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Saturday, 5 March 2016

'भारत में आजादी' के मायने और वामपंथियों का 'खेल'

देश की संवैधानिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले को इसी व्यवस्था ने आज एक मौका और दिया कि वह 'आजादी' के अर्थ को समझ सके। हिरासत से छूटने के बाद कन्हैया का एक बदला हुआ रूप देखने को मिला। उसके भाषण को सुनकर ऐसा लगा जैसे अपनी मूल विचारधारा से कहीं भटक सा गया है। हालांकि उसके इस भटकाव से मुझे खुशी हुई लेकिन मैं फिर भी कन्हैया कुमार को लेकर कुछ लिखने की इच्छा हुई।

आज कन्हैया ने अपनी विचारधारा को स्पष्ट करते हुए कहा कि हम पेटेंट के खिलाफ हैं, अखंड भारत किसी का पेटेंट नहीं, हम कश्मीर को भारत का अंग मानते हैं। इस बात से मुझे कोई आपत्ति नहीं। मैं भी यही मानता हूं, लेकिन साथ ही मैं कन्हैया से पूछना चाहता हूं कि जब वह जेल में था उस दौरान उसके विचार परिवार के समर्थकों ने खुलेआम यह लिखना और बोलना शुरू कर दिया था कि कश्मीर में जनमत संग्रह करा देना चाहिए, कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए। ऐसा कहने वालों में सिर्फ कन्हैया की विचारधारा के राजनीतिक समर्थक ही नहीं थे बल्कि उनके साथ-साथ देश की प्रबुद्ध माडिया के साथी भी थे। जिनका तर्क था कि आंबेडकर ने भी तो कश्मीर के विषय में 'ऐसा' कहा था।

कन्हैया ने कहा कि देश की सरकार एक पार्टी की सरकार बन गई है, एक दफ्तर की सरकार बन गई है। उनको यह याद दिलाना है कि आप देश के पीएम हैं, शिक्षा मंत्री हैं। कन्हैया ने  साफ किया कि पीएम मोदी से उसका मतभेद है, मनभेद नहीं है। यहां तक बात बहुत अच्छी थी। मतभेद बुद्दिजीवियों के बीच होते हैं, कन्हैया भी एक अच्छा बुद्धिजीवी है, एक नामी संस्थान में पढ़ रहा है, देश की राजधानी में रह रहा है और निसंदेह पढ़ाई भी की होगी। लेकिन मेरा सवाल यह है कि अगर आप मात्र मतभेद रखते हैं तो यदि देश की सरकार एक पार्टी की सरकार बन गई है और आपके मत को स्वीकार नहीं किया जा रहा है तो क्या आप देश की जनता के प्रेम और विश्वास द्वारा दिए गए पुरस्कारों को लौटाने की शुरुआत कर दोगे? यदि आप वास्तव में बुद्धिजीवी हो तो सर्वप्रथम देश की जनता के मन में विश्वास पैदा करो और अपने मत को लोकतंत्रिक मंदिर यानि संसद में प्रतिस्थापित करो।

कन्हैया ने कहा कि देश की न्याय प्रक्रिया में जेएनयू को भरोसा है। कन्हैया ने कहा, 'संविधान विडियो नहीं है, जिसे बदल दोगे। संविधान एक दस्तावेज है। इसे देश की महिलाओं, दलित, किसानों, मजदूरों ने आजादी के आंदोलन के अनुभवों से सींच कर बनाया है। संविधान की प्रस्तावना दुनिया का एक बेहतरीन दस्तावेज है। जो संविधान के साथ खिलवाड़ कर रहा है उन्हें नकारना है। समानता, भाईचारा, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद इन आदर्शों के लिए लड़ना है।' कोई समस्या नहीं है मुझे कन्हैया के इस स्टैंड के साथ। बहुत अच्छी बात है। लेकिन कन्हैया साहब मैंनें भी थोड़ा बहुत भगत सिंह को पढ़ा है लेकिन साथ ही समझने की भी कोशिश की है। भगत सिंह का इशारा उस व्यवस्था की ओर था जो अंग्रेज चला रहे थे। और मुझे इस बात को मानने में कोई संकोच नहीं है कि इस देश की वर्तमान व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। मैं भी मानता हूं कि व्यवस्था में परिवर्तन चाहिए। जब तक व्यवस्था ही नहीं बदलेगी तब तक समानता, सद्भाव जैसे विषय समाज में स्थापित हो ही नहीं सकते। जातिवाद से आजादी मुझे भी चाहिए यद्यपि इस देश को जातिवाद से आजादी चाहिए और इस आजादी को पाने के लिए हमें संविधान में परिवर्तन करना ही होगा लेकिन उससे पहले हमें अपने विचारों में परिवर्तन करना होगा, आपको अपने विचारों में परिवर्तन करना होगा। आपको यह तय करना होगा कि देश में यदि कोई छात्र व्यवस्था से परेशान होकर आत्महत्या करता है तो कुर्तकों के सहारे उसे जातिवादी जंजीरों में जकड़ कर 'दलित' न बनाएं बल्कि एक मेधावी छात्र ने ऐसा कदम क्यों उठाया उस पर चिंतन करें और यदि आवश्यक हो तो व्यवस्था परिवर्तन के लिए आंदोलन करें। हम आपके साथ हैं लेकिन यह तब तक नहीं हो सकता जब तक आप अपना दोहरा चरित्र ना छोड़ दें।

कन्हैया ने कहा, 'जेएनयू वर्तमान में लड़ रहा है भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए। देश को बताना चाहते हैं कि आप जब टैक्स देते हैं उसकी सब्सिडी से हम यहां पढ़ते हैं। आपको आश्वस्त करना चाहते हैं कि यहां के स्टूडेंट्स देशद्रोही नहीं हो सकते।' मुझे भी यही अपेक्षा है लेकिन जब देखता हूं कि उसी जेएनयू में उमर खालिद जैसे लोग भी पढ़ते हैं, जब देखता हूं कि उस विश्वविद्यालय में ऐसे लोग भी पढ़ते हैं जो एक आतंकी अफजल की सजा को न्यायिक हत्या बताते हैं तो मुझे लगता कि हमारा पैसा किसी गलत जगह पर जा रहा है। और कन्हैया साहब, आप कितना भी कह लें कि आप संविधान भक्त हो गए लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि आप अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए ऐसा कर रहे हो। इसमें भी कोई बुराई नहीं है, राजनीति करो लेकिन देश के साथ, देश के विरोध में जाकर करोगे तो उसे देश स्वीकार नहीं करेगा। मुझे खुशी है कि एक रंग वाले झंडे की 'लाल गुलामी' को तोड़कर आज तुम्हारे साथी तिरंगे को भी साथ लेकर खड़े थे।  

कन्हैया ने कहा, 'इतना भी फर्क नहीं समझे कि आरोपी और आरोप सिद्ध में क्या फर्क है। सीधे आतंकवादी बना दिया। हम भी आप जैसे किसी मां-बाप के बच्चे हैं। कोई आतंकवादी नहीं हैं। इसलिए हमें गलत मत समझिए। हक की लड़ाई लड़ते हैं यही अपराध है। अगर आप गलत मानेंगे तो लड़ाई बंद कर देंगे। सरकार गलत कहेगी तो और लड़ेंगे।' बहुत अच्छी बात है। सत्ता को निरंकुश नहीं होने देना चाहिए, आलोचना होनी चाहिए लेकिन कन्हैया यदि विरोध और आलोचना के अंतर को समझने की कोशिश करोगे साथ ही अगर सकारात्मकता और नकारात्मकता के विचारों से बाहर निकलोगे तब जानोगे हक की लड़ाई क्या होती है। जल-जंगल-जमीन के नाम पर किसी सीआरपीएफ जवान की हत्या कर देना अगर हक की लड़ाई है तो मैं ऐसी लड़ाई लड़ने वालों को आतंकवादी से कम नहीं मानता। आतंकवादियों को मारने समय शायद सैनिक न सोचता हो लेकिन एक नक्सली को मारते समय जरूर सोचता होगा। कन्हैया तुमको क्या लगता है कि जब सैनिक की किसी नक्सली के साथ मुठभेड़ होती होगी तो क्या वह निर्ममता से तत्काल उस नक्सली को मारने के लिए तैयार हो जाता होगा। नहीं, उसके हाथ एक बार जरूर कांपते हैं, एक बार उसके मन में तो यह जरूर आता है कि ये लोग यह सब छोड़कर शांति के साथ मिल-जुल कर क्यों नहीं रहते लेकिन नक्सली, पूरी तरह से आतंकवादी कृत्यों से सुसज्जित बस उद्देश्य का अंतर रहता है।

कन्हैया ने कहा, 'मेरा आदर्श अफजल गुरु नहीं, आज मेरा आदर्श रोहित वेमुला है।' अच्छी बात है कि आपका आदर्श रोहित है लेकिन रोहित से पहले आपका आदर्श कौन था? क्या आपके समर्थकों ने कभी अफजल का समर्थन नहीं किया। आज आप कहने लगे कि हर घर से रोहित निकलेगा, बिलकुल निकलना चाहिए लेकिन क्या आप कुछ समय पहले हर घर से अफजल को नहीं निकाल रहे थे।

कन्हैया ने कहा, 'हम अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा जानते हैं। हम आजादी का मतलब जानते हैं। इसीलिए देश से नहीं बल्कि देश में आजादी चाहते हैं।' कन्हैया जी इस देश में आपको कौन सी आजादी नहीं मिली है? आप शायद स्वच्छंदता को स्वतंत्रता मान बैठे हैं। आपको कोई संघ का स्वयंसेवक बनाने नहीं आ रहा, आपको कोई जबरदस्ती बीजेपी के पक्ष में मतदान करने को नहीं कह रहा, आपको कोई जबरदस्ती मनुवादी नहीं बना रहा, सामंतवाद, साम्राज्यवाद यहां है नहीं, कर्म आधारित व्यवस्था है, जो जितनी मेहनत करेगा उसे उतना ही मिलेगा हालांकि इस व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए परंतु फिर भी आवश्यकता के अनुरूप आजादी मिली हुई है। हमें पता है देश में बहुत सी कुरीतियां हैं लेकिन उनको समाप्त ना ही तुम अकेले कर सकते हो और ना ही मैं। एक साथ मिलकर उन्हें दूर करने की कोशिश करो लेकिन अगर समाज बनाने की ही ठानी है तो फिर अपने उद्देश्य में राजनीति मत करो। अगर तुम भारत में ऐसी आजादी चाहते हो कि तुम एक आतंकी की सजा के विरोध में सभाएं करो, तुम नक्सलियों द्वारा मारे गए शहीदों की चिताग्नि ठंडी होने से पहले उनकी हत्या का जश्न मनाना शुरू कर दो, तुम इस देश का अलग इतिहास बनाकर लोगों को बताओ और अगर कोई सही इतिहास बताने की कोशिश करे तो उसे भगवाकरण का नाम दे दो तो यह नहीं चलेगा। अगर तुम भारत में ऐसी आजादी चाहते हो तो बेहतर होगा कि तुम भारत से ही आजादी ले लो। इस देश के शौर्यपूर्ण इतिहास और संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार किसी को भी नहीं है। इस देश को रंगों से ढकने की जरूरत नहीं है। भगवा भी इस देश का है और लाल-हरा भी, उसे पूजा पद्धतियों से जोड़कर, उसे राजनीतिक विचारधाराओं से जोड़कर, उसे संप्रदायों से जोड़कर समाज के सामने प्रदर्शित करने से मात्र देश के टुकड़े होंगे और उन टुकड़ों में कहीं तुम्हारे अपने ही दूर ना हो जाएं इस बारे में भी सोच लो और अगर इस दर्द को व्यवहारिक रूप से समझना है तो कभी जाकर उनके पास बैठो जिनको कश्मीर से भगा दिया गया था या फिर उनके पास जिनको लाहौर से भगा दिया गया था।

Tuesday, 23 February 2016

कैसी मानवीयता है आपकी, यह दोहरा चरित्र क्यों?

आज वामपंथ को लेकर मेरे मन में कुछ सवाल उत्पन्न हुए। मुझे उन प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे इसी अपेक्षा के साथ इस ब्लॉग को लिख रहा हूं। उन सवालों को आपके समझ रखने से पहले मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि मुझे वामपंथ के मूल विचार से कोई आपत्ति नहीं है अपितु मुझे तो लगता है कि जहां से वामपंथ आया है वहां के लिए वह सर्वश्रेष्ठ था। अपने विषय को स्पष्ट करने से पहले एक उदाहरण देता हूं। मान लीजिए आप तमिलनाडु में रहते हैं जहां 12 महीने गर्मी रहती है, उस मौसम के हिसाब से आप लुंगी या कोई हल्का कपड़ा पहनते हैं लेकिन फिर किसी कारणवश आप जम्मू-कश्मीर में रहने के लिए चले जाते हैं। क्या आप वहां पर भी सिर्फ इस तर्क के साथ कि अरे मैं तो तमिलनाडु का हूं, वहां मैंने हमेशा लुंगी पहनी है, इसलिए यहां भी वही पहनूंगा कहकर वही पुराने कपड़े पहनकर जी सकते हैं?

आपका जवाब ना ही होगा, क्योंकि आपको पता है कि वातावरण, परिस्थिति और परिवेश के अनुसार परिवर्तित होना ही समझदारी है।

यही स्थिति आज वामपंथ की है। आधुनिक वामपंथ के जनक कार्ल मार्क्स ने कहा था कि समाज में दो ही वर्ग होते हैं: पूंजीपति और सर्वहारा। कार्ल मार्क्स जहां के थे वहां वास्तव में दो ही वर्ग थे, एक शोषक यानि पूंजीपति और दूसरा शोषित यानी सर्वहारा। लेकिन क्या भारत में भी दो ही वर्ग रहे हैं? हो सकता है भारतीय इतिहास को सिरे से नकार देने वाले वामपंथी यहां भी कह दें कि भारत में भी यही दो वर्ग थे लेकिन जिसने सकारात्मक दृष्टि के, बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए भारतीय इतिहास का अध्ययन किया है, उसे पता होगा कि भारत में प्रत्येक व्यक्ति का एक विशिष्ट वर्ग था। हर एक व्यक्ति स्वयं में पूर्ण था लेकिन फिर भी एक दूसरे पर आश्रित था। यही भारत की सामाजिक व्यवस्था थी। अगर इसी के साथ हम वामपंथी इतिहास पर नजर डालें तो हमें पता लगेगा कि मार्क्‍सवाद को बड़े पैमाने पर व्यवहार में उतारने का एक बड़ा प्रयास माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीन में किया गया, जिसके फलस्वरूप 1949 में चीनी लोक गणराज्य की स्थापना हुई। आरंभ में साम्यवादी चीन को समस्त प्रकार की सोवियत सहायता प्राप्त हुई। ऐसा लगा कि इतनी विशाल आबादी और क्षेत्र वाले ये दोनों साम्यवादी देश पूंजीवादी विश्व के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर विश्व के अन्य देशों में साम्यवाद का प्रसार करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

1960 के दशक के आरंभ में दोनों देशों के बीच वैचारिक मतभेद उभरने लगे। इसका एक कारण दोनों के अलग-अलग राष्ट्रीय हित और उसके अनुसार मार्क्‍सवाद की अलग-अलग व्याख्याएं थीं। इसके साथ एक प्रमुख कारण यह था कि निकिता ख्रुश्चेव के नेतृत्व में सोवियत संघ पूंजीवाद के साथ ‘शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व’ की नीति अपनाना चाहता था जबकि माओ पूंजीवादी देशों के प्रति युद्धरत रहने पर बल दे रहे थे। वामपंथ वहां स्थायित्व नहीं ले पाया।

1920 में जब वामपंथ ने भारत में पैर रखा तो उसके सिद्धान्त वही थे जो उसका मूल आधार थे, लेकिन चूंकि भारत के परिपेक्ष्य में यहां का परिवेश वामपंथ को अपना चुके अन्य देशों की तरह नहीं था इस नाते यह तय था कि इससे भारत का नुकसान ही होगा। बिना परिस्थितियों का अध्ययन और विश्लेषण किए वामपंथ भारत में जड़ें जमाने की कोशिश करने लगा। जिस भारतीय संस्कृति को धर्म से जोड़कर कहा गया कि ‘धर्म अफीम की तरह होता है’ उस संस्कृति का चिंतन ही नहीं किया गया। यानी जिस स्थान पर रहकर वहां के तथाकथित धर्म को अफीम बताया गया, उन पूजा पद्धतियों में बुराइयां रही थीं। वहां धर्म के नाम पर शोषण किया जाता था। लेकिन इस भारत की स्थिति तो ऐसी नहीं थी। मैं मानता हूं कि भारत में भी एक लंबे समय तक कुछ वर्गों को दबाने की भरसक कोशिशें की गई हैं लेकिन अगर हम मूल भारतीय संस्कृति के बारे में सोचे तो उसमें कोई कमी नहीं। पूर्ण समानता आधारित संस्कृति को लाने के लिए आपको भारत की शिक्षा देनी होगी। अगर आप भारत में जर्मनी या रूस की शिक्षा देंगे तो यह संभव ही नहीं है कि इस देश में शांति बनी रहेगी।

आप ईश्वर को नहीं मानते, हमें कोई समस्या नहीं, आपका पूजा पद्दतियों में विश्वास नहीं, हमें कोई समस्या नहीं, आप धर्म को भी नहीं मानते फिर भी कोई समस्या नहीं लेकिन किसी एक विषय पर तो आपको हमारे साथ खड़ा होना होगा या किसी एक विषय पर तो हमें अपने साथ खड़ा कर लीजिए। आपसे हम कहते हैं कि ‘देश’ या ‘राष्ट्र’ के विषय पर ही आप हमारे साथ आ जाइए लेकिन आप नहीं आते। चलिए हम आपसे पूछते हैं कि आखिर आप किस विषय पर हमें अपने साथ लेना चाहते हैं? हमें पता है आपका जवाब ‘मानवता’ होगा, लेकिन यह कैसी मानवता है कि आप एक कलबुर्गी की हत्या पर अवार्ड वापसी का दौर शुरू कर देते हैं लेकिन देश के दिल, दिल्ली में खड़ी देश की संसद पर हमला करके दिल्ली पुलिस के पांच जवानों, सीआरपीएफ की एक महिला कर्मी और 2 सुरक्षा गार्डों के हत्यारे के समर्थन में नारे लगाते हैं। वहीं, जब एक स्वयंसेवक की खुलेआम आपकी विचारधारा के लोग उसके परिवार के सामने हत्या कर देते हैं तब आपके मुंह में दही जम जाता है। कैसी मानवीयता है आपकी? यह दोहरा चरित्र क्यों?

मैं निंदा करता हूं किसी भी व्यक्ति की हत्या की, चाहे वह किसी भी विचारधारा का अनुपालक हो लेकिन महोदय एक वामपंथी साहित्यकार की हत्या पर आप देश के उस पीएम से इस्तीफा मांगने लगते हैं जिसे इस देश की जनता ने चुन कर भेजा है, एक इखलाक की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या पर आप पूरे देश को असहिष्णु करार देते हैं परंतु क्या एक ऐसे व्यक्ति के लिए आपका मानवाधिकार नहीं है, जिसे आपकी विचारधारा से ग्रसित लोगों से समर्थन प्राप्त नक्सलियों के द्वारा, वनवासियों के आधुनिकीकरण में प्रयासरत, शिक्षा का विस्तार कर रहे वनवासी कल्याण आश्रम के पूर्णकालिक को मार दिया जाता है। जल-जंगल-जमीन के लिए तथाकथित लड़ाई लड़ने वाले, हमारे सुरक्षा जवानों की हत्या करने वाले नक्सलियों की आप वकालत करने लगते हैं। आप कहते हैं कि वे अगर अपनी जमीन के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं तो बुराई क्या है? लेकिन आपकी ये दलीलें कश्मीर के मुद्दे पर कहां चली जाती हैं? आप अपनी जमीन के लिए लड़ाई लड़ें तो क्रांतिकारी और अगर हम अपनी जमीन को बचाए रखने की बात करें अपने लिए नहीं आम जनता के लिए तो असहिष्णु हो जाते हैं। आप बात करते हैं समानता की, कैसी समानता? जिन देशों में वहां की महिलाओं को मात्र वस्तु समझा जाता हो वहां पर महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए आंदोलन शुरू हुए और हमारे देश में तो भव्यता की नींव पर टिकी एक संस्कृति है जिसमें महिला को पूज्य माना गया है। आप उन कुछ साल पुरानी अपरिपक्व संस्कृतियों के नजरिए से इस देश में महिला सशक्तीकरण के पैमाने तय करते हैं।

सबसे ऊपर दिए गए उदाहरण के आधार पर जो इस क्षेत्र(जिसे मैं राष्ट्र कहता हूं) के लिए उपयुक्त हो उसे स्वीकार करिए। सिर्फ स्वयं को बुद्धिजीवी दिखाने के लिए ऐसे काम मत करिए जिससे सोवियत संघ से भी बुरी हालत हो जाए। इस देश को आधुनिक विश्वगुरु बनाइए। एक साथ मिलकर काम करिए। देश की संकल्पना को साकार करिए और अपने ही विषय को वसुधैव कुटुंबकम के नजरिए से सिर्फ एक बार देखने की कोशिश करिए।

Monday, 15 February 2016

JNU के 'प्रगतिवादियों' को राष्ट्रवादी शिक्षा देनी होगी


आज वॉट्सऐप पर एक मित्र ने मेसेज किया कि अगर कश्मीर के लोग चाहते हैं कि वे अलग हो जाएं तो उनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए, उनको स्वतंत्र कर देना चाहिए ताकि वे अपने हिसाब से जी सकें। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से अपने उस मित्र को मेरे प्रिय बागी कवि विनीत चौहान की दो पंक्तियां समर्पित करना चाहता हूं-

अपनी इस केसर घाटी को इतना लहू दे चुके हैं हम,
अब तो जो भी फूल खिलेंगे, सारे फूल हमारे होंगे।


वैसे उन्होंने सच ही कहा कि कश्मीर का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि वह भारत से अलग हो जाए। ऐसे लोगों के लिए विनीत ने कहा है, ‘कश्मीर वह बेवफा औरत हो चला है जो खाता हमसे है, पहनता हमसे है, जीता हमसे है और नैन-मटक्के पड़ोसी के साथ करना चाहता है।’ मेरे उस मित्र की बात का जवाब आज मैं राजनीतिक तौर पर देने की स्थिति में नहीं हूं क्योंकि मैंने पिछले लोकसभा चुनाव में अपना वोट बीजेपी को दिया था। वही बीजेपी जो विपक्षी पार्टी होने के दौरान अफजल गुरु की फांसी के लिए आंदोलन करती थी, वही बीजेपी जिसके मातृ संगठन के द्वारा एक राष्ट्र, एक ध्वज, एक निशान और एक विधान के नारे सुनकर मुझे लगता था कि राष्ट्रीय एकात्मता के लिए कार्य करने वाला अन्य कोई संगठन हो ही नहीं सकता। उसी बीजेपी ने सत्ताकांक्षा के नशे में चूर होकर दो ध्वजों के नीचे खड़े होकर स्व. मुफ्ती साहब से हाथ मिलाया।

यह वही मुफ्ती साहब थे जिन्होंने घाटी में सफल चुनाव का श्रेय पाकिस्तान, सीमापार के तत्वों और हुर्रियत को दिया था। यह वही मुफ्ती साहब थे जिनके दिसंबर 1989 में भारत का गृहमंत्री बनते ही आतंकवादियों ने इन्हीं की बेटी रूबिया को अगवा कर लिया था, और फिर भारत सरकार को रूबिया की रिहाई के बदले पांच आतंकवादियों को जेल से छोड़ना पड़ा था।


यह वह दौर था जब घाटी में आतंकी गतिविधियां अपने चरम पर पहुंच गई थीं और आतंकवाद कश्मीरी पंडितों को वहां से खदेड़कर एक इस्लामिक गणतंत्र की मांग करने लगा था। लेकिन इस देश की सबसे बड़ी तथाकथित लोकतांत्रिक पार्टी ने इतिहास को भूलते हुए अपने सिद्धान्तों से समझौता कर लिया और सत्ता लोलुपता के चलते घाटी में गठबंधन कर कमल खिला दिया। जब ऐसा हुआ तो मुझे लगा कि बीजेपी का यह कदम उन पचास हजार से अधिक सैनिकों के मुंह पर तमाचा है जिन्होंने कश्मीर के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए आपने प्राणों की बाजी लगा दी।
दोस्तों, मैं आपको इस समस्या के बारे में बेहतर तरीके से बताने के लिए थोड़ा सा इतिहास में ले जाऊंगा। वैसे तो कश्मीर को हथियाने के लिए पाकिस्तान की ओर से लगातार कोशिश होती रहती हैं, लेकिन 1971 के बाद से पाकिस्तान इसे लेकर ज्यादा गंभीर हो गया है। पाकिस्तान ने जितने कश्मीर पर कब्जा कर रखा है उसे ही नहीं झेल पा रहा है तो और ज्यादा लेकर क्या करेगा? जब कश्मीर से स्वतंत्र होने की मांग उठती है तो यहां कुछ लोगों को लगता है कि भले ही कश्मीर स्वतंत्र हो जाए लेकिन पाकिस्तान के पास ना जाए। फिर लोग कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मांग करने लगते हैं।

ऐसे लोगों को मैं इतिहास का एक पृष्ठ याद दिलाना चाहता हूं, 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के एक हिस्से को पूर्ण स्वतंत्र बांग्लादेश बना दिया था, उसी तरह अब पाकिस्तान भारत के टुकड़े करना चाहता है। पाकिस्तान अब कश्मीर को अपना हिस्सा नहीं बनाना चाहता अपितु वह चाहता है कि कश्मीर अलग करके वह 1971 का बदला ले सके और इसी उद्देश्य के साथ पाकिस्तान से आतंकी भेजे जाते हैं जो भारत में ‘अलगाववादी’ कहे जाते हैं। भोले-भाले कश्मीरियों को बरगलाकर ये अपने साथ मिलाते हैं और कश्मीर में अलग झंडा लेकर भारत का विरोध करने के लिए तैयार खड़े रहते हैं। जब लोग यह कहते हैं कि कश्मीर में जनमत संग्रह कराना चाहिए तो मेरा उनसे कहना है कि अगर जनमत संग्रह कराना है तो कश्मीर में नहीं बल्कि पूरे भारत के लोगों से कराइए। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि तीन प्रदेशों के बराबर हम सिर्फ एक जम्मू कश्मीर पर खर्च करते हैं। इस देश के लोगों के द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे से कश्मीर का खर्च चलता है, ऐसे में कश्मीर का क्या करना है यह तय करने का अधिकार सिर्फ वहां रह रहे लोगों का नहीं बल्कि पूरे भारत का है।

जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो जम्मू-कश्मीर हमारे (यानी भारत के) साथ नहीं था। 20 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया और 24 अक्टूबर तक जम्मू कश्मीर की सेना ने पाकिस्तानी हमलावरों के आगे घुटने टेक दिए थे, पाकिस्तानी सेना श्रीनगर के नजदीक पहुंच गई थी। महाराजा हरि सिंह को लगा कि अब अगर पाकिस्तान को रोका नहीं गया तो ना सिर्फ जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखने का सपना टूट जाएगा बल्कि जम्मू-कश्मीर एक इस्लामिक राष्ट्र बन जाएगा। इस मामले में भारत की सेना कुछ कर नहीं सकती थी क्योंकि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं था। आखिरकार महाराजा हरि सिंह ने भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को पत्र लिखकर कहा कि ‘आप हमारी पाकिस्तान से रक्षा कीजिए, बदले में हम अपना पूरा का पूरा राज्य भारत में मिलाने को तैयार हैं।’ इसके बाद एक लिखित समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस विषय में आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के साथ महाराजा हरि सिंह ने एक शर्त भी रखी। हरि सिंह अपनी संस्कृति की विशिष्टता को बनाए रखना चाहते थे इसलिए उन्होंने जम्मू-कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा देने की शर्त रखी। कश्मीर के भारत राष्ट्र में विलय के बाद भारतीय सेना ने कार्रवाई शुरू की लेकिन वह उतना आसान नहीं था क्योंकि इस अवधि में वहां बर्फबारी होती है और पाकिस्तानी सेना काफी अन्दर तक घुस आई थी इसलिए भारतीय सेना को दो-ढाई महीने का समय लग गया। चूंकि कश्मीर की सेना की जगह अब भारतीय सेना आ गई थी और जम्मू-कश्मीर के राजा ने भारत के साथ विलय का समझौता भी कर लिया था तो पाकिस्तान को लगा कि जम्मू-कश्मीर पर कब्ज़ा करना अब मुश्किल है, इसलिए पाकिस्तान ने कूटनीतिक प्रयास शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने मान लिया था कि जम्मू-कश्मीर पर तो अब हम कब्ज़ा कर नहीं सकते लिहाजा जितना इलाका हमारे हाथ लगा है उसी को अपने आधीन कर लिया जाए। इसी उद्देश्य के साथ पाकिस्तान ने अमेरिका से संपर्क किया और समझौता कराने को कहा।

समझौता हुआ लेकिन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने एक गलती कर दी, नेहरु ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी, जबकि युद्धविराम का नियम है कि युद्धविराम का फैसला कैबिनेट की मीटिंग बुलाकर किया जाता है, पर नेहरु ने अकेले ही यह घोषणा ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से कर दी। जिसके बाद पाकिस्तान की सेना जहां तक थी वहां तक का पूरा क्षेत्र पाक अधिकृत कश्मीर बन गया। आज धारा 370 के आधार पर कश्मीर का झंडा अलग है, कश्मीर का कानून अलग है, कश्मीर का संविधान अलग है। फिर भी जब कोई सरकार कहती है कि कश्मीर, भारत का अभिन्न अंग है तो मुझे लगता है कि देश को धोखा देने की कोशिश की जा रही है।

आपको पता होगा कि भारत सरकार आपके लिए कोई भी खर्चा करती है तो उसका हिसाब कैग (Comptroller and Auditor General of India) रखता है लेकिन जम्मू-कश्मीर पर आज तक जितना भी खर्च हुआ है उसका हिसाब कैग के पास नहीं है। इस बारे में स्वर्गीय राजीव दीक्षित के द्वारा जब कैग से पूछा गया तो कैग ने कहा कि कश्मीर के खर्च का हिसाब जम्मू-कश्मीर की सरकार के पास है। उस जम्मू-कश्मीर से भारत को बाहर करने के लिए जब नारे लगाए जाते हैं तो पीड़ा होती है। यह पीड़ा इसलिए होती है क्योंकि जिस राजनीतिक पार्टी को मैंने व्यक्तिगत रूप से लोकसभा चुनाव में वोट दिया था उस राजनीतिक पार्टी के राज में एक साल में जितने पाकिस्तानी झंडे घाटी में लहराए गए उतने तो पिछले 68 सालों में नहीं लहराए गए। क्या आपने इतने भारत विरोधी नारे देश की राजधानी में पहले कभी सुने। लेकिन फिर भी थोड़ी सी संतुष्टि इस बात की है कि कम से कम इन भारत विरोधियों पर कुछ कार्रवाई तो हो रही है। खैर, बुद्धिजीवियों का गढ़ कहे जाने वाले जेएनयू के ‘प्रगतिवादी’ छात्रों को अब राष्ट्रवादी शिक्षा देनी होगी।


इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...