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Sunday, 25 December 2016

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने जैसे नारे लगे थे। क्या हुआ फिर? मीडिया चीखा, ‘राष्ट्रवादी’ चिल्लाए, पुलिस ने कुछ लेफ्ट विंग के छात्रनेताओं को उठाया, उनको कोर्ट में पेश किया और फिर कोर्ट ने उन्हें सशर्त अंतरिम जमानत दे दी। बस कहानी खत्म….

लगभग 9 महीने बीत गए, लेकिन आज तक भारत विरोधी नारे लगाने वालों को सजा नहीं मिली। अरे सजा छोड़िए साहब, हमारी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां उन लोगों की पहचान तक नहीं कर पाईं जिन्होंने देश को गालियां दी थीं। हम भी खामोश हो गए। हमें तो भूलने की बीमारी है। हम भूल गए कि हमारी मां को गालियां दी गई थीं।

भारत, एक ऐसा देश जहां के एक विश्वविद्यालय का छात्र गुमशुदा हो जाता है तो उस विश्वविद्यालय के वीसी तक को बंधक बना लिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां विश्व के सबसे बड़े गैर-राजनीतिक संगठन के कार्यकर्ताओं की हत्या पर नेता से अभिनेता तक, सभी मौन हो जाते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां गोरक्षक बनकर लोग अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी निकालते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां एक आतंकी के जनाजे में हजारों की संख्या में लोग मातम मनाते हुए दिखते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां एक अभिनेता सीमा पर तैनात सैनिक की शहादत पर ‘बिगड़े बोल’ बोलने से भी नहीं हिचकता, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां एक आतंकी को ‘शहीद’ कहकर सम्मान दिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत एक ऐसा देश जहां सिर्फ तीन बार ‘तलाक-तलाक-तलाक’ बोलकर एक महिला के सपनों को एक झटके में चकनाचूर कर दिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते? (क्लिक कर पढ़ें: महिलाओं के शोषण का नायाब तरीका है तीन तलाक)

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग नवरात्र में तो भोज के लिए कन्याएं खोजते हैं, लेकिन पैदा होने से पहले ही अपनी बेटी को मार देते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?
विश्व गौरव

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग हलाला और मुताह जैसी कुप्रथाओं का खुले आम समर्थन करते हुए एक धर्मनिरपेक्ष देश में मजहबी कानून का पक्ष लेते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग बात तो ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ की करते हैं, लेकिन महिला को दहेज के लालच में जिंदा जला देते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग राष्ट्र की वंदना की पर्याय सूक्ति, वंदे मातरम को एक संगठन और धर्म विशेष से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि उनके गले पर चाकू भी रख दी जाएगी तब भी वंदे मातरम नहीं बोलेंगे, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग राजनीतिक विरोध करते-करते अपने स्तर को राष्ट्र विरोध तक ले आते हैं, उन्हें विदेशों में भी अपने प्रधानमंत्री की बुराई करने से कोई परहेज नहीं होता, वे घर के मतभेदों को मनभेद के रूप में विश्वपटल पर प्रदर्शित करते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के लोग सरकार की अच्छी योजनाओं के साथ इसलिए नहीं खड़े होते क्योंकि वे विपक्षी पार्टी से आते हैं, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां ‘सवर्ण’ होते हुए भी दलितों को सम्मान दिलाने का प्रथम प्रयास करने वाले विनायक दामोदर सावरकर को गद्दार और सांप्रदायिक करार दिया जाता है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां सनातन धर्म की सर्वोच्च पदवी पर विराजमान, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती कहते हैं कि महिलाओं द्वारा शनि शिंगणापुर में पूजा किए जाने से बलात्कार बढ़ेंगे, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

भारत, एक ऐसा देश जहां के तथाकथित नारीवादियों ने महिला आजादी का पैमाना उनके कम कपड़ों और सिगरेट-शराब पीने को बना दिया है, क्या इसे असहिष्णुता नहीं कहते?

असहिष्णुता क्या है?  कोई भारत को गाली दे और उसे रोका जाए, असहिष्णुता यह नहीं है। असहिष्णुता है अपने कर्तव्य और अधिकार के मध्य सामंजस्य स्थापित न करना। लेकिन इस असहिष्णुता के होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि मैं अपने देश को छोड़कर पाकिस्तान चला जाऊं या अगर मैं यह कहूं कि भारत में असहिष्णुता है तो कोई फर्जी राष्ट्रवादी मुझे देशद्रोही करार करके मेरे लिए पाकिस्तान का टिकट कटाकर ले आए। वास्तविक पीड़ा तो इस बात की है कि इस तरह की ‘असहिष्णुताओं’ पर ना ही कोई अवॉर्ड वापसी अभियान चलता है और ना कोई पत्रकार अपने चैनल की स्क्रीन काली करता है….

Wednesday, 24 February 2016

इस संस्कृति में रामभक्ति करें या न करें, लेकिन...

पिछले कुछ समय से हमारा देश अजीब दौर से गुजर रहा है। इस देश के हालात ऐसे हो गए हैं कि वोट के सौदागर सत्ता के सिंहासन पर बैठने के लिए नीचता की पराकाष्ठा पार करने से भी गुरेज नहीं करते। देश की इस स्थिति के लिए सिर्फ इस देश के राजनेता ही जिम्मेदार नहीं नहीं हैं अपितु इसके लिए कहीं ना कहीं हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हम आज सामने वाले व्यक्ति को उसके तर्कों के आधार पर नहीं अपितु उसके तर्कों से सहमति रखने वाली राजनीतिक पार्टियों से जोड़ देते हैं। आज हम जिसे भी चाहते हैं उसे अपनी तरह का देखना चाहते हैं, आज हमारी स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि अगर हम कहते हैं कि आइए सब एक हो जाइए तो साथ में शर्त लगा देते हैं कि एक तब होंगे जब आप हमारी तरह से सोचने लगेंगे। इसको अगर एक सामान्य पंक्ति में कहें तो हम आज ‘एकता’ नहीं अपितु ‘एकरूपता’ चाहते हैं। इस एकरूपता की विचारधारा का प्रभाव सभी तरह की विचारधाराओं पर है।

कोई कहता है कि देश के मजदूरों एक हो जाओ तो वह साथ में यह भी कहने लगता है कि आपको एक होने के लिए ‘राम’ को मानना बंद करना होगा। अगर कोई यह कहता है कि इस देश के सनातनियों एक हो जाओ तो साथ में अप्रत्यक्ष शर्त लगा दी जाती है कि इसके लिए आपको मुसलमानों का विरोध करना होगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम जैसे हैं उसी तरह रहकर मात्र भारतीयता के नाम पर एक हो जाएं। इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश में कुछ लोगों को इस बात पर शर्म आती है कि हमारे लोकतांत्रिक मंदिर, यानी संसद पर हमला करके इस देश की एकात्मता पर प्रहार करने वाले अफजल गुरु नाम के आतंकी को फांसी पर लटका दिया जाता है।

इन शर्मीले लोगों के साथ-साथ एक अन्य वर्ग कहता है कि अगर वह हमला सफल हो जाता तो क्या होता? कुछ भ्रष्ट लोग ही तो मरते। मैं उनको बताना चाहता हूं कि इस देश की संसद में कोई व्यक्ति नहीं बैठता बल्कि इस देश की संसद में जनमत बैठता है। वह जनमत जिसे मैं और आप चुनते हैं, आपने जिसको अपना वोट दिया हो भले ही वह व्यक्ति उस संसद में ना पहुंचा हो लेकिन किसी अन्य की पसंद तो वहां बैठती है। सिर्फ मैं और मेरी विचारधारा, कैसी समानता है आपकी? जो काम आपके मन-मुताबिक ना हो उस पर आपको शर्म आने लगती है, कैसी मानवता है आपकी? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में जब छात्रों के वर्ग ने कहा कि ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा है…’ मुझे समझ नहीं आया कि यहां कातिल कौन है? देश का उच्चतम न्यायालय, देश का राष्ट्रपति, अफजल की फांसी के लिए अपने शहीद पति को मरणोपरांत दिए गए शौर्यता के प्रमाण पत्रों को लौटाने की बात करने वाली वे वीरांगनाएं, वे पुलिस वाले जिन्होंने अफजल को पकड़ा अथवा देश का हर एक वह नागरिक जो सड़क से लेकर संसद तक अफजल के कुकृत्य के लिए फांसी की मांग कर रहा था?

हो सकता है कि इन शर्मीले लोगों का अफजल या उसकी विचारधारा से कोई परिवारिक अथवा व्यक्तिगत संबन्ध हो इसलिए इन्हें अफजल के तथाकथित कातिलों के जिंदा होने पर शर्म आती हो, मुझे भी शर्म आती है लेकिन इस विषय को लेकर नहीं बल्कि कुछ अन्य विषयों को लेकर… अगर आप इससे आगे पढ़कर यह जानना चाहते हैं कि मुझे किन विषयों को लेकर शर्म आती है तो सबसे पहले आपने जो राजनीतिक विचारधाराओं के दुशाले ओढ़कर रखें हैं उन्हें उतार फेकें। इस लेख को आगे पढ़ने से पहले आप अपने ह्दय से अपनी प्रिय राजनीतिक पार्टी के झंडे को नीचे करके सिर्फ तिरंगे को स्थान दें और फिर आगे पढ़ें…

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश की एक केन्द्रीय मंत्री निरंजन ज्योति, सत्ता के मद में इस कदर चूर हो जाती हैं कि वह मान लेती हैं कि उसकी राजनीतिक पार्टी के पक्ष में मतदान करने वाले लोग ‘रामजादे’ हैं और उसके विपक्ष में मतदान न करने वाले लोग ‘हरामजादे’ हैं। क्या उनके कहने का अर्थ यह था कि 2014 में उनकी पार्टी को वोट देने वाले 31% लोग रामजादे तथा अन्य 69% लोग हरामजादे थे? अगर आज सबसे अधिक वोट पाने वाली पार्टी को देश की सरकार मान लिया जाता है तो क्या उसी आधार पर यह भी मान लिया जाए कि यह देश हरामजादों का है (बहुमत के आधार पर)।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में एक प्रदेश की सत्ता का संचालन करने वाली पार्टी, टीएमसी के नेता तमस पॉल अपने प्रदेश की एक प्रमुख विपक्षी पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं को रेप करवाने की धमकी दे डालते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश की जनता कुछ उम्मीदों के साथ मात्र वाकपटुता को देखकर एक व्यक्ति को इस देश की संसद का नेतृत्व करने के लिए भेजती है और वह व्यक्ति पार्टी स्वार्थ में लिप्त होकर विरोधियों को नक्सली करार देते हुए जंगल जाने की सलाह दे देता है। देश का प्रधान यहीं पर नहीं रुकता वह उस समय के सबसे लोकप्रिय युवा राजनेता अरविंद केजरीवाल को पाकिस्तान का एजेंट करार देता है।

मुझे शर्म तब आती है जब ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ वाली संस्कृति को मानने वाले देश में एक बेटी ‘दामिनी’ सड़क पर तड़पती रहती है और कोई उसे उठाकर हॉस्पिटल तक ले जाने की कोशिश नहीं करता।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश के एक प्रदेश का एक पूर्व मुख्यमंत्री तथा केन्द्रीय सरकार का पूर्व मंत्री दिग्विजय सिंह एक महिला सांसद के लिए ‘100 टका टंच माल’ जैसी उपमाओं का प्रयोग करता है।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में हजारों सेवा प्रकल्प चलाने वाले विश्व के सबसे बड़े गैर राजनीतिक संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकी और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं को गुंडा कहा जाता है।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का एक नेता गिरिराज सिंह कहता है कि जो उसके ‘प्रधान’ का विरोध कर रहे हैं उनका स्थान पाकिस्तान में है भारत में नहीं। इतना ही नहीं वह महाशय अशफ़ाक उल्ला खां और वीर अब्दुल हमीद के देश में आतंक फैलाने वालों को एक समुदाय विशेष से जोड़कर पूरे समुदाय को आतंकी घोषित करने की कोशिश करते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का सर्वोच्च नेता कहता है कि बलात्कार करने वाले लड़कों को फांसी नहीं देनी चाहिए, लड़कों से गलती हो जाती है।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार, जिसने इस देश में सबसे अधिक शासन किया है, उसकी सर्वोच्च नेता अपने देश के बेटों पर भरोसा न करके विदेश इलाज कराने जाती हैं और इस देश से उम्मीद करती हैं कि हम उनके बेटे के भरोसे देश छोड़ दें।

मुझे शर्म तब आती है जब जाति व्यवस्था को पानी पी-पी कर कोसने वाले वामपंथी मात्र चर्चाओं में रहने के लिए एक छात्र को दलित बनाकर जातिगत राजनीति करने लगते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में चंद राष्ट्रद्रोहियों की वजह से देश को कई नेता, अभिनेता, पत्रकार, शिक्षाविद् देने वाले विश्वविद्यालय को आतंक का अड्डा करार दिया जाता है।

मुझे शर्म तब आती है जब किसी ‘दल’ के लोग संस्कृति का झंडा लेकर हिंसा का रास्ता अपनाते हैं। इतना ही नहीं संस्कृति के ये तथाकथित ठेकेदार अपने शहीदों की पुण्यतिथि और उन शहीदों से जुड़े तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने से नहीं हिचकते। अपनी सांस्कृतिक भव्यता को समझाने की क्षमता तो इनमें रही नहीं इसलिए लाठी-डंडे और झूठे तथ्यों का सहारा लेते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब कुछ लोग देश के प्रधान के लिए ‘नीम का पत्ता कड़वा है, नरेन्द्र मोदी भ… है’ जैसी बातें बोलकर राज-द्रोह करते हैं और उन पर पुलिस जमकर लाठियां बरसाती है लेकिन जब कुछ लोग एक शैक्षिक संस्थान के अंदर ‘भारत तेरी बर्बादी तक….’ जैसे नारे लगाते हैं तो हमारे देश की वीर पुलिस आई-कार्ड देखने लगती है। किसकी नौकरी करते हैं ये पुलिस वाले… राजा की या राष्ट्र की…

मुझे शर्म तब आती है जब हत्यारों और बलात्कारियों को पकड़ने में नाकाम रहने वाली पुलिस एक नेता की भैंस को चोरी करने वाले को पकड़ लेती है।

मुझे शर्म तब आती है जब एक कामचोर कर्मचारी, एक टैक्स चोर और सड़क पर बिना घबराए सिग्नल तोड़ने वाला व्यक्ति पूछता है कि पीएम साहब अच्छे दिन कब लाएंगे?

मुझे शर्म तब आती है जब इतने सारे विषयों के होते हुए कोई एक आतंकी की फांसी को गलत बताते हुए उसके मानवाधिकार की बात करता है। जिस आतंकी में मानवता नाम की चीज ही नहीं है उसके लिए किस आधार पर मानवाधिकार की बातें की जाती हैं यह मेरी समझ से परे है। एक बात और इतिहास के द्वारा बताना चाहता हूं। शायद कुछ लोगों का उसमें विश्वास ना हो लेकिन मेरा है, अपने विश्वास के आधार पर एक अतिमहत्वपूर्ण विषय की ओर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।

दोस्तो, विभीषण रावण के राज्य में रहने वाला एक ऐसा व्यक्ति था जिसके सहयोग के बिना श्रीराम को सीता नहीं मिलतीं, जिनके सहयोग के बिना लक्ष्मण जीवित नहीं बचते, जिसके सहयोग के बिना रावण के राज्य की गोपनीय बातें हनुमान-श्रीराम को पता नहीं लगतीं। एक लाइन में कहें तो ‘श्रीराम का आदर्श भक्त’… इतना कुछ होते हुए भी आज उस घटना के हजारों सालों के बाद भी किसी पिता ने अपने बेटे का नाम ‘विभीषण’ नहीं रखा। जानते हैं क्यों?

क्योंकि इस संस्कृति में आप राम भक्ति करें या ना करें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर राष्ट्रभक्ति नहीं की तो कभी माफ नहीं किए जाएंगे।

Tuesday, 2 February 2016

'प्रभु' की रेल का शर्मनाक चेहरा

पिछले कुछ दिनों में विभिन्न समाचार पत्रों में रेल मंत्री सुरेश प्रभु के कार्य की काफी सराहना पढ़ने को मिली। ख़बरों को पढ़कर लगता था की मेरी अगली ट्रेन की यात्रा शायद कुछ शानदार अनुभवों वाली होगी। कुछ पारिवारिक परेशानियों के चलते पिछले कुछ दिनों से लखनऊ में था। इसी दौरान मध्य प्रदेश के रीवा जिले में एक कार्यक्रम के लिए जाना हुआ। रीवा से वापसी के दौरान 31 जनवरी को रीवा-आनंद विहार ट्रेन से दिल्ली जाते समय ट्रेन के स्लीपर कोच में जो कुछ घटित हुआ वह कहीं ना कहीं रेलवे की व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह जरूर लगाता है। उस यात्रा के दौरान जो कुछ घटित हुआ वह वास्तव में काफी दुःखद है।
मैं, ट्रेन के एस-5 कोच की 26 नंबर सीट पर लेटा था। ट्रेन रीवा से जब इलाहाबाद पहुंची तो मेरे ठीक सामने वाली 31 नंबर साइड लोअर बर्थ पर तीन अधेड़ उम्र के लोग आकर बैठ गए। कुछ देर बाद वहां से टिकट पर्यवेक्षक महोदय गुजरे।
 
उनमें से एक व्यक्ति ने पर्यवेक्षक महोदय से कहा, ‘सर, हमारा वेटिंग टिकट है, अगर कोई सीट हो तो दे दीजिए।’ पर्यवेक्षक महोदय ने तत्काल अपना मुंह खोला और बोले, ‘एक सीट का 500 रुपए लगेगा।’ मैं चुपचाप लेटा था क्योंकि अगर वेटिंग टिकट है तो थोड़ा सा तो झेलना ही होगा। लेकिन टीटीई  की बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। एक ओर जहां प्रभु की रेल भ्रष्टाचार मुक्ति के बड़े-बड़े दावे कर रही है वहीं दूसरी ओर उनका एक कर्मचारी इलाहाबाद से अलीगढ़ के लिए 500 रुपए में सीट बेच रहा था। खुलेआम इस तरह की मांग की कल्पना मैंने नहीं की थी।

एक पत्रकार होने के नाते मैंने उन लोगों से पूरा विषय फिर से पूछा। नियमतः यदि ट्रेन में कोई सीट चार्ट बनने के बाद भी खाली रह जाती है तो टिकट पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी है कि RAC वाले व्यक्ति को पूरी सीट उपलब्ध कराए और यदि उसके बाद भी कोई सीट खाली रहती है तो वेटिंग टिकट वाले को सीट दे और यदि फिर भी सीट खाली रहती है तो जनरल टिकट के साथ आरक्षित डिब्बे में यात्रा कर रहे यात्रियों को पेनल्टी के साथ सीट दे।
लेकिन इस ट्रेन के हालात कुछ और ही थे। सहयात्री से पूरा विषय जानने के बाद मैं उनके साथ टीटीई के पास गया। सामान्य तौर पर मैं कहीं पर यह नहीं बताता कि मैं पत्रकार हूं। मैंने टीटीई  से कहा कि आप 500 रुपये में सीट कहां से देते और वो 500 रुपए कहां जाते? तो उनका जवाब था, ‘यह नेतागिरी कॉलेज तक ही रखो और अगर तुमसे दुःख नहीं देखा जा रहा है तो अपनी सीट दे दो। मैं कुछ नहीं जानता।’ इतना कहने के बाद वह मेरे सहयात्री से बोले, ‘तुमको वेटिंग टिकट के साथ आरक्षित डिब्बे में बैठने का अधिकार नहीं है। वो तो मैंने तुमको घुसने दिया है तो चुपचाप बैठ जाओ। ज्यादा नेताओं को लेकर आओगे तो इनके साथ तुमको भी रात में अन्य यात्रियों को डिस्टर्ब करने के आरोप में बंद करवा दूंगा।’ यह मेरे लिए एक आश्चर्यजनक स्थिति थी। 

जितनी आसानी से पर्यवेक्षक महोदय ने रात के 10:20 बजे यह बात बोली थी उतना ही आसान मेरे लिए उनकी इस करतूत को आईना दिखाना था। मैंने तत्काल तय किया कि इस स्थिति के विषय में ट्वीट के द्वारा माननीय रेल मंत्री महोदय को अवगत कराऊंगा। लगभग 5 मिनट तक दो टिकट पर्यवेक्षक मुझे धमकी भरे अंदाज में नियम कानून समझाते रहे। फिर मैंने उनको अपना परिचय देते हुए कहा कि आप अपना नाम बता दीजिए तो वह बोले, ‘मीडिया बहुत अच्छा है क्या? मेरे पर्स में 20 पत्रकारों के कार्ड पड़े हैं। जाकर अपनी सीट पर सो जाओ नहीं तो समस्या में पड़ जाओगे।’
 
तभी फतेहपुर स्टेशन आ गया। उन में से एक टीटीई बाहर उतर गया। मैं चाहता तो बहस कर सकता था लेकिन मैं समझ गया था कि इसका कोई मतलब नहीं निकलेगा। मैंने अपना स्मार्टफोन निकाल कर रेलमंत्री को ट्वीट करने की कोशिश की लेकिन अंबानी के ‘रिलायंस’ ने मेरा साथ नहीं दिया। नेटवर्क की समस्या के चलते मैं ना ही किसी को कॉल कर सकता था और ना ही मेसेज। उन दोनों में एक टीटीई की उम्र मुश्किल से 26 के आस-पास रही होगी। तय है कि अपने छात्र जीवन में उस युवा ने भी भ्रष्टाचार का सामना किया होगा, और संभवतः उसे भी लगता होगा कि काश इस देश में भ्रष्टाचार ना होता। लेकिन आज जब उसके पास जिम्मेदारी है, जब वह कुछ कर सकता है तब वह उसी भ्रष्टाचार की गंदगी में फंस गया।

खैर मैं अपनी सीट पर आकर वापस लेट गया और अपनी सीट पर उनमें से एक अन्य को बैठाया। उस व्यक्ति के मुंह से बस इतना ही निकला कि ‘काश! मोदी जी को यह पता होता’… मैं उसकी सकारात्मक उम्मीद को देखकर हैरान था। कुछ ही देर में मुझे नींद आ गई, फिर मेरी आंख खुली तब तक ट्रेन खुर्जा पहुंच चुकी थी। मैं एक बार फिर से टीटीई का नाम जानने के लिए उसकी सीट पर गया लेकिन वह भी जा चुके थे। मैं चुपचाप आकर अपनी सीट पर बैठ गया और आनंद विहार रेलवे स्टेशन के आने का इंतजार करने लगा। मेरे मन में एक ही सवाल था कि बिना खुद को बदले क्या हमारा ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ की उम्मीद करना ठीक है?

Friday, 27 November 2015

एक मुस्लिम लड़के का आमिर को करारा जवाब

एक ओर जहां देश में तथाकथित 'असहिष्णुता' को लेकर माहौल गरम दिख रहा है वहीं दूसरी ओर एक वर्ग ऐसा भी है जिसे देश देश के माहौल से कोई समस्या नहीं है। कल कुछ सर्च करते करते अचानक मेरी नजर quora.com की एक पोस्ट पर गई। उस पोस्ट को पढ़कर मुझे लगा कि आखिर कोई कैसे यह कह सकता है कि इस देश में असहिष्णुता बढ़ रही है। एक मुस्लिम लड़के ने यह पोस्ट लिखी तो काफी समय पहले थी लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में यह बिलकुल सटीक बैठती है। वर्तमान परिदृश्य के अनुसार बेहद प्रासंगिक लगने वाली वह पोस्ट अंग्रेजी भाषा में लिखी गई थी। उस पोस्ट को मैं हिन्दी भाषा में आपके सामने रख रहा हूं। इस पूरे विषय पर मेरा क्या विचार है उसे आप लेख के अंत में पाएंगे। वेबसाइट पर प्रश्न पूछा गया था कि एक भारतीय मुसलमान के तौर पर आपको किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा है?
पोस्ट के जवाब में सैयद नासिर ने जो कुछ लिखा वह भारत की गंगा जमुनी तहजीब को बताता है। नासिर लिखता है कि मेरे साथ एक बार नहीं कई बार भेदभाव हुआ है।

रमजान के महीने में जब मेरे दोस्‍त अपने व मेरे बीच भेदभाव करते हुए कहते हैं कि तुम घर जाओ हम काम संभाल लेंगे।

रमजान की एक शाम एक गैर मुस्‍लिम दोस्‍त ने अपने व मेरे घर के बीच भेदभाव किया। उसने कहा कि आज हम प्रॉजेक्‍ट वर्क तुम्‍हारे घर पर निपटाएंगे, चूंकि रमजान है और मैं तुम्‍हारे घर पर बने लजीज व्‍यंजनों का स्‍वाद मिस नहीं करना चाहता।

जब भी शराब पीने वाले दोस्‍तों के साथ पार्टी होती है तो वह मेरे साथ भेदभाव करते और मेरे लिए सॉफ्ट ड्रिंक लाना नहीं भूलते।

जब भी हम कहीं बाहर नॉन वेज खाने का प्‍लान बनाते हैं। तो मेरे दोस्‍त रेस्‍तरांओं के बीच भेदभाव करते हैं। वे वहीं जाते हैं जहां उन्‍हें मेरे लिए हलाल फूड मिलने का यकीन होता है।

हर शुक्रवार को मुझे अपने और गैर मुस्‍लिम दोस्‍तों के बीच भेदभाव महसूसत होता है। जब मुझे नमाज के लिए जाने की इजाजत होती है और वे उस आधे घंटे के दौरान काम कर रहे होते हैं।

तफरी के दौरान भी मुझसे भेदभाव होता है। अगर माहौल है तो मुझसे उर्दू शायरी सुनाने की उम्‍मीद की जाती है।

हर बार घर जाते समय मुझे भेदभाव का सामना करना पड़ता है। वापस आने पर मुझसे ढेर सारी बिरयानी लाने की उम्‍मीद की जाती है। किसी और के साथ ऐसा नहीं होता। यह भेदभाव है।

हर रोज जब दोपहर के वक्‍त वर्कप्‍लेस पर अपनी टेबल के करीब नमाज के वक्‍त मेरे साथी बाहर चले जाते हैं। जिससे कि उन पांच मिनटों के दौरान लंच की उनकी गपशप से मैं डिस्‍टर्ब न हो जाऊं।

नासिर ने आगे लिखा कि बहरहाल अगर साफ शब्‍दों में कहूं तो मुझे याद नहीं आता कि कभी मेरे साथ कहीं पर भी भेदभाव हुआ। मुझे नौकरी बिना किसी परेशानी के और प्रमोशन टैलेंट के दम पर मिला। इस्‍तीफा भी बिना किसी विवाद के दिया। मैं अपने करियर में बिना यह इस फीलिंग के साथ आगे बढ़ सकता हूं कि अपने धर्म के चलते मैंने कोई अवसर खो दिया।

नासिर लिखता है कि कुछ मुस्‍लिम दोस्‍तों ने जरूर मुझे बताया कि उन्‍हें नए शहर में किराए का मकान मिलने में तकलीफ होती है। मेरा मानना है कि ऐसा मकानमालिकों के मुस्‍लिमों को नापसंद करने की बजाय नॉन वेजिटेरियंस को मकान न देने के चलते हो सकता है। मांस मच्‍छी न खाना उनके धर्म का हिस्‍सा होगा और संभव है वह अपने घर में मांस न चाहते हों। ऐसे लोगों को दरकिनार कर आगे बढ़िए। आखिर आपका इरादा मकानमालिक की बेटी से शादी करने का तो नहीं है। संभव है आप अपने धर्म को लेकर कांशियस हो रहे हैं, जिसके चलते लगने लगा है कि सिर पर लगी टोपी की वजह से एयरपोर्ट पर ज्‍यादा तलाशी या ट्रैफिक पुलिस वाला रोक रहा है। इन्‍हें इग्‍नोर कर आगे बढ़िए। भारत में आगे बढ़ने के लिए आपके पास पर्याप्‍त मौके हैं।
सिविल सर्विस एग्‍जामिनेशन से लेकर सॉफ्टेवेयर इंडस्‍ट्री में नौकरियों तक, पर्याप्‍त व ट्रांसपेरेंट रास्‍ते हैं जहां आप अपने को साबित कर सकते हैं। उन पर ध्‍यान केंद्रित करिए बजाय यह सोचने कि मेट्रो में बैठी महिला आपको दाढ़ी के चलते देख रही थी। अपने गैर मुस्‍लिम दोस्‍तों के सवालों का जवाब दीजिए जो वह अकसर किसी दुर्भावना नहीं बल्‍कि क्‍यूरियोसिटी के चलते पूछ रहे होते हैं। मुस्‍कुराते रहिए। अपने धर्म व उसकी हीलिंग व अच्‍छाई को बढ़ावा देने की ताकत में यकीन करिए। आपका वक्‍त अच्‍छा गुजरेगा।

नासिर ने अपने जवाब के अंत में 'प्राउड एंड हैप्‍पी टू बी इंडियन। जय हिंद' लिखा है।


दोस्तों, इस उत्तर को पढ़कर मुझे ह्रदय से बहुत ही खुशी हुई। अगर हम मुस्लिम्स से यह अपेक्षा करते हैं कि वे गैर मुस्लिमों के बारे में वैसे ही विचार रखें जैसे कि नासिर के हैं तो दोस्तों हमें भी मुस्लिमों के साथ वैसा ही व्यवहार करना होगा जैसा कि नासिर के मुस्लिम परिचितों ने उसके साथ किया। दोस्तों, जो मुस्लिम आज इस देश में रह रहे हैं वे तुर्की या अरब से नहीं आए हैं बल्कि वे सभी यहीं के हैं लेकिन इस देश के कुछ लोग ऐसा मान कर बैठे हैं मुसलमान का मतलब गद्दार और जब उनके सामने एपीजे अब्दुल कलाम या अशफाक उल्ला खान का नाम लो तो वे बहुत आसानी से सवाल को टालते हुए इन नामों को अपवाद करार देते हैं।

दोस्तों, एक चौपाई है, जाकी रही भावना जैसी, रघु मूरति देखी तिन तैसी। बिलकुल वैसी ही स्थिति है, आप जिस रूप में जिसे देखेंगे वैसे ही वे दिखेंगे। आप एक मुसलमान में अगर लादेन देखेंगे तो वह आपको वैसा ही दिखेगा और अगर उसी मुसलमान में आप एपीजे अब्दुल कलाम को देखने की कोशिश करेंगे तो निश्चित ही आपकी अपेक्षानुसार वह व्यक्ति एपीजे कलाम बनने की कोशिश करेगा। हमारे पुराणों में आकर्षण के सिद्धान्त की बात की गई है, वही तो है यह।

और दोस्तों, अगर कोई व्यक्ति इतना गिरा हुआ है कि वह इस देश की माटी के साथ गद्दारी करने के बारे में सोच रहा है तो उसे जेल में मत डालो बल्कि चौराहे पर गोली मार दो, लेकिन उस व्यक्ति को इस्लाम से मत जोड़ो और इसके साथ इतनी हिम्मत भी रखो कि अगर कोई ऐसा व्यक्ति जो भगवा कपड़े पहन कर इस देश को तोड़ने की साजिश करे तो उसे भी उतनी ही बर्बरता से मारने की हिम्मत रखो। और दोस्तों भगवा पहन कर देश तोड़ने की बात करने वाला एक बड़ा नाम तथाकथित स्वामी अग्निवेश का है। मेरा मानना है कि जो राष्ट्र और मातृभूमि को सर्वप्रथम ना माने वह भले ही दिन में 50 बार मंदिर जाता हो लेकिन उसे हिंदू नहीं कहा जा सकता। यह सिद्धान्त मेरा अपना नहीं है अपितु यह सिद्धान्त तो हमारे पूर्वज श्री रामचन्द्र जी ने दिया था। याद है ना आपको श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा था, "अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥" अभी हाल ही में हुए पेरिस हमले के बाद अपने एक मुस्लिम मित्र दानिश से मैंने पूछा कि भाई यह कैसा इस्लाम है तो दानिश ने कहा कि जो मजमूलों का कातिल है वह मुसलमान नहीं हो सकता। उसके जवाब से मुझे एहसास हुआ कि हम दोनों के विचार तो एक ही हैं।
इस ब्लॉग को एक अपेक्षा के साथ लिख रहा हूं... मेरी अपेक्षा यह है कि आने वाले कुछ समय में इस देश का प्रत्येक मुसलमान जब भारत से कहीं बाहर जाए तो वह कहे कि भारत के 25 करोड़ मुसलमान 100 करोड़ सनातनियों की सुरक्षा में रहते हैं और जब कोई सनातनी कहीं बाहर जाए तो वह कहे कि भारत के मुसलमान हमसे पहले मां भारती की रक्षा में अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार खड़े रहते हैं तथा जब तक भारत में ईमान के पक्के ये 25 करोड़ मुसलमान हैं तब तक भारत का कोई कुछ नहीं कर सकता।

इसी अपेक्षा के साथ वन्दे भारती...

Thursday, 27 August 2015

भारत vs इंडिया- एक विश्लेषण



वर्तमान समय में भारत, इंडिया मे खोता जा रहा हैं। मेरे इस लेख पर बहुत से तथाकथित बुद्धिजीवी मुझे ज्ञान की बाते बतायेंगे। आप सभी पाठकों से निवेदन हैं की इस लेख को लिखने की आवश्यकता मुझे क्यों पडी उसे समझने का प्रयास करें। भारत को इंडिया से अलग करके देखने की मेरी कोशिश कइयों को नागवार लगेगी, और कई इसे मेरी सनक कह कर खारिज कर देंगे। लेकिन भारत इंडिया नही हैं यह कहने वाला मै अकेले नहीं हूं। अंग्रजों द्वारा लागू की गई शिक्षा पद्धति एवं कुछ मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भारत एवं इंडिया को एक दिखाने का प्रयास किया। मेरे कुछ सामान्य से प्रश्न उन बुद्धिजीवीयों से हैं जो भारत को इंडिया कहते हैं- 

जब कोई उनसे हिन्दी मे पूछता है आप किस देश मे रहते हैं? तो सामान्य सा उत्तर आता हैं, 'मैं भारत या हिन्दुस्तान में 
रहता हूं' लेकिन जब उसी व्यक्ति से अंगेजी मे पूछा जाता हैं  In which country do you live? तो वहीं बडे शौक से कहते हैं I live in india । पूरे विश्व के अंदर किसी एक देश का नाम कोई बता सकता है जिसको दो अलग अलग भाषाओं मे अलग अलग नाम से बुलाया जाता हो। जब भारतीय क्रिक्रेट टीम क्रिक्रेट खेलती है तो टीवी पर नीचे लिख कर आता हैं इंडिया। क्या किसी अन्य देश के साथ ऐसा होता है क्या कोई अन्य देश अपने गुलामी को अपने सर का ताज बना कर चलता है। 


सामान्य अंग्रेजी में कक्षा 4 में हमें नाउन की परिभाषा पढाई जाती हैं एव नाउन के सिद्धातों के अनुसार प्रापर नाउन का कभी ट्रांसलेशन नहीं होता उदाहरण के तौर पर यदि मेरा नाम विश्व गौरव हैं तो क्या अंग्रेजी मे मुझे 'world pride' या 'world dignity' कहा जायेगा? नहीं न.... अंग्रेजी की थोड़ी बहुत व्याकरण का ज्ञान मुझे भी है और उसके अनुसार प्रापर नाउन का अंग्रेजी में ट्रासलेशन करना व्याकरण के साथ खिलवाड करने जैसा है। हो सकता हैं बहुत से बु़द्धिजीवी यह बोलें कि आर्यावत, भारत, विश्वगुरू, हिन्दुस्तान, सोने की चिडिया की तरह ही इंडिया भी इस देश का नाम हैं लेकिन यदि नाम हैं तो व्याकरण के साथ ऐसा भद्दा मजाक क्यूं क्या संविधान में लिखी एक लाईन INDIA THAT IS BHARAT के लिए हम बचपन में पढ़ी हुई व्याकरण को भूल सकतें हैं ? आज के संदर्भ में भारत को पहचानना बहुत आसान हैं। भारत के लोग गावों और शहर की गरीब बस्तियों मे रहते हैं, यह भी हो सकता है कि वो उसी अटटालिकाओं मे रहतें हो लेकिन उनके मन में आज भी भारतीय संस्कति, भारतीय आचार-विचार, भारतीय संस्कार कहे-अनकहे रूप में दिख ही जाते हैं। भारत के लोग हमारी पंरम्परा का पालन करते हैं, उसमें गर्व महसूस करते हैं, ये लोग जमीन से जुडे़ हुए लोग हैं जो स्वयं में अपने देश को देखते हैं। ये लोग स्वयं को 1/125 करोड़ भारत समझते हैं। ये लोग इतनी झमता रखते हैं, कि विश्व पटल पर भारत का प्रतिनिधित्व कर सकें। उसी भारत के एक निवासी के रूप में भगवा वेशधारी स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो धर्म सम्मेलन में इंडिया को नहीं भारत को प्रस्तुत किया था। 

वर्तमान समय में यदि चर्चा इंडिया के विषय में की जाए तो ध्यान मे आता है कि इंडिया, भारत का शोषण करता हैं। भारत इंडिया का उपनिवेश बन के रह गया हैं। इंडिया अमीर हैं, उसके पास बेसुमार धन-दौलत, चल-अचल सम्पत्ति है इनके बच्चे इंग्लिस मीडियम मिशीनरी स्कूलों में पढ़ते हैं तथा बडे़ होकर अमेरिका, इग्लैड, जर्मनी, आस्टेलिया में पढ़ने जाते हैं । ये भारतवासियों को हेय दृष्टि से देखते हैं। भारत में इनकों कुछ भी अच्छा नही लगता ये अंग्रेजी बोलना पंसद करते हैं। भारतीय भाषायों को बोलने मे इन्हें शर्म महसूस होती है। इंडिया के लोग अपनी पंरम्परा के पालन मे हीन भावना महसूस करते हैं। उनको भारत के इतिहास का कोई ज्ञान नहीं है, वे विदेशी सभ्यता, संस्कति को अपनाने मे गर्व महसूस करते हैं। इन्हें भारतीय कला,साहित्य, संस्कृति और विज्ञान नित्कृष्ट लगते हैं । मुझे डर इस बात का है कि भारत के अंदर एक ऐसी जड़ विहीन पीढ़ी अस्तित्व में आ रही हैं जो न यहां की होगी न वहां की। 

क्या है इंडिया और क्या है भारत

भारत में गॅाव हैं, गली हैं, चैबारा हैं। इंडिया में सिटी हैं, मॅाल हैं, पंचतारा हैं। 
भारत में काका हैं, बाबा हैं, दादी हैं। इंडिया में अंकल, आंटी कि आबादी हैं। 
भारत मे मटके है, दोने हैं, पत्तल हैं। इंडिया में पॅालिथीन हैं, वॅाटर हैं और वॅाईन हैं। 
भारत में दूध हैं, दही हैं, लस्सी हैं। इंडिया मे खतरनाक कोक, विस्की और पेप्सी हैं। 
भारत में मंदिर हैं, मंडप हैं, पंडाल है। इंडिया में पब है, डिस्कों हैं और हॅाल हैं। 
भारत मे आदर हैं, प्रेम हैं, सत्कार हैं। इंडिया मे स्वार्थ हैं, नफरत हैं और दुत्कार हैं। 
भारत सीधा हैं, सरल हैं, सहज हैं। इंडिया धुर्त हैं, चालाक हैं, कुटील हैं। 
भारत में संतोष हैं, सुख हैं, चैन हैं। इंडिया बदहबास, दुखी और बेचैन हैं। 
क्यूं कि---------- 
भारत को देवों ने वीरों ने रचाया हैं। इंडिया को लालची अंग्रेजो ने बसाया हैं। (मांइड इट से साभार) 

राष्टीयता, एकात्मता एवं भारतीय अर्थव्यवस्था को तोड़ने के लिए किया गया अंग्रेजो का प्रयास आज विकराल परिणामों के साथ भलीभूत होता दिख रहा हैं एवं इन सभी के लिए पूर्णरूप से मैकाले शिक्षा पद्धति जिम्मेदार हैं अब वास्तव में आवश्यकता हैं कि भारत को भारत कि शिक्षा दी जाए। जिससे कि भारत का बेटा अमेरिका और इंग्लैड के सामने हाथ फैला कर ना खड़ा हो। 

इस बात का गर्व मुझे भी है कि नासा के अंदर 46 प्रतिशत भारतीय काम करते हैं लेकिन एक पीड़ा यह भी हैं कि वह अपनी प्रतिभा को भारत से नाकार दिए जाने के बाद वहां जा कर वह सम्मान पाते हैं जो उन्हे भारत में मिलना चाहिए था। और यही पीडा जन्म देती हैं शिक्षा पद्धति में बदलाव के लिए किए जा रहे आंदोलन को। 

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

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