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Tuesday, 22 November 2016

नोटबंदी का अंधसमर्थन और अंधविरोध दोनों ही संवेदनहीन

आज 14वां दिन है नोटबंदी का… वही लंबी-लंबी लाइनें… गिरता व्यापार और परेशान लोग…तो क्या नोटबंदी का फैसला गलत था? क्या 1000 और 500 रुपए के नोटों पर बैन लगाकर नरेन्द्र मोदी ने अपनी दायित्वविहीन सामाजिक अपरिपक्वता का परिचय दिया है? इस सवाल का उत्तर समझने से पहले कुछ अन्य बिंदुओं पर भी ध्यान देते हैं।

क्या नोटबंदी का विरोध करने वाला हर एक व्यक्ति वही है, जिसने ब्लैकमनी छिपा रखा है? अगर आप इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि हर एक देशभक्त आंखें बंद करके नोटबंदी का समर्थन कर रहा है या उसे कोई परेशानी नहीं हो रही है तो निश्चित ही आप ‘अन्धभक्त’ ही कहे जाएंगे। क्योंकि रिक्शा चलाने वाले से लेकर और दिहाड़ी पर मजदूरी करने वाले भी इस फैसले से परेशान दिख रहे हैं और उनके पास ना ही ब्लैकमनी है और ना ही वे भ्रष्टाचारी हैं। वे परेशान नोटबंदी के फैसले से नहीं बल्कि इसके क्रियान्वयन से हैं। अगर आप किसी भी सामान्य व्यक्ति से बात करेंगे और उससे पूछेंगे कि अगर इस फैसले से भविष्य में देश का या आम आदमी का फायदा होता है तो क्या यह फैसला ठीक है? इस प्रश्न के जवाब में कोई ‘नहीं’ में जवाब नहीं देगा। हालांकि वह अपनी परेशानी बताएगा, अपने ज्ञान और विवेक के आधार पर कुछ सुधाव देगा लेकिन केन्द्र सरकार को ‘संवेदनहीन’, ‘बेवकूफ’, या ‘पागलों का झुंड’ नहीं कहेगा।

vishva gaurav
दूसरी ओर इस फैसले के क्रियान्वयन में जो नुकसान हुए हैं या हो रहे हैं, यदि उनका मजाक उड़ाया जाए या उनका अपमान किया जाए तो इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा। इस फैसले से जिनको सच में नुकसान हुआ है, उनके दर्द की आवाज को हथियार बनाकर राजनीति भी की जा रही है और की भी जाएगी क्योंकि हमारे अपने नेताओं की राजनीतिक दायित्व की शुचिता शून्य तक पहुंच गई है। हमने जिनको चुना है, हम जिनके पीछे चलते हैं, इस विश्वास के साथ कि वे सही रास्ते पर ही चलेंगे, ऐसे लोग बिना प्रमाणिकता के एक चोर को गरीब जनता का प्रतिनिधि घोषित करके उस चोर की आत्महत्या को ‘शहादत’ जैसा बताने की कोशिश करते हैं और प्रधानमंत्री को इसके लिए जिम्मेदार बताकर कटघरे में खड़ा कर देते हैं। ऐसा कोई नहीं है जिसे इस फैसले से परेशानी ना उठानी पड़ी हो। एक कट्टर मोदीभक्त से लेकर एक कट्टर मोदी विरोधी तक, सभी को परेशानी उठानी पड़ रही है, लेकिन लोग एक उम्मीद के साथ ये परेशानियां सहने को तैयार हैं। ये लोग जो लंबी-लंबी लाइनों में खड़े दिखते हैं, और नोटबंदी से हो रही परेशानियों के बारे में पूछने पर बहुत खुश होकर यह जताने की कोशिश करते हैं कि उन्हें कोई परेशानी नहीं हैं, ये लोग नोट बदलने के लिए नहीं बल्कि देश बदलने के लिए इन परेशानियों को सह रहे हैं।


नोटबंदी के फैसले के क्रियान्वयन की कमियों पर सामान्य जनमानस की परेशानियों पर सवाल जरूर उठने चाहिए लेकिन साथ ही सवाल उन लोगों पर भी उठने चाहिए जो एक समय बाबा रामदेव के साथ 1000 और 500 के नोटों पर तत्काल प्रतिबंध की मांग का समर्थन कर रहे हैं, वे आज आखिर क्यों इस फैसले पर विरोधी सुर अपनाकर ‘छोटीगंगा’ बहा रहे हैं? आज अरविंद केजरीवाल को देश की जनता को बताना चाहिए कि 2012 वाला वह अरविंद केजरीवाल असली था या आज का अरविंद केजरीवाल असली है। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर तो यही लगता है कि केजरीवाल साहब उस समय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का चेहरा बनकर अपना राजनीतिक करियर चमकाना चाह रहे थे, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली और आज सिर्फ विरोध की राजनीति करके अपने अस्तित्व को लोगों के मानस में बचाए रहना चाहते हैं।

इन 14 दिनों में संवेदनशीलता की एक नई परिभाषा को चरितार्थ होते हुए देखा। हमने देखा कि 4 घंटे से लाइन में लगे एक छोटे से किसान, एक मजदूर और एक महिला की परेशानी के लिए हमारे नेता सड़क पर उतरें हैं। अच्छा लगा कि वे आम आदमी के दर्द को महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पीड़ा तब होती है जब वही लोग सवा सौ करोड़ के प्रधान की आंखों के आंसुओं को नौटंकी बताते हैं। राजनीति को नकारात्मकता के चरम तक पहुंचाने वाले ये लोग अगर ऐसा सोचते हैं कि देश उन्हें समझ नहीं रहा, तो यह उनकी भूल है क्योंकि देश सब देख रहा है। मैं नहीं जानता कि इस नोटबंदी का परिणाम क्या होगा लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूं कि देश की सत्ता के सिंहासन पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जो बड़े फैसले लेने की हिम्मत रखता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ समस्या यह थी कि उनमें ऐसे निर्णय लेने की इच्छाशक्ति नहीं थी। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस राजनीतिक दल से वह आते हैं, उसने उन्हें इतने अधिकार ही नहीं दिए थे।

एक बात और, ऐसा नहीं है कि नोटबंदी का फैसला, बीजेपी का फैसला है। बीजेपी के कई नेता, सरकार में बैठे कई लोग, ‘राष्ट्रवादी विचारधारा’ के होने का दावा करने वाले कई संगठन इस फैसले से घबराए हुए हैं क्योंकि भ्रष्टाचार पर कांग्रेस का ‘कॉपीराइट’ तो था नहीं। कहीं से तो शुरुआत करनी ही थी। शुरुआत हुई है, भविष्य में लिखा जाने वाला इतिहास तय करेगा कि इस फैसले से हमें और आपको कितना फायदा हुआ। लेकिन इन सबके बीच आपको एक आम नागरिक होने के नाते, एक भारतीय होने के नाते ऐसा फैसला लेने के लिए दिखाई गई इच्छाशक्ति की सराहना तो करनी ही चाहिए।

लोग कह रहे हैं कि यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला है, सरकार ने तैयारी नहीं की, सरकार ने समय नहीं दिया, सरकार को नोट बदलने के लिए समय दिया जाना चाहिए था। परेशानी मुझे भी हो रही है लेकिन मैनेज करने की कोशिश कर रहा हूं क्योंकि मैं समझ रहा हूं कि यदि नोटबैन करने से 2 महीने या 1 महीने पहले बता दिया जाता तो जितनी देर में आप 10-20 हजार रुपये के नोट बदलते, उतनी देर में ब्लैकमनी संचित करके रखे हुए लोग हजारों करोड़ रुपये बदल लेते। रही बात जल्दबाजी और सरकार की तैयारी की तो मुझे लगता है कि सरकार द्वारा लगातार उठाए जा रहे कदम तथा नीतियों में लगातार हो रहे बदलाव इस बात को प्रदर्शित करते हैं कि सरकार ने आगे की योजना का पूरा ‘ब्लू प्रिंट’ तैयार कर रखा है। ऐसे कदमों का कोई सही समय नहीं होता। जिस समय सरकार ने ऐसी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया, वह अपने आप में बिल्कुल सही समय है।

यह बात सच है कि हमारे देश में जितना ब्लैक मनी है उससे कई गुना ज्यादा ब्लैक मनी स्विस बैंक में भरा पड़ा है। सरकार के नियंत्रण में हमारा अपना देश है, सफाई की शुरुआत अपने घर से ही की जाती है। स्विस बैंक के ब्लैक मनी को निकालने के और कई रास्ते हैं, सरकार आगे क्या कदम उठाएगी वह तो बाद में ही पता लगेगा लेकिन उन कदमों के इंतजार में घर की सफाई भी ना की जाए, यह तो पूर्ण रूप से अव्यावहारिक है।

सरकार के इस कदम से निश्चित ही मुझे मेरे जैसे सभी आम नागरिकों को परेशानी हो रही है लेकिन हमें यह भी पता होना चाहिए कि इससे नकली नोट छापने वालों को, आतंकियों को, नक्सलियों को, कश्मीर में पत्थरबाजों को पैसा देने वालों को, टैक्स चोरों को, बिस्तर और तकियों में नोट भरकर रखने वालों को बड़ा नुकसान हुआ है और उनके नुकसान का हमें भले ही तत्कालिक लाभ ना हो लेकिन दीर्घकालिक लाभ अवश्य होगा।

Thursday, 17 March 2016

स्वतंत्रता और स्वछंदता में अंतर समझे मीडिया

मीडिया के बिना वर्तमान समय में समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन हाल ही में दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुए विवादित कार्यक्रम के बाद भारतीय मीडिया दे धड़ों में बटा नजर आ रहा है। जेएनयू में भारत तेरी बर्बादी तक जंग रहेगी...जंग रहेगी...जैसे नारों को मीडिया का एक वर्ग अभिव्यक्ति और असहमति की स्वतंत्रता बता रहा है तो दूसरा वर्ग इसे राष्ट्रद्रोह की संज्ञा दे रहा है। इस विषय पर एक निष्पक्ष स्थायित्व लेने के लिए सर्वप्रथम हमें पत्रकारिता को समझना होगा। क्या पत्रकारिता का अर्थ यह होता है कि आप सही और गलत में कोई फर्क न करते हुए दोनों पक्षों का समर्थन करें अथवा पत्रकारिता का अर्थ यह होता है कि आप सही और गलत में फर्क करते हुए सही का समर्थन करें और गलत को पूर्ण दृढ़ता के साथ गलत कहें। मेरा मानना है कि दूसरा विकल्प ही पत्रकारिता का विशुद्ध रूप है। आप जब पत्रकारिता व्यवसाय होती जा रही है तो इसे एक मिशन के रूप में लेना संभव नहीं लेकिन क्या एक पत्रकार 'भारतीय' व्यवसायी नहीं हो सकता? क्या एक पत्रकार भारतीय पत्रकार नहीं हो सकता? क्या एक पत्रकार अपने व्यवसाय से पहले देश को नहीं मान सकता? क्या एक पत्रकार अपने व्यवसाय के मिशन के रूप में नहीं ले सकता? क्या एक पत्रकार किसी अन्य देश में जाएगा तो वह भारतीय से पहले पत्रकार होगा? ऐसे कई सवाल हैं जो आज हमारे सामने खड़े हैं।

मीडिया से इतर अगर राजनीतिक वर्गों की बात करें तो एक वर्ग कहता है कि देश के मजदूरों एक हो जाओ तो वह साथ में यह भी कहने लगता है कि आपको एक होने के लिए ‘राम’ को मानना बंद करना होगा। अगर कोई यह कहता है कि इस देश के सनातनियों एक हो जाओ तो साथ में अप्रत्यक्ष शर्त लगा दी जाती है कि इसके लिए आपको मुसलमानों का विरोध करना होगा। इसको अगर एक सामान्य पंक्ति में कहें तो हम आज ‘एकता’ नहीं अपितु ‘एकरूपता’ चाहते हैं। इस एकरूपता की विचारधारा का प्रभाव सभी तरह की विचारधाराओं पर है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम जैसे हैं उसी तरह रहकर मात्र भारतीयता के नाम पर एक हो जाएं। इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश में कुछ लोगों को इस बात पर शर्म आती है कि हमारे लोकतांत्रिक मंदिर, यानी संसद पर हमला करके इस देश की एकात्मता पर प्रहार करने वाले अफजल गुरु नाम के आतंकी को फांसी पर लटका दिया जाता है। और इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भी बंट चुका है।

स्वतंत्रता किसी भी तरह के निरपेक्ष स्वच्छंदता का पर्याय नहीं हो सकती है। यदि ऐसा होता तो वह आत्महंता कहलायेगा, जैसा कि अनेको देशों में हुआ है कि वहां पर प्रजातंत्र आया जरुर लेकिन वह अधिक दिनों तक ठहर नहीं सका। सही अर्थो में स्वतंत्रता मिलने के साथ ही प्रत्येक व्यक्ति के साथ दायित्व एवं कर्तव्य जुड़ जाते हैं। आत्मनियंत्रण एवं लगातार चौकसी के अभाव में स्वतंत्रता की परिकल्पना अधूरी रह जाती है। हम अपने- आपको आज स्वतंत्र्योत्तार युग के वासी मानते हैं। ऐसा लगता है, कि स्वतंत्रता अपने कालक्रम में एक बिंदु था, न कि कोई सतत अनुभव। ऐसा लगता है कि मानो पश्चिमीकरण की स्वाभाविक नियति की दिशा में हम लगातार अग्रसर होते जा रहे हैं हमारी इस यात्रा में राजनीतिक स्वतंत्रता एक महज पड़ाव था। यदि हम वर्तमान समय में भाषा, व्यवहार और वैचारिक दायरे मे रह कर सोचे तो स्वतंत्रता, स्वाधीनता आज लगभग बाहर ढकेल दी गई है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि स्वायत्ताता, आत्मगौरव और आत्मबोध की जगह हम अंग्रेजी राज के मात्र उत्ताराधिकारी बनकर रह गए हैं। वैश्वीकरण के दबाव में हम यह मान बैठे हैं कि पश्चिमी सभ्यता अकाट्य एवं अपरिवर्तनीय भविष्य है। राजनीतिक रूप से स्वाधीन होकर भी हम आज तक आत्म संशय से पूर्णतः ग्रस्त हैं, भारतीयता के बारे में हम अस्पष्ट, ज्ञान-विज्ञान के आयातक बन कर अपनी ही जड़ों से कटते चले जा रहें हैं। वर्तमान समय में गांधीजी का हिंद स्वराज हमारी रीति-नीति से हाशिये पर जा चुका है।

आज, बौद्धिक चर्चाओं में जिस अमूर्तीकृत भारतीय जीवन शैली पर विश्लेषण हो रहा है, वह साम्राज्यवादी आधार पर भी अप्रासंगिक है और केवल आरोपित दृष्टि को प्रोत्साहित कर रहा है। वह न ज्ञान से जुड़ा रहा, और न ही समाज से ऐसी अवस्था में कोई वैकल्पिक दिशा या राह ढूंढ़ा नही जा रहा है। स्वदेशी या देशज विचार उपयोगी हो सकते हैं लेकिन  इसके लिए जो संकल्प और इच्छाशक्ति की आवश्यकता है वह कहीं विरल होती जा रही है और जो भी प्रयास हो रहे हैं वे अधकचरे और बेमन से हो रहे हैं। वस्तुत: स्वतंत्रता अमूल्य है, इस धरती पर केवल मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जिसके लिए उसका शारीरिक और भौतिक जीवन अपर्याप्त है, क्योंकि वह अपनी बुद्धि के बल पर इसके पार झांकने की चेष्टा करता है और जीवन मे मूल्यों एवं आदर्शो का सृजन करता है। मानव जीवन मूल्यों और संभावनाओं का जगत है इसका प्रयोजन मनुष्य को राह दिखाना और  उसका मार्ग प्रशस्त करना है। मनुष्य आहार, भोजन, निद्रा, भय और मैथुन की पशुवृत्तिायों तक अपने को संकुचित न रखकर मूल्यों को ढूंढता है, उन मूल्यों को जिन पर जीवन को न्योछावर किया जा सके। मानव जीवन कुछ ऐसे ही स्पृहणीय लक्ष्यों एवं चाहतों के अधीन संचालित होता हैजिन पर किसी प्रकार की बंदिश नहीं होती है, सिवाय खुद अपने द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के। यदि प्रतिबंध न हों तो इस प्रकार की ईच्छाए मनुष्य को गलत राह पर ले जा सकती हैं। इस विवेक के न होन पर हम पशुवत आचरण करने लगते हैं और तात्कालिक भौतिक सुख पाने तक ही अपने आप को सीमित कर लेते हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय यानी चोरी न करना, अपरिग्रह यानी आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना, शुचिता, इंद्रियनिग्रह, धैर्य और क्षमा जैसे गुणों को धर्म के प्राणिमात्र के लिए उपयुक्त या ठीक तरह से व्यवहार के अंतर्गत इसे शामिल कर मनुष्य को एक बड़ी जिम्मेदारी दी गयी है। धर्म व्यक्ति को अपने बारे में कम और दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करें या सामाजिक जीवन कैसे जिएं इसके बारे में अधिक बताता है। स्वतंत्रता कभी निरपेक्ष नहीं होती पर इसका गलत अर्थ लगा कर हम स्वच्छंद होते जा रहे हैं जिसके परिणामस्वरुप लूट-मार, हत्या, घोटालों, व्यभिचार, त्रासदियों, अत्याचारों, एवं हिंसा की असंख्य घटनाओं के रूप में हमारे सामने आए-दिन उपस्थित होते रहते हैं।

निश्चित ही विचारों को व्यक्त करने की आजादी संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है, लेकिन संविधान के ही तहत इस आजादी पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने का राज्य को अधिकार भी दिया गया है। ऐसे में अदालत ने भी यह माना कि देश में शिक्षा और चेतना के मौजूदा स्तर को देखते हुए स्वतंत्रता को स्वच्छंदता में तब्दील होने की छूट नहीं दी जा सकती है। इसलिए संसद को कानून बनाकर इस बारे में स्थिति स्पष्ट करनी होगी। खासकर देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा, सामाजिक चेतना जैसे संवेदनशील पहलुओं को देखते हुए तकनीकी प्रसार को रोकने के बजाय इसे बेकाबू होने से रोकने के उपाय करना वक्त की मांग है।

प्रत्येक समाज का, राष्ट्र का एक तंत्र होता है जो धीरे-धीरे विकसित होता है और वही उसके शासन तंत्र का आधार बनता है। हमारे पास व्यवस्था का एक लंबा इतिहास है। उसी को समयानुसार आवश्यक  परिवर्तन करके सुधारना चाहिए। आज भी मानवीय संबंधों, प्रकृति के साथ सामंजस्य के सूत्रों, मितव्ययिता और संयम की जीवन शैली ही हमारे तंत्र का आधार हो सकती है। आज की गैर जिम्मेदार उपभोक्ता संस्कृति और अंधे कानून हमारे मार्गदर्शक नहीं हो सकते। हमारी जीवन शैली ही हमारी हो सकती है। वही हमें  गति प्रदान कर सकती है और वही हमारा धर्म हो सकती है।

अंग्रेजो के जाने के बाद स्वतंत्र बनते समय हमने इस नींव को भुला दिया।  स्वाधीनता का अर्थ है कि हम अपने नियंता और मालिक बनें। कानून के डंडे से संचालित जीवन की अपेक्षा स्वप्रेरित जीवन जिएं। यहीं आकर संस्कारों का महत्त्व पता चलता है। संस्कार हममें एक ऐसी आदत का निर्माण कर देते हैं कि स्वतः ही एक समरसता का जीवन जीने लगते हैं। लेकिन इस देश का मीडिया संस्कारों को तो व्यर्थ मानता है। आधुनिकता के नाम पर पाश्चायत्य सभ्यता के दुष्चक्र में मीडिया कुछ इस कदर फंसता जा रहा है कि यदि कोई भारतीय संस्कार और संस्कृति की बात करे तो वह उसे पिछड़ा और देश के विकास की गति में बाधक मान लेता है।

स्वतंत्रता आज स्वच्छंदता में बदल गई है। हमे पड़ताल करनी होगी कि जो देश कभी विश्व गुरु के नाम से पह्चाना जाता था, आज अनुकरण या स्पष्ट शब्दों में कहें तो अंधानुकरण करने वाला कैसे बन गया। हर संस्कृति की अपनी विशिष्टता होती है, साथ ही उसमें खामियां भी होती हैं, हमारी जिम्मेदारी है कि अगर हमें अनुकरण करना ही है तो विशिष्टता का करें ना कि खामियों को भी अपना मान लें। आज सिर्फ अन्धानुकरण हो रहा है और उसे नाम दिया जा रहा है आधुनिकता का, इससे अधिक दुर्भाग्य इस देश का हो ही नहीं सकता। किसी भी संस्कृति की विशिष्टाता होती है उसकी शिक्षा व्यवस्था, क्या हमने अपनी शिक्षा व्यवस्था को ऐसा ढाला है की यह अनुकरणीय बने और हम अग्रज?
आज समय आ गया है कि आजादी के 69 साल के बाद हम थोड़ा सा पीछे मुड़ कर देखें और अपनी खामियों को चिन्हित कर उन्हें मिटाने का प्रयास करें। आज जरुरत है वैल्यु की जो आज कल प्राइस में परिवर्तित होती जा रही है। ये सब किसी के करने से नहीं होने वाला बल्कि हमें खुद अपने निजी और सामजिक स्तर पर ये सब करना होगा तभी उम्मीद जग सकती है।

आज स्वच्छंदता हमारी पूरी की पूरी व्यवस्था में व्याप्त है चाहे वह नौकरशाह हों या मिडिया ,चाहे न्यायपालिका हो या समाज आदि। आज कोई भी किसी तरह के बंधन को स्वीकार नहीं करना चाहता है चाहे वह कानून का हो या राज व्यवस्था का। राजनीति तो पहले ही दागदार हो चुकी है, वे दिन चले गए जब राजनीतिज्ञों को देख कर स्वतः ही मन में सम्मान का भाव उत्पन्न हो जाया करता था कि अमुख नेता इतना पढ़ा-लिखा है ,अमुख इतना बड़ा समाज सुधारक है आदि, पर आज तो ऐसी छवि वाला कोई नेता दिखता ही नहीं, सभी एक दूसरे पर लांछन लगाने में व्यस्त दिखते हैं और ये दिखने की कोशिश करते हैं की उनका विरोधी देखो कितना नीचे गिर गया है। इस व्यवस्था को बनाने में और पोषित करने में कहां आ गए हम? जिस देश का इतिहास इतना गौरवशाली था ,जहां का भूगोल आज भी सोना उगलने की स्थति में है फिर नागरिक शास्त्र में कैसे चुक गए कि ऐसी व्यवस्था खड़ी हो गयी? जिसकी भाषा (संस्कृत) को सभी भाषाओं की जननी कहा जाता था, आज उसके विषय में बात करने पर भगवाकरण का आरोप लगने लगता है।

स्वतंत्रता और स्वच्छंदता को अक्सर एक मानने की भूल कर दी जाती है और इसी का परिणाम है कि स्वतंत्रता के नाम पर कई बार अतार्किक मांग उठायी जाती है। स्वतंत्रता का पक्षधर उदारवाद व्यक्ति को विवेकशील प्राणी मानता है और उसे अपने बारे में स्वयं निर्णय करने तथा विकास-मार्ग स्वयं चुनने का अधिकार देने की बात करता है। इस बात में कोई शक नहीं है कि व्यक्ति विवेकशील प्राणी है परन्तु उसकी विवेकशीलता की सीमा है अर्थात् व्यक्ति पूर्ण विवेकशील नहीं है। इसी कारण व्यक्ति-व्यक्ति की सोच और मान्यता में अंतर नजर आता है, जो कि कई बार एक-दूसरे के विपरीत भी हो जाता है। अतः स्वतंत्रता की मात्रा का सीमांकन जरुरी हो जाता है। स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबन्ध जरुरी है ताकि किसी एक व्यक्ति की स्वतंत्रता अन्य की स्वतंत्रता में बाधक न हो जाय। वहीं स्वच्छन्दता में प्रतिबंधों का कोई स्थान नहीं होता, अतः स्वच्छन्दता निरंकुश रूप धारण किए हुए है। वहीं स्वतंत्रता मानवता के हित में कुछ प्रतिबंधों को आरोपित करती है, जिससे कि एक व्यक्ति की स्वतंत्रता का अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता से कोई संघर्ष न हो

हाल ही में हुए जेएनयू प्रकरण में एक बात तो साफ हो गई है कि राजनीतिक विचार परिवारों की तरह मीडिया भी विचारों में स्थायित्व नहीं ला पा रहा है। कोई चैनल वैचारिक प्रतिबद्धता से इस कदर ग्रसित है कि वह फर्जी विडियो को बिना जांच किए टीवी पर चला देता है तो कोई चैनल देश की संसद पर हमला करने वाले आतंकी के समर्थन में लगने वाले नारों को अभिव्यक्ति की आजादी कहता है। इस देश की संसद में कोई व्यक्ति नहीं बैठता बल्कि इस देश की संसद में जनमत बैठता है। वह जनमत जिसे मैं और आप चुनते हैं, आपने जिसको अपना वोट दिया हो भले ही वह व्यक्ति उस संसद में ना पहुंचा हो लेकिन किसी अन्य की पसंद तो वहां बैठती है। क्या पत्रकारिता का यह दायित्व नहीं है कि वह देश के जनमत का सम्मान करे और देश विरोधी नारे लगाने वालों के खिलाफ एक साथ खड़ी हो? क्या इस प्रकार की पत्रकारिता कहीं न कहीं राष्ट्रविरोधी तत्वों को संरक्षण देने का काम नहीं कर रही है? क्या फर्जी विडियो चला कर टीआरपी बटोरने वाले चैनल पत्रकारिता की विश्वस्नीयता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहे?

देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में जब छात्रों के वर्ग ने कहा कि ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा है…’ मुझे समझ नहीं आया कि यहां कातिल कौन है? देश का उच्चतम न्यायालय, देश का राष्ट्रपति, अफजल की फांसी के लिए अपने शहीद पति को मरणोपरांत दिए गए शौर्यता के प्रमाण पत्रों को लौटाने की बात करने वाली वे वीरांगनाएं, वे पुलिस वाले जिन्होंने अफजल को पकड़ा अथवा देश का हर एक वह नागरिक जो सड़क से लेकर संसद तक अफजल के कुकृत्य के लिए फांसी की मांग कर रहा था? ऐसे में जब कोई मीडिया संस्थान इस प्रकार के नारे लगाने वालों का अभिव्यक्ति और असहमति की स्वतंत्रता के नाम पर समर्थन करता है तो क्या उस संस्थान का कृत्य राष्ट्रविरोध की श्रेणी में नहीं आता।

देश के कुछ मीडिया संस्थानों का कहना है कि बिना प्रमाण के भारत की बर्बादी के नारे लगाने के मामले में एक निर्दोष को गिरफ्तार कर लिया गया। उनका मानना है कि यह मानवता विरोधी कदम था। गिरफ्तार किए गए लोगों तथा उनकी विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियों का स्पष्ट तौर पर कहना है कि अफजल गुरू की फांसी 'न्यायिक हत्या' थी। यह कैसी मानवता है कि आप एक कलबुर्गी की हत्या पर अवार्ड वापसी का दौर शुरू कर देते हैं लेकिन देश के दिल, दिल्ली में खड़ी देश की संसद पर हमला करके दिल्ली पुलिस के पांच जवानों, सीआरपीएफ की एक महिला कर्मी और 2 सुरक्षा गार्डों के हत्यारे के समर्थन में नारे लगाते हैं। क्या अफजल का कृत्य मानवता विरोधी नहीं था?

एक ऐतिहासिक प्रसंग के माध्यम से इस विषय को स्पष्ट करना चाहूंगा। विभीषण रावण के राज्य में रहने वाला एक ऐसा व्यक्ति था जिसके सहयोग के बिना श्रीराम को सीता नहीं मिलतीं, जिनके सहयोग के बिना लक्ष्मण जीवित नहीं बचते, जिसके सहयोग के बिना रावण के राज्य की गोपनीय बातें हनुमान-श्रीराम को पता नहीं लगतीं। एक लाइन में कहें तो ‘श्रीराम का आदर्श भक्त’… इतना कुछ होते हुए भी आज उस घटना के हजारों सालों के बाद भी किसी पिता ने अपने बेटे का नाम ‘विभीषण’ नहीं रखा। जानते हैं क्यों?
क्योंकि इस संस्कृति में आप राम भक्ति करें या ना करें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर राष्ट्रभक्ति नहीं की तो कभी माफ नहीं किए जाएंगे। आज एक सामान्य व्यक्ति से अधिक आवश्यक मीडिया के लिए है कि वह अधिकारों के साथ-साथ दायित्व को भी समझे। आज आवश्यक है कि मीडिया समाज, राष्ट्र और मानवीयता के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वयं सुनिश्चित करे। आज आवश्यक है कि मीडिया समाज को स्वतंत्रता और स्वछंदता के बीच के अंतर के विषय में जानकारी दे।

Friday, 8 January 2016

अब बुद्ध को युद्ध करना ही होगा...



कुछ ही दिन पहले जब आतंक ने मां भारती के धवल दामन पर काला धब्बा लगाने की कोशिश की तो इस देश के बेटों ने पठानकोट में अभूतपूर्व शौर्य गढ़ते हुए यह बता दिया कि इस देश के बेटे अपनी मां की छाती पर चढ़कर अशांति फैलाने का कुत्सित प्रयास करने वालों का सामना करने के लिए हर पल तैयार खड़े हैं। इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद आज अवकाश होने के कारण मैंने सोचा कि एक बार उस समय के बारे में भी पढ़ा जाए जब हम अंग्रेजी सल्तनत के अधीन थे। मेरे मन में दुःख के बीच यह उत्सुकता भी थी कि उस दौर के सैनिकों (क्रांतिकारियों) के मन में परिवार और मां भारती के प्रति कैसे विचार रहे होंगे। उस समय के विषय में अध्ययन करने के दौरान दो प्रसंग ऐसे सामने आए जिनको पढ़कर इस ब्लॉग को लिखने का विचार आया। उन दोनों प्रसंगों को आपसे साझा कर रहा हूं:

प्रथम प्रसंग: 85 साल का एक बूढ़ा शेर, बहादुर शाह ज़फर अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था तो अंग्रेजों ने दो पंक्तियां लिखवाकर भेजीं कि,
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

तो बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर दो पंक्तियां जवाब के तौर पर लिखीं:
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्थान की।।


दूसरा प्रसंगः जब पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां को फांसी की सजा सुनाई गई तो जेल में अशफ़ाक की आखों से आंसू की दो बूंदें टपक गईं। कहीं से यह जानकारी बिस्मिल को मिली तो बिस्मिल ने पत्र के माध्यम से अशफ़ाक से पूछा, 'अशफ़ाक, फांसी से डर गए क्या?' तो अशफ़ाक ने बिस्मिल को उत्तर देते हुए लिखा, 'बिस्मिल, रोता इसलिए नहीं कि मैं मरने वाला हूं, मैं इस लिए रोता हूं कि तुमने सनातन धर्म में जन्म लिया है, तुम्हारे धर्म की मान्यता है कि तुम्हारे यहां पुनर्जन्म होता है, तुम मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए कई बार जन्म लेकर संघर्ष कर सकते हो। लेकिन मेरे मजहब की मान्यता है कि पुनर्जन्म नहीं होता होता इसलिए मैं मां भारती के लिए अपना एक जीवन ही कुर्बान कर पाऊंगा।

इन दो प्रसंगों के माध्यम से मैं वह समय याद दिलाना चाहता हूं जब इस देश, इस मातृभूमि के लिए स्वयं को न्योछावर कर देने वाले मात्र राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मानते थे। उन क्रांतिकारियों को पता था कि देश की सत्ता का संचालन जिनके हाथों में है, उन फिरंगियों लिए उनकी भावनाओं का कोई महत्व नहीं है। लेकिन इस दौर में जब हम पूरी दुनिया के सामने एक स्वस्थ लोकतंत्र रखने का दावा करते हैं, ऐसे में क्या वास्तव में देश का सैनिक इस बात को स्वीकार कर सकता है कि यदि वह अपनी जान, इस राष्ट्र की रक्षा के लिए कुर्बान करेगा तो उसके बाद इस देश की सत्ता के सिंहासन पर बैठे वे लोग, जिनको वहां बैठाने में उस सैनिक का भी योगदान है, क्या वे आतंक को रोकने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ आतंकियों से निपटने की जिम्मेदारी सेना को दे पाएंगे?

हमारे देश के एक बड़े नेता और केन्द्र की सरकार के मंत्री अरुण जेटली जी ने प्रेस वार्ता के दौरान दो दिन पहले कहा कि पठानकोट ऑपरेशन में अधिक समय इस लिए लग गया क्यों कि हम आतंकियों को जिंदा पकड़ना चाहते थे। अरे जेटली जी, एक कसाब पर इस देश की तत्कालीन सरकार ने 3.5 लाख प्रतिदिन के हिसाब से 70 करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर दिए। उस दौरान तो आप बड़े गर्व से कहते थे कि देश पर हमला करने वालों को तुरंत मार देना चाहिए। शायद अपने इसी बदले हुए रवैये को आप सत्ता की जिम्मेदारी कहें लेकिन मैं इसे इच्छा शक्ति की नपुंसकता मानता हूं। इस देश के सैनिक चाहते तो उन आतंकियों को जिंदा भी पकड़ सकते थे, लेकिन उन्हें पता था कि अगर जिंदा पकड़ लिया तो आप उन आतंकियों के लिए एक विशिष्ट बैरक के साथ तैयार खड़े हैं। साहब, उन्होंने नेताओं की तरह दलाली के पैसे से खरीदी गई खद्दर नहीं पहनी हैं, वे मां भारती की रक्षा के लिए तैयार वर्दी पहनते हैं, उन्हें यह पता होता है कि किस पर गोली चलानी है और किसे जीवित छोड़ना है। लाल किले से आतंक के खिलाफ आग की भाषा बोलना बहुत आसान होता है लेकिन उस आतंक के खिलाफ आग उगलने का काम इस देश के सैनिकों की बन्दूकें करती हैं।

6 आतंकियों को मारने में हमने इस देश के 7 जांबाज जवानों को खो दिया। कल्पना करिए उन परिवारों के बारे में, जिनके परिवार का सदस्य कुछ ही पलों में उनसे दूर चला गया। निरंजन की उस दो साल की बेटी विस्मय के मन की पीड़ा को महसूस करिए। उस गरुड़ कमांडो गुरुसेवक सिंह की पत्नी के विषय में सोचिए जिसने मात्र डेढ़ महीने पहले 18 नवंबर को एक नए जीवन की शुरुआत की थी। शहीद हवलदार कुलवंत सिंह के उस बेटे के बारे में सोचिए जो नए साल पर अपने पिता और नई बाइक की प्रतीक्षा कर रहा था। धन्य है यह देश जहां अपने पति को राष्ट्ररक्षा में न्यौछावर कर देने के 24 घंटे भी नहीं पूरे हुए और जब पत्रकारों ने उस वीरांगना से बात की तो भीगी आंखों के साथ उसने जवाब दिया, 'अभी तो मेरा बेटा भी है, वह अपने पिता के सपनों को पूरा करेगा। मैं उसे भी सेना में भेजूंगी।'

आतंकी हमले क्यों होते हैं उसका एक मात्र कारण है कि हमने सेना के पैरों में बेड़ियां डाल कर रखी हैं। जब मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा कि अब भारत को इन आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए तो मेरे कुछ मित्रों ने कहा कि आप क्यों चाहते हैं कि भारत, पाकिस्तान पर हमला करे? क्या युद्ध एक मात्र विकल्प है? मैं, उन्हें और अधिक स्पष्टता के साथ बता देना चाहता हूं कि मैं पाकिस्तान पर हमला नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि उन आतंकियों पर हमला हो जो पाकिस्तान में बैठे हैं। पाकिस्तान हमारा दुश्मन नहीं है। वहां भी हमारे जैसे ही लोग रहते हैं। उनके भी पूर्वजों ने कभी इस देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था। वे भी नहीं चाहते कि स्कूल में पढ़ने गए उनके बच्चे वापस ना आएं। मुझे उम्मीद है कि पाकिस्तान हमारा साथ देगा और मान लीजिए हमला करने के दौरान पाकिस्तान उन आतंकियों के साथ खड़ा हो जाए तो हम इतने सक्षम हैं कि एक और युद्ध लड़ सके। अगर हमने साफ तौर पर विश्व को यह संदेश देकर हमला किया कि हमारा हमला आतंकियों पर है तो विश्वास मानिए विश्व का कोई देश पाकिस्तान के साथ नहीं खड़ा होगा।

मेरी पीड़ा क्यों है उसका एक कारण है। अभिमन्यु, चक्रव्यूह का सप्तम द्वार नहीं भेद पाया तो इसमें अभिमन्यु का कोई दोष नहीं था। कभी पिता अर्जुन और मामा श्रीकृष्ण को यह फुर्सत नहीं मिली कि वे अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदने की कला सिखा दें। अभिमन्यु को मां सुभ्रदा के गर्भ में मात्र एक बार चक्रव्यूह को भेदने की कहानी सुनने का अवसर मिला लेकिन सुभ्रदा को नींद आ गई। अभिमन्यु ने तो अपनी जिम्मेदारी निभाई और समय आने पर यह प्रमाणित किया कि उनको मां के गर्भ में जितना सीखने का अवसर मिला उतना उसने पूरी निष्ठा से सीखा। मोदी जी से पहले मैंने दो सरकारें और देखीं, एक अटल जी की सरकार और एक मनमोहन जी की सरकार दोनों ने इस देश के युवाओं को संतुष्टि नहीं दी। अब अगर मोदी सरकार भी उनकी तरह ही मात्र शोक-संवेदना व्यक्त करके चुपचाप बैठी रहेगी तो मेरे बाद की पीढ़ी को यह विश्वास दिलाना काफी मुश्किल होगा कि आतंक को रोकने के लिए अगर सेना में गए तो देश की राजनीति आपके साथ खड़ी होगी। फिर शायद कोई बेटा सेना में नहीं जाएगा, फिर शायद कोई मां अपने बेटे को सेना में नहीं भेजेगी और फिर शायद कोई बेटी अपने पिता की शहादत पर अर्थी को कंधा देती नहीं दिखेगी। यह देश युद्ध और बुद्ध, दोनों ही संस्कृतियों को जीता है, हमें यह बताना होगा कि हम गांधी और बुद्ध के अनुयायी भगत सिंह और वीर शिवाजी की भाषा भी जानते हैं। हमें यह समझना होगा कि हमारा शत्रु कैसा है? हमारी कार्यशैली, हमारे शत्रु की कार्यशैली पर निर्भर होनी चाहिए। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि अगर हम एक बार विश्व स्तर पर यह संदेश दे दें कि हम आतंक का मुंहतोड़ जवाब दे देंगे तो शायद इस देश में आतंकवादी हमलों की तादात कम हो जाए।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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