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Wednesday, 28 August 2024

पहले पूतिन, फिर ज़ेलेंस्की से भी गले मिले PM मोदी, दो-गले से बात क्यों कर रहे वामपंथी?

पहले पूतिन, फिर ज़ेलेंस्की से भी गले मिले PM मोदी, दो-गले से बात क्यों कर रहे वामपंथी?

बहुत लंबे समय से किसी विषय पर चर्चा नहीं कर पाया। कई परिचितों के मैसेज आए कि कुछ लिख नहीं रहे, दरअसल एक, कुछ तो समय का अभाव था और दूसरा कोई ऐसा विषय नहीं मिल रहा था कि कुछ विमर्श किया जाए। हालांकि आज जिस विषय पर चर्चा करने वाला हूं, वह विषय तो सामान्य है, लेकिन कुछ बौद्धिकतावादी लोगों ने विषय को विशिष्ट बना दिया है। बीते दिनों फेसबुक पर एक पोस्ट देखी। यह पोस्ट थी, मेरे प्रथम पूर्णकालिक संपादक रहे नीरेन्द्र नागर जी की। उन्होंने लिखा था-


मोदी पूतिन के बाद अब ज़ेलेंस्की से भी गले मिल लिए। यानी बता दिया कि भारत आक्रांता के साथ भी हैं और आक्रांत के साथ भी। थप्पड़ मारने वाले के साथ भी और थप्पड़ खाने वाले के साथ भी।

अंग्रेज़ी में इसे कहते हैं - Running with the hare and hunting with the hounds. हिंदी में शालीन भाषा में कहें तो गंगा गए गंगाराम, जमुना गए जमुनादास। अशालीन भाषा में एक शब्द है जिसका मैं प्रयोग नहीं करना चाहता। आप ख़ुद ही समझ जाएँ।

वैसे मोदी के लिए यह कोई नई बात नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही है कि भाषणों में नारी सुरक्षा की दुहाई देना और ज़मीन पर आततायियों का साथ देना चाहे वह राम रहीम हो या गुजरात के संस्कारी।

मेरे पिता कहा करते थे कि कोई क्या 'कहता' है, यह उसकी असल पहचान नहीं होती। असल पहचान इससे होती है कि वह क्या 'करता' है।

और मोदी क्या 'करते' हैं, यह हम सब जानते हैं। भक्त भी।


एक तरफ वसुधैव कुटुंबकम् का जाप, दूसरी तरफ़ मेरे देश, मेरे लोगों का हित। अजीब दोगलापन है। इसी को मैं स्वार्थप्रेरित कायरता कहता हूँ।

राम-रावण युद्ध में भी दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क थे। तो क्यों राम का समर्थन करते हो? महाभारत युद्ध में भी कौरवों का अपना पक्ष था। फिर क्यों पांडवों का पक्ष लेते हो?


इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाया। दरअसल बात सिर्फ नीरेन्द्र नागर जी की नहीं है, कई अन्य लोग भी, विशेषकर वामपंथी, सोशल मीडिया पर ऐसी ही बातें कर रहे हैं, इसलिए विषय की गहराई में जाना बहुत जरूरी है। नरेन्द्र मोदी का विरोध अपनी जगह है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों का वैचारिक विरोध होता रहना चाहिए, लेकिन किसी भी व्यवस्था में यदि आप मुल्क को, मनुष्यता को किसी भी अन्य चीज से ऊपर रखते हैं तो मेरी इसपर आपत्ति है। रूस और यूक्रेन का क्या मामला है, कौन सही है, कौन गलत है, इस प्रश्न पर दोनों पक्षों की अपनी राय है औऱ यह दोनों देशों के बीच का मामला है, इसमें किसी तीसरे का हस्तक्षेप तब तक नहीं होना चाहिए, जबतक वह मामला आपको या आपके मुल्क के एक भी व्यक्ति को प्रभावित ना कर रहा हो। 


किसी एक पक्ष को आक्रांता कहना और किसी दूसरे पक्ष को आक्रांत कहना, निश्चित तौर पर दो देशों के बीच की निजता में हस्तक्षेप है। एक तीसरे मुल्क के नागरिक के तौर पर मेरे लिए तो गर्व का विषय यही है कि उन दो देशों के युद्ध के बीच जब भारत के बेटे-बेटियों को यूक्रेन से बाहर आना था तो मेरे देश के बच्चे जब तिरंगा लेकर निकले तो दोनों देशों की सेनाओं ने अपने हथियार नीचे किए और उन्हें रास्ता दिया। और सिर्फ इतना ही नहीं, मेरे मुल्क के बच्चों के साथ उस मुल्क के बच्चे भी तिरंगे की छत्रछाया में बाहर आ गए, जो हमारा सामाजिक दुश्मन किंतु पड़ोसी था। मेरे लिए तो यही गर्व का विषय है कि मेरे मुल्क की मनुष्यता ने मेरे सामाजिक दुश्मन देश के बच्चों को भी जिंदगी दी।


मैं विदेश नीति का पंडित नहीं हूं, लेकिन यदि दो दुश्मन देशों से हमारे अपने संबंध अच्छे हैं और हम उसके निजी मामलों में ‘मनुष्यता’ के नाम पर किसी एक का समर्थन ना करते हुए हिंसक कार्यपद्धति का सहारा न लेते हुए पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कह सकते हैं कि रास्ता शांति से ही निकलेगा, बातचीत से ही निकलेगा और दोनों में एक भी देश हमारी बात पर प्रतिउत्तर नहीं करता है तो हमें इसे अपनी विदेश नीति की विजय क्यों नहीं मानना चाहिए?

बाकी राजनीति हो या असल जीवन, कोई क्या 'कहता' है, यह उसकी असल पहचान नहीं होती। असल पहचान इससे होती है कि वह क्या 'करता' है। शून्यता के गर्त में पहुंच चुकी वैचारिकी को जीवित रखने के लिए ‘कुछ भी’ लिख देना और कह देना तो बहुत आसान होता है, लेकिन करना बहुत मुश्किल। किसी वाममार्गी से मिलिए, उसके लिए बहुत आसान होता है यह कहना कि ब्राह्मणों ने दलितों का खूब शोषण किया, उनकी जमीनें छीन लीं, मेरे दादा-परदादा ने भी ली थीं, लेकिन इस प्रश्न पर मौन हो जाते हैं कि जब आपको पता है कि आपके दादा-परदादा ने किसी दलित-शोषित की जमीन पर कब्जा किया था, छल से उसकी जमीन ले ली थी, तो आपको जानकारी मिलने के बाद आपने वापस क्यों नहीं की? तब आप कह देते हैं कि मुझे क्या पता कि 70-80 साल पहले वो जमीन किसकी थी। अरे नहीं पता है तो उस जमीन को किसी दलित-शोषित को दान कर दीजिए, लेकिन वो नहीं कर पाएंगे।
इस पूरी वाममार्गी वैचारिकी के लिए अशालीन भाषा में एक शब्द है जिसका मैं प्रयोग नहीं करना चाहता। पाठक ख़ुद ही समझ जाएँगे।

यह विषय कूटनीति का है, उसमें संस्कार और संस्कृति को लाने की आवश्यकता ही क्या है। लेकिन मेरे लिए प्रसन्नता का विषय यह है कि कम से कम अपना विषय तर्कयुक्त सिद्ध करने के लिए नीरेन्द्र नागर जी ने उन पात्रों का उदाहरण दिया, जो उनकी वैचारिकी के ऐतिहासिक कोश में अस्तित्वहीन थे। देने को तो वह शक्तिमान और तमराज किलविष का उदाहरण भी दे सकते थे, लेकिन नहीं, उन्होंने राम-रावण और पांडव-कौरवों का जिक्र किया। नीरेन्द्र नागर जी के प्रश्नों का उत्तर देने में मुझे बहुत खुशी होगी, क्योंकि श्रीराम मेरा प्रिय विषय हैं, लेकिन उससे पहले एक अन्य विषय को समझना भी बहुत जरूरी है। मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी हूं। मनोविज्ञान की दृष्टि से बताता हूं कि नीरेन्द्र नागर जी ने शक्तिमान-तमराज की जगह श्रीराम-श्रीकृष्ण का उदाहरण क्यों दिया। दरअसल 2014 की भाजपा की 282 सीटें, 2019 की 303 सीटें जीतना और फिर 2024 में 240 सीटों पर आना उनकी पराजय नहीं है, उनकी विजय तो इसी बात में है कि उन्होंने वामपंथ की Anti Theist वैचारिकी को 10-15 सालों में Anti Modi बना दिया है। यह बात आपको सामान्य लग सकती है, लेकिन मनोवैज्ञानिक नजरिये से देखेंगे तो पता लगेगा कि जिस वैचारिकी की स्वीकार्यता लंबे समय तक पूरी दुनिया में रही, उसे BJP ने खत्म नहीं किया, बल्कि उसे बदल दिया, और यह बहुत बड़ी बात है।


अब आते हैं नीरेन्द्र नागर जी के प्रश्न पर। हम कहते हैं वसुधैव कुटुंबकम्। इसे स्वीकार भी करते हैं लेकिन अगर समय/काल/परिस्थिति के अनुसार कोई अपने व्यवहार में बदलाव को लेकर उचित निर्णय नहीं लेगा तो वह समाप्त हो जाएगा। उदाहरण से समझिए- उपनिवेशवाद के विरोध के नाम पर खड़ी हुई वामपंथी वैचारिकी इसीलिए समाप्त हो गई क्योंकि उन्होंने समयानुरूप सामाजिक परिवेश के अनुसार आवश्यकता को स्वीकार नहीं किया। और जिन वामपंथियों ने स्वीकार किया, उन्होंने अलग-अलग संस्थानों में नौकरी की, वहां अपनी वैचारिकी को स्थापित करने का प्रयास किया, अब इसे आप ‘दोगलापन’ कहिए या स्वार्थप्रेरित वैचारिक आत्महत्या, आपकी समझ है। मेरे हिसाब से तो यह उचित था। कोई वामपंथी अगर किसी कॉर्पोरेट मीडिया संस्थान में संपादक बन जाए, उसका कार्यालय जंगलों को काटकर बसाई गई किसी फिल्म सिटी में हो और उस संस्थान में उपनिवेशवाद के समर्थन वाले विज्ञापन चलते रहें, और उसी से उसका वेतन आए तो इसे आपके तर्क के हिसाब से तो गलत कहा जाएगा। फिर तो आप भी समझ सकते हैं कि कौन कितना गलत है।


वसुधैव कुटुंबकम् की वैचारिकी हमारे अपने मन और शरीर से शुरू होती है, फिर वह ब्रह्मांड तक जाती है। पहले यह वैचारिकी हमें अपने शरीर रूपी कुटुंब में स्थापित करनी होगी कि शरीर का प्रत्येक अंग बराबर है, प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है। फिर इसे अपने परिवार, मोहल्ले, समाज और देश में स्थापित करना होगा। अभी हम अपने शरीर और मन में तो स्थापित कर नहीं पाए, बात करेंगे दुनिया की। गालियां इस बात पर देते हैं कि वर्ण व्यवस्था के एक वर्ग को पैरों से निकला हुआ क्यों दिखाया, अरे जब सारे अंग बराबर हैं तो पैर कौन सी खराब चीज हो गए?


राम-रावण युद्ध हो या कौरव-पांडव युद्ध, समय और परिस्थिति के हिसाब से हमारे इतिहास में फैसले लिए गए हैं। त्रेतायुग में बड़ा भाई दुनिया के सबसे बड़े सिंहासन को ठोकर मारकर एक वल्कल पहनकर 14 वर्षों के लिए वन को चला जाता है, तो उसका सौतेला भाई बड़े भाई की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राज्य का संचालन करता है। राम और रावण का इतिहास स्वीकार कर रहे हैं और उसका उदाहरण दे रहे हैं तो इसे भी स्वीकार करिए कि वह इतिहास था और भविष्य में इतिहास का मूल्यांकन होता है। उस काल में दोनों पक्षों के अपने तर्क थे, लोगों ने अपनी समझ के अनुसार एक पक्ष चुना, एक पक्ष हारा और दूसरा जीता। हजारों सालों के बाद जब इतिहास का मूल्यांकन हुआ तो श्रीराम और पांडवों का पक्ष न्यायोचित लगा तो हम उस पक्ष के समर्थन में रहते हैं। जिसे रावण या कौरव का पक्ष न्यायोचित लगता है, वह उसके समर्थन में रहते हैं। इसमें कौन सी गलत बात है?

त्रेतायुग में परिस्थितियां अलग थीं, इसलिए वहां कूटनीति भी कम थी। द्वापर में परिस्थितियां बदलीं, युद्ध की नीतियां बदलीं तो कूटनीति भी बदल गई। आज कलियुग में परिस्थितियां और अलग हैं तो कूटनीति भी अलग स्तर की होनी चाहिए, जो कि है भी।

पड़ोसी मुल्क पूर्वी पाकिस्तान में जब उसके अपने ही लोग अत्याचार कर रहे थे, और वहां से जब शरणार्थी बंगाल में आने लगे और उससे हमारे मुल्क का हित प्रभावित होने लगा तो भारत की शेेरनी इंदिरा गांधी ने उनकी औकात दिखा दी थी, आज चाहे यूक्रेन हो या इजरायल, अगर कोई मदद मांगे और दूसरा प्रेम से बात समझने को तैयार ना हो तो निश्चित ही सत्ताधीशों को वही करना चाहिए जो मैडम इंदिरा ने किया था। लेकिन, उस परिस्थिति में भी तो वामपंथी यही कहेंगे कि युद्ध गलत है? है ना?


Tuesday, 26 April 2016

'ऑड-ईवन' पर देश के मन की बात सुनिए मोदीजी!

किसी ने सच ही कहा है कि सत्ता का नशा हर तरह के नियम, कायदे और कानून भुला देता है। कुछ ऐसा ही हाल वर्तमान समय में भारत के नेताओं का हो चुका है।kejriwal देश की राजधानी में जब हमारे ‘माननीय’ ही नियमों को तोड़ने से परहेज नहीं करते तो एक सामान्य व्यक्ति से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह नियमों का पालन करेगा? कल कुछ सांसदों ने ऑड-ईवन नियम तोड़ा। किसी ने नियम तोड़कर माफी मांगी तो किसी ने दिल्ली के सीएम केजरीवाल को मनोरोगी की संज्ञा दे दी। क्या राजनीति ऐसी होनी चाहिए? क्या अपनी विपक्षी पार्टी को नीचा दिखाने का यही तरीका होना चाहिए? क्या देश और समाज हित में कोई प्रयोग किया जा रहा है तो उस प्रयोग का समर्थन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर नहीं किया जाना चाहिए?
दिल्ली प्रदेश में बीजेपी, आज विपक्ष की पार्टी है। विपक्ष का काम सत्ता का विरोध करना नहीं होता है बल्कि विपक्ष का काम सत्ता को समाज हित में नए रास्ते दिखाने का होता है। विपक्ष का काम सत्ता को गिराने का नहीं होता बल्कि विपक्ष का काम होता है कि जब सत्ता लड़खड़ाए, तो विपक्ष उसे एक नया विकल्प दे। पीएम नरेन्द्र मोदी ने जनधन योजना के रूप में इसी प्रकार का एक प्रयोग किया था, वह प्रयोग सफल भी माना जा सकता है। लेकिन एक बार कल्पना करिए कि यदि 31 प्रतिशत वोट पाकर सरकार में आई एनडीए की सभी योजनाओं-परियोजनाओं का विरोध अन्य सभी विपक्षी पार्टियां करने लगें तो क्या ये योजनाएं सफल होंगी। दिल्ली में ऑड-ईवन एक प्रयोग है, हो सकता है कि इससे कोई खास फर्क न पड़े, लेकिन क्या इस परिकल्पना के चलते इस प्रयोग को किया ही न जाए! जब कई देशों में इस नियम के सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले हों तब मात्र अहंकारवश दलगत राजनीति से प्रेरित होकर नियमों का उल्लंघन करना बीजेपी जैसी पार्टियों को शोभा नहीं देता।
vijay goel
ऑड-ईवन का विरोध कर नियम तोड़ते बीजेपी के विजय गोयल।
देश के प्रधान ने जब लोकसभा में कहा, ‘हम (सरकार) चाहते हैं कि विपक्ष हमारे साथ मिलकर काम करे।’ तो मुझे लगा कि चलो कोई तो है जो पक्ष-विपक्ष के सामंजस्य के साथ कुछ अच्छा करना चाहता है। लेकिन यही अपेक्षा एक विपक्ष के रूप में इस देश को बीजेपी से भी है। संभव है कि नियम तोड़ने वाले हमारे ‘माननीयों’ को ऑड-ईवन के विषय में जानकारी ना हो और वे गलती से गलत नंबर वाली गाड़ी ले आए हों लेकिन क्या नैशनल मीडिया पर छाए रहने वाले एक विषय के बारे में सांसदों को जानकारी न होना, उचित है? कितना अच्छा होता यदि हमारे पीएम साहब कम से कम एनडीए सांसदों को ऑड-ईवन का पालन करने के लिए सार्वजनिक रूप से कहते।
बीजेपी के दृष्टिकोण से केजरीवाल में लाख बुराइयां होंगी लेकिन इस देश के राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि कोई भी सरकार जब कोई नियम अथवा योजना लाती है, तो समाज हित के लिए ही लाती है। दिल्ली की जनता ने ऑड-ईवन को स्वीकार किया है ऐसे में किसी के द्वारा भी बिना किसी आधार के इसका विरोध करना राजनीति के निम्नतम स्तर को दर्शाता है। अच्छे उद्देश्य के साथ किए जा रहे प्रयोग पर देश के सभी दल एक होकर काम करें तभी ‘भारत माता’ की जय होगी। किसी से जबरदस्ती एक नारा लगवाकर मां भारती की ‘जय’ नहीं हो सकती।
Modiएक सकारात्मक प्रयोग पर सभी का समर्थन मिलना, एक नई तरह की राजनीति का जन्म होगा। सत्ता, समाज कार्य का साधन है, यदि उसे साध्य मान लिया जाएगा तो निश्चित ही समाज हित नहीं हो सकता। साध्य तो समाज हित ही होना चाहिए। देश की राजनीति में परिवर्तन परम आवश्यक है। देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक सिंहासन पर बैठने वाले व्यक्ति का दायित्व है कि वह इस राजनीति में परिवर्तन के लिए नींव पूजन करे। नए प्रयोग में नुकसान हो सकते हैं लेकिन उन नुकसानों के डर के चलते यदि प्रयोग न किए गए तो देश की हालत बद से बदतर हो जाएगी और भविष्य इसके लिए सभी नकारात्मक प्रवृत्ति वाले, दलगत राजनीति से प्रेरित नेताओं को ही अपराधी मानेगा।

Monday, 21 March 2016

जनरल टिकट के साथ स्लीपर कोच की रात

आज पिता जी की इच्छानुसार पीसीएस की परीक्षा देने कानपुर आना हुआ। कल शाम की ट्रेन से दिल्ली से कानपुर आया। परीक्षा के चलते ट्रेन में काफी भीड़ थी। मेरा रिजर्वेशन था और सीट कंफर्म थी। लेकिन कुछ छात्र मेरी सीट पर आकर बैठ गए। मानवीयता के नाते मैंने उनसे सीट खाली करने को नहीं कहा, उनके साथ मैं भी बैठा रहा। इस दौरान टिकट पर्यवेक्षक जो कि एक महिला थीं, वह आईं और जनरल ‘टिकट’ वालों से प्रति व्यक्ति 200 रुपए लेने लगीं। मुझे बहुत बुरा लगा क्योंकि मेरी नजरों के सामने भ्रष्टाचार हो रहा था। मैंने इस विषय को लेकर रेल मंत्री महोदय और रेल मंत्रालय को ट्वीट्स किए। मुझे उम्मीद थी कि शायद कोई कार्यवाही हो, लेकिन कुछ नहीं हुआ। टिकट पर्यवेक्षक महोदया अपनी जेब गरम करके चली गईं।
खैर, बैठे-बैठे ही पूरी यात्रा हो गई। सुबह कानपुर पहुंचकर स्टेशन के पास ही एक होटल लिया और फ्रेश होकर परीक्षा देने चला गया। प्रथम पाली की परीक्षा तो हो गई लेकिन उसके बाद 3 घंटे का गैप था। परीक्षा केंद्र से होटल लगभग 10 किमी दूर था। इस नाते वापस जाना संभव नहीं था। पिछली 3 रातों से जाग रहा था इसलिए नींद भी आ रही थी। कड़ी धूप में किसी तरह 3 घंटे का समय बिताकर दूसरी पाली की परीक्षा दी। नींद मुझ पर हावी होने का भरसक प्रयास कर रही थी। ऑटो से 10 किमी का सफर तय करने में मुझे 2 घंटे से भी ज्यादा लग गए।
शाम 7 बजे होटल पहुंचकर सोचा कि थोड़ा आराम कर लूं, लेकिन रात 9:15 पर मेरी ट्रेन थी इसलिए मन में डर भी था कि कहीं ट्रेन छूट न जाए। घर में बात करने के पश्चात लेटा ही था कि निद्रा देवी ने मुझ पर पूर्ण अधिकार स्थापित कर लिया। मैं सो चुका था और जब आंख खुली तो रात के 12:50 बज रहे थे। मैं अपना एटीएम दिल्ली में ही भूल आया था। मेरे पास सिर्फ 600 रुपये ही बचे थे। थोड़ा समय पहले तक कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि अपने पास कंफर्म टिकट जो था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी थीं, ट्रेन जा चुकी थी। मैं तुरंत होटल से निकला और स्टेशन पहुंचा, मुझे उम्मीद थी शायद ट्रेन लेट हो और मुझे सीट मिल जाए लेकिन हर बार आपकी इच्छानुसार सब कुछ नहीं होता, शायद इसलिए क्योंकि आपकी सकारात्मकता से अन्य लोगों की सकारात्मकता ज्यादा प्रभावशाली होती है।
ट्रेन जा चुकी थी, बस से जाने भर का किराया नहीं था। अंत में तात्कालिक निर्णय के आधार पर तय किया कि जनरल टिकट से यात्रा करूंगा। 145 रुपए का जनरल टिकट लेकर ट्रेन पता की और प्लैटफॉर्म पर आ गया। पानी तथा कुछ खाने का हल्का-फुल्का सामान लेकर बैग में रखा और ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगा। ट्रेन आने के बाद जब जनरल बोगी की भीड़ देखी तो उसमें बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। अगले पल मैं ट्रेन के स्लीपर कोच में था।
ट्रेन चलने के बाद मैं टिकट पर्यवेक्षक से मिला और उनको अपनी स्थिति से अवगत कराया। ‘या तो पैसा दो या फिर जनरल बोगी में जाओ’ कहकर वह आगे चले गए। अपना काम निपटाकर वह वापस मेरे पास आए और बोले कि क्या करना है?
मैंने उनको फिर से अपनी स्थिति बताई कि किस तरह से मेरी ट्रेन छूट गई थी, साथ ही जनरल बोगी की भीड़ के बारे में बताया। उन्होंने कहा, ‘इसमें बैठना है तो पैसा लगेगा।’
मेरा अगला प्रश्न था- ‘कितना?’
वह बोले, ‘जो देना है दे दो।’ मेरे सामने धर्मसंकट की स्थिति थी कि क्या करूं? मेरे हाथ स्वतः ही जेब में गए और मैंने उनको 100 रुपए निकालकर दे दिए।
रुपए लेकर वह आगे चले गए लेकिन मेरी चिंताओं को बढ़ा गए। ज़िन्दगी में पहली बार मैं एक भ्रष्टाचार में सहभागी था। आज से पहले मैं बहुत गर्व से कहता था कि मैं कभी किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार का हिस्सा नहीं बना लेकिन अब कभी ऐसा नहीं कह पाऊंगा। मेरे पास सिर्फ 300 रुपए बचे थे। अंत में मैंने तय किया कि मैं पेनल्टी सहित टिकट बनवाऊंगा। मैं तत्काल प्रभाव से टीटीई के पास गया और उनसे कहा कि मुझे पेनल्टी के साथ टिकट बनवाना है। उसने हंसते हुए गणित लगाई और बोला 365 रुपए लगेंगे, आप 100 रुपए दे चुके हो, 265 और दे दो। मैंने शेष बचे 100-100 के तीनों नोट उनकी तरफ बढ़ा दिए और कहा कि अगर टिकट नहीं बनवाया तो जीवनभर खुद को माफ़ नहीं कर पाऊंगा।
वह हतप्रभ थे, शायद उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति ना मिला हो जिसका काम 100 रुपए में हो रहा हो लेकिन वह साढ़े तीन गुना पैसा देने खुद आया हो। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या करते हो?
मैंने कहा कि सर, आप टिकट बना दो और मैं जाऊं। मैं ऐसे स्थानों पर सामान्य रूप से अपना परिचय देने से बचता हूं। उन्होंने फिर कहा, ‘मैं तुम्हारे पिता की उम्र का हूं और तुमको अपना काम बताने में भी दिक्कत हो रही है।’ फिर मैंने उनसे कहा कि मैं दिल्ली में पत्रकार हूं। वह खड़े हुए और बोले कि तुम्हारा नाम क्या है? मैंने कहा, विश्व गौरव। उन्होंने कहा, आगे? मैंने कहा, बस इतना ही। फिर वह और खुले तथा बोले, जाति? उनका यह प्रश्न मुझे अचंभित करने वाला था। मैंने उनसे कहा, ‘जन्म तो एक ब्राह्मण कुल में लिया है लेकिन कर्म से पूर्ण ब्राह्मण नहीं हूं।’ उन्होंने पहले लिए गए 100 रुपए सहित पूरे 400 रुपए मुझे वापस कर दिए और कहा, ‘तुमसे मैं पैसे नहीं ले सकता, तुम ट्रेन में बैठे रहो और इसे मेरी मदद समझो। रोज बहुत से लोग मिलते हैं जो पत्रकारिता के नाम पर भ्रष्टाचार करते हैं। और हां, अब कभी किसी से यह मत कहना कि तुम्हारे कर्म ब्राह्मण जैसे नहीं हैं।’ उन्होंने मुझसे कहा कि तुम मेरे बेटे की उम्र के हो, आज मैं तुमसे वादा करता हूं कि कभी गलत तरह से पैसा नहीं लूंगा। मैं धन्यवाद बोलकर चला आया।
अभी ट्रेन में ही हूं, मोबाइल पर ब्लॉग लिख रहा हूं, आंखों में आंसू हैं और हृदय में ईश्वर पर विश्वास। अगर मन साफ है तो आपके साथ कुछ बुरा नहीं हो सकता। मैं आगे भी यह कह पाऊंगा कि मैं कभी किसी भ्रष्टाचार में सहभागी नहीं बना। मेरे ‘गौरव’ को बनाए रखने में सहयोग के लिए ईश्वर का धन्यवाद।
(समय- 03:28 AM)

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...