Saturday, 31 October 2015

सोशल मीडिया का सच: एक विश्लेषण


दोस्तों, आज एक अजब दौर आ गया है। व्यक्तिगत बातों से लेकर सामाजिक चिंतन तक सब कुछ सोशल मीडिया पर ही हो रहा है। आज ट्विटर, फेसबुक और वाट्सऐप अपने प्रचंड क्रांतिकारी दौर से गुजर रहा है...

जिसने चार दिन पहले सोशल मीडिया चलाना शुरू किया है उससे लेकर कल तक सड़क पर लाठियां खाने वाला व्यक्ति भी सोशल मीडिया पर ही क्रांति करना चाहता है...
कोई बेडरूम में लेटे-लेटे गौहत्या करने वालों को सबक सिखाने  की बातें कर रहा है तो किसी के इरादे सोफे पर बैठे बैठे महंगाई बेरोजगारी या बांग्लादेशियों को उखाड़ फेंकने के हो रहे हैं। हंसी तो इस बात पर आती है कि सप्ताह में एक दिन नहाने वाले लोग स्वच्छता अभियान की खिलाफत और समर्थन कर रहे हैं।

अपने बिस्तर से उठकर एक गिलास पानी लेने पर नोबेल पुरस्कार की उम्मीद रखने वाले बता रहे हैं कि मां-बाप की सेवा कैसे करनी चाहिए। इतना ही नहीं जिन्होंने आजतक बचपन में कंचे तक नहीं जीते वे लोग बता रहे हैं कि भारत रत्न किसे मिलना चाहिए। जिन्हें गली में होने वाले क्रिकेट में इसी शर्त पर खिलाया जाता था कि बॉल कोई भी मारे पर अगर नाली में गई तो निकालना तुझे ही पड़ेगा वे आज कोहली को समझाते पाए जाते कि उसे कैसे खेलना है।

कुछ लोग वास्तव में बधाई के पात्र हैं जिन्होंने देश में महिलाओं की कम जनसंख्या को देखते हुए लड़कियों के नाम से नकली आईडी बनाकर जनसंख्या अनुपात को बराबर कर दिया है। जिन्हें अपने गोत्र का नहीं पता है वे लोग आज हिन्दुत्व के लिए जान देने की बातें कर रहे हैं। जो नौजवान एक बालतोड़ हो जाने पर रो-रो कर पूरे मोहल्ले में
हल्ला मचा देते हैं वे सोशल मीडिया पर देश के लिए सर कटा लेने की बात करते दिखेंगे। आप कितने भी तर्कों के साथ अपना विषय रखें लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो सकारात्मक सोच ही नहीं सकते। आज भाजपा समर्थक अंधभक्त, आप समर्थक उल्लू तथा कांग्रेस समर्थक आतंकवादियों के समर्थक और सोनिया के चमचे करार दिए जाते हैं।

कॉपी पेस्ट करनेवालों के तो कहने ही क्या! किसी की भी पोस्ट चेंप कर एसे व्यवहार करेंगे जैसे साहित्य की गंगा उसके घर से ही बहती है और वो भी 'अवश्य पढ़े ' तथा 'मार्केट में नया है' की सूचना के साथ। टैगियों की तो बात ही निराली है। इन्हें ऐसा लगता है कि जब तक ये गुड मॉर्निंग वाले पोस्ट पर टैग नहीं करेंगे तब तक लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि सुबह हो चुकी है । जिनकी वजह से शादियों में गुलाबजामुन वाले स्टॉल पर एक आदमी खड़ा रखना जरूरी होता है वे लोग आम बजट पर टिप्पणी करते हुए पाए जाते हैं। कॉकरोच देखकर चिल्लाते हुए दस किलोमीटर तक भागने वाले पाकिस्तान को धमका रहे होते हैं कि "अब भी वक्त है सुधर जाओ"।

दोस्तों, मैं यह नहीं कहता कि सोशल मीडिया पर लिखना नहीं चाहिए या लोगों को जागरुक नहीं करना चाहिए लेकिन मैं इतना जरूर चाहता हूं ये बातें सिर्फ लाइक और कमेंट पाने  तक ही सीमित ना रह जाएं। दोस्तों मैं 2010 से फेसबुक चला रहा हूं। उस समय मेरी एक एक पोस्ट पर 500-700 लाइक और 100-150 शेयर आते थे। लेकिन दोस्तों मैं उनमें से नहीं था कि सिर्फ फेसबुक तक ही सीमित रहता। दोस्तों मैं बस यह चाहता हूं कि कितने भी लाइक कमेंट बटोर लो लेकिन जब इस देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए 5 अप्रैल 2011 की तरह कोई 75 साल का युवा आंदोलनरत हो तो भले ही उसके साथ खड़े होने के लिए आप जंतर मंतर ना पहुंच पाना लेकिन दोस्तों मेरी तरह जहां भी रहना वहीं पर आंदोलन करते हुए लाठियां खाने से कभी पीछे मत हटना। दोस्तों, 16 दिसंबर 2012 जैसी घटना के बाद अगर दामिनी जैसी देश की कोई बेटी पुकारे तो अपने सारे लाइक कमेंट्स को छोड़ कर सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोगों से उस बेटी के साथ हुई दुष्टता का हिसाब मांगने पहुंच जाना।

वंदे भारती

Friday, 30 October 2015

यही तो है घोर कलियुग...




दोस्तों अभी कुछ दिन पहले विजयादशमी का पर्व बीता। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने राक्षसों के राजा रावण का वध किया था। रावण दहन का अर्थ है कि हम हमारे अंदर की बुराइयों का अंत कर भगवान श्रीराम के आदर्शों पर चलने की कोशिश करें लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ और ही दिख रहा है मेरे पास कई संदेश आए जिसमें यह जताने का प्रयास किया गया कि अगर हम आज रावण भी बन जाएं तो बेहतर हैं। मेरे पास एक संदेश आया कि रावण में अहंकार लेकिन पश्चाताप भी था, रावण में वासना के साथ संयम भी था, रावण में सीता के अपहरण की ताकत थी साथ ही बिना सहमति परस्त्री को स्पर्श भी न करने का संकल्प भी था। इस प्रकार से रावण की महिमा मंडित किया जाना मुझे अच्छा नहीं लगा तो मैंने सोचा कि इस विषय पर कुछ लिखा जाए।

मेरे एक मित्र ने संदेश भेजा कि सीता जीवित मिली यह निश्चित रूप से श्रीराम की ताकत थी, परन्तु वह पवित्र मिली यह रावण की मर्यादा थी। क्या शानदार विश्लेषण था उनका। किसी ने कहा है कि अधूरा ज्ञान विनाश की जड़ होता है। बिना अध्ययन के इस प्रकार के विषयों को समाज में फैलाना एक राष्ट्रीय अपराध है। रावण ने सीता को बलपूर्वक इसलिए हाथ नहीं लगाया क्योंकि उसे कुबेर के पुत्र नलकुबेर ने श्राप दिया था कि यदि रावण ने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध अनैतिक कामेच्छा से छुआ या अपने महल में रखा तो तेरे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे। रावण ने कुबेर की पत्नी के साथ बलात्कार किया था । इसी डर के कारण रावण ने ना तो सीता को कभी बलपूर्वक छूने का प्रयास किया और न ही अपने महल में रखा। इतना ही नहीं रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहां रावण ने माया को अपने वाक्जाल में फंसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासनायुक्त होकर मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया। इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।

कुछ लोग तो रावण जैसा भाई बनने तक की सलाह दे देते हैं। उनका मानना है कि बहन के अपमान का बदला लेने के लिए सीता का हरण किया और अपनी बहन के लिए अपने पूरे कुल की कुर्बानी दे दी। जबकि यह सत्य नहीं है। रावण ने अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए सीता का अपहरण नहीं किया बल्कि इसलिए किया क्योंकि वह कामांध था। उसने अपने पूरे जीवनकाल में 70 से भी ज्यादा स्त्रियों के साथ बलात्कार किया था जिनमें कुबेर की पत्नी आख़िरी थी। जब शूर्पणखा ने रावण के सामने सीता की सुंदरता का वर्णन किया, तो उसके मन में सीता को प्राप्त करने की लालसा जाग उठी। इसलिए रावण ने सीता का हरण किया। और रावण की बहन शूर्पणखा ने यूं ही रावण के समक्ष सीता के विषय में नहीं बताया था अपितु इसके पीछे भी एक रहस्य था। शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था।  वह कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का भी वध कर दिया। इस कारण से श्री राम और लक्ष्मण की वीरता को देखते हुए उसने रावण से अपना बदला लेने के लिए यह खेल खेला।

कुछ लोगों का मानना है कि रावण अजेय योद्धा था। वह अपने जीवन में कभी किसी से नहीं हारा। जबकि ये बात पूरी तरह से गलत है। रावण राम के अलावा पाताल लोक के राजा बलि, महिष्मति के राजा कार्तवीर्य अर्जुन, वानरराज बालि और भगवान शिव से पराजित हो चुका था। वह कोई शिव भक्त नहीं था बल्कि उसे पता था कि जिनसे जिनसे वह पराजित हुआ है उनमें एकमात्र शिव ही ऐसे हैं जो अजर अमर हैं इस नाते वह शिव जी का सम्मान करता था। इस सम्मान को यदि डर का नाम दिया जाए तो भी गलत नहीं होगा। वह जब बैजनाथ का शिवलिंग लेकर जा रहा था, तब उसे लघुशंका आई, उसने ब्राह्मण के रुप में आए विष्णु को शिवलिंग थमा दिया और खुद निवृत्त होने चला गया। विष्णु ने शिवलिंग वहीं जमीन पर रख दिया। जब रावण आया और उसने शिवलिंग को उठाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं हिल सका तो रावण ने गुस्से में शिवलिंग पर मुठ्ठी से प्रहार कर दिया, जिससे शिवलिंग आधे से ज्यादा जमीन में धंस गया। मैं मानता हूं कि रावण विद्वान था, लेकिन उसने अपने ज्ञान को कभी व्यवहारिक जीवन में नहीं उतारा। लाखों ऋषियों का वध किया, कई यज्ञों का ध्वंस किया और महिलाओं का अपहरण करके उनका बलात्कार किया। रावण ने रंभा नामक अप्सरा से भी बलात्कार किया था। रावण ने वेदवती नाम की एक ब्राह्मणी के रूप से प्रभावित होकर उनसे भी बलात्कार करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने किसी प्रकार से स्वयं को बचाकर आत्मदाह कर लिया। हो सकता है कि आप कहें कि यदि रावण शिव भक्त नहीं था तो शिव जी ने रावण को सोने की लंका क्यों दी लेकिन दोस्तों यह सत्य नहीं है। सत्य यह है कि लंका का निर्माण देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा ने किया था। उसमें सबसे पहले राक्षस ही निवास करते थे। भगवान विष्णु के भय से जब राक्षस पाताल चले तो लंका सूनी हो गई। रावण के बड़े भाई (सौतेले) ने अपनी तपस्या से भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने उसे लोकपाल बना दिया और सोने की लंका में निवास करने के लिए कहा। जब रावण विश्व विजय पर निकला तो उसने कुबेर से सोने की लंका व पुष्पक विमान भी छीन लिया और उसकी पत्नी से बलात्कार किया। फिर रावण ने वहां राक्षसों का राज्य स्थापित किया।
मित्रों इस प्रकार की बातें वे लोग करते हैं जिन्होंने कभी रामायण पढ़ने की कोशिश तक नहीं की। उनकी सम्पूर्ण रामायण मात्र स्व. रामानन्द सागर के धारावाहिक और चचा की विचारधारा वाली पाठ्यपुस्तकों तक ही सीमित है और जो थोड़ी बहुत रही सही कसर थी वह वामपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने पूरी कर दी। इसी का परिणाम है कि स्थिति ऐसी बन गई कि लोगों को रावण बनने का प्रवचन दिया जाने लगा, नमस्ते के स्थान पर कई लोग जय लंकेश कहा जाने लगा। हम कहते हैं कि राम एक चरित्र हैं तो उसी प्रकार रावण एक दुष्चरित्र है इसलिए लाखों साल से हिन्दू रावण और बुराई को पर्यायवाची मानते आये हैं किन्तु आज कुछ बुद्धि भ्रष्ट लोगों को प्रभु श्रीराम के निर्मल चरित्र के स्थान पर रावण अधिक प्रेरणास्पद लगता है। आपसे निवेदन है कि इस दुष्चक्र में आप न फंसें। राम बनें, राम का जन्म रावण यानी बुराई को अच्छा ठहराने के लिए नहीं अपितु रावण का संहार करने के लिए हुआ था।

वन्दे भारती


Friday, 23 October 2015

कलराज जी, 'अच्छे दिन' जाने वाले हैं...



इस देश की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। आज संवेदनहीनता और असहिष्णुता की पराकाष्ठा को पार करते हुए कांग्रेस के एक नेता जयराम रमेश ने गोमांस के मुद्दे पर कहा कि किसी को लोगों पर यह नहीं थोपना चाहिए कि वे क्या खाएं और क्या न खाएं। रमेश ने कहा, 'आप इस पर नियम-कायदे नहीं बना सकते। आप यह नहीं कह सकते कि आप गोमांस नहीं खा सकते। कल आप कहेंगे कि 'दाल मखनी' नहीं खा सकते, आप 'मटर पनीर' नहीं खा सकते। क्या बकवास है यह सब? भारत किस तरफ जा रहा है?'

ऐसे हैं हमारे देश के नेता। जयराम रमेश वो नेता हैं जिनको इस देश की जनता ने केन्द्रीय मंत्री स्वीकार किया। रमेश जी भारत की चिंता मुझे भी है। मैं भी दिनरात यही सोचता रहता हूं कि भारत किस ओर जा रहा है। इस देश के लोगों को एकजुट करने के लिए जैसे ही कोई खड़ा होता है आप जैसे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारत की अस्मिता का चीरहरण करने लगते हैं। अरे रमेश जी आप कहते हैं कि बीफ खाना एक निजी मुद्दा है। बस आप इतना बता दो कि आपकी मां के साथ कोई दुर्व्यवहार करे, दुराचार करे तो क्या यह दुराचार करने वाले का निजी मुद्दा है? क्या आप दुराचार करने वाले व्यक्ति को भी अपने इसी सिद्धान्त के आधार पर स्वतंत्रता देंगे। नहीं दे सकते, क्यों कि उसे झेलने वाली आपकी मां है। और नेताजी यदि आपने उस दुराचारी को स्वतंत्रता दे भी दी तो भी इस देश के युवा आपकी मां के लिए खड़े रहेंगे क्यों कि यह वह देश है जिसमें मां को ईश्वर से भी ऊपर माना गया है।

स्वतंत्रता और स्वच्छन्दता के अंतर को समझिए। मैं आपको याद दिला दूं कि इस देश का आधार इस देश की संस्कृति है और इस देश की संस्कृति में गाय को पूज्यनीय माना गया है। इसे हिंदू मुसलमान से मत जोड़िए। मेरा यह क्रोध मात्र कांग्रेस के जयराम रमेश जी से ही संबन्धित नहीं है अपितु आज इस देश की तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय नेता ने भी बहुत सुन्दर बात कही, केन्द्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रम मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र ने कहा कि "यदि लोग बीफ खाते हैं तो आप उन्हें कैसे रोक सकते हैं?"
सही कहा कलराज जी इस देश में जब आप जैसे दोगले लोगों को हम मंत्री बनने से नहीं रोक पाए तो बीफ खाने वालों को कैसे रोकेंगे। मुझे आपसे ज्यादा गुस्सा तो स्वयं पर आ रहा है। जब भाजपा का गढ़ कहे जाने वाले लखनऊ में भाजपा का अस्तित्व समाप्त होने की कगार पर था, उस समय आपको लखनऊ पूर्वी विधानसभा प्रत्याशी बनाया गया था और आपके चुनाव प्रचार के लिए आपकी विधानसभा में रहने वाले अपने मित्र नितिन मित्तल के कहने पर आपके चुनाव प्रचार में मैं भी गया था। लगातार 16 दिन तक अपने 18 मित्रों की टीम के साथ मैं उस विधानसभा में जाकर बिना कुछखाए पिए आपका प्रचार करता था। नितिन हमेशा मुझसे यही कहता था कि विश्व गौरव कलराज जी, अटल जी के समकक्ष हैं, यदि कलराज जी हार गए तो अटल जी हार जाएंगे। काश उस समय आपका यह घिनौना चेहरा मेरे सामने आ गया होता तो मैं आपके विरोध में प्रचार करता।

आपके चुनाव में तन, मन और धन से लगने वाले उस नितिन ने गौ संरक्षण हेतु काऊ मिल्क पार्टी जैसा देशव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया और आप उसको शाबासी देने के स्थान पर अप्रत्यक्ष रुप से उसके विरोध में खड़े हो गए। किसी ने सच ही कहा है कि सत्ता बड़े बड़े मठाधीशों को मानसिक रूप से विकलांग बना देती है। ऐसे विषयों पर मीडिया को तो मसाला  मिल गया लेकिन उस विचार का क्या जो देश की एकता, अखंडता और एकात्मता का संरक्षण करेगा।

आप दोनों बड़े नेता हैं, लाखों फॉलोवर्स हैं आपके लेकिन इतिहास आपको माफ नहीं करेगा....रही बात मेरी तो मुझे इस बात की चिंता नहीं कि देश ऐसे चल रहा है....मुझे चिंता इस बात की है कि कहीं देश यूं ही ना चलता रहे....

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Thursday, 22 October 2015

संघ क्यों है और क्यों रहेगा?

दोस्तों, आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 साल का हो चुका है। 1925 में दशहरे के दिन, उस दिन की सार्थकता को प्रमाणित करते हुए डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। सांप्रदायिक,हिंदूवादी, फासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ अपने उद्देश्य से नहीं भटका। मैं इस लेख को इस लिए नहीं लिख रहा क्यों कि मैं एक स्वयंसेवक हूं अपितु अपने पत्रकारिता धर्म को निभाते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ देश के सामने उस संगठन के बारे में लिख रहा हूं जिसकी तुलना आईएसआईएस से करके आतंकवादी करार दिया जाता है।

दोस्तों, स्वतंत्रता के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नजर रखी। यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार। उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे। विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज्यादा राहत शिविर लगाए थे।

1962 में हुए युद्ध के समय सेना की मदद के लिए देशभर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी। संघ ने सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता भी की। जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए। निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- 'यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।'

आज जिस कश्मीर के लिए हम पाकिस्तान से वार्ता कर रहे हैं। वह कश्मीर कभी यह कहता था कि हम भारत के साथ नहीं आएंगे। कश्मीर के महाराजा हरिसिंह विलय का फैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार तो- हम क्या करें वाली मुद्रा में- मुंह बिचकाए बैठी थी। उस समय सरदार पटेल और संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर की इच्छा शक्ति के कारण कश्मीर का भारत में विलय हुआ।

1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया था। शास्त्रीजी ने कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था।

इतना ही नहीं दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे। गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा
आज़ाद हुआ।

भारत का काला अध्याय कहे जाने वाले 1975 से 1977 के बीच लगे आपातकाल के खिलाफ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताजा है। सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन चलाना शुरू किया। आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने संभाला। जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं।

1955 में बना भारतीय मजदूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मजदूर संगठन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था। कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मजदूर संघ ने ही शुरू किया था। आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मजदूर संगठन है। जहां बड़ी संख्या में जमींदार थे उस राजस्थान में खुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं। संघ के स्वयंसेवक शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने।

भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे संगठनों की स्थापना संघ के स्वयंसेवकों ने संघ से प्रेरित होकर ही की। विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है। केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं। संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं। अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज्यादा काम कर रहा है। लगभग 35 हजार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू और कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम और 19 हिंदू बच्चे हैं।

1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक- संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है। भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में संघ के स्वयंसेवकों ने संघ की विचारधारा का मूर्त रूप प्रस्तुत किया।

दोस्तों संघ एक संगठन है, जिसमें विभिन्न प्रकार के लोग जुड़े हैं। संभव है कि संघ के किसी स्वयंसेवक की व्यक्तिगत विचारधारा से आपकी सहमति ना हो लेकिन संघ की मूल विचारधारा से असहमति का विषय किसी के मन में नहीं आ सकता। सैकड़ों आरोपों के बावजूद यदि संघ आज खड़ा है तो उसका एकमात्र कारण है कि संघ ने कभी बांटने की कोशिश नहीं की। राष्ट्रीय एकात्मता के आधारभूत स्तंभ के रूप में संघ आज भी खड़ा है। मित्रों, जब तक संघ का मूल विचार संघ के स्वयंसेवकों के मन में स्थापित रहेगा तब तक संघ इस धरती पर रहेगा और जिस दिन संघ के स्वयंसेवक ने राजनीति में 'अनावश्यक' हस्तक्षेप शुरू कर दिया उस दिन संघ समाप्त हो जाएगा।

वंदे भारती

Wednesday, 21 October 2015

ऐसे शरियत की भारत को जरूरत नहीं

मित्रों, अभी अभी एक खबर देखी कि मुंबई के वरली तट के निकट स्थित एक छोटे से टापू पर स्थित एक हाजी अली दरगाह में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित है। इस खबर को पड़कर मेरी इच्छा हुई कि इस दरगाह के विषय में जाना जाए, लेकिन कुछ खास जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी लेकिन वर्तमान समय में जो मामला चल रहा है उसके विषय में पूर्ण जानकारी अवश्य मिल गई।

सोमवार को हाजी अली दरगाह के ट्रस्टियों ने मीटिंग में फैसला लेकर मुंबई हाईकोर्ट को एक पत्र के जरिए यह जानकारी दी है कि वे दरगाह में किसी महिला को घुसने नहीं देंगे। इससे पहले कुछ महिलाओं तथा महिला संगठनों ने इस बात की याचिका दाखिल की थी कि इस दरगाह में महिलाओं के प्रतिबंधित प्रवेश को तत्काल बहाल किया जाए। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाली महिलाओं के वकील राजू मोरे ने अदालत में दलील दी थी कि अन्य दरगाहों या धार्मिक स्थलों पर महिलाओं की एंट्री बैन नहीं है फिर हाजी अली दरगाह में पाबंदी क्यों है।

जस्टिस वी.एम.कानडे की खंडपीठ को हाजी अली दरगाह के कमिटी मेंबर्स ने जो पत्र दिया है। उसमें कहा गया है कि मुस्लिम संत के मजार के करीब महिलाओं का प्रवेश महापाप है। दरगाह कमिटी ने अदालत को बताया कि उसने इस संबंध में निर्णय लेने का जो आदेश दिया था उसके तहत दरगाह के ट्रस्टियों की दोबारा मीटिंग बुलाई गई थी। जिसमें एक बार फिर से सर्वसम्मति से महिलाओं को दरगाह के गर्भगृह में प्रवेश नहीं देने का निर्णय लिया गया है। दरगाह के ट्रस्ट ने अपनी बात के समर्थन में हाईकोर्ट के समक्ष एक दलील और पेश की है। जिसमें कहा गया है कि संविधान के कानून और विशेषकर अनुच्छेद 26 के तहत ट्रस्ट को अपने धार्मिक मामलों को अपने मूलभूत अधिकारों के तहत चलाने की आजादी मिली हुई है। और इसमें किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप अनुचित है।
मित्रों , किस देश में जी रहे हैं हम और कैसे लोगों के साथ। जिस देश में अर्धनारीश्वर स्वरूप की पूजा होती है, जिस देश में नारी को पूज्या माना गया है, जिस देश में ऐसे मंदिर हैं जहां बिना पत्नी के आप ईश्वर के दर्शन नहीं कर सकते, जिस देश में बिना विवाह के मोक्ष की कल्पना नहीं की जाती है, उस देश के अन्दर आज भी ऐसे लोग हैं जो नारी को सजदा तक नहीं करने देते।

मेरे इस विषय को हिंदू- मुसलमान से जोड़कर ना पढ़ें। मैं मानता हूं कि हिंदुओं में भी कुछ लोग नारियों को पुरुष के बराबर नहीं समझते। वे लोग लड़कियों को पढ़ने से या अन्य कई कामों से रोकते हैं लेकिन हमें यह विचार करना होगा कि क्या यह हमारी मूल संस्कृति थी। इस देश के अन्दर गार्गी जैसी विद्युषी हुई है जो याज्ञवल्क्य जैसे ज्ञानी को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती देती है। यह देश रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेन्नमा, बेगम हजरत महल का देश है, यहां पर ऐसे लोगों का कोई स्थान नहीं जो लिंग भेद को बढ़ावा दे रहे हैं।

कल शाम की ही बात है कि एक चैनल की डीबेट में एक मोहतरमा शरियत कानून की वकालत कर रही थीं। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसे लोगों को हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर क्यों बरदाश्त कर रहे हैं। क्यों उन्हें यह मौका दिया जाता है कि वे भेदभाव करने वाले कानून को लागू करके देश तोड़ने वालों का समर्थन करें।
यदि मेरे इस विषय का किसी के पास कोई जवाब है तो कृपया बताएं...
वन्दे भारती

Thursday, 15 October 2015

अगर वह हार गया तो समझ लेना....

मित्रों हमारा अभियान आगे बढ़ रहा है,कुछ हमारा साथ देने के लिए आगे आ रहे हैं तो कुछ हमें अपने साथ लेना चाहते हैं। आज शाम मेरे पास एक राजनीतिक संगठन से फ़ोन आया। बात कर रहे व्यक्ति ने मुझसे कहा कि विश्व गौरव जी आप नितिन जी से बात करके इस अभियान को हमारे बैनर पर चलाइए,हमारे पास बहुत से कार्यकर्ता हैं, मीडिया का सपोर्ट भी मिलेगा। आप सब लोग बस हमारे साथ आ जाइए। मैं समझ गया कि अब हमारे उद्देश्य को पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता क्यों कि जब झूठे वादे और कसमों के आधार पर सत्ता के सिंघासन पर बैठने वाली राजनीतिक पार्टियां आपका सहयोग मांगने लगें तो समझ जाइए कि आपकी मेहनत रंग ला रही है।मैंने उन नेता जी को तो मना कर दिया लेकिन सोचा कि अपने भाई और #मिल्कपार्टी अभियान के सूत्रधार श्री नितिन मित्तल जी के लिए कुछ लिखूं। आज का ये ब्लॉग उस दिन के लिए लिख रहा हूँ जब हमारा ये आंदोलन सफल हो जाएगा। बहुत से लालच दिए जाएंगे, बहुत से लोग इस आंदोलन के कर्णधारों से जुड़कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहेंगे लेकिन बस इतना निवेदन है कि उनके जाल में मत फंसना...

सबसे पहले नितिन को आगाह करते हुए कुछ पक्तियां आप सभी को समर्पित करता हूँ।

एक बार फिर जीवन का रथ मुड़ा राष्ट्रहित पथ पर
राजनीति ने डोरे डाले फिर सेवा के व्रत पर
लक्ष्मण रेखा बड़ी क्षीण है, बड़ी क्रूर है काई
कदम कदम पर फिसलाएगी रेशम सी चिकनाई
काजल के पथ पर चढ़ना और चढ़ कर पार उतरना
बहुत कठिन है निष्कलंक रहकर ये सब करना।


मित्रों, बड़ी लड़ाई है, थोड़ी मुश्किल है लेकिन आसान काम करना होता तो ईश्वर इस काम के लिए नितिन जैसे संघर्षशील व्यक्ति को नहीं चुनता। छोटा काम तो कोई भी कर सकता है। अगर किसी एक जगह पर मिल्क पार्टी करनी होती तो लखनऊ या दिल्ली जैसे स्थानों पर हजारों विद्यार्थी तो नितिन के एक इशारे पर वैसे ही खड़े हो जाते और शानदार पार्टी करा देते। ये आंदोलन एक निर्णायक आंदोलन सिद्ध होगा। मैं खुद को इस लायक नहीं समझता कि नितिन या मुस्लिम गौ भक्त भाई दानिश आजाद के बराबर खुद को कह सकूँ। लेकिन मैं बस इतना जानता हूँ कि कभी प्रेम पर, कभी राजनीति पर,कभी सिद्धांतों पर, कभी संस्कृति,कभी शायरियां लिखने वाली मेरी कलम अब अगले कुछ समय में सिर्फ गाय माता के लिए लिखेगी।
अपने दोस्तों में, परिवार में, ऑफिस में मुझे सिर्फ इस आंदोलन की चर्चा करनी है वो सिर्फ इस लिए कि गौ हत्या बंद हो। अलगे कुछ महीने के बाद अगर देश की संसद गौ हत्या निषेध क़ानून लागू करे, अगर 2017 में उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में कोई राजनीतिक पार्टी अपने घोषणा पत्र में यह लिखे कि हम गौ संरक्षण को प्रोत्साहन देने के लिए कानून लाएंगे तो समझ लेना कि देश जीत गया, मैं यानी विश्व गौरव जीत गया।

मित्रों, आज वो समय चल रहा है जब इस देश के लोग ये बात मान चुके हैं कि इस देश में गौ हत्या निषेध जैसा कोई कानून नहीं आ सकता, यह वो समय है जब इस देश का युवा गौ हत्या जैसे विषयों पर बात करने को साम्प्रदायिकता समझता है। ऐसे समय में इस आंदोलन को मिल रहा समर्थन व्यक्तिगत रूप से मुझे शक्ति दे रहा है।

मैं पेशे से एक समाचार संस्थान में पत्रकार हूं। दिन के 9 घंटे मैं ऑफिस को देता हूं फिर कुछ समय अन्य व्यक्तिगत कामों को देकर सो जाता हूं। आज से 20 दिन पहले मेरे पूज्य गुरुदेव एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण भगत जी के निर्देशानुसार एक पुस्तक लिखनी  शुरू की थी लेकिन गौ रक्षा के इस आंदोलन के मद्देनजर अपने सभी कामों को छोड़कर सिर्फ यही काम कर रहा हूं। ऑफिस में 9 घंटे देने के बाद पिछले 6 दिनों से सिर्फ 4-5 घंटे की नींद ले रहा हूं ताकि मेरी मां यह न कहे कि मेरा बेटा इतना कमजोर है कि अपनी जीवनदायिनी के लिए कुछ समय भी नहीं दे सकता।

दोस्तों, इस विषय पर नितिन से मेरी बात हुई तो मैंने उससे कहा कि क्या देश आपका साथ देगा? तो उसने कहा कि पूरा देश मेरे लिए एकजुट हो या ना हो लेकिन अपनी मां के लिए कौन बेटा नहीं खड़ा होगा? मैंने बस इतना ही कहा कि अगर अब देश नहीं खड़ा हुआ तो मैं दुबारा सोशल मीडिया पर राष्ट्रवाद को आधार मानकर कुछ नहीं लिखूंगा और ना ही अपने छोटे भाइयों से ऐसे विषय पर लिखने के लिए कहूंगा। किसी मंच से राष्ट्रवाद की बातें नहीं करूंगा। मैं यह मान लूंगा कि जिस देश के बेटे अपनी मां के लिए एकजुट नहीं हो सकते, वो मेरे जैसे एक छोटे से कलमकार के लिखने से क्या बदलेंगे।

दोस्तों, दिन में रोटी पर, बोटी पर और एक कुतिया पर मर मिटने वाले कुत्ते भी गली में किसी चोर के आ जाने पर एकजुट हो जाते हैं हमारे यहां तो हमारी मां को बेचने के लिए, हमारी मां को काटने के लिए लोग तैयार खड़े हैं। एक अंतिम बात- आज इस देश का 5 फुट 7 इंच का एक नौजवान गौ माता के लिए अपना सब कुछ छोड़कर खड़ा हुआ है। अगर आज आपने उसका साथ नहीं दिया तो आज मैं विश्व गौरव पूरी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि अगले 50 सालों तक कोई नितिन मित्तल हमारी गौ मां के लिए संघर्ष करने के लिए नहीं खड़ा होगा। उसको हारने मत देना दोस्तों..... अपनी मां को हारने मत देना....

सकारात्मक सहयोग की अपेक्षा के साथ...
विश्व गौरव

Tuesday, 13 October 2015

क्या आप नहीं देंगे इस आंदोलन का साथ


मित्रों आजकल गौहत्या, बीफ पार्टी, पोर्क पार्टी त्यादि विषयों की चर्चाएं जोरों पर हैं। जब इस देश में जब बीफ पार्टी होती है तो कुछ लोग पोर्क पार्टी करने लगते हैं। वे सब यह भूल जाते हैं कि हमारी संस्कृति यह नहीं कहती कि यदि कोई गलत करे तो उसका विरोध करने के लिए हम गलत तरीका अपनाएं। गाय किसी एक धर्म विशेष की है ऐसा नहीं है, गाय का दूध तो प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभकारी होता है। ऐसे में गाय को लेकर हिंदू- मुस्लिम करना गलत होगा। हमने तय किया है कि हम सकारात्मकता के साथ इस विषय को उठाएंगे और इसकी शुरुआत लखनऊ से होगी। हम देश के विभिन्न हिस्सों में काऊ मिल्क पार्टी का आयोजन करेंगे. उन पार्टीज में हम गाय के दूध तथा गाय से प्राप्त अन्य उत्पादों के लाभ समाज को बताएंगे। देश में हुए पिछले कुछ आंदोलनों से एक बात तय हो गई है कि आप चुनिंदा लोग कुछ भी कर सकते हैं। हम अपने इस प्रयास में सोशल मीडिया का सहारा लेंगे और आप देखना आपके छोटे से प्रयास से कुछ बड़ा होगा। मैं वादा तो नहीं करता लेकिन इतना जरूर कहता हूं कि अगर हम सब एक होकर कोई लक्ष्य निर्धारित करेंगे तो उस लक्ष्य तक पहुंचने में हमें कोई भी बुरी ताकत नहीं रोक सकती। मुझे आप सब पर विश्वास है और मुझे यह भी पता है कि हमारा यह आंदोलन अवश्य सफल होगा। इस आंदोलन के सफल होने के बाद हम गर्व से कह सकेंगे कि किसी विषय का विरोध सकारात्मक तरीके से भी किया जा सकता है।

मित्रों मैं बहुत ही स्वार्थी किस्म का व्यक्ति हूं। मैं इस आंदोलन से सिर्फ इस लिए जुड़ा हूं कि आज से 20 साल के बाद मेरी बहन का बेटा जब मुझसे पूछे कि मामा जी आज से 20 साल पहले गाय माता को बचाने के लिए आंदोलन चल रहा था तब आप कहां थे? तो मैं उससे नजर मिला कर यह कह सकूं कि बेटा मैं उन गौ भक्तों के साथ मिलकर सोशल मीडिया पर एक क्रांति लाने के लिए प्रयास कर रहा था। मैं उसे बता सकूंगा कि बेटा इस देश के युवाओं ने मेरे साथ, मेरे कंधे से कंधा मिलाकर इस क्रांति में सहयोग किया था।

दोस्तों, आज गौ माता की रक्षा के लिए इस देश के कुछ युवा एकजुट होकर मिल्क पार्टी करना चाहते हैं। उनमें से कई लोगों से मेरी बात हुई, वो सभी लोग बस एक ही बात कह रहे थे कि विश्व गौरव भाई आप देखना इस देश के युवा हमारा साथ देंगे, इस देश के युवा गाय माता से बहुत प्रेम करते हैं लेकिन राजनीति उन्हें एक नहीं होने दे रही। उन्होंने कहा कि इस देश को राजनेता हिन्दू- मुस्लिम में बांट कर देश तोड़ना चाहते हैं लेकिन इस देश का युवा ऐसा नहीं होने देंगे। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भाई आप देखना 17 अक्टूबर को जब लखनऊ से इस आंदोलन की शुरुआत करेंगे, उस दिन फेसबुक और ट्विटर पर #milkparty टॉप ट्रेंड में चल रहा होगा। मैं नहीं जानता कि ऐसा होगा या नहीं लेकिन मैं यह बात पूरे विश्वास से अवश्य कह सकता हूं कि इस आंदोलन के साथ ईश्वर है और जिस आंदोलन के साथ ईश्वर हो उस आंदोलन को सफल होने से कौन रोक सकता है। मैं आज बस आपसे इतना ही निवेदन करना चाहता हूं कि इन युवाओं का साथ जरूर देना, अगर आज आप इनके साथ नहीं खड़े हुए तो अगले 200 सालों तक कोई युवा गौ संरक्षण के लिए आगे नहीं आएगा।

इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लखनऊ के नितिन मित्तल अपना सब कुछ छोड़कर गौ माता की सेवा के लिए लगने वाले हैं। मैं इस ऊर्जावान युवा को हारते हुए नहीं देख सकता। ये आंदोलन नितिन का व्यक्तिगत आंदोलन नहीं है यह आंदोलन इस देश के प्रत्येक नागरिक का आदोलन है। यह आंदोलन है इस देश की अस्मिता, एकात्मता एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए। इन लोगों को हारने मत देना क्यों कि अगर ये लोग हार गए तो एक बार फिर यह प्रमाणित हो जाएगा कि देश ने राजनीति की गंदी सोच को देश ने स्वीकार कर लिया है। अगर ये लोग हार गए तो तुष्टीकरण की जीत हो जाएगी।
हमारी सरकार से स्पष्ट मांग है कि गौ हत्या पर सख्त कानून बने और गौ संरक्षण के लिए सरकार की ओर से योजनाएं शुरू करके प्रोत्साहन दिया जाए।

इस आदोंलन को सफल बनाने के लिए फेसबुक या ट्विटर पर कोई भी पोस्ट डालें तो उसके साथ #milkparty अवश्य जोड़े।
फेसबुक पर COW MILK PARTY के पेज को लाइक करने के लिए यहां क्लिक करें

हमें ओवैसी और आजम खान जैसे लोगों को यह एहसास दिलाना है कि भारत मां अभी बांझ नहीं हुई हैं। वह अभी भी वीरों को जन्म देती है।
अगले लेख में... मनुष्य जाति के लिए कितनी लाभदायक हैं गौ माता

जय गौ माता    वन्दे भारती






Sunday, 11 October 2015

अरे मामा जी, प्रणाम!


कक्षा 6 में एक कहानी पढ़ी थी, कहानी आज के परिदृश्य में बिलकुल प्रासंगिक लगती है। कहानी कुछ इस तरह थी कि एक सज्जन बनारस पहुँचे। वह स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता हुआ आया और मामाजी ! मामाजी का संबोधन करते हुए लपक कर चरण छूते हुए बोला, 'मैं मुन्ना। आप पहचाने नहीं मुझे ? मुन्ना ? वे सोचने लगे। हाँ, मुन्ना। भूल गये आप मामाजी!'




सज्जन थोड़े संतुष्ट हुए और सोचने लगे कि चलो अनजाना ही सही कोई तो मिल गया जो बनारस घुमाएगा। अपनी किस्मत पर मन ही मन प्रसन्न होते हुए सोचने लगे कि शायद इसे कोई गलतफहमी हुई है लेकिन कोई बात नहीं, कोई ना हो इससे बेहतर है कि कोई तो हो। वह यह सोच ही रहे थे कि वह लड़का फिर से बोला, 'मामा जी, कोई बात नहीं, इतने साल भी तो हो गये। मैं आजकल यहीं हूँ।' प्रसन्नतापूर्वक मामाजी अपने भांजे के साथ बनारस घूमने लगे। कभी इस मंदिर, कभी उस मंदिर। फिर पहुँचे गंगाघाट और बोले कि सोच रहा हूँ, नहा लूँ !
इतना सुनते ही मुन्ना बोला, ' बिलकुल नहाइए मामा जी। बनारस आए हैं और नहाएंगे नहीं, यह कैसे हो सकता है ?' भांजे का अश्वासन मिलते ही मामाजी ने गंगा जी में हर-हर गंगे बोलते हुए डुबकी लगाई और उसके बाद जैसे ही बाहर निकले तो सामान गायब, कपड़े गायब ! लड़का... मुन्ना भी गायब!


मुन्ना... ए मुन्ना ! बोलते हुए वह नदी से बाहर निकले। मगर मुन्ना वहां हो तो मिले। वह तौलिया लपेट कर खड़े हैं और लोगों से पूछ रहे हैं कि क्यों भाई साहब, आपने मुन्ना को देखा है ? किसी ने पूछा- कौन मुन्ना ? तो वह सज्जन बोले-वही जिसके हम मामा हैं। वह तौलिया लपेटे यहां से वहां दौड़ते रहे। मुन्ना नहीं मिला। ठीक उसी प्रकार... भारतीय नागरिक और भारतीय वोटर के रुप में हमारी यही स्थिति है ! चुनाव के मौसम में हर कोई आता है और हमारे चरणों में गिर जाता है और कहता है, 'मुझे नहीं पहचाना? मैं चुनाव का उम्मीदवार। होने वाला विधायक'

आप प्रजातंत्र की गंगा में डुबकी लगाते हैं। बाहर निकलने पर आप देखते हैं कि वह शख्स जो कल आपके चरण छूता था, आपका वोट लेकर गायब हो गया। वोटों की पूरी पेटी लेकर भाग गया। समस्याओं के घाट पर हम तौलिया लपेटे खड़े हैं। सबसे पूछ रहे हैं — क्यों साहब, वह कहीं आपको नज़र आया ? अरे वही, जिसके हम वोटर हैं। पांच साल इसी तरह तौलिया लपेटे, घाट पर खड़े बीत जाते हैं। 5 साल बाद अगले चुनावी स्टेशन पर पहुंचते पहुंचते सारी पुरानी बातें भूलकर आपको लगता है कि पुराना वाला भांजा बुरा था, यह अच्छा होगा, लेकिन स्थिति जस की तस ही रहती है।

अपने विवेक के आधार पर मतदान करें। आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में बहुत से भांजे मिलेंगे लेकिन अगर फिर से उनके चक्कर में फंसे तो याद रखिएगा ये भांजे आपके पास बनारस से घर जाने के पैसे भी नहीं छोड़ेंगे।


Tuesday, 6 October 2015

क्या फर्क पड़ता है अगर उनका नाम चाँद मियां था

पिछले दो साल में एक विषय बहुत ही चर्चा में रहा। हमारे एक तथाकथित धर्म के रक्षक या यूँ कहें ठेकेदार ने शिरडी के साईं बाबा के विषय में कुछ कहा। इस विषय पर बहुत से टीवी चैनल्स की डिबेट में जाना हुआ।एक बार उसी समय मन में आया कि इन तथाकथित हिंदूवादियों पर अपनी लेखनी चलाऊँ लेकिन फिर सोचा अपनी आस्था को प्रमाणित करने की आवश्यकता क्या है।

मित्रों सोचा कि आखिर क्यों हिंदुत्व की ऐसी स्थिति है तो ओस प्रश्न का उत्तर स्वतः मिल गया। क्या फर्क पड़ता है यदि उस व्यक्ति का नाम चाँद मियां था। क्या फर्क पड़ता है कि वो मांस खाते थे। महाराष्ट्र के 50 प्रतिशत से अधिक ब्राह्मण मांस खाते हैं। अभी हाल ही के मामले को देख लीजिए महाराष्ट्र के एक हिन्दू राजनीतिक परिवार की ओर से मांस बैन का विरोध किया गया।
वहां मांस की सुलभ उपलब्धता थी तो वो खाते होंगे। इस बात से समस्या क्या है। हिंदुत्व की बात होती है तो सबसे पहले संघ का नाम आता है, लेकिन संघ ने कभी भी साईं पूजा का विरोध नहीं किया। हिंदूवादी चैनल की बात आती है तो सुदर्शन न्यूज़ का नाम आता है। और साईं बाबा का सबसे बड़ा समर्थक सुदर्शन न्यूज़ है जो सुबह शिर्डी की आरती दिखाता है।
सोशल मीडिया पर कुछ समय से मैं देख रहा हूँ कि पोस्ट की जाती है साईं मुसलमान था इस लिए पूजन मत करो। अरे भाई मेरे कट्टर हिन्दू भाई आप ही कहते हो ना कि यहाँ का हर मुसलमान कनवर्टेड है तो वो भी अपने ही परिवार की पीढ़ी से निकले हैं ना। और दूसरा विषय यदि कोई साईं पूजक उनका पूजन करता है तो वह किसी मजार अथवा मस्जिद में नहीं अपितु मंदिर में जाता है। एक मूर्ती का पूजन करता है। व्यक्ति में ईश्वर के स्वरुप को देखना ही तो हमारी संस्कृति का आधार है। उनके कर्मों के आधार पर उनका पूजन किया जाता है।
राम और कृष्ण की भांति ही वह भी हमारे पूर्वज हैं। मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि अब मत बांटो, अब मत तोड़ो सनातन को, बहुत हो गया। सनातन अजर अमर है। इसका अंत नहीं हो सकता। हिंदुत्व समाप्त हो सकता है सनातन नहीं। सनातन को तोड़ोगे तो हिंदुत्व समाप्त हो जाएगा।
बिना किसी विषय का उद्देश्य समझे कॉपी पेस्ट कर देने से हिंदुत्व मजबूत नहीं होगा। मैं साईं बाबा का पूजक हूँ। आओ और देखो शिर्डी में होने वाले सेवा कार्यों को। सेवा ही सिखाता है ना हिंदुत्व। मुझे गर्व है कि विप्रः पूज्यते की संस्कृति के संवाहक के दायित्व का निर्वहन करने के लिए ईश्वर ने मेरा जन्म इस परम पवित्र मोक्षदायिनी भारत माता की गोद में होना सुनिश्चित किया। आप भी विरोध करने से वेदों की ऋचाओं का अध्ययन करो। गीता के सार को समझो, राम को समझो उनके चरित्र को समझो और फिर उसे साईं बाबा से मिलाओ। गीता में दिए गए श्री कृष्ण के उपदेशों का सार और साईं वचन को एक बार साथ में पढ़ कर देखो।
जो श्री कृष्ण सिखाना चाहते हैं उसी के एक माध्यम में रूप में यदि साईं बाबा ने कार्य किया तो उनका विरोध क्यों.....

Monday, 5 October 2015

जीवन का आधार है आत्मबल

बिना आत्मबल के जीवन में कुछ भी करना संभव नहीं है। हम अपने जीवन में बहुत कुछ नहीं पा पाते और उनके लिए स्वयं की कमियों को दोष न देकर अन्य लोगों को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। वास्तव में हमारी सभी समस्याओं की जड़ यही है कि हम दूसरों को अपनी गलतियों के लिए कोसना शुरू कर देते हैं। असफल होने का एक अन्य कारण जो मुझे समझ आता है वो ये कि हम सामान्य तौर पर स्वयं को समझने से अधिक समय दूसरों को समझने में लगा देते हैं लेकिन ऐसा करने से परिणाम शून्य आता है। एक बार सोच कर देखिए कि क्या हम किसी को समझ सकते हैं। ये संभव ही नहीं है कि हम किसी को समझ लें। 

एक उदाहरण से समझिए कि जिस माँ ने हमें जन्म दिया है, जिस पिता ने हमें पाला है जिसने हमें उँगली पकड़कर चलना सिखाया क्या वो माँ पिता हमें अपने पूरे जीवन में समझ पाते हैं। जिनका रक्त हमारी शिराओं में बह रहा है वो भी हमें नहीं समझ पाते और हम किसी के साथ कुछ समय व्यतीत करके ये मान लेते हैं कि हम उसे पूरी तरह से समझ चुके हैं अथवा समझ सकते हैं।
कुछ ऐसी ही गलती मैं भी अपने जीवन में कर चुका हूँ। लेकिन इसमें किसी की गलती नहीं थी,ये कहीं न कहीं मेरी कमी थी कि मैं उस व्यक्ति को समझ नहीं पाया। जब उसने मुझे अपने मन की भावना बताई तो मुझे पता चला कि उसकी अपेक्षाओं को मैं पूर्ण नहीं कर पाया। आप अपनी भावनाओं को कभी किसी के सामने अभिव्यक्त नहीं कर सकते। ऐसी अवस्था में यदि हम इसमें उसकी गलती दे दें तो निश्चित ही हम गलत कर रहे हैं। हमको आवश्यकता है स्वयं को पहचानने की, स्वयं की क्षमताओं को पहचानने की और उन्हें पहचान कर मूर्त रूप देकर हम निश्चय ही अधिक संतुष्ट रह सकते हैं।

आज से यदि कभी भी मन में किसी के लिए कोई गलत विचार आपके मन में आए तो बस मेरा एक तरीका अपनाइएगा। स्वयं से इस बात का चिंतन करिएगा कि आपने जिस व्यक्ति से जुड़कर उसके लिए जो कुछ किया है उससे आप आत्मसंतुष्ट हैं अथवा नहीं। यदि आपको लगे कि आप अपने द्वारा किए गए कार्यों से संतुष्ट हैं तो इस बात से चिंतित मत होइएगा कि सामने वाला व्यक्ति क्या कह रहा है या क्या सोच रहा है।
मित्रों यदि रास्ते पर कंकड़ ही कंकड़ हो तो भी एक अच्छा जूता पहनकर उस पर चला जा सकता है..
लेकिन यदि एक अच्छे जूते के अंदर एक भी कंकड़ हो तो एक अच्छी सड़क पर भी कुछ कदम भी चलना मुश्किल है।

अर्थात बाहर की चुनौतियों से नहीं हम अपनी अंदर की कमजोरियों से हारते हैं। स्वयं से कभी मत हारिएगा। अपने आपमें कभी नकारात्मक परिवर्तन मत लाइएगा। सकारात्मक सोच और उसका अनुसरण ही आपके जीवन का आधार है। मैं कोई बहुत बड़ा ज्ञानी नहीं हूँ लेकिन अपने अनुभवों के आधार ये आपसे साझा कर रहा हूँ।

वंदे भारती

Saturday, 26 September 2015

क्यों समाप्त नहीं हो सकता टोल टैक्स? : गडकरी जी से एक सवाल


बहुत समय से देश का एक वर्ग ऐसी हवा बनाए हुए था कि भारतीय जनता पार्टी चाहती है कि देश से टैक्स खत्म कर दिए जाएं। कहीं न कहीं मुझे भी ऐसा लगता था कि भाजपा उन टैक्सेज को खत्म कर देगी जिनको लगाने के पीछे अंग्रेजों का उद्देश्य भारत और भारतीयों को लूटना था। लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के पहले कई बार बैठकों में भी भाजपा के नेताओं से सुना कि कांग्रेस सरकार ऐसे टैक्सेज लगा कर हमें लूट रही है। जब राजीव दीक्षित जी सर्कुलर टैक्सेशन सिस्टम के विषय में बोलते थे तो भाजपा के नेता भी उनकी हां में हां मिलाते थे। लेकिन अब ऐसा क्या हुआ कि  बीजेपी इन करों को समाप्त करने से बच रही है।

आज लेकिन केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस संभावना से पूरी तरह इनकार किया कि भविष्य में टोल टैक्स को वापस लिया जा सकता है। एक न्यूज चैनल की ओर से आयोजित कार्यक्रम के दौरान गडकरी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि टोल टैक्स कभी खत्म नहीं होगा। उन्होंने कहा कि सरकार के पास सड़क बनाने के लिए पैसे नहीं हैं। टोल कम या ज्यादा हो सकता है पर खत्म नहीं। उन्होंने कहा कि यदि हमें बेहतर रोड का इस्तेमाल करना है तो टैक्स तो देना ही होगा। उन्होंने कहा कि सड़कों के निर्माण के लिए विदेश से कर्ज लेंगे तो ब्याज लगेगा।

मैं माननीय मंत्री महोदय से पूछना चाहता हूं कि इनकम टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स और सर्विस टैक्स, वैट, कस्टम ड्यूटी, ऑक्टरॉय जैसे टैक्सेज का क्या करते हैं आप? क्या इस देश के विकास में इतना पैसा वास्तव में लगाते हैं।

मित्रों इस देश का टैक्सेशन सिस्टम भी जबरदस्त है।

मुझसे सरकार के एक प्रतिनिधि ने पूछा कि क्या करते हो?
तो मैंने कहा कि बिजनेस।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- प्रोफेशनल टैक्स चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने फिर कहा -क्या बिजनेस करते हो?
मैंने कहा -सामान बेचता हूं।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा -सेल्स टैक्स चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि का अगला प्रश्न था कि सामान लाते कहां से हो?
मैंने कहा -दूसरे प्रदेशों या विदेश से।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा -सेन्ट्रल सेल्स टैक्स, कस्टम ड्यूटी और ऑक्टरॉय चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- आप चीजें कहां बनाते हो(पैकिंग इत्यादि)?
मैंने कहा- फैक्ट्री में।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- एक्साइज ड्यूटी चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- क्या आपके पास ऑफिस, फैक्ट्री है?
मैंने कहा- हां।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- मुंशिपल और फायर टैक्स चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने फिर कहा- क्या आपके पास स्टॉफ है?
मैंने कहा- हां
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- स्टाफ प्रोफेशनल टैक्स चुकाओ

सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- आप किसी प्रकार की सर्विस लेते या देते हो?
मैंने कहा- हां।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- सर्विस टैक्स चुकाओ।

सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- आप बिजनेस की वजह से काफी टेंशन में रहते होंगे।
मैंने कहा- हां।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- आप टेंशन मिटाने के लिए क्या करते हो?
मैंने कहा- फिल्म देखने चला जाता हूं।
तो सरकार के प्रतिनिधि ने कहा- इंटरटेनमेंट टैक्स चुकाओ।

और अगर एक भी टैक्स चुकाने में देरी की तो पेनॉल्टी / फाइन अलग से दो।


ये है हमारा टैक्सेशन सिस्टम। ये सिर्फ बड़े कारोबारियों के लिए ही नहीं है। अगर आप अपनी गली में या गांव में सेवा भाव से कोई छोटी सी दुकान भी चला रहे हैं तो भी आपको ये सारे टैक्सेज चुकाने पड़ेंगे। अब आप स्वयं सोचकर देखिए कि यदि आपके मन में एक बार सेवा भाव आया तो क्या आप कर पाएंगे।
मैंने सरकार के उस प्रतिनिधि के समक्ष भी यही कहा तो वो बोले कि इन सारे टैक्सेज से ही तो सरकार चलती है। इन्ही से तो विकास का काम होता है। इतना कहकर वो चले गए। अब कोई मुझे ये बताए कि क्या वास्तव में इन टैक्सेज से ही विकास होता है।

हमारे दिए गए टैक्सेज से देश के नेताओं को तन्ख्वाह दी जाती है। दुर्भाग्य देखिए कि जिस देश में अर्थशास्त्र का जन्म हुआ, जिस देश में चाणक्य जैसा अर्थशास्त्री हुआ उस देश में अर्थशास्त्र की परिभाषा ही बदल गई।
अन्त में माननीय गडकरी जी से मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि कृपया राजधर्म का पालन करते हुए सामान्य जनमानस की परिस्थियों को समझते हुए कुछ भी बोलें। आपको यह समझना होगा कि राजनीति का अर्थ राज करने की नीति न होकर राजकीय व्यवस्था को चलाने की नीति है।



Thursday, 24 September 2015

मैं और वो

सुबह मैं जैसे ही सो कर उठा, वो मेरे बिस्तर के पास ही खड़े थे। उन्हें लगा कि मैं उनसे कुछ बात करूँगा।
कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिए धन्यवाद कहूंगा। लेकिन मैं फटाफट चाय पी कर तैयार होने चला गया और उनकी तरफ देखा भी नहीं।

फिर उन्होंने सोचा कि मैं नहा के उन्हें याद करूंगा। पर मैं इस उधेड़बुन में लग गया कि मुझे आज कौन से कपड़े पहनने हैं। फिर जब मैं जल्दी जल्दी नाश्ता कर रहा था और अपने ऑफिस के कागज इक्ठेहं करने के लिये घर में इधर से उधर दौड़ रहा था...तो भी उन्हें लगा कि शायद अब मुझे उनका ध्यान आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

फिर जब मैंने आफिस जाने के लिए मेट्रो पकड़ी तो वो समझे कि इस खाली समय का उपयोग मैं उनसे बातचीत करने में करूंगा पर मैंने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर मोबाइल में गेम खेलने लगा और वो खड़े के खड़े ही रह गए।
वो मुझे बताना चाहते थे कि दिन का कुछ हिस्सा उनके साथ बिता कर देखूं, फिर मेरे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन मैंनें उनसे बात ही नहीं की...

एक मौका ऐसा भी आया जब मैं बिलकुल खाली था और कुर्सी पर पूरे 15 मिनट यूं ही बैठा रहा, लेकिन तब भी मुझे उनका ध्यान नहीं आया। दोपहर के खाने के वक्त जब मैं इधर-उधर देख रहा था, तो भी उन्हें लगा कि खाना खाने से पहले मैं एक पल के लिए उनेक बारे में सोचूंगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
दिन का अब भी काफी समय बचा था। उन्हें लगा कि शायद इस बचे समय में हमारी बात हो जाएगी, लेकिन घर पहुँचने के बाद मैं रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो गया। जब वे काम निबट गए तो मैंनें टीवी खोल लिया और घंटो टीवी देखता रहा। देर रात थक कर मैं बिस्तर पर जाकर लेट गया।

मैंनें अपनी पत्नी, बच्चों को शुभरात्रि कहा और चुपचाप चादर ओढ़कर सो गया। उनका बड़ा मन था कि वो भी मेरी दिनचर्या का हिस्सा बनें...मेरे साथ कुछ वक्त बिताएं...कुछ मेरी सुनें और कुछ अपनी सुनाएं... मेरा कुछ मार्गदर्शन करें ताकि मुझे समझ आए कि मैं किस लिए इस धरती पर आया हूं और किन कामों में उलझ गया हूं, लेकिन मुझे समय ही नहीं मिला और वे मन मार कर ही रह गए।
वो मुझसे बहुत प्रेम करते हैं। हर रोज वो इस बात का इंतजार करते हैं कि मैं उनका ध्यान करूंगा और
अपनी छोटी छोटी खुशियों के लिए उनका धन्यवाद करूंगा। पर मैं तब ही उनके पास जाता हूं जब कुछ चाहिए होता है। मैं जल्दी में जाता हूं और अपनी माँगें उनके सामने रख कर चला जाता हूं।
वो बस यही सोचते हैं कि हो सकता है कल मुझे उनकी याद आ जाए। बस इसी अपेक्षा के साथ समय बीतता जाता है लेकिन मैं बिल्कुल भी उन्हें याद नहीं करता। जब कोई समस्या आती है तो मैं उनको दोषी ठहरा देता हूं।

अन्त में वो बस यही कहते हैं कि


दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोई।
जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे को होए।।


आप समझ ही गए होंगे कि वो कौन हैं जो हमसे इतनी अपेक्षाएं रखते हैं। जी हां सही पहचाना, वो ईश्वर ही हैं....

वन्दे भारती

Wednesday, 23 September 2015

फलाह, अगर हिम्मत है तो जवाब दो ताहिर के इस प्रश्न का...

लो अब एक नई मांग- एक मुस्लिम व्यक्ति ने Change.org पर एक पिटिशन लॉन्च करके बकरीद के त्योहार पर सब्जियों पर बैन लगाने की मांग की है। फलाह फैजल नामक इस शख्स ने अपनी पिटिशन में लिखा कि जैन संप्रदाय के त्योहार 'पर्यूषण पर्व' पर देश के कई राज्यों की सरकारों ने कुछ दिनों के लिए मीट पर बैन लगा दिया था इस लिए बकरीद पर सब्जी बैन होनी चाहिए।

फलाह की मांग है कि उनके त्योहार बकरीद पर सब्जियां बैन कर दी जानी चाहिए, क्योंकि उनकी भी 'भावनाएं' हैं। फलाह ने कहा, 'पैगंबर अपने खुद के बेटे का बलिदान देने के लिए राजी थे। मुझे लगता है कि हम सभी एक दिन के लिए सब्जियों का बलिदान दे सकते हैं यानी न खाकर काम चला सकते हैं।' फलाह ने कहा कि रमजान के दौरान मुस्लिम पूरे एक महीने तक रोजा रखते हैं, ऐसे में शाकाहारी एक दिन तो आराम से 'भूखे' रह सकते हैं। अपनी इस व्यंग्य भरी पिटिशन में फलाह ने सब्जियों पर बैन न लगाए जाने की स्थिति में एक विकल्प की पेशकश भी की। फलाह ने कहा, 'मेरी वैकल्पिक मांग यह है कि देश का हर नागरिक अपने धर्म की मान्यताओं की परवाह किए बगैर बकरीद के दिन मटन (बिरयानी) खाकर हमारे इस त्योहार में हिस्सा लें।' फलाह की इस आधारहीन पिटिशन को अब तक 500 लोगों का समर्थन मिल चुका है, लेकिन इसे 490 लोगों के समर्थन की जरूरत और है।

मुझे समझ में नहीं आता कि ये देश तोड़ने वाले लोग आखिर इस देश में जिन्दा क्यों हैं। क्या इनके खुदा ने इनको विवेक नाम की कोई चीज नहीं दी है। ये लोग आखिर क्यों देश की एकता, अखंडता और एकात्मता के साथ खेल रहे हैं। क्यों इन्हें राष्ट्रीय समरसता से कोई मतलब नहीं। आखिर ये ऐसी मांगे करके प्रदर्शित क्या करना चाहते हैं?

मित्रों वास्तव में बहुत पीड़ा होती है जब ऐसी खबरें सामने आती हैं। जब विभिन्न प्रदेशों की सरकारों ने जैन संप्रदाय के त्योहार 'पर्यूषण पर्व' को ध्यान में रखते हुए मीट पर बैन लगाया था तो मेरी अपने एक मुस्लिम मित्र से इस विषय पर चर्चा हुई। उस मित्र का नाम ताहिर है। ताहिर ने मुझसे कहा कि विश्व गौरव भाई आप मीट नहीं खाते हो और जब हमारे साथ खाना खाते हो तो हम भी मीट नहीं खा पाते, लेकिन ऐसा करके आपके चेहरे पर जो संतुष्टि दिखती है उससे मुझे बहुत सुकून मिलता है। लेकिन उसकी इस बात से मुझे जो सुकून मिला उसे मैं प्रदर्शित नहीं कर सकता।

अभी फलाह की मांग की जानकारी मिलने के बाद मैंने ताहिर को फोन किया तो उसने कहा कि भाई हमको मीट न मिले तो हम सब्जी खा सकते हैं लेकिन मुझे पता है अगर आपको सब्जी न मिले तो आप भूखे रहना ज्यादा पसंद करेंगे। उसने कहा कि जिसने ये मां की है कि सब्जी बैन कर दो उससे कहो कि जैन समाज ने एक दिन मीट बैन करने की मांग की थी और वो जीवन पर्यन्त मीट नहीं खाते, क्या फलाह भी एक दिन सब्जियों पर बैन लगा देने से जीवन भर मुस्लिम समाज के द्वारा सब्जी न खाने की जिम्मेदारी लेता है।

मैं ताहिर के इस प्रश्न को फलाह से पूछना चाहता हूं। ऐसे मुस्लिम मित्रों को पाकर मैं स्वयं को धन्य मानता हूं....
वन्दे भारती

Tuesday, 22 September 2015

नेपाल में भारत विरोध और मेरी सलाह


नेपाल राष्ट्र के लिए दुर्भाग्य का विषय है कि तथाकथित सेकुलरिज्म वाले कुछ महानुभाव उस देश में जन्म ले चुके हैं। हिन्दुत्व का आधार बनकार खड़ा नेपाल आज टूट चुका है। आज दिन में ट्विटर पर #backoffindia ट्रेन्ड कर रहा था। मेरी इच्छा हुई कि इस विषय का पूरा सच जानूं। जब इसका सच जाना तो मेरे होश ही उड़ गए। नेपाल में नया संविधान लागू होने के बाद करीब 50 हजार लोगों ने ट्वीट करके भारत को नसीहत दी कि भारत नेपाल के अंदरूनी मसलों से दूर ही रहे।
मित्रों जब वो ट्वीट्स मैनें पढ़े तो समझ में ही नहीं आया कि क्या करूं और इन सबके लिए किसको जिम्मेदार ठहराऊं। लेकिन फिर भी नेपाल के जो मित्र आज ट्विटर पर आंदोलनरत थे उनको कुछ आंकड़ें याद दिलाना चाहता हूं। मैं उनको इन आंकड़ों के माध्यम से बताना चाहता हूं कि जब जब नेपाल में कोई समस्या आई है तो सबसे पहले भारत ही खड़ा हुआ।

एक संपूर्ण राहत व बचाव अभियान कार्यक्रम जिसका कूट नाम ऑपरेशन मैत्री है शुरु करके भारत आपदा के वक्त प्रतिक्रिया करने वाला पहला देश था। सिर्फ पंद्रह मिनट के अंदर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक शीर्ष अधिकारियों व मंत्रियों की एक बैठक बुलाई और राहत व बचाव कार्यों को शुरू करने व राष्ट्रीय बचाव दल की टुकडियों को नेपाल भेजने के निर्देश दिये। दोपहर तक भारत के राष्ट्रीय आपदा मोचन बल और नागरिक सुरक्षा की 10 टुकडियाँ जिसमे 450 अधिकारी व तमाम खोज़ी कुत्तों के साथ नेपाल पहुंच गये थे। दस अन्य भारतीय वायुसेना के विमान राहत व बचाव कार्य के लिये काठमांडू पहुंच गये। भूकम्प के तुरंत बाद सहायता भेजते हुए भारत ने 43 टन राहत सामग्री, टेंट, खाद्द पदार्थ नेपाल भेजे। प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल के अपने समकक्ष सुशील कोइराला से फोन पर बात की और उन्हें हर संभव मदद का भरोसा दिलाया। भारतीय थल सेना ने एक मेजर जनरल को राहत व बचाव कार्यों की समीक्षा व संचालन के लिये नेपाल भेजा। भारतीय वायुसेना ने अपने इल्यूशिन आइएल-76 विमान, सी-130 हर्क्युलीज़ विमान, बोईंग सी-17 ग्लोबमास्टर यातायात वायुयान और एम आई 17 हेलिकॉप्टरों को ऑपरेशन मैत्री के तहत नेपाल के लिये रवाना किया। लगभग आठ एमाई 17 हेलिकॉप्टरों को प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री गिराने के काम में लगाया गया। देर शनिवार रात से लेकर रविवार की सुबह तक भारतीय वायु सेना ने ६०० से ज्यादा भारतीय नागरिकों को नेपाल से सुरक्षित निकाला। दस उडानें जो रविवार के लिये तैयार थीं सेना के चिकित्सकों, चलायमान अस्पतालों, नर्सों, दवाइयों, अभियाँत्रिकी दलों, पानी, खाद्द पदार्थ, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल और नागरिक सुरक्षा की टुकडियों, कम्बल, टेंट व अन्य जरूरी सामान लेकर नेपाल पहुंचें।

मित्रों आज जिस नरेन्द्र मोदी को नेपाल के लिए अनावश्यक बताया जा रहा है उन्हीं प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में हर नेपाली के आँसू पोंछने की बात कही। भारतीय सेना के एक पर्वतारोही दल ने एवरेस्ट के आधार शिविर से 19 पर्वतारोहियों के शवों को बरामद किया और 61 फंसे हुए पर्वतारोहियों को बाहर निकाला। भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर एवरेस्ट पर्वत पर बचाव अभियान के लिये 26 अप्रैल की सुबह पहुंच गये थे। भारतीय विदेश सचिव एस जयशंकर ने 6 और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन दलों को अगले 48 घंटों में नेपाल भेजने की घोषणा की। उन्होने यह भी कहा कि जो वायुयान नेपाल भेजे जा रहे हैं वो सिर्फ भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशी नागरिकों को भी निकालने में लगाए जाएंगे। रविवार की शाम तक भारत ने 50 टन पानी, 22 टन खाद्द सामग्री और 2 टन दवाइयाँ काठमांडू भेजीं। लगभग 1000 और एनडीआरएफ के जवानों को बचाव अभियान में लगाया गया। सड़क मार्ग से भारी संख्या में भारतीय व विदेशी नागरिकों का नेपाल से निकलना जारी था। सोनौली और रक्सौल के रास्ते फंसे हुए भारतीयों व विदेशियों को निकालने के लिये सरकार ने 35 बसों को भारत-नेपाल सीमा पर लगाया। भारत ने फंसे हुए विदेशियों को सद्भाव वीजा जारी करना शुरू कर दिया था और उन्हे वापस लाने के लिये सडक मार्ग से कई सारी बसें और एम्बुलेंस भेजना शुरू कर दिया था। भारतीय रेलवे ने राहत अभियान के तहत 1 लाख पानी की बोतलें भारतीय वायुसेना की मदद से नेपाल भेजीं। रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने बाद में ट्वीट करते हुए लिखा की रोजाना 1लाख पानी की बोतलें नेपाल भेजने के उपाय किये जा रहे हैं। एयर इंडिया ने नेपाल को उड़ान भरने वाली अपनी सभी उडानों के टिकट किराए में भारी घटोत्तरी कर दी। एयर इंडिया ने घोषणा करते हुए कहा कि वह अपनी सभी उडानों में यथासंभव राहत सामग्री भी ले जायेगी। 1 दिन में भारतीय वायुसेना ने 12 विमानों की मदद से 2000 भारतीय नागरिकों को नेपाल से बाहर निकाल लिया था।

मैं यह सब आंकड़े बताकर भारत के द्वारा किए गए सहयोग को एहसान के रूप में जताने का प्रयास नहीं कर रहा। मेरी इच्छा मात्र इतनी सी है कि नए संविधान के आते ही किसी कुचक्र में न फंसे। नेपाल के नागरिक एक बार भारत का इतिहास पढ़ लें कि यहां की राजनीतिक पार्टियों ने किस प्रकार से देश को तोड़ा है। कहीं ऐसा न हो कि कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों के कारण नेपाल की राष्ट्रीय एकात्मता पर प्रश्न चिन्ह लगने के साथ साथ एक अच्छा सहयोगी भी खो जाए।

वन्दे भारती


Saturday, 19 September 2015

क्या आप भी कूल ड्यूड हैं?

आज मैं आपको बता रहा हूं कूल डूड के कुछ लक्षण-
पढ़कर तय करिए कि कितने कूल डूडों को आप जानते हैं।

कूल डूड वही हैं जिनको देशी भाषा में हम “घोंचू” कहते हैं। इनको पहचानने के कुछ खास तरीकों पर आज चर्चा करते हैं। इनकी पहचान कूल्हों से सरकती हुई पैंट, बेतरतीब बढ़े हुए बाल जैसी कई अजीबोगरीब चीजें होती हैं। कभी कभी तो  इनके बाल ऐसे दिखते है जैसे जोर का बिजली का झटका खा कर आए हों । ये वो लोग होते हैं जो अपनी मां की प्रत्येक सलाह पर तो बद्तमीजी से उत्तर देते हैं लेकिन अपनी गर्लफ्रेंड के सामने गिड़गिड़ाते हुए दिख जाते हैं। इनकी सोच भारत की नहीं अपितु इंडिया का प्रतिनिधित्व करती है। इनकी कुछ और विशिष्ट पहचानों को जानते हुए इनकी सोच को समझने का प्रयास करते हैं। 1. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इनकी प्रोफाइल पिक्चर से पश्चिमी सभ्यता साफ झलकती है।

2. कवर फोटो पर किस करते हुए कपल की फोटो होगी जैसे इनकी परिवारिक परंपरा वही रही हो।

3. ये देशहित से जुड़ी पोस्ट को नजरअंदाज करते हैं क्योंकि ये लोग इंडियन है भारतीय नहीं। देश के विषय सोचना इनको अपने वश की बात नहीं लगती। आधुनिकता के नाम पर नग्नता को ये आधार बना लेते हैं।

4. इनको राजनीति से बहुत नफरत है। ये मतदान वाले दिन को छुट्टी का दिन मानकर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ शॉपिंग करने जाते हैं। ये मतदान तो करते नहीं लेकिन किसी भी समस्या का दोष सीधे सरकार पर मढ़ देते हैं।




5. इन्हें अश्लीलता और बॉलीवुड बहुत पसंद होता है। भजन, लोक गीत-संगीत यहां तक कि कवि सम्मेलन भी इन्हें बोरिंग और पकाऊ लगते हैं।

6. इन्हें हिन्दी और अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म आती है। ये लोग Hi, LoL, What’s up, Dude, Thanks या India Is my Love, Please Chat आदि तरह से बात करते हुए पाए जाते हैं।

7. इनकी टाइमलाइन पर जाकर अगर आप देखेंगे तो इन्होंने कुछ अश्लील पेज लाइक कर के रखे होंगे। इनके लिए हनी सिंह और सनी लियोनी तक ही जीवन सीमित है क्योंकि इन लोगों की आत्मा ही मर चुकी होती है और ये लोग केवल लाश बनकर जिंदा रहते हैं।

8.ये लोग अधिक से अधिक लड़कियों को जोड़कर उन्हें मदर डे,फादर डे, कुत्ता डे, सूअर डे ये डे वो डे पर गुलाब के फूल मैसेज करेंगे और अँग्रेजी में लिखेगें I LOVE YOU में भले ही सामने वाली प्रोफाइल इन लोगों के बाप के माँ की आयु वाली महिला की हो। 

9. इस तरह के लोग सुबह जय श्री राम नाम से शर्म महसूस करेंगे और सुबह GOOD MORNING तथा शाम को GOOD EVENING कहेंगे।

10. ये लोग विदेशी डे आते है तो ज्यादा ही उत्सुकता से मनाते हैं लेकिन इन लोगों ने कभी अपने माँ बाप की दिल से सेवा नहीं की है, ये लोग गौशाला में नहीं जाएँगे। ये लोग 5 रूपये गौदान नहीं करेंगे लेकिन रोज डे या कुत्ता डे पर 500 रूपये के नकली फूल जरूर लेंगे।

ऐसे नकारा युवाओं से देश क्या उम्मीद कर सकता है, इस सब के पीछे अश्लील फिल्में और मीडिया द्वारा परोसी जा रही अश्लीलता जिम्मेदार है और इन लोगों को यही पता नहीं इंडिया और भारत में धरती आसमान जैसा अंतर है। हम भारत माता कह सकते हैं और एक बार सोच कर देखिए कि ये गुलामी की सोच वाले लोग जब इंडिया माता कहेंगे तो कैसा लगेगा ?  हमारा उद्देश्य होना चाहिए कि इस तरह के लोगों को देश के प्रति जागरुक करें। इन लोगों को भारत की पहचान दें, इन्हें संस्कार दे, धर्म का ज्ञान दें ताकि ये लोग आने वाली पीढ़ियों को बर्बादी की ओर ना जाने दें।
॥ इंडियन नहीं भारतीय बनो ॥
वन्दे भारती



Thursday, 17 September 2015

एक सच जिसको जानकर आंखे खुल जाएंगी आपकी...

गणेश स्थापना क्यों?

इस देश की एक बड़ी समस्या है कि इस देश के लोगों ने सोचना बंद कर दिया है। उन्हें किसी भी परंपरा का इतिहास नहीं पता, बस जो चल रहा है उसका अनुसरण करते हुए चलते रहना है। उस परंपरा को प्रारंभ करने का उद्देश्य भी हमनें जानना जरूरी नहीं समझा। आज गणेश चतुर्थी है। महाराष्ट्र का सबसे बड़ा पर्व, उस पर्व का उत्साह यहां दिल्ली में भी देखने को मिल रहा है। घरों से लेकर विद्यालयों तक हर जगह गणेश प्रतिमा की स्थापना हो रही है। हर टीवी चैनल पर गणेश चतुर्थी से जुड़े कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं, लेकिन मैं सुबह से प्रतीक्षा करता रहा कि कोई इस गणपति उत्सव की स्थापना का उद्देश्य बताएं। सच कहूं तो इस देश के मीडिया संस्थानों से अधिक अपेक्षा मुझे सोशल मीडिया के क्रांतिकारियों से थी लेकिन मुझे एक भी पोस्ट ऐसे विषय से सम्बन्धित नहीं दिखी। इसी नाते अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए मैंने स्वयं इस विषय पर लिखने का मन बनाया।

मित्रों जब स्वदेशी शब्द हमारे कानों में पड़ता है तो सबसे पहले हमारे मस्तिष्क में महात्मा गांधी और खादी का नाम ध्यान में आता है। लेकिन क्या आपको पता है कि स्वदेशी से स्वतंत्रता का स्वप्न देखने वाले प्रथम क्रांतिकारी का नाम क्या था? उनका नाम था लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक। 1894 मे अंग्रेजों ने भारत में धारा 144 नाम का एक बहुत खतरनाक कानून बना दिया था।  इस कानून के तहत किसी भी स्थान पर 5 से अधिक भारतीय इकट्ठे नहीं हो सकते थे। वे समूह बनाकर कहीं प्रदर्शन नहीं कर सकते थे और अगर कोई ब्रिटिश पुलिस अधिकारी उनको कहीं इकट्ठा देख ले तो आप सोच भी नहीं सकते कि उनको कितनी कड़ी सजा दी जाती थी।

लोगों में व्याप्त भय को समाप्त करने के लिए लोकमान्य तिलक ने गणपति उत्सव की स्थापना की और सामान्य जनमानस में यह विश्वास दिलाया कि विघ्नहर्ता गणेश जी आपके सारे विघ्न हर लेंगे और अंग्रेजों से हमें मुक्ति दिलाएंगे। सबसे पहले पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव का आयोजन किया गया। 1894 से पहले लोग अपने अपने घरो मे गणपति उत्सव मनाते थे लेकिन 1894 के बाद इसे सामूहिक तौर पर मनाने लगे तो पुणे के शनिवारवाडा मे हजारों लोगों की भीड़ उमड़ी।
इस प्रकार पूरे 10 दिन तक 20 अक्तूबर 1894 से लेकर 30 अक्तूबर 1894 तक पुणे के शनिवारवाड़ा में गणपति उत्सव मनाया गया। हर दिन लोकमान्य तिलक वहां भाषण के लिए किसी बड़े व्यक्ति को आमंत्रित करते थे। 20 अक्तूबर को बंगाल के सबसे बड़े नेता बिपिन चंद्र पाल वहाँ आए और ऐसे ही 21 अक्तूबर को उत्तर भारत के लाला लाजपत राय वहाँ पहुंचे। वहां 10 दिन तक इन महान नेताओं के भाषण हुआ करते थे ! और सभी भाषणों का मुख्य मुद्दा यही होता था कि गणपति जी हमको इतनी शक्ति दें कि हम भारत से अंग्रेजों को भगाएं, गणपति जी हमें इतनी शक्ति दें कि हम भारत में स्वराज्य लाएं। तिलक जी के प्रयासों के कारण ही अगले वर्ष 1895 मे पुणे के शनिवारवाड़ा मे 11 स्थानों पर गणपति स्थापित किए गए, उसके अगले साल 31 और 1897 में संख्या 100 को पार कर गई। धीरे -धीरे पुणे के नजदीक महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरों अहमदनगर ,मुंबई ,नागपुर आदि तक में ये गणपति उत्सव फैलता गया। हर वर्ष हजारों लोग इकट्ठे होते और बड़े नेता उनमें राष्ट्रीयता की भावना भरने का कार्य करते।  इसी तरह लोगों का गणपति उत्सव के प्रति उत्साह बढ़ता गया और साथ में राष्ट्र के प्रति चेतना भी बढ़ती गई।

1904 में लोकमान्य तिलक ने लोगों से कहा कि गणपति उत्सव का मुख्य उद्देश्य स्वराज्य हासिल करना और अंग्रेजों को भारत से भगाना है। बिना आजादी के गणेश उत्सव का कोई महत्व नहीं है। तब पहली बार लोगों ने लोकमान्य तिलक के इस उद्देश्य को बहुत गंभीरता से समझा। तभी 1905 मे अंग्रेजी सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया। कर्जन नाम के अंग्रेज अधिकारी ने बंगाल को पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल नामक दो हिस्सों मे बाँट दिया। हिन्दू और मूसलमान के आधार पर यह पहला बंटवारा था। डिविजन ऑफ बंगाल एक्ट नामक कानून के आधार पर यह विभाजन किया गया। बंगाल उस समय भारत का सबसे बड़ा राज्य था और इसकी कुल आबादी 7 करोड़ थी।

लोकमान्य तिलक ने इस बंटवारे के खिलाफ सबसे पहले विरोध की घोषणा की उन्होनें ने लोगों से कहा कि अगर अंग्रेज भारत में संप्रदाय के आधार पर बंटवारा करते हैं तो हम अंग्रेजों को भारत में रहने नहीं देंगे। उन्होने अपने एक मित्र तथा बंगाल के सबसे बड़े नेता बिपिन चंद्र पाल को बुलाया साथ ही उन्होंने एक अन्य नेता अरबिंदो घोष जी को बुलाया और उन्हें कहा कि आप बंगाल मे गणेश उत्सव का आयोजन कीजिए। तो बिपिन चंद्र पाल जी ने कहा कि बंगाल के लोगों पर गणेश जी का प्रभाव ज्यादा नहीं है,  तो तिलक जी ने पूछा फिर किसका प्रभाव है ? तो उन्होनें कहा कि बंगाल में नवदुर्गा नामक एक उत्सव मनाया जाता है उसका बहुत प्रभाव है। तब तिलक जी ने कहा ठीक है मैं यहाँ गणेश उत्सव का आयोजन करता हूँ आप वहाँ दुर्गा उत्सव का आयोजन करिए। तभी से बंगाल मे समूहिक रूप से दुर्गा उत्सव मनाना शुरू हुआ जो आज तक जारी है।

लोगों ने तिलक जी से पूछा कि विरोध का तरीका क्या होगा? तो लोकमान्य तिलक ने कहा कि भारत में अंग्रेजी सरकार ईस्ट इंडिया कंपन्नी की मदद से चल रही है। ईस्ट इंडिया कंपनी का माल जब तक भारत मे बिकेगा तब तक अंग्रेजों की सरकार भारत मे चलेगी और अगर माल बिकना बंद हो गया तो अंग्रेजों के पास धन जाना बंद हो जाएगा और अंग्रेज भारत से भाग जाएँगे।
तब वहां पर एक आंदोलन शुरू हुआ। उस आंदोलन के प्रमुख नेता थे लाला लाजपतराय (उत्तर भारत), विपिन चंद्र पाल (बंगाल और पूर्व भारत) और लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक (पश्चिम भारत)। इस तीनों नेताओं ने अंग्रेजों के बंगाल विभाजन का विरोध शुरू किया।

लोकमान्य तिलक ने अपने शब्दों में इसको स्वदेशी आंदोलन कहा। अँग्रेजी सरकार इसे बंग भंग आंदोलन कहती रही। उस समय इन तीन नेताओं के आवाह्न पर करोड़ों भारत वासियों ने अंग्रेजी कपड़े पहनना बंद कर दिया, भारत के हजारों नाईयों ने अंग्रेजी ब्लेड से दाड़ी बनाना बंद कर दिया,  यहां तक कि विदेश से आने वाली चीनी का बहिस्कार करके इस देश में गुड़ की मिठाइयां बनने लगीं। इसी आंदोलन के आगे झुकते हुए अंग्रेजों ने 1911 में डिविजन ऑफ बंगाल एक्ट वापिस लियाऔर इस तरह पूरे देश मे लोकमान्य तिलक की जय जयकार होने लगी।
आज हम गणेश उत्सव तो मनाते हैं लेकिन विदेशी वस्तुओं का साथ नहीं छोड़ते। और तो और हम तो अपनी खुशी के लिए गणपति को टाई भी पहनाने लगे। मित्रों यदि वास्तविक स्वराज्य चाहिए तो मेरे निवेदन को स्विकार करें और विदेशी वस्तुओं को बहिस्कार करते हुए गणपति स्थापना की सार्थकता प्रमाणित करें।
वन्दे भारती।

Wednesday, 16 September 2015

ठाकुर रोशन सिंह : भारत मां का लाल

9 अगस्त 1925 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पास स्थित काकोरी स्टेशन के पास जो सरकारी खजाना लूटा गया था उसमें ठाकुर रोशन सिंह शामिल नहीं थे। इसके बावजूद अंग्रेज सरकार ने उन्हें 19 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद की नैनी जेल में फांसी पर लटका दिया गया।

36 वर्षीय ठाकुर रोशन सिंह का चेहरा काकोरी कांड में शामिल केशव चक्रवर्ती मिलती थी। अंग्रेज सरकार के लिए कोशव से बड़ी चुनौती रोशन थे। इस लिए झूठे सबूतों के आधार पर रोशन सिंह को फांसी दे दी गई। अंग्रेजी सरकार के द्वारा बंगाल की अनुशीलन समिति के सदस्य केशव चक्रवर्ती को खोजने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया।

सी.आई.डी. के कप्तान खानबहादुर तसद्दुक हुसैन पंडित राम प्रसाद बिस्मिल पर बार-बार यह दबाव डालते रहे कि वह किसी भी तरह अपने दल का संबंध बंगाल के अनुशीलन दल या रूस की बोल्शेविक पार्टी से बता दें, परंतु बिस्मिल टस से मस नहीं हुए। आखिरकार रोशन सिंह को दफा 120 'बी' और 121 'ए' के तहत पांच-पांच वर्ष की बामशक्कत कैद और 396 के तहत फांसी की सजा दी गई। इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय और वायसराय के यहां अपील भी की गई परंतु नतीजा वहीं निकला 'ढ़ाक के तीन पात।'

क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का जन्म उत्तरप्रदेश के ख्याति प्राप्त जनपद शाहजहांपुर में स्थित गांव नबादा में 22 जनवरी 1892 को हुआ था। उनकी माता का नाम कौशल्या देवी और पिता का नाम ठाकुर जंगी सिंह था।

ठाकुर रोशन सिंह ने छह दिसंबर 1927 को इलाहाबाद नैनी जेल की काल कोठरी से अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था। उन्होंने पत्र में लिखा था 'मुझे एक सप्ताह के भीतर ही फांसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप मेरे लिए रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का कारण होगी। मैं दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूं। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्टभरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिंदगी जीने के लिए जा रहा हूं। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है उसकी वही गति होती है, जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले महात्मा मुनियों की।'

पत्र के अंत में उन्होंने अपना यह शेर भी लिखा-
'जिंदगी जिंदा-दिली को जान ऐ रोशन
वरना कितने ही यहां रोज फना होते हैं।'


फांसी से पहली की रात ठाकुर रोशन सिंह कुछ घंटे सोए। फिर देर रात से ही ईश्वर भजन करते रहे। प्रात:काल शौच आदि से निवृत्त हो यथा नियम स्नान-ध्यान किया। कुछ देर गीता पाठ में लगाया फिर पहरेदार से कहा, 'चलो'। पहरेदार हैरत से उन्हें देखने लगा कि यह कोई आदमी है या देवता। जाते जाते उन्होंने अपनी काल कोठरी को प्रणाम किया और गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फांसी घर की ओर चल दिए। उन्होंने फांसी के फंदे को चूमा फिर जोर से तीन बार वंदे मातरम का उद्घोष किया और वेद मंत्र का जाप करते हुए फंदे से झूल गए।

उनके अंतिम दर्शन करने और उनकी अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए इलाहाबाद के नैनी स्थित मलाका जेल के फाटक पर हजारों की संख्या में स्त्री-पुरुष, युवा और वृद्ध एकत्र थे । 19 दिसंबर 1927 को भात मां के इस सपूत को फांसी दे दी गई। जैसे ही जेल कर्मचारी उनका शव बाहर लाए वहां उपस्थित सभी लोगों ने नारा लगाया 'रोशन सिंह अमर रहें'। भारी जुलूस की शक्ल में शवयात्रा निकली और गंगा-यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी, जहां वैदिक रीति से उनका अंतिम संस्कार किया गया।

फांसी के बाद ठाकुर रोशन सिंह के चेहरे पर एक अद्भुत शांति दृष्टिगोचर हो रही थी। मूंछें वैसी की वैसी ही थीं बल्कि गर्व से ज्यादा ही तनी हुई लग रहीं थी। उन्हें मरते दम तक बस एक ही मलाल था कि उन्हें फांसी दे दी गई, कोई बात नहीं। उन्होंने तो जिंदगी का सारा सुख उठा लिया परंतु बिस्मिल, अशफाक और लाहिड़ी जिन्होंने जीवन का एक भी ऐशो-आराम नहीं देखा, उन्हें इस बेरहम बरतानिया सरकार ने फांसी पर क्यों लटकाया?

नैनी जेल के फांसी घर के सामने अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की आदमकद प्रतिमा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान का उल्लेख करते हुए लगाई गई है। वर्तमान समय में इस स्थान पर एक मेडिकल कॉलेज स्थापित है। हमारा दुर्भाग्य है कि हमें अपनी पुस्तकों में इन वीरों के विषय में नहीं पढ़ाया जाता।
वन्दे भारती

Friday, 11 September 2015

बैन लगाकर मीट की कालाबाजारी करना चाहती है महाराष्ट्र सरकार?



हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने जैन समुदाय के पर्यूषण पर्व और उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए मीट पर बैन लगा दिया। संभव है कि उसमें कहीं न कहीं उन्हें खुश करने का उद्देश्य हो लेकिन एक बात मुझे समझ नहीं आ रही कि ऐसे छोटे से विषय को राष्ट्रीय मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है। यदि किसी समुदाय विशेष की भावनाओं का सम्मान करते हुए सरकार कोई कदम उठाती है तो क्या उस विषय पर राजनीति करना आवश्यक है? क्या ऐसा संभव नहीं कि इन बेवजह के मुद्दों को छोड़कर राष्ट्रीय हित से जुड़ें विषयों को उठाया जाए।

मुझे आज की स्थिति देखकर हंसी आ रही है और हंसी आने का एक सामान्य सा कारण है कि ये सब उस देश में हो रहा है जिस देश में भाग्यलक्ष्मी माता के मंदिरों में लगी घंटियों को इस लिए रस्सी से बांध कर बंद कर दिया जाता है क्यों कि उनकी आवाज से एक समुदाय विशेष की नींद में बाधा आती थी। उस देश में जहां पर हर सप्ताह के एक विशेष दिन को हजारों स्थानों पर रास्ता बदलने को कह दिया जाता है। ये आखिर ऐसे विषयों पर राजनीति करके जताना क्या चाहते हैं? प्रदेश एवं देश की सरकार का एक तथाकथित हिंदूवादी सहयोगी राजनीतिक दल ये कहता है कि प्रदेश सरकार बैन लगाकर समुदाय विशेष को खुश करना चाहती है। अरे ठाकरे साहब, आप भी तो इस बैन का विरोध करके एक समुदाय विशेष को खुश करके तुष्टीकरण की राजनीति ही तो कर रहे हैं।

आज अगर स्वर्गीय बाला साहब जी स्वर्ग से शिवसेना, उद्धव ठाकरे और वर्तमान कार्यपद्धति को देख रहे होंगे तो निश्चित ही उनकी आखों से खून के आंसू निकल रहे होंगे। उन्होंने शिवसेना को इस लिए तैयार किया था जिससे कि देश की गिरती हुई राजनीति को एक कलाकार का हृदय संभाल ले, जिससे कि देश की राजनीतिक व्यवस्था से परिवारवाद का नाश हो और एक सामान्य व्यक्ति, सामान्य व्यक्तियों के लिए व्यवस्था चलाए। राजनीति, जिसका अर्थ था राज करने की नीति उसे पूर्ण रूप से परिवर्तित करने का श्रेय स्व. बाल ठाकरे जी को ही जाता है। उन्होंने राजकीय व्यवस्था को ठीक प्रकार से चलाने वाली नीति को राजनीति माना था। परिवारवाद का विरोध करने वाले बाल ठाकरे ने अपने पुत्र को शिवसेना में सबसे अधिक महत्व इसलिए दिया क्यों कि उन्हें लगता था कि यह मेरे साथ अधिक समय रहता है इस लिए मेरे विचारों को ठीक प्रकार से समझकर उसे आगे ले जाएगा, लेकिन आज हो कुछ और ही रहा है। शिवसेना एक सामान्य व्यक्ति का राजनीतिक दल न होकर ठाकरे परिवार का दल बन गया है। मूल विचारों और सिद्धान्तों के साथ समझौता करके सत्ता के सिहांसन के प्रति प्रेम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। 

आज मीट पर बैन लगा तो शिवसेना और मनसे वाले सड़क पर दुकान लगा कर मीट बेचने लगे, कल को अगर सरकार वेश्यवृत्ति पर बैन लगा दे तो ये दोनों दलों के कार्यकर्ता क्या करेंगे?

लेकिन इसके बाद जो हुआ उसकी अपेक्षा नहीं थी। भाजपा की ओर से दिया गया तर्क मेरी समझ से बाहर है। सरकारी अधिवक्ता से जब न्यायालय ने पूछा कि मटन पर बैन लगा दिया लेकिन मछली, सी-फूड, फ्रोजन मटन व अंडों पर बैन क्यों नहीं लगाया, क्या उनको नहीं मारा जाता है?
तो हमारे माननीय अधिवक्ता महोदय के द्वारा जवाब में कहा गया कि मटन और मछली में फर्क है। मछली को जैसे ही पानी से बाहर निकाला जाता है, वह मर जाती है, उसे काट कर मारा नहीं जाता।
अरे अधिवक्ता महोदय मछली को पानी से क्या दाना खिलाने के लिए निकाला जाता है। मछली को पानी से निकालने का उद्देश्य यही होता है कि वह मर जाए और फिर उसका भक्षण किया जाए।

न्यायालय ने फिर अधिवक्ता महोदय से पूछा कि अहिंसा की बात करते हैं, पर ये क्या बात हुई कि कुछ दिन के लिए कत्ल और मटन की बिक्री रोक दें, बाकी दिन जारी रहे। क्या ऐसी भावनाएं एक दिन के लिए मन में आती हैं, अगले दिन चली जाती हैं?
सरकारी अधिवक्ता महोदय के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था।

न्यायालय ने पूछा कि मटन की बिक्री कैसे रोकेंगे? क्या पुलिस और म्युनिसिपल अधिकारी घर-घर जाकर तस्दीक करेंगे कि मीट न खाया जाए?
तो अधिवक्ता महोदय द्वारा उत्तर दिया जाता है कि हम लोगों के किचन में जा कर उन्हें रोकने नहीं जा रहे हैं। बैन सिर्फ जानवरों को काटने और सेल पर है। खाने पर नहीं है।
अरे अधिवक्ता महोदय यदि कोई अपने किचन में मीट बनाएगा तो वह लाएगा कहां से? क्या आपके कहने का तात्पर्य यह है कि बैन लगने के बाद कालाबाजारी करो।

मुझे समझ में नहीं आता कि इन जैसे अल्पज्ञानियों को अधिवक्ता बना कौन देता है? जिन लोगों के मस्तिष्क में किसी विषय को लेकर उद्देश्य ही स्पष्ट नहीं होता उन्हें सरकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए क्यों भेज दिया जाता है। इनसे बेहतर विषय का स्पष्टीकरण तो वैचारिक आधार पर जुड़ा हुआ एक सामान्य सा कार्यकर्ता दे सकता है। ऐसे विषयों पर भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को चिंतन की आवश्यकता है।

Thursday, 10 September 2015

मांसाहार क्यों? - एक विवेचन




कभी कभी कुछ अल्पज्ञानी मुझसे कहते हैं कि विश्व गौरव जी ये बताइए कि आपके सनातन धर्म में तो मांसाहार प्रचलित है और आप नहीं खाते, ऐसा क्यों? वो कुछ मंदिरों का नाम गिनाकर कहते हैं कि आपके इन इन मंदिरों में तो मांस ही चढ़ाया जाता है तो आप क्यों मांस का विरोध करते है? ऐसे लोगों को उस समय तो मैं उत्तर दे देता हूं लेकिन आज मुझे लग रहा है कि ऐसे प्रश्न तो बहुत से लोगों के दिमाग में आते होगें। इस लिए आज इस विषय पर विस्तार से लिखने की योजना बनाई है।

किसी भी क्षेत्र की संस्कृति उसके प्राकृतिक वातावरण पर आधारित होती है। जिन स्थानों पर जिस चीज की पैदावार होती है वहां पर वही चीज खाई जाती है। हमारे शास्त्रों में तो यह भी कहा गया है कि पौधों में भी प्राण होते हैं तो क्या हम शाकाहारी मनुष्य हत्यारे नहीं हुए। मित्रों इस विषय को ठीक प्रकार से समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा, उस समय में जब यातायात की व्यवस्था नहीं थी। दक्षिण भारत के क्षेत्र में समुद्र होने के कारण वहां के मुख्य भोजन में मछली का विशेष महत्व है। उत्तर भारत में मांस इस लिए प्रचलन में नहीं है क्यों कि वहां पर गेहूं इत्यादि की पैदावार अधिक है।

पिछले वर्ष रिपोर्टिंग के लिए कोलकाता जाना हुआ था, 10 दिनों के उस प्रवास में वहां पर गेहूं की रोटियां मिलना बहुत मुश्किल हो रहा था। दाल के नाम पर दाल का पानी ही मिलता था। तब मुझे पता चला कि आखिर यहां के क्षेत्र में मछली क्यों खाई जाती है। ये बहुत ही सामान्य सी बातें हैं जिन पर बिना चिंतन किए हम उसे धर्म से जोड़ देते हैं। चिंतन का विषय ये है कि उस समय जब यातायात की व्यवस्था नहीं थी तो लोंगो के मुख्य आहार के रूप में मछली इत्यादि को लिया जाता था। उस समय के जानवर और मनुष्य के अनुपात में और आज के मनुष्य और जानवर के अननुपात में चिंतन की आवश्यकता है।

आज जब सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं तो हम क्यों मांसाहार को इतना अधिक महत्व दे रहे हैं ये चिंतन का विषय होना चाहिए।

Tuesday, 8 September 2015

दृष्टि और दृष्टिकोण



एक बार की बात है। एक नवविवाहित जोड़ा दिल्ली में किराए के घर में रहने पहुंचा। पति का नाम आशीष और पत्नी का नाम शिप्रा था। अगली सुबह, जब आशीष और शिप्रा नाश्ता कर रहे थे, तभी शिप्रा ने खिड़की से देखा कि सामने वाली छत पर कुछ कपड़े फैले हैं। शिप्रा ने कहा कि लगता है सामने वाले घर में रहने वाले लोगों को कपड़े साफ करना भी नहीं आता, जरा देखो तो कितने मैले लग रहे हैं?
आशीष ने उसकी बात सुनी पर अधिक ध्यान नहीं दिया।
एक-दो दिन बाद फिर उसी जगह कुछ कपड़े फैले थे। शिप्रा ने उन्हें देखते ही अपनी बात दोहरा दी, 'कब सीखेंगे ये लोग कि कपड़े कैसे साफ़ करते हैं।'
आशीष सुनता रहा पर इस बार भी उसने कुछ नहीं कहा।
लेकिन अब तो ये आए दिन की बात हो गई, जब भी शिप्रा कपड़े फैले देखती भला-बुरा कहना शुरू कर देती।
लगभग एक महीने बाद सुबह के समय आशीष और शिप्रा नाश्ता कर रहे थे। शिप्रा ने हमेशा की तरह नजरें उठाईं और सामने वाली छत की तरफ देखा और देखते ही बोली कि अरे वाह! लगता है इन्हें अक्ल आ ही गई। आज तो कपड़े बिलकुल साफ दिख रहे हैं, जरूर किसी ने टोका होगा!'
आशीष ने कहा कि नहीं उन्हें किसी ने नहीं टोका।
शिप्रा ने आश्चर्य से आशीष को घूरते हुए पूछा कि तुम्हें कैसे पता?
तो आशीष ने जवाब दिया कि आज मैं सुबह जल्दी उठ गया था और मैंने इस खिड़की पर लगे कांच को बाहर से साफ कर दिया, इसलिए तुम्हें कपड़े साफ दिखाई दे रहे हैं।

इस छोटी सी कहानी के मर्म को समझा आपने? हम बिना स्थितियों का विवेचन किए दूसरों के विषय में अपनी राय बना लेते हैं। इस देश की राजनीति की वर्तमान स्थिति कुछ ऐसी ही हो गई है। देश के राजनेता बिना स्वयं का विश्लेषण किए मात्र आरोप और प्रत्यारोप की राजनीति कर रहे हैं और इस देश का दुर्भाग्य ये है कि देश की जनता उन राजनेताओं के मायाजाल में फंसती जा रही है। आत्मचिंतन के बिना इस देश को पुनः विश्वगुरू बनाने का स्वप्न साकार नहीं हो सकता। इस देश की बागडोर इन राजनेताओं के हाथ में सौंपकर हम ये समझने लगते हैं कि अब देश की पूरी जिम्मेदारी इन पर ही है लेकिन क्या हमारी जिम्मेदारी मात्र 5 साल में 2 बार मतदान कर देने भर से समाप्त हो जाती है। क्या हम अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं रहे हैं? यदि हमने अभी अपने दृष्टकोण में परिवर्तन नहीं किया तो शिप्रा की तरह ही बस बुराइयां ही देखते रहेंगे। हमें अच्छाई को समर्थन और बुराई को पहचान कर उसका विरोध करना ही होगा। तभी हम मां भारती के पुत्र कहलाने के हकदार होंगे।
वन्दे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...