Showing posts with label अच्छे दिन. Show all posts
Showing posts with label अच्छे दिन. Show all posts

Monday, 21 March 2016

जनरल टिकट के साथ स्लीपर कोच की रात

आज पिता जी की इच्छानुसार पीसीएस की परीक्षा देने कानपुर आना हुआ। कल शाम की ट्रेन से दिल्ली से कानपुर आया। परीक्षा के चलते ट्रेन में काफी भीड़ थी। मेरा रिजर्वेशन था और सीट कंफर्म थी। लेकिन कुछ छात्र मेरी सीट पर आकर बैठ गए। मानवीयता के नाते मैंने उनसे सीट खाली करने को नहीं कहा, उनके साथ मैं भी बैठा रहा। इस दौरान टिकट पर्यवेक्षक जो कि एक महिला थीं, वह आईं और जनरल ‘टिकट’ वालों से प्रति व्यक्ति 200 रुपए लेने लगीं। मुझे बहुत बुरा लगा क्योंकि मेरी नजरों के सामने भ्रष्टाचार हो रहा था। मैंने इस विषय को लेकर रेल मंत्री महोदय और रेल मंत्रालय को ट्वीट्स किए। मुझे उम्मीद थी कि शायद कोई कार्यवाही हो, लेकिन कुछ नहीं हुआ। टिकट पर्यवेक्षक महोदया अपनी जेब गरम करके चली गईं।
खैर, बैठे-बैठे ही पूरी यात्रा हो गई। सुबह कानपुर पहुंचकर स्टेशन के पास ही एक होटल लिया और फ्रेश होकर परीक्षा देने चला गया। प्रथम पाली की परीक्षा तो हो गई लेकिन उसके बाद 3 घंटे का गैप था। परीक्षा केंद्र से होटल लगभग 10 किमी दूर था। इस नाते वापस जाना संभव नहीं था। पिछली 3 रातों से जाग रहा था इसलिए नींद भी आ रही थी। कड़ी धूप में किसी तरह 3 घंटे का समय बिताकर दूसरी पाली की परीक्षा दी। नींद मुझ पर हावी होने का भरसक प्रयास कर रही थी। ऑटो से 10 किमी का सफर तय करने में मुझे 2 घंटे से भी ज्यादा लग गए।
शाम 7 बजे होटल पहुंचकर सोचा कि थोड़ा आराम कर लूं, लेकिन रात 9:15 पर मेरी ट्रेन थी इसलिए मन में डर भी था कि कहीं ट्रेन छूट न जाए। घर में बात करने के पश्चात लेटा ही था कि निद्रा देवी ने मुझ पर पूर्ण अधिकार स्थापित कर लिया। मैं सो चुका था और जब आंख खुली तो रात के 12:50 बज रहे थे। मैं अपना एटीएम दिल्ली में ही भूल आया था। मेरे पास सिर्फ 600 रुपये ही बचे थे। थोड़ा समय पहले तक कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि अपने पास कंफर्म टिकट जो था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी थीं, ट्रेन जा चुकी थी। मैं तुरंत होटल से निकला और स्टेशन पहुंचा, मुझे उम्मीद थी शायद ट्रेन लेट हो और मुझे सीट मिल जाए लेकिन हर बार आपकी इच्छानुसार सब कुछ नहीं होता, शायद इसलिए क्योंकि आपकी सकारात्मकता से अन्य लोगों की सकारात्मकता ज्यादा प्रभावशाली होती है।
ट्रेन जा चुकी थी, बस से जाने भर का किराया नहीं था। अंत में तात्कालिक निर्णय के आधार पर तय किया कि जनरल टिकट से यात्रा करूंगा। 145 रुपए का जनरल टिकट लेकर ट्रेन पता की और प्लैटफॉर्म पर आ गया। पानी तथा कुछ खाने का हल्का-फुल्का सामान लेकर बैग में रखा और ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगा। ट्रेन आने के बाद जब जनरल बोगी की भीड़ देखी तो उसमें बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। अगले पल मैं ट्रेन के स्लीपर कोच में था।
ट्रेन चलने के बाद मैं टिकट पर्यवेक्षक से मिला और उनको अपनी स्थिति से अवगत कराया। ‘या तो पैसा दो या फिर जनरल बोगी में जाओ’ कहकर वह आगे चले गए। अपना काम निपटाकर वह वापस मेरे पास आए और बोले कि क्या करना है?
मैंने उनको फिर से अपनी स्थिति बताई कि किस तरह से मेरी ट्रेन छूट गई थी, साथ ही जनरल बोगी की भीड़ के बारे में बताया। उन्होंने कहा, ‘इसमें बैठना है तो पैसा लगेगा।’
मेरा अगला प्रश्न था- ‘कितना?’
वह बोले, ‘जो देना है दे दो।’ मेरे सामने धर्मसंकट की स्थिति थी कि क्या करूं? मेरे हाथ स्वतः ही जेब में गए और मैंने उनको 100 रुपए निकालकर दे दिए।
रुपए लेकर वह आगे चले गए लेकिन मेरी चिंताओं को बढ़ा गए। ज़िन्दगी में पहली बार मैं एक भ्रष्टाचार में सहभागी था। आज से पहले मैं बहुत गर्व से कहता था कि मैं कभी किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार का हिस्सा नहीं बना लेकिन अब कभी ऐसा नहीं कह पाऊंगा। मेरे पास सिर्फ 300 रुपए बचे थे। अंत में मैंने तय किया कि मैं पेनल्टी सहित टिकट बनवाऊंगा। मैं तत्काल प्रभाव से टीटीई के पास गया और उनसे कहा कि मुझे पेनल्टी के साथ टिकट बनवाना है। उसने हंसते हुए गणित लगाई और बोला 365 रुपए लगेंगे, आप 100 रुपए दे चुके हो, 265 और दे दो। मैंने शेष बचे 100-100 के तीनों नोट उनकी तरफ बढ़ा दिए और कहा कि अगर टिकट नहीं बनवाया तो जीवनभर खुद को माफ़ नहीं कर पाऊंगा।
वह हतप्रभ थे, शायद उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति ना मिला हो जिसका काम 100 रुपए में हो रहा हो लेकिन वह साढ़े तीन गुना पैसा देने खुद आया हो। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या करते हो?
मैंने कहा कि सर, आप टिकट बना दो और मैं जाऊं। मैं ऐसे स्थानों पर सामान्य रूप से अपना परिचय देने से बचता हूं। उन्होंने फिर कहा, ‘मैं तुम्हारे पिता की उम्र का हूं और तुमको अपना काम बताने में भी दिक्कत हो रही है।’ फिर मैंने उनसे कहा कि मैं दिल्ली में पत्रकार हूं। वह खड़े हुए और बोले कि तुम्हारा नाम क्या है? मैंने कहा, विश्व गौरव। उन्होंने कहा, आगे? मैंने कहा, बस इतना ही। फिर वह और खुले तथा बोले, जाति? उनका यह प्रश्न मुझे अचंभित करने वाला था। मैंने उनसे कहा, ‘जन्म तो एक ब्राह्मण कुल में लिया है लेकिन कर्म से पूर्ण ब्राह्मण नहीं हूं।’ उन्होंने पहले लिए गए 100 रुपए सहित पूरे 400 रुपए मुझे वापस कर दिए और कहा, ‘तुमसे मैं पैसे नहीं ले सकता, तुम ट्रेन में बैठे रहो और इसे मेरी मदद समझो। रोज बहुत से लोग मिलते हैं जो पत्रकारिता के नाम पर भ्रष्टाचार करते हैं। और हां, अब कभी किसी से यह मत कहना कि तुम्हारे कर्म ब्राह्मण जैसे नहीं हैं।’ उन्होंने मुझसे कहा कि तुम मेरे बेटे की उम्र के हो, आज मैं तुमसे वादा करता हूं कि कभी गलत तरह से पैसा नहीं लूंगा। मैं धन्यवाद बोलकर चला आया।
अभी ट्रेन में ही हूं, मोबाइल पर ब्लॉग लिख रहा हूं, आंखों में आंसू हैं और हृदय में ईश्वर पर विश्वास। अगर मन साफ है तो आपके साथ कुछ बुरा नहीं हो सकता। मैं आगे भी यह कह पाऊंगा कि मैं कभी किसी भ्रष्टाचार में सहभागी नहीं बना। मेरे ‘गौरव’ को बनाए रखने में सहयोग के लिए ईश्वर का धन्यवाद।
(समय- 03:28 AM)

Monday, 15 February 2016

JNU के 'प्रगतिवादियों' को राष्ट्रवादी शिक्षा देनी होगी


आज वॉट्सऐप पर एक मित्र ने मेसेज किया कि अगर कश्मीर के लोग चाहते हैं कि वे अलग हो जाएं तो उनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए, उनको स्वतंत्र कर देना चाहिए ताकि वे अपने हिसाब से जी सकें। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से अपने उस मित्र को मेरे प्रिय बागी कवि विनीत चौहान की दो पंक्तियां समर्पित करना चाहता हूं-

अपनी इस केसर घाटी को इतना लहू दे चुके हैं हम,
अब तो जो भी फूल खिलेंगे, सारे फूल हमारे होंगे।


वैसे उन्होंने सच ही कहा कि कश्मीर का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि वह भारत से अलग हो जाए। ऐसे लोगों के लिए विनीत ने कहा है, ‘कश्मीर वह बेवफा औरत हो चला है जो खाता हमसे है, पहनता हमसे है, जीता हमसे है और नैन-मटक्के पड़ोसी के साथ करना चाहता है।’ मेरे उस मित्र की बात का जवाब आज मैं राजनीतिक तौर पर देने की स्थिति में नहीं हूं क्योंकि मैंने पिछले लोकसभा चुनाव में अपना वोट बीजेपी को दिया था। वही बीजेपी जो विपक्षी पार्टी होने के दौरान अफजल गुरु की फांसी के लिए आंदोलन करती थी, वही बीजेपी जिसके मातृ संगठन के द्वारा एक राष्ट्र, एक ध्वज, एक निशान और एक विधान के नारे सुनकर मुझे लगता था कि राष्ट्रीय एकात्मता के लिए कार्य करने वाला अन्य कोई संगठन हो ही नहीं सकता। उसी बीजेपी ने सत्ताकांक्षा के नशे में चूर होकर दो ध्वजों के नीचे खड़े होकर स्व. मुफ्ती साहब से हाथ मिलाया।

यह वही मुफ्ती साहब थे जिन्होंने घाटी में सफल चुनाव का श्रेय पाकिस्तान, सीमापार के तत्वों और हुर्रियत को दिया था। यह वही मुफ्ती साहब थे जिनके दिसंबर 1989 में भारत का गृहमंत्री बनते ही आतंकवादियों ने इन्हीं की बेटी रूबिया को अगवा कर लिया था, और फिर भारत सरकार को रूबिया की रिहाई के बदले पांच आतंकवादियों को जेल से छोड़ना पड़ा था।


यह वह दौर था जब घाटी में आतंकी गतिविधियां अपने चरम पर पहुंच गई थीं और आतंकवाद कश्मीरी पंडितों को वहां से खदेड़कर एक इस्लामिक गणतंत्र की मांग करने लगा था। लेकिन इस देश की सबसे बड़ी तथाकथित लोकतांत्रिक पार्टी ने इतिहास को भूलते हुए अपने सिद्धान्तों से समझौता कर लिया और सत्ता लोलुपता के चलते घाटी में गठबंधन कर कमल खिला दिया। जब ऐसा हुआ तो मुझे लगा कि बीजेपी का यह कदम उन पचास हजार से अधिक सैनिकों के मुंह पर तमाचा है जिन्होंने कश्मीर के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए आपने प्राणों की बाजी लगा दी।
दोस्तों, मैं आपको इस समस्या के बारे में बेहतर तरीके से बताने के लिए थोड़ा सा इतिहास में ले जाऊंगा। वैसे तो कश्मीर को हथियाने के लिए पाकिस्तान की ओर से लगातार कोशिश होती रहती हैं, लेकिन 1971 के बाद से पाकिस्तान इसे लेकर ज्यादा गंभीर हो गया है। पाकिस्तान ने जितने कश्मीर पर कब्जा कर रखा है उसे ही नहीं झेल पा रहा है तो और ज्यादा लेकर क्या करेगा? जब कश्मीर से स्वतंत्र होने की मांग उठती है तो यहां कुछ लोगों को लगता है कि भले ही कश्मीर स्वतंत्र हो जाए लेकिन पाकिस्तान के पास ना जाए। फिर लोग कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मांग करने लगते हैं।

ऐसे लोगों को मैं इतिहास का एक पृष्ठ याद दिलाना चाहता हूं, 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के एक हिस्से को पूर्ण स्वतंत्र बांग्लादेश बना दिया था, उसी तरह अब पाकिस्तान भारत के टुकड़े करना चाहता है। पाकिस्तान अब कश्मीर को अपना हिस्सा नहीं बनाना चाहता अपितु वह चाहता है कि कश्मीर अलग करके वह 1971 का बदला ले सके और इसी उद्देश्य के साथ पाकिस्तान से आतंकी भेजे जाते हैं जो भारत में ‘अलगाववादी’ कहे जाते हैं। भोले-भाले कश्मीरियों को बरगलाकर ये अपने साथ मिलाते हैं और कश्मीर में अलग झंडा लेकर भारत का विरोध करने के लिए तैयार खड़े रहते हैं। जब लोग यह कहते हैं कि कश्मीर में जनमत संग्रह कराना चाहिए तो मेरा उनसे कहना है कि अगर जनमत संग्रह कराना है तो कश्मीर में नहीं बल्कि पूरे भारत के लोगों से कराइए। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि तीन प्रदेशों के बराबर हम सिर्फ एक जम्मू कश्मीर पर खर्च करते हैं। इस देश के लोगों के द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे से कश्मीर का खर्च चलता है, ऐसे में कश्मीर का क्या करना है यह तय करने का अधिकार सिर्फ वहां रह रहे लोगों का नहीं बल्कि पूरे भारत का है।

जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो जम्मू-कश्मीर हमारे (यानी भारत के) साथ नहीं था। 20 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया और 24 अक्टूबर तक जम्मू कश्मीर की सेना ने पाकिस्तानी हमलावरों के आगे घुटने टेक दिए थे, पाकिस्तानी सेना श्रीनगर के नजदीक पहुंच गई थी। महाराजा हरि सिंह को लगा कि अब अगर पाकिस्तान को रोका नहीं गया तो ना सिर्फ जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखने का सपना टूट जाएगा बल्कि जम्मू-कश्मीर एक इस्लामिक राष्ट्र बन जाएगा। इस मामले में भारत की सेना कुछ कर नहीं सकती थी क्योंकि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं था। आखिरकार महाराजा हरि सिंह ने भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को पत्र लिखकर कहा कि ‘आप हमारी पाकिस्तान से रक्षा कीजिए, बदले में हम अपना पूरा का पूरा राज्य भारत में मिलाने को तैयार हैं।’ इसके बाद एक लिखित समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस विषय में आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के साथ महाराजा हरि सिंह ने एक शर्त भी रखी। हरि सिंह अपनी संस्कृति की विशिष्टता को बनाए रखना चाहते थे इसलिए उन्होंने जम्मू-कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा देने की शर्त रखी। कश्मीर के भारत राष्ट्र में विलय के बाद भारतीय सेना ने कार्रवाई शुरू की लेकिन वह उतना आसान नहीं था क्योंकि इस अवधि में वहां बर्फबारी होती है और पाकिस्तानी सेना काफी अन्दर तक घुस आई थी इसलिए भारतीय सेना को दो-ढाई महीने का समय लग गया। चूंकि कश्मीर की सेना की जगह अब भारतीय सेना आ गई थी और जम्मू-कश्मीर के राजा ने भारत के साथ विलय का समझौता भी कर लिया था तो पाकिस्तान को लगा कि जम्मू-कश्मीर पर कब्ज़ा करना अब मुश्किल है, इसलिए पाकिस्तान ने कूटनीतिक प्रयास शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने मान लिया था कि जम्मू-कश्मीर पर तो अब हम कब्ज़ा कर नहीं सकते लिहाजा जितना इलाका हमारे हाथ लगा है उसी को अपने आधीन कर लिया जाए। इसी उद्देश्य के साथ पाकिस्तान ने अमेरिका से संपर्क किया और समझौता कराने को कहा।

समझौता हुआ लेकिन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने एक गलती कर दी, नेहरु ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी, जबकि युद्धविराम का नियम है कि युद्धविराम का फैसला कैबिनेट की मीटिंग बुलाकर किया जाता है, पर नेहरु ने अकेले ही यह घोषणा ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से कर दी। जिसके बाद पाकिस्तान की सेना जहां तक थी वहां तक का पूरा क्षेत्र पाक अधिकृत कश्मीर बन गया। आज धारा 370 के आधार पर कश्मीर का झंडा अलग है, कश्मीर का कानून अलग है, कश्मीर का संविधान अलग है। फिर भी जब कोई सरकार कहती है कि कश्मीर, भारत का अभिन्न अंग है तो मुझे लगता है कि देश को धोखा देने की कोशिश की जा रही है।

आपको पता होगा कि भारत सरकार आपके लिए कोई भी खर्चा करती है तो उसका हिसाब कैग (Comptroller and Auditor General of India) रखता है लेकिन जम्मू-कश्मीर पर आज तक जितना भी खर्च हुआ है उसका हिसाब कैग के पास नहीं है। इस बारे में स्वर्गीय राजीव दीक्षित के द्वारा जब कैग से पूछा गया तो कैग ने कहा कि कश्मीर के खर्च का हिसाब जम्मू-कश्मीर की सरकार के पास है। उस जम्मू-कश्मीर से भारत को बाहर करने के लिए जब नारे लगाए जाते हैं तो पीड़ा होती है। यह पीड़ा इसलिए होती है क्योंकि जिस राजनीतिक पार्टी को मैंने व्यक्तिगत रूप से लोकसभा चुनाव में वोट दिया था उस राजनीतिक पार्टी के राज में एक साल में जितने पाकिस्तानी झंडे घाटी में लहराए गए उतने तो पिछले 68 सालों में नहीं लहराए गए। क्या आपने इतने भारत विरोधी नारे देश की राजधानी में पहले कभी सुने। लेकिन फिर भी थोड़ी सी संतुष्टि इस बात की है कि कम से कम इन भारत विरोधियों पर कुछ कार्रवाई तो हो रही है। खैर, बुद्धिजीवियों का गढ़ कहे जाने वाले जेएनयू के ‘प्रगतिवादी’ छात्रों को अब राष्ट्रवादी शिक्षा देनी होगी।


Saturday, 26 September 2015

क्यों समाप्त नहीं हो सकता टोल टैक्स? : गडकरी जी से एक सवाल


बहुत समय से देश का एक वर्ग ऐसी हवा बनाए हुए था कि भारतीय जनता पार्टी चाहती है कि देश से टैक्स खत्म कर दिए जाएं। कहीं न कहीं मुझे भी ऐसा लगता था कि भाजपा उन टैक्सेज को खत्म कर देगी जिनको लगाने के पीछे अंग्रेजों का उद्देश्य भारत और भारतीयों को लूटना था। लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के पहले कई बार बैठकों में भी भाजपा के नेताओं से सुना कि कांग्रेस सरकार ऐसे टैक्सेज लगा कर हमें लूट रही है। जब राजीव दीक्षित जी सर्कुलर टैक्सेशन सिस्टम के विषय में बोलते थे तो भाजपा के नेता भी उनकी हां में हां मिलाते थे। लेकिन अब ऐसा क्या हुआ कि  बीजेपी इन करों को समाप्त करने से बच रही है।

आज लेकिन केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस संभावना से पूरी तरह इनकार किया कि भविष्य में टोल टैक्स को वापस लिया जा सकता है। एक न्यूज चैनल की ओर से आयोजित कार्यक्रम के दौरान गडकरी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि टोल टैक्स कभी खत्म नहीं होगा। उन्होंने कहा कि सरकार के पास सड़क बनाने के लिए पैसे नहीं हैं। टोल कम या ज्यादा हो सकता है पर खत्म नहीं। उन्होंने कहा कि यदि हमें बेहतर रोड का इस्तेमाल करना है तो टैक्स तो देना ही होगा। उन्होंने कहा कि सड़कों के निर्माण के लिए विदेश से कर्ज लेंगे तो ब्याज लगेगा।

मैं माननीय मंत्री महोदय से पूछना चाहता हूं कि इनकम टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स और सर्विस टैक्स, वैट, कस्टम ड्यूटी, ऑक्टरॉय जैसे टैक्सेज का क्या करते हैं आप? क्या इस देश के विकास में इतना पैसा वास्तव में लगाते हैं।

मित्रों इस देश का टैक्सेशन सिस्टम भी जबरदस्त है।

मुझसे सरकार के एक प्रतिनिधि ने पूछा कि क्या करते हो?
तो मैंने कहा कि बिजनेस।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- प्रोफेशनल टैक्स चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने फिर कहा -क्या बिजनेस करते हो?
मैंने कहा -सामान बेचता हूं।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा -सेल्स टैक्स चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि का अगला प्रश्न था कि सामान लाते कहां से हो?
मैंने कहा -दूसरे प्रदेशों या विदेश से।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा -सेन्ट्रल सेल्स टैक्स, कस्टम ड्यूटी और ऑक्टरॉय चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- आप चीजें कहां बनाते हो(पैकिंग इत्यादि)?
मैंने कहा- फैक्ट्री में।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- एक्साइज ड्यूटी चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- क्या आपके पास ऑफिस, फैक्ट्री है?
मैंने कहा- हां।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- मुंशिपल और फायर टैक्स चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने फिर कहा- क्या आपके पास स्टॉफ है?
मैंने कहा- हां
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- स्टाफ प्रोफेशनल टैक्स चुकाओ

सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- आप किसी प्रकार की सर्विस लेते या देते हो?
मैंने कहा- हां।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- सर्विस टैक्स चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- आप बिजनेस की वजह से काफी टेंशन में रहते होंगे।
मैंने कहा- हां।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- आप टेंशन मिटाने के लिए क्या करते हो?
मैंने कहा- फिल्म देखने चला जाता हूं।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- इंटरटेनमेंट टैक्स चुकाओ।

और अगर एक भी टैक्स चुकाने में देरी की तो पेनॉल्टी / फाइन अलग से दो।


ये है हमारा टैक्सेशन सिस्टम। ये सिर्फ बड़े कारोबारियों के लिए ही नहीं है। अगर आप अपनी गली में या गांव में सेवा भाव से कोई छोटी सी दुकान भी चला रहे हैं तो भी आपको ये सारे टैक्सेज चुकाने पड़ेंगे। अब आप स्वयं सोचकर देखिए कि यदि आपके मन में एक बार सेवा भाव आया तो क्या आप कर पाएंगे।
मैंने सरकार के उस प्रतिनिधि के समक्ष भी यही कहा तो वो बोले कि इन सारे टैक्सेज से ही तो सरकार चलती है। इन्ही से तो विकास का काम होता है। इतना कहकर वो चले गए। अब कोई मुझे ये बताए कि क्या वास्तव में इन टैक्सेज से ही विकास होता है।

हमारे दिए गए टैक्सेज से देश के नेताओं को तन्ख्वाह दी जाती है। दुर्भाग्य देखिए कि जिस देश में अर्थशास्त्र का जन्म हुआ, जिस देश में चाणक्य जैसा अर्थशास्त्री हुआ उस देश में अर्थशास्त्र की परिभाषा ही बदल गई।
अन्त में माननीय गडकरी जी से मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि कृपया राजधर्म का पालन करते हुए सामान्य जनमानस की परिस्थियों को समझते हुए कुछ भी बोलें। आपको यह समझना होगा कि राजनीति का अर्थ राज करने की नीति न होकर राजकीय व्यवस्था को चलाने की नीति है।



Monday, 27 July 2015

"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"

विदेशी कंपनियों से सामान खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से देश बेचने वाला व्यक्ति पूछता है
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*दीवार पर पेशाब करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*बिजली चोरी करता व्यक्ति पूछता है, "अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*यहाँ-वहाँ कचरा फैंकता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*कामचोर कर्मचारी पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*टेक्स चोरी करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*नौकरी पर देरी से व जल्दी घर दौड़ता कर्मचारी पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*लड़कियों से छेड़खानी करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?
"वंदे मातरम् के समय बातें करते स्कूलों के कुछ लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"

*स्कूल में बच्चों को न भेजने वाले लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*सड़क पर रेड सिग्नल तोड़ते लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*किताबों से दूर भागते विद्यार्थी पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*कारखानों में हराम खोरी करते लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे........!!

अच्छे दिन आएंगे लेकिन उनको लाने वाले पीएम साहब नहीं होंगे....हम अगर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और अपने जीवन में प्रत्येक काम यह सोचकर करेंगे कि मेरे प्रत्येक कार्य से देश पर प्रभाव पड़ रहा है, तो निश्चित ही अच्छे दिन आ जाएंगे। सड़क पर कचरा नरेन्द्र मोदी नाम का व्यक्ति नहीं फेंकता है, अपने बच्चों को यो-यो टाईप नरेंद्र मोदी नहीं बनाता....हमें करना होगा स्वयं में परिवर्तन यदि हम वास्तव में अच्छे दिनों की परिकल्पना को साकार करना चाहते हैं तो....

वन्दे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...