Thursday, 20 August 2015

कुछ सवाल जो शायद आपके मन में भी आते होंगे...

मेरे वाट्सअप पर कल एक संदेश आया। उस संदेश में किसी डॉ. सुनील कुमार यादव ने हिन्दुत्व या यूं कहें हमारी संस्कृति से संबन्धित कुछ प्रश्न पूछे थे। इस प्रकार के प्रश्न उन सभी के मन में उठते होंगे जिन्होनें कभी इस देश की संस्कृति को समझने का प्रयास ही नहीं किया। फिर भी राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए डॉ. साहब के उन प्रश्नों के उत्तर दे रहा हूं।

1:- सभी देवी देवताओं ने भारत मे ही जन्म क्यों लिया, क्यों किसी भी देवी देवता को भारत के बाहर कोई नही जानता ?

जिनको आप देवता कह रहे हैं वो मूल रूप से हमारे पूर्वज हैं। उनके अन्दर देवत्व अर्थात अच्छाई की अधिकता थी इस लिए उन्हें देवता माना। यदि वह देवत्व हम स्वयं में प्रतिस्थापित कर लें तो हमें भी देवता माना जाएगा। संभवतः आपने 'अहं ब्रह्मास्मि' तो सुना ही होगा। हम चाहें तो स्वयं में देवत्व को जगा लें अथवा असुरत्व जगा लें। और जहां तक प्रश्न है कि सभी ने भारत में ही जन्म क्यों लिया तो महोदय जिस समय की हम बात करते हैं, वह समय जिसमें राम ने जन्म लिया था अर्थात त्रेतायुग, वह समय आज से 864000 वर्ष से अधिक पुराना है। उस समय विश्व के किस देश में मानव प्रजाति निवास करती थी प्रमाण सहित मुझे बताएं।


2:- जितने भी देवी देवताओं की सवारियां हैं उनमें सिर्फ वही जानवर क्यों हैं जो कि भारत मे पाए जाते हैं, ऐसे जानवर क्यों नही जो कि सिर्फ कुछ ही देशों मे पाए जाते है जैसे कि कंगारु, जिराफ आदि !!

अल्पज्ञान अंधकार की जड़ है। महोदय ये जो जानवरों की सवारी की बात की जाती हैं वो एक प्रतिरूप हैं यह बताने के लिए जिन्हें हम जानवर कहते हैं उन्हें समाप्त नहीं करना है क्यों कि वो हमारे देवी देवताओं के वाहन हैं। इस बात के माध्यम से ही हमारे मन में वह भाव आया है जिसकी वजह से हम खड़े खड़े किसी जानवर को नहीं मारते।

3:- सभी देवी देवता हमेशा राज घरानों में ही जन्म क्यों लेते थे ? क्यों किसी भी देवी देवता ने किसी गरीब या शुद्र के यहां जन्म नहीं लिया !

महोदय कृष्ण जी का जन्म किस राजघराने में हुआ था मुझे भी बताएं। और एक भ्रम अपने मस्तिष्क से निकाल दें कि देव जन्म लेते हैं। मूल रूप से देव पवन, अग्नि, वरूण हैं। अब मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए कि इन देवों का जन्म कौन से राज घरानों में हुआ है।


4:- पौराणीक कथाओं  में सभी देवी देवताओं की दिन चर्या का वर्णन है जैसे कि कब पार्वती जी ने चंदन से स्नान किया, गणेश के लिये लड्डु बनाये, गणेश ने लड्डु खाये आदि, लेकिन जैसे ही ग्रंथो कि स्क्रीप्ट खत्म हो गयी भगवानों कि दिन चर्या भी खत्म तो क्या सभी देवी देवताओं का देहांत हो गया ??

आप अपने पुत्र को किसी विषय का उदाहरण देते हैं तो एक विशिष्ट दिवस की बात करते हैं ना, यथा जब मैं छोटा था तो पैदल 12 किलोमीटर पढ़ने जाता था या फिर कोई अन्य....ऐसे प्रसंगों की चर्चा एक सकारात्मक संदेश देने के लिए की जाती है न कि साहित्य संपदा को बढ़ाने के लिए।

5:- ग्रंथो के अनुसार पुराने समय मे सभी देवी देवताओं का पृथ्वी पर आना जाना लगा रहता था जैसे कि किसी को वरदान देने या किसी पापी का सर्व नाश करने लेकिन अब ऐसा क्या हुआ जो देवी देवताओं ने प्रथ्वी पर आना बंद ही कर दिया !!

महोदय देवता सत्य के प्रतीकात्मक विचार हैं। और किसने कहा वो धरती पर नहीं आते। वो तो धरती पर ही रहते हैं हमारे आपके अंदर विद्यमान रहते हैं। उनको देखने की हमारी क्षमता नहीं है लेकिन महसूस कर सकते हैं। और यदि आप देवताओं को महसूस करना चाहते हैं तो जब आप किसी परेशानी में हों और कोई आकर आपकी मदद करे तो समझ लेना कि देवता आपके पास हैं। और यदि साक्षात दर्शन चाहते हैं तो एक काम करिए स्वामी रामकृष्ण परमहंस बनो स्वतः उसी प्रकार से आप भी देवताओं का साक्षात्कार करने लगोगे। विषय पर ध्यान दीजिएगा स्वामी रामकृष्ण परमहंस का अर्थ है स्वयं में उतनी क्षमता विकसित करना कि सामने वाले में स्वामी विवेकानंद जैसे चरित्र का निर्माण कर सको।

6:- जब भी कोई पापी पाप फैलाता था तो उसका नाश करने के लिये खुद भगवान किसी राजा के यहां जन्म लेते थे फिर 30-35 की उम्र तक जवान होने के बाद वो पापी का नाश करते थे, ऐसा क्यों? पाप का नाश जब भगवान खुद ही कर रहे हैं तो 30-35 साल का टाइम क्यों भगवान सीधे कुछ क्यों नही करते जिस प्रकार उन्होने अपने भक्तों का उत्तराखण्ड में नाश किया ?

मित्र कंश का वध श्री कृष्ण ने किस उम्र में किया था। ताड़का का वध श्री राम ने किस उम्र में किया था। आपका यह प्रश्न मूर्खता से परिपूर्ण है। जैसा मैंने पहले ही कहा कि जिनको आप देवता कह रहे हैं वो हमारे पूर्वज हैं , और सबसे विशेष बात उनका मानव जीवन जिसकी एक परंपरा है जिसे कोई नहीं बदल सकता और इस परंपरा के स्थायित्व की सुंदरता देखिए कि जब त्रेतायुग में राम के रूप में वह बाली का धोखे से वध करते हैं तो उसका परिणाम कृष्ण के रूप में उन्हें द्वापर युग में भुगतना पड़ता है और एक गरड़िए के हाथों उनकी मृत्यु होती है। और रही बात उत्तराखण्ड में अपने भक्तों का नाश करने की तो यदि अपनी संस्कृति का आपको थोड़ा सा भी ज्ञान होगा तो आपको पता होगा देवभूमि में जिसकी मृत्यु होती है वह स्वर्ग या नर्क नहीं अपितु सीधे वैकुंठ जाता है।

(7) अगर हिन्दू धर्म कई हज़ार साल पुराना है,तो फिर भारत के बाहर इसका प्रसार क्यों नहीं हुआ और एक भारत से बाहर के धर्म “इस्लाम” को इतनी मान्यता कैसे हासिल हुई कि वो आपके अपने पुरातन धर्म से ज़्यादा अनुयायी कैसे बना सका?

पहली बात हिन्दू कोई धर्म नहीं है। सनातन धर्म में कोई एक अकेले सिद्धान्तों का समूह नहीं है जिसे सभी सनातनियों को मानना ज़रूरी है। हिन्दू एक जीवन का मार्ग है। हिन्दुओं का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है और न ही कोई "पोप"। इसके अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं। फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर हिन्दू मानते हैं, इन सब में विश्वास: धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं) और बेशक, ईश्वर।

(8) अगर हिन्दू धर्म के अनुसार एक जीवित पत्नी के रहते, दूसरा विवाह अनुचित है, तो फिर राम के पिता दशरथ ने चार विवाह किस नीति अनुसार किए।

इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ें।
 दशरथ के तीन विवाहों का सत्य

(9)शिव के लिंग (पेनिस) की पूजा क्यों करते हैं? क्या उनके शरीर में कोई और चीज़ पूजा के क़ाबिल नहीं?

इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ें।
शिवलिंग रहस्य

आशा है कि आपको अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गए होंगे.....और यदि अभी भी नहीं समझ आया है तो माफ कीजिएगा आपके मन में जिज्ञासा न होकर विरोध का भाव है जो उचित नहीं।

Wednesday, 19 August 2015

नाग पंचमी क्यों, सांप पंचमी क्यों नहीं ?

नागपंचमी को सांप पंचमी क्यों नहीं कहा जा सकता? क्या कभी आपके मस्तिष्क में यह प्रश्न उठा....
आज नाग पंचमी के पावन पर्व पर इसी विषय पर बात करें तो कैसा रहेगा...

सरीसृप प्रजाति के प्राणी को पूजा जाता है,वह सर्प है किन्तु नाग तो एक जाति है जिनके संबंध में विभिन्न मतानुसार अलग-अलग मान्यताएं है-यक्षों की एक समकालीन जाति सर्प चिन्ह वाले नागों की थी,यह भी दक्षिण भारत में पनपी थी। नागों ने लंका के कुछ भागों पर ही नहीं,वरन प्राचीन मलाबार पर अधिकार जमा रखा था।



रामायण में सुरसा को नागों की माता और समुद्र को उनका अधिष्ठान बताया गया है। महेंद्र और मैनाक पर्वतों की गुफाओं में भी नाग निवास करते थे। हनुमानजी द्वारा समुद्र लांघने की घटना को नागों ने प्रत्यक्ष देखा था।
नागों की स्त्रियां अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध थी। प्राचीन काल में विषकन्याओं का चलन भी कुछ ज्यादा ही था। इनसे शारीरिक संपर्क करने पर व्यक्ति की मौत हो जाती थी। ऐसी विषकन्याओं को राजा अपने राजमहल में शत्रुओं पर विजय पाने तथा षड्यंत्र का पता लगाने हेतु भी रखा करते थे। रावण ने नागों की राजधानी भोगवती नगरी पर आक्रमण करके वासुकि,तक्षक,शंक और जटी नामक प्रमुख नागों को परास्त किया था।

नागपंचमी मनाने के संबंध में एक मत यह भी है कि अभिमन्यु के बेटे राजा परीक्षित ने तपस्या में लीन ऋषि के गले में मृत सर्प डाल दिया था। इस पर ऋषि के शिष्य श्रृंगी ऋषि ने क्रोधित होकर शाप दिया कि यही सर्प सात दिनों के पश्चात तुम्हें जीवित होकर डस लेगा,ठीक सात दिनों के पश्चात उसी तक्षक सर्प ने जीवित होकर राजा को डसा। तब क्रोधित होकर राजा परीक्षित के बेटे जन्मजय ने विशाल "सर्प यज्ञ" किया जिसमे सर्पो की आहुतियां दी।
इस यज्ञ को रुकवाने हेतु महर्षि आस्तिक आगे आए। उनका आगे आने का  कारण यह था कि महर्षि आस्तिक के पिता आर्य और माता नागवंशी थी। इसी नाते से वे यज्ञ होते देख न देख सके।सर्प यज्ञ रुकवाने,लड़ाई को ख़त्म करने पुनः अच्छे सबंधों को बनाने हेतु आर्यो ने स्मृति स्वरूप अपने त्योहारों में 'सर्प पूजा' को एक त्योहार के रूप में मनाने की शुरुआत की।
नागवंश से ताल्लुक रखने पर उसे नागपंचमी कहा जाने लगा होगा। मास्को के लेखक ग्रीम वागर्द लोविन ने प्राचीन 'भारत का इतिहास' में नाग राजवंशों के बारे में बताया कि मगध के प्रभुत्व के सुधार करने के लिए अजातशत्रु का उत्तराअधिकारी उदय (461-ईपू )राजधानी को राजगृह से पाटलीपुत्र ले गया,जो प्राचीन भारत प्रमुख बन गया। अवंति शक्ति को बाद में राजा शिशुनाग के राज्यकाल में ध्वस्त किया गया था। एक अन्य राज शिशुनाग वंश का था। शिशु नाग वंश का स्थान नंद वंश (345 ईपू)ने लिया।

नाग वंश का राज्य मथुरा,विदिशा,कांतिपुरी,(कुतवार )व् पदमावती (पवैया )तक विस्तृत था। नागों ने अपने शासन काल के दौरान जो सिक्के चलाए थे उसमे सर्प के चित्र अंकित थे। इससे भी यह तथ्य प्रमाणित होता है कि नागवंशीय राजा सर्प पूजक थे। शायद इसी पूजा की प्रथा को निरंतर रखने हेतु श्रावण शुक्ल की पंचमी को नागपंचमी का चलन रखा गया होगा। कुछ लोग नागदा नामक ग्रामों को नागदा से भी जोड़ते है। यहां नाग-नागिन की प्रतिमाएं और चबूतरे बने हुए हैं  इन्हे भिलट बाबा के नाम से भी पुकारा है। उज्जैन में नागचंद्रेश्वर का मंदिर नागपंचमी के दिन खुलता है व सर्प उद्यान भी है। खरगोन में नागलवाड़ी क्षेत्र में नागपंचमी के दिन मेला व बड़ा भंडारा होता है।सर्प कृषि मित्र है व सर्प दूध नहीं पीते हैं,उनकी पूजा करना व रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।

नागपंचमी का त्योहार यूँ तो हर वर्ष देश के विभिन्न भागों में मनाया जाता है लेकिन उत्तरप्रदेश में इसे मनाने का ढंग कुछ अनूठा है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को इस त्योहार पर राज्य में गुडि़या को पीटने की अनोखी परम्परा है।
नागपंचमी को महिलाएँ घर के पुराने कपडों से गुड़िया बनाकर चौराहे पर डालती हैं और बच्चे उन्हें कोड़ो और डंडों से पीटकर खुश होते हैं। इस परम्परा की शुरूआत के बारे में एक कथा प्रचलित है।

तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी। समय बीतने पर तक्षक की चौथी पीढ़ी की कन्या राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में ब्याही गई। उस कन्या ने ससुराल में एक महिला को यह रहस्य बताकर उससे इस बारे में किसी को भी नहीं बताने के लिए कहा लेकिन उस महिला ने दूसरी महिला को यह बात बता दी और उसने भी उससे यह राज किसी से नहीं बताने के लिए कहा। लेकिन धीरे-धीरे यह बात पूरे नगर में फैल गई।
तक्षक के तत्कालीन राजा ने इस रहस्य को उजागर करने पर नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा करके कोड़ों से पिटवा कर मरवा दिया। वह इस बात से क्रुद्ध हो गया था कि औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती है। तभी से नागपंचमी पर गुड़िया को पीटने की परम्परा है।

क्या सचमुच आप तिरंगे का ही सम्मान करते हैं?

मित्रों अभी अभी स्वतंत्रता दिवस बीता....हम स्वतन्त्र देश भारत के नागरिक हैं परन्तु आज भी परतंत्रता, गुलामी की मानसिकता से भरे हैं, तभी तो हम आज भी अपने राष्ट्रीय पर्वों पर ब्रिटिश शासन के गुणगान करने वाले गीत “जन गण मन” को बड़ी शान से गाते हैं । इस तथा कथित राष्ट्रगान से जुड़े कुछ तत्थ्य आपके सामने रख रहा हूँ………

भारतीय जनमानस ब्रिटिश शासन के खिलाफ था । देश की आजादी के लिये क्रांतिवीर कदम-कदम पर ब्रिटिश शासन को चुनौती दे रहे थे । ब्रिटिश शासन हिल चुका था, घबडा गया था । सन 1905 में बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन में पूरे देश का जनामानस अंग्रेजों के विरोध में उठ खडा हुआ । उस वक्त तक भारत की राजधानी बंगाल का प्रसिद्ध नगर कलकत्ता थी । अंग्रेजों ने अपनी जान बचाने के लिए 1911 में कलकत्ता को राजधानी न रखकर दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया । पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे । अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि भारत के लोगों का कुछ ध्यान बटे और विद्रोह शांत हो जाये ।

इंग्लैंड में उस समय शासन कर रहे किंग जार्ज पंचम ने 1911 में भारत का दौरा किया । अंग्रेजो ने अपने किंग को खुश करने के लिये एक स्वागत गीत लिखने के लिये रवीन्द्र नाथ टैगोर पर दबाव डाला । रवीन्द्र नाथ टैगोर का परिवार अंग्रेजों के प्रगाढ़ मित्रों में गिना जाता था । रवीन्द्र नाथ टैगोर के परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे । उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे । रवीन्द्र नाथ टैगोर के परिवारिक सदस्यों ने अपना बहुत सा पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा रखा था । रवीन्द्र नाथ टैगोर भी अंग्रेजो के प्रति बहुत सहानुभूति रखते थे ।

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अंग्रेजों के बहुत दबाव और अपनी अंग्रेजों के प्रति सहानुभूति के कारण एक गीत “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता” लिखा । इस गीत की सभी पंक्तियों और शब्दों में किंग जार्ज का ही गुणगान है । इस गीत के भावार्थ को निष्पक्ष हो कर समझने पर ही पता लगेगा कि यह गीत वास्तव में अंग्रेजो और किंग जार्ज पंचम के गुणगान करने के लिये लिखा गया था । इस गीत के भावार्थ को समझने पर ही हम जान सकेगे कि यह गीत अंग्रेजों की चाटुकारिता के लिये था |

जन गण मन अधिनायक जय हे ,
भारत भाग्य विधाता ,
पंजाब, सिन्धु , गुजरात , मराठा , द्राविड , उत्कल बंग ,
विन्ध्य हिमाँचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मांगे
गाए सब जय गाथा
जन गन मंगल दायक जय हे ,
भारत भाग्य विधाता ,
जय हे जय हे जय हे ,
जय जय जय जय हे .

रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित इस गीत का अर्थ कुछ इस प्रकार से है ……

“भारत के नागरिक, भारत की जनता आपको ह्रदय से भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है । हे अधिनायक (Superhero) तुम ही भारत के भाग्य विधाता हो । तुम्हारी जय हो! जय हो! जय हो! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त, पंजाब, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र (मराठा), दक्षिण भारत (द्रविड़), उड़ीसा (उत्कल), बंगाल (बंग) आदि तथा भारत के पर्वत विन्ध्याचल और हिमालय एवं भारत की नदियाँ यमुना और गंगा सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है । प्रातःकाल जागने पर हम तुम्हारा ही ध्यान करते है और तुम्हारा ही आशीष चाहते है । तुम्हारी ही यश गाथा हम हमेशा गाते है । हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो-किंग जार्ज ) तुम्हारी जय हो, जय हो, जय हो । ”

किंग जार्ज पंचम जब भारत आये तब ये गीत उनके स्वागत में गाया गया । किंग जार्ज जब इंग्लैंड वापस गये तब उन्होंने इस गीत “जन गण मन” का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया । अंग्रेजी अनुवाद जब किंग जार्ज ने सुना तो कहा कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की । किंग जार्ज बहुत खुश हुआ । उसने आदेश दिया कि जिस व्यक्ति ने ये गीत उनके सम्मान में लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये । रवीन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए । किंग जार्ज उस समय नोबल पुरस्कार समिति के अध्यक्ष भी थे । उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया । जब रवीन्द्र नाथ टैगोर को इस नोबल पुरस्कार के विषय में पता चला तो उन्होंने इसे लेने से इन्कार कर दिया । इस इन्कार का कारण था भारत में इस गीत के लिखे जाने पर भारत की जनता द्वारा रवीन्द्र नाथ टैगोर की भर्त्सना और गाँधी जी के द्वारा रवीन्द्र नाथ टैगोर को मिली फटकार । रवीन्द्र नाथ टैगोर ने किंग जार्ज से कहा की आप यदि मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मेरे द्वारा रचित पुस्तक गीतांजलि पर दें लेकिन इस गीत के नाम पर न दें और साथ ही यही प्रचारित भी करें क़ि मुझे नोबेल पुरस्कार मेरी गीतांजलि नामक पुस्तक पर मिला है । किंग जार्ज ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की बात मान कर उन्हें सन 1913 में उनकी गीतांजलि नामक पुस्तक पर नोबल पुरस्कार दे दिया ।

रवीन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों से मित्रता और सहानुभूति सन 1919 तक कायम रही पर जब जलिया वाला हत्या कांड हुआ तब गाँधी जी ने रवीन्द्र नाथ टैगोर को फटकारते हुए एक पत्र लिखा, उसमे गाँधी जी ने कहा क़ि इतने जघन्य नरसंहार के बाद भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरा, कब खुलेगी तुम्हारी आँखे, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? बाद में गाँधी जी स्वयं रवीन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और उनको बहुत फटकारा उन्होंने कहा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अन्ध भक्ति में डूबे हुए हो ? कब तक ऐसे ही डूबे रहोगे, कब तक ऐसे ही चाटुकारिता करते रहोगे ? तब जाकर रवीन्द्र नाथ टैगोर की आँखे खुली और उन्होंने इस हत्या काण्ड का विरोध किया और अपनी “सर” की उपाधि अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दी ।

यहाँ एक बात और महत्वपूर्ण है कि सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वह सब अंग्रेजी सरकार के पक्ष में लिखा और 1919 के बाद उनके लेख कुछ-कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे । रवीन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे । अपने बहनोई को उन्होंने 1919 में एक पत्र लिखा, इसमें उन्होंने लिखा कि ये ‘जन गण मन’ नामक गीत अंग्रेजो ने मुझ पर दबाव डाल कर जबरदस्ती लिखवाया है । इसके शब्दों का अर्थ भारतीय जनमानस को ठेस पहुंचाने वाला है । भविष्य में इस गीत को न गाया जाये वही अच्छा है । लेकिन अंत में उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि इस पत्र को अभी किसी को न दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ परन्तु मेरी मृत्यु के उपरांत इस पत्र को अवश्य सार्वजनिक कर दें ।

7 अगस्त 1941 को रवीन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि इस जन गन मन गीत को न गाया जाये ।

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी । लेकिन वह दो खेमो में बंटी हुई थी । जिसमे एक खेमे के नेता थे बाल गंगाधर तिलक और दूसरे खेमे के मोती लाल नेहरु । मतभेद था सरकार बनाने को लेकर । मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ मिलकर संयुक्त सरकार (Coalition Government) बनायें । जबकि बाल गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है । इस मतभेद के कारण लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और मोती लाल नेहरु अलग-अलग हो गये और कांग्रेस दो खेमों में बंट गई, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक गरम दल के नेता कहलाने लगे उनके साथ सभी क्रांतिकारी विचारधारा के लोग थे तथा मोती लाल नेहरु नरम दल के नेता कहलाने लगे, उनके साथ वही लोग थे जो अंग्रेजो की दया-कृपा पर निर्भर थे । यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि गांधी जी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो सामाजिक परिदृश्य में किसी तरफ नहीं थे, परन्तु मानसिक और हृदयात्मक लगाव मोती लाल नेहरु से था, यह बात अलग है कि गाँधी जी का दोनों पक्ष बहुत सम्मान करते थे ।

कांग्रेस के नरम दल के समर्थक अंग्रेजो के साथ रहते थे । उनके साथ रहना, उनकी खुशामद करना, उनकी बैठकों में शामिल होना, वे हर समय अंग्रेजो के दबाव में रहते थे । अंग्रेजों को वन्देमातरम से बहुत चिढ होती थी । नरम दल के समर्थक अंग्रेजों को खुश करने के लिये रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा रचित “जन गण मन” गाया करते थे और गरम दल वाले अंग्रेजों और नरम दल के समर्थकों को मुंहतोड जवाब देने के लिये बकिंम चन्द्र चैटर्जी द्वारा रचित “वन्दे मातरम” गाया करते थे ।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को वन्देमातरम गीत पसंद नहीं था । अंग्रेजों के कहने पर नरम दल के समर्थकों ने कहना शुरू कर दिया कि मुसलमानों को वन्देमातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें मूर्ति पूजा करने को कहा गया है । उस समय तक मुस्लिम लीग भी अस्तित्व में आ चुकी थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे । मोहम्मद अली जिन्ना ने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया । मोहम्मद अली जिन्ना अंग्रेजों के इशारों पर चलने वालो में गिने जाते थे, उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नही गाना चाहिये ।

सन 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान सभा में राष्ट्र गान के मुद्दे पर लम्बी बहस हुई । संविधान सभा के 319 सांसदों (इसमे मुस्लिम सांसद भी थे) में से 318 सांसदों ने बंकिम चन्द्र चैटर्जी द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर अपनी सहमति जताई । बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना जिनका नाम “पंडित जवाहर लाल नेहरु” था । जवाहर लाल नेहरु का तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए । जब कि वास्तविकता यह थी कि वन्देमातरम गीत से मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं थी बल्कि मुसलमानों ने तो इसे राष्ट्र गान बनाने के पक्ष में संविधान सभा में मतदान किया था । वंदे मातरम गीत से अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी । अंग्रेजों का जवाहर लाल नेहरू पर इस गीत को राष्ट्र गान न रखने का दबाव बढता जा रहा था । अंग्रेजों की सलाह पर जवाहर लाल नेहरू इस मसले को गाँधी जी के पास ले गये क्योंकि जवाहर लाल नेहरू ये जानते थे कि गाँधी जी उनकी बात का विरोध नहीं करेगे और यदि करेगे भी तो अंतिम फैसला उन्ही (जवाहर लाल नेहरू) के हक में ही देगे ।

गाँधी जी भी जन गन मन गीत को राष्ट्र गान बनाने के पक्ष में नहीं थे । पर जवाहर लाला नेहरू पर अगाध प्रेम के कारण उन्होंने नेहरू से कहा कि मै जन गण मन को राष्ट्र गान नहीं बनाना चाहता और तुम वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये । गाँधी जी ने तीसरे विकल्प में झंडा गान “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा” (रचइता श्याम लाल गुप्त “पार्षद”) को रखा । लेकिन नेहरु उस पर भी तैयार नहीं हुए । नेहरु का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है ।

गाँधी जी के राजी न होने के कारण नेहरु ने इस मुद्दे को टाल दिया परन्तु गाँधी जी की मृत्यु के बाद नेहरु ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया । भारत का जनमानस नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया वह भी वन्देमातरम गीत के सिर्फ़ पहले छंद को, पूरे गीत को नहीं । लेकिन कभी इसे किसी भी राष्ट्रीय पर्व पर गया नहीं गया । नेहरु कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि उनके आका अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे । जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था ।

बीबीसी ने उस वक्त एक सर्वे किया, उसने पूरे संसार में जितने भी भारतीय मूल के लोग रहते थे, उनसे पूछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत भारतीय राष्ट्रगान के रूप में ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों का कथन था कि मुझे वन्देमातरम गीत भारतीय राष्ट्रगान के रूप में ज्यादा पसंद है । बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ होती है कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दूसरे नंबर पर वन्देमातरम था । कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है ।

यह है इतिहास वन्दे मातरम का और जन गण मन को राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान बनाए जाने का । अब ये हम भारतीयों को तय करना है कि हमको क्या गाना चाहिये, और किसे अपनाना चाहिये ।

वन्देमातरम……………………………

Tuesday, 18 August 2015

संघ की मूल अनुभूति...


राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ जिसे आर.एस.एस (R.S.S.) जाना जाता है ।मुझे नही लगता कि किसी को संघ की पहचान बताने की जरूरत है। आज यह कहना ही उचित होगा कि इसके आलोचक ही इसकी मुख्य पहचान है। जब आलोचक संघ की कटु आलोचना करते नज़र आते है तब तब संघ और मजबूत होता हुआ दिखाई पड़ता है। छद्म धर्मनिरपेक्षवादी लोगों को यही लगता है कि भारत उन्ही के भरोसे चल रहा होता है किन्‍तु जानकर भी पागलो की भांति हरकत करते है जैसे उन्‍हे पता ही न हो कि संघ की वास्‍तविक गतिविधि क्‍या है ?

संघ के बारे थोड़ा बताना चाहूँगा उन धर्मनिरपेक्ष बंदरो को जो अपने आकाओ के इसारे पर नाचने की हमेशा नाटक करते रहते है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्‍थापना सन् 27 सितंबर 1925 को विजय दशमी के दिन मोहिते के बाड़े नामक स्‍थान पर डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य डॉक्टर जी ने की थी। संघ के 5 स्‍वयंसेवको के साथ शुरू हुई विश्व की पहली शाखा आज 50 हजार से अधिक शाखाओ में बदल गई और ये 5 स्‍वयंसेवक आज करोड़ो स्‍वयंसेवको के रूप में हमारे समाने है। संघ की विचार धारा में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, राम जन्मभूमि, अखंड भारत, समान नागरिक संहिता जैसे विजय है जो देश की समरसता की ओर ले जाता है। कुछ लोग संघ की सोच को राष्ट्र विरोधी मानते है क्‍योकि उनका काम ही है यह मानना, नही मानेगे तो उनकी राजनीतिक गतिविधि खत्‍म हो जाती है।



राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की हमेशा अवधारणा रही है कि 'एक देश में दो दप्रधान, दो विधान, दो निशान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे' बात सही भी है। जब समूचे राष्ट्र और राष्ट्र के नागरिकों को एक सूत्र मे बाधा गया है तो धर्म के नाम पर कानून की बात समझ से परे हो जाती है, संघ द्वारा समान नागरिक संहिता की बात आते ही संघ को सामप्रदायिक होने की संज्ञा दी जाती है। अगर देश के समस्‍त नागरिको के लिये एक नियम की बात करना साम्प्रदायिकता है तो मेरी नज़र में इस साम्प्रदायिकता से बड़ी देशभक्ति और नही हो सकती है।



संघ ने हमेशा कई मोर्चो पर अपने आपको स्‍थापित किया है। राष्ट्रीय आपदा के समय संघ का स्यंवसेवक यह नहीं देखता‍ कि आपदा मे फंसा हुआ व्‍यक्ति किस पूजा पद्धति को मानने वाला है। आपदा के समय संघ केवल और केवल राष्ट्र धर्म का पालन करता है कि आपदा मे फसा हुआ अमुख भारत माता का बेटा है। गुजरात में आए भूकम्प और सुनामी जैसी घटनाओं के समय सबसे आगे अगर किसी ने निःस्वार्थ भाव से कार्य किया तो वह संघ का स्‍वयंसेवक था। संघ के प्रकल्पों ने देश को नई गति दी है। दीन दयाल शोध संस्थान ने गांवों को स्वावलंबी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। संघ के इस संस्‍थान ने अपनी योजना के अंतगत करीब 80 गांवों में यह लक्ष्य हासिल कर लिया और करीब 500 गांवों तक विस्‍तार किया जाना है। दीन दयाल शोध संस्थान के इस प्रकल्प में संघ के हजारों स्‍वयंसेवक बिना कोई वेतन लिए मिशन मानकर अपने अभियान मे लगे हैं। सम्‍पूर्ण राष्‍ट्र में संघ के विभिन्‍न अनुसांगिक संगठनों राष्ट्रीय सेविका समिति, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय सिख संगत, भारतीय मजदूर संघ, हिंदू स्वयंसेवक संघ, हिन्दू विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, दुर्गा वाहिनी, सेवा भारती, भारतीय किसान संघ, बालगोकुलम, विद्या भारती, भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम सहित ऐसे संगठन कार्यरत है जो करीब 1 लाख प्रकल्‍पों को चला रहे है।



संघ की प्रार्थना भी भारत माता की शान को चार चाँद लगता है, संघ की प्रार्थना की एक एक लाईन राष्‍ट्र के प्रति अपनी सच्‍ची श्रद्धा प्रस्‍तुत करती है। संघ को गाली देने से संघ का कुछ बिगड़ने वाला नही है अप‍ितु गंदे लोगो की जुब़ान की गन्‍दगी ही परिलक्षित होती है।


Friday, 14 August 2015

क्या करें ऐसी आजादी का...

" हुआ हुक्म जब फांसी का तो भगत सिंह यूँ मुस्काया
बोला माँ अब गले लगा लो मुद्दत में मौक़ा आया
तख़्ते फाँसी कूंच पेजब क़दमों की आहट आती थी
तो दीवारें भी झूम-झूम कर वंदेमातरम् गाती थीं
चूम के फाँसी का फन्दा जब इंक़लाब वो बोला था
काँप उठी थी वसुंधरा अंग्रेज़ी शासन डोला था
आख़िर बोला यही वसीयत ऐ रखवाले करता हूँ
माँ की लाज बचा लेना अब तुम्हे हवाले करता हूँ
आओ तुमको इंक़लाब की ताक़त मैं दिखलाता हूँ
छोड़ दिए तुमने जो पन्ने उनकी याद दिलाता हूँ ।"
-शहनाज हिन्दुस्तानी


एक बार फिर देश तैयार है 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस की एक और वर्षगांठ मनाने के लिए। हम सिर्फ यह कह-सुन कर आपस में खुश हो लेते हैं कि हम आजाद हैं, लेकिन सच में हम कितना आजाद हैं, यह तो हमारा दिल ही जानता है। यही वजह है कि आजादी का आंदोलन देख चुकी हमारी बुजुर्ग पीढ़ी बड़े सहज भाव में कहती सुनाई देती है कि इससे तो अंग्रेजों का राज अच्छा था।



वस्तुत: हमारी आजादी आधी अधूरी ही है। इसकी वजह ये है कि हम 15 अगस्त 1947 को अग्रेजों की दासता से तो मुक्त हो गए, मगर जैसी शासन व्यवस्था है, उसमें अब हम अपनों की ही दासता में जीने को विवश हैं। आज हम किस बात पर गर्व करें, सत्ता के सिंहासन के पैर की जूती बन चुकी व्यवस्था पर या अंग्रेजों द्वारा भारत को बर्बाद करने के लिए बनाए गए कानूनों पर जो आज भी हमारे गले में लटके हुए हैं, या इस बात पर कि इस देश का युवा को 14 नवंबर और 30 जनवरी तो याद है लेकिन 27 सितंबर नहीं।

मित्रों आज एक बार फिर रोने का मन कर रहा है। बहुत से लोग अधिकारों की बात करते हुए दिख जाते हैं। हमारे संविधान ने हमको बहुत से अधिकार दे रखे हैं, जैसे.....
1. किसी के भी मुंह पर कालिख फेंकने की आजादी
2. किसी के भी ऊपर जूता फेंकने की आजादी
3. किसी को भी गलियां देने की आजादी
4. कश्मीर में पाकिस्तानी झंडा फहराने देने की आजादी
5. आतंकवादियों को अपने दामाद की तरह पूरी सुरक्षा और इज्ज़त के साथ रखने की आज़ादी
6. सरबजीत जैसे देशभक्त को आतंकवादी बताने और अफजल गुरु जैसे आतंकवादी को फांसी नहीं होने देने की आजादी
7. शांति और अहिंसक तरीकों से आन्दोलन करने वालो को बिना कारण के जेलों में ठूंसने की आजादी
8. अरबों रुपयों का भ्रष्टाचार करके सीना तान के खड़े रहने की आजादी
9. भारत के साधू संतो और भगवानों का अपमान करने की आजादी
10. सिख जैसी देशभक्त कौम पर गंदे गंदे चुटकुले बनाने की आजादी
11. सरकारी दफ्तरों मैं काम नहीं करने और आराम से रिश्वत लेकर काम करने की आजादी
ऐसी बहुत सी आजादी हमें हमारे संविधान ने दे रखी हैं।
क्या हमारे महान क्रांतिकारियों ने ऐसे भारत के लिए कुर्बानियाँ दी थी ???

दरअसल, अब हम एक ऐसी परंतत्रता में जी रहे हैं, जिसके खिलाफ अब दोबारा संघर्ष की जरूरत है। हमें अगर पूरी आजादी चाहिए, तो हमें एक और स्वाधीनता संग्राम के लिये तैयार हो जाना चाहिये। यह स्वाधीनता संग्राम जमाखोरों, कालाबाजारियों के खिलाफ होना चाहिए। यह संग्राम भ्रष्टाचारियों से लड़ा जाना चाहिए। यह संग्राम चोर, उचक्कों, लुटेरों और ठगों के खिलाफ छेड़ा जाना चाहिये। यह संग्राम देश को खोखला कर रहे सत्ता व स्वार्थलोलुप नेताओ के विरुद्ध लड़ा जाना चाहिए।
हर भारतीय की इच्छा है कि आजादी केवल किताबों और शब्दों में ही नहीं, बल्कि धरातल पर भी दिखनी चाहिये। हमें भगत सिंह के सपनों का भारत चाहिए। हमें देश के महान क्रांतिकारियों के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देना है। विडंबना यह है कि हम आजादी के पर्व पर इन तथ्यों पर जरा भी चिंतन नहीं करते। हम सिर्फ इस दिन रस्म अदायगी करते हैं। सुबह झंडा फहरा कर और बड़े-बड़े भाषण देकर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और दूसरे ही दिन पुराने ढर्ऱे वाली आपाधापी में व्यस्त हो जाते हैं।

देश तो बनता है संस्कृति ,परंपराओं और देश के निवासियों की असंदिग्ध निष्ठा से, पर देश के निवासियों में सर्वप्रथम निष्ठा तो जाति धर्म के प्रति प्रतीत होती है। सांस इस देश में भरते है गुणगान विदेश का करते हैं। ये कैसा राष्ट्र प्रेम है? इस मनोदशा को बदलना होगा समृद्धशाली और सामर्थ्यवान भारत की रचना करनी होगी। स्वतंत्र भारत के 69 सालों के बाद भी गौरवमयी इतिहास पर खून के धब्बे आज भी विराजमान हैं, कुछ कराहते हैं, आज भी जीवनयापन के साथ आत्मसम्मान के लिये संघर्षरत हैं, जिनकी कराह देश की नींद में दाखिल है परंतु सत्ताधीशों की नींद नहीं टूट रही है।

महोदय अब मत करिए कुछ ऐसा कि खुद से भी नजर मिला पाओ। देश के लिए सिर्फ एक दिन ही नहीं है, हर दिन, हर पल है देश के लिए और देशवासियों के लिए...
अपने अधिकार ही नहीं कर्तव्यों को भी समझें
देश को तोड़ने वाले तत्त्वों से बचें और आजादी की उड़ान भरें अपने आजाद विचारों के साथ...
वन्दे भारती

Wednesday, 12 August 2015

भगवान को कैसे देखें...


एक बार अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा कि भगवान मै आपके विराट स्वरूप का दर्शन करना चाहता हूँ | 
श्री कृष्ण ने कहा -
इन पंच तत्वों से बनी आँखो से केवल पंचतत्व की बनी चीज ही देख सकते हो | इन आँखो से मिट्टी देख सकते हो ,हाँड़ माँस से बनी चीजें देख सकते हो , इनसे भगवान को नही देख सकते | भगवान चमड़े की आँखो का विषय नही है, भगवान का शरीर सच्चिदानंद है दिव्य है। इसी लिए भगवान ने कहा ----दिब्यं ददामि ते चक्छुः " अर्थात् मै तुम्हे दिब्य दृष्टि दूँगा | तब तुम मेरे दिव्य स्वरुप को देख सकोगे |
क्या आपने कभी ठंडक देखी ? क्या आपने कभी गर्मी देखी ? क्या आपने कभी प्यार देखा ?? अच्छा आप बताइये ज्ञान को देखा ? सबका उत्तर है नही | तो फिर जब आप इन चीजों को नही देख पाये तो भगवान को देख लोगे ???

भगवान ने अपना स्वरुप जब अर्जुन को दिखाया तो वे देख पाये , माँ यसोदा को जब दिखाया तो वे देख सकीं |
अतः भगवान को देखने के लिए एक योग्यता चाहिए "प्रेमांजना छुरित भक्ति विलोचनेना संतः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति" अर्थात जिनकी आखों में भगवान के प्रति शुद्ध प्रेम का अंजन(काजल) लगा है वे शुद्ध भक्त भगवान का दर्शन हर क्षण करते हैं। शुद्ध भक्त प्रकृति के तीन गुणों से ऊपर दिव्य गुण में स्थित होते हैं।
तो अगर भगवान को देखना है तो इस योग्य बनिए। हरे कृष्ण महामंत्र का जप कलियुग में भगवद प्राप्ति का सर्वोत्तम एवं सरल साधन है। इसका जप करने से हमारे ह्रदय में भगवान के प्रति सुप्तावस्था में पड़ा प्रेम जागृत होता है और हमे परम पद की ओर ले जाता है।
प्रतिदिन कम से कम १० मिनट जरूर जप करें।
नशा, मांसाहार, अवैध सम्बन्ध, जुआ, इन सब कुकर्मों से दूर रहे।
हरे कृष्ण।

सावन,भारतीय संस्कृति और एक रहस्य


यहाँ दो पात्र हैं : एक है भारतीय और एक है इंडियन ! आइए देखते हैं दोनों में क्या बात होती है !

इंडियन : ये शिव रात्रि पर जो तुम इतना दूध चढाते हो शिवलिंग पर, इस से अच्छा तो ये हो कि ये दूध जो बहकर नालियों में बर्बाद हो जाता है, उसकी बजाए गरीबों मे बाँट दिया जाना चाहिए ! तुम्हारे शिव जी से ज्यादा उस दूध की जरुरत देश के गरीब लोगों को है. दूध बर्बाद करने की ये कैसी आस्था है ?




भारतीय : सीता को ही हमेशा अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है, कभी रावण पर
प्रश्नचिन्ह क्यूँ नहीं लगाते तुम ?

इंडियन : देखा ! अब अपने दाग दिखने लगे तो दूसरों पर ऊँगली उठा रहे हो ! जब अपने बचाव मे कोई उत्तर नहीं होता, तभी लोग दूसरों को दोष देते हैं. सीधे-सीधे क्यूँ नहीं मान लेते कि ये दूध चढाना और नालियों मे बहा देना एक बेवकूफी से ज्यादा कुछ नहीं है !

भारतीय : अगर मैं आपको सिद्ध कर दूँ की शिवरात्री पर दूध चढाना बेवकूफी नहीं समझदारी है तो ?

इंडियन : हाँ बताओ कैसे ? अब ये मत कह देना कि फलां वेद मे ऐसा लिखा है इसलिए हम ऐसा ही करेंगे, मुझे वैज्ञानिक तर्क चाहिए।

भारतीय : ओ अच्छा, तो आप विज्ञान भी जानते हैं ? कितना पढ़े हैं आप ?

इंडियन : जी, मैं ज्यादा तो नहीं लेकिन काफी कुछ जानता हूँ, एम् टेक किया है, नौकरी करता हूँ. और मैं अंध विशवास मे बिलकुल भी विशवास नहीं करता, लेकिन भगवान को मानता हूँ.

भारतीय : आप भगवान को मानते तो हैं लेकिन भगवान के बारे में जानते नहीं कुछ भी. अगर जानते होते, तो ऐसा प्रश्न ही न करते ! आप ये तो जानते ही होंगे कि हम लोग त्रिदेवों को मुख्य रूप से मानते हैं : ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शिवजी (ब्रह्मा विष्णु महेश) ?

इंडियन : हाँ बिलकुल मानता हूँ.

भारतीय : अपने भारत मे भगवान के दो रूपों की विशेष पूजा होती है : विष्णु जी की और शिव जी की ! ये शिव जी जो हैं, इनको हम क्या कहते हैं – भोलेनाथ, तो भगवान के एक रूप को हमने भोला कहा है तो दूसरा रूप क्या हुआ ?

इंडियन (हँसते हुए) : चतुर्नाथ !

भारतीय : बिलकुल सही ! देखो, देवताओं के जब प्राण संकट मे आए तो वो भागे विष्णु जी के पास, बोले “भगवान बचाओ ! ये असुर मार देंगे हमें”. तो विष्णु जी बोले अमृत पियो. देवता बोले अमृत कहाँ मिलेगा ? विष्णु जी बोले इसके लिए समुद्र मंथन करो !
तो समुद्र मंथन शुरू हुआ, अब इस समुद्र मंथन में कितनी दिक्कतें आई ये तो तुमको पता ही होगा, मंथन शुरू किया तो अमृत निकलना तो दूर विष निकल आया, और वो भी सामान्य विष नहीं हलाहल विष ! भागे विष्णु जी के पास सब के सब ! बोले बचाओ बचाओ !
तो चतुर्नाथ जी, मतलब विष्णु जी बोले, ये अपना डिपार्टमेंट नहीं है, अपना तो अमृत का डिपार्टमेंट है और भेज दिया भोलेनाथ के पास ! भोलेनाथ के पास गए तो उनसे भक्तों का दुःख देखा नहीं गया, भोले तो वो हैं ही, कलश उठाया और विष पीना शुरू कर दिया ! ये तो धन्यवाद देना चाहिए पार्वती जी का कि वो पास में बैठी थी, उनका गला दबाया तो ज़हर नीचे नहीं गया और नीलकंठ बनके रह गए.

इंडियन : क्यूँ पार्वती जी ने गला क्यूँ दबाया ? 

भारतीय : पत्नी हैं ना, पत्नियों को तो अधिकार होता है ..:P किसी गण की हिम्मत होती क्या जो शिव जी का गला दबाए……अब आगे सुनो फिर बाद मे अमृत निकला ! अब विष्णु जी को किसी ने invite किया था ???? मोहिनी रूप धारण करके आए और अमृत लेकर चलते बने.
और सुनो – तुलसी स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती है, स्वादिष्ट भी, तो चढाई जाती है कृष्ण जी को (विष्णु अवतार).
लेकिन बेलपत्र कड़वे होते हैं, तो चढाए जाते हैं भगवान भोलेनाथ को !
हमारे कृष्ण कन्हैया को 56 भोग लगते हैं, कभी नहीं सुना कि 55 या 53 भोग लगे हों, हमेशा 56 भोग ! और हमारे शिव जी को ? राख , धतुरा ये सब चढाते हैं, तो भी भोलेनाथ प्रसन्न ! कोई भी नई चीज़ बनी तो सबसे पहले विष्णु जी को भोग ! दूसरी तरफ शिव रात्रि आने पर हमारी बची हुई गाजरें शिव जी को चढ़ा दी जाती हैं……

अब मुद्दे पर आते हैं……..इन सबका मतलब क्या हुआ ???

विष्णु जी हमारे पालनकर्ता हैं, इसलिए जिन चीज़ों से हमारे प्राणों का
रक्षण-पोषण होता है वो विष्णु जी को भोग लगाई जाती हैं !
और शिव जी?
शिव जी संहारकर्ता हैं, इसलिए जिन चीज़ों से हमारे प्राणों का नाश होता है,
मतलब जो विष है, वो सब कुछ शिव जी को भोग लगता है !

इंडियन : ओके ओके, समझा !

भारतीय : आयुर्वेद कहता है कि वात-पित्त-कफ इनके असंतुलन से बीमारियाँ होती हैं और श्रावण के महीने में वात की बीमारियाँ सबसे ज्यादा होती हैं. श्रावण के महीने में ऋतू परिवर्तन के कारण शरीर मे वात बढ़ता है. इस वात को कम करने के लिए क्या करना पड़ता है ? ऐसी चीज़ें नहीं खानी चाहिएं जिनसे वात बढे, इसलिए पत्ते वाली सब्जियां नहीं खानी चाहिएं !और उस समय पशु क्या खाते हैं ?

इंडियन : क्या ?

भारतीय : सब घास और पत्तियां ही तो खाते हैं. इस कारण उनका दूध भी वात को बढाता है ! इसलिए आयुर्वेद कहता है कि श्रावण के महीने में (जब शिवरात्रि होती है !!) दूध नहीं पीना चाहिए. इसलिए श्रावण मास में जब हर जगह शिव रात्रि पर दूध चढ़ता था तो लोग समझ जाया करते थे कि इस महीने मे दूध विष के सामान है, स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है, इस समय दूध पिएंगे तो वाइरल इन्फेक्शन से बरसात की बीमारियाँ फैलेंगी और वो दूध नहीं पिया करते थे ! इस तरह हर जगह शिव रात्रि मनाने से पूरा देश वाइरल की बीमारियों से बच जाता था ! समझे कुछ ?
इंडियन : omgggggg !!!! यार फिर तो हर गाँव हर शहर मे शिव रात्रि मनानी चाहिए, इसको तो राष्ट्रीय पर्व घोषित होना चाहिए !

भारतीय : हम्म….लेकिन ऐसा नहीं होगा भाई कुछ लोग साम्प्रदायिकता देखते हैं, विज्ञान नहीं ! और सुनो. बरसात में भी बहुत सारी चीज़ें होती हैं लेकिन हम उनको दीवाली के बाद अन्नकूट में कृष्ण भोग लगाने के बाद ही खाते थे (क्यूंकि तब वर्षा ऋतू समाप्त हो चुकी होती थी). एलोपैथ कहता है कि गाजर मे विटामिन ए होता है आयरन होता है लेकिन आयुर्वेद कहता है कि शिव रात्रि के बाद गाजर नहीं खाना चाहिए इस ऋतू में खाया गाजर पित्त को बढाता है ! तो बताओ अब तो मानोगे ना कि वो शिव रात्रि पर दूध चढाना समझदारी है ?

इंडियन : बिलकुल भाई, निःसंदेह ! ऋतुओं के खाद्य पदार्थों पर पड़ने वाले प्रभाव को ignore करना तो बेवकूफी होगी.

भारतीय : ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है ! ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते !
जिस संस्कृति की कोख से मैंने जन्म लिया है वो सनातन (=eternal) है, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें ! -

Thursday, 6 August 2015

अच्छा तो मैं भी नक्सली हूं.... लेकिन ऐसा नक्सली होने पर गर्व है...

कुछ दिन पहले अपने एक छोटे भाई प्रीतम दुबे के साथ राष्ट्रीय एकात्मता के विषय पर चर्चा हो रही थी, तो उसने किसी विषय पर बोला कि हमारे संविधान में ऐसा लिखा है...तो मेरे मुंह से अचानक निकला कि मैं संविधान को नहीं मानता। मेरे मुंह से संविधान के विषय में ऐसा पहली बार निकला था। उस रात मेरे लिए चिंतन का विषय यही था कि मेरे मुंह से संविधान को लेकर ऐसी बात क्यों निकली। इसका मतलब यह नहीं कि मैं हमेशा से संविधान का पूर्ण रूप से समर्थन करता था। मैं पहले भी संविधान का विरोध करता रहा हूं लेकिन वो विरोध इस लिए होता था क्यों कि मैनें संविधान की बहुत सी धाराओं  तथा कानूनों के विषय में विस्तार पूर्वक अध्ययन किया था। अंग्रेजों द्वारा बनाए गए उन कानूनों के पीछे के मूल उद्देश्यों को मैं समझता था इस नाते मैं संविधान का विरोध करता था लेकिन कभी ऐसा नहीं लगा कि संविधान को पूर्ण रूप से नकारना उचित होगा।

उस दिन प्रीतम से बात करते हुए जब मेरे मुंह से निकला कि मैं संविधान को नहीं मानता तो मेरे स्वयं के वाक्य ने मुझे चिंतन की स्थिति में ले जाकर खड़ा कर दिया और ऐसा इस लिए हुआ क्यों कि ये विचार मेरे मूल विचार नहीं थे। ऐसा लगा कि किसी और के विचार मुझ पर हावी हो रहे हैं। फिर जब इस विषय पर सकारात्मक चिंतन किया तो समझ आया कि मैं इतना कमजोर नहीं कि किसी और के विचार मुझ पर हावी हो जाएं। ये वाक्य जो मेरे मुंह से निकला था उसे यह मानकर सत्य मान लिया कि ये ईश्वर की सोच है और मुझे चलाने वाले, मुझे जन्म देने वाले परमपिता परमेश्वर ने मेरे मन में ये विचार डाला।

आज ऑफिस में बैठे समय कुछ लिख रहा था तभी अचानक मेरी नजर बाबा सत्यनारायण मौर्य की एक कविता पर पड़ी। कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं...

भारत माँ के सब बेटे हैं, सबको माँ का प्यार मिले।
एक रहे कानून व्यवस्था, सबको सम अधिकार मिले॥
जाति भाषा पंथ भेद तो, रूप रंग खुशबू भाई
इन बातों को लेकर ना, इस धरती पर हथियार चले॥
समरस भावों से भारत माँ, पुत्रों तुम्हें निहारती।
वन्दे मातरम् गाकर लो, भारत माँ की आरती॥ 

इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे समझ आया कि सांस्कृतिक आधार पर हमें संविधान की नहीं अपितु सम विधान की आवश्यकता है। ऐसी व्यवस्था जो सभी के लिए समान हो अर्थात भेदभाव रहित व्यवस्था।

इस विषय पर एक अन्य मित्र से चर्चा हुई तो उन्होंने कहा कि नक्सली भी संविधान नहीं मानते तो तुममें और उनमें क्या अंतर है? यदि नक्सली इस विषय को लेकर नक्सली कहे जाते हैं तो मुझे भी नक्सली कहलाने में गर्व होगा।

मित्रों एक बार सोच कर देखिए कि जब ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण किया तो उसने ऐसा नहीं किया कि अमुख पेड़ से प्राप्त ऑक्सीजन का प्रयोग केवल महिलाएं करेंगी तथा अमुख पेड़ से पुरुष.... इस नदी से प्राप्त जल का प्रयोग केवल 14 वर्ष तक के बच्चे कर सकते हैं।लिखने को ऐसे बहुत से विषय हैं लेकिन इसे संकेत समझ कर एक बार आप भी चिंतन करें कि क्या हम स्वयं को भगवान से भी ऊपर समझने लगे हैं? जब ईश्वर ने कोई भेदभाव नहीं किया तो हम क्यों कर रहे हैं?

आज इसी प्रश्न के साथ......

वन्दे भारती

Wednesday, 5 August 2015

राम मंदिर कब बनेगा?


कल शाम कुछ वामपंथी मित्रों के साथ बैठा हुआ था, उन सभी के साथ चर्चा का विषय था मोदी सरकार का एक साल...जैसा कि वामपंथी परंपरा रही है कि जब उनके पास मूल तथ्य या तार्किक विषय नहीं रहता है तो वो विषय से चर्चा से भटका देते हैं। ऐसा ही कुछ कल भी हुआ, एक मित्र ने कहा कि तुम्हारे राम का मंदिर कब बनेगा?
उनके इस प्रश्न को सुनकर मैं समझ गया कि अब उनके पास कोई तर्क नहीं बचा है...लेकिन उनके प्रश्न ने मुझे ब्लॉग लिखने का एक विषय दे दिया..मैं इस ब्लॉग के माध्यम से राम मंदिर के विषय में अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूं।

प्रश्न था कि तुम्हारे राम का मंदिर कब बनेगा?
मेरे राम का मंदिर तो बना हुआ है, मेरे राम मेरे मन में बसते हैं और मेरे राम का मंदिर पूर्ण रूप से पूर्ण भव्यता के साथ बना हुआ है। जहां तक बात है अयोध्या के राम मंदिर की तो वो मेरे राम का नहीं हमारे राम का मंदिर है। राम जिस दिन मेरे तुम्हारे से हटकर अपने हो गए उसी दिन भव्य राम मंदिर का निर्माण हो जाएगा। दिस राम की मैं वन्दना करता हूं वो राष्ट्रदेव राम हैं। वो राष्ट्रदेव राम एक ऐसे चेतन तत्व हैं जो दुनिया के कण कण में समाए हुए हैं। राम मंदिर के भव्य निर्माण से पहले हमें यह समझना होगा कि राम कौन हैं, राम कोई और नहीं हम स्वयं हैं। जब हमारी आखों के सामने कुछ गलत हो रहा हो और हम उसके खिलाफ संघर्ष करें तो समझ लेना कि राम आ गए और जब हम उसका विरोध न करें तो समझ लेना हम पर रावण हावी हो रहा है।
जब हमारे यहां किसी बच्चे का जन्म होता है तो यही कहा जाता है कि राम को कौशल्या ने जन्म दिया है न कि ये कहा जाता है विश्व गौरव या फलाने ने जन्म लिया है। राम किसी उपन्यास के पात्र नहीं हैं, यदि वह किसी उपन्यास के पात्र होते तो यह नाम कब का मिट गया होता। राम राष्ट्र की संस्कृति के आधार हैं, और इसी लिए जब भारत में किसी का विवाह होता है तो महिलाएं जो गीत गाती हैं उसमें यही कहती हैं कि राम और सीता का विवाह हो रहा है।
हमारे यहां कहा भी गया है कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।




दृष्टि के बदलते ही सृष्टि बदल जाती है, क्योंकि दृष्टि का परिवर्तन मौलिक परिवर्तन है। अतः दृष्टि को बदलें सृष्टि को नहीं, दृष्टि का परिवर्तन संभव है, सृष्टि का नहीं। दृष्टि को बदला जा सकता है, सृष्टि को नहीं। हाँ, इतना जरूर है कि दृष्टि के परिवर्तन में सृष्टिभी बदल जाती है। इसलिए तो सम्यकदृष्टि की दृष्टि में सभी कुछ सत्य होता है और मिथ्या दृष्टि बुराइयों को देखता है। अच्छाइयाँ और बुराइयाँ हमारी दृष्टि पर आधारित हैं।
श्री राम के रूप को लेकर संटों में मटभेद हो सकते हैं कोई सगुण राम को मानता है तो कोई निर्गुण राम को, कोई प्रेम मार्गी है तो कोई अन्य किसी रूप में लेकिन सभी के राम का चरित्र एक जैसा ही है।
हमारे राम का मंदिर मुझे या नरेन्द्र मोदी को नहीं बनाना है वो मंदिर हमें बनाना पड़ेगा। 6 दिसंबर को जब हमारा स्वाभिमान जागा और ढ़ांचा गिराया गया तो एक प्रश्न उठा कि प्रेम की प्रतिमूर्ति श्री राम के मंदिर निर्माण के लिए आन्दोलन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

इस बात का उत्तर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने बहुत पहले ही दे दिया था। उन्होंने कहा था कि
"शस्त्र नहीं हैं वहाँ.. शास्त्र सिर धुनते और रोते हैं,
ऋषियों को भी सिद्धि तभी मिलती है
जब पहरे पर स्वयं धनुर्धर राम खड़े होते हैं."
मेरे एक पूर्वज ने कहा था कि जो कायर होते हैं उनके देवता भी कायर होते हैं। इसी कारण राम मंदिर टूट गया। जब हमने कायरता धारण की तो बाबर ने हमारे राम का मंदिर तोड़ दिया तब श्री राम भी कुछ नहीं कर पाए और जब हमने कायरता का परित्याग किया तो ढ़ांचा गिर गया। हमने भक्ति योग को तो ध्यान में रखा लेकिन शक्ति का प्रयोग करना भूल गए।
घर में बैठकर राम की पूजा करने से धरती स्वर्ग नहीं बनेगी, धरती को स्वर्ग बनाने के लिए हमें राम के चरित्र को स्वयं में उतारना पड़ेगा। बिना शक्ति के भक्ति का कोई महत्व नहीं रहता।

कुछ लोग कहते हैं कि एक नहीं बनेगा तो क्या हो जाएगा, आज तक 3000 से अधिक मंदिरों को तोड़ कर मस्जिद का निर्माण किया गया लेकिन हम उन 3000 मंदिरों के लिए आंदोलन नहीं कर रहे। हमारी आस्था के आधार मंदिरों में 3 प्रमुख मंदिर आते हैं, एक- अयोध्या का राम मंदिर दूसरा काशी का बाबा विश्वनाथ का मंदिर तथा तीसरा मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि। और इन मंदिरों के लिए नियमित संघर्ष चल रहा है।

मित्रों मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि बाबरी ढ़ांचा गिराकर राष्ट्रवादियों ने मुस्लिमों का अपमान हुआ है। मैं उनसे मात्र एक प्रश्न पूछना चाहता हूं कि हम हजारों सालों से रावण का पुतला जलाते हैं तो उससे नाराज होकर क्या ब्राह्मणों ने कभी कहा कि इससे हमारा अपमान हो रहा है। इस देश का सच्चा मुस्लिम कभी स्वयं को बाबर की औलाद नहीं मान सकता।

राम मंदिर निर्माण के लिए एकजुट हों और सभी मुस्लिम भाइयों से निवेदन है कि राम मंदिर को किसी मजहब से न जोड़ें । राम सिर्फ हिन्दुओं के न होकर इस देश की अस्मिता के आधार हैं।

भगवान राम सिर्फ हिन्दुओं के आस्था के कारण ही भगवान नहीं हैं बल्कि वे अपने कर्मों की वजह से पूजे जाते हैं और, पुरुषोत्तम कहलाते हैं-

  • भगवान राम द्वारा सीता को यह वचन दिया जाना कि मैं अपने जीवन में सिर्फ एक ही विवाह करूँगा, और तुम मेरी एकमात्र पत्नी रहोगी यह दर्शाता है कि वे बहुविवाह के विरोधी थे जो कि उस समय बहुत ही आम बात थी ( आज भी हिन्दुओं में भगवान् राम की तरह एक विवाह की ही मान्यता है)। 
  • जंगल में निषादराज से गले मिलकर भगवान राम ने उंच-नीच की भावना पर कुठाराघात किया और हमें यह सन्देश दिया कि जाति अथवा धन आधारित विभेद नहीं होना चाहिए !, सबरी जो कि एक अछूत जाति से थी उसके हाथों के जूते बेर खा कर उन्होंने जाति या वर्ण व्यवस्था को कर्म  आधारित प्रमाणित कर दिया और हमें यह सन्देश दिया कि मोल व्यक्तियों और उसकी भावनाओं का होता है ना कि उसके कुल या जाति का !
  • जंगल में ही अहिल्या को शापमुक्त कर उन्होंने यह सन्देश दिया कि अनजाने में हुए गलती गलती नहीं कहलाती है और, बेहतर भविष्य के लिए उसे माफ़ कर देना ही उचित है !, बाली वध का सार यह है कि अगर आपका मित्र सही है तो किसी भी हालत में आपको आपके मित्र की सहायता करनी चाहिए और, येन-केन-प्रकारेण पृथ्वी पर से दुष्टों का संहार जरुरी है ताकि सज्जन चैन से जी सकें !, 
  • सीता जी के अपहरण के पश्चात् पहले समुद्र से विनय पूर्वक रास्ता मांगना फिर उस पर ब्रह्मास्त्र से प्रहार को उत्तेजित होना यह दर्शाता है कि शक्तिसंपन्न होने के बाद भी लोगों को अपनी मर्यादा नहीं भुलानी चाहिए.!, समुद्र को मात्र एक बाण से सुखा देने कि क्षमता होने के वाबजूद भी समुद्र पर राम सेतु का बनाना हमें यह सिखाता है कि अगर कम बन जाए तो बिना वजह शक्ति प्रदर्शन अनुचित है और, अपने से कमजोर को ताकत के बल पर अपना पसंदीदा काम करवाना सर्वथा अनुचित है !
  • रावण वध के पश्चात् लक्ष्मण को उसके पास शिक्षा ग्रहण करने को भेजना हमें सिखाता है कि ज्ञान जिस से भी मिले जरुर ग्रहण करना चाहिए और, मनुष्य ये कभी भी नहीं समझना चाहिए कि वो सम्पूर्ण है !, 
  • सीता की अग्नि परीक्षा पर भगवन राम कहते हैं कि ""आज ये सीता की अग्नि परीक्षा अंतिम अग्नि परीक्षा है और, दुनिया में फिर किसी नारी को ऐसी प्रताड़ना नहीं दी जाएगी, मनुष्य को अपनी अर्धागिनी पर विश्वास करना चाहिए क्योंकि माता सीता उतने वर्ष रावण जैसे व्यक्ति के पास रह कर भी पवित्र ही थी !, ठीक उसी प्रकार आधुनिक नारी को भी घर में अथवा बाहर अकेला छोड़ देने के बाद उसकी बातों और उसकी पवित्रता पर विश्वास करना चाहिए क्योंकि, नारी वो शक्ति है जो रावण जैसे नराधम के पार अकेली रह कर भी अपनी लाज की रक्षा करने में सक्षम है !, यदि अग्नि परीक्षा नहीं हुई होती तो नारी की सच्चाई संदिग्ध ही जाती और, वो विश्वास का मामला होता परन्तु अग्नि परीक्षा ने यह साबित कर दिया कि नारी पर शक करने का कोई कारण नहीं है खास कर जब वो आपकी अर्धांगिनी हो !
     
  • एक धोबी के कहने पर भगवान् राम द्वारा माता सीता का परित्याग भगवान राम का राजधर्म था जहाँ उन्होंने माता सीता का परित्याग कर यह सन्देश दिया कि राजा की अपनी कोई ख़ुशी अथवा गम नहीं होना चाहिए !, अगर राज्य का एक भी व्यक्ति भले ही वो एक धोबी जैसा निर्धन, निर्बल ही क्यों ना हो उसका मत भी महत्वपूर्ण है और, उसके राय भी महत्वपूर्ण हैं !, कोई भी काम सर्वसम्मति के करना चाहिए और, सर्वसम्मति बनाने के लिए अगर राजा को अपनी निजी खुशी को यदि बलिदान भी करना पड़े तो राजा को कर देना चाहिए क्योंकि राजा बनने के व्यक्ति खुद का या परिवार का नहीं रह जाता है बल्कि वो राज्य का हो जाता है ! प्रजा की ख़ुशी में ही राजा की ख़ुशी होनी चाहिए और, प्रजा के दुःख में ही राजा का भी दुःख निहित है ! 


भगवान राम के हर काम में हमारे लिए अहम् सन्देश है...! तो कहने का मूल तात्पर्य यह है कि राम के चरित्र को अपनाओ तभी राम राज्य आएगा और उस चरित्र को अपनाने के लिए राम मंदिर का भव्य निर्माण परम आवश्यक है वो भी प्रत्येक नागरिक के सहयोग से।

वन्दे मातरम

Tuesday, 4 August 2015

यूं ही नहीं मैं तिरंगा हो जाता हूं....

'तिरंगा' एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही हर एक भारतवासी के मन में ऊर्जा का प्रवाह एवं संचार बढ़ जाता है। तिरंगे को देखकर स्वतः ही हमारा सिर उसके सम्मान में झुक जाता है और ऐसा इस लिए होता है क्यों कि हमें पता है कि इस राष्ट्रीय ध्वज की संप्रभुता के संरक्षण के लिए देश के क्रातिकारियों ने समर्पण की पराकाष्ठा को पार किया। भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज की अभिकल्‍पना को स्वीकार किया गया।  इसके वर्तमान स्‍वरूप की अभिकल्पना पिंगली वैंकैयानन्‍द ने की थी। प्रत्‍येक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र का अपना एक ध्‍वज होता है जो कि एक संकेत होता है कि अमुख देश स्‍वतंत्र है।  वर्तमान भारतीय राष्‍ट्रीय ध्वज ‘’तिरंगे’’ के नाम से जाना जाता है।


भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की प‍ट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्‍वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्‍य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्‍तंभ पर बना हुआ है। इसका व्‍यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।

समय समय पर इस देश में अनेक ध्वजों को राष्ट्रीय ध्वज माना गया। प्रथम राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।
द्वितीय ध्‍वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्‍वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्‍तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
तृतीय ध्‍वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया । यह ध्‍वज जो वर्तमान स्‍वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। तथापि यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं था और इसकी व्‍याख्‍या इस प्रकार की जानी थी।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा। केवल ध्‍वज में चलते हुए चरखे के स्‍थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्‍वज अंतत: स्‍वतंत्र भारत का तिरंगा ध्‍वज बना।

भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्‍य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है। ध्वज के मध्य में बने धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्‍यु है।

26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया और स्‍वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्‍ट‍री में न केवल राष्‍ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्‍ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते है। बशर्ते कि वे ध्‍वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्‍वज संहिता, 2002 को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्‍थानों आदि के सदस्‍यों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्‍द्रीय और राज्‍य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।

26 जनवरी 2002 विधान पर आधारित कुछ नियम और विनियमन हैं कि ध्‍वज को किस प्रकार फहराया जाए

राष्‍ट्रीय ध्‍वज को शैक्षिक संस्‍थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्‍काउट शिविरों आदि) में ध्‍वज को सम्‍मान देने की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्‍वज आरोहण में निष्‍ठा की एक शपथ शामिल की गई है। किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्‍थान के सदस्‍य द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज का अरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्‍यथा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के मान सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है। नई संहिता की धारा 2 में सभी निजी नागरिकों अपने परिसरों में ध्‍वज फहराने का अधिकार देना स्‍वीकार किया गया है।

इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए। इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता। किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।

तिरंगे से जुड़े सभी विषयों को न सिर्फ समझें अपितु इस परम पवित्र तिरंगे को अपने भावों में, विचारों में, उद्देश्यों में, चरित्र में तथा आत्मा में उतारें।

वन्दे भारती

Monday, 3 August 2015

धिक्कार तथाकथित राष्ट्रवादियों पर....

दो दिन पूर्व फ्रेंडशिप डे के विरोध में एक ब्लॉग लिखा, जिन्होंने उसे पढ़ा उन्होंने उसका समर्थन किया, लेकिन एक बुद्धजीवी वर्ग ऐसा भी था जिसने बिना ब्लॉग पढ़े, अथवा आंशिक रूप से पढ़कर आधारहीन तथा तथ्यहीन मैसेज करना शुरू कर दिया। मेरा विषय स्पष्ट था कि मित्रता का व्यापार नहीं होना चाहिए और मैंने मात्र फ्रेंडशिप डे का विरोध नहीं किया था अपितु 'चॉकलेट-डे', 'टेडी-डे', 'फादर्स-डे', 'मदर्स-डे', 'वेलेन्टाइन-डे, आदि फालतू के दिनों का विरोध किया था।

जिन वामपंथी एवं पाश्चात्य सभ्यता के संवाहक मित्रों ने मेरे विषय का विरोध किया उनके बेकार के संदेशों का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मुझे मूल पीड़ा हुई उन लोगों के संदेशों से जो स्वयं को संस्कृति का संवाहक कहते थे, खुद को संघ का बहुत बड़ा स्वयंसेवक कहते थे। उन लोगों ने फ्रेंडशिप डे की शुभकामनाएं न देकर मैत्री दिवस/ मित्रता दिवस की शुभकामनाएं दीं। वो संस्कृति के तथाकथित संवाहक एक दिन पहले 1 अगस्त को लोकमान्य बाल गंगाधर की पुण्यतिथि पर एक शोक संदेश भी न भेज पाए। पीड़ा इस बात की नहीं वो मैत्री दिवस अथवा मित्रता दिवस की शुभकामनाएं दे रहे थे, पीड़ा इस बात की है वो परम पवित्र भारत वर्ष को स्वतंत्र करने वाले, देश में स्वदेशी आंदोलन के जनक को फ्रेंडशिप डे की तैयारियों के कारण भूल गए।

और तो और वो मित्र भारत के राष्‍ट्रीय ध्वज की रूपरेखा तैयार करने वाले पिंगली वेंकैय्या का जन्मदिन भी भूल गए। धन्य हैं ऐसे राष्ट्रवादी जो विदेशी षड़यंत्रों का हिंदी अनुवाद कर स्वयं को राष्ट्रवादी कहते हैं।

और मेरा विरोध सिर्फ ऐसे तथाकथित ग्लोबल त्योहारों से नहीं है अपितु देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए रक्षाबंधन पर विदेशी राखियों का भी विरोध करता हूं, दीपावली पर विदेशी दीपकों तथा मोमबत्तियों और चायनीज पटाखों का भी विरोध करता हूं, होली पर विदेशी रंगों का भी विरोध करता हूं। और मैं ऐसा इसलिए करता हूं कि जब मुझसे कोई ये कहे कि आपने देश के लिए क्या किया है तो मैं खुद से नजर मिला कर जवाब दे सकूं कि स्वदेशी संरक्षण में एक हिस्सा मेरा भी है।

अगर मैं ईद पर जीव हत्या का विरोध करता हूं तो दीपावली पर पटाखों पर व्यर्थ पैसे बर्बाद करने का भी विरोध करता हूं, अगर मैं चर्च में मोमबत्ती जलाने का विरोध करता हूं तो शिवलिंग पर दूध बहाने का भी विरोध करता हूं।

ऐसे विषयों को किसी संप्रदाय विशेष से न जोड़कर देखें अपितु राष्ट्र सर्वप्रथम की भावना के साथ ऐसे विषयों पर चिंतन करें।

वन्दे भारती

Saturday, 1 August 2015

हां आप बेच रहे हैं देश....

हां मैं करता हूं इन 'डे' का विरोध
कल शाम को स्टेशनरी की एक दुकान पर एक पेन लेने के लिए जाना हुआ। वहां जाकर कुछ अलग लग रहा था.... उस दुकान पर भीड़ कुछ ज्यादा ही लग रही थी और उस भीड़ का एक बड़ा हिस्सा कार्ड के सेक्शन में दिख रहा था। नोएडा की संस्कृति कुछ ऐसी है कि रक्षाबंधन तथा दीपावली पर भी कार्ड दिए जाते हैं। लेकिन रक्षाबंधन तथा दीपावली में अभी बदुत समय था, दिमाग पर थोड़ा जोड़ डाला तो ध्यान आया कि दो दिन बाद फ्रेंडशिप डे है।




पूरी शिद्दत से निभाई मित्रता
अगस्त माह के प्रथम रविवार को युवा वर्ग द्वारा ‘फ्रेंडशिप डे’ मनाया जाता है । इस वर्ष 2 अगस्त को ‘फ्रेंडशिप डे’ मनाया जाएगा । फ्रेंडशिप डे के नाम पर इस दिन मित्रों को प्रीतिभोज देना, मैत्री के प्रतीक के रूप में एक-दूसरे के हाथ में फ्रेंडशिप बैंड बांधना आदि घटनाएं भारी मात्रा में होती हैं । विद्यालय एवं महाविद्यालयों में इसका प्रमाण लक्षणीय है । क्या वास्तव में कोई एक बैंड बांधकर मैत्री में वृद्धि होती है ? एक-दूसरे को संकट के समय सहायता करने एवं मित्र का कदम अयोग्य दिशा से जाते समय उसे सहायता करने को खरी मैत्री कहते हैं । एक-दूसरे को अड़चन के समय सहायता करने के अनेक उदाहरण हिन्दुओं के प्राचीन इतिहास में देखने को मिलते हैं, जिसमें एक है श्रीकृष्ण-सुदामा ! परंतु वर्तमान समय के युवा पाश्‍चात्त्य सभ्यता के अधीन जाकर ऐसी मैत्री का केवल प्रदर्शन करने में बड़प्पन मानते हैं । वास्तव में राष्ट्र पर जब संकट छाया हो, तो ऐसे बेकार दिन मनाने की अपेक्षा सभी मित्रों के साथ बैठकर राष्ट्र के वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा करना ज्यादा उचित लगता है।

मित्रों के साथ बैठकर शराब के पेग बनाना और उस के बाद दिल की बातों के नाम एक दूसरे को गालियां देना और भी बहुत सारी हरकतें करना मुझे व्यक्तिगत रूप से उचित नहीं लगता। लेकिन ‘फ्रेंडशिप डे’ का विरोध मैं मात्र इस लिए नहीं करता क्यों कि इससे हमारा सांस्कृतिक क्षरण होता है...इस प्रकार के सभी तथाकथित उत्सवों के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है....
हमने तो कभी बैंड नहीं बांधे...

"एक ग्रीटिंग कार्ड बनाने वाली कंपनी 'Hallmark Cards' के मालिक 'जॉइस सी॰ हॉल' द्वारा 1910 में अपनी कंपनी में ग्रीटिंग की बिक्री बढ़ाने के लिए एक दिन बनाया गया, जिसे 'Friendship-Day ' का नाम दिया गया और आज स्पष्ट रूप से बधाई कार्ड को बढ़ावा देने के लिए एक वाणिज्यिक नौटंकी को पूरी दुनिया (खासकर एशियाई देश) मना रही है..!" Friendship-Day (मित्रता-दिवस) अमेरीकी कंपनियों द्वारा शुरू किया गया 'व्यावसायीकरण' का एक विपणन (Marketing) नाटक है..!
भारतीयों के इसी उतावलेपन का फायदा उठाकर कंपनियां 'चॉकलेट-डे', 'टेडी-डे', 'फादर्स-डे', 'मदर्स-डे', 'वेलेन्टाइन-डे, आदि फालतू के दिनों को व्यावसायीकरण के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं..! दुनिया हमारी अच्छाइयों को पेटेंट कर रही है और हम उनके त्यागे हुए मूल्यों को अपने जीवन में उतार रहें हैं..! ऐसा लगता है कि भारतीयों के जीवन में समय की इतनी कमी होने लगी है कि उन्हें 'फ्रेंडशिप-डे' का सहारा लेना पड़ रहा है..!
साथ हों या न हों लेकिन वो यादें तो हैं

मैं इन तमाम 'डे' का विरोध लाठी लेकर नहीं करता..! मेरा बस इतना कहना है कि मित्रता का व्यवहार हो, मित्रता का व्यापार नहीं..! प्यार का सम्मान किया जाए, प्यार का व्यापार नहीं..! मित्रता को, प्यार को हम किसी एक विशेष
दिन की परिधि में न बाँधेँ..! मेरे इस पोस्ट को अन्यथा न लिया जाए, मैं सिर्फ मित्रता तथा प्यार जैसे रिश्तोँ के व्यवसायीकरण का विरोध करता हूँ..!

ऐसे तमाम डे का प्रचार-प्रसार करके विदेशी कंपनियाँ और उनके दलाल इस देश से अरबों रुपये लूट कर हर साल ले जाते हैं, जिससे इस देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है..! इन तमाम डे को मनाने के चक्कर में हमारे देश का युवा-वर्ग 'गिफ्ट तथा कार्ड' पर अपने पैसे को बर्बाद कर रहा है और विदेशी बनियोँ (व्यवसायियों) के हाथों को मजबूत कर रहा है, जो कहाँ तक उचित है..!

हमें इन अंतर्राष्ट्रीय साजिशों को भी समझना चाहिए..! हो सकता है कि आपको सांस्कृतिक क्षरण से कोई फर्क न पड़ता हो लेकिन मुझे पता है कि आप देश को बेचने में आप सहयोग नहीं करेंगे...

"वन्दे-मातरम्"
वन्दे भारती

Friday, 31 July 2015

हां मैं पत्रकार हूं, और राष्ट्रवादी हिन्दू भी...

आज मेरे पास एक वरिष्ठ पत्रकार महोदय का फोन आया, संभवतः उन्होंने मेरा मोबाइल नंबर फेसबुक से लिया होगा (उनकी बातों से अनुमान लगाया)। उन्होंने मुझसे पहला प्रश्न पूछा कि विश्व गौरव जी आपने अपना फेसबुक पेज कब बनाया था। मैनें उनसे कहा महोदय पहले अपना परिचय दीजिए..तब उन्होंने कहा कि वो एक निजी चैनल में वरिष्ठ पत्रकार हैं...इतना बताने के बाद उन्होंने फिर से अपना प्रश्न दोहरा दिया...उनके प्रश्न को सामान्य रूप से लेते हुए मैंने बताया कि 6 साल पहले बनाया था...मेरे जवाब देने के बाद वो बोले अच्छा अच्छा उस समय छात्र जीवन में रहे होंगे...मैंने कहा हां...तो उन्होंने कहा विश्व गौरव जी अब तो आप व्यावसायिक जीवन में आ चुके हैं फेसबुक पेज का नाम तो नहीं बदल सकता लेकिन फेसबुक प्रोफाइल से राष्ट्रवादी शब्द हटा दीजिए...उनके इतना कहते ही मुझे उनके पूरा विषय समझ आ गया दरअसल में उनके अन्दर मेरे पेज पर मेरे नाम के साथ राष्ट्रवादी हिन्दू देखकर सेक्लुरिज्म का कीड़ा जाग उठा था। 



मित्रों जब मैंने वो फेसबुक पेज बनाया था उस समय मेरी उम्र 18 साल थी लेकिन इस का मतलब ये नहीं मैंने राष्ट्रवादी हिन्दू शब्द का प्रयोग भावावेश में किया था। मैंने पूरे विवेक के साथ उस शब्द को अपने नाम के साथ जोड़ा था। मैंने उन पत्रकार महोदय से 1 घंटे तक बात की तब वो मेरे विषय से सहमत हुए। मुझे लगा कि ऐसे विषय पर ब्लाग लिखना चाहिए जिससे कि यदि कोई मुझे ऐसी राय दे तो मैं अपना समय व्यर्थ नष्ट न करते हुए अपने ब्लॉग का लिंक देकर अपना विषय स्पष्ट कर सकूं।

मित्रों मेरे लिए राष्ट्रवादी और हिन्दू दोनों शब्दों के मायने थोड़े अलग हैं... भारत के अतरिक्त किसी भी अन्य देश का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह देशभक्त नहीं हो सकता। राष्ट्रवाद की मूल परिकल्पना को समझने के लिए देश, राज्य तथा राष्ट्र की परिकल्पना को अलग अलग समझना आवश्यक है। 
देश एक भौगोलिक ईकाई है तथा राज्य देश का राजकीय अथवा शासकीय घटक है । देश मे एक अथवा एक से अधिक राज्य भी हो सकते है । जबकि राष्ट्र एक सांस्कृतिक ईकाई है , जिसके लिए मात्र भूमि ,लोगो ,एवं शासन पर्याप्त नहीं है अपितु सांस्कृतिक एकता की अनुभूति आवश्यक है । देश राष्ट्र के शरीर का एक भाग हो सकता है ,जबकि संस्कृति राष्ट्र की आत्मा है । राष्ट्र स्थिर व चिरंतर है जबकि राज्य अस्थिर हो सकता है अथवा बदल भी सकता है । 

अपने देश एवं उनकी परंपराओं के प्रति , उसके ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रति , उसकी सुरक्षा एवं समृद्धि के प्रति जिसकी अव्यभिचारी एवं एकांतिक निष्ठा हो वही लोग राष्ट्रीय अथवा राष्ट्रवादी कहे जाते हैं। 

मैंने अभी लिखा कि भारत के अतरिक्त किसी भी अन्य देश का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता वो इस लिए क्योंकि किसी भी अन्य देश के पास उनकी स्थायी संस्कृति ही नहीं है। इस लिए वो अपनी भौगोलिक ईकाई के प्रति समर्पित तो हो सकते हैं लेकिन उनसे राष्ट्रवादी होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। मेरे लिए भौगोलिक संरक्षण से अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संरक्षण है, क्योंकि मुझे पता है कि परम पवित्र भारतवर्ष का आधार यहां की संमृद्ध संस्कृति है ।

ये विषय तो हो गया राष्ट्रवादी शब्द के मूल भाव का अब विषय आता है हिन्दू शब्द का....

हमारे पौराणिक ग्रन्थों में कहीं हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म का उल्लेख नहीं है।पुराणों में कर्इ कथाएं हैं, पर किसी कथा में हिन्दू धर्म की व्याख्या नहीं की गयी है। रामायण और महाभारत संसार के वहृततम और श्रेष्ठतम महाकाव्य है, जिनके महानायक राम और कृष्ण हैं, किन्तु इनकी महता देवताओं के रुप में नहीं की गयी हैं। इन्हें विष्णु का मनुष्य रुप में अवतार माना गया है। भग्वदगीता को धर्म का चश्मा उतार कर पढ़ने से इसमें छुपा हुआ गूढ आध्यात्मिक अर्थ समझ में आता है। भग्वद गीता धर्म, दर्शन और आध्यात्म का अनुपम ग्रन्थ है, जो हमारी राष्ट्रीय निधि  है। शताब्दियों पूर्व लिखा गया यह ग्रन्थ विश्व का पहला और अंतिम ऐसा ग्रन्थ हैं, जैसा न कभी लिखा गया था और न लिखा जायेगा। किन्तु गीता के किसी श्लोक में हिन्दू, हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व की व्याख्या नहीं की गयी है।

हिन्दू और हिन्दुत्व शब्द को सियासत मे लपेट कर जो व्याख्या की जा रही है, वह जानबूझ कर वातावरण को विषाक्त करने का प्रयास है। हमारा राष्ट्र भारत था, भारत है और भारत ही रहेगा। मुगलो ने इसे हिन्दुस्तान बनाया और अंग्रेजों ने इंड़िया। अंग्रेज इंड़िया में रहते थे, किन्तु अपने आपको ब्रिटिश कहते थे, किन्तु मुगल हिन्दुस्तानी कहते थे, क्योंकि हिन्दुस्तान को ही वे अपना मुल्क मानते थे। उन्हें हिन्दू शब्द से न तो घृणा थी और न ही इस विशेषण को अपनी पहचान के आगे लगाने से अपने आपको अपमानित महसूस करते थे। पाकिस्तान बनने के पहले सारे मुसलमान हिन्दुस्तानी मुसलमान कहलाते थे, किन्तु अब वे पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी कहलाते हैं। स्पष्ट है, हिन्दु धर्म नहीं, पहचान है, फिर इसे धर्म से क्यों जोड़ा जा रहा है ?

हमारी संस्कृति शांति और सहिष्णुता का पाठ पढाती है। हमने तलवार के बल पर नहीं, दिलों को जोड़ कर दुनिया जीती हैं । पूरी दक्षिण -पूर्वी ऐशिया में हज़ारों वर्षों से हमारी सांस्कृतिक विरासत आज भी अक्षुण्ण हैं। हमने हिंसा से नहीं, शांति के पाठ से संसार को बोद्धमय बनाया। कभी खून खराबे से दुनिया को जीतने की योजनाएं नहीं बनायी। इतिहास गवाह है कि जो तलवार ले कर दुनिया फतह करने निकले थे, वे मिट गये, किन्तु हमारी धर्म पताका विश्व में आज भी फहरा रही है।

सामान्य शब्दों में यदि समझें तो अटक से कटक तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति जो गाय, गंगा ,गीता और गायत्री का सम्मान करता है भले ही वह किसी भी पूजा पद्धति को मानता हो, हिन्दू है।जो व्यक्ति श्री राम की मूर्ति के सामने बैठकर पूजा करता हो किन्तु गायत्री के रहस्य को न जानता हो वह हिन्दू नहीं हो सकता और जो भले ही नमाज अदा करता हो लेकिन गंगा की पवित्रता को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हो वह हिन्दू है।

राष्ट्रवादी तथा हिन्दू शब्द की मूल परिकल्पना को यदि हमने समझकर स्वीकार कर लिया तो निश्चय ही हमारी 90 प्रतिशत समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

वन्दे भारती

Tuesday, 28 July 2015

आज देश रो दिया.....कलाम को प्रणाम

कल शाम देश ने अपने एक मजबूत स्तंभ को खो दिया,देश के लिए यह एक अपूर्णीय क्षति है। व्यक्तिगत रूप से कलाम जी मेरे जीवन को आधार देने वाले एक मजबूत स्तंभ थे। उनको पढ़कर और सुनकर मैनें अपने जीवन में बहुत कुछ सीखा है। मैं बचपन से ही संघ से जुड़ा रहा हूं। एक स्वयंसेवक के रूप में अपने प्रथमिक दौर में मेरे विचार एक हिन्दूवादी के थे। वो एक ऐसा समय था जब मैं ना ही संघ के मूल विचार को समझता था और ना ही हिन्दू शब्द की मूल परिकल्पना को। उस दौर में मेरे मन के एक हिस्से में मुस्लिमों के प्रति दुर्भावना बसी हुई थी। उस समय मेरी उम्र मुश्किल से 16 साल रही होगी।


उसी दौरान एक दिन मेरे बाबा जी ने मुझे कलाम साहब की जीवनी पढ़ने को दी, वो मेरे विचारों में परिवर्तन के लिए एक पर्याप्त थी। उस जीवनी के एक वाक्य को मैंने अपने जीवन में अनुपादित किया। 'अंग्रेजी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में विज्ञान के मूल काम अंग्रेजी में हैं. मेरा विश्वास है कि अगले दो दशक में विज्ञान के मूल काम हमारी भाषाओँ में आने शुरू हो जायेंगे, तब हम जापानियों की तरह आगे बढ़ सकेंगे...' राष्ट्रभाषा के प्रति उनके समर्पण को देखकर उनके उद्देश्य को मूर्त रूप देने के लिए मैंने अपने स्तर पर प्रयास शुरू किया और सभी कार्य हिंदी में करने का प्रयास करने लगा।
जब उम्र थोड़ी ज्यादा हुई तो धीरे धीरे संघ और हिन्दुत्व का मूल विचार भी समझ में आया। और 20 की उम्र के बाद जब कुछ ऐसे लोगों से चर्चा होती थी जो खुद को कट्टर हिन्दू कहते थे तो उनसे मेरा पहला प्रश्न होता था कि क्या कलाम साहब के योगदान को आप नहीं मानेंगे।

जो व्यक्ति गीता और कुरान दोनों का अध्ययन करता हो उसे एक संप्रदाय विशेष से जोड़ना कहीं न कहीं बेईमानी लगता है। अपने व्यक्तिगत जीवन में मैंने भारत को परमाणु संपन्न बनाने वाले डॉक्टर अब्दुल कलाम से बहुत कुछ सीखा है...उनके कुछ विचार आपके जीवन में भी परिवर्तन ला सकते हैं....

Be more dedicated to making solid achievements than in running after swift but synthetic happiness.
 कृत्रिम सुख की बजाये ठोस उपलब्धियों के पीछे समर्पित रहिये.

English is necessary as at present original works of science are in English. I believe that in two decades times original works of science will start coming out in our languages. Then we can move over like the Japanese.
अंग्रेजी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में विज्ञान के मूल काम अंग्रेजी में हैं. मेरा विश्वास है कि अगले दो दशक में विज्ञान के मूल काम हमारी भाषाओँ में आने शुरू हो जायेंगे, तब हम जापानियों की तरह आगे बढ़ सकेंगे.

I was willing to accept what I couldn’t change.
मैं हमेशा इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार था कि मैं कुछ चीजें नहीं बदल सकता.

Great dreams of great dreamers are always transcended.
महान सपने देखने वालों के महान सपने हमेशा पूरे होते हैं.

Let us sacrifice our today so that our children can have a better tomorrow.
आइये हम अपने आज का बलिदान कर दें ताकि हमारे बच्चों का कल बेहतर हो सके.

Man needs his difficulties because they are necessary to enjoy success.
इंसान को कठिनाइयों की आवश्यकता होती है, क्योंकि सफलता का आनंद उठाने कि लिए ये ज़रूरी हैं.

No religion has mandated killing others as a requirement for its sustenance or promotion.
किसी भी धर्म में किसी धर्म को बनाए रखने और बढाने के लिए दूसरों को मारना नहीं बताया गया.

Tell me, why is the media here so negative? Why are we in India so embarrassed to recognise our own strengths, our achievements? We are such a great nation. We have so many amazing success stories but we refuse to acknowledge them. Why?
 मुझे बताइए , यहाँ का मीडिया इतना नकारात्मक क्यों है? भारत में हम अपनी अच्छाइयों, अपनी उपलब्धियों को दर्शाने में इतना शर्मिंदा क्यों होते हैं? हम एक महान राष्ट्र हैं. हमारे पास ढेरों सफलता की गाथाएँ हैं, लेकिन हम उन्हें नहीं स्वीकारते. क्यों?

You have to dream before your dreams can come true.
इससे पहले कि सपने सच हों आपको सपने देखने होंगे .


इस व्यक्तित्व को भावभीनी श्रद्धांजलि.....

Monday, 27 July 2015

"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"

विदेशी कंपनियों से सामान खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से देश बेचने वाला व्यक्ति पूछता है
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*दीवार पर पेशाब करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*बिजली चोरी करता व्यक्ति पूछता है, "अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*यहाँ-वहाँ कचरा फैंकता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*कामचोर कर्मचारी पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*टेक्स चोरी करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*नौकरी पर देरी से व जल्दी घर दौड़ता कर्मचारी पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*लड़कियों से छेड़खानी करता व्यक्ति पूछता है,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?
"वंदे मातरम् के समय बातें करते स्कूलों के कुछ लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"

*स्कूल में बच्चों को न भेजने वाले लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*सड़क पर रेड सिग्नल तोड़ते लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*किताबों से दूर भागते विद्यार्थी पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे...?"
*कारखानों में हराम खोरी करते लोग पूछते हैं,
"अच्छे दिन कब आयेँगे........!!

अच्छे दिन आएंगे लेकिन उनको लाने वाले पीएम साहब नहीं होंगे....हम अगर देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और अपने जीवन में प्रत्येक काम यह सोचकर करेंगे कि मेरे प्रत्येक कार्य से देश पर प्रभाव पड़ रहा है, तो निश्चित ही अच्छे दिन आ जाएंगे। सड़क पर कचरा नरेन्द्र मोदी नाम का व्यक्ति नहीं फेंकता है, अपने बच्चों को यो-यो टाईप नरेंद्र मोदी नहीं बनाता....हमें करना होगा स्वयं में परिवर्तन यदि हम वास्तव में अच्छे दिनों की परिकल्पना को साकार करना चाहते हैं तो....

वन्दे भारती

एक मांग पीएम मोदी के नाम

ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के समय चलने वाले सिक्कों पर ॐ हुआ करता था क्योंकि उनको पता था कि भारत का आधार भारत की संस्कृति है तथा भारत की संस्कृति का आधार आध्यात्म है। कंपनी की सरकार ने अपनी महारानी की फोटो के भी सिक्के चलाए लेकिन श्री राम, हनुमान और गणेश जी से दूर नहीं हो पाए।


एक बार कल्पना करिए कि आज के समय में अगर सिक्कों पर भगवान् श्रीराम लक्ष्मण जानकी जी और हनुमान जी के चित्र हों तो देश में क्या होगा। देश की तथाकथित स्वतंत्रता के बाद हमने अपनी विरासत को गंवाया और तो और हमने देश की सत्ता उनके हाथों में दी जिनको इस देश की संस्कृति से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था।

कभी कभी लगता है ऐसी आज़ादी से तो अच्छा था कि हम गुलाम रहते लेकिन फिर सोचता हूं कि देश की ऐसी स्थिति के लिए मूल रूप से तो हम ही जिम्मेदार हैं, हम ही तो चुनते हैं सरकार.... हम ही तो चलाते हैं सिस्टम....

मात्र नेताओं को गाली देने से कुछ नहीं होगा..हमें बोलना पड़ेगा....हमें ये बताना पड़ेगा कि हम चाहते हैं कि देश फिर से विश्व गुरू बने...पिछले लोकसभा चुनाव में एक उम्मीद के साथ हम सभी ने देश की सत्ता का संचालन एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में दिया जो कहता था कि देश नहीं झुकने दिया जाएगा, इतनी जल्दी उसका विरोध करना  भी ठीक नहीं। लेकिन हमारा शांत बैठना भी तो ठीक नहीं है।

मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं कि 1000 रुपए के नोट पर महात्मा गांधी का चित्र रहता है, निश्चित रूप से देश हित में उनका भी योगदान रहा है...लेकिन मेरा मूल विषय यह है कि यदि 1000 रुपए के नोट पर महात्मा गांधी का चित्र हो सकता है तो 500 रुपए के नोट पर चन्द्रशेखर आजाद का , 100 रुपए के नोट पर भगत सिंह का, 50 रुपए के नोट पर रानी लक्ष्मीबाई का चित्र क्यों नहीं हो सकता। क्या देश की स्वतंत्रता में इनका कोई योगदान नहीं था? और यह प्रश्न मैं आज अपने इस ब्लॉग के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री महोदय से पूछना चाहता हूं। हो सकता है भगवान् श्रीराम को आप एक वर्ग विशेष का मानते हों, हो सकता है कि तथाकथित सांप्रदायिक सौहार्द के संरक्षण के लिए आप श्रीराम का चित्र सिक्कों पर न छपवा सकते हों लेकिन मैं इतना तो मानकर चल रहा हूं कि आप कांग्रेस सरकार की भांति हमारे शहीदों को आतंकवादी तो नहीं मानते होंगे.....

वन्दे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...