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Tuesday, 14 June 2016

बीजेपी वाले मोदी को 'जुमलेबाज' साबित करके मानेंगे

कुछ दिन पहले काशी (वाराणसी) जाने की योजना बनी। मन काफी उत्साहित था कि अपने देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में जाने का अवसर मिल रहा है। उम्मीद थी कि बनारस की तस्वीर पहले से काफी बेहतर हो गई होगी। मेरे साथ मेरे दो अन्य मित्र भी थे। जब लखनऊ में रहा करता था तो हर 4-5 महीने में बनारस जाना होता था। वहां पर मेरे कुछ रिश्तेदार भी रहते हैं तो इस नाते रुकना भी उनके घर पर ही होता था। लेकिन 3 साल पहले दिल्ली आने के बाद से बनारस जाना नहीं हुआ।
लोकसभा चुनाव के दौरान जब यह पता लगा कि बीजेपी के पीएम प्रत्याशी बनारस से चुनाव लड़ने वाले हैं तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि अब बनारस की तस्वीर बदल जाएगी। बनारस और बनारस की संस्कृति को नजदीक से समझने के लिए हमने तय किया कि इस बार किसी रिश्तेदार के घर पर न रुक कर किसी गेस्ट हाऊस में रुकेंगे ताकि किसी तरह की बंदिशें न रहें। रेलवे स्टेशन पर उतरकर ऑटो से ऑनलाइन बुक किए गए गेस्ट हाऊस की ओर जैसे ही मैंने बढ़ना शुरू किया, मेरी उम्मीदें भी टूटने लगीं। मैं जो कुछ भी देख रहा था वह हैरान कर देने वाला था।  स्टेशन से कुछ ही दूरी पर नगर निगम का एक कूड़ाघर था, लेकिन कूड़ा उसके बाहर पड़ा हुआ था। एक गाय उस कूड़े में पड़ी पॉलीथीन खा रही थी लेकिन उसे रोकने वाला कोई नहीं था।
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प्रतीकात्मक तस्वीर।
यूपी में वैसे तो इस तरह के दृश्य सामान्य हैं लेकिन जिस पार्टी ने अपने चुनाव में गौ रक्षा को मुद्दा बनाया हो, जो पार्टी गौमांस निषेध के लिए कानून की मांग करती हो और जो पार्टी गाय को मां कहती हो, उस पार्टी के बैनर पर प्रधानमंत्री के सिंहासन पर काबिज हुए व्यक्ति के निर्वाचन क्षेत्र में मैं ऐसे दृश्यों की अपेक्षा नहीं करता था। हालांकि मैं यह नहीं मानता कि इस तरह के दृश्यों के लिए सीधे प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहरा देना ठीक होगा, लेकिन यदि उस क्षेत्र में पार्षद से लेकर मेयर तक सभी उस तथाकथित गौभक्त राजनीतिक दल के हों तो पार्टी की मूल विचारधारा तथा कार्यपद्धति में प्रदर्शित होने वाले अंतर पर एक सवाल तो बनता ही है। गाय को खाने की बात करने वालों को तो यह गौ भक्त पार्टी भारतीय संस्कृति का विरोधी करार देती है लेकिन जहां गाय की मौत को रोक सकती है वहां मूक दर्शक बनकर बैठी है।
खैर, यह एकमात्र विषय नहीं था जिससे काशी में मेरा मन दुखी हुआ। इसके अलावा भी काशी में कुछ ऐसा दिखा जिसकी मैंने कल्पना नहीं की थी। मेरा गेस्ट हाउस मणकर्णिका घाट के पास था। जो लोग वहां गए होंगे उनको पता होगा कि उस घाट पर जाने के किए एक पतली सी गली से लगभग 2 किमी पैदल जाना होता है। यह एक ऐसा घाट है जहां पर अंतिम संस्कार की अग्नि कभी ठंडी नहीं होती, पूरे देश से इस घाट पर अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए आते हैं।काशी लेकिन इस घाट पर जाने के लिए जो रास्ता है वह इतना बुरा है कि यदि बारिश हो जाए तो वहां से निकलना मुश्किल हो जाएगा। गंगा नदी में आज भी उसी तरह से शव (लाशें) बहकर आती हैं जैसे पहले आती थीं, अगर उनको रोकना संभव नहीं है तो गंगा संरक्षण मंत्रालय जैसी खानापूर्ती करने की क्या आवश्यकता है? दशाश्वमेध घाट और अस्सी घाट जैसे घाटों पर अच्छा काम हुआ है लेकिन क्या बनारस को उसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार से दूर ले जाकर मात्र पर्यटन स्थल बनाना है।
काशी की आत्मा गलियों में बसती है, हर रोज कड़ी धूप में महामूरगंज रोड पर 2 किलोमीटर की दूरी तय करने में कम से कम 1 घंटा लगता है। क्या इस समस्या से समाधान की आवश्यकता नहीं है? जब पीएम मोदी जी जन-धन योजना लेकर आए तो मुझे व्यक्तिगत रूप से लगा कि अब हर एक व्यक्ति की पहुंच बैंक तक होगी। जब कोई नकारात्मक प्रवृत्ति वाला व्यक्ति मुझसे कहता था कि मोदी सरकार ने अब तक कुछ भी अच्छा किया है क्या? तो सबसे पहले मैं स्वच्छ भारत अभियान और जन-धन योजना का ही नाम लेता था क्योंकि मुझे लगता था कि इन दोनों का सीधा फायदा एक गांव में रहने वाले व्यक्ति को होगा। लेकिन आज अपनी काशी यात्रा के बाद मैं यह कह सकता हूं कि यह मेरा भ्रम था। आप कल्पना कर सकते हैं कि काशी, जहां मिनी पीएमओ बना हुआ है वहां पर 13 में से 12 एटीएम कैशलेस पड़े हुए हैं। ऐसे में एक सीधा सा और सामान्य सा सवाल है कि एक गरीब आदमी आखिर क्यों बैंक में अपना अकाउंट खुलवाए।
एक गरीब आदमी हर महीने किसी तरह से 500 रुपए बचाकर अकाउंट में जमा करता है कि अब तो एटीएम कार्ड है, कभी भी निकाल लूंगा, लेकिन जब उसका बेटा बीमार होता है तो उसे अपने 500 रुपए बनारस की सड़कों पर घूमते हुए एटीएम मशीन में कैश चेक करने में खर्च करने पड़ते है। वह सिर्फ 500 रुपए खर्च नहीं कर रहा होता है बल्कि अपने एक महीने की पूरी बचत खर्च कर रहा होता है। यह बात मैं किसी स्वकल्पित उदाहरण स्वरूप नहीं लिख रहा अपितु यह काशी के एक चाय वाले का अनुभव है। शायद मैं उसकी इस बात पर इतनी आसानी से विश्वास नहीं करता लेकिन मैंने खुद ऐसा ही कुछ झेला है तो ऐसे में संभव है कि लोगों के साथ इससे भी अधिक बुरा होता हो।
काशी को मोक्ष की नगरी माना जाता है। मैं यह भी मानता हूं कि देश के प्रधान के पास इतना समय नहीं होता कि वह मात्र अपने निर्वाचन क्षेत्र की चिंता करता रहे लेकिन क्या सांसद प्रतिनिधि, मिनी पीएमओ में काम करने वाले लोगों, मेयर, विधायकों और पार्षदों को इस बात का भान नहीं है कि पूरे विश्व से लोग इस जगह पर घूमने के लिए आते हैं। क्या यहां की व्यवस्था को देखकर उन देशी-विदेशी पर्यटकों के माध्यम से विश्व स्तर पर भारत के पीएम की इच्छा शक्ति के विषय में नकारात्मक संदेश नहीं जाता होगा? मुझे लगता है कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों को इस सवाल पर चिंतन की आवश्यकता है। कहीं उनकी कामचोरी से हमारे पीएम सच में ‘जुमलेबाज’ न साबित हो जाएं।

Tuesday, 26 April 2016

'ऑड-ईवन' पर देश के मन की बात सुनिए मोदीजी!

किसी ने सच ही कहा है कि सत्ता का नशा हर तरह के नियम, कायदे और कानून भुला देता है। कुछ ऐसा ही हाल वर्तमान समय में भारत के नेताओं का हो चुका है।kejriwal देश की राजधानी में जब हमारे ‘माननीय’ ही नियमों को तोड़ने से परहेज नहीं करते तो एक सामान्य व्यक्ति से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह नियमों का पालन करेगा? कल कुछ सांसदों ने ऑड-ईवन नियम तोड़ा। किसी ने नियम तोड़कर माफी मांगी तो किसी ने दिल्ली के सीएम केजरीवाल को मनोरोगी की संज्ञा दे दी। क्या राजनीति ऐसी होनी चाहिए? क्या अपनी विपक्षी पार्टी को नीचा दिखाने का यही तरीका होना चाहिए? क्या देश और समाज हित में कोई प्रयोग किया जा रहा है तो उस प्रयोग का समर्थन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर नहीं किया जाना चाहिए?
दिल्ली प्रदेश में बीजेपी, आज विपक्ष की पार्टी है। विपक्ष का काम सत्ता का विरोध करना नहीं होता है बल्कि विपक्ष का काम सत्ता को समाज हित में नए रास्ते दिखाने का होता है। विपक्ष का काम सत्ता को गिराने का नहीं होता बल्कि विपक्ष का काम होता है कि जब सत्ता लड़खड़ाए, तो विपक्ष उसे एक नया विकल्प दे। पीएम नरेन्द्र मोदी ने जनधन योजना के रूप में इसी प्रकार का एक प्रयोग किया था, वह प्रयोग सफल भी माना जा सकता है। लेकिन एक बार कल्पना करिए कि यदि 31 प्रतिशत वोट पाकर सरकार में आई एनडीए की सभी योजनाओं-परियोजनाओं का विरोध अन्य सभी विपक्षी पार्टियां करने लगें तो क्या ये योजनाएं सफल होंगी। दिल्ली में ऑड-ईवन एक प्रयोग है, हो सकता है कि इससे कोई खास फर्क न पड़े, लेकिन क्या इस परिकल्पना के चलते इस प्रयोग को किया ही न जाए! जब कई देशों में इस नियम के सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले हों तब मात्र अहंकारवश दलगत राजनीति से प्रेरित होकर नियमों का उल्लंघन करना बीजेपी जैसी पार्टियों को शोभा नहीं देता।
vijay goel
ऑड-ईवन का विरोध कर नियम तोड़ते बीजेपी के विजय गोयल।
देश के प्रधान ने जब लोकसभा में कहा, ‘हम (सरकार) चाहते हैं कि विपक्ष हमारे साथ मिलकर काम करे।’ तो मुझे लगा कि चलो कोई तो है जो पक्ष-विपक्ष के सामंजस्य के साथ कुछ अच्छा करना चाहता है। लेकिन यही अपेक्षा एक विपक्ष के रूप में इस देश को बीजेपी से भी है। संभव है कि नियम तोड़ने वाले हमारे ‘माननीयों’ को ऑड-ईवन के विषय में जानकारी ना हो और वे गलती से गलत नंबर वाली गाड़ी ले आए हों लेकिन क्या नैशनल मीडिया पर छाए रहने वाले एक विषय के बारे में सांसदों को जानकारी न होना, उचित है? कितना अच्छा होता यदि हमारे पीएम साहब कम से कम एनडीए सांसदों को ऑड-ईवन का पालन करने के लिए सार्वजनिक रूप से कहते।
बीजेपी के दृष्टिकोण से केजरीवाल में लाख बुराइयां होंगी लेकिन इस देश के राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि कोई भी सरकार जब कोई नियम अथवा योजना लाती है, तो समाज हित के लिए ही लाती है। दिल्ली की जनता ने ऑड-ईवन को स्वीकार किया है ऐसे में किसी के द्वारा भी बिना किसी आधार के इसका विरोध करना राजनीति के निम्नतम स्तर को दर्शाता है। अच्छे उद्देश्य के साथ किए जा रहे प्रयोग पर देश के सभी दल एक होकर काम करें तभी ‘भारत माता’ की जय होगी। किसी से जबरदस्ती एक नारा लगवाकर मां भारती की ‘जय’ नहीं हो सकती।
Modiएक सकारात्मक प्रयोग पर सभी का समर्थन मिलना, एक नई तरह की राजनीति का जन्म होगा। सत्ता, समाज कार्य का साधन है, यदि उसे साध्य मान लिया जाएगा तो निश्चित ही समाज हित नहीं हो सकता। साध्य तो समाज हित ही होना चाहिए। देश की राजनीति में परिवर्तन परम आवश्यक है। देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक सिंहासन पर बैठने वाले व्यक्ति का दायित्व है कि वह इस राजनीति में परिवर्तन के लिए नींव पूजन करे। नए प्रयोग में नुकसान हो सकते हैं लेकिन उन नुकसानों के डर के चलते यदि प्रयोग न किए गए तो देश की हालत बद से बदतर हो जाएगी और भविष्य इसके लिए सभी नकारात्मक प्रवृत्ति वाले, दलगत राजनीति से प्रेरित नेताओं को ही अपराधी मानेगा।

Wednesday, 24 February 2016

इस संस्कृति में रामभक्ति करें या न करें, लेकिन...

पिछले कुछ समय से हमारा देश अजीब दौर से गुजर रहा है। इस देश के हालात ऐसे हो गए हैं कि वोट के सौदागर सत्ता के सिंहासन पर बैठने के लिए नीचता की पराकाष्ठा पार करने से भी गुरेज नहीं करते। देश की इस स्थिति के लिए सिर्फ इस देश के राजनेता ही जिम्मेदार नहीं नहीं हैं अपितु इसके लिए कहीं ना कहीं हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हम आज सामने वाले व्यक्ति को उसके तर्कों के आधार पर नहीं अपितु उसके तर्कों से सहमति रखने वाली राजनीतिक पार्टियों से जोड़ देते हैं। आज हम जिसे भी चाहते हैं उसे अपनी तरह का देखना चाहते हैं, आज हमारी स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि अगर हम कहते हैं कि आइए सब एक हो जाइए तो साथ में शर्त लगा देते हैं कि एक तब होंगे जब आप हमारी तरह से सोचने लगेंगे। इसको अगर एक सामान्य पंक्ति में कहें तो हम आज ‘एकता’ नहीं अपितु ‘एकरूपता’ चाहते हैं। इस एकरूपता की विचारधारा का प्रभाव सभी तरह की विचारधाराओं पर है।

कोई कहता है कि देश के मजदूरों एक हो जाओ तो वह साथ में यह भी कहने लगता है कि आपको एक होने के लिए ‘राम’ को मानना बंद करना होगा। अगर कोई यह कहता है कि इस देश के सनातनियों एक हो जाओ तो साथ में अप्रत्यक्ष शर्त लगा दी जाती है कि इसके लिए आपको मुसलमानों का विरोध करना होगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम जैसे हैं उसी तरह रहकर मात्र भारतीयता के नाम पर एक हो जाएं। इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश में कुछ लोगों को इस बात पर शर्म आती है कि हमारे लोकतांत्रिक मंदिर, यानी संसद पर हमला करके इस देश की एकात्मता पर प्रहार करने वाले अफजल गुरु नाम के आतंकी को फांसी पर लटका दिया जाता है।

इन शर्मीले लोगों के साथ-साथ एक अन्य वर्ग कहता है कि अगर वह हमला सफल हो जाता तो क्या होता? कुछ भ्रष्ट लोग ही तो मरते। मैं उनको बताना चाहता हूं कि इस देश की संसद में कोई व्यक्ति नहीं बैठता बल्कि इस देश की संसद में जनमत बैठता है। वह जनमत जिसे मैं और आप चुनते हैं, आपने जिसको अपना वोट दिया हो भले ही वह व्यक्ति उस संसद में ना पहुंचा हो लेकिन किसी अन्य की पसंद तो वहां बैठती है। सिर्फ मैं और मेरी विचारधारा, कैसी समानता है आपकी? जो काम आपके मन-मुताबिक ना हो उस पर आपको शर्म आने लगती है, कैसी मानवता है आपकी? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में जब छात्रों के वर्ग ने कहा कि ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा है…’ मुझे समझ नहीं आया कि यहां कातिल कौन है? देश का उच्चतम न्यायालय, देश का राष्ट्रपति, अफजल की फांसी के लिए अपने शहीद पति को मरणोपरांत दिए गए शौर्यता के प्रमाण पत्रों को लौटाने की बात करने वाली वे वीरांगनाएं, वे पुलिस वाले जिन्होंने अफजल को पकड़ा अथवा देश का हर एक वह नागरिक जो सड़क से लेकर संसद तक अफजल के कुकृत्य के लिए फांसी की मांग कर रहा था?

हो सकता है कि इन शर्मीले लोगों का अफजल या उसकी विचारधारा से कोई परिवारिक अथवा व्यक्तिगत संबन्ध हो इसलिए इन्हें अफजल के तथाकथित कातिलों के जिंदा होने पर शर्म आती हो, मुझे भी शर्म आती है लेकिन इस विषय को लेकर नहीं बल्कि कुछ अन्य विषयों को लेकर… अगर आप इससे आगे पढ़कर यह जानना चाहते हैं कि मुझे किन विषयों को लेकर शर्म आती है तो सबसे पहले आपने जो राजनीतिक विचारधाराओं के दुशाले ओढ़कर रखें हैं उन्हें उतार फेकें। इस लेख को आगे पढ़ने से पहले आप अपने ह्दय से अपनी प्रिय राजनीतिक पार्टी के झंडे को नीचे करके सिर्फ तिरंगे को स्थान दें और फिर आगे पढ़ें…

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश की एक केन्द्रीय मंत्री निरंजन ज्योति, सत्ता के मद में इस कदर चूर हो जाती हैं कि वह मान लेती हैं कि उसकी राजनीतिक पार्टी के पक्ष में मतदान करने वाले लोग ‘रामजादे’ हैं और उसके विपक्ष में मतदान न करने वाले लोग ‘हरामजादे’ हैं। क्या उनके कहने का अर्थ यह था कि 2014 में उनकी पार्टी को वोट देने वाले 31% लोग रामजादे तथा अन्य 69% लोग हरामजादे थे? अगर आज सबसे अधिक वोट पाने वाली पार्टी को देश की सरकार मान लिया जाता है तो क्या उसी आधार पर यह भी मान लिया जाए कि यह देश हरामजादों का है (बहुमत के आधार पर)।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में एक प्रदेश की सत्ता का संचालन करने वाली पार्टी, टीएमसी के नेता तमस पॉल अपने प्रदेश की एक प्रमुख विपक्षी पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं को रेप करवाने की धमकी दे डालते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश की जनता कुछ उम्मीदों के साथ मात्र वाकपटुता को देखकर एक व्यक्ति को इस देश की संसद का नेतृत्व करने के लिए भेजती है और वह व्यक्ति पार्टी स्वार्थ में लिप्त होकर विरोधियों को नक्सली करार देते हुए जंगल जाने की सलाह दे देता है। देश का प्रधान यहीं पर नहीं रुकता वह उस समय के सबसे लोकप्रिय युवा राजनेता अरविंद केजरीवाल को पाकिस्तान का एजेंट करार देता है।

मुझे शर्म तब आती है जब ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ वाली संस्कृति को मानने वाले देश में एक बेटी ‘दामिनी’ सड़क पर तड़पती रहती है और कोई उसे उठाकर हॉस्पिटल तक ले जाने की कोशिश नहीं करता।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश के एक प्रदेश का एक पूर्व मुख्यमंत्री तथा केन्द्रीय सरकार का पूर्व मंत्री दिग्विजय सिंह एक महिला सांसद के लिए ‘100 टका टंच माल’ जैसी उपमाओं का प्रयोग करता है।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में हजारों सेवा प्रकल्प चलाने वाले विश्व के सबसे बड़े गैर राजनीतिक संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकी और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं को गुंडा कहा जाता है।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का एक नेता गिरिराज सिंह कहता है कि जो उसके ‘प्रधान’ का विरोध कर रहे हैं उनका स्थान पाकिस्तान में है भारत में नहीं। इतना ही नहीं वह महाशय अशफ़ाक उल्ला खां और वीर अब्दुल हमीद के देश में आतंक फैलाने वालों को एक समुदाय विशेष से जोड़कर पूरे समुदाय को आतंकी घोषित करने की कोशिश करते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का सर्वोच्च नेता कहता है कि बलात्कार करने वाले लड़कों को फांसी नहीं देनी चाहिए, लड़कों से गलती हो जाती है।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार, जिसने इस देश में सबसे अधिक शासन किया है, उसकी सर्वोच्च नेता अपने देश के बेटों पर भरोसा न करके विदेश इलाज कराने जाती हैं और इस देश से उम्मीद करती हैं कि हम उनके बेटे के भरोसे देश छोड़ दें।

मुझे शर्म तब आती है जब जाति व्यवस्था को पानी पी-पी कर कोसने वाले वामपंथी मात्र चर्चाओं में रहने के लिए एक छात्र को दलित बनाकर जातिगत राजनीति करने लगते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में चंद राष्ट्रद्रोहियों की वजह से देश को कई नेता, अभिनेता, पत्रकार, शिक्षाविद् देने वाले विश्वविद्यालय को आतंक का अड्डा करार दिया जाता है।

मुझे शर्म तब आती है जब किसी ‘दल’ के लोग संस्कृति का झंडा लेकर हिंसा का रास्ता अपनाते हैं। इतना ही नहीं संस्कृति के ये तथाकथित ठेकेदार अपने शहीदों की पुण्यतिथि और उन शहीदों से जुड़े तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने से नहीं हिचकते। अपनी सांस्कृतिक भव्यता को समझाने की क्षमता तो इनमें रही नहीं इसलिए लाठी-डंडे और झूठे तथ्यों का सहारा लेते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब कुछ लोग देश के प्रधान के लिए ‘नीम का पत्ता कड़वा है, नरेन्द्र मोदी भ… है’ जैसी बातें बोलकर राज-द्रोह करते हैं और उन पर पुलिस जमकर लाठियां बरसाती है लेकिन जब कुछ लोग एक शैक्षिक संस्थान के अंदर ‘भारत तेरी बर्बादी तक….’ जैसे नारे लगाते हैं तो हमारे देश की वीर पुलिस आई-कार्ड देखने लगती है। किसकी नौकरी करते हैं ये पुलिस वाले… राजा की या राष्ट्र की…

मुझे शर्म तब आती है जब हत्यारों और बलात्कारियों को पकड़ने में नाकाम रहने वाली पुलिस एक नेता की भैंस को चोरी करने वाले को पकड़ लेती है।

मुझे शर्म तब आती है जब एक कामचोर कर्मचारी, एक टैक्स चोर और सड़क पर बिना घबराए सिग्नल तोड़ने वाला व्यक्ति पूछता है कि पीएम साहब अच्छे दिन कब लाएंगे?

मुझे शर्म तब आती है जब इतने सारे विषयों के होते हुए कोई एक आतंकी की फांसी को गलत बताते हुए उसके मानवाधिकार की बात करता है। जिस आतंकी में मानवता नाम की चीज ही नहीं है उसके लिए किस आधार पर मानवाधिकार की बातें की जाती हैं यह मेरी समझ से परे है। एक बात और इतिहास के द्वारा बताना चाहता हूं। शायद कुछ लोगों का उसमें विश्वास ना हो लेकिन मेरा है, अपने विश्वास के आधार पर एक अतिमहत्वपूर्ण विषय की ओर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।

दोस्तो, विभीषण रावण के राज्य में रहने वाला एक ऐसा व्यक्ति था जिसके सहयोग के बिना श्रीराम को सीता नहीं मिलतीं, जिनके सहयोग के बिना लक्ष्मण जीवित नहीं बचते, जिसके सहयोग के बिना रावण के राज्य की गोपनीय बातें हनुमान-श्रीराम को पता नहीं लगतीं। एक लाइन में कहें तो ‘श्रीराम का आदर्श भक्त’… इतना कुछ होते हुए भी आज उस घटना के हजारों सालों के बाद भी किसी पिता ने अपने बेटे का नाम ‘विभीषण’ नहीं रखा। जानते हैं क्यों?

क्योंकि इस संस्कृति में आप राम भक्ति करें या ना करें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर राष्ट्रभक्ति नहीं की तो कभी माफ नहीं किए जाएंगे।

Tuesday, 23 February 2016

कैसी मानवीयता है आपकी, यह दोहरा चरित्र क्यों?

आज वामपंथ को लेकर मेरे मन में कुछ सवाल उत्पन्न हुए। मुझे उन प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे इसी अपेक्षा के साथ इस ब्लॉग को लिख रहा हूं। उन सवालों को आपके समझ रखने से पहले मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि मुझे वामपंथ के मूल विचार से कोई आपत्ति नहीं है अपितु मुझे तो लगता है कि जहां से वामपंथ आया है वहां के लिए वह सर्वश्रेष्ठ था। अपने विषय को स्पष्ट करने से पहले एक उदाहरण देता हूं। मान लीजिए आप तमिलनाडु में रहते हैं जहां 12 महीने गर्मी रहती है, उस मौसम के हिसाब से आप लुंगी या कोई हल्का कपड़ा पहनते हैं लेकिन फिर किसी कारणवश आप जम्मू-कश्मीर में रहने के लिए चले जाते हैं। क्या आप वहां पर भी सिर्फ इस तर्क के साथ कि अरे मैं तो तमिलनाडु का हूं, वहां मैंने हमेशा लुंगी पहनी है, इसलिए यहां भी वही पहनूंगा कहकर वही पुराने कपड़े पहनकर जी सकते हैं?

आपका जवाब ना ही होगा, क्योंकि आपको पता है कि वातावरण, परिस्थिति और परिवेश के अनुसार परिवर्तित होना ही समझदारी है।

यही स्थिति आज वामपंथ की है। आधुनिक वामपंथ के जनक कार्ल मार्क्स ने कहा था कि समाज में दो ही वर्ग होते हैं: पूंजीपति और सर्वहारा। कार्ल मार्क्स जहां के थे वहां वास्तव में दो ही वर्ग थे, एक शोषक यानि पूंजीपति और दूसरा शोषित यानी सर्वहारा। लेकिन क्या भारत में भी दो ही वर्ग रहे हैं? हो सकता है भारतीय इतिहास को सिरे से नकार देने वाले वामपंथी यहां भी कह दें कि भारत में भी यही दो वर्ग थे लेकिन जिसने सकारात्मक दृष्टि के, बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए भारतीय इतिहास का अध्ययन किया है, उसे पता होगा कि भारत में प्रत्येक व्यक्ति का एक विशिष्ट वर्ग था। हर एक व्यक्ति स्वयं में पूर्ण था लेकिन फिर भी एक दूसरे पर आश्रित था। यही भारत की सामाजिक व्यवस्था थी। अगर इसी के साथ हम वामपंथी इतिहास पर नजर डालें तो हमें पता लगेगा कि मार्क्‍सवाद को बड़े पैमाने पर व्यवहार में उतारने का एक बड़ा प्रयास माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीन में किया गया, जिसके फलस्वरूप 1949 में चीनी लोक गणराज्य की स्थापना हुई। आरंभ में साम्यवादी चीन को समस्त प्रकार की सोवियत सहायता प्राप्त हुई। ऐसा लगा कि इतनी विशाल आबादी और क्षेत्र वाले ये दोनों साम्यवादी देश पूंजीवादी विश्व के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर विश्व के अन्य देशों में साम्यवाद का प्रसार करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

1960 के दशक के आरंभ में दोनों देशों के बीच वैचारिक मतभेद उभरने लगे। इसका एक कारण दोनों के अलग-अलग राष्ट्रीय हित और उसके अनुसार मार्क्‍सवाद की अलग-अलग व्याख्याएं थीं। इसके साथ एक प्रमुख कारण यह था कि निकिता ख्रुश्चेव के नेतृत्व में सोवियत संघ पूंजीवाद के साथ ‘शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व’ की नीति अपनाना चाहता था जबकि माओ पूंजीवादी देशों के प्रति युद्धरत रहने पर बल दे रहे थे। वामपंथ वहां स्थायित्व नहीं ले पाया।

1920 में जब वामपंथ ने भारत में पैर रखा तो उसके सिद्धान्त वही थे जो उसका मूल आधार थे, लेकिन चूंकि भारत के परिपेक्ष्य में यहां का परिवेश वामपंथ को अपना चुके अन्य देशों की तरह नहीं था इस नाते यह तय था कि इससे भारत का नुकसान ही होगा। बिना परिस्थितियों का अध्ययन और विश्लेषण किए वामपंथ भारत में जड़ें जमाने की कोशिश करने लगा। जिस भारतीय संस्कृति को धर्म से जोड़कर कहा गया कि ‘धर्म अफीम की तरह होता है’ उस संस्कृति का चिंतन ही नहीं किया गया। यानी जिस स्थान पर रहकर वहां के तथाकथित धर्म को अफीम बताया गया, उन पूजा पद्धतियों में बुराइयां रही थीं। वहां धर्म के नाम पर शोषण किया जाता था। लेकिन इस भारत की स्थिति तो ऐसी नहीं थी। मैं मानता हूं कि भारत में भी एक लंबे समय तक कुछ वर्गों को दबाने की भरसक कोशिशें की गई हैं लेकिन अगर हम मूल भारतीय संस्कृति के बारे में सोचे तो उसमें कोई कमी नहीं। पूर्ण समानता आधारित संस्कृति को लाने के लिए आपको भारत की शिक्षा देनी होगी। अगर आप भारत में जर्मनी या रूस की शिक्षा देंगे तो यह संभव ही नहीं है कि इस देश में शांति बनी रहेगी।

आप ईश्वर को नहीं मानते, हमें कोई समस्या नहीं, आपका पूजा पद्दतियों में विश्वास नहीं, हमें कोई समस्या नहीं, आप धर्म को भी नहीं मानते फिर भी कोई समस्या नहीं लेकिन किसी एक विषय पर तो आपको हमारे साथ खड़ा होना होगा या किसी एक विषय पर तो हमें अपने साथ खड़ा कर लीजिए। आपसे हम कहते हैं कि ‘देश’ या ‘राष्ट्र’ के विषय पर ही आप हमारे साथ आ जाइए लेकिन आप नहीं आते। चलिए हम आपसे पूछते हैं कि आखिर आप किस विषय पर हमें अपने साथ लेना चाहते हैं? हमें पता है आपका जवाब ‘मानवता’ होगा, लेकिन यह कैसी मानवता है कि आप एक कलबुर्गी की हत्या पर अवार्ड वापसी का दौर शुरू कर देते हैं लेकिन देश के दिल, दिल्ली में खड़ी देश की संसद पर हमला करके दिल्ली पुलिस के पांच जवानों, सीआरपीएफ की एक महिला कर्मी और 2 सुरक्षा गार्डों के हत्यारे के समर्थन में नारे लगाते हैं। वहीं, जब एक स्वयंसेवक की खुलेआम आपकी विचारधारा के लोग उसके परिवार के सामने हत्या कर देते हैं तब आपके मुंह में दही जम जाता है। कैसी मानवीयता है आपकी? यह दोहरा चरित्र क्यों?

मैं निंदा करता हूं किसी भी व्यक्ति की हत्या की, चाहे वह किसी भी विचारधारा का अनुपालक हो लेकिन महोदय एक वामपंथी साहित्यकार की हत्या पर आप देश के उस पीएम से इस्तीफा मांगने लगते हैं जिसे इस देश की जनता ने चुन कर भेजा है, एक इखलाक की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या पर आप पूरे देश को असहिष्णु करार देते हैं परंतु क्या एक ऐसे व्यक्ति के लिए आपका मानवाधिकार नहीं है, जिसे आपकी विचारधारा से ग्रसित लोगों से समर्थन प्राप्त नक्सलियों के द्वारा, वनवासियों के आधुनिकीकरण में प्रयासरत, शिक्षा का विस्तार कर रहे वनवासी कल्याण आश्रम के पूर्णकालिक को मार दिया जाता है। जल-जंगल-जमीन के लिए तथाकथित लड़ाई लड़ने वाले, हमारे सुरक्षा जवानों की हत्या करने वाले नक्सलियों की आप वकालत करने लगते हैं। आप कहते हैं कि वे अगर अपनी जमीन के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं तो बुराई क्या है? लेकिन आपकी ये दलीलें कश्मीर के मुद्दे पर कहां चली जाती हैं? आप अपनी जमीन के लिए लड़ाई लड़ें तो क्रांतिकारी और अगर हम अपनी जमीन को बचाए रखने की बात करें अपने लिए नहीं आम जनता के लिए तो असहिष्णु हो जाते हैं। आप बात करते हैं समानता की, कैसी समानता? जिन देशों में वहां की महिलाओं को मात्र वस्तु समझा जाता हो वहां पर महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए आंदोलन शुरू हुए और हमारे देश में तो भव्यता की नींव पर टिकी एक संस्कृति है जिसमें महिला को पूज्य माना गया है। आप उन कुछ साल पुरानी अपरिपक्व संस्कृतियों के नजरिए से इस देश में महिला सशक्तीकरण के पैमाने तय करते हैं।

सबसे ऊपर दिए गए उदाहरण के आधार पर जो इस क्षेत्र(जिसे मैं राष्ट्र कहता हूं) के लिए उपयुक्त हो उसे स्वीकार करिए। सिर्फ स्वयं को बुद्धिजीवी दिखाने के लिए ऐसे काम मत करिए जिससे सोवियत संघ से भी बुरी हालत हो जाए। इस देश को आधुनिक विश्वगुरु बनाइए। एक साथ मिलकर काम करिए। देश की संकल्पना को साकार करिए और अपने ही विषय को वसुधैव कुटुंबकम के नजरिए से सिर्फ एक बार देखने की कोशिश करिए।

Friday, 8 January 2016

अब बुद्ध को युद्ध करना ही होगा...



कुछ ही दिन पहले जब आतंक ने मां भारती के धवल दामन पर काला धब्बा लगाने की कोशिश की तो इस देश के बेटों ने पठानकोट में अभूतपूर्व शौर्य गढ़ते हुए यह बता दिया कि इस देश के बेटे अपनी मां की छाती पर चढ़कर अशांति फैलाने का कुत्सित प्रयास करने वालों का सामना करने के लिए हर पल तैयार खड़े हैं। इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद आज अवकाश होने के कारण मैंने सोचा कि एक बार उस समय के बारे में भी पढ़ा जाए जब हम अंग्रेजी सल्तनत के अधीन थे। मेरे मन में दुःख के बीच यह उत्सुकता भी थी कि उस दौर के सैनिकों (क्रांतिकारियों) के मन में परिवार और मां भारती के प्रति कैसे विचार रहे होंगे। उस समय के विषय में अध्ययन करने के दौरान दो प्रसंग ऐसे सामने आए जिनको पढ़कर इस ब्लॉग को लिखने का विचार आया। उन दोनों प्रसंगों को आपसे साझा कर रहा हूं:

प्रथम प्रसंग: 85 साल का एक बूढ़ा शेर, बहादुर शाह ज़फर अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था तो अंग्रेजों ने दो पंक्तियां लिखवाकर भेजीं कि,
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

तो बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर दो पंक्तियां जवाब के तौर पर लिखीं:
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्थान की।।


दूसरा प्रसंगः जब पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां को फांसी की सजा सुनाई गई तो जेल में अशफ़ाक की आखों से आंसू की दो बूंदें टपक गईं। कहीं से यह जानकारी बिस्मिल को मिली तो बिस्मिल ने पत्र के माध्यम से अशफ़ाक से पूछा, 'अशफ़ाक, फांसी से डर गए क्या?' तो अशफ़ाक ने बिस्मिल को उत्तर देते हुए लिखा, 'बिस्मिल, रोता इसलिए नहीं कि मैं मरने वाला हूं, मैं इस लिए रोता हूं कि तुमने सनातन धर्म में जन्म लिया है, तुम्हारे धर्म की मान्यता है कि तुम्हारे यहां पुनर्जन्म होता है, तुम मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए कई बार जन्म लेकर संघर्ष कर सकते हो। लेकिन मेरे मजहब की मान्यता है कि पुनर्जन्म नहीं होता होता इसलिए मैं मां भारती के लिए अपना एक जीवन ही कुर्बान कर पाऊंगा।

इन दो प्रसंगों के माध्यम से मैं वह समय याद दिलाना चाहता हूं जब इस देश, इस मातृभूमि के लिए स्वयं को न्योछावर कर देने वाले मात्र राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मानते थे। उन क्रांतिकारियों को पता था कि देश की सत्ता का संचालन जिनके हाथों में है, उन फिरंगियों लिए उनकी भावनाओं का कोई महत्व नहीं है। लेकिन इस दौर में जब हम पूरी दुनिया के सामने एक स्वस्थ लोकतंत्र रखने का दावा करते हैं, ऐसे में क्या वास्तव में देश का सैनिक इस बात को स्वीकार कर सकता है कि यदि वह अपनी जान, इस राष्ट्र की रक्षा के लिए कुर्बान करेगा तो उसके बाद इस देश की सत्ता के सिंहासन पर बैठे वे लोग, जिनको वहां बैठाने में उस सैनिक का भी योगदान है, क्या वे आतंक को रोकने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ आतंकियों से निपटने की जिम्मेदारी सेना को दे पाएंगे?

हमारे देश के एक बड़े नेता और केन्द्र की सरकार के मंत्री अरुण जेटली जी ने प्रेस वार्ता के दौरान दो दिन पहले कहा कि पठानकोट ऑपरेशन में अधिक समय इस लिए लग गया क्यों कि हम आतंकियों को जिंदा पकड़ना चाहते थे। अरे जेटली जी, एक कसाब पर इस देश की तत्कालीन सरकार ने 3.5 लाख प्रतिदिन के हिसाब से 70 करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर दिए। उस दौरान तो आप बड़े गर्व से कहते थे कि देश पर हमला करने वालों को तुरंत मार देना चाहिए। शायद अपने इसी बदले हुए रवैये को आप सत्ता की जिम्मेदारी कहें लेकिन मैं इसे इच्छा शक्ति की नपुंसकता मानता हूं। इस देश के सैनिक चाहते तो उन आतंकियों को जिंदा भी पकड़ सकते थे, लेकिन उन्हें पता था कि अगर जिंदा पकड़ लिया तो आप उन आतंकियों के लिए एक विशिष्ट बैरक के साथ तैयार खड़े हैं। साहब, उन्होंने नेताओं की तरह दलाली के पैसे से खरीदी गई खद्दर नहीं पहनी हैं, वे मां भारती की रक्षा के लिए तैयार वर्दी पहनते हैं, उन्हें यह पता होता है कि किस पर गोली चलानी है और किसे जीवित छोड़ना है। लाल किले से आतंक के खिलाफ आग की भाषा बोलना बहुत आसान होता है लेकिन उस आतंक के खिलाफ आग उगलने का काम इस देश के सैनिकों की बन्दूकें करती हैं।

6 आतंकियों को मारने में हमने इस देश के 7 जांबाज जवानों को खो दिया। कल्पना करिए उन परिवारों के बारे में, जिनके परिवार का सदस्य कुछ ही पलों में उनसे दूर चला गया। निरंजन की उस दो साल की बेटी विस्मय के मन की पीड़ा को महसूस करिए। उस गरुड़ कमांडो गुरुसेवक सिंह की पत्नी के विषय में सोचिए जिसने मात्र डेढ़ महीने पहले 18 नवंबर को एक नए जीवन की शुरुआत की थी। शहीद हवलदार कुलवंत सिंह के उस बेटे के बारे में सोचिए जो नए साल पर अपने पिता और नई बाइक की प्रतीक्षा कर रहा था। धन्य है यह देश जहां अपने पति को राष्ट्ररक्षा में न्यौछावर कर देने के 24 घंटे भी नहीं पूरे हुए और जब पत्रकारों ने उस वीरांगना से बात की तो भीगी आंखों के साथ उसने जवाब दिया, 'अभी तो मेरा बेटा भी है, वह अपने पिता के सपनों को पूरा करेगा। मैं उसे भी सेना में भेजूंगी।'

आतंकी हमले क्यों होते हैं उसका एक मात्र कारण है कि हमने सेना के पैरों में बेड़ियां डाल कर रखी हैं। जब मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा कि अब भारत को इन आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए तो मेरे कुछ मित्रों ने कहा कि आप क्यों चाहते हैं कि भारत, पाकिस्तान पर हमला करे? क्या युद्ध एक मात्र विकल्प है? मैं, उन्हें और अधिक स्पष्टता के साथ बता देना चाहता हूं कि मैं पाकिस्तान पर हमला नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि उन आतंकियों पर हमला हो जो पाकिस्तान में बैठे हैं। पाकिस्तान हमारा दुश्मन नहीं है। वहां भी हमारे जैसे ही लोग रहते हैं। उनके भी पूर्वजों ने कभी इस देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था। वे भी नहीं चाहते कि स्कूल में पढ़ने गए उनके बच्चे वापस ना आएं। मुझे उम्मीद है कि पाकिस्तान हमारा साथ देगा और मान लीजिए हमला करने के दौरान पाकिस्तान उन आतंकियों के साथ खड़ा हो जाए तो हम इतने सक्षम हैं कि एक और युद्ध लड़ सके। अगर हमने साफ तौर पर विश्व को यह संदेश देकर हमला किया कि हमारा हमला आतंकियों पर है तो विश्वास मानिए विश्व का कोई देश पाकिस्तान के साथ नहीं खड़ा होगा।

मेरी पीड़ा क्यों है उसका एक कारण है। अभिमन्यु, चक्रव्यूह का सप्तम द्वार नहीं भेद पाया तो इसमें अभिमन्यु का कोई दोष नहीं था। कभी पिता अर्जुन और मामा श्रीकृष्ण को यह फुर्सत नहीं मिली कि वे अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदने की कला सिखा दें। अभिमन्यु को मां सुभ्रदा के गर्भ में मात्र एक बार चक्रव्यूह को भेदने की कहानी सुनने का अवसर मिला लेकिन सुभ्रदा को नींद आ गई। अभिमन्यु ने तो अपनी जिम्मेदारी निभाई और समय आने पर यह प्रमाणित किया कि उनको मां के गर्भ में जितना सीखने का अवसर मिला उतना उसने पूरी निष्ठा से सीखा। मोदी जी से पहले मैंने दो सरकारें और देखीं, एक अटल जी की सरकार और एक मनमोहन जी की सरकार दोनों ने इस देश के युवाओं को संतुष्टि नहीं दी। अब अगर मोदी सरकार भी उनकी तरह ही मात्र शोक-संवेदना व्यक्त करके चुपचाप बैठी रहेगी तो मेरे बाद की पीढ़ी को यह विश्वास दिलाना काफी मुश्किल होगा कि आतंक को रोकने के लिए अगर सेना में गए तो देश की राजनीति आपके साथ खड़ी होगी। फिर शायद कोई बेटा सेना में नहीं जाएगा, फिर शायद कोई मां अपने बेटे को सेना में नहीं भेजेगी और फिर शायद कोई बेटी अपने पिता की शहादत पर अर्थी को कंधा देती नहीं दिखेगी। यह देश युद्ध और बुद्ध, दोनों ही संस्कृतियों को जीता है, हमें यह बताना होगा कि हम गांधी और बुद्ध के अनुयायी भगत सिंह और वीर शिवाजी की भाषा भी जानते हैं। हमें यह समझना होगा कि हमारा शत्रु कैसा है? हमारी कार्यशैली, हमारे शत्रु की कार्यशैली पर निर्भर होनी चाहिए। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि अगर हम एक बार विश्व स्तर पर यह संदेश दे दें कि हम आतंक का मुंहतोड़ जवाब दे देंगे तो शायद इस देश में आतंकवादी हमलों की तादात कम हो जाए।

Sunday, 3 January 2016

मोदी जी! देश जीत गया लेकिन आप हार गए

नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले इंडिया टीवी के शो 'आप की अदालत' का एक एपिसोड आज अनायास ही याद आ गया। उस शो को मैंने अभी ऑफिस से वापस आकर फिर से देखा। उस शो का एक हिस्सा आप सभी से शेयर करना कर रहा हूं।

रजत शर्मा(होस्ट)- 26/11 की घटना के समय अगर आप इन्चार्ज होते तो क्या करते?
नरेन्द्र मोदी: जो मैंने गुजरात में किया वो कर के दिखाता, मुझे देर नहीं लगती। मैं आज भी कहता हूं, पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए, ये लव लेटर लिखना बंद कर देना चाहिए। प्रणव मुखर्जी(तत्कालीन रक्षा मंत्री) रोज एक चिट्टठी भेज रहे और वो सवाल भेज रहे, ये जवाब देते फिरते हैं। गुनाह वो करें और जवाब भारत सरकार दे रही है।
रजत शर्मा- लेकिन इंटरनैशनल प्रेशर है, उसका भी तो ख्याल रखना पड़ेगा भारत सरकार को।
नरेन्द्र मोदी: इंटरनैशनल प्रेशर पैदा करने की ताकत आज हिंदुस्तान में है, 100 करोड़ का देश है। पूरी दुनिया पर प्रेशर आज हम पैदा कर सकते हैं जी। मैं तो हैरान हूं जी, पाकिस्तान हमको मार कर चला गया, पाकिस्तान ने हम पर हमला बोल दिया मुंबई में और हमारे मंत्री जी अमेरिका गए और रोने लगे, ओबामा, ओबामा...पाकिस्तान हमको मार कर चला गया, बचाओ...बचाओ...ये कोई तरीका होता है क्या? पड़ोसी मार कर चला जाए और अमेरिका जाते हो, अरे पाकिस्तान जाओ ना।
रजत शर्मा- क्या तरीका होता है?
नरेन्द्र मोदी: पाकिस्तान जिस भाषा में समझे, समझाना चाहिए।

दोस्तों, मैं अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी का स्वयंसेवक हूं, मेरी शिक्षा भी विद्या भारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु/ विद्या मंदिर में हुई है लेकिन मैंने अपने जीवन में सिर्फ एक बार बीजेपी को वोट दिया है। मैं लखनऊ महानगर का एकमात्र ऐसा स्वयंसेवक था जो संघ के प्रचारकों के साथ मेरे आराध्य श्रीराम का राजनीतिकरण करने वाली बीजेपी के सिद्धान्तों पर बहस करता था। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने जवानी को जिया तो ऐसा कि राजसी सुखों को छोड़कर समाज के लिए कार्य करने वाले एक ऋषि के साथ वन को चले गए और वन जाते वक्त जब पिता दशरथ ने कहा कि राक्षसों से लड़ने के लिए सेना लेते जाओ तो कहा कि सेना ले गया तो क्या फायदा? वहां जाकर वहां के लोगों की सेना बनाऊंगा ताकि मेरे बाद भी उनमें राक्षसों से युद्ध करने का आत्मविश्वास बना रहे। मैं बहस करता था उन राम के लिए लिए जिन्होंने अपनी पीढ़ियों की परंपरा को तोड़ते हुए एकपत्नीव्रत लिया और एक ऐसी महिला से विवाह किया जिसका कुल तक ज्ञात नहीं था। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने पितृ भक्ति में अपने पिता के एक वचन को इस तरह से निभाया कि 14 सालों तक अयोध्या का सिंहासन फुटबॉल की तरह उछलता रहा। मैं बहस करता था तो उन राम के लिए तो उन राम के लिए जिन्होंने अपने प्रेम के लिए नदियों को छोड़िए, समुद्र पर भी पुल बना दिया। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने राजधर्म निभाया तो ऐसा कि राक्षसों का वध करके जीते गए क्षेत्र को वहीं के मूल निवासियों के हवाले कर दिया और अपने राज्य के एक सामान्य व्यक्ति की बात सुनकर अपनी धर्म पत्नी स्वयं से दूर कर दिया। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने मातृभूमि से प्रेम किया तो ऐसा कि सोने की लंका को छोड़ कर सामान्य जनमानस के बीच अयोध्या पहुंच गए।

मेरे उन श्रीराम को राजनीतिक गलियारों में बेचने वाले तथाकथित भक्तों को मैंने मोदी के भाषणों की वजह से लोकसभा चुनाव में वोट दिया। मेरे सांसद महोदय आज देश के गृहमंत्री हैं लेकिन कल पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकवादी हमले के समय उनकी हिम्मत नहीं थी कि वे देश की जनता का सामना कर सकें। देश के जवानों ने जब आतंकियों को मार गिराते हुए विजय पताका लहराई तब वे मीडिया के सामने आने की हिम्मत जुटा पाए। अरे राजनाथ जी, देश के जवान तो तब भी आतंकियों के सामने अपनी जान की बाजी लगा कर संघर्ष कर रहे थे जब हमारे सांसद कुर्सियों के नीचे छिपने की जगह ढ़ूंढ रहे थे, उस वक्त आप कहते थे कि भारत को उन्हें जवाब देना चहिए लेकिन आज जब आपके हाथ में सब कुछ है तो आप चुप-चाप बस सैनिकों को शाबासी देकर चल दिए।

मुझे खुशी है कि आज पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकी हमले के बाद हमारे देश के सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सभी आतंकियों को मार गिराया लेकिन मुझे दुःख भी है कि एक के बदले 10 सिर लाने का दंभ भरने वाली सरकार का प्रधान जब कर्नाटक के एक कार्यक्रम में भाषण देता है तो मात्र उसी पुरानी जुमले बाजी के सहारे देश के मन में खुद को प्रतिस्थापित करने की करने की कोशिश करता है जिनके भरोसे आज वह देश की सत्ता के सिंहासन पर काबिज है।  माननीय प्रधानमंत्री महोदय, इस गलतफहमी में मत रहिएगा कि देश ने अगर एक इतिहास को रचते हुए अगर आपको पूर्ण बहुमत वाली कुर्सी दी है तो वह इसलिए नहीं दी कि देश कांग्रेस से परेशान था, देश की जनता ने आपको देश की सत्ता का संचालन इसलिए सौंपा है ताकि आप देश के स्वाभिमान की रक्षा कर सकें। साड़ियां और शालें तो आती-जाती जाती रहेंगी लेकिन अगर आप सत्ता के अहंकार में देश के दिल से निकल गए तो फिर दुबारा वापस आने का मौका नहीं मिलेगा।

केन्द्र में बीजेपी सरकार आने से पहले नरेन्द्र मोदी ने एक निजी चैलन को दिए गए साक्षात्कार में कहा था, 'लादेन का पाकिस्तान की धरती पर मारा जाना इस बात की पुष्टि करता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों का एक बहुत बड़ा अड्डा बना हुआ है, भारत सरकार को इस विषय को तत्काल संज्ञान में लेना चाहिए और विश्व की मानवतावादी शक्तियों को एकजुट करते हुए अमेरिका पर भी दबाव डालना चाहिए कि वह ढ़ुलमुल नीति ना अपनाए। यह दुर्भाग्य है कि सुबह ओबामा के वक्तव्य में पाकिस्तान के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा गया है। भारत सरकार को इसे गंभीरता से लेते हुए मानवतावादी शक्तियों को एकजुट करना चाहिए।'

मोदी जी, तब हमारे तत्कालीन पीएम अमेरिका के सामने खड़े नहीं हो पाते थे, शायद इस लिए क्योंकि उन्हें भारत की युवा शक्ति पर विश्वास नहीं था लेकिन आप तो देश की शक्ति  को जानते हैं, बराक सहित विश्व के सभी बड़े नेता आपके मित्र हैं, अब बनाइए इंटरनैशनल प्रेशर और घर में घुसकर मारिए मौलाना मसूद अजहर को। अब तो नवाज से भी आपकी अच्छी दोस्ती है, वह भी साथ देंगे आपका, कोशिश तो करिए। मोदी जी, मैं अब भी आशाहीन नहीं हुआ हूं, मुझे उम्मीद है कि आपका पौरुष जागेगा और 17 साल पहले की गई गलती को सुधार लिया जाएगा। पता नहीं क्यों उम्मीद का दिया मेरे मन में जल रहा है? वो भी उन परिस्थितियों में जब हमले के बाद खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली पार्टी की ओर से यह बयान आता है कि सिर्फ एक हमले की वजह से पाकिस्तान के साथ चल रही वार्ता रद्द नहीं की जाएगी। अब देश जुमलेबाजी में फंसने वाला नहीं है और इस बात को दिल्ली तथा बिहार की जनता ने प्रमाणित भी कर दिया है। यदि पीएम साहब फ्लाइट मोड और साइलंट मोड में फंसे रहे तो यह तय है कि इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा। उम्मीद है कि खुद को प्रधानसेवक कहने वाले मोदी जी जनरल मोड पर आ जाएंगे और पाकिस्तान को उसी की भाषा में रिटर्न गिफ्ट देंगे।

Sunday, 6 December 2015

कैसे राम, और कैसा मंदिर?


दोस्तों, आज से 23 साल पहले बाबरी ढ़ांचे जिसे कुछ अज्ञानी मस्जिद भी कहते हैं, उसे देश की जनता के एक वर्ग ने गिरा दिया। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि एक स्वतंत्र देश में गुलामी की कोई निशानी नहीं होनी चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि देश की सारी मस्जिदें तोड़ दो..अरे मस्जिद भी इस देश के नागरिकों की, हमारे भाइयों की इबादतगाह है, उसका सम्मान होना चाहिए। और इस देश के प्रत्येक नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि इस देश के नागरिकों के पूजन स्थल की, इबादतगाह की सुरक्षा करे। अब संभव है कि आपके मन में सवाल उठे कि जब आप मानते हैं कि मस्जिद नहीं टूटनी चाहिए तो फिर बाबरी के गिरने को सही कैसे ठहरा सकते हैं? तो दोस्तों, मैं आपको बता दूं कि पहली बात तो यह कि यह देश राम का देश है, बाबर का नहीं...अब इसे यह मत कहना कि मैं मुस्लिम विरोधी हूं... मैं चाहता हूं कि इस देश के लोगों के बीच चर्चाएं बाबर पर नहीं बल्कि इस देश के सबसे बड़े मुसलमान, एपीजे अब्दुल कलाम पर चर्चा पर हो, अशफाक उल्ला खां पर चर्चा हो। उन पर कोई उंगली उठाएगा तो इस देश के मुसलमानों के साथ नहीं बल्कि उनसे आगे खड़ा होकर उनका विरोध करूंगा जो इस देश की एकात्मता के आधार कलाम जैसे मुस्लिमों पर उंगली उठाएंगे और मैं ऐसा इस लिए करूंगा क्यों कि कलाम साहब सिर्फ मुसलमानों के नहीं अपितु इस देश के प्रत्येक नागरिक के हैं। ठीक इसी प्रकार राम सिर्फ हिंदुओं के नहीं अपितु प्रत्येक हिंदुस्थानी के हैं।

यह भी पढ़ें: कब बनेगा राम मंदिर

सांस्कृतिक आधार पर इस देश के मुसलमान जिन्ना के नहीं अशफाक उल्ला खां के वंसज हैं। जिनको इस भारत मां से प्यार नहीं था वे 1947 में ही यह देश छोड़कर जा चुके हैं। अब जो यहां पर हैं वे हमारे अपने हैं। अगर आप उन पर प्रश्नचिन्ह लगाना पूरी तरह से गलत होगा। मेरे इस कथन को इस रूप में ना लिया जाए कि मैं याकूब की शवयात्रा को निकालने वालों का समर्थन करता हूं। वे भटके हुए लोग हैं जो याकूब की शवयात्रा निकालते हैं। उन्हें सत्य से अवगत कराना होगा और वे यदि इस भारत भूमि के प्रति सम्मान ना रखें तो उन्हें पाकिस्तान मत भेजो बल्कि चौराहे पर खड़े करके गोली मार दो। राम तो हमारी अस्मिता के आधार हैं, राम तो वह हैं जो वनवास के समय जब दुनिया और मानवता के सबसे बड़े दुश्मन, रावण से युद्ध करने निकलते हैं तो एक राजकुमार होते हुए भी वे किसी राजा का साथ नहीं लेते बल्कि वंचितों को, वनवासियों को गले लगाते हैं।

राम का तो पूरा जीवन ही त्रासदीपूर्ण रहा। इसके बावजूद लोग राम की पूजा करते हैं। भारतीय मानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं; बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टता पूर्वक किया। अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा। मैंने ने राम को इसलिए पसंद किया, क्योंकि मैंने राम के आचरण में निहित सूझबूझ को समझा।

दरअसल, राम की पूजा इसलिए नहीं की जाती कि हमारी भौतिक इच्छाएं पूरी हो जाएं-मकान बन जाए, प्रमोशन हो जाए, सौदे में लाभ मिल जाए। बल्कि राम की पूजा हम उनसे यह प्रेरणा लेने के लिए करते हैं कि मुश्किल क्षणों का सामना कैसे धैर्य पूर्वक बिना विचलित हुए किया जाए। राम ने अपने जीवन की परिस्थितियों को सहेजने की काफी कोशिश की, लेकिन वे हमेशा ऐसा कर नहीं सके। उन्होंने कठिन परिस्थतियों में ही अपना जीवन बिताया, जिसमें चीजें लगातार उनके नियंत्रण से बाहर निकलती रहीं, लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने हमेशा खुद को संयमित और मर्यादित रखा। आध्यात्मिक बनने का यही सार है।

संत कबीर कहते हैं कि
राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप


अर्थात राम नाम को महत्व जाने बिना उसे जपना तो न जपने जैसा ही है क्योंकि जब तक मस्तिष्क पर देहाभिमान की छाया है तब तक अपने पापों से छुटकारा नहीं मिल सकता।

इस संसार में चार राम हैं-

एक राम दशरथ का बेटा , एक राम घट घट में बैठा !
एक राम का सकल पसारा , एक राम है सबसे न्यारा !


संसार में चार राम हैं ! जिनमें से तीन को हम जगत व्यवहार में जानते हैं पर चौथा अज्ञात राम ही सार है । उसका विचार करना चाहिये । एक दशरथ पुत्र राम को सभी जानते हैं और एक जो प्रत्येक जीवात्मा के घट ( शरीर ) में विराजमान है तथा एक ये जो समस्त ( सकल ) दृश्य अदृश्य सृष्टि है , ये ( विराट पुरुष ) राम ही है - राम में ही है । लेकिन इन सबसे परे जो चौथा ( आत्मा ) राम है । वही हमारा और इन सबका सार है । अतः उसी को जानना उत्तम है।



इसलिए मैं उस राम का मंदिर चाहता हूं जो हिंदुओं के नहीं बल्कि प्रत्येक भारतीय के हैं। भाजपा ने तो हमारे राम को भरे बाजार बेच दिया और आज भी उन्ही राम पर राजनीति करना चाहती है, लेकिन यह देश सब समझता है। इस देश की जनता को जब मंदिर बनाना होगा, मंदिर बन जाएगा। मंदिर बनाने के लिए इस देश के 125 करोड़ भारतीयों को किसी 'दल' की जरूरत नहीं लेकिन हां 'दल' को अवश्य इस देश के लोगों की जरूरत होगी। जब इस देश का प्रत्येक 'भारतीय' यह कहेगा कि मंदिर बने तब मंदिर बनना चाहिए और जिसे राम स्वीकार नहीं उसे स्वयं को भारतीय कहलाने का भी अधिकार नहीं। शब्द पर ध्यान दीजिएगा मात्र प्रत्येक 'भारतीय'।

यह भी पढ़ें: कब बनेगा राम मंदिर

वंदे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...