लेकर मैं सामान्य तौर पर बात नहीं करता लेकिन इस मामले में बात करना जरूरी हो जाता है। उस बेचारे की हत्या सिर्फ इसलिए हो जाती है क्योंकि उसका संबंध एक ऐसी सोशल मीडिया पोस्ट से था, जिसमें नुपुर शर्मा का समर्थन किया गया था। मैं यह लिखना नहीं चाहता था लेकिन इस ब्लॉग में मेरे कुछ सवाल हैं। ये सवाल इस देश के हर मुसलमान से, हर हिंदू से, हर राष्ट्रवादी से और हर उस शख्स से हैं जो खुद को इन तीनों की परिधि से बाहर रखते हैं। 


सबसे पहले बताइए कि नुपुर शर्मा ने क्या कहा था?

नुपुर शर्मा ने इस्लामिक मान्यताओं और पैगम्बर मुहम्मद साहब को लेकर एक कॉमेंट किया था, जिसे विवादित कहा जा रहा है। लेकिन उसमें विवादित क्या था, इसका जवाब कोई नहीं दे रहा।


नुपुर शर्मा ने जो कहा था, क्यों कहा था?

जिस वक्त नुपुर ने वह बयान दिया, उस वक्त टीवी डिबेट में एक जाहिल मौलाना ने शिवलिंग पर अभद्र टिप्पणी की थी। स्वाभाविक है कि वह 'दिव्य ज्ञान' मौलाना साहब को किसी मदरसे या जाकिर नाइक जैसे किसी मूर्ख ने दिया होगा, क्योंकि जो टिप्पणी उसने की थी, उसकी प्रामाणिकता किसी भी सनातन साहित्य में नहीं मिलती।


नुपुर शर्मा ने जो कहा था, वह 'दिव्य ज्ञान' उन्हें कहां से मिला था?

नुपुर शर्मा ने जो कहा, वे बात कई मौलाना अपने मजहबी प्रचार के दौरान कहते रहते हैं। कई इस्लामिक किताबों में उसका जिक्र है। 


क्या नुपुर ने जिस बात पर प्रतिक्रिया दी, उन्हें उस बात पर गुस्सा नहीं आना चाहिए था?

बिलकुल आना चाहिए था। लेकिन प्रतिक्रिया का तरीका वह नहीं होना चाहिए था, जो था। इसे एक उदाहरण से समझिए। आप पर कोई झूठा आरोप लगाए कि आपने उसके 5 रुपये चुरा लिए। आप क्या करेंगे? क्या आप यह कहेंगे कि तुम भी तो 10 रुपये चुराते रंगे हाथों पकड़े गए थे? या फिर आप उसके आरोपों का प्रमाण मांगते हुए खुद की बेगुनाही साबित करने की कोशिश करेंगे। अगर आप पहली वाली बात कहते हैं, तो इसका सीधा सा मतलब है कि आप उस झूठे आरोप को प्रामाणिकता दे रहे हैं, जो आप पर लगाया गया है।


यही नुपुर के केस में हुआ। नुपुर को बेहद शालीनता से उस मौलाना से पूछना चाहिए था कि उसे वह दिव्य ज्ञान कहां से मिला? फिर सनातन साहित्य के आधार पर तर्क देकर पूरे देश को बताना चाहिए था कि ये जाहिल किस तरह से लाइव डिबेट में बैठकर शिवलिंग/सनातन/हिंदुत्व की अनर्गल व्याख्या करके देश को बरगला रहे हैं।


मेरे जीवन में एक ऐसा शख्स आया, जिसने मुझे सैद्धांतिक और वैचारिक रूप से काफी मजबूती दी। मेरे और उनके बीच में घनघोर वैचारिक असहमतियां थीं, लेकिन उन असहमतियों के बीच होने वाली चर्चा में हमने कभी मर्यादा नहीं लांघी। वह मेरे संपादक थे, मैं एक कॉपी एडिटर। नौकरी सभी को प्यारी होती है, लेकिन विश्वास मानिए, मैं सिर्फ उस शख्स के लिए वहां था। हालांकि अब वह शौक जरूरत बन गया है लेकिन मुझे वह संवाद अच्छा लगता था। हमारे बीच 'ऊष्म संवाद' की शुरुआत कैंपस में हुए इंटरव्यू के दौरान ही हो गई थी। वह जब कुछ लिखते थे तो मैं उन्हें जवाब देता था। उनका 'भगवान' में विश्वास नहीं है और मैं घनघोर धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति हूं। वह कभी श्रीरामचरित मानस की किसी चौपाई पर प्रश्न खड़ा करते थे तो कभी मनुस्मृति की किसी सूक्ति पर। सार्वजनिक लिखते थे। 


जब वह श्रीराम के चरित्र पर सवाल उठाते थे, भारतीय परंपराओं पर सवाल उठाते थे तो मुझे बहुत गुस्सा आता था। मैंने भी उन्हें 'उन्हीं की भाषा में' जवाब देता था। वह ब्लॉग लिखते थे, मैं भी लिखता था। उनके तर्कों का जवाब देता था। अधिकांशतः वह सहमत नहीं होते थे, लेकिन हमारी चर्चा एक बिंदु पर समाप्त इसलिए हो जाती थी क्योंकि बात तथ्यों की होती थी। वह वक्त था और आज का वक्त है, लोग आज भी किसी ब्लॉग का लिंक फेसबुक पर मैसेज करके जब कहते हैं, 'भाईसाहब! अद्भुत जानकारी दी आपने, मैंने तो यह सोचा ही नहीं था।', तो लगता है कि उस वक्त में वक्त का जो निवेश अध्ययन में किया था, वह व्यर्थ नहीं था। कहने का मतलब यह है कि तरीका यह भी होता है।    

 

क्या नुपुर की प्रतिक्रिया पर गुस्सा आना चाहिए था?

बिलकुल! किसी को भी आएगा। उसे पता है कि जो कहा जा रहा है, वह गलत है, उसपर चर्चा होगी तो सवाल उठेंगे। वे सवाल सिर्फ उस बात पर नहीं, पूरी मान्यताओं पर होंगे, पूरे इस्लामिक इतिहास पर होंगे। 


क्या नुपुर के खिलाफ उस गुस्से को जिस तरह से प्रदर्शित किया गया, वैसे किया जाना चाहिए था?

बिलकुल नहीं! सभी की अपनी मान्यताएं हैं। उनमें से कुछ अंधविश्वास भी हो सकती हैं लेकिन किसी और को यह अधिकार नहीं है कि उनपर कटाक्ष करे। आप उनपर संवाद कर सकते हैं, लेकिन उन्हें गलत नहीं ठहरा सकते। यह उस समुदाय विशेष के अपने लोगों की जिम्मेदारी है, कि उनमें सुधार/बदलाव करें। नुपुर ने जो कहा था, उसपर आप शांतिपूर्ण विरोध कर सकते थे। कुछ गलत था तो कोर्ट जा सकते थे। लेकिन जो तांडव किया गया, उसे किसी भी कुतर्क के साथ सही नहीं ठहराया जा सकता।


और सबसे अहम सवाल

ऐसे मामलों में भाजपा शासित राज्यों में, खासकर उत्तर प्रदेश में जैसी बुल्डोजर वाली या पुलिसिया कार्रवाई हुई क्या वह गलत थी?

बिलकुल! कई लोगों का कहना है कि इसके लिए न्याय व्यवस्था है। बिलकुल है। न्यायपालिका का काम है न्याय देना। लेकिन मेरे अपने सिद्धांत हैं लेकिन वे पूरी तरह से व्यवहारिक हैं। माफी के साथ मैं सरकारी/प्रशासनिक कार्रवाई करने वाले हर उस शख्स से पूछना चाहूंगा कि क्या भारत की वर्तमान न्याय व्यवस्था से आप न्याय की उम्मीद करते हैं। मुझे लगता है कि हमारी अदालतें, सबूतों के आधार पर फैसला देती हैं, न्याय नहीं देतीं। सबूतों को खत्म किया जा सकता है, उनके साथ छेड़छाड़ की जा सकती है और फिर न्याय कहां से मिलेगा?


एक बुजुर्ग अपनी जिंदगी के 30-35 साल एक बिल्डर से कानूनी लड़ाई लड़ने में लगा देता है। किस लिए? अपनी एक बीघा जमीन के लिए। दिल पर हाथ रखकर बताइए, उसे न्याय मिलता है?

एक बुजुर्ग महिला रोती-बिलखती रहती है, उसके साथ कोई नहीं होता, और उसकी अपनी बहू बेटे के साथ मिलकर घर से निकाल देती है। ऐसी महिला को अदालत न्याय दे पाती है?

पुलिस की मिली भगत से किसी पर झूठी एफआईआर हो जाती है, उसकी पूरी जवानी कोर्ट के चक्कर लगाते खराब हो जाती है, अदालत उसे न्याय दे पाती है?

अरे और तो और... सैकड़ों निर्दोषों की हत्या करने वाले आतंकी को न्याय व्यवस्था के नाम पर हमारे टैक्स के पैसे से पाला जाता है, इसे आप न्याय कहते हैं?

माफ कीजिएगा, लेकिन यह व्यवस्था न्याय के नाम पर सिर्फ छलावा है।


सरकार की जिम्मेदारी है कि वह व्यवस्था बनाए रखे। हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहते हैं और लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां 'एकरूपता' नहीं होती। असहमतियों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन असहमति के नाम पर अराजकता पूरी तरह से गलत है। और मैं मानता हूं समाज को अराजक बनने से रोकने की जिम्मेदारी सरकार की है। चार लोगों के लिए आप 40 की उपेक्षा नहीं कर सकते। इसके लिए आप प्रेम से भी समझा सकते हैं और भय से भी।

इसका एक ही तरीका है, और वह श्रीरामचरित मानस में बताया गया है। दो पंक्तियों में इसका उत्तर है: 


भय बिनु होइ न प्रीति


तो क्या न्याय व्यवस्था को खत्म करके सब कुछ सरकारों पर छोड़ देना चाहिए?

बिलकुल नहीं! इससे भी अराजकता ही बढ़ेगी, बस वह सरकारी अराजकता होगी। न्याय व्यवस्था को खत्म करने की नहीं, उनमें सुधार की जरूरत है। जरूरत है कि 'तारीख पर तारीख...' वाली परंपरा को बदला जाए। न्याय देने वाले को न्याय की महत्ता का अहसास हो। जल्द से जल्द मामलों की सुनवाई हो। एक निश्चित समय में फैसला ना आने पर संबंधित, जज/अफसर पर कार्रवाई हो। जब तक यह नहीं होगा, कुछ नहीं बदलने वाला।

Thursday, 16 June 2022

'पत्थरवार' और 'अग्निवार' के जाहिल एक जैसे, कार्रवाई में भेदभाव क्यों कर रहीं 'रामराज्य' वाली राष्ट्रवादी सरकारें?

 10 जून 2022, दिन शुक्रवार

कुछ मुसलमान, किसी हिंदू की बयान से इस कदर नाराज हो गए कि जमकर तोड़फोड़ की, मंदिरों पर हमले किए, आम लोगों पर पत्थर चलाए, यहां तक की व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश में जुटे यानी संविधान बचाने का प्रयास कर रहे पुलिसवालों को पीटा। पुलिस अफसरों के रोते हुए चेहरे दिखे, आम लोगों की आंखों में भय दिखा, टूटे मंदिर दिखे, हमारी-आपकी यानी देश की संपत्ति का नुकसान दिखा। 


11 जून 2022, दिन शनिवार

लोगों को हिरासत में लिया गया, पुलिसवालों ने जमकर खातिरदारी की। हिंसा करने वालों की 'अवैध' संपत्तियों पर बुलडोजर चलने का आदेश हुआ। एक दिन पहले मेरे मन में जो गुस्सा था, वो अब दूर हो रहा था। मैंने सोशल मीडिया पर लिखा भी कि जो जिस भाषा में समझे, उसे उसी भाषा में समझाना चाहिए। यह लाइन गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में बोली थी। 


श्रीराम ने भी ऐसा ही किया था

मैं बिना शंका के इस बात को मानता हूं कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जीवन से आप काफी कुछ सीख सकते हैं। इतना ही नहीं, मैं यह भी मानता हूं कि अगर किसी राष्ट्र या 'State' को न्याय आधारित व्यवस्था बनानी है तो वह किसी किसी व्यक्ति द्वारा बनाए गए सिद्धांतों के संकलन को पुस्तक का रूप देने से नहीं आ सकती, वह रामराज्य से ही आ सकती है। मैं राष्ट्र में 'सम विधान' चाहता हूं, यानी ऐसी व्यवस्था जो सबके लिए समान हो। सिर्फ ऊपर से नहीं मन से, और यह व्यवस्था हमारी व्यवस्था का हिस्सा रही है:

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। 

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।


एक छोटा सा प्रसंग याद दिलाता हूं। मेरे राम, अपनी पत्नी को एक तत्कालीन आतंकी से आजादी दिलाने के लिए निकले, रास्ते में समुद्र पड़ा, तीन दिन तक समुद्र से राह देने की गुहार लगाई, बार-बार आग्रह करते रहे लेकिन समुद्र ने एक ना सुनी। तब श्रीराम समझ गए कि मामला ऐसे नहीं जमेगा, और फिर उन्होंने दूसरा तरीका अपनाया। इस प्रसंग को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ यूं लिखा है:


विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।


लक्ष्मण तीन दिन पहले से ही आग्रह के पक्ष में नहीं थे। वह जानते थे कि समुद्र को चंद क्षणों में सुखाया जा सकता है। लेकिन राम ने तीन दिनों का अवसर दिया, आग्रह किया और फिर जब समुद्र ने नहीं सुनी तो अपने महा-अग्निपुंज-शर का संधान किया, जिससे समुद्र के अन्दर ऐसी आग लग गई कि उसमें वास करने वाले जीव-जन्तु जलने लगे। इसके बाद समुद्र देव ने अपनी रक्षा के लिए याचना की। श्रीराम चाहते तो तीन दिन पहले भी वही कर सकते थे जो बाद में किया, लेकिन उन्हें पता था कि उससे समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं को पीड़ा होगी, इसलिए उन्होंने वह नहीं किया। लेकिन जब अंतिम विकल्प ही बचा तो व्यक्ति क्या ही करे।


10 जून की जहालत क्यों?

अब जरा इसे 10 जून की घटना से जोड़िए। नुपुर शर्मा ने कुछ कहा। कहां से पढ़ा, उसमें कितना सच है, किस बात के रिएक्शन में कहा, वह सब बाद की बात है, मैं मानता हूं कि हम सामने वाले से अलग इसीलिए हैं क्योंकि हमारी संस्कृति हमें इसकी अनुमति नहीं देती। मुझे लगता है कि नहीं कहना चाहिए था, संयम रखना चाहिए था, खासकर तब जब देश आपको देख रहा हो। लेकिन कहा! फिर? देर से ही सही, ऐक्शन हुआ। निजी तौर पर मुझे लगता है कि नहीं होना चाहिए था लेकिन हुआ। फिर एफआईआर हुई, निजी तौर पर मुझे लगता है कि यह ठीक था। मामला न्यायालय में जाएगा और सामने आएगा कि भई, नुपुर ने क्या और कहां से पढ़कर कहा। अब और क्या किया जा सकता था? न्यायालय आज के संविधान के मुताबिक सर्वोच्च व्यवस्था है ना? वहां मामला पहुंच गया, बात खत्म। लेकिन नहीं! इसके बाद 10 जून इतिहास बन गया।


व्यवस्था का आधार है पर्सेप्शन!

लोगों ने सोशल मीडिया पर नुपुर के समर्थन में बहुत कुछ लिखा लेकिन भाजपा के किसी आधिकारिक प्रवक्ता ने उसके बाद नुपुर के कृतित्व का समर्थन नहीं किया। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि देश जलाया जाए? खूब बवाल काटा गया। फिर पुलिस/प्रशासन/सरकार ने उन्हें सीख देने के लिए बल का प्रयोग किया। मैं मानता हूं कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह बिलकुल वैसा ही था, जैसे श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करते वक्त किया था। मुझे लगता है कि यह बिलकुल सही फैसला था। जो प्यार से/ समझाने से ना माने, उसे डराकर/धमकाकर ही रखना चाहिए। और वैसे भी किसी राज्य की व्यवस्था पर्सेप्शन पर ही चलती है। पर्सेप्शन ठीक रहना चाहिए। 


जरा सोचकर देखिए!

इस पूरी घटना को एक सप्ताह भी नहीं बीता कि केन्द्र की मोदी सरकार 'अग्निपथ योजना' ले आई। यह कितनी बेहतर है और इसमें क्या खामियां हैं, यह अलग विषय है। एक भारतीय नागरिक के तौर पर मुझे लगता है कि किसी सरकार को जनता के रोजगार को लेकर गंभीरता से काम करना चाहिए, उस लिहाज से मैं इसे सही मानता हूं। लेकिन एक राष्ट्रवादी के तौर पर मुझे लगता है कि नोटबंदी की तरह ही देश का प्रधान एक बार फिर से आत्मचेतना विहीन जनता पर एकबार फिर से जरूरत से अधिक भरोसा कर रहा है और यह देश के लिए घातक हो सकता है। खैर, इसपर फिर कभी बात कर लेंगे, अभी विषय है कि अगर सरकार के किसी फैसले से आप खुश नहीं हैं तो क्या करेंगे? आप विरोध दर्ज करा सकते हैं, आप उस योजना में हिस्सा नहीं ले सकते हैं, लेकिन आपने क्या किया? वही जहालत दिखाई जो 10 जून को 'मुसलमानों' ने दिखाई थी। 


10 जून और 16 जून वाले जाहिलों में अंतर क्यों?

अब मेरा सीधा सवाल सरकार से है। इस देश का हिस्सा बिहार भी है, राजस्थान भी, मध्य प्रदेश भी, उत्तर प्रदेश भी और अन्य राज्य भी। 10 जून को प्रदर्शन के नाम पर जो नंगापन दिखाया गया, क्या वह 16 जून 2022 को हुई जहालत से कम था? हां, बस इतना अंतर था कि वह मजहबी जहालत थी और यह राजनीति से प्रेरित जहालत। लेकिन ना मजहब बुरा है और ना ही राजनीति, गलत तो जहालत है ना? फिर जहालत करने वालों में भेदभाव क्यों? मैं राजस्थान, बिहार या किसी अन्य गैर भाजपा शासित राज्य से अपेक्षा नहीं करता, लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की सरकार चलाने वाली पार्टी तो राम राज्य की बात करती है ना? राम तो भेदभाव नहीं करते थे। श्रीराम ने तो अपने उस अनुज को भी व्यवस्था तोड़ने पर सजा दी थी, जिसने 14 साल तक निद्रा देवी को अपने पास तक नहीं फटकने दिया। फिर आप क्यों वैसी ही कार्रवाई नहीं करते? क्यों बुलडोजर वाली कार्रवाई 16 जून को जहालत करने वालों पर होने की बात नहीं कर रहे? वजह कोई भी हो, विद्वेष कैसा भी हो, लेकिन विश्वास मानिए यह रामराज्य नहीं है, यह न्याय नहीं है!

Saturday, 14 May 2022

मनुस्मृति ने मुझे क्या सिखाया और मौलवी ने क्या बताया? 'जन्म' जाति के अहंकार में डूबे लोग जरूर पढ़ें

भारत की सामाजिक परंपरा ने व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए दो तरह के संगठन बनाए। एक था वर्ण और दूसरा आश्रम। वर्ण यानी कर्म की प्रकृति और आश्रम यानी वर्ण के लिए प्रशिक्षण। कौन किसका बेटा है, कौन किस जगह पर पैदा हुआ, इसकी जगह पर कौन किस विषय में रुचि रखता है, कौन किस विषय में 'कुशलता' प्राप्त करना चाहता है, इसे चुनने का अधिकार दिया गया। आसान शब्दों में कहें तो आज जिस स्किल डिवेलपमेंट की बात सरकार कर रही है, वह तो हमारी परंपरा का हिस्सा था। 


थोड़ा विस्तार से समझते हैं। हम जब कोई व्यवस्था बनाते हैं तो उसकी कुशलता में कोई कमी नहीं छोड़ते। सब बेहतर रखने की कोशिश करते हैं। इसी व्यवस्था के तहत चार वर्ण बने और कर्मों के आधार पर उनका नामकरण कर दिया गया। यह वर्ण व्यवस्था विभेद रहे, इसके लिए सभी की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा के शरीर से ही बताई गई। ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल के 90वें सूक्त की 12वीं ऋचा में कहा गया:


ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायतः ॥


अर्थात

जो समाज को ज्ञान देने का काम करे, लोगों को शिक्षित करे, नैतिकता का पाठ पढ़ाए... वह मुख से उत्पन्न हुआ ब्राह्मण

जो अपने भुजबल से समाज की रक्षा करे, वह भुजाओं से उत्पन्न हुआ क्षत्रिय

जो समाज का पेट पाले, उनके जीवन यापन के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए, वह उदर यानी पेट से उत्पन्न हुआ वैश्य

जो समाज के लिए श्रम साधना करे, वह पैरों से उत्पन्न हुआ शूद्र


अब यहां से दो विषय लेकर चलते हैं। पहला विषय यह है कि भाई शूद्रों को लिस्ट में सबसे नीचे रखा और फिर पैरों से उत्पत्ति करा दी। मतलब इतनी नाइंसाफी! यह मैं नहीं कह रहा, यह हमारे नवबौद्ध कहते हैं। अब उन मूर्खों को कौन समझाए कि भाई, पैर कौन सी खराब चीज है। एक-एक काम बंट रहा था, कोई नीचे रहा, कोई ऊपर, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी काम का महत्व कम आंका गया। अगर ऐसा होता तो कह देते कि शूद्र नौकर हैं, उनका छुआ नहीं खाना है, उनकी उत्पत्ति तो ब्रह्मा जी ने की ही नहीं। कोई कहानी बना देते, जैसे बहुत से नवबौद्धों ने बना रखी है। कह देते कि वो ब्रह्मा जी के वाहन हंस का मन किया कि किसी को परेशान किया जाए तो बस परेशान करने के लिए हंस ने 'शूद्र' की उत्पत्ति कर दी। मतलब अजब ही मूर्खता चल रही है।


कोई ऊपर नीचे नहीं, सभी का अपना महत्व है। इन चारों कामों से एक भी काम ना हो तो हो सकता है कि आप जिंदा रह लें लेकिन सामाजिक तानाबाना नहीं चल सकता था। हमने व्यवस्था बनाई, इसीलिए आज हमारे पास हजारों लाखों सालों का इतिहास है। हमने दायित्वों का वर्गीकरण किया, लोगों की योग्यता, क्षमता और प्रतिभा को निखरने का अवसर दिया, इसलिए हम विश्वगुरु कहलाए, इसीलिए सबसे प्रतापी राजा हमारे पास हुए, इसलिए पूरी दुनिया में सबसे बड़े निर्यातक हम रहे, इसीलिए हमारा हर काम व्यवस्थित रहा। 


सब परफेक्ट था तो समस्या कैसे हुई?

जैसा मैंने पहले भी कहा कि हम जब कोई व्यवस्था बनाते हैं तो उसकी कुशलता में कोई कमी नहीं छोड़ते। हमारी वर्ण और आश्रम व्यवस्था भी परफेक्ट थी, जैसे जब भारत का संविधान बना तो वह भी सभी के बारे में सोचकर एकदम परफेक्ट बनाया गया, उस समय के हिसाब से। लेकिन फिर विसंगतियां आनी शुरू हो गईं, लोग निजी लाभ के लिए उनका दुरुपयोग करने लगे। बिलकुल वैसे ही, जैसे कई बार आज पड़ोसी से कूड़ा डालने को लेकर झगड़ा हो जाए तो SC-ST एक्ट लगवा दिया जाता है, या पत्नी अपनी सास को खाना ना दे और पति इसे लेकर डांटे तो दहेज उत्पीड़न का केस लगवा दिया जाता है। उसी तरह से लोगों ने उस वर्ण व्यवस्था का भी दुरुपयोग किया, उसके सहारे लोगों का शोषण भी किया, उनके मानवीय अधिकारों का हनन भी किया। लेकिन क्या इसके लिए आप वर्ण व्यवस्था को दोषी ठहराएंगे? नहीं! दोषी वह है, जिसने दुरुपयोग किया, जैसे संविधान का होता है। फर्जी केस लगवाने वालों की वजह से हम संविधान को गलत नहीं कह सकते। बदलते वक्त के साथ मल्टिटास्किंग उपयुक्त व्यवस्था है। अब कोई 'वैश्य' आपका पेट पालने के लिए नहीं बैठा है, अब आपको अपना पेट पालने के लिए कभी ब्राह्मण वाला, तो कभी क्षत्रिय वाला, तो कभी शूद्र वाला काम करना पड़ेगा। जब काम दूसरे वर्ण वाला कर रहे हैं तो जन्म को लेकर अहंकार क्यों? और यह कहने का अधिकार मैं तब रखता हूं, जब पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कहूं कि बदलते वक्त के साथ जब हम बिना किसी की जाति पूछे उसके साथ ऑफिस में खाना खाते हैं, साथ में  डेस्क शेयर करते हैं, एक ही रूम में शेयरिंग करते हैं, एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, तो जाति आधारित कानूनों को खत्म करके 'समान नागरिक संहिता' लागू की जाए। 


जब ऊपर के पैराग्राफ के अंतिम हिस्से का पहला भाग कहता हूं तो जन्म आधारित जाति के अहंकार में डूबे मूर्खों को मैं ब्राह्मण विरोधी लगने लगता हूं, और जब दूसरा हिस्सा कहता हूं तो आरक्षण विरोधी हो जाता हूं। मेरा स्पष्ट मानना है कि जाति व्यवस्था इस देश में नहीं होनी चाहिए, आज हमें उसकी आवश्यकता ही नहीं है। इसके साथ ही कहीं पर भी जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था भी नहीं होनी चाहिए।


अब तक तो ज्ञान की बातें हुईं। अब मैं आपको बताता हूं कि आज सालों बाद मेरा मन क्यों किया कि 'ब्राह्मण' रूप में आया जाए। दरअसल कुछ दिन पहले एक राजनीतिक दल की महिला नेता ने ट्वीट किया, 'ब्राह्मण समाज को अपने पुत्र-पुत्रियों को ब्राह्मणों में ही विवाह करने के लिए प्रेरित, संस्कारित और शिक्षित करना ही चाहिए। जिससे ब्राह्मण संस्कार चिरायु हों। रोटी सबके साथ मिल बाँटकर खाओ, पर बेटी अपने ब्राह्मण कुल में ही दो और अपने ब्राह्मण कुल से ही लो।'


https://twitter.com/RoliTiwariMish1/status/1523863999519277058


इस ट्वीट के बाद मैं बड़ा आश्चर्यचकित हुआ कि समाजवादी पार्टी की नेता होकर ब्राह्मणों की इतनी चिंता कैसे? फिर नाम देखा, उसमें पंडित भी था, तिवारी भी और मिश्रा भी। वंशावली की बात करूं तो मैं विश्व गौरव, कश्यप गोत्र, वेद-सामवेद, उपवेद- गंधर्ववेद, शिखा-वाम, पाद-वाम, शाखा-कौथुमी, सूत्र-गोभिल, देवता-विष्णु और छंद-जगति होने के बाद सैकड़ों धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करने के उपरांत भी इस तरह का ज्ञानार्जन नहीं कर पाया। जिस मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जन्मस्थान के लिए के लिए देश का लगभग पूरा हिंदू मन से एकमत था, उस राम की पत्नी का कुल-गोत्र किसी को नहीं पता था। ऐसे राम को पूजने वाले देश में जाति को लेकर ऐसी बातें। कितने ऋषियों ने राक्षसों की कन्याओं से विवाह किया, क्यों? ताकि उनकी आने वाली पीढ़ी की प्रवृत्ति बदले। कुछ की बदली, तो कुछ की नहीं बदली। लेकिन जब पंडित डॉ. रोली तिवारी मिश्रा ने यह पोस्ट की तो अपने उपरोक्त ज्ञान के आधार पर मैंने जवाब दिया, 'कर्म के आधार पर बनी वर्ण व्यवस्था को आज की व्यवस्था में कैसे स्थापित कर सकती हैं आप? आपके परिवार का एक सदस्य भी क्या आज 'ब्राह्मण' रह गया है? नाम के आगे पंडित लगाने से कोई ब्राह्मण नहीं होता, इस अहंकार से बाहर निकलिए।'


मेरे इस कॉमेंट के साथ ही दो तरह के लोग फुल मूड में आ गए। अलग-अलग कॉमेंट किए। मैं कोशिश करूंगा कि इस ब्लॉग में सभी के सवालों का जवाब दूं और जिज्ञासा का समाधान करूं। इनमें से कुछ को तो भ्रम है, यानी वे समय के अभाव में अध्ययन नहीं कर पाए, और जो सुना, उसे मान लिया। दूसरे हैं कुपढ़, जिन्होंने वही पढ़ा जो विकृत साहित्य उन्हें पढ़ाया गया। ऐसे लोगों को समझाना लगभग नामुमकिन है, लेकिन फिर भी इनका जवाब देना इसलिए जरूरी है, ताकि कम से कम अनपढ़ों को ये कुपढ़ अपने वश में ना कर पाएं।


अल्पज्ञान से भरे मेरे अनुज राशिद के सवाल और उनके जवाब

जब मैं नवभारत टाइम्स डिजिटल में कार्यरत था, तो मैंने मेरठ से एक बालक को अपनी टीम में रखा था। राशिद नाम था उसका। मैंने किसी के चुनाव के लिए जो मानक तय किया था, उसमें वह फिट बैठता था। जब उसका चुनाव किया तो बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया, क्योंकि वह सोशल मीडिया पर काफी कुछ अनर्गल लिखता था। लेकिन वह मेरा विषय नहीं था, इसलिए मैं अपने फैसले पर अडिग रहा। चूंकि वह मेरी टीम का हिस्सा रहा है, इसलिए उसकी जिज्ञासा का समाधान बेहद जरूरी है।


राशिद ने लिखा, 'कर्म के आधार पर बनी वर्ण व्यवस्था को क्या ये कहना चाहिए की शूद्र आपकी सेवा के लिए बने हैं, उन्हें चाहे जैसे इस्तेमाल करो, और यदि किसी शूद्र के कानो में गीता के शब्द पड़ जाए तो उसके कानों में सीसा पिघला कर डाल दो।' मैंने पूछा कि यह जवाब कहां से मिला तो राशिद ने 2-4 ग्रंथों के साथ उनकी तथाकथित सूक्तियां लिख डालीं।


शूद्र किस लिए बने थे, वह मैं ऊपर स्पष्ट कर चुका हूं और गीता में तो भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥' अब ऐसे में अगर कोई यह कहे कि गीता सुनने वाले के कान में सीसा पिघलाकर डाल दो तो हास्यास्पद लगता है। कौन सी बात किस प्रसंग में कही गई, किसने कही, बिना इसे समझे कुछ भी कह देना गलत होगा। वाल्मीकी रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने रावण से भी बहुत कुछ कहलवाया है, अगर आप उस एक श्लोक को पढ़कर यह कह देंगे कि यह तो रामायण में लिखा है, तो गलत होगा। खैर, राशिद ने मनुस्मृति की एक तथाकथित सूक्ति बताई- 'अनिष्टेषु वर्तन्ते सर्व कर्मसु। सर्वथा ब्राह्मणा पूज्या: परमं दैवतं हितत्।। मनु-स्मृति-९/३१९' बड़े धड़ल्ले से ऐसी सूक्तियां, श्लोक और बातें बिना प्रसंग के और भावहीन विषय को केन्द्र में रखकर फैलाई जाती हैं। 


ऊपर की तरह ही श्रीरामचरित मानस की एक तथाकथित चौपाई का जिक्र किया जाता है, 'पूजहि विप्र सकल गुण हीना। शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।', इसका जिक्र भी राशिद ने किया है। 

ऐसे और भी सूक्तियों/ चौपाइयों/श्लोकों के साथ इस बात को प्रमाणित करने की कोशिश की जाती है कि सनातन परंपरा में ब्राह्मण जाति को सबसे ऊपर रखा गया, शूद्रों को दबाया गया। अरे साहब! सनातन पर सवाल उठाने से पहले सनातन को समझ तो लो। सनातन में जब कर्म आधारित व्यवस्था है तो उसमें ब्राह्मण जन्म से कोई कैसे हो गया। श्रीरामचरितमानस की जिस  चौपाई का ऊपर जिक्र किया गया है, उसके साथ कितनी चालाकी से छेड़छाड़ की गई है, उसे समझिए। असल चौपाई है:

पूजिय विप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ज्ञान प्रवीना।

लेकिन इस चौपाई को इतना स्पष्ट कर दिया गया कि लोग आसानी से समझ सकें कि शूद्रों के साथ तो सनातन में बड़ा भेदभाव हुआ है। खैर, हम आपको अरण्यकांड की इस चौपाई का अर्थ बताते हैं। पूरा प्रसंग समझाएंगे तो बहुत समय लगेगा, लेकिन इतना समझ लीजिए कि राक्षस कबंध से भगवान श्रीराम यह कह रहे हैं और बात हो रही है ऋषि दुर्वासा के बारे में। ऋषि दुर्वाषा के क्रोध के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन उनके ज्ञान और कर्म के बारे में कोई पश्नचिह्न नहीं लगा सकता। इस चौपाई को दो हिस्सों में तोड़कर समझते हैं:

पहला हिस्सा: पूजिय विप्र सील गुन हीना।

पूजिए+ विप्र (साधु) को+ सील का गुन (कोमल हृदय के गुण से रहित)

अर्थात- 


दूसरा हिस्सा: सूद्र न गुन गन ज्ञान प्रवीना

सूद्र न गुन (शूद्र यानी तपस्या से हीन मत समझ)+ गन ज्ञान प्रवीना (ज्ञानी मानो)


पूरी चौपाई का अर्थ समझें तो वहां किसी ब्राह्मण और शूद्र की बात ही नहीं हो रही है, वहां तो बस दुर्वासा ऋषि के बारे में राम बता रहे हैं कबंध को। 

इसका अर्थ होगा- वह विप्र जिसमें भले ही कोमलता ना हो, जो भले ही डांटता-फटकारता हो, दंडित करता हो, लेकिन फिर भी वह पूज्य है। उसे उसके व्यवहार के आधार पर शूद्र यानी तपस्या से हीन मत समझो, बल्कि उनके तप, त्याग, गुण और विशेषताओं के आधार पर उन्हें ज्ञानी समझो।


अब इस चौपाई में ब्राह्मण व्यभिचारी होने पर भी पूज्य है, यह कहां से आ गया? यह सिर्फ एक उदाहरण है। भारतीय परंपराओं और साहित्य के साथ लगातार ऐसा हुआ। साहित्य में विकृति आती है तो परंपरा और समाज स्वतः विकृत हो जाता है, यही हमारे साथ हुआ। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस विकृति से हमारी संस्कृति खत्म होती जा रही है। लेकिन इसका जिम्मेदार कोई व्यक्ति, कोई जाति, कोई संप्रदाय या कोई विशेष वर्ग नहीं है। हर जाति/संप्रदाय/वर्ग में ऐसे लोग हैं, जो बिना पढ़े सिर्फ उसी को सत्य मान लेते हैं, जो उन्हें बताया जाता है। ऐसी ही एक और सूक्ति राशिद ने लिखी


शतं ब्राह्मण माक्रश्य क्षत्रियो दण्डं अर्हति।

वैश्योप्यर्ध शतं द्वेवा शूद्रस्तु वधम् अर्हसि।।

(मनु-स्मृति-- ८/२६७/)


कुपढ़ का अर्थ समझिए। राशिद के अनुसार इसका अर्थ है कि मनु-स्मृति में वर्णित है कि ब्राह्मण बुरे कर्म करे, तब भी पूज्य है, क्योंकि वह भू- मण्डल का परम देवता है।


जब मैंने इसे पढ़ा तो हंसी आई। क्योंकि ऊपर जो सूक्ति लिखी है, उसका इस अर्थ से कोई लेना देना नहीं है। उस सूक्ति में बताया गया है कि यदि किसी ब्राह्मण (उस समय के हिसाब से कर्म वाला) को दुष्ट वचन कहे तो उसे क्या सजा मिलेगी। यानि अगर क्षत्रिय कुछ कहेगा तो उसे क्या दंड मिलेगा, वैश्य को क्या दंड मिलेगा और शूद्र को क्या दंड मिलेगा। यह सामान्य सा दंड विधान था। इस सूक्ति के विषय में जब एक आचार्य से बात कर रहा था तो उन्होंने बहुत शानदार उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, 'मान लीजिए, किसी कक्षा में 40 बच्चे हैं, उन्हें तीन कैटिगरी में बांटिए, पहली जो पढ़ने में बहुत होशियार हैं और शिक्षक की सारी बातें मानते हैं, दूसरी जो कम होशियार हैं और कभी-कभी गड़बड़ कर देते हैं तथा तीसरी में वे छात्र जो अधिक गड़बड़ करते हैं। अब अगर कोई छात्र शिक्षक की अवज्ञा करे तो शिक्षक हर कैटिगरी के छात्र को उसके पुराने रेकॉर्ड के हिसाब से ही दंड देगा।' यह उस समय का एक दंडविधान था। खास बात यह है कि अगर कोई ब्राह्मण किसी ब्राह्मण को कुछ कहता है तो उसपर राजदरबार में राजा के समक्ष शास्त्रार्थ का विधान था। उनके जवाब पर मैंने पूछा कि ऐसा क्योंकि किसी और वर्ण का व्यक्ति एक ब्राह्मण को कुछ नहीं कह सकता? उनका जवाब था, 'एक व्यक्ति सुबह भोजन करता है, उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि शाम को भोजन कहां से मिलेगा। लोगों को शिक्षित करने का काम करता है, कुटिया में रहता है, लालच शून्य है। उसे कोई कुछ कहेगा तो कष्ट तो होगा।'


इस्लाम आतंकवाद सिखाता है?

इसी तरह सैकड़ों सूक्तियां, श्लोक मार्केट में तैर रहे हैं, जिनका अर्थ विकृत रूप में फैलाकर समाज में विद्वेष फैलाया जा रहा है। अब हो सकता है कि किसी के मन में सवाल उठे कि हम ये कैसे सही मानें कि मनुस्मृति या अन्य किसी ग्रंथ में किसी जाति के लिए विद्वेष नहीं है। मैं इसका जवाब एक उदाहरण से देता हूं। एक बार मेरे एक परिचित ने पूछा कि आपके मुसलमान दोस्त क्यों हैं, उनको तो आतंकवाद सिखाया जाता है, जिहाद सिखाया जाता है। मैंने पूछा कि यह किसने कहा कि मुसलमानों को आतंकवाद सिखाया जाता है? उसने कहा, वे जिहाद के नाम पर कत्लेआम करते हैं, ये तो आतंकवाद ही है और उन्हें यह सब कुरान सिखाती है।


मौलवी साहब ने समझाया इस्लाम

सवाल में दम था, लेकिन मैं सनातनी इस्लाम के बारे में क्या ही जानता। लेकिन मैं अपने उन मित्रों को तो जानता था, जो मेरे साथ रहते थे, मेरे साथ जिन्होंने दामिनी के लिए तिरंगा उठाया था, जिन्होंने शिक्षा के व्यापारीकरण के खिलाफ मेरे छात्र जीवन के दौरान एबीवीपी का भगवा झंडा भी उठाया था, फिर मैं कैसे मान लेता कि उनको आतंकवाद सिखाया जाता है। इसके बाद मैं एक मौलवी साहब के पास गया। उनसे यही सवाल रखे, तो उन्होंने सबसे पहले तो जिहाद का मतलब बताया। उन्होंने कहा कि 'जिहाद का मतलब है अपने अंदर के राक्षस से लड़ना। अपने अंदर की बुराइयों से लड़ना और सिर्फ लड़ना नहीं बल्कि उस लड़ाई में अत्यधिक प्रयास करना मतलब जीतकर ही दम लेना। अब अगर कोई जिहाद के नाम पर एक कौम को बुराई बताकर उसकी हत्या कर रहा है, तो वह कुछ भी हो सकता है, सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता।' 


बात बस इतनी सी है। इस दुनिया में आपका मानस तय करने वाले बहुत से लोग हैं। आपने उनके हिसाब से अपना मानस बना लिया तो किसी का कोई नुकसान हो या ना हो, 'आप' में से 'आप' खत्म हो जाएंगे। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं कि कोई किसी चीज की कैसी भी व्याख्या करे, लेकिन उसमें जो आपके साथ आपके पड़ोसी और आपके समाज के लिए हितकारी हो, उसे स्वीकार करो। 


नारी के विषय में मनुस्मृति

मनुस्मृति के विषय में कहा जाता है कि वह नारी स्वतंत्रता के खिलाफ है। लेकिन जितना मैंने पढ़ा है, मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 56वें श्लोक में वर्णित है, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:, यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:’, अर्थात जहां पर स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं और जहां उनकी पूजा नहीं होती, वहां सब काम निष्फल होते हैं। नारी के लिए ऐसा भाव भारतीय परंपरा को छोड़कर किसी अन्य परंपरा में नहीं दिखता और यह परंपरा मनुस्मृति आधारित है। तो बताइए आखिर किस आधार पर मनुस्मृति का विरोध किया जाए।


दहेज इत्यादि पर मनुस्मृति

मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के 138वें श्लोक का अर्थ मुझे बताया गया कि स्त्री, रोगी, भारवाहक, अधिक आयुवाले, विद्यार्थी, वर और राजा को पहले रास्ता देना चाहिए। इसी मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 52वें श्लोक में कहा गया कि जो वर के पिता, भाई, रिश्तेदार आदि लोभवश, कन्या या कन्या पक्ष से धन, संपत्ति, वाहन या वस्त्रों को लेकर उपभोग करके जीते हैं वे महानीच लोग हैं। क्या दहेज प्रथा का इससे बड़ा विरोध कोई कर सकता है? विश्वास मानिए, किसी और वजह से नहीं, बल्कि एक सनातनी होने का गर्व अनुभव करने के लिए मैंने अपने विवाह कतो पूर्ण रूप से दहेज रहित रखा। मेरे कई 'अपने' इस बात से आज तक मुझसे नाराज हैं, लेकिन मैं गर्वित हूं कि जिस गौरवशाली परंपरा का इतिहास हजारों-लाखों वर्ष पुराना है, उसे संरक्षित करने में थोड़ा सा योगदान मेरा भी है। 


मुझे टैग करते हुए सोशल मीडिया पर आरक्षण व्यवस्था से प्रताड़ित एक नवयुवक ने लिखा, 'मेरे माता-पिता दोनों जन्म से ब्राह्मण हैं, मैं दिन-रात साफ सफाई का काम कर लूंगा, मुझे SC-ST का सर्टिफिकेट कैसे मिल सकता है?' 


कुल/गोत्र का अहंकार! मनुस्मृति पढ़ लो आज के ब्राह्मणो

आज इस देश में भ्रष्टाचार से भी बड़ी कोई बीमारी है तो वह जातिवाद है। मैं मानता हूं कि जन्म आधारित जाति व्यवस्था इस देश की एकात्मता, अखंडता और एकता के लिए खतरा है लेकिन इस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराना गलत होगा। नीति की स्पष्ट व्याख्या मनुस्मृति में मिलती है, आज जब पूरा दलित आंदोलन मनुवाद के विरोध पर टिका है, ऐसे समय में मैं बताना चाहता हूं कि वर्ण व्यव्स्था को जन्म के आधार पर नहीं अपितु कर्म के आधार पर शुरू किया गया था। वर्ण अर्थात वरण करने वाला यानी चुनाव करने वाला, अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्म को चुनने का अधिकार था। उस गुण, कर्म, स्वभाव आधारित व्यवस्था को आज जन्म आधारित बनाकर एक पुण्य संस्कृति का विरोध करना वास्तव में दुखद है। मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के 109वें श्लोक में साफ तौर पर कहा गया है कि अपने गोत्र या कुल की दुहाई देकर भोजन करने वाले को स्वयं का उगलकर खाने वाला माना जाए। अतः मनुस्मृति के अनुसार जो जन्म से ब्राह्मण या ऊंची जाति वाले अपने गोत्र या वंश का हवाला देकर स्वयं को बड़ा कहते हैं और मान-सम्मान की अपेक्षा रखते हैं उन्हें तिरस्कृत किया जाना चाहिए। अब अगर कोई अल्पज्ञानी 'ब्राह्मण' खुद को सिर्फ इसलिए 'बड़ा' मानने लगे कि उसका कुल/गोत्र क्या है तो उसका तिरस्कार करने का आदेश स्वयं मनुस्मृति देती है।


आज की व्यवस्था बेहतर है, या तब की थी?

मनुस्मृति के 10वें अध्याय के 65वें श्लोक में कहा गया है कि ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र, ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं। मनुस्मृति के अनेक श्लोक कहते हैं कि उच्च वर्ण का व्यक्ति भी यदि श्रेष्ठ कर्म नहीं करता, तो वह शूद्र (अशिक्षित) बन जाता है। अब अगर आप उस शूद्र शब्द को जन्म आधारित जाति से जोड़ दें तो गलत होगा। इस तरह से वर्ण बदलने का व्यवस्था आज का संविधान देता है क्या? लेकिन उस समय के विधान यानी मनुस्मृति में ऐसी व्यवस्था थी। 


....फिर भी, इसे समझना जरूरी है

इतना कुछ होने के बावजूद संभव है कि मनुस्मृति में कुछ ऐसी बातें हों जो आज के परिपेक्ष्य में आत्मसात करने के लिए उपयुक्त न हों अथवा यह भी संभव है कि जिस उद्देश्य के साथ वे बातें लिखी गई हों, वह उद्देश्य हमारी समझ से परे हों लेकिन इस तर्क के साथ पूरी मनुस्मृति को नकार देना अनुचित होगा। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, सभी को परिवर्तित होना चाहिए लेकिन उस परिवर्तन की दिशा सकारात्मक होनी चाहिए। सकारात्मक सोचें, सकारात्मक समझें और सकारात्मक करें……हमें तो गर्व करना चाहिए कि हमारे देश में 2000 से अधिक सालों का इतिहास रखने वाली सेवा समर्पित ईसाईयत है, 1400 से अधिक सालों का इतिहास रखने वाला शांतिप्रिय इस्लाम है, लगभग 500 सालों का गौरवशाली इतिहास रखने वाला सिख पंथ है, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी और आदि काल से चला आ रहा पूर्ण सनातन भी है। जिस परंपरा (रिलिजन) में जो भी उचित हो, जो भी वर्तमान परिपेक्ष्य में अनुकरणीय हो, उसे ससम्मान आत्मसात करने में क्या बुराई है?


अध्ययन का वक्त नहीं है तो मेल करें

और अंत में बस इतना ही कहूंगा कि आप अपने जन्मजातीय ब्राह्मण होने के अहंकार में हैं या बाप-दादाओं की कहानियों के आधार पर आज सक्षम होने के बावजूद एक वर्ग विशेष को अपने उस शोषण का जिम्मेदार मानते हैं, जो आज हो नहीं रहा, या फिर आपको किसी भी भारतीय साहित्य में कोई खामी दिखती है और आपको उसकी पुष्टि करने के लिए अध्ययन का समय नहीं है  तो प्लीज मुझे news.vgaurav@gmail.com पर मेल करें। मैं उपनिषद परंपरा का पालन करते हुए अध्ययन करूंगा और आपकी जिज्ञासा का समाधान करूंगा। और एक और बात, विश्वास मानिए, अगर कुछ गलत हुआ तो वह भी बताऊंगा और अपने पूर्वजों की तरफ से क्षमा भी मांगूंगा। पर अगर आप फर्जी ज्ञान बाटेंगे तो उससे मेरा कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन आपका कोई लाभ भी नहीं होने वाला। शुभकामनाएं...

Monday, 20 September 2021

UP में सच दिखाने की सजा FIR क्यों है? CM योगी आदित्यनाथ के नाम एक पत्रकार का खुला पत्र

 प्रिय योगी आदित्यनाथ जी,
देश में बीते साल जब कोरोना का कहर शुरू हुआ तो सरकार ने बेहद संजीदगी से प्रवासी मजदूरों को मुफ्त में राशन पैकेट और भोजन पैकेट उपलब्ध कराने शुरू किए। फिर जब काम-धंधे रुक गए तो सरकार ने गरीबों को मुफ्त राशन देने की घोषणा कर दी। दुनिया में मुफ्त में राशन वितरण की यह सबसे बड़ी योजना थी। एक भारतीय के तौर पर मेरे लिए ये गर्व का विषय था कि अचानक आई महामारी को लेकर तमाम अव्यवस्थाओं के बीच सरकार कम से कम भूख मिटाने का इंतजाम कर रही है।

इस बीच अचानक पता लगा कि गरीबों के हक पर डाका जा रहा है। सरकारी राशन की दुकानों पर कोटेदार गरीबों के राशन में घटतौली कर रहे हैं। खबर हुई तो कुछ कोटेदारों पर ऐक्शन भी हो गया। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसका संज्ञान लिया। कई फोन आए, लोगों ने बधाइयां दीं, सुकून था कि प्रदेश के अंतिम व्यक्ति को मिलने वाले हक में थोड़ा योगदान मेरा और मेरे संस्थान का भी है।

पढ़ें: एनबीटी के 'ऑपरेशन भूख' का बड़ा असर: सीएम योगी बोले- कतई न होने पाए गरीबों के राशन में कटौती

फिर कोरोना की दूसरी लहर आई, फिर वैसी शिकायतें थीं, लोगों का कहना था कि हमें एकबार फिर से 'ऑपरेशन भूख' को रिएक्टिवेट करना चाहिए। हमने किया।

देखें वीडियो:
https://www.facebook.com/watch/?v=921599678683156


कोटेदारों ने खोली गोदाम की पोल
इसबार कोटेदारों ने साफ कहा कि उन्हें राशन गोदाम से ही कम मिलता है, बोरियों का वजन नहीं दिया जाता, अतिरिक्त वसूली भी होती है। अफसरों से बात की गई तो उन्होंने जांच कराने की बात कही। लेकिन कार्रवाई फिर से कोटेदारों पर हो गई और मामले को खत्म करा दिया गया। हमारे पास लगातार फोन आ रहे थे कि व्यवस्थाएं नहीं सुधरीं। अफसर छोटी मछलियों पर कार्रवाई करके खानापूर्ति कर देते हैं और बड़ी मछलियां आराम से भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगाती रहती हैं। खैर, हमारी टीम बुलाकी अड्डे के पास स्थित FCI के गोदाम पहुंची। यहीं से कोटेदारों को राशन दिया जाता है। वहां जाने से पहले हमने अपने कुछ कोटेदारों को फोन किया और पूछा कि क्या वे वहां आ सकते हैं। किसी ने समय मांगा तो किसी ने मना कर दिया। इसबीच अलका नाम की एक कोटेदार के रिश्तेदार रजनीश ने कहा कि वह आज राशन लेने जा रहे हैं। मैंने उनको गोदाम पर मिलने को कहा।

जब दबाव काम नहीं आया तो मैडम धमकाने लगीं
गोदाम पर मार्केटिंग इंस्पेक्टर शशि सिंह मौजूद नहीं थीं, एक कथित कर्मचारी जिसका नाम मोनू था, वो कोटेदारों को राशन दे रहा था। पहले तो हमने चुपचाप उसके काम और बातचीत की रिकॉर्डिंग की, फिर उसे अपना परिचय देने के बाद उसका परिचय पूछा। वो भड़क गया और कई लोगों से फोन कराकर दबाव डलवाने लगा। इसबीच उसने शशि सिंह से बात कराई, शशि सिंह ने मेरा परिचय पूछने के बाद फो न काट दिया। इसके बाद शशि सिंह ने अपने कई 'रिश्तेदार' पत्रकारों से फोन कराया, लेकिन मेरा साफ स्टैंड था कि मैं अपनी खबर के बीच में किसी को नहीं आने दूंगा।

कुछ देर के बाद शशि सिंह आईं और जब उनसे पूछा गया उनकी अनुपस्थिति में एक आउटसोर्सिंग वाला कर्मचारी कैसे बिना वेरिफिकेशन के राशन कैसे बांट सकता है तो वह भड़क गईं और एफआईआर की धमकी देने लगीं। बाद में विभिन्न धाराओं में मेरे साथ मेरे सहयोगी आशीष सुमित मिश्रा पर FIR हुई और मुख्य आरोपी रजनीश नामक शख्स को बनाया गया। इसकी वजह थी कि वह कैमरे पर वहां की व्यवस्थाओं को नंगा कर रहा था, सच बोल रहा था।

अब मैं कुछ टेक्निकल चीजें समझाता हूं।
1. उत्तर प्रदेश में एक कोटेदार को प्रति क्विंटल 70 रुपये मानदेय मिलता है, राशन बंटवाने के लिए।
2. डोर स्टेप डिलिवरी खत्म होने के बाद सरकार कोटेदारों को लगभग 18 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से अतरिक्त धन दे रही है, गोदाम से कोटे तक लाने के लिए।
यानी कोटेदार को कुल 70+18= 88 रुपये सरकार की ओर से मिलता है।
3. कोटेदार को राशन तौलवाने का पैसा गोदाम पर अलग से देना पड़ता है, उसे खुद गोदाम जाकर राशन लदवाना पड़ता है और इतनी महंगाई में वह कम से कम 35-40 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से राशन को अपने कोटे तक लेकर आता है। अब एक गणित समझिए:

मान लीजिए किसी कोटेदार के पास 200 क्विंटल राशन आ रहा है, इसका मतलब है कि उसे सरकार की ओर से 17,600 रुपये मिल रहा है।
इसके बाद उसके खर्च जोड़िए
गोदाम से कोटे तक राशन लाने का खर्च: 200x40= 8000
दुकान का किराया= 4000 (औसतन)
सहयोगी का खर्च= 8000 (औसतन)
बिजली का बिल= 1000 (औसतन)
स्टेशनरी (पेन, डायरी, बिल)= 1000 (औसतन)
अतिरिक्त खर्चे (राशन लेने जाना, उतरवाना)=1000
कुल= 23000 रुपये
यानी क्या कोटेदार 5400 रुपये अपनी जेब से भरेगा? नहीं वो भ्रष्टाचार करेगा। क्योंकि सिस्टम ऐसा बना हुआ है। और ये जो गणित मैंने समझाया है, ये हर अधिकारी को पता है, इसलिए कठोर कार्रवाई नहीं होती।

कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार
सबसे आसान तरीका ये है कि सरकारी राशन की दुकानों को सरकार सीधे तौर पर अपने अंडर में ले ले और वहां बाकायदा कर्मचारी तैनात करके राशन का वितरण कराए। ऐसे मामलों में जवाबदेही उस सरकारी कर्मचारी की तय होगी।
दूसरा रास्ता यह है कि दिल्ली, हरियाणा जैसे अन्य राज्यों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में कम से कम मानदेय इतना किया जाए कि इन कोटेदारों को गलत करने की जरूरत ना पड़े। फिर गोदाम से लेकर दुकान तक, कड़ाई से व्यवस्था का पालन कराया जाए।  

हो सकता है कि ये कोटेदारों के पक्ष की बात हो, लेकिन असल में ये बात सीधे तौर पर सूबे के गरीबों से जुड़ी हुई है। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान एक पेपर हुआ करता था 'मीडिया रिसर्च'। उसमें खबर के पीछे छिपी खबर निकालना बताया जाता था। मैं जो भी स्टोरी करता हूं, उसकी तह में जाकर पता करता हूं कि असल मसला फंस कहां रहा है। इस मामले में भी वही है। मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। बेहद संजीदगी के साथ अपना काम करता रहूंगा।

मामले में भले ही FIR हुई हो, लेकिन उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं अपना काम कर रहा हूं और व्यवस्था अपना काम करेगी। बस दो छोटे से सवाल हैं
1. एक बच्ची को लगातार अश्लील वीडियो कॉल आते हैं, 4 दिन तक पिता थाने के चक्कर लगाता रहता है, लेकिन एक FIR दर्ज नहीं करती।
दुकान से लूट हो जाती है, दुकानदार से मारपीट होती है, पुलिस कहती है कि 151 में मुकदमा कराना है तो कराओ, लूट का नहीं लिखेंगे। इसके बाद पीड़ित आपको पत्र लिखता है।
किसी के साथ राजधानी के बड़े चौराहे पर मोबाइल लूट होती है, लेकिन पुलिस 3 दिन तक FIR नहीं दर्ज करती।
इतनी संजीदा UP पुलिस कुछ ही घंटों में बिना एक बार भी मेरा पक्ष जाने FIR कैसे दर्ज कर लेती है। क्या इसलिए क्योंकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दबाने की कोशिश में सब हिस्सेदार हैं।

2. ये तेजी अच्छी है, FIR का मतलब होता है- First Information Report यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट। सूचना मिलते ही पुलिस का नैतिक दायित्व है कि FIR दर्ज करे, लेकिन हर मामले में ही ऐसा करे। बाकी मामलों में ऐसा क्यों नहीं होता?

एक राष्टवादी सरकार से मेरी अपेक्षा क्या थी?
FIR हो गई थी, कोई बात नहीं थी। लेकिन 3 दिन बीत जाने के बाद भी एक कामचोर अफसर कुर्सी पर बैठा है, मामले में उच्चस्तरीय जांच क्यों नहीं हुई? हम तो सरकार की मदद कर रहे हैं, बता रहे हैं कि किस तरह से व्यवस्था को खराब किया गया है, किस तरह से अफसरों ने गड़बड़ की है, सरकार को तो हमारा सहयोग करना चाहिए। और हम अपेक्षा भी यही करते हैं।

Wednesday, 15 September 2021

लखनऊ के पत्रकार साथियों के नाम Open Letter

 नमस्ते,
मुझे बताया गया कि लखनऊ की मीडिया के एक वॉट्सऐप ग्रुप में हाल ही में मेरे ऊपर हुई एफआईआर को लेकर कुछ चर्चा हो रही है। उसमें इस पूरे मामले को लेकर कुछ भ्रम जैसी स्थिति है। इसलिए मैं चाहता हूं कि मेरी बात भी लखनऊ के सभी जूनियर-सीनियर पत्रकार मित्रों तक पहुंचे।
सबसे पहले तो अपने बारे में बता दूं, क्योंकि डिजिटल में काम करने की वजह से फील्ड में अधिक नहीं रह पाता और इसी वजह से आप सभी से परिचय भी नहीं हो पाया। मेरा नाम विश्व गौरव है और मैं लखनऊ का ही रहने वाला हूं। 2010 में लखनऊ से ही बहुत छोटे स्तर पर पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर 2013 में दिल्ली गया और 2017 तक वहीं पत्रकारिता की। फिलहाल लखनऊ में हूं और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में काम कर रहा हूं। वैसे तो सामान्य तौर पर डिजिटल में डेस्क पर काम करने वाले लोग स्टोरीज नहीं करते, लेकिन मैंने शुरुआत से ही इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की।
अब आते हैं इस मामले पर।

हमने बीते साल 'ऑपरेशन भूख' नाम से एक सीरीज चलाई थी। काफी प्रभावी सीरीज रही थी।


डीटेल में आप उसके बारे में यहां जान सकते हैं। मुझे जानकारी मिली थी कि सरकारी राशन की दुकानों पर कोटेदार गरीबों के राशन में घटतौली कर रहे हैं। खबर हुई तो कुछ कोटेदारों पर ऐक्शन भी हो गया। फिर कुछ कोटेदारों ने मुझसे मिलकर अपनी समस्याएं बताईं, ऊपर दिए गए लिंक पर आप देख सकते हैं कि उनके पक्ष को भी शामिल करते हुए हमने स्टोरीज कीं। इसके बाद अभी 2-3 महीने पहले हमने फिर से अपनी वही पुरानी सीरीज शुरू की, जिसमें फिर से लोगों को राशन कम दिया जा रहा था। कोटेदारों ने ऑन कैमरा बताया कि उन्हें गोदाम से राशन कम मिलता है।
यहां देखें:




जिसके बाद जिला प्रशासन ने कोटेदारों पर कार्रवाई करके खानापूर्ति कर ली। फिर इस महीने मेरे पास कई कोटेदारों के फोन आए कि गोदाम से राशन कम मिल रहा है और अवैध वसूली हो रही है। उनका कहना था कि डोरस्टेप डिलिवरी खत्म होने के बाद व्यवस्था और खराब हो गई है। जिसके बाद हमारी टीम बुलाकी अड्डे के पास स्थित FCI के गोदाम पहुंची। यहीं से कोटेदारों को राशन दिया जाता है। वहां जाने से पहले हमने अपने कुछ कोटेदारों को फोन किया और पूछा कि क्या वे वहां आ सकते हैं। किसी ने समय मांगा तो किसी ने मना कर दिया। इसबीच अलका नाम की एक कोटेदार के रिश्तेदार रजनीश ने कहा कि वह आज राशन लेने जा रहे हैं। मैंने उनको गोदाम पर मिलने को कहा।

गोदाम पर मार्केटिंग इंस्पेक्टर शशि सिंह मौजूद नहीं थीं, एक कथित कर्मचारी जिसका नाम मोनू था, वो कोटेदारों को राशन दे रहा था। पहले तो हमने चुपचाप उसके काम और बातचीत की रिकॉर्डिंग की, फिर उसे अपना परिचय देने के बाद उसका परिचय पूछा। वो भड़क गया और कई लोगों से फोन कराकर दबाव डलवाने लगा। इसबीच उसने शशि सिंह से बात कराई, शशि सिंह ने मेरा परिचय पूछने के बाद फो न काट दिया। इसके बाद शशि सिंह ने अपने कई 'रिश्तेदार' पत्रकारों से फोन कराया, लेकिन मेरा साफ स्टैंड था कि मैं अपनी खबर के बीच में किसी को नहीं आने दूंगा।

कुछ देर के बाद शशि सिंह आईं और जब उनसे पूछा गया उनकी अनुपस्थिति में एक आउटसोर्सिंग वाला कर्मचारी कैसे बिना वेरिफिकेशन के राशन कैसे बांट सकता है तो वह भड़क गईं और एफआईआर की धमकी देने लगीं। बाद में विभिन्न धाराओं में मेरे साथ मेरे सहयोगी आशीष सुमित मिश्रा पर FIR हुई और मुख्य आरोपी रजनीश नामक शख्स को बनाया गया। इसकी वजह थी कि वह कैमरे पर वहां की व्यवस्थाओं को नंगा कर रहा था, सच बोल रहा था।

शशि सिंह का कहना था कि उनके पास महिलाबाद का भी चार्ज है, और वो वहां गई थीं, लेकिन मेरे सूत्रों ने बताया कि वो उसदिन वहां भी नहीं थीं। रही बात उनके बयान की, तो वीडियो में उन्होंने जो बोला है, उसके बाद मेरा जवाब यही था कि 'आपने जो कह दिया, मैं कोटेदारों के आरोपों के साथ उसे भी चला दूंगा।'

साथियो, हम में से कई 'सिस्टम' वाले या फिर ऐक्सिडेंटल पत्रकार होंगे, लेकिन मैंने बहुत कुछ छोड़कर इसे चुना है। आज तक और आगे भी कोई मुझपर किसी तरह की दलाली प्रमाणित नहीं कर सकता। पूरी जिम्मेदारी के साथ अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर पत्रकारिता करता हूं। सिलिंडर पर मिलने वाली सब्सिडी से लेकर किसी तरह की 'गैरजरूरी' सरकारी सुविधा नहीं ली। कई वर्तमान मंत्री निजी तौर पर काफी पहले से संपर्क में हैं, कई जूनियर इन मंत्रियों के PRO हैं, कई पुराने निजी संबंधों वाले परिचित विभिन्न राजनीतिक दलों में बड़ी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन पत्रकारिता शुरू करने से लेकर आज तक किसी राजनीतिक दल के कार्यालय से लेकर सचिवालय तक में एक चाय तक नहीं पी। पत्रकारिता के इतने बड़े ब्रैंड से जुड़ने के बाद कभी उन लोगों से मिलने नहीं गया। बात की, तो भी बेहद प्रोफेशनल होकर। लोग कहने लगे कि तुम बदल गए हो लेकिन शायद ये बदलाव मेरी जिम्मेदारी के साथ स्वतः ही आ गया था।

मुझे नहीं पता कि मेरी बातों को आप किस तरह से लेंगे, लेकिन मैं बस अंत में इतना कहना चाहता हूं कि मेरी किसी से लड़ाई नहीं है, मुझे किसी से लड़ना भी नहीं है लेकिन ये धर्म युद्ध है और जो इस युद्ध में सत्य के साथ नहीं है, वो निश्चित ही असत्य/अधर्म के साथ है।
बाकी फैसला आप सभी पर है...

आपका
विश्व गौरव

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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