Monday, 6 March 2023

बोलो सारा रारा रा, जोगीरा सारा रारा रा



कांग्रेस थी, हो गई गायब , वामी हो गए अगवा।

रंग चढ़ा मेहनत का देखो, पूर्वोत्तर भी भगवा।।

जोगीरा सा रा रा रा


देश के दिल में दिल्ली है और दिल्ली में 'मतवाला'

पूछताछ में राज खुल गए, चचा किए घोटाला 

बोलो सारा रारा रा, जोगीरा सारा रारा रा



लूट- लूट के घर को भरता, सबको भेजे जेल

भारत माँ की जय बोल के, सर जी खेलें खेल

बोलो सारा रारा रा, जोगीरा सारा रारा रा



कभी सपा तो कभी भाजपा, सिक्का है वो खोटा।

झूठ बोलना उसकी आदत, है बिन पेंदी का लोटा।

बोलो सारा रारा रा, जोगीरा सारा रारा रा


तुलसी को वो गाली देवे, खूब मचावे गंध

ताज होटल में चले जब थप्पड़, ठठरी गई बंध

बोलो सारा रारा रा….


टीपू रोए , आजम रोए, बचा ना कौनो काम

बुलडोज़र खुब दौड़ चला है, बोलो जय श्रीराम 

बोलो सारा रारा रा, जोगीरा सारा रारा रा


रामचरित की प्रतियाँ जलतीं, चुप बैठी सरकार

रामकृपा से कुर्सी पाए, अब बदल गया व्यवहार

बोलो सारा रारा रा, जोगीरा सारा रारा रा


बुआ होलिका मूल निवासी, प्रह्लाद था बाभन

जानें  कैसी थ्योरी  लाते,  बामसेफ  के  रावन

बोलो सारा रारा रा, जोगीरा सारा रारा रा



कोस-कोस पर पानी बदले, घाट-घाट पर चप्पू

हर सूबे में धरम बदलता, गिरगिट जैसा पप्पू

बोलो सारा रारा रा, जोगीरा सारा रारा रा


सपा का चिल्लर देता गाली, खूब फैलाए झूठ।

पड़ी फिर जब सच की लाठी, बट्ट गए रे सूज।

बोलो सारा रारा रा….


बालाजी के चेले है वो,लगे है थोड़े सख्त

दरबार में पहुंचे नक्कटे खुद भी हो गए भक्त 

बोलो सारा रारा रा….


बागेश्वर में बाबा जी है, खूब जमावे रंग

बालाजी जी ने गदा चलाया विरोधी हो गए दंग

बोलो सारा रारा रा….


इफ्तारी को भोज बताएं, होली को हुड़दंग

बीएचयू पर चढ़ गया भइया, सिकुलर वाला रंग

बोलो सारा रारा रा….


पेट्रोल की कीमत उछली, बढ़े गैस के दाम,

अच्छे दिन की आस में जनता, नेता भरें गोदाम

जोगीरा सारा रा रा रा...


रंग बिरंगे रंग यहाँ पर, रंग हमारी जान

सजी रहे होठों पे सबके, होली में मुस्कान

जोगीरा सारा रा रा रा...

Tuesday, 4 October 2022

मैं Adipurush के बॉयकॉट के खिलाफ हूं, अपने बच्चों को जरूर दिखाऊंगा

 


एक फिल्म आ रही आदिपुरुष। सोशल मीडिया पर लोग बॉयकॉट की अपील कर रहे हैं। इस बॉयकॉट की वजह भी बड़ी दिलचस्प है। वह वजह है 'मेकअप'। लंकेश का मेकअप,  कई लोगों ने मुझसे पूछा कि आप तो श्रीराम पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, फिर आदिपुरुष के खिलाफ क्यों नहीं लिख रहे? लेकिन क्या वाकई इस आदिपुरुष के खिलाफ लिखने की जरूरत है? मुझे लगता है नहीं! कारण भी समझाता हूं।


सबसे पहली बात तो यह कि आपको किसी भी काम के पीछे का Intention यानी प्रयोजन समझना होगी। 'आदिपुरुष' एक फिल्म है, तो स्वाभाविक है कि प्राथमिक प्रयोजन तो 'बेहतर कलेक्शन' ही होगा। दूसरी बात है मैसेज, यानी फिल्म से संदेश क्या जा रहा है। अभी फिल्म आई नहीं है, लेकिन टीजर से इतना साफ हो गया है कि 'लंकेश' लंका का राजा है और उसने 'राघव' की धर्मपत्नी 'जानकी' का बलपूर्वक अपहरण किया और फिर राघव ने वानर सेना के संग मिलकर न्याय के दो पैरों से अन्याय के दस सिरों को कुचल दिया। एक लाइन में समझे तो राघव ने साफ संदेश दिया कि 'न्याय के हाथों अन्याय का सर्वनाश होकर रहेगा।' मुझे नहीं लगता कि इस संदेश से किसी को कोई समस्या होनी चाहिए।


मत भूलिए, इस देश की आत्मा पर प्रहार करने वाले खलनायकों को भी इसी देश की फिल्मों में नायक बनाते हुए 'सहृदय' दिखाने की कोशिश की गई। वहां ना संदेश स्पष्ट था और ना ही प्रयोजन लेकिन हमने उन्हें बर्दाश्त किया। आज दक्षिण भारत का सिनेमा कम से कम संदेश और वैचारिक प्रयोजन को लेकर तो स्पष्ट है ना? फिर समस्या कहां हैं? आदिपुरुष का टीजर कार्टून जैसा लगे या गेम ऑफ थ्रोन्स की कॉपी, मुझे लगता है कि हमें फोकस सिर्फ संदेश पर करना चाहिए।


अब बात करते हैं 'मेकअप' इत्यादि पर। आपको क्या लगता है कि 70-80 के दशक में फिल्मों को जिस रूप में प्रदर्शित किया जाता था, उसी तरह से आज भी प्रदर्शित किया जाए तो आज की पीढ़ी देखेगी क्या? बात व्यावहारिक करिए, आपके घर का बच्चा क्या किसी पुरानी फिल्म को उतनी रुचि से देखेगा, जितनी रुचि से वह 'Vlad and Niki', 'Shafa and Soso' या लाखों रुपये के खिलौनों के साथ बनाया गया यूट्यूब वीडियो देखता है? अपवाद छोड़ दीजिए, लेकिन सामान्यतः वह नहीं देखेगा क्योंकि आज के वक्त में उसे उन वीडियोज में रोचकता और नयापन नहीं मिलेगा। 


मेरा जन्म 90 के दशक में हुआ, हमने पूरे परिवार नहीं, बल्कि मोहल्ले वालों के साथ बैठकर रामानंद सागर की रामायण देखी है, उस एक घंटे के एपिसोड के लिए आधे घंटे इंतजार किया है, लेकिन सोचकर देखिए कि आज हम अपने परिवार को कितना वक्त दे पाते हैं, आस-पड़ोस के लोगों को कितना वक्त दे पाते हैं? वक्त के साथ चीजें बदलती रहती हैं, और वक्त के हिसाब से चलना भी चाहिए। कोई नहीं जानता कि रामानंद सागर की रामायण में जैसा श्रीराम, माता सीता या हनुमान जी को जिस रूप में दिखाया गया है, क्या वाकई में वे उसी रूप में थे? लेकिन हमने उन्हें उसी रूप में लिया क्योंकि हमारे मानस में वैसी छवि बन गई। आने वाली पीढ़ी को अगर इन चरित्रों में रुचि नहीं आएगी तो वे इस पूरे इतिहास से दूर हो जाएंगे। 


ढाई-तीन घंटे की फिल्म को अत्यधिक आदर्श रूप में बनाने की कोशिश करेंगे तो नई पीढ़ी, खासकर बच्चों में उन चरित्रों को लेकर सैकड़ों-हजारों सवाल उठेंगे। इन सवालों के जवाब आप दे नहीं पाएंगे, क्योंकि आपने स्वयं अध्ययन नहीं किया है। मेरे मन में भी 14-15 साल की उम्र में 'रामायण' देखकर कई सवाल उठे थे। खासकर उत्तरकांड को लेकर। तब मेरी परदादी ने मेरी जिज्ञासाओं का समाधान किया था। उस वक्त में उनके उम्र के लोगों के पास समय व्यतीत करने के साथ ज्ञानार्जन करने के साधन बस धर्मशास्त्र ही थे। लेकिन आज? खुद से पूछिए कि आपने वाल्मीकि रामायण कितनी बार पढ़ी है? जब पढ़ी नहीं, तो जिज्ञासाओं का समाधान कैसे करेंगे?


मुख्य बात संदेश ही है, वह पहुंचने दीजिए। अगर अन्याय पर न्याय के विजय का यह इतिहास उनतक नहीं पहुंचा तो वे स्पाइरमैन, बैटमैन और कैप्टन अमेरिका को ही आदर्श मानकर थायनोस को राक्षस मान लेंगे। 


फिर कह रहा हूं, समय के साथ परिवर्तन बहुत जरूरी है। याद करिए वह वक्त जब कवि सम्मेलनों में फूहड़ता हावी थी, अच्छी कविताओं को सुनने के लिए लोग नहीं मिलते थे। तब एक नवयुवक निकला और उसने हिंदी कविता को कॉन्सर्ट बना दिया। हिंदी कविता को विश्व मंच तक पहुंचाया। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि जब वह नवयुवक बोलता था तो हर उम्र के लोग उससे खुद को जोड़ लेते थे। वह हिंदी के सामान्यतः अप्रचलित शब्दों, जिन्हें आप क्लिष्ट कहते हैं, उनका प्रयोग भी ऐसे करता था, कि श्रोता उस शब्द का अर्थ ना जानते हुए भी समझ जाते थे। वह श्रोताओं के मानसिक स्तर तक पहुंचता था, फिर उनके मानसिक स्तर को खुद के स्तर तक लाता था। हम आज उसे डॉ. कुमार विश्वास के नाम से जानते हैं। 


लोगों ने उनका भी बहुत विरोध किया। कई बड़े और पुराने कवियों ने तो निजी तौर पर किसी चर्चा के दौरान मुझसे बड़े गलत से शब्दों का प्रयोग किया। लेकिन विश्वास मानिए कुमार विश्वास ने करके दिखाया कि साधन महत्वपूर्ण नहीं है, साधना महत्वपूर्ण है। और साधना पर केन्द्रित कर्म होंगे तो साध्य की सात्विकता पर प्रश्नचिह्न लगने का प्रश्न ही नहीं उठता। आज हिंदी से प्रेम करने वाला, हिंदी के विकास और विस्तार को देखकर प्रसन्न होने वाला हर व्यक्ति कुमार विश्वास पर गर्व करता है, क्योंकि उन्होंने हिंदी को ठीक जगह पर पहुंचाने के लिए साधना की।


गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो स्वयं लिखा है: 

हरि अनंत हरि कथा अनंता। 

कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥


अब कोई किसी भी तरह से श्रीराम का चरित्र दिखाए, बस उनका चरित्र हनन ना करे, एक अच्छा संदेश दे, बस यही प्रसन्न और संतुष्ट होने के लिए पर्याप्त है।

Adipurush में 'लंकेश' के मेकओवर पर सवाल, रावणप्रेमियों से मांगो सीधा जवाब


आदिपुरुष फिल्म में कुछ लोगों की आपत्ति 'लंकेश' के मेकओवर को लेकर है। पत्रकारिता में अभी हाल फिलहाल में आकर प्राइम-टाइम एपिसोड करने वाले एक साथी ने लिखा, 'महान ऋषि विश्रवा का पुत्र रावण अहंकारी था। कई कमियां थी। पर वो ‘ख़िलजी’ नहीं था। रावण विद्वान और महाज्ञानी पंडित था जिसकी वेद-शास्त्रों पर पकड़ थी, भोलेनाथ का महान भक्त था जिसने शिव तांडव स्त्रोत की रचना की। इसी वजह से प्रभु राम ने लक्ष्मण को उससे शिक्षा लेने आखिरी समय भेजा था। रावण से सीख मिलती है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, घमंड, ईर्ष्या, मन, ज्ञान, चित्त और अहंकार का त्याग करें। वरना रावण की तरह रूप-रंग, ज्ञान, धैर्य, त्याग भक्ति तथा सर्वलक्षणों से युक्त वीर जो देवलोक का स्वामी बन सकता था उसकी तरह हश्र हो जाएगा।'


बस लोगों को समस्या इसी बात से है कि एक 'ब्राह्मण' को ऐसा क्यों दिखा दिया? 


अरे भाई, महान ऋषि विश्रवा का पुत्र था तो क्या हुआ? था तो राक्षसों का राजा ही ना?

विद्वान था तो क्या हुआ? विघ्न को ऋषि-मुनियों के यज्ञों में ही डालता था ना?

भोलेनाथ का भक्त था तो क्या हुआ? देव-असुर और मनुष्यों की कन्याओं का अपहरणकर्ता ही था ना?

अरे जैसा भी था, था तो रावण ही ना?

(रावण के विषय में ये सारी बातें स्वयं पंच-कन्याओं में से एक माता मंदोदरी ने वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण के वध के समय कही हैं।)


एक और चीज सोशल मीडिया पर बहुत चल रही है कि श्रीराम ने रावण की मृत्यु के बाद लक्ष्मण को 'ज्ञान' लेने के लिए उसके पास भेजा। इस वाक्य से यह प्रमाणित करने की कोशिश की गई, कि रावण बहुत ज्ञानी था। लेकिन ऐसा कुछ भी वाल्मीकि रामायण में नहीं है। मैं सबकुछ नहीं जानता, लेकिन लोगों ने बताया कि भई, दक्षिण भारत की रामायण में ऐसा जिक्र आता है। चलिए मान लिया कि श्रीराम ने दक्षिण की रामायण में लक्ष्मण को रावण के पास भेजा। दक्षिण का ही मामला था, तो दक्षिण वालों ने ठीक ही लिखा होगा। लेकिन फिर सवाल यह उठता है कि रावण ने ज्ञान क्या दिया? तो जब उस ज्ञान की बात करते हैं तो मुझे बताया गया कि रावण ने नीति शास्त्र की तीन मुख्य बातें लक्ष्मण को बताईं:


1. शुभ कार्य करने में कभी देरी नहीं करनी चाहिए।

2. कभी भी अपने प्रतिद्वंद्वी या शत्रु को खुद से छोटा या कमतर नहीं समझना चाहिए।

3.अपने रहस्य कभी किसी को नहीं बताने चाहिए।

 

इसके अलावा भी कुछ 'ज्ञान' की बातें रावण द्वारा लक्ष्मण को बताए जाने का जिक्र किया जाता है। लेकिन अब मुझे कोई बताए कि इनमें से एक भी बात क्या रावण ने अपनी जीवनशैली में शामिल की? ये सारी बातें तो श्रीराम ने रावण को अनुभव कराईं। मतलब जो अनुभव श्रीराम ने रावण को दिए, उसे आज के तथाकथित ब्राह्मण बुद्धिजीवी रावण का 'ज्ञान' बताते हैं, बताइए इससे अधिक अवैज्ञानिक बात कोई होगी? 


हाल ही में 'रावण सेना' नामक संगठन के किसी उत्साही कार्यकर्ता ने मुझे फोन किया। लगभग धमकाने वाले अंदाज में उसने कहा, 'अभी हम फोन पर समझा रहे हैं, पत्रकारिता करिए, रावण ब्राह्मण था, उसके खिलाफ फर्जी बातें मत फैलाइए। वह राजा राम और राजा रावण का युद्ध था। उसमें छल से राम ने रावण की हत्या कर दी। रावण ने तो अपनी बहन के अपमान का बदला लेने लिया था।' एक और मैसेज किसी ने किया कि आज की बहनें चाहती हैं कि उनका भाई रावण जैसा हो। 


यह सब कुपढ़ों के दिमाग की उपज है। श्रीराम के चरित्र और रावण के चरित्र को लेकर एक कूटप्रबंध किया गया। जिसकी वजह से श्रीराम को लेकर हमारे मन में शंका आई और रावण के चरित्र को लेकर सकारात्मक विश्वास पनपता गया। बेहतर होता कि ये लोग वाल्मीकि कृत रामायण पढ़ते तो पता लगता कि रावण कैसा था। मेरा स्पष्ट मानना है कि श्रीराम और रावण का युद्ध सत्य और असत्य का युद्ध था, न्याय और अन्याय का युद्ध था, मानवता और दानवता का युद्ध था। वह धर्म युद्ध था और धर्म युद्ध में निरपेक्षता जैसा कोई सिद्धांत स्थान नहीं पा सकता। इस धर्म युद्ध में या तो आप श्रीराम के साथ हो सकते हैं, या रावण के साथ... मैंने श्रीराम को चुना, आप अपना देख लीजिए... 

Saturday, 24 September 2022

'तुम पैसा मांगने आए हो, FIR करा दूंगा', पत्रकारों को ऐसी धमकियां क्यों मिल रही हैं?

 किसी कॉलेज में पत्रकारिता के विद्यार्थियों की क्लास लेने जाओ या इंटर्नशिप कर रहे युवाओं संग संवाद करने, एक सवाल अक्सर उठता है कि 'आज 'दिखने' वाले पत्रकार अधिकांशतः सोशल मीडिया पर किसी एक 'दल' के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। लेकिन जो ऐसा नहीं करते, उनमें आप भी हैं। इस तरह का काम करने के दौरान किस तरह से आपको रोका जाता है?'


इस सवाल का एक लाइन में जवाब होता है कि सच कहने से आपको कोई कभी नहीं रोक सकता। अवरोधक निश्चित रूप से मिलते हैं, लेकिन उन्हें पार करना ही फील्ड की पत्रकारिता की चुनौती है। यहां समझने वाली बात यह है कि फील्ड की पत्रकारिता का मतलब यह नहीं है कि आप माइक/डायरी-पेन लेकर घूमते हों, ऑफिस में बैठकर भी ग्राउंड से खबरें निकालने वाले पत्रकार भी ऐसी परेशानियों को झेलते हैं। आज इस पोस्ट में मैं एक ताजा मामला आपको बताता हूं। लेकिन उससे पहले एक वादा भी करता हूं। 12 फरवरी 2012 को पहली बार एक मीडिया संस्थान से जुड़ा था, 12 फरवरी 2023 को मेरे पत्रकारिता जीवन के 11 साल पूरे हो रहे हैं। इस दौरान एक छोटे से थाने के लेवल की रिपोर्टिंग से लेकर स्टेट लेवल की टीम संभाली। अपने 11 साल के अनुभवों के आधार पर अगले साल फरवरी तक एक किताब लिखूंगा। 

ऊपर से बहुत बड़े दिल के लगने वाले लोग अंदर से कितने छोटे होते हैं, ऑफिस में वैचारिक/सामाजिक द्वंद कैसा होता है, कैसे लोग सही का साथ देने के लिए खड़े हो जाते हैं, कैसे लोग गलत के खिलाफ बोलने/लिखने को मजबूर करते हैं, कैसे लोग आपके नौकरी के नाम पर शारीरिक शोषण का प्रयास करते हैं, ऐसे कई विषयों पर अपनी आंखों देखी के साथ अपने अनुभव साझा करूंगा। इन सबके साथ सबसे महत्वपूर्ण चीज कि पत्रकारिता पर दबाव किस तरह का रहता है, उसपर भी बात करूंगा। 

खैर, अभी आप पढ़िए एक ताजा किस्सा:

बीते 22 सितंबर को सुप्रिया श्रीवास्तव नाम की एक लड़की ने ICU में एडमिट अपने पिता का वीडियो ट्वीट किया। ट्वीट में सुप्रिया ने पिता के इलाज के लिए आर्थिक मदद की गुजारिश की थी। सुप्रिया ने अभिनेता सोनू सूद, आन्त्रप्रेन्योर निखिल श्रीवास्तव और पत्रकार हेमेन्द्र त्रिपाठी को मेंशन किया था। 2-4 दिन में ट्वीट वायरल हो गया। जाने-माने फिल्मकार मनीष मुंदड़ा, 'एमबीए चाय वाला' के फाउंडर प्रफुल्ल समेत कई लोगों ने ट्वीट में मदद का भरोसा दिलाया। चूंकि मामला वेरिफाइड नहीं था तो मामले को वेरिफाई करने की जिम्मेदारी स्थानीय पत्रकार हेमेन्द्र त्रिपाठी को दी गई। इस दौरान किसी ने मुझे भी ट्वीट में मेंशन किया तो मैंने हेमेन्द्र से बात की और कहा कि एक बार मामला पूरा पता कर ले।

शुक्रवार को हेमेन्द्र गोमती नगर में मंत्री आवास के सामने स्थित सन हॉस्पिटल गया और पीड़ित परिवार से बात की। वहां परिवार ने बताया कि किस तरह से एक महीने से हॉस्पिटल इलाज के नाम पर लगातार बजट बढ़ाता जा रहा है और पैसे की डिमांड कर रहा है। हेमेन्द्र ने वहां मौजूद हॉस्पिटल के मालिक अखिलेश पांडे से मामले के बारे में पूछा तो उन्होंने मामले में जानकारी देने से आनाकानी की। हॉस्पिटल के मालिक ने मामले को रफा दफा करने को भी कहा। जिसके बाद कई लोगों से सलाह लेने के बाद यह तय किया गया कि हॉस्पिटल के अकाउंट में पैसा ट्रांसफर नहीं कराया जाएगा और मरीज को कहीं और शिफ्ट करा लिया जाएगा। 

शनिवार सुबह मैंने हेमेन्द्र से जानकारी ली तो पता लगा कि यह वही हॉस्पिटल है, जिसपर पहले भी कई बड़े आरोप लग चुके हैं। कोविड के दौरान जब मैं लखनऊ में था, तब इस हॉस्पिटल के कई कारनामे सामने आए थे। इसलिए मैंने भी सुझाव दिया कि मरीज को वहां से हटा लिया जाए, साथ ही मैंने हॉस्पिटल के मालिक से बात कराने को कहा। हेमेन्द्र हॉस्पिटल गया तो स्टाफ ने कहा कि मालिक मौजूद नहीं है। इसके बाद मैंने हॉस्पिटल मालिक को मैंने खुद फोन कर बात की। 

मैंने हॉस्पिटल मालिक से कहा कि मैं पेशेंट को जल्द किसी दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करा रहा हूं, तब तक उनके परिवार को परेशान ना किया जाए। फिर मैंने उन बातों का जिक्र किया, जो परिवार की ओर से बताई गई थीं। जैसे ब्लड/दवाइयां/इंजेक्शन जैसी चीजें जो मरीज का परिवार बाहर से आधे दाम पर लाता था, उसके बदले परिवार से हॉस्पिटल करीब दोगुने दाम वसूलता था। इन चीजों पर सवाल पूछा तो मालिक भड़क गया। गाली गलौच करने लगा और बोला कि तुमने मुझसे रंगदारी मांगने के लिए फोन किया है, इसकी एफआईआर कराऊंगा।

अब उसे तो पता नहीं था कि मैं हर कॉल रिकॉर्ड करता हूं। ऐसा पहले भी मेरे साथ कई बार हो चुका है। एक बार एक सरकारी राशन की दुकान पर हो रही घपलेबाजी पर सवाल पूछा तो वहां की कोटेदान ऑन कैमरा कहने लगीं कि तुम मुझसे पैसे मांगने आए थे, नहीं दिए तो झूठे आरोप लगाने लगे। मैंने वहीं पर ऑन कैमरा सीक्रेट कैमरे से रिकॉर्ड हो रही कोटे में एंट्री से लेकर आखिर तक की वीडियो उनको दिखाई और कहा कि यह पैंतरे बाजी नहीं चलेगी। फिर उस वीडियो के साथ एडीएम सप्लाई को शिकायत की तो मैडम का कोटा निरस्त हुआ। और भी कई बार ऐसा हुआ है, लेकिन हर बार 'बैकअप' प्लान की वजह से मेरी इज्जत बची रही।

आज इस मामले में भी वही हुआ। अब साहब को रिकॉर्डिंग वाली बात पता नहीं थी तो झोंके में आ गए और बोल गए। लेकिन जरा सोचिए, थर्ड पार्टी ऐप्स भी बंद हो गए हैं, नए फोन में रिकॉर्डिंग की सुविधा तो है लेकिन कॉल की शुरुआत में ही 'Your call has been Recording' सुनाई देता है, आईफोन में कॉल रिकॉर्डिंग नहीं है, ऐसे में अगर मोबाइल के चुनाव में मैंने रिकॉर्डिंग को प्राथमिकता ना देकर मॉडल/कैमरा/लुक/रैम वगैरह को महत्व दिया होता तो? 

तो क्या? अब तक मैं भी 'दलाल पत्रकार' की श्रेणी में आ गया होता। खैर, मामले की जानकारी डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक को दे दी गई है। हो सकता है कि वह मामले की गंभीरता समझें और कार्रवाई करें, या यह भी हो सकता है कि मामले को वह यूं ही जानें दें।

वैसे कार्रवाई की उम्मीद सरकार से क्या ही करें। क्योंकि यह अस्पताल और इसका मालिक कोई मामूली आदमी नहीं है। इसके दो-चार कारनामे देखिए:


1. कोविड का दौर याद है आपको? मई 2021 में जब जिंदगी के लिए जंग लड़ी जा रही थी, तब सन हॉस्पिटल के निदेशक अखिलेश पांडे ने हॉस्पिटल के कर्मचारियों के साथ मिलकर अस्पताल में ऑक्सीजन न होने की अफवाह फैलाकर मरीजों को भर्ती नहीं किया था। जो भर्ती थे, उनसे बाहर से ऑक्सिजन लाने का दबाव डाला गया था, जो नहीं ला पाए उनसे मनमाने तरीके से उगाही की गई। यहां तक की कई मरीजों का अडवांस जमा पैसा भी वापस नहीं किया। 

मामले में तत्कालीन डीएम अभिषेक प्रकाश के आदेश पर आपदा प्रबंधन की धारा 51, 52, महामारी अधिनियम 3, धारा 144 का उल्लंघन और अफवाह फैलाने का मुकदमा दर्ज किया गया था, लेकिन कार्रवाई क्या हुई?

2. कोविड के दौर में ही नितिन मिश्रा नामक एक पत्रकार ने सन हॉस्पिटल के मालिक पर आठ घंटे तक बंधक बनाए रखने, मारपीट करने और सोने की चेन-कैश छीन लेने का आरोप लगाया था। मामले में एफआईआर भी दर्ज हुई थी। उस पत्रकार का कहना था कि सन अस्पताल के मालिक अखिलेश पांडे से जब कुछ सवाल पूछे तो उसने कहा कि वह उसपर जबरन विज्ञापन मांगने की एफआईआर करा देगा। इसके बाद जब नितिन ने विरोध किया तो उसको बंधक बनाकर मारपीट की गई। इसके बाद नितिन ने मारपीट, लूट, धमकी समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था। गिरफ्तारी भी हुई थी, लेकिन फिर क्या हुआ, किसी को नहीं पता!

3. सुल्तानपुर से इलाज कराने आई एक मरीज आरती मिश्रा के परिजन उसे लोहिया अस्पताल लेकर गए थे जहां बेड खाली न होने के चलते वहीं से निजी अस्पताल की लगी वैन उन्हें गुमराह करके सन हॉस्पिटल ले गई। हालत बिगड़ती देख परिजनों ने 20 फरवरी को सन अस्पताल में भर्ती कराया। हॉस्पिटल में उससे कहा गया कि लगभग 30-35 हजार का खर्च आएगा, लेकिन वहां उनसे तीन दिनों के अंदर करीब तीन लाख पचास हजार रुपये इलाज के नाम पर वसूले गए। परिजनों ने मरीज को आराम नहीं मिलता देख वहां से डिस्चार्ज करने की बात कही और अपने मरीज की रिपोर्ट फाइल मांगी तो अस्पताल कर्मियों ने उन्हें रिपोर्ट नहीं दी और उनके साथ मारपीट कर डाली। लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं हुई!

4. मामले की शिकायत हुई तो स्वास्थ्य विभाग ने हॉस्पिटल पर छापा मारा और बिल रेकॉर्ड मांगा। उसमें अनियमितता मिली। दूसरी ओर लोहिया अस्पताल से दलालों का एक गुट पकड़ा गया। यह गैंग गंभीर मरीजों के परिवारीजनों को बरगलाकर प्राइवेट अस्पताल में जल्द और आसानी से इलाज दिलवाने का हवाला देता था। अपनी बातों में फंसाकर एंबुलेंस से मरीज को प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती करवा देते थे। यही नहीं, भर्ती करवाने के बाद इलाज के नाम पर पूरी रकम भी जमा करवा लेते थे। उसमें से एक दलाल सन हॉस्पिटल के मालिक अखिलेश पांडेय का करीबी था। मामले में इसकी शिकायत सीएमओ से की गई। पुलिस ने अस्पताल संचालक पर दर्ज मुकदमों का रिकॉर्ड खंगाला। पूरे मामले की फाइल तैयार कर डीएम को भेजी।  पुलिस ने डीएम से अस्पताल के संचालन पर रोक लगाने की लेकिन सात महीने से अधिक का वक्त हो गया, कोई कार्रवाई नहीं हुई!

5. सन हॉस्पिटल का निदेशक अखिलेश पांडे कितना बड़ा लतखोर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि जब पुलिस ने इसके खिलाफ कार्रवाई शुरू की तो इसने एक वीडियो जारी कर विभूतिखंड थाने के इंस्पेक्टर पर महीने की 50,000 रुपये वसूली के आरोप लगा दिए। मजेदार बात यह है कि पुलिस अफसर कार्रवाई कर रहे थे, कार्रवाई की सिफारिश कर रहे थे और यह साहब वसूली के आरोप लगा रहे थे। बिलकुल वैसे ही, जैसे एक पत्रकार ने इनसे सही तरह से काम करने को कहा तो उसपर रंगदारी मांगने का आरोप लगा दिया।

सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश पांडे के खिलाफ 25 से अधिक मामले दर्ज हैं और मरीजों से वसूली की सैकड़ों शिकायतें आ चुकी हैं। अब गेंद योगी सरकार के खाते में है। लोगों की फिक्र है तो जिंदगी का सौदा करने वाले इन दलालों पर सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए। 

पत्रकारों के लिए सीख

आपके साथ भी ऐसा हो सकता है। बेहद जरूरी है कि अगर आप कहीं भी ऐसी स्टोरी के लिए जा रहे हैं तो एक बैकअप प्लान जरूर रखें। सोशल मीडिया के इस दौर में आपकी छवि कभी भी खराब हो सकती है। इसलिए कम से कम किसी जगह पर जाएं तो शुरुआत से लेकर आखिर तक सीक्रेट कैमरे से अडिशनल वीडियो जरूर बनाएं। फोन पर किसी से बात करें तो रिकॉर्डिंग जरूर रखें। याद रहे, सत्य की लड़ाई में परेशानियां आती हैं, लेकिन सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।

Tuesday, 19 July 2022

सावरकर पर सवाल उठाते हो? मतलब तुम गांधी को भी नहीं मानते हो

 27 फरवरी 2002, गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के कोच एस 6 पर एक हमला होता है और कोच में बैठे कारसेवकों को जिंदा जला दिया जाता है। इस हमले में 59 लोगों की दर्दनाक मौत हो जाती है। गोधरा पुलिस मामले में 103 लोगों को गिरफ्तार करती है। केस चलता है, कुछ को फांसी की सजा होती है और कुछ को उम्रकैद की। लेकिन इस फैसले का सबसे अहम किरदार वे 67 लोग होते हैं, जिन्हें मामले में बरी कर दिया जाता है।


अब मेरा सवाल यह है कि क्या उन 67 लोगों और उनके परिवार से देश को संबंध खत्म कर लेना चाहिए? इस सवाल का जवाब सोचिए।

अगर आप भारत की न्याय व्यवस्था में विश्वास रखते होंगे, विश्वास छोड़िए, अगर आप भारत की संवैधानिक व्यवस्था का सम्मान ही करते होंगे तो आप इस सवाल का जवाब 'नहीं' में ही देंगे। लेकिन जरा रुकिए!


30 जनवरी 1948, महात्मा गांधी की हत्या हो जाती है। ठीक छह दिन बाद विनायक दामोदर सावरकर को गांधी की हत्या के षणयंत्र में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है। केस चलता है। फरवरी 1949 में सावरकर को बरी कर दिया जाता है। लेकिन करीब 73 साल बीत जाने के बाद भी क्या हर बात में देश के संविधान की दुहाई देने वाले लोग उस फैसले का सम्मान करने की हिम्मत जुटा पाए हैं?

अगर आप अपने दिल पर हाथ रखकर इस सवाल का जवाब पूछेंगे तो उत्तर मिलेगा - 'नहीं'


लेकिन क्यों?


हमारे देश के तथाकथित प्रगतिवादी, न्यायवादी, मानवतावादी, समाजवादी, बहुजनवादी, वामपंथी... ये सारे वाद आखिर सावरकर के नाम पर संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ अप्रत्यक्ष रूप से क्यों खड़े हो जाते हैं? 


क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि सावरकर का विचार उनके राष्ट्रवाद विरोधी अजेंडे में फिट नहीं बैठता? या फिर वाकई सावरकर में खामियां थीं?


एक मिनट! इस सवाल को पूछने का अधिकार क्या मैं या कोई और रखता है? और अगर यह सवाल पूछा जाना चाहिए तो क्या यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि क्या मोहनदास करमचंद गांधी में कोई खामी नहीं थी? क्या जवाहरलाल नेहरू ने अपने जीवन में जो कुछ भी किया, वह सब ठीक था?


मुझे लगता है कि हमें इस तरह के विमर्श से बचना चाहिए। ध्यान दें, मैं यह नहीं कह रहा कि उनमें खामियां नहीं थीं, मैं बस यह कह रहा हूं कि हमें इस तरह के सवाल नहीं उठाने चाहिए। लाख कमियां हों गांधी में लेकिन अपने देश के लोगों की हालत देखकर अगर कोई आजीवन एक कपड़े में रहने का व्रत ले लेता है तो बस उसका संकल्प ही है जो पूरे राष्ट्र का मार्ग प्रदर्शित करता है, उसका अलावा सब नगण्य है। खुद एसी कमरों से बाहर निकलकर चार कदम पैदल चलने तक की हिम्मत ना रखने वाले लड़के दो-दो आजीवन कारावास की सजा पाने के बाद भी मुस्कुराने वाले सावरकर पर सवाल उठाते हैं तो कष्ट होता है। गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की पत्रिका 'अंतिम जन' के ताजा अंक में सावरकर के योगदान को गांधी के बराबर बताया गया है। अब कुछ लोग उसपर सवाल उठा रहे हैं, क्यों भाई?


चलो, आप गांधी को मानते हो। गांधी किसको मानते थे? मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को। आइए, इस पूरे विवाद का हल श्रीराम से जुड़ी एक कथा से समझते हैं:


माता सीता का हरण होने के बाद, भगवान राम को लंका तक पहुंचने के लिए उनकी वानर सेना जंगल को लंका से जोड़ने के लिए समुद्र के ऊपर पुल बनाने के काम में लग जाती है। भगवान राम पुल बनाने में उस गिलहरी के योगदान की तारीफ करते हुए उसे अपने हाथों में उठा लेते हैं और कहते हैं कि पुल बनाने में पूरी सेना के साथ बराबर का योगदान गिलहरी का भी है। 


क्या आपने कहीं ऐसा पढ़ा कि कभी ऐसा कहा गया हो कि गिलहरी का योगदान कम था? या नल-नील का योगदान अधिक था?


नहीं। ऐसा कभी और कहीं नहीं सुना-पढ़ा होगा।


किसी पुण्य काम में बस उद्देश्य देखा जाता है। यह नहीं देखा जाता कि किसने कम मेहनत की, किसने किस रास्ते से मेहनत की। यही बात बस गांधी और सावरकर के विवाद में समझनी है। गांधी हों या सावरकर, बिस्मिल हों या अशफाक उल्ला खां, दुर्गा भाभी हों या लक्ष्मीबाई, किसी के योगदान को कम नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह बात बस उन्हें समझाई जा सकती है, जो समझना चाहते हों। कोई महापुरुष अथवा क्रांतिकारी किसी ‘दल’ विशेष का नहीं होता और महापुरुष वही होता है जो सामान्य व्यक्ति से बेहतर तरीके से समाज के प्रति स्वयं को समर्पित करे। हो सकता है उस ‘महापुरुष’ की विचारधारा हमसे 100 प्रतिशत ना मिलती हो, लेकिन क्या ऐसे में आप उससे 100 प्रतिशत असहमत हो सकते हैं?


आपका तर्क कुछ भी हो लेकिन इसका जवाब ‘नहीं’ में ही मिलेगा। समाज के विषय में सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में एक विशिष्ट विचार है। यदि आप किसी विचार से 100 प्रतिशत असहमत हैं तो इसका साफ तौर पर मतलब है कि आप उसका विरोध अज्ञानतावश अथवा द्वेषवश कर रहे हैं, और यदि आप किसी से 100 प्रतिशत सहमत होने का दावा कर रहे हैं तो इसका भी अर्थ यही है कि या तो आप अज्ञानी हैं अथवा अंधभक्त हैं। 


अब बात सावरकर की हो रही है, तो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि सावरकर ही नहीं, देश की स्वतंत्रता के लिए सबकुछ न्योछावर करने वाले हजारों-लाखों क्रांतिकारियों के साथ हमारी सरकारों ने बहुत नाइंसाफी की है लेकिन आज बात करते हैं सावरकर की। और बात सावरकर की कर रहे हैं तो शुरुआत करते हैं उस शख्स से, जिसने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ भारत की सेना खड़ी कर दी थी। 


वैसे तो अभी तक भारत के वीर सपूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मौत पर रहस्यात्मक प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है लेकिन एक प्रचलित ‘तथ्य’ यह भी है कि आज से ठीक 71 साल पहले 18 अगस्त 1945 को तोक्यो जाते हुए उनका हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और इस हादसे में नेताजी की मौत हो गई थी। नेताजी की मौत से जुड़ा सच क्या है, यह एक अलग विषय है लेकिन देश के प्रति पूर्ण मनोयोग के समर्पित होकर ब्रिटिश सेना के सामने एक भारतीय सेना खड़ी करने वाले सुभाष बाबू के जीवन के जुड़े कुछ ऐसे अध्याय हैं जिनके बारे में शायद आपको जानकारी न हो। विश्व इतिहास में आजाद हिंद फौज जैसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता जहां 1,50,000 युद्ध बंदियों को संगठित, प्रशिक्षित कर अंग्रेजों के सामने खड़ा किया गया हो।


सन् 1938 में सुभाष चन्द्र बोस, कांग्रेस के अध्यक्ष बने लेकिन अपने कार्यकाल के दौरान गांधी जी तथा उनके सहयोगियों के व्यवहार से दुखी होकर सुभाष चन्द्र बोस ने 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद 3 मई 1939 को उन्होंने कोलकाता में फॉरवर्ड ब्लॉक अर्थात अग्रगामी दल की स्थापना की तथा भारत की स्वतंत्रता और अखंडता के लिए वह तत्कालीन नेताओं एवं क्रांतिकारियों से संपर्क करने लगे।


आपको जानकर हैरानी होगी कि सुभाष बाबू को अंग्रेजों के सामने एक भारतीय सेना खड़ी करने की प्रेरणा विनायक दामोदर सावरकर से मिली थी। 26 जून 1940 को सुभाष चन्द्र बोस, सावरकर के घर गए। वह सावरकर से मिलने मोहम्मद अली जिन्ना के कहने पर गए थे क्योंकि जिन्ना, सावरकर को हिंदुओं का नेता मानता था और खुद को मुस्लिमों का नेता कहता था। मुस्लिम लीग द्वारा मुसलमानों के लिए जब अलग देश की मांग की गई तो सुभाष बाबू जिन्ना के पास गए। सुभाष बाबू चाहते थे कि मुस्लिम लीग देश के विभाजन की मांग न करे।


जिन्ना के पास पहुंचने पर जिन्ना ने सुभाष बाबू से पूछा कि वह किसकी तरफ से उससे बात करने आए हैं? इस पर सुभाष बाबू ने कहा कि वह फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता के तौर पर बात करना चाहते हैं। सुभाष बाबू की इस बात पर जिन्ना ने कहा, ‘मैं मुसलमानों का नेता हूं और मुझसे कोई हिंदू नेता ही बात कर सकता है।’ जिन्ना की नजर में विनायक दामोदर सावरकर हिन्दुओं के नेता थे। जब सुभाष बाबू, विनायक दामोदर सावरकर से मिलने पहुंचे तो सावरकर ने सुभाष बाबू को महान क्रांतिकारी रायबिहारी बोस के साथ हुए पत्रव्यवहार के बारे में बताया। सावरकर ने उनको बताया कि रायबिहारी बोस, युद्धबंदी भारतीयों को एकत्रित करके एक सेना बनाने का प्लान बना रहे हैं। इसके बाद नेता जी जर्मनी गए। जर्मनी में उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की।


जर्मनी में सुभाष बाबू ने हिटलर से मुलाकात की। नेताजी भारत को आजाद करवाने के लिए दुनिया भर की मदद चाहते थे। हिटलर ने एक सीमा तक नेताजी की मदद भी की। वह सुभाष बाबू से बहुत प्रभावित हुआ। महान देशभक्त रासबिहारी बोस के मार्गदर्शन में नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर के वैफथे नामक हॉल में आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) का गठन किया। इस सरकार को जापान, इटली, जर्मनी, रूस, बर्मा, थाईलैंड, फिलीपींस, मलयेशिया सहित नौ देशों ने मान्यता प्रदान की। आजाद हिंद सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री के पद की शपथ लेते हुए सुभाष ने कहा, ‘मैं अपनी अंतिम सांस तक स्वतंत्रता यज्ञ को प्रज्वलित करता रहूंगा।’ लेकिन बात सिर्फ नेताजी तक ही सीमित नहीं है। 


एक राजनीतिक दल यह आरोप लगाता है कि पोर्ट ब्लेयर (अंडमान द्वीप) जेल से अपनी ‘काले पानी’ की सजा से रिहाई के लिए अंग्रेजों से क्षमा याचना की थी। हो सकता है ऐसा हो, लेकिन क्या ऐसा करने का उद्देश्य यह नहीं हो सकता कि सावरकर ने भी वही सोचा हो जो एक समय श्रीकृष्ण ने सोचा था, जिसकी वजह से वह रणछोड़ कहलाए। परिस्थिति का विवेचन एक सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ करें तो पाएंगे कि अपने-अपने समय में इन व्यक्तित्वों ने जो निर्णय लिए वे एकमात्र विकल्प थे। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं इसका एक कारण है, यदि हम स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान की सोच को उस दौर के क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ कर समझने का प्रयास करेंगे तो सामने आएगा कि उस दौर के अधिकतर क्रांतिकारी जान देने के पक्ष में नहीं थे। इसका कारण यह नहीं था कि वह जान देने से डरते थे, बल्कि इसका कारण यह था कि उनको पता था कि देश की स्वतंत्रता के लिए जीवित रहकर संघर्ष करना अतिआवश्यक है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के बीच का अंसेबली में बम फेंकने से पहले का संवाद है।


शहीद भगत सिंह से जुड़े साहित्य को पढ़ने पर पता लगता है कि जब भगत सिंह ने सांडर्स को मारकर लालाजी की मौत का बदला लेने के बाद असेंबली में बम फेंकने का निर्णय लिया तब चंद्रशेखर आजाद ने पूरी योजना तैयार की कि किसी तरह और किन रास्तों से बम विस्फोट करने के बाद निकालकर भागा जा सकता है। उन्होंने यह योजना भगत सिंह को बताई लेकिन भगत सिंह ने इस पर अमल करने से साफ तौर से मना कर दिया। भगत सिंह गिरफ्तार होना चाहते थे। इस मुद्दे पर आजाद से भगत सिंह की गर्मागर्म बहस भी हुई। भगत सिंह का कहना था, ‘हम असेंबली में बम किसी की जान लेने के लिए नहीं फेंकने वाले हैं। हमारा उद्देश्य है, लोगों को जगाना और उस उद्देश्य को मैं गिरफ्तार होकर ज्यादा बेहतर तरीके से पूरा कर सकता हूं। केस चलेगा, जिरह होगी और उस जिरह हमें अपनी बात देशवासियों तक पहुंचाने का मौका मिलेगा।’


इस पर आज़ाद का कहना था कि केस का मतलब होगा मौत की सजा। इसके बाद भगत सिंह ने आजाद से कहा, ‘मैं जान देने के लिए ही गिरफ्तार होना चाहता हूं, मैं जीवित रहकर आजादी के आंदोलन में उतना योगदान नहीं दे पाऊंगा जितना मरकर दे सकता हूं।’ भगत सिंह बोले, ‘मेरी मौत कई भगत सिंह पैदा कर देगी।’ दोनों महान क्रांतिकारियों के बीच लंबी बहस हुई लेकिन भगतसिंह अपनी जिद के पक्के थे। आखिरकार आजाद को उनके आगे हार माननी पड़ी। फिर वही हुआ जो भगतसिंह चाहते थे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़े व्यक्ति द्वारा जीवन को व्यर्थ नष्ट कर देने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। भगत सिंह तथा उनके साथी क्रांतिकारियों का उद्देश्य साफ था कि उनकी मौत एक नए आंदोलन को खड़ा करेगी लेकिन सभी क्रांतिकारी सिर्फ अपनी जान कुर्बान कर देते तो शायद आज हम स्वतंत्र देश में सांस नहीं ले रहे होते।  कुछ ऐसे ही विचार विनायक दामोदर सावरकर के भी बन गए थे। और यह विचार क्यों बने होंगे, इस बात का अंदाजा आप तब तक नहीं लगा सकते जब तक उस दौर की स्थितियों के विषय में अध्ययन न कर लें।


10 मई, 1907 को सावरकर ने इंडिया हाउस, लन्दन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाई। इस अवसर पर विनायक सावरकर ने अपने ओजस्वी भाषण में प्रमाणों सहित 1857 के संग्राम को गदर नहीं, अपितु भारत के स्वातन्त्र्य का प्रथम संग्राम सिद्ध किया। सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का ‘स्वाधीनता संग्राम’ बताते हुए लगभग एक हजार पृष्ठों का इतिहास लिखा। जून 1908 में तैयार हो चुकी पुस्तक ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857’ में सावरकर ने इस लड़ाई को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आजादी की पहली लड़ाई घोषित किया था। इस पुस्तक से भारत में भगत सिंह सहित कई लोगों ने प्रेरणा ली।


हो सकता है कि अब कोई यह तर्क दे कि भगत सिंह तो सावरकर के हिंदुत्व के विरोधी थे। बिलकुल थे, क्योंकि उन्होंने सावरकर के हिंदुत्व को समझा नहीं था। जब सावरकर की पुस्तक भारत में कोहराम मचा रही थी तब भगत सिंह अपने शैशव काल में थे और सावरकर उस दौर में अंग्रेजों के गढ़ में रहकर मां भारती के चरणों की जंजीरों को तोड़ने के लिए प्रयास कर रहे थे। इसे आयु आधारित अनुभव कहें तो गलत न होगा। आगे जिस रूप में भगत सिंह ने सावरकर के हिंदुत्व को समझा, अगर मैं भी वैसा ही मान लूं तो मैं भी विरोध करूंगा लेकिन वास्तविकता यह है कि सावरकर के हिंदुत्व की व्यापकता उतनी सीमित नहीं जितना प्रचारित की गई। यह बिलकुल वैसा ही था जैसे एक 13-14 साल का छोटा सा बच्चा गांधी- गांधी करते हुए एक बुजुर्ग नेता के पीछे घूमता रहता है और फिर जब वह नेता अहिंसा के नाम पर अपने आंदोलन को वापस लेने की घोषणा करता है तो बच्चा उस नेता के रास्ते को नकार कर उसके विपरीत सिद्धांत आधारित रास्ते का चुनाव कर लेता है। इस विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि महात्मा गांधी ने अपने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को वापस लेकर कुछ गलत किया था। इसी आधार पर सावरकर को भी सिर्फ एक व्यक्ति के दृष्टिकोण के चलते गलत नहीं माना जा सकता।


आइए, सावरकर से जुड़े कुछ विषयों का विश्लेषण करते हैं:

क्या बंगाल विभाजन के दौरान 1905 में पुणे में अभिनव भारत संगठन द्वारा विदेशी कपड़ों की होली जलाना कोई सामान्य कदम था, उस समय जब हम गुलाम थे और सोशल मीडिया जैसी कोई चीज नहीं होती थी।


क्या यह झूठ है कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सावरकर की योग्यता, क्षमता और प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें छात्रवृत्ति दी थी।


क्या यह भी झूठ है कि भगत सिंह, राजाराम शास्त्री से कहा करते थे मुझे सावरकर जी के जीवन प्रसंगों, जैसे लंदन में रहते हुए मदनलाल ढींगरा को क्रांति की ओर प्रेरित करना, गिरफ्तारी के दौरान भारत लाए जाते समय जहाज से समुद्र में कूद पड़ऩा आदि ने बहुत प्रभावित किया है। (काशी विद्यापीठ के युवा राजाराम शास्त्री को लाला लाजपतराय जी ने द्वारका दास पुस्तकालय का प्रबंधक मनोनीत किया था। भगत सिंह से राजाराम के मैत्रीपूर्ण संबंध बन गये थे। राजाराम शास्त्री ने कई जगह अपने और भगत सिंह के संवाद का जिक्र किया है।)


क्या यह भी झूठ है कि सावरकर की प्रेरणा से ही जर्मनी में संपन्न होने वाली इंटरनैशनल सोशलिस्ट कांग्रेस में सरदार सिंह राणा और श्रीमती भीखाजी ने भारत का प्रतिनिधि बनकर वन्दे मातरम् लिखित ध्वज को फहराया।


क्या यह भी झूठ है कि वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दो आजीवन कारावास की सजा पाने वाले एकमात्र क्रांतिकारी हैं।


क्या यह भी झूठ है कि सावरकर ने अंडमान जेल में रहते हुए, अंग्रेजों के कानूनों के जाल में उनको ही फंसाकर कैदियों को सामान्य सुविधाएं उपलब्ध कराई थीं।


क्या यह भी झूठ है कि ‘सवर्ण’ होते हुए भी दलितों को सम्मान दिलाने के लिए उन्होंने रत्नागिरी में प्रथम प्रयास किया।


क्या यह भी झूठ है कि अस्पृश्यता निवारण के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करते हुए सावरकर ने अपने ब्राह्मणत्व कर्म का प्रतिपालन किया।


क्या यह भी झूठ है कि ‘भाषा शुद्धि’ यानी हिंदी तथा देवनागरी के संरक्षण हेतु उन्होंने प्रयास किए।


ऐसे बहुत सारे विषय हैं जो अटल जी द्वारा की गई सावरकर की व्याख्या को प्रमाणित करते हैं। स्वातंत्र्य वीर विनायक सावरकर के सिद्धांतों की वर्तमान समाज में एक विशिष्ट प्रासंगिकता इसलिए भी है क्योंकि आज भी कानूनों के आधार पर देश के प्रधान की तस्वीर के साथ छेड़छाड़ करने वाले को जेल हो जाती है और भारत की बर्बादी के नारे लगाने वाले जेल के सीकचों से बाहर ही रहते हैं। उन सिद्धांतों की प्रासंगिकता इसलिए भी है क्योंकि हमारे गांवों में आज भी ‘बिछड़े जनों’ को स्वयं से अलग ही समझा जाता है।


मेरा मानना है कि रानी लक्ष्मीबाई हों या रानी चेन्नमा, चन्द्रशेखर आजाद हों या भगत सिंह, अशफाक उल्ला खां हों या बहादुर शाह जफर, जवाहर लाल नेहरू हों या महात्मा गांधी, सभी ने अपने स्तर पर कुछ ना कुछ तो अच्छा किया है। जो अच्छा है, जो सकारात्मक है, जो अनुकरणीय है, उसे आत्मसात करने अथवा उसकी प्रशंसा करने में क्या बुराई है? हिंदुत्व शब्द से परेशानी है तो स्पष्ट समझ लें कि ‘श्रीराम को पूजना हिंदुत्व नहीं बल्कि श्रीराम को आत्मसात करना हिंदुत्व है।’

Saturday, 9 July 2022

उदयपुर में इस्लाम के नाम पर एक हिंदू की हत्या के लिए जिम्मेदार कौन? हिम्मत है तो जवाब सोचिए


 राजस्थान का उदयपुर जिला

'एक हिंदू दर्जी को दो मुसलमान बेरहमी से मार देते हैं।' 


यहां बात हिंदू-मुसलमान की इसलिए हो रही है क्योंकि हत्या के पीछे वजह वही थी। लेकिन दोषी किसे मानना चाहिए? 

इस्लाम को? राजस्थान की कांग्रेस सरकार को? नुपुर शर्मा को? भारत के कानून को? सोशल मीडिया को? या खुद को?


दोषी किसे ठहराना चाहिए, उसपर बाद में आते हैं। पहले यह देखिए कि दोषी ठहराया किसे पर जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणियों की मानें तो दोषी ठहराने की कोशिश हो रही है नुपुर शर्मा को। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता, वजह समझने के लिए यहां क्लिक कर पढ़ें: नुपुर शर्मा ने क्या गलत किया? हिंदू-मुस्लिम-राष्ट्रवादी-वामपंथी.... सभी के लिए कुछ सवाल


एक छोटी सी कहानी से समझिए

नुपुर के साथ उदयपुर में जो हुआ, उसके लिए पाकिस्तानी आतंकी संगठनों को दोषी ठहराया जा रहा है। एक छोटा सा लिंक मिला और मिल गई क्लीन चिट हर उस दोषी को, जिसकी लापरवाह कार्यशैली ने इंसानियत की सरेआम हत्या कर दी। अगर किसी को मेरी बात आज बुरी लगे तो माफ करिएगा, लेकिन मेरी कलम का आक्रोश आपकी नाराजगी से रुकने वाला नहीं है। आगे की बात करने से पहले मैं एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं।


अमेरिका में वेदांत का प्रचार करके भारत लौटते हुए स्वामी रामतीर्थ जापान गए। वहां उनका भव्य स्वागत हुआ। उन्हें वहां एक विद्यालय में आमंत्रित किया गया। विद्यालय में एक विद्यार्थी से स्वामी जी ने सप्रेम पूछा, ‘बच्चे, तुम किस धर्म को मानते हो? छात्र ने उत्तर दिया, ‘बौद्ध धर्म को।’ स्वामी जी ने फिर पूछा, ‘बुद्ध के विषय में तुम्हारे क्या विचार हैं?’ विद्यार्थी ने उत्तर दिया, ‘बुद्ध भगवान हैं।’ इतना कह कर उसने ध्यान करके अपने देश की प्रथा के अनुसार भगवान बुद्ध को सम्मान के साथ प्रणाम किया। स्वामी जी ने उस विद्यार्थी से फिर पूछा, ‘अच्छा बताओ, कन्फ्यूशियस के बारे में तुम क्या जानते हो?’ विद्यार्थी ने बड़ी बुद्धिमानी से स्वामी जी के प्रश्न का उत्तर दिया, ‘कन्फ्यूशियस एक महान संत हैं।’ और उसने पूर्ववत बुद्ध की तरह कन्फ्यूशियस का ध्यान करके उन्हें भी सादर प्रणाम किया।


अंत में स्वामी जी ने सवाल किया, ‘बेटा, सुनो। अगर किसी दूसरे देश से जापान को जीतने के लिए एक भारी सेना आए और उसके सेनापति बुद्ध या कन्फ्यूशियस हों तो उस समय तुम क्या करोगे?’ स्वामी रामतीर्थ का इतना कहना था कि छात्र का चेहरा तमतमा उठा। स्वामी जी की बात सुनकर वह सहसा खड़ा हो गया और क्रोध से भर उठा। अपनी लाल-लाल आंखों से घूरते हुए जोश के साथ उसने कहा, ‘तब मैं अपनी तलवार से बुद्ध का सिर काट दूंगा और कन्फ्यूशियस को पैरों से रौंद डालूंगा।’


यह एक बच्चे के विचार थे। अपने 'भगवान' से पहले देश की रक्षा का विचार उसे किसने दिया? यह विचार उसे उसके समाज/घर के संस्कारों से मिला। आज आतंकी संगठनों पर सवाल उठ रहे हैं। जिस देश की संस्कृति किसी निरीह जीव पर गलती से पैर पड़ जाने पर भी आत्मा को झकझोर देने वाली है, वहां एक इंसान का गला बेरहमी से काट डाला गया। अब निकाला जा रहा है उन हत्यारों का आतंकी कनेक्शन। 


एक उदाहरण से आत्मावलोकन कीजिए

इसमे कोई दो राय नहीं कि पूरी दुनिया में इस तरह की आतंकी विचारधारा फैलाने वाले संगठन कई हैं। उनका दोष कम नहीं हो जाता। लेकिन मैं बस एक सवाल पूछना चाहता हूं। हमारे घर में एक मासूम बच्चा है। हमारे घर के पड़ोस में एक गंदा आदमी रहता है, वह उसी जाति का है, जिस जाति के आप हैं। वह शख्स बहुत गंदी-गंदी गालियां देता है। हमारा बच्चा रोज उसके पास जाकर बैठता है। हमें पता है कि वह वहां क्या सीखता होगा, लेकिन फिर भी हम उसके पास अपने बच्चे को जाने से नहीं रोकते। अरे, रोकना तो छोड़िए, हम तो उसे रोज भेजते हैं। हम कहते हैं कि जाओ उसके पास बैठो। फिर कुछ दिन बीतते हैं और हमारा बच्चा घर में आने वाले हर शख्स को गालियां देने लगता है। बच्चा बड़ा हो जाता है। उसकी आदत नहीं बदलती। अब गलती किसकी देंगे। क्या यहां पर यह उचित होगा कि आज आपका बच्चा जो कर रहा है, उसके लिए आप बस पड़ोसी को जिम्मेदार ठहराकर अपनी जिम्मेदारी से पलड़ा झाड़ लें?


नहीं! बिल्कुल नहीं! कतई नहीं!

गलती आपकी थी कि आपने अपने बच्चे को नहीं रोका। गलती उस बच्चे की थी, जिसने बड़ा होने के बाद भी समाज के बीच रहकर अच्छा और बुरा समझने की कोशिश नहीं की। इसके अलावा गलती किसी की नहीं है।


यही हाल आज मुसलमानों का है। जिहाद जैसे पवित्र शब्द की निर्मम हत्या करके उसके नाम पर आतंक सीखने जब आपके समुदाय का बच्चा किसी के पास जा रहा था, और आपने उसे नहीं रोका, तो इसमें गलती आपके समुदाय की है। हर उस शख्स की है, जो खुद को उस समुदाय का रहनुमा बताता है। गलती उस शख्स की है, जिसने भारत में रहकर, भारत को समझने की कोशिश नहीं की। पहली अपनी गलतियों पर खुद को सजा दीजिए, फिर दोषी ठहराइए उन आतंकी संगठनों को, जिनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़कर आपके समुदाय के लड़के आतंक सीख रहे हैं। 

Sunday, 3 July 2022

बेटी लक्ष्मी स्वरूपा ही क्यों होती है... सरस्वती या सीता जैसी क्यों नहीं?

 
बीते कुछ वक्त से हर शुक्रवार की शाम को मां पीतांबरा के दर्शन के लिए दतिया से निकल जाता था। नौकरी से छुट्टी लेना संभव नहीं था तो शुक्रवार की शाम को शिफ्ट खत्म होने के बाद करीब 8 घंटे का सफर करता था। शनिवार को सुबह करीब 1-2 बजे दतिया पहुंचने के बाद सुबह चार बजे माई के दर्शन करता था और फिर शनिवार और रविवार की नौकरी वहीं दतिया से ही होती थी। फिर रविवार को देर रात लखनऊ के लिए वापसी होती थी। बीते कुछ सप्ताह से लगातार यही क्रम चल रहा था। 


एक जुलाई 2022 को भी शुक्रवार का दिन था। पत्नी को अचानक से दोपहर में प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। वैसे तो बच्चे भगवान देता है और वे प्रतिरूप भी उसी के होते हैं लेकिन मेरी और मेरी पत्नी की इच्छा थी की इसबार बेटी ही हो। शाम के 4-5 बजे होंगे। दतिया से महाराज जी का फोन आया। उन्होंने पूछा- निकल चुके वत्स? (पहली भेंट के समय से ही वह मुझे वत्स ही कहते थे।) मैंने उन्हें अपनी परिस्थिति बताई और कहा कि इसबार माई के दर्शन नहीं हो पाएंगे। उन्होंने कहा- ऐसा हो ही नहीं सकता। आपको दर्शन जरूर होंगे। मैंने फिर कहा- महाराज जी! इच्छा तो बहुत थी लेकिन क्या ही बताया जाए। उन्होंने कहा, 'वत्स! गुप्त नवरात्रि चल रहे हैं। माई दर्शन जरूर देंगी, इसे कोई नहीं टाल सकता। आप ध्यान रखिए।' रात 9:55 पर प्यारी सी बिटिया ने जन्म लिया। घर पर फोन करके बता ही रहा था कि महाराज जी की वेटिंग आने लगी। करीब दो मिनट के बाद कॉलबैक किया तो उनका पहला वाक्य था, 'आप माई के दर्शन करने नहीं आ पाए तो माई खुद आपको दर्शन देने और आपके साथ रहने आ रही हैं।' मैंने जवाब दिया, 'आ गईं।'


इसके बाद शुरू हुआ बधाइयों का सिलसिला। हजारों की संख्या सोशल मीडिया पर पोस्ट-मैसेज और लगातार फोन की बजती घंटियों के बीच एक बात ने बहुत कष्ट दिया। क्षमा के साथ कहना चाहूंगा कि बेटी के आने पर शुभकामनाओं के लिए मिले संदेशों में एक तिहाई से अधिक संदेशों से मेरे मानस को आपत्ति हुई। उन सभी की शुभकामनाओं के लिए हृदय से आभारी हूं लेकिन एक बार फिर क्षमा के साथ कहूंगा कि उन शुभकामनाओं में 'भारतीयता' नहीं थी। लोगों ने फोन पर, मैसेज में कहा कि 'मां लक्ष्मी आई हैं।' 


मेरा सवाल है कि 'मां लक्ष्मी' ही क्यों?

भारतीय सनातन परंपरा के 33 कोटि देवता लाखों-करोड़ों स्वरूप में धरा पर उपस्थित हैं। हर स्वरूप का एक संदेश है। कोई सृष्टि का पालक है तो किसी ने सृष्टि की व्यवस्था बनाए रखने के लिए संहारक की जिम्मेदारी उठाई है। कोई देवी समर्पण की प्रतिरूप हैं तो कोई धन-धान्य की। ऐसे में मेरी बेटी को लक्ष्मी स्वरूपा कहा जा रहा है। ऐसा कहने वालों में अधिकांश मुझे निजी तौर पर जानते हैं, मेरी प्राथमिकताएं भी समझते हैं। धन मेरी प्राथमिकता कभी नहीं रही, आज भी नहीं है और ईश्वर की कृपा रही तो आगे भी नहीं होगी। नौकरी के बाद बचने वाले समय का आधा हिस्सा मैं आज भी किताबों के साथ बिताता हूं। फिर भी मुझे लगता है कि कितनी भी कोशिश कर लूं, बहुत कुछ पढ़ना/समझना छूट जाएगा। लोग कहते हैं कि एक पिता अपने बच्चों के लिए वे सपने देखता है, जो वह खुद नहीं कर पाता है। मेरे साथ भी ऐसा ही है। मैं चाहता हूं कि मेरा बेटा/बेटी, मुझसे अधिक अध्ययन करें। लेकिन फिर जब कोई कहता है कि लक्ष्मी आई तो मुझे लगता है कि हमने प्राथमिकताएं बदल दी हैं।


भारत की परंपरा तो सर्वदा ज्ञान आधारित रही है। हमारी परंपरा में ज्ञान के बाद संस्कार आते हैं, और फिर आता है दायित्वबोध। धन को तो हमने प्रथम तीन स्थान में भी नहीं रखा है। फिर आज हमारी प्राथमिकताएं क्यों बदलीं? क्यों किसी बेटी के जन्म पर हम यह नहीं कहते हैं कि देखो वैदेही आई हैं। क्या आप अपनी बेटी में मां सीता के जैसा त्याग और प्रेम नहीं चाहते? हम यह क्यों नहीं कहते कि देखो मां वगेश्वरी आई हैं। क्या आप नहीं चाहते कि आपकी बेटी में ज्ञान का भंडार हो? ऐसे बहुत से स्वरूप हो सकते हैं, लेकिन हमारी मति के केन्द्र में धन आ गया है, मुझे आपत्ति इस बात से है। हमारा आंगन तपस्या, करुणा, ममता, दया और क्षमा जैसे दीपों से रोशन हुआ है, मुझे अपने आंगन में सिर्फ धन नहीं चाहिए था। मेरा विश्वास है, जिसे जितनी आवश्यकता होती है, और मन/कर्म द्वेष रहित होते हैं, ईश्वर उतना उपलब्ध करा देता है।


खैर, बेटी आई है तो एक पिता के तौर पर मेरा विश्वास क्या है, उसे पढ़िए...

तुम हमारी साधना की, परम तप की चेतना हो

दिव्य हो तुम विश्व दीप्ति, तुम प्रथम संवेदना हो

उस निशा की उस विजय का, हो परम उपहार हो तुम

स्वप्न पूर्णित किए तुमने, कामना विस्तार हो तुम


गतिशील जीवन की तरह, सतत तुम बढ़ती रहो

आत्म चेतन भाव भरकर, तुम सदा चलती रहो

लक्ष्य अनुपम हो सदा, स्थिर रहे संपूर्णता

दृढ़ रहे विश्वास तेरा, शून्य हो संकीर्णता  


तुम सनातन शक्ति जैसी, आत्मनिर्भर ही बनो

तुम जियो यह प्रण लिए, प्रतिकार बन तम से ठनो

उस दिवस में यह धरा, चरणों में तेरे झुक जाएगी

प्रेम पोषित अपराजिता जब, दिनकर को पथ दिखलाएगी 

Friday, 1 July 2022

नुपुर शर्मा ने क्या गलत किया? हिंदू-मुस्लिम-राष्ट्रवादी-वामपंथी.... सभी के लिए कुछ सवाल


 राजस्थान का उदयपुर जिला

'एक हिंदू दर्जी को दो मुसलमान बेरहमी से मार देते हैं।' 


वैसे तो अपराधी और पीड़ित के धर्म को लेकर मैं सामान्य तौर पर बात नहीं करता लेकिन इस मामले में बात करना जरूरी हो जाता है। उस बेचारे की हत्या सिर्फ इसलिए हो जाती है क्योंकि उसका संबंध एक ऐसी सोशल मीडिया पोस्ट से था, जिसमें नुपुर शर्मा का समर्थन किया गया था। मैं यह लिखना नहीं चाहता था लेकिन इस ब्लॉग में मेरे कुछ सवाल हैं। ये सवाल इस देश के हर मुसलमान से, हर हिंदू से, हर राष्ट्रवादी से और हर उस शख्स से हैं जो खुद को इन तीनों की परिधि से बाहर रखते हैं। 


सबसे पहले बताइए कि नुपुर शर्मा ने क्या कहा था?

नुपुर शर्मा ने इस्लामिक मान्यताओं और पैगम्बर मुहम्मद साहब को लेकर एक कॉमेंट किया था, जिसे विवादित कहा जा रहा है। लेकिन उसमें विवादित क्या था, इसका जवाब कोई नहीं दे रहा।


नुपुर शर्मा ने जो कहा था, क्यों कहा था?

जिस वक्त नुपुर ने वह बयान दिया, उस वक्त टीवी डिबेट में एक जाहिल मौलाना ने शिवलिंग पर अभद्र टिप्पणी की थी। स्वाभाविक है कि वह 'दिव्य ज्ञान' मौलाना साहब को किसी मदरसे या जाकिर नाइक जैसे किसी मूर्ख ने दिया होगा, क्योंकि जो टिप्पणी उसने की थी, उसकी प्रामाणिकता किसी भी सनातन साहित्य में नहीं मिलती।


नुपुर शर्मा ने जो कहा था, वह 'दिव्य ज्ञान' उन्हें कहां से मिला था?

नुपुर शर्मा ने जो कहा, वे बात कई मौलाना अपने मजहबी प्रचार के दौरान कहते रहते हैं। कई इस्लामिक किताबों में उसका जिक्र है। 


क्या नुपुर ने जिस बात पर प्रतिक्रिया दी, उन्हें उस बात पर गुस्सा नहीं आना चाहिए था?

बिलकुल आना चाहिए था। लेकिन प्रतिक्रिया का तरीका वह नहीं होना चाहिए था, जो था। इसे एक उदाहरण से समझिए। आप पर कोई झूठा आरोप लगाए कि आपने उसके 5 रुपये चुरा लिए। आप क्या करेंगे? क्या आप यह कहेंगे कि तुम भी तो 10 रुपये चुराते रंगे हाथों पकड़े गए थे? या फिर आप उसके आरोपों का प्रमाण मांगते हुए खुद की बेगुनाही साबित करने की कोशिश करेंगे। अगर आप पहली वाली बात कहते हैं, तो इसका सीधा सा मतलब है कि आप उस झूठे आरोप को प्रामाणिकता दे रहे हैं, जो आप पर लगाया गया है।


यही नुपुर के केस में हुआ। नुपुर को बेहद शालीनता से उस मौलाना से पूछना चाहिए था कि उसे वह दिव्य ज्ञान कहां से मिला? फिर सनातन साहित्य के आधार पर तर्क देकर पूरे देश को बताना चाहिए था कि ये जाहिल किस तरह से लाइव डिबेट में बैठकर शिवलिंग/सनातन/हिंदुत्व की अनर्गल व्याख्या करके देश को बरगला रहे हैं।


मेरे जीवन में एक ऐसा शख्स आया, जिसने मुझे सैद्धांतिक और वैचारिक रूप से काफी मजबूती दी। मेरे और उनके बीच में घनघोर वैचारिक असहमतियां थीं, लेकिन उन असहमतियों के बीच होने वाली चर्चा में हमने कभी मर्यादा नहीं लांघी। वह मेरे संपादक थे, मैं एक कॉपी एडिटर। नौकरी सभी को प्यारी होती है, लेकिन विश्वास मानिए, मैं सिर्फ उस शख्स के लिए वहां था। हालांकि अब वह शौक जरूरत बन गया है लेकिन मुझे वह संवाद अच्छा लगता था। हमारे बीच 'ऊष्म संवाद' की शुरुआत कैंपस में हुए इंटरव्यू के दौरान ही हो गई थी। वह जब कुछ लिखते थे तो मैं उन्हें जवाब देता था। उनका 'भगवान' में विश्वास नहीं है और मैं घनघोर धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति हूं। वह कभी श्रीरामचरित मानस की किसी चौपाई पर प्रश्न खड़ा करते थे तो कभी मनुस्मृति की किसी सूक्ति पर। सार्वजनिक लिखते थे। 


जब वह श्रीराम के चरित्र पर सवाल उठाते थे, भारतीय परंपराओं पर सवाल उठाते थे तो मुझे बहुत गुस्सा आता था। मैंने भी उन्हें 'उन्हीं की भाषा में' जवाब देता था। वह ब्लॉग लिखते थे, मैं भी लिखता था। उनके तर्कों का जवाब देता था। अधिकांशतः वह सहमत नहीं होते थे, लेकिन हमारी चर्चा एक बिंदु पर समाप्त इसलिए हो जाती थी क्योंकि बात तथ्यों की होती थी। वह वक्त था और आज का वक्त है, लोग आज भी किसी ब्लॉग का लिंक फेसबुक पर मैसेज करके जब कहते हैं, 'भाईसाहब! अद्भुत जानकारी दी आपने, मैंने तो यह सोचा ही नहीं था।', तो लगता है कि उस वक्त में वक्त का जो निवेश अध्ययन में किया था, वह व्यर्थ नहीं था। कहने का मतलब यह है कि तरीका यह भी होता है।    

 

क्या नुपुर की प्रतिक्रिया पर गुस्सा आना चाहिए था?

बिलकुल! किसी को भी आएगा। उसे पता है कि जो कहा जा रहा है, वह गलत है, उसपर चर्चा होगी तो सवाल उठेंगे। वे सवाल सिर्फ उस बात पर नहीं, पूरी मान्यताओं पर होंगे, पूरे इस्लामिक इतिहास पर होंगे। 


क्या नुपुर के खिलाफ उस गुस्से को जिस तरह से प्रदर्शित किया गया, वैसे किया जाना चाहिए था?

बिलकुल नहीं! सभी की अपनी मान्यताएं हैं। उनमें से कुछ अंधविश्वास भी हो सकती हैं लेकिन किसी और को यह अधिकार नहीं है कि उनपर कटाक्ष करे। आप उनपर संवाद कर सकते हैं, लेकिन उन्हें गलत नहीं ठहरा सकते। यह उस समुदाय विशेष के अपने लोगों की जिम्मेदारी है, कि उनमें सुधार/बदलाव करें। नुपुर ने जो कहा था, उसपर आप शांतिपूर्ण विरोध कर सकते थे। कुछ गलत था तो कोर्ट जा सकते थे। लेकिन जो तांडव किया गया, उसे किसी भी कुतर्क के साथ सही नहीं ठहराया जा सकता।


और सबसे अहम सवाल

ऐसे मामलों में भाजपा शासित राज्यों में, खासकर उत्तर प्रदेश में जैसी बुल्डोजर वाली या पुलिसिया कार्रवाई हुई क्या वह गलत थी?

बिलकुल! कई लोगों का कहना है कि इसके लिए न्याय व्यवस्था है। बिलकुल है। न्यायपालिका का काम है न्याय देना। लेकिन मेरे अपने सिद्धांत हैं लेकिन वे पूरी तरह से व्यवहारिक हैं। माफी के साथ मैं सरकारी/प्रशासनिक कार्रवाई करने वाले हर उस शख्स से पूछना चाहूंगा कि क्या भारत की वर्तमान न्याय व्यवस्था से आप न्याय की उम्मीद करते हैं। मुझे लगता है कि हमारी अदालतें, सबूतों के आधार पर फैसला देती हैं, न्याय नहीं देतीं। सबूतों को खत्म किया जा सकता है, उनके साथ छेड़छाड़ की जा सकती है और फिर न्याय कहां से मिलेगा?


एक बुजुर्ग अपनी जिंदगी के 30-35 साल एक बिल्डर से कानूनी लड़ाई लड़ने में लगा देता है। किस लिए? अपनी एक बीघा जमीन के लिए। दिल पर हाथ रखकर बताइए, उसे न्याय मिलता है?

एक बुजुर्ग महिला रोती-बिलखती रहती है, उसके साथ कोई नहीं होता, और उसकी अपनी बहू बेटे के साथ मिलकर घर से निकाल देती है। ऐसी महिला को अदालत न्याय दे पाती है?

पुलिस की मिली भगत से किसी पर झूठी एफआईआर हो जाती है, उसकी पूरी जवानी कोर्ट के चक्कर लगाते खराब हो जाती है, अदालत उसे न्याय दे पाती है?

अरे और तो और... सैकड़ों निर्दोषों की हत्या करने वाले आतंकी को न्याय व्यवस्था के नाम पर हमारे टैक्स के पैसे से पाला जाता है, इसे आप न्याय कहते हैं?

माफ कीजिएगा, लेकिन यह व्यवस्था न्याय के नाम पर सिर्फ छलावा है।


सरकार की जिम्मेदारी है कि वह व्यवस्था बनाए रखे। हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहते हैं और लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां 'एकरूपता' नहीं होती। असहमतियों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन असहमति के नाम पर अराजकता पूरी तरह से गलत है। और मैं मानता हूं समाज को अराजक बनने से रोकने की जिम्मेदारी सरकार की है। चार लोगों के लिए आप 40 की उपेक्षा नहीं कर सकते। इसके लिए आप प्रेम से भी समझा सकते हैं और भय से भी।

इसका एक ही तरीका है, और वह श्रीरामचरित मानस में बताया गया है। दो पंक्तियों में इसका उत्तर है: 


भय बिनु होइ न प्रीति


तो क्या न्याय व्यवस्था को खत्म करके सब कुछ सरकारों पर छोड़ देना चाहिए?

बिलकुल नहीं! इससे भी अराजकता ही बढ़ेगी, बस वह सरकारी अराजकता होगी। न्याय व्यवस्था को खत्म करने की नहीं, उनमें सुधार की जरूरत है। जरूरत है कि 'तारीख पर तारीख...' वाली परंपरा को बदला जाए। न्याय देने वाले को न्याय की महत्ता का अहसास हो। जल्द से जल्द मामलों की सुनवाई हो। एक निश्चित समय में फैसला ना आने पर संबंधित, जज/अफसर पर कार्रवाई हो। जब तक यह नहीं होगा, कुछ नहीं बदलने वाला।

Thursday, 16 June 2022

'पत्थरवार' और 'अग्निवार' के जाहिल एक जैसे, कार्रवाई में भेदभाव क्यों कर रहीं 'रामराज्य' वाली राष्ट्रवादी सरकारें?

 10 जून 2022, दिन शुक्रवार

कुछ मुसलमान, किसी हिंदू की बयान से इस कदर नाराज हो गए कि जमकर तोड़फोड़ की, मंदिरों पर हमले किए, आम लोगों पर पत्थर चलाए, यहां तक की व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश में जुटे यानी संविधान बचाने का प्रयास कर रहे पुलिसवालों को पीटा। पुलिस अफसरों के रोते हुए चेहरे दिखे, आम लोगों की आंखों में भय दिखा, टूटे मंदिर दिखे, हमारी-आपकी यानी देश की संपत्ति का नुकसान दिखा। 


11 जून 2022, दिन शनिवार

लोगों को हिरासत में लिया गया, पुलिसवालों ने जमकर खातिरदारी की। हिंसा करने वालों की 'अवैध' संपत्तियों पर बुलडोजर चलने का आदेश हुआ। एक दिन पहले मेरे मन में जो गुस्सा था, वो अब दूर हो रहा था। मैंने सोशल मीडिया पर लिखा भी कि जो जिस भाषा में समझे, उसे उसी भाषा में समझाना चाहिए। यह लाइन गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में बोली थी। 


श्रीराम ने भी ऐसा ही किया था

मैं बिना शंका के इस बात को मानता हूं कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जीवन से आप काफी कुछ सीख सकते हैं। इतना ही नहीं, मैं यह भी मानता हूं कि अगर किसी राष्ट्र या 'State' को न्याय आधारित व्यवस्था बनानी है तो वह किसी किसी व्यक्ति द्वारा बनाए गए सिद्धांतों के संकलन को पुस्तक का रूप देने से नहीं आ सकती, वह रामराज्य से ही आ सकती है। मैं राष्ट्र में 'सम विधान' चाहता हूं, यानी ऐसी व्यवस्था जो सबके लिए समान हो। सिर्फ ऊपर से नहीं मन से, और यह व्यवस्था हमारी व्यवस्था का हिस्सा रही है:

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। 

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।


एक छोटा सा प्रसंग याद दिलाता हूं। मेरे राम, अपनी पत्नी को एक तत्कालीन आतंकी से आजादी दिलाने के लिए निकले, रास्ते में समुद्र पड़ा, तीन दिन तक समुद्र से राह देने की गुहार लगाई, बार-बार आग्रह करते रहे लेकिन समुद्र ने एक ना सुनी। तब श्रीराम समझ गए कि मामला ऐसे नहीं जमेगा, और फिर उन्होंने दूसरा तरीका अपनाया। इस प्रसंग को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कुछ यूं लिखा है:


विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।


लक्ष्मण तीन दिन पहले से ही आग्रह के पक्ष में नहीं थे। वह जानते थे कि समुद्र को चंद क्षणों में सुखाया जा सकता है। लेकिन राम ने तीन दिनों का अवसर दिया, आग्रह किया और फिर जब समुद्र ने नहीं सुनी तो अपने महा-अग्निपुंज-शर का संधान किया, जिससे समुद्र के अन्दर ऐसी आग लग गई कि उसमें वास करने वाले जीव-जन्तु जलने लगे। इसके बाद समुद्र देव ने अपनी रक्षा के लिए याचना की। श्रीराम चाहते तो तीन दिन पहले भी वही कर सकते थे जो बाद में किया, लेकिन उन्हें पता था कि उससे समुद्र में रहने वाले जीव-जंतुओं को पीड़ा होगी, इसलिए उन्होंने वह नहीं किया। लेकिन जब अंतिम विकल्प ही बचा तो व्यक्ति क्या ही करे।


10 जून की जहालत क्यों?

अब जरा इसे 10 जून की घटना से जोड़िए। नुपुर शर्मा ने कुछ कहा। कहां से पढ़ा, उसमें कितना सच है, किस बात के रिएक्शन में कहा, वह सब बाद की बात है, मैं मानता हूं कि हम सामने वाले से अलग इसीलिए हैं क्योंकि हमारी संस्कृति हमें इसकी अनुमति नहीं देती। मुझे लगता है कि नहीं कहना चाहिए था, संयम रखना चाहिए था, खासकर तब जब देश आपको देख रहा हो। लेकिन कहा! फिर? देर से ही सही, ऐक्शन हुआ। निजी तौर पर मुझे लगता है कि नहीं होना चाहिए था लेकिन हुआ। फिर एफआईआर हुई, निजी तौर पर मुझे लगता है कि यह ठीक था। मामला न्यायालय में जाएगा और सामने आएगा कि भई, नुपुर ने क्या और कहां से पढ़कर कहा। अब और क्या किया जा सकता था? न्यायालय आज के संविधान के मुताबिक सर्वोच्च व्यवस्था है ना? वहां मामला पहुंच गया, बात खत्म। लेकिन नहीं! इसके बाद 10 जून इतिहास बन गया।


व्यवस्था का आधार है पर्सेप्शन!

लोगों ने सोशल मीडिया पर नुपुर के समर्थन में बहुत कुछ लिखा लेकिन भाजपा के किसी आधिकारिक प्रवक्ता ने उसके बाद नुपुर के कृतित्व का समर्थन नहीं किया। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि देश जलाया जाए? खूब बवाल काटा गया। फिर पुलिस/प्रशासन/सरकार ने उन्हें सीख देने के लिए बल का प्रयोग किया। मैं मानता हूं कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह बिलकुल वैसा ही था, जैसे श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करते वक्त किया था। मुझे लगता है कि यह बिलकुल सही फैसला था। जो प्यार से/ समझाने से ना माने, उसे डराकर/धमकाकर ही रखना चाहिए। और वैसे भी किसी राज्य की व्यवस्था पर्सेप्शन पर ही चलती है। पर्सेप्शन ठीक रहना चाहिए। 


जरा सोचकर देखिए!

इस पूरी घटना को एक सप्ताह भी नहीं बीता कि केन्द्र की मोदी सरकार 'अग्निपथ योजना' ले आई। यह कितनी बेहतर है और इसमें क्या खामियां हैं, यह अलग विषय है। एक भारतीय नागरिक के तौर पर मुझे लगता है कि किसी सरकार को जनता के रोजगार को लेकर गंभीरता से काम करना चाहिए, उस लिहाज से मैं इसे सही मानता हूं। लेकिन एक राष्ट्रवादी के तौर पर मुझे लगता है कि नोटबंदी की तरह ही देश का प्रधान एक बार फिर से आत्मचेतना विहीन जनता पर एकबार फिर से जरूरत से अधिक भरोसा कर रहा है और यह देश के लिए घातक हो सकता है। खैर, इसपर फिर कभी बात कर लेंगे, अभी विषय है कि अगर सरकार के किसी फैसले से आप खुश नहीं हैं तो क्या करेंगे? आप विरोध दर्ज करा सकते हैं, आप उस योजना में हिस्सा नहीं ले सकते हैं, लेकिन आपने क्या किया? वही जहालत दिखाई जो 10 जून को 'मुसलमानों' ने दिखाई थी। 


10 जून और 16 जून वाले जाहिलों में अंतर क्यों?

अब मेरा सीधा सवाल सरकार से है। इस देश का हिस्सा बिहार भी है, राजस्थान भी, मध्य प्रदेश भी, उत्तर प्रदेश भी और अन्य राज्य भी। 10 जून को प्रदर्शन के नाम पर जो नंगापन दिखाया गया, क्या वह 16 जून 2022 को हुई जहालत से कम था? हां, बस इतना अंतर था कि वह मजहबी जहालत थी और यह राजनीति से प्रेरित जहालत। लेकिन ना मजहब बुरा है और ना ही राजनीति, गलत तो जहालत है ना? फिर जहालत करने वालों में भेदभाव क्यों? मैं राजस्थान, बिहार या किसी अन्य गैर भाजपा शासित राज्य से अपेक्षा नहीं करता, लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की सरकार चलाने वाली पार्टी तो राम राज्य की बात करती है ना? राम तो भेदभाव नहीं करते थे। श्रीराम ने तो अपने उस अनुज को भी व्यवस्था तोड़ने पर सजा दी थी, जिसने 14 साल तक निद्रा देवी को अपने पास तक नहीं फटकने दिया। फिर आप क्यों वैसी ही कार्रवाई नहीं करते? क्यों बुलडोजर वाली कार्रवाई 16 जून को जहालत करने वालों पर होने की बात नहीं कर रहे? वजह कोई भी हो, विद्वेष कैसा भी हो, लेकिन विश्वास मानिए यह रामराज्य नहीं है, यह न्याय नहीं है!

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...