Monday, 21 December 2015

'निर्भया' हम शर्मिंदा हैं....

दोस्तों, 16 दिसम्बर 2012, इस तिथि को सुनते ही आत्मा काँप गई ना। जी हाँ, मेरी भी कुछ हालत ऐसी ही हो जाती है। बहुत सी यादें जुड़ी हैं इस तिथि से....

2012 के अंत से लेकर एक लंबे समय तक बहुत सी लाठियां खाईं। छात्रसंघ चुनाव लड़ने की तैयारी के बीच अचानक सब कुछ छोड़ कर चला गया जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा पर प्रदर्शन करने, कालीदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पर जाकर नारेबाजी शुरू की तो लाठियां चलने लगी। सब झेला सिर्फ इस लिए कि शायद कुछ ऐसा हो जाए कि देश की सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोगों को एहसास हो कि इस देश का युवा चाहता कि भारत की प्रतिष्ठा का सम्मान बना रहे लेकिन आज सब कुछ छलावा लग रहा है। पिछली बातों को याद करके बस आंखों में नमी सी छाने लगने लगती है।

दोस्तों, वह एक ऐसा आंदोलन था जिसमें मैं पूरी शिद्दत से लगा था। मेरे जीवन का सबसे बड़ा किंतु असफल आंदोलन... 22 दिसंबर को जब इस देश के युवाओं ने आजादी के बाद के 65 सालों के इतिहास को बदलते हुए देश के प्रथम व्यक्ति के रायसीना हिल्स स्थित घर के दरवाजे पर सुबह सुबह लात मारते हुए कहा कि उठो और इस देश की बेटी के साथ हुए कुकृत्य का जवाब दो तो इस देश की सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था यह तय नहीं कर पा रही थी कि इन युवाओं को क्या कहकर रोका जाए।  उसके ठीक अगले दिन सुबह लखनऊ में जब हम सब मुख्यमंत्री आवास पहुंचे तो पुलिसवालों का चेहरा बता रहा था कि वो हमें रोकना नहीं चाह रहे थे। उनकी अनचाही नाकाम कोशिश के बाद जब हम मुख्यमंत्री आवास पहुंचे तो सुबह से शाम हो गई लेकिन कोई नहीं आया लेकिन लखनऊ के युवाओं ने भी बता दिया कि वो अपनी 'बहन' के लिए कुछ भी कर सकते हैं। फिर शाम 6 बजे भारी ठंड में राजनीति ने अपनी गंदी चालों को  चलना शुरू किया। हमें वहां से हटाने के लिए तत्कालीन जिला न्यायाधीश अनुराग यादव आए और बोले कि आप सब धरना स्थल चलिए वहां हम आपसे बात करेंगे। जब हम नहीं माने तो वे हमारे साथ पैदल धरना स्थल पर गए। सात किलोमीटर की उस पदयात्रा के दौरान ठंड के बीच उनके चेहरे का पसीना बता रहा था कि वे मजबूरी में पैदल चल रहे हैं। अंत में धरना स्थल पर हम सबको अश्वासनों की मीठी गोली दे दी गई। 1 महीने तक मैं और मेरे कई साथी सुबह के समय धरना स्थल पर बैठते थे तो रात में कैंडिल मार्च करते थे। नेताओं के आश्वासनों ने हम सबको अपनी झूठी चालों में फंसा लिया।

पढ़ें: नारी और हमारे समाज की विकृत मानसिकता

आज जब उस घृणित अपराध को अंजाम देने वाले व्यक्ति को नाबालिक करार देते हुए छोड़ दिया गया तो बस मन में यही आया कि क्या से क्या हो गए हैं हम? जिस देश में नारी को पूज्या समझा जाता था और जिस देश में नारी के सम्मान की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने समुद्र पर पुल बना दिया था उस देश में नारी के साथ ऐसा व्यवहार... बातें राम मंदिर की हो रही हैं...कैसा राम मंदिर यार, जब आप अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहे तो क्या राम आएंगे....नहीं, हमें ही राम बनना होगा...बदलनी होगी यह व्यवस्था... आफरोज जैसे रावणों के वंशजों को हमें ही समाप्त करना होगा और अगर हम इस व्यवस्था को नहीं बदल सकते तो हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम किसी श्रीराम मंदिर की बात करें.... देवताओं का वास तो वहां होता है, जहां महिलाओं का सम्मान होता है।

कल मेरे एक अनुज पंकज ने एक ब्लॉग लिखा...(पंकज के ब्लॉग को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।) उसके अलावा कई छोटे भाई प्रदीप तिवारी जैसे कई लोग फेसबुक पर लगातार लिख रहे हैं कि देश संवेदनाओं से नहीं कानून से चलता है। मैं प्रदीप तथा पंकज की बातों से सहमत नहीं हूं। मेरा मानना है कि यह देश आज भी संवेदनाओं से चल रहा है। इस राष्ट्र का आधार संवेदना है। हम इंग्लैंड में नहीं रहते हैं जहां रिश्ते कानून आधारित होते हों। मेरा इनसे बहुत ही सीधा सा प्रश्न है कि क्या इनकी मां और पिता का रिश्ता कानून यानी लॉज आधारित है? मुझे पता है इसका जवाब नहीं ही होगा। जब इस देश में रिश्ते कानूनन नहीं बनते तो इस देश की बेटी की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने वाले को छोड़ने के पीछे कानून की दुहाई क्यों दी जा रही है, यह मेरी समझ से परे है। और सबसे बड़ी बात कि जो व्यक्ति बलात्कार जैसा कुकृत्य कर सकता है उसे नाबालिग किस आधार पर कहा जा रहा है।

सिर्फ एक यही मामला नहीं है, हाल ही में देश में अपराध दर पर एक रिपोर्ट आई है जो बताती है कि पिछले दस साल में नाबालिगों द्वारा किए गए संज्ञेय अपराधों में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जहां 2003 में नाबालिगों द्वारा किए गए अपराध के 17,819 मामले दर्ज किए गए, वहीं 2014 में यह संख्या बढ़ कर 38,586 हो गयी। दस साल पहले रेप के 466 मामले सामने आए थे, जबकि पिछले साल दर्ज हुए मामलों में 2,144 बलात्कार के हैं। अकेले दिल्ली में ही संख्या 140 रही।

आज जब इस देश के माननीय प्रधानमंत्री महोदय विश्व पटल पर बहुत ही गर्व से यह कहते हैं कि भारत एक युवा देश है तो उसका आधार होता है कि इस देश में लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या 18 की उम्र से कम है। तो क्या यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि 'भारत एक नाबालिग देश है।'

पढ़ें: आखिर क्यों होते हैं बलात्कार?

बलात्कार गंदी और निम्न स्तर सोच के कारण होते हैं। वह सोच उम्र नहीं देखती। भारत के बहुविध समाज में स्त्रियों का विशिष्ट स्थान रहा हैं। पत्नी को पुरूष की अर्धांगिनी माना गया हैं। वह एक विश्वसनीय मित्र के रूप में भी पुरूष की सदैव सहयोगी रही हैं। कहा जाता हैं कि जहां नारी की पूजा होती हैं वहीं देवता रमण करते है। नारी नर की खान है। वह पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील और विश्व के लिए करूणा संजोने वाली महाकृति है। एक गुणवान स्त्री काँटेदार झाड़ी को भी सुवासित कर देती हैं और निर्धन से निर्धन परिवार को भी स्वर्ग बना देती हैं।

भारतीय समाज में नारी का देवी स्वरूपा स्थान है। एक आदर्श नारी धैर्य, त्याग, ममता, क्षमा, स्नेह,समर्पण, सहनशीलता, करूणा, दया परिश्रमशीलता आदि गुणों से परिपूर्ण हैं। महादेवी वर्मा ने कहा है कि 'नारी केवल एक नारी ही नहीं अपितु वह काव्य और पे्रम की प्रतिमूर्ति हैं। पुरूष विजय का भूखा होता हैं और नारी समर्पण की' वास्तव में भारतीय नारी पृथ्वी की कल्पलता के समान हैं।

मैं मानता हूं कि मात्र उस बलात्कारी हत्यारे को सजा देने से बलात्कार जैसे अपराध नहीं रुकेंगे लेकिन दोस्तों, एक कठोर सजा देने से समाज में यह संदेश तो जरूर जाता कि यह देश ऐसे अपराधों के लिए माफी देने वाला शांतिप्रिय देश नहीं बल्कि अपने शरीर को छोड़ चुके लोगों भी को न्याय देने वाला न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के सिद्धान्तों का अनुपालक है। एक बात और ऐसे घृणित अपराधों के लिए मैं शरियत का समर्थन करता हूं और मुझे लगता है कि ऐसे बलात्कारियों को बस इस्लाम सजा दे सकता है।


 उस आंदोलन की कुछ तस्वीरें...




तत्कालीन जिलाधिकारी अनुराग यादव जी....

मेरी सहपाठी एवं एबीवीपी की कार्यकर्ता के लगी चोट...

तब लगा था जीत जाऊंगा....लेकिन....

सीएम आवास के अंदर पहुंचने के बाद कुछ ऐसी खुशी थी... 
आंदोलन के इतिहास में अभूतपूर्व परिवर्तन...
 
बच्चों से लेकर महिलाएं...सब छोड़कर आ गईं थी साथ...

पुलिस ने रोकने की कोशिश तो बहुत की लेकिन नहीं रोक लके....


छात्रनेता नितिन मित्तल के सवालों का जवाब तक नहीं था डीएम साहब के पास

सबके साथ...सब जगह...बस एक ही मांग...'हत्यारों को फांसी दो'

वंदे भारती

Sunday, 6 December 2015

कैसे राम, और कैसा मंदिर?


दोस्तों, आज से 23 साल पहले बाबरी ढ़ांचे जिसे कुछ अज्ञानी मस्जिद भी कहते हैं, उसे देश की जनता के एक वर्ग ने गिरा दिया। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि एक स्वतंत्र देश में गुलामी की कोई निशानी नहीं होनी चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि देश की सारी मस्जिदें तोड़ दो..अरे मस्जिद भी इस देश के नागरिकों की, हमारे भाइयों की इबादतगाह है, उसका सम्मान होना चाहिए। और इस देश के प्रत्येक नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि इस देश के नागरिकों के पूजन स्थल की, इबादतगाह की सुरक्षा करे। अब संभव है कि आपके मन में सवाल उठे कि जब आप मानते हैं कि मस्जिद नहीं टूटनी चाहिए तो फिर बाबरी के गिरने को सही कैसे ठहरा सकते हैं? तो दोस्तों, मैं आपको बता दूं कि पहली बात तो यह कि यह देश राम का देश है, बाबर का नहीं...अब इसे यह मत कहना कि मैं मुस्लिम विरोधी हूं... मैं चाहता हूं कि इस देश के लोगों के बीच चर्चाएं बाबर पर नहीं बल्कि इस देश के सबसे बड़े मुसलमान, एपीजे अब्दुल कलाम पर चर्चा पर हो, अशफाक उल्ला खां पर चर्चा हो। उन पर कोई उंगली उठाएगा तो इस देश के मुसलमानों के साथ नहीं बल्कि उनसे आगे खड़ा होकर उनका विरोध करूंगा जो इस देश की एकात्मता के आधार कलाम जैसे मुस्लिमों पर उंगली उठाएंगे और मैं ऐसा इस लिए करूंगा क्यों कि कलाम साहब सिर्फ मुसलमानों के नहीं अपितु इस देश के प्रत्येक नागरिक के हैं। ठीक इसी प्रकार राम सिर्फ हिंदुओं के नहीं अपितु प्रत्येक हिंदुस्थानी के हैं।

यह भी पढ़ें: कब बनेगा राम मंदिर

सांस्कृतिक आधार पर इस देश के मुसलमान जिन्ना के नहीं अशफाक उल्ला खां के वंसज हैं। जिनको इस भारत मां से प्यार नहीं था वे 1947 में ही यह देश छोड़कर जा चुके हैं। अब जो यहां पर हैं वे हमारे अपने हैं। अगर आप उन पर प्रश्नचिन्ह लगाना पूरी तरह से गलत होगा। मेरे इस कथन को इस रूप में ना लिया जाए कि मैं याकूब की शवयात्रा को निकालने वालों का समर्थन करता हूं। वे भटके हुए लोग हैं जो याकूब की शवयात्रा निकालते हैं। उन्हें सत्य से अवगत कराना होगा और वे यदि इस भारत भूमि के प्रति सम्मान ना रखें तो उन्हें पाकिस्तान मत भेजो बल्कि चौराहे पर खड़े करके गोली मार दो। राम तो हमारी अस्मिता के आधार हैं, राम तो वह हैं जो वनवास के समय जब दुनिया और मानवता के सबसे बड़े दुश्मन, रावण से युद्ध करने निकलते हैं तो एक राजकुमार होते हुए भी वे किसी राजा का साथ नहीं लेते बल्कि वंचितों को, वनवासियों को गले लगाते हैं।

राम का तो पूरा जीवन ही त्रासदीपूर्ण रहा। इसके बावजूद लोग राम की पूजा करते हैं। भारतीय मानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं; बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टता पूर्वक किया। अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा। मैंने ने राम को इसलिए पसंद किया, क्योंकि मैंने राम के आचरण में निहित सूझबूझ को समझा।

दरअसल, राम की पूजा इसलिए नहीं की जाती कि हमारी भौतिक इच्छाएं पूरी हो जाएं-मकान बन जाए, प्रमोशन हो जाए, सौदे में लाभ मिल जाए। बल्कि राम की पूजा हम उनसे यह प्रेरणा लेने के लिए करते हैं कि मुश्किल क्षणों का सामना कैसे धैर्य पूर्वक बिना विचलित हुए किया जाए। राम ने अपने जीवन की परिस्थितियों को सहेजने की काफी कोशिश की, लेकिन वे हमेशा ऐसा कर नहीं सके। उन्होंने कठिन परिस्थतियों में ही अपना जीवन बिताया, जिसमें चीजें लगातार उनके नियंत्रण से बाहर निकलती रहीं, लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने हमेशा खुद को संयमित और मर्यादित रखा। आध्यात्मिक बनने का यही सार है।

संत कबीर कहते हैं कि
राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप


अर्थात राम नाम को महत्व जाने बिना उसे जपना तो न जपने जैसा ही है क्योंकि जब तक मस्तिष्क पर देहाभिमान की छाया है तब तक अपने पापों से छुटकारा नहीं मिल सकता।

इस संसार में चार राम हैं-

एक राम दशरथ का बेटा , एक राम घट घट में बैठा !
एक राम का सकल पसारा , एक राम है सबसे न्यारा !


संसार में चार राम हैं ! जिनमें से तीन को हम जगत व्यवहार में जानते हैं पर चौथा अज्ञात राम ही सार है । उसका विचार करना चाहिये । एक दशरथ पुत्र राम को सभी जानते हैं और एक जो प्रत्येक जीवात्मा के घट ( शरीर ) में विराजमान है तथा एक ये जो समस्त ( सकल ) दृश्य अदृश्य सृष्टि है , ये ( विराट पुरुष ) राम ही है - राम में ही है । लेकिन इन सबसे परे जो चौथा ( आत्मा ) राम है । वही हमारा और इन सबका सार है । अतः उसी को जानना उत्तम है।



इसलिए मैं उस राम का मंदिर चाहता हूं जो हिंदुओं के नहीं बल्कि प्रत्येक भारतीय के हैं। भाजपा ने तो हमारे राम को भरे बाजार बेच दिया और आज भी उन्ही राम पर राजनीति करना चाहती है, लेकिन यह देश सब समझता है। इस देश की जनता को जब मंदिर बनाना होगा, मंदिर बन जाएगा। मंदिर बनाने के लिए इस देश के 125 करोड़ भारतीयों को किसी 'दल' की जरूरत नहीं लेकिन हां 'दल' को अवश्य इस देश के लोगों की जरूरत होगी। जब इस देश का प्रत्येक 'भारतीय' यह कहेगा कि मंदिर बने तब मंदिर बनना चाहिए और जिसे राम स्वीकार नहीं उसे स्वयं को भारतीय कहलाने का भी अधिकार नहीं। शब्द पर ध्यान दीजिएगा मात्र प्रत्येक 'भारतीय'।

यह भी पढ़ें: कब बनेगा राम मंदिर

वंदे भारती

Friday, 27 November 2015

एक मुस्लिम लड़के का आमिर को करारा जवाब

एक ओर जहां देश में तथाकथित 'असहिष्णुता' को लेकर माहौल गरम दिख रहा है वहीं दूसरी ओर एक वर्ग ऐसा भी है जिसे देश देश के माहौल से कोई समस्या नहीं है। कल कुछ सर्च करते करते अचानक मेरी नजर quora.com की एक पोस्ट पर गई। उस पोस्ट को पढ़कर मुझे लगा कि आखिर कोई कैसे यह कह सकता है कि इस देश में असहिष्णुता बढ़ रही है। एक मुस्लिम लड़के ने यह पोस्ट लिखी तो काफी समय पहले थी लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में यह बिलकुल सटीक बैठती है। वर्तमान परिदृश्य के अनुसार बेहद प्रासंगिक लगने वाली वह पोस्ट अंग्रेजी भाषा में लिखी गई थी। उस पोस्ट को मैं हिन्दी भाषा में आपके सामने रख रहा हूं। इस पूरे विषय पर मेरा क्या विचार है उसे आप लेख के अंत में पाएंगे। वेबसाइट पर प्रश्न पूछा गया था कि एक भारतीय मुसलमान के तौर पर आपको किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा है?
पोस्ट के जवाब में सैयद नासिर ने जो कुछ लिखा वह भारत की गंगा जमुनी तहजीब को बताता है। नासिर लिखता है कि मेरे साथ एक बार नहीं कई बार भेदभाव हुआ है।

रमजान के महीने में जब मेरे दोस्‍त अपने व मेरे बीच भेदभाव करते हुए कहते हैं कि तुम घर जाओ हम काम संभाल लेंगे।

रमजान की एक शाम एक गैर मुस्‍लिम दोस्‍त ने अपने व मेरे घर के बीच भेदभाव किया। उसने कहा कि आज हम प्रॉजेक्‍ट वर्क तुम्‍हारे घर पर निपटाएंगे, चूंकि रमजान है और मैं तुम्‍हारे घर पर बने लजीज व्‍यंजनों का स्‍वाद मिस नहीं करना चाहता।

जब भी शराब पीने वाले दोस्‍तों के साथ पार्टी होती है तो वह मेरे साथ भेदभाव करते और मेरे लिए सॉफ्ट ड्रिंक लाना नहीं भूलते।

जब भी हम कहीं बाहर नॉन वेज खाने का प्‍लान बनाते हैं। तो मेरे दोस्‍त रेस्‍तरांओं के बीच भेदभाव करते हैं। वे वहीं जाते हैं जहां उन्‍हें मेरे लिए हलाल फूड मिलने का यकीन होता है।

हर शुक्रवार को मुझे अपने और गैर मुस्‍लिम दोस्‍तों के बीच भेदभाव महसूसत होता है। जब मुझे नमाज के लिए जाने की इजाजत होती है और वे उस आधे घंटे के दौरान काम कर रहे होते हैं।

तफरी के दौरान भी मुझसे भेदभाव होता है। अगर माहौल है तो मुझसे उर्दू शायरी सुनाने की उम्‍मीद की जाती है।

हर बार घर जाते समय मुझे भेदभाव का सामना करना पड़ता है। वापस आने पर मुझसे ढेर सारी बिरयानी लाने की उम्‍मीद की जाती है। किसी और के साथ ऐसा नहीं होता। यह भेदभाव है।

हर रोज जब दोपहर के वक्‍त वर्कप्‍लेस पर अपनी टेबल के करीब नमाज के वक्‍त मेरे साथी बाहर चले जाते हैं। जिससे कि उन पांच मिनटों के दौरान लंच की उनकी गपशप से मैं डिस्‍टर्ब न हो जाऊं।

नासिर ने आगे लिखा कि बहरहाल अगर साफ शब्‍दों में कहूं तो मुझे याद नहीं आता कि कभी मेरे साथ कहीं पर भी भेदभाव हुआ। मुझे नौकरी बिना किसी परेशानी के और प्रमोशन टैलेंट के दम पर मिला। इस्‍तीफा भी बिना किसी विवाद के दिया। मैं अपने करियर में बिना यह इस फीलिंग के साथ आगे बढ़ सकता हूं कि अपने धर्म के चलते मैंने कोई अवसर खो दिया।

नासिर लिखता है कि कुछ मुस्‍लिम दोस्‍तों ने जरूर मुझे बताया कि उन्‍हें नए शहर में किराए का मकान मिलने में तकलीफ होती है। मेरा मानना है कि ऐसा मकानमालिकों के मुस्‍लिमों को नापसंद करने की बजाय नॉन वेजिटेरियंस को मकान न देने के चलते हो सकता है। मांस मच्‍छी न खाना उनके धर्म का हिस्‍सा होगा और संभव है वह अपने घर में मांस न चाहते हों। ऐसे लोगों को दरकिनार कर आगे बढ़िए। आखिर आपका इरादा मकानमालिक की बेटी से शादी करने का तो नहीं है। संभव है आप अपने धर्म को लेकर कांशियस हो रहे हैं, जिसके चलते लगने लगा है कि सिर पर लगी टोपी की वजह से एयरपोर्ट पर ज्‍यादा तलाशी या ट्रैफिक पुलिस वाला रोक रहा है। इन्‍हें इग्‍नोर कर आगे बढ़िए। भारत में आगे बढ़ने के लिए आपके पास पर्याप्‍त मौके हैं।
सिविल सर्विस एग्‍जामिनेशन से लेकर सॉफ्टेवेयर इंडस्‍ट्री में नौकरियों तक, पर्याप्‍त व ट्रांसपेरेंट रास्‍ते हैं जहां आप अपने को साबित कर सकते हैं। उन पर ध्‍यान केंद्रित करिए बजाय यह सोचने कि मेट्रो में बैठी महिला आपको दाढ़ी के चलते देख रही थी। अपने गैर मुस्‍लिम दोस्‍तों के सवालों का जवाब दीजिए जो वह अकसर किसी दुर्भावना नहीं बल्‍कि क्‍यूरियोसिटी के चलते पूछ रहे होते हैं। मुस्‍कुराते रहिए। अपने धर्म व उसकी हीलिंग व अच्‍छाई को बढ़ावा देने की ताकत में यकीन करिए। आपका वक्‍त अच्‍छा गुजरेगा।

नासिर ने अपने जवाब के अंत में 'प्राउड एंड हैप्‍पी टू बी इंडियन। जय हिंद' लिखा है।


दोस्तों, इस उत्तर को पढ़कर मुझे ह्रदय से बहुत ही खुशी हुई। अगर हम मुस्लिम्स से यह अपेक्षा करते हैं कि वे गैर मुस्लिमों के बारे में वैसे ही विचार रखें जैसे कि नासिर के हैं तो दोस्तों हमें भी मुस्लिमों के साथ वैसा ही व्यवहार करना होगा जैसा कि नासिर के मुस्लिम परिचितों ने उसके साथ किया। दोस्तों, जो मुस्लिम आज इस देश में रह रहे हैं वे तुर्की या अरब से नहीं आए हैं बल्कि वे सभी यहीं के हैं लेकिन इस देश के कुछ लोग ऐसा मान कर बैठे हैं मुसलमान का मतलब गद्दार और जब उनके सामने एपीजे अब्दुल कलाम या अशफाक उल्ला खान का नाम लो तो वे बहुत आसानी से सवाल को टालते हुए इन नामों को अपवाद करार देते हैं।

दोस्तों, एक चौपाई है, जाकी रही भावना जैसी, रघु मूरति देखी तिन तैसी। बिलकुल वैसी ही स्थिति है, आप जिस रूप में जिसे देखेंगे वैसे ही वे दिखेंगे। आप एक मुसलमान में अगर लादेन देखेंगे तो वह आपको वैसा ही दिखेगा और अगर उसी मुसलमान में आप एपीजे अब्दुल कलाम को देखने की कोशिश करेंगे तो निश्चित ही आपकी अपेक्षानुसार वह व्यक्ति एपीजे कलाम बनने की कोशिश करेगा। हमारे पुराणों में आकर्षण के सिद्धान्त की बात की गई है, वही तो है यह।

और दोस्तों, अगर कोई व्यक्ति इतना गिरा हुआ है कि वह इस देश की माटी के साथ गद्दारी करने के बारे में सोच रहा है तो उसे जेल में मत डालो बल्कि चौराहे पर गोली मार दो, लेकिन उस व्यक्ति को इस्लाम से मत जोड़ो और इसके साथ इतनी हिम्मत भी रखो कि अगर कोई ऐसा व्यक्ति जो भगवा कपड़े पहन कर इस देश को तोड़ने की साजिश करे तो उसे भी उतनी ही बर्बरता से मारने की हिम्मत रखो। और दोस्तों भगवा पहन कर देश तोड़ने की बात करने वाला एक बड़ा नाम तथाकथित स्वामी अग्निवेश का है। मेरा मानना है कि जो राष्ट्र और मातृभूमि को सर्वप्रथम ना माने वह भले ही दिन में 50 बार मंदिर जाता हो लेकिन उसे हिंदू नहीं कहा जा सकता। यह सिद्धान्त मेरा अपना नहीं है अपितु यह सिद्धान्त तो हमारे पूर्वज श्री रामचन्द्र जी ने दिया था। याद है ना आपको श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा था, "अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥" अभी हाल ही में हुए पेरिस हमले के बाद अपने एक मुस्लिम मित्र दानिश से मैंने पूछा कि भाई यह कैसा इस्लाम है तो दानिश ने कहा कि जो मजमूलों का कातिल है वह मुसलमान नहीं हो सकता। उसके जवाब से मुझे एहसास हुआ कि हम दोनों के विचार तो एक ही हैं।
इस ब्लॉग को एक अपेक्षा के साथ लिख रहा हूं... मेरी अपेक्षा यह है कि आने वाले कुछ समय में इस देश का प्रत्येक मुसलमान जब भारत से कहीं बाहर जाए तो वह कहे कि भारत के 25 करोड़ मुसलमान 100 करोड़ सनातनियों की सुरक्षा में रहते हैं और जब कोई सनातनी कहीं बाहर जाए तो वह कहे कि भारत के मुसलमान हमसे पहले मां भारती की रक्षा में अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार खड़े रहते हैं तथा जब तक भारत में ईमान के पक्के ये 25 करोड़ मुसलमान हैं तब तक भारत का कोई कुछ नहीं कर सकता।

इसी अपेक्षा के साथ वन्दे भारती...

Thursday, 26 November 2015

खड़गे जी, कुछ पढ़कर आओ..

अभी अभी कांग्रेस के एक बड़े नेता तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने राजग के सांसदों से कहा, 'तुम, आर्य तो बाहर से आए थे, हम इस देश के हैं...' मुझे समझ नहीं आता ऐसे अज्ञानी लोग क्यों इस देश में रह रहे हैं। जिन्हें इस देश की संस्कृति, इस देश के इतिहास का ज्ञान नहीं वह क्यों लोकसभा में पहुंच जाते हैं? और इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देश के नागरिक ऐसे कुत्सित विचारों वाले लोगों को अपना नेता चुन लेते हैं।

दोस्तों, आर्य शब्द वेदों मे वर्णित हैं यह संस्कृत का शब्द हैं, जिसका अर्थ होता हैं “श्रेष्ठ” या “नेक”। सृष्टि की आदि से वेदों के आदेशो का पालन करने वाले मनुष्य आर्य कहलाते आये हैं। अंग्रेजी और वामपंथी इतिहास में देश को तोड़ने की बड़ी साजिशें की गईं। इस देश में दो प्रकार के संप्रदाय बहुत ही पुराने समय से चल रहे हैं एक वैष्णव तथा दूसरा शैव। वैष्णव, भगवान विष्णु के पूजकों को तथा शैव, भगवान शिव के पूजकों को कहा जाता है। आर्य का अर्थ स्पष्ट रूप से वैष्णव और द्रविड़ का अर्थ शैव है। अंग्रेजों के समय मैकॉले और मैक्समूलर जैसे लोगों ने षणयंत्र रचकर यह प्रचारित किया कि आर्य बाहर से आये थे। उनका उद्देश्य था कि इस तरीके से भारत मे फूट डालो राज करो की निति के आधार पर शासन किया जाए।

ऋग्वेद में एक वेद मंत्र आता है,
अहं भूमिददामार्यायाहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याम् ।
अहमपो अनयं वावशाना मम देवासो अनु केतामायन् ॥
ऋग्वेद  4/26/2
अर्थात् (ईश्वर कहते हैं) मैं आर्य के लिए भूमि देता हूँ । मैं दानशील मनुष्य के लिए धन की वर्षा करता हूँ । मैं घनघोर शब्द करनेवाले बादलों को धरती पर वर्षाता हूँ । विद्वानलोग मेरे ज्ञान (उपदेश)के अनुसार चलते हैं ।
इस वेद मन्त्र में बतलाया गया है कि ईश्वर आर्य के लिए ही अर्थत अच्छे उत्तम मनुष्यों के लिए ही भूमि और धन देता है। वर्षा करता है और ज्ञान देता है।
इस पंक्ति को सामान्य तौर पर ना लें। इसका स्पष्ट अर्थ है कि ईश्वर ने यह भूमि श्रेष्ठ लोगों को दी है। खुद ही सोचिए अपनी बनाई चीज किसको दी जाती है?

'कृण्वन्तो विश्वार्यम' तो आप सबने पढ़ा ही होगा। यह ऋग्वेद के एक मंत्र का एक हिस्सा है। ऋग्वेद में कहा गया है -
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ।
अपघ्नन्तो अराव्ण: ॥
ऋग्वेद 9/63/5

अर्थात् - आत्मा को बढ़ाते हुए दिव्य गुणों से अलंकृत करते हुए तत्परता के साथ कार्य करते हुए अदानशीलता को , ईर्ष्या , द्वेष , द्रोह की भावनाओं को , शत्रुओं को परे हटते हुए सम्पूर्ण विश्व को , समस्त संसार को आर्य बनाएं। आर्य कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है जिसे आप यह कह दें कि वेद, धर्म परिवर्तन या जाति परिवर्तन के लिए कहा  जा रहा है। कितनी सुंदर बात है कि संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाएं, सम्पूर्ण विश्व को नेक बनाएं। हमें गर्व होना चाहिए कि हम ऐसी संस्कृति के संवाहक हैं जो नेक बनाने पर जोर देती है। हमारी संस्कृति यह नहीं कहती कि दुनिया को मूर्ति पूजक बनाओ, बल्कि श्रेष्ठ बनने और बनाने को कहती है। आर्य यदि जाति होती तो लोग कहते मैं आर्य हूं लेकिन इतिहास में किसी ने यह नहीं कहा कि मैं आर्य हूं। रामायण महाभारत मे भी आर्य का सम्बोधन आया है। मगर क्या यह संबोधन क्या किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए था? या उस समय के लोग खुद को आर्य (श्रेष्ठ) कहते थे? बिल्कुल नहीं उस समय भी दूसरों के द्वारा भी “आर्यपुत्र” “आर्यमाता” “आर्यपत्नी” का संबोधन मिलता है। एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है जिसमें किसी ने खुद को आर्य कहा हो।

श्रीमद्भगवद्गीता में आर्य शब्द का प्रयोग
भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन से कहा है -
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकिर्तिकरमर्जुन ।।
श्री मद्भग्वद गीता 2/2

अर्थात - हे अर्जुन ! तुम को विषम स्थल में यह अज्ञान किस हेतु से प्राप्त हुआ है , क्यों कि यह न तो आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषों का प्रिय व उन द्बारा अपनाया गया है ।न स्वर्ग देनेवाला है और न कीर्ति को करनेवाला है ।
यह सभी जानते हैं की अर्जुन मोह में पड़कर अपना कर्तव्य - कर्म भूल चुके थे और भिक्षा का अन्न खाने के लिए तैयार था । अपने धर्म को छोड़कर निन्दित कर्म करने के लिए तैयार था। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने उसे अनार्य कहा है। और आर्यों के गुण अपनाने के लिए ही उसे पूरे गीता का उपदेश दिया है। श्री कृष्ण आर्य थे - अर्जुन आर्य था। जब अर्जुन आर्य के कर्तव्य कर्म को छोड़कर उसके विपरीत कर्मों को अपनाने लगा तो श्री कृष्ण ने अर्जुन को धिक्कारा और आर्य अर्थात श्रेष्ठ बने रहने के लिए उपदेश दिया।

रामायण में भी आर्य शब्द का प्रयोग
 
वाल्मीकि रामायण में आर्य शब्द का अनेक बार प्रयोग हुआ है ।
भगवान राम के गुणों का वर्णन करने के पश्चात वाल्मीकि मुनि से नारद जी कहते हैं -
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रिय दर्शनः ॥ 1/16
वे आर्य एवं सब में समान भाव रखनेवाले हैं । उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है ।
एक मनुष्य में जितने अच्छे गुण होने चाहिए उन गुणों का वर्णन भगवान श्री राम में करने के पश्चात नारद जी उन्हें आर्य कहते हैं ।

आधुनिक विद्वान आर्य शब्द का प्रयोग इन्हीं अर्थों में करते हैं । भारत के मूल निवासी जितने भी हैं वे आर्य हैं ।
महाकवि मैथिलिशरण गुप्त ने भारत - भारती में लिखा है -
जग जान ले कि न आर्य केवल नाम के ही आर्य हैं ।
वे नाम के अनुरूप ही करते सदा शुभ कार्य हैं ॥

दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य शब्द की व्याख्या (meaning of arya) में कहा है कि “जो श्रेष्ठ स्वभाव, धर्मात्मा, परोपकारी, सत्य-विद्या आदि गुणयुक्त और आर्यावर्त (aryavart) देश में सब दिन से रहने वाले हैं उनको आर्य कहते है।”
इतने प्रमाणों के बाद भी कुछ लोग इस देश की एकात्मता को तोड़ने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि हम इस प्रकार के कुत्सित प्रयासों में फंसते जा रहे हैं। मैं मात्र इतना कहना चाहता हूं कि इस भारत माता की गोद में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति आर्य अर्थात श्रेष्ठ है क्यों कि उसने इस पतित पावनी भारत भूमि पर जन्म लिया है।

वन्दे भारती


Friday, 13 November 2015

आत्मपरीक्षण भाग- 2


आत्मपरीक्षण भाग- 1 से आगे...

दोस्तों, हिंदू कभी आतंकी नहीं हो सकता, हिंदुत्व कट्टर नहीं है, हिंदुत्व वीर है। जो कट्टरता की बात करे वो हिन्दू नहीं है। यह बात मैं उसी आधार पर कह रहा हूँ जिस आधार पर मैं यह कहता हूँ कि आतंकवादी मुसलमान नहीं हो सकता। बिना गीता पढ़े , बिना उसका अनुपालन किए हम स्वयं को कृष्ण के वंशज कहलाने के अधिकारी नहीं हैं। गीता में स्पष्ट लिखा है कि धर्म युद्ध में निरपेक्षता का कोई स्थान नहीं है। आज आवश्यकता धर्म निरपेक्षता की नहीं धर्म परायणता की है लेकिन धर्म परायण होने के लिए धर्म का मूल चरित्र समझ लें।


धर्म को पूजा पद्धति समझ लिया तो गीता का पूरा सिद्धांत फेल हो जाएगा। आपका दायित्व की आपका धर्म है, मेरा राष्ट्र के प्रति एक पत्रकार के रूप में बिना किसी प्रतिबद्धता के विषय रखना ही धर्म है। माता पिता के प्रति उनके बेटे के रूप में उन्हें अपेक्षानुरूप सुविधाएँ एवं आत्मिक शांति देने का प्रयास करना ही मेरा धर्म है। विद्यार्थी के प्रति एक गुरु के रूप में अपने ज्ञान को बिना किसी लालच और अपेक्षा के विस्तृत करना ही मेरा धर्म है। अपने छोटे भाई के प्रति एक बड़े भाई के रूप में उसे अपने अनुभव के आधार पर सही गलत का रास्ता दिखाना ही मेरा धर्म है। परिस्थिति के अनुरूप धर्म बदल जाता है लेकिन धर्म का मूल चरित्र नहीं बदलता। धर्म की बहुत ही सुंदर व्याख्या मनुस्मृति में की गई है। मनु स्मृति में मनु कहते है:
आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च समानमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

अर्थात अगर किसी मनुष्य में धार्मिक लक्षण नहीं है और उसकी गतिविधी केवल आहार ग्रहण करने, निंद्रा में,भविष्य के भय में अथवा संतान उत्पत्ति में लिप्त है, वह पशु के समान है क्योंकि धर्म ही मनुष्य और पशु में भेद करता हैं|
इसके आगे मनु धार्मिक शब्द की व्याख्या करते हैं। मनु स्मृति में मनु आगे कहते है कि

धृति क्षमा दमोस्तेयं, शौचं इन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो, दसकं धर्म लक्षणम ॥


धृति = प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धैर्य न छोड़ना , अपने धर्म के निर्वाह के लिए
क्षमा = बिना बदले की भावना लिए किसी को भी क्षमा करने की
दमो =  मन को नियंत्रित करके मन का स्वामी बनना
अस्तेयं = किसी और के द्वारा स्वामित्व वाली वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग नहीं करना, यह चोरी का बहुत व्यापक अर्थ है , यहाँ अगर कोई व्यक्ति किसी और व्यक्ति की वस्तुओं या सेवाओं का उपभोग करने की सोचता भी है तो वह धर्म विरूद्ध आचरण कर रहा हैं
शौचं = विचार, शब्द और कार्य में पवित्रता
इन्द्रियनिग्रहः= इंद्रियों को नियंत्रित कर के स्वतंत्र होना
धी = विवेक जो कि मनुष्य को सही और गलत में अंतर बताता हैं
र्विद्या = भौतिक और अध्यात्मिक ज्ञान
सत्यं = जीवन के हर क्षेत्र में सत्य का पालन करना, यहाँ मनु यह भी कहते है कि सत्य को प्रमाणित करके ही उसे सत्य माना जाए
अक्रोधो = क्रोध का अभाव क्योंकि क्रोध ही आगे हिंसा का कारण होता हैं
यह दस गुण मनुष्य को पशुओं से अलग करते हैं। यदि किसी व्यक्ति में यह गुण नहीं हैं तो वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है। इन 10 गुणों का अनुपालन करने वाला व्यक्ति ही धार्मिक कहा जाता है। इस प्रकार के धर्म के प्रति परायणता परम आवश्यक है और मुझे लगता है कि किसी भी पूजा पद्दति को मानने वाला व्यक्ति इन गुणों को सांप्रदायिक या कट्टर नहीं कहेगा।

पढ़ें: हां मैं पत्रकार हूं और राष्ट्रवादी हिंदू भी...
दोस्तों,12 जुलाई 2013 को रायटर्स को दिए गए एक साक्षात्कार में नरेन्द्र मोदी जी ने कहा कि वह हिंदू राष्ट्रवादी हैं। उस दिन के बाद से ही मैंने सोशल मीडिया पर उनके समर्थन में लिखना शुरू किया। 20 जून 2011 को मैंने फेसबुक पर विश्व गौरव राष्ट्रवादी हिन्दू नाम से अपना एक पेज बनाया था। मेरे लिए हिंदू और राष्ट्रवाद की परिकल्पना पूर्णतः स्पष्ट थी। मैं हिन्दू शब्द को एक राष्ट्रीयता मानकर कर स्वयं को हिन्दू कहता हूं। जहां तक रिलिजन की बात है तो इस शब्द में मेरा विश्वास नहीं है। रिलीजन तो विभेद पैदा करता है और धर्म विभेद समाप्त करने का। मैं धार्मिक हूं और अपेक्षा करता हूं कि यदि धर्म की इस वास्तविक परिकल्पना को तथाकथित नास्तिक ने समझ लिया तो वह स्वयं को धार्मिक ही मानेगा। फिर वह कभी यह नहीं कहेगा कि वह नास्तिक है। हम अपने विषय को स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं इसका एकमात्र कारण है संवाद की कमी। संवाद होते रहना चाहिए, संवाद के बिना यह दुनिया समाप्त हो जाएगी।

पढ़ें: कुछ सवाल जो शायद आपको भी परेशान करते होंगे...

मैं संघ के वर्गों में भी गया हूं, शारीरिक से अधिक बौद्धिक विषयों पर ध्यान दिया। विद्यार्थी जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में काम किया। विद्यार्थियों का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मिली तो विद्यार्थी नवजागृति मंच में प्रदेश प्रवक्ता, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय अध्यक्ष के दायित्व का निर्वहन किया। बाबा जी भाजपा और चाचा जी सपा से जुड़े हैं इस नाते राजनीति को समझने का अवसर मिला। कई करीबी परिचित कांग्रेस और वामपंथी संगठनों से भी जुड़े हैं इस लिए उनको भी समझा। दोस्तों लेकिन इन सभी विचारधाराओं को उसी रूप में स्वीकार नहीं किया जैसी यह प्रदर्शित होती हैं। इनके बारे में पढ़ा, मैंने दीनदयाल जी के साथ मार्क्स और लेनिन को भी पढ़ा। मैनें एक लड़की से प्रेम भी किया, उसके दूर जाने के बाद आज भी शायरियां लिखता हूं लेकिन एक प्रेमी के रूप में मैंने रांझा, महिवाल को आदर्श नहीं माना। मेरे प्रेम के आदर्श श्री राम बने जिन्होंने अपने प्रेम की रक्षा के लिए समुद्र पर भी पुल बना दिया।

पढ़ें: हां, मैं भी एक लड़की से प्रेम करता हूं

दोस्तों, मैं यह नहीं कहता कि आप मेरे विचारों से पूर्णतः सहमत हों लेकिन मैं इतना जरूर चाहता हूं कि अपने विवेक का इस्तेमाल करके विषयों का विश्लेषण अवश्य करें.... विषय मात्र इतना है कि भक्ति ठीक है लेकिन अंधभक्ति उचित नहीं। दोस्तों, बस इतना याद रखना कि अगर इंग्लैंड के पास अतीत की शक्ति है, अगर जापान के पास तकनीक की शक्ति है, अगर चीन के पास श्रम की शक्ति है, अगर अमेरिका के पास डॉलर की शक्ति है तो भारत के पास मात्र परिवार और संस्कार की शक्ति है। हमने अगर अपनी इस शक्ति को खो दिया तो संभव है कि हम अमेरिका, चीन और जापान जैसे बन जाएं लेकिन इतना याद रखना आज से 100 साल के बाद आपकी उस समय की पीढ़ी के बारे में यही कहा जाएगा कि इनका देश बिलकुल चीन,अमेरिका या जापान जैसा है। कोई यह नहीं कहेगा कि इनका देश भारत है। दोस्तों, भारत को अमेरिका, जापान, चीन नहीं बल्कि भारत बनाने के लिए एक जुट हो जाओ...
वन्दे भारती




आत्मविश्लेषण भाग-1


आज पत्रकारिता के क्षेत्र के एक महान व्यक्तित्व से बातचीत हुई। उनकी बातों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि फेसबुक या ट्विटर पर मैं जो कुछ भी लिखता हूं क्या वह उसे पढ़नें वालों तक उसी रूप में पहुंचता है। उनसे चर्चा के बाद इस विषय पर मैंने अपने कई सोशल मीडिया के मित्रों से बात की। उनमें से जो लम्बे समय से मुझसे जुड़े थे उन्होंने तो वही बातें कहीं जो मैं सोचता हूं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन बातों को नकारात्मक रूप में ले लेते हैं। मैं क्या हूं? मैं क्या सोचता हूं? मेरे विचारों का आधार क्या है? इन बातों को मुझ से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। मैं जब भी मोदी या भाजपा के खिलाफ लिखता हूँ तो लोग उसे दिखावा करार देते थे, लोग कहते थे कि विश्व गौरव जी आप पत्रकारिता से जुड़ गए इस लिए खुद को निष्पक्ष साबित करने के लिए यह सब लिख रहे हो।

 


यहां तक कह दिया जाता है कि तुम सेक्युलर बन रहे हो। मैं कभी सेक्युलर बनने की कोशिश नहीं करता, बल्कि मेरी कोशिश रहती है कि मैं धर्मपरायण बनूं। पत्रकारिता मेरा धर्म है और उस धर्म को निभाते हुए यदि सत्ता के सिंहासन पर बैधा व्यक्ति कुछ गलत करता है तो मैं उसकी आलोचना करता हूं।
दोस्तों इस देश के अंदर जितनी भी समस्याएं चल रही हैं उन सबका एक मात्र कारण है संवाद की कमी। मैंने पहले भी लिखा है कि डायलॉग बहुत जरुरी है। मेरा मानना यह है कि यदि आप बात ही नहीं करेंगे, संवाद ही नहीं करेंगे तो आपको अपनी वास्तविकता या आपकी कार्यपद्धति के वास्तविक प्रभाव का पता कैसे चलेगा? आप एक ओर कहते हो मदरसों में आतंकवाद पढ़ाया जाता है दूसरी ओर उन्हीं मदरसों से एपीजे अब्दुल कलाम निकलते हैं।

आप कहते हो आरएसएस आतंकवादी संगठन है, उसी संगठन का एक स्वयंसेवक विदेशों में इस देश का प्रतिनिधित्व कर रहा है। यदि इन दोनों बातों को कहने वाले लोगों के बीच में संवाद रहा होता तो शायद इस देश को और भी कई कलाम और मोदी मिल जाते। इस दुनिया में मात्र दो पक्ष होते हैं सत्य और असत्य। सत्य की ओर खड़ा व्यक्ति मदरसों से भी निकल सकता है और असत्य की ओर खड़ा होने वाला व्यक्ति अर्थात अपने पूर्वजों के नाम पर राजनीति करने वाला, उनकी कसमें खाने वाला, उन्हें एक मुद्दा बना देने वाला व्यक्ति भी संघ का एक तथाकथित स्वयंसेवक हो सकता है।



पढ़ें: नितिन गडकरी से एक सवाल

मेरे विचार एकदम स्पष्ट हैं कि यदि वास्तव में हम चाहते हैं कि भारत विश्वगुरु के पद पर पुनर्स्थापित हो तो उसके लिए हमें अपने विवेक का उपयोग करना होगा। रावण के राज्य में भी विभीषण को इतनी स्वतंत्रता थी कि वह श्री राम के भजन करते थे। किसी भी पूजा पद्धति पर आघात गलत होगा। बेहतर होगा कि सभी पूजा पद्धतियों से राष्ट्र को सर्वोपरि, मानवता को सर्वोपरि मानने वाले लोग एक ओर और अन्य किसी शक्ति में विश्वास रखने वाले लोग दूसरी ओर रहें। इस संस्कृति ने सभी को समाहित किया है अपितु इस वर्त्तमान भारत में ही हजारों तरह की संस्कृतियाँ आज भी हैं। हमें विविधताओं का देश कहा जाता है। कुछ विविधताओं को और स्वीकार करो और उन सभी में जो उचित और आवश्यक लगे उसे अपनाकर स्वयं को और मजबूत करो। हम सब में बराबर शक्ति है बस आवश्यकता है उसे पहचानने की। अगर अपनी ऊर्जा का दुरप्रयोग कर दिया जो हमारी आने वाली पीढ़ी हमें गालियां देगी। अकेला मोदी कुछ नहीं करेगा, हम सबको एक साथ मिलकर काम करना होगा। प्रत्येक पूजा पद्धति के अच्छे लोगों को काम करना होगा।

अभी एक पोस्ट के कमेंट बॉक्स में दो वर्ग बंटे हुए थे, एक कह रहा था कि हिन्दू एक हुआ है तब मोदी आए दूसरा कह रहा था अगर मुसलमानों ने वोट नहीं दिया होता तो मोदी नहीं आते।
मैंने दोनों पक्षों के लोगों को व्यक्तिगत सन्देश भेजकर पूछा कि क्या आपके मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान या जन धन योजना की 100 प्रतिशत सफलता बिना मुस्लिमों के सहयोग के हो जाएगी और क्या बिना एक भी हिंदू के सहयोग के इस देश के पूरे मुसलमान एक होकर किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना सकते हैं। दोनों का जवाब ना ही है। आज जब एक होने का समय है तो एक हो जाओ। जब तक एक नहीं होगे तब तक भारत को विश्व गुरु बनाने के बारे में सोचना मात्र छलावा है।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सत्ता के साथ विपक्ष भी पूर्ण रूप से साथ खड़ा हो। दोस्तों, एक बार सोच कर देखो कि अगर प्रधानमंत्री जन धन योजना या स्वच्छ भारत अभियान शुरू करते हैं और सोनिया गांधी,राहुल,मुलायम,लालू नितीश सब यह कह दें कि सभी को अकाउंट खुलवाना है या सफाई करनी है तो इन योजनाओं का पूरा होना कितना आसान हो जाएगा।





विपक्ष का काम विरोध करना नहीं होता, विपक्ष का काम सत्ता पक्ष को भटकने से बचाने का होता है। मात्र 31 प्रतिशत वाला जो कह दे वह सही,इसको आधार मानकर नहीं चलना होगा। 69 प्रतिशत के वर्ग के सहयोग की आवश्यकता अवश्य पड़ेगी। मैं संघ का स्वयंसेवक हूँ, हालांकि काम की वजह से नियमित शाखा नहीं जा पाता लेकिन 14 वर्ष के स्वस्तरीय सक्रिय कार्य और संघ के वर्गों से यही सीखा है कि सत्य के साथ खड़े रहना है। संघ के वर्ग में एक बार तत्कालीन सरसंघचालक पूजनीय सुदर्शन जी ने कहा था कि यदि कांग्रेस हमारे विचारों का समर्थन करे तो हम उसके साथ हैं। डॉक्टर साहब ने भी कांग्रेस में काम किया था और जब विचार पसंद नहीं आए तो छोड़ दिया। संघ के इस विचार को मानता हूँ कि यदि कोई अच्छा कर रहा है तो उसे अंगीकार करो। मात्र इस लिए आप उसके अच्छे कामों का  विरोध शुरू कर दो क्यों कि वह आपका समर्थक नहीं है। ऐसा करना निश्चय ही गलत होगा।

पढ़ें: अब बस करो ओवैसी, नहीं तो...

दोस्तों, इस देश का सांस्कृतिक आधार श्री राम,कृष्ण और हरिश्चंद्र हैं यदि वास्तव में आप संस्कृति के संरक्षक हो तो उनके समय में एक दूसरे के प्रति जैसा प्रेम और जैसा विश्वास था वैसा पैदा करो। इसे और आसानी से समझिए श्री राम के समय कार नहीं थी तो क्या आप संस्कृति के नाम पर कार नहीं चलाओगे? कार चलाओ लेकिन अपने मन में माता पिता के प्रति श्री राम जैसा आदर रखो। राम को अपने जीवन में उतारो और जिस दिन राम इस देश के नागरिकों के मन में उतर जाएँ उस दिन मंदिर बनाओ और दुनिया के सामने कहो कि देखो हम अपने आदर्शों, अपने पूर्वजों के आदर्शों पर चल रहे हैं। हमने राम को पढ़ा तो लेकिन समझा नहीं। हम कहते रहे कि राम कोई व्यक्ति नहीं एक चरित्र हैं लेकिन कभी इस चरित्र को जीवन में उतरने का प्रयास नहीं किया।

दोस्तों, संवाद की कमी तब महसूस होती है जब इस देश का प्रधानमंत्री यूके जाता है और वहां पर प्रेस वार्ता में एएनआई के पत्रकार को यह सोचकर प्रश्न पूछने के लिए कहता है कि यह मेरे देश का पत्रकार है, यह इस समय मेरे लिए देश की आवाज है और देश के लिए मेरी आवाज, तो यह जो भी पूछेगा देश के हित में पूछेगा लेकिन हमारे पत्रकार साहब मोदी जी के समक्ष असहिष्णुता का मुद्दा उठाते हैं। जिस स्थान पर पूरे विश्व का मीडिया हो वहां पर देश की आतंरिक स्थिति पर देश के प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा कर देना उन पत्रकार महोदय का कैसा दायित्व है। जितना मोदी ने असहिष्णुता के मुद्दे पर वहां बोला कि मेरे लिए हर एक घटना महत्व रखती है उतनी बात अगर यहाँ बोल देते तो शायद आधी समस्याओं का समाधान हो जाता। पत्रकार का काम देश में और देश के बाहर जनता और सत्ता के बीच सकारात्मक सोच के साथ सेतु का काम करना है। एएनआई के पत्रकार यदि भारत में मोदी जी की एक बाइट लेकर चला देते तो शायद आज तथाकथित 'असहिष्णुता' कोई मुद्दा ही ना होता।

आत्मपरीक्षण भाग- 2 पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Sunday, 1 November 2015

ऑनलाइन मायाजाल में फंसता भारत


कुछ दिन पहले की बात है, मैं स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एक ब्रांच मैनेजर से मिलने के लिए बैंक गया था। बैंक में मेरी मुलाकात मेरे घर के पास रहने वाले 65 वर्षीय रामशंकर पांडेय जी से हुई। मैंने उनसे पूछा कि चाचा जी आप अपने घर से इतनी दूर क्या करने के लिए आए हो? तो उन्होंने बताया कि उन्हें कुछ पैसा कहीं ट्रान्सफर करना था। इसलिए वह घर से 7 किलोमीटर दूर स्थित इस बैंक में आए थे। उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं रहता था, इसलिए मैंने उनसे कहा कि चाचा जी घर पर चलकर मैं इंटरनेट बैंकिंग चालू कर देता हूं, फिर आपको इतनी परेशानी नहीं होगी। तो वह बोले कि ऐसा मैं क्यूँ करूँ ?

तो मैंने कहा कि अब छोटे छोटे ट्रांसफर के लिए बैंक आने की और घंटों बर्बाद करने की जरूरत नहीं, और आप जब चाहे तब घर बैठे अपनी ऑनलाइन शॉपिंग भी कर सकते हैं। हर चीज बहुत आसान हो जाएगी। मैं बहुत उत्सुक था उन्हें नेट बैंकिंग की दुनिया के बारे में विस्तार से बताने के लिए। इस पर उन्होंने पूछा अगर मैं ऐसा करता हूँ तो क्या मुझे घर से बाहर निकलने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी? मुझे बैंक जाने की भी ज़रूरत नहीं?
मैंने उत्सुकतावश कहा, हाँ आपको कही जाने की जरुरत नही पड़ेगी और आपको किराने का सामान भी घर बैठे ही डिलिवरी हो जाएगा और ऐमजॉन, फ्लिपकॉर्ट व स्नैपडील सबकुछ घर पर ही डिलिवरी करते हैं।

उन्होंने इस बात पर जो जवाब मुझे दिया वह वास्तव में एक गंभीर विषय था। मेरे जैसे व्यक्ति ने भी उस पक्ष के बारे में सोचा ही नहीं था।

उन्होंने कहा आज सुबह जब से मैं इस बैंक में आया, मै अपने चार मित्रों से मिला और मैंने उन कर्मचारियों से बातें भी की जो मुझे जानते हैं। मेरे बच्चें दूसरे शहर में नौकरी करते हैं और कभी कभार ही मुझसे मिलने आते जाते हैं, पर आज ये वो लोग हैं जिनका साथ मुझे चाहिए। मैं अपने आप को तैयार कर के बैंक में आना पसंद करता हूं, यहां जो अपनापन मुझे मिलता है उसके लिए ही मैं वक़्त निकालता हूँ।

उन्होंने एक पुरानी घटना के बारे में बताते हुए कहा कि दो साल पहले की बात है मैं बहुत बीमार हो गया था। जिस मोबाइल दुकानदार से मैं रीचार्ज करवाता हूं, वो मुझे देखने आया और मेरे पास बैठ कर मुझसे सहानुभूति जताई और उसने मुझसे कहा कि मैं आपकी किसी भी तरह की मदद के लिए तैयार हूँ।
वो आदमी जो हर महीने मेरे घर आकर मेरे यूटिलिटी बिल्स ले जाकर ख़ुद से भर आता था, जिसके बदले मैं उसे थोड़े बहुत पैसे दे देता था उस आदमी के लिए कमाई का यही एक जरिया था और उसे खुद को रिटायरमेंट के बाद व्यस्त रखने का तरीका भी।
कुछ दिन पहले मॉर्निंग वॉक करते समय अचानक मेरी पत्नी गिर पड़ी, मेरे किराने वाले दुकानदार की नजर उस पर गई, उसने तुरंत अपनी कार में डाल कर उसको घर पहुँचाया क्यूंकि वो जानता था कि वो कहा रहती हैं।
अगर सारी चीज़ें ऑन लाइन ही हो गई तो मानवता, अपनापन, रिश्ते - नाते सब समाप्त जाएंगे !
मैं हर वस्तु अपने घर पर ही क्यूं मगाऊं ?
मैं अपने आपको सिर्फ अपने कम्प्यूटर से ही बातें करने में क्यूं झोंकू ?
मैं उन लोगों को जानना चाहता हूं जिनके साथ मेरा लेन-देन का व्यवहार है, जो कि मेरी निगाहों में सिर्फ दुकानदार नहीं हैं। इससे हमारे बीच एक रिश्ता, एक बन्धन कायम होता है !
क्या ऐमजॉन, फ्लिपकॉर्ट या स्नैपडील ये रिश्ते-नाते,प्यार, अपनापन भी दे पाएंगे ?

फिर उन्होने बड़े पते की एक बात कही जो मुझे बहुत ही विचारणीय लगी, आशा हैं आप भी इस पर चिंतन करेंगे....
उन्होने कहा कि ये घर बैठे सामान मंगवाने की सुविधा देने वाला व्यापार उन देशों में फलता फूलता हैं जहां आबादी कम हैं और लेबर काफी मंहगी है।
अपने भारत जैसे 125 करोड़ की आबादी वाले गरीब एंव मध्यम वर्गीय बहुल देश मे इन सुविधाओं को बढ़ावा देना आज तो नया होने के कारण अच्छा लग सकता हैं पर इसके दूरगामी प्रभाव बहुत ज्यादा नुकसानदायक होंगे।

देश मे 80% जो व्यापार छोटे छोटे दुकानदार गली मोहल्लों मे कर रहे हैं वे सब बंद हो जाएंगे और बेरोजगारी अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाएगी। तो अधिकतर व्यापार कुछ गिने चुने लोगों के हाथों मे चला जाएगा। हमारी आदतें खराब और शरीर इतना आलसी हो जाएगा कि बहार जाकर कुछ खरीदने का मन नहीं करेगा। जब ज्यादातर धन्धे और दुकानें ही बंद हो जाएंगी तो रेट कहां से टकराएंगे तब ये ही कंपनिया जो अभी सस्ता माल दे रही है वो ही फिर मनमानी किम्मत हमसे वसूल करेंगी। हमे मजबूर होकर सबकुछ ऑनलाइन ही खरीदना पड़ेगा और ज्यादातर जनता बेकारी की ओर अग्रसर हो जाएगी।

दोस्तों एक बार इस विषय पर सोचिएगा जरूर... मैं यह नहीं कहता कि ऑनलाइन शॉपिंग ना करें लेकिन सब्जियों जैसी चीजें ऑनलाइन खरीदने का मतलब है? इसे समझना बहुत आवश्यक है...

वन्दे भारती

Saturday, 31 October 2015

सोशल मीडिया का सच: एक विश्लेषण


दोस्तों, आज एक अजब दौर आ गया है। व्यक्तिगत बातों से लेकर सामाजिक चिंतन तक सब कुछ सोशल मीडिया पर ही हो रहा है। आज ट्विटर, फेसबुक और वाट्सऐप अपने प्रचंड क्रांतिकारी दौर से गुजर रहा है...

जिसने चार दिन पहले सोशल मीडिया चलाना शुरू किया है उससे लेकर कल तक सड़क पर लाठियां खाने वाला व्यक्ति भी सोशल मीडिया पर ही क्रांति करना चाहता है...
कोई बेडरूम में लेटे-लेटे गौहत्या करने वालों को सबक सिखाने  की बातें कर रहा है तो किसी के इरादे सोफे पर बैठे बैठे महंगाई बेरोजगारी या बांग्लादेशियों को उखाड़ फेंकने के हो रहे हैं। हंसी तो इस बात पर आती है कि सप्ताह में एक दिन नहाने वाले लोग स्वच्छता अभियान की खिलाफत और समर्थन कर रहे हैं।

अपने बिस्तर से उठकर एक गिलास पानी लेने पर नोबेल पुरस्कार की उम्मीद रखने वाले बता रहे हैं कि मां-बाप की सेवा कैसे करनी चाहिए। इतना ही नहीं जिन्होंने आजतक बचपन में कंचे तक नहीं जीते वे लोग बता रहे हैं कि भारत रत्न किसे मिलना चाहिए। जिन्हें गली में होने वाले क्रिकेट में इसी शर्त पर खिलाया जाता था कि बॉल कोई भी मारे पर अगर नाली में गई तो निकालना तुझे ही पड़ेगा वे आज कोहली को समझाते पाए जाते कि उसे कैसे खेलना है।

कुछ लोग वास्तव में बधाई के पात्र हैं जिन्होंने देश में महिलाओं की कम जनसंख्या को देखते हुए लड़कियों के नाम से नकली आईडी बनाकर जनसंख्या अनुपात को बराबर कर दिया है। जिन्हें अपने गोत्र का नहीं पता है वे लोग आज हिन्दुत्व के लिए जान देने की बातें कर रहे हैं। जो नौजवान एक बालतोड़ हो जाने पर रो-रो कर पूरे मोहल्ले में
हल्ला मचा देते हैं वे सोशल मीडिया पर देश के लिए सर कटा लेने की बात करते दिखेंगे। आप कितने भी तर्कों के साथ अपना विषय रखें लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो सकारात्मक सोच ही नहीं सकते। आज भाजपा समर्थक अंधभक्त, आप समर्थक उल्लू तथा कांग्रेस समर्थक आतंकवादियों के समर्थक और सोनिया के चमचे करार दिए जाते हैं।

कॉपी पेस्ट करनेवालों के तो कहने ही क्या! किसी की भी पोस्ट चेंप कर एसे व्यवहार करेंगे जैसे साहित्य की गंगा उसके घर से ही बहती है और वो भी 'अवश्य पढ़े ' तथा 'मार्केट में नया है' की सूचना के साथ। टैगियों की तो बात ही निराली है। इन्हें ऐसा लगता है कि जब तक ये गुड मॉर्निंग वाले पोस्ट पर टैग नहीं करेंगे तब तक लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि सुबह हो चुकी है । जिनकी वजह से शादियों में गुलाबजामुन वाले स्टॉल पर एक आदमी खड़ा रखना जरूरी होता है वे लोग आम बजट पर टिप्पणी करते हुए पाए जाते हैं। कॉकरोच देखकर चिल्लाते हुए दस किलोमीटर तक भागने वाले पाकिस्तान को धमका रहे होते हैं कि "अब भी वक्त है सुधर जाओ"।

दोस्तों, मैं यह नहीं कहता कि सोशल मीडिया पर लिखना नहीं चाहिए या लोगों को जागरुक नहीं करना चाहिए लेकिन मैं इतना जरूर चाहता हूं ये बातें सिर्फ लाइक और कमेंट पाने  तक ही सीमित ना रह जाएं। दोस्तों मैं 2010 से फेसबुक चला रहा हूं। उस समय मेरी एक एक पोस्ट पर 500-700 लाइक और 100-150 शेयर आते थे। लेकिन दोस्तों मैं उनमें से नहीं था कि सिर्फ फेसबुक तक ही सीमित रहता। दोस्तों मैं बस यह चाहता हूं कि कितने भी लाइक कमेंट बटोर लो लेकिन जब इस देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए 5 अप्रैल 2011 की तरह कोई 75 साल का युवा आंदोलनरत हो तो भले ही उसके साथ खड़े होने के लिए आप जंतर मंतर ना पहुंच पाना लेकिन दोस्तों मेरी तरह जहां भी रहना वहीं पर आंदोलन करते हुए लाठियां खाने से कभी पीछे मत हटना। दोस्तों, 16 दिसंबर 2012 जैसी घटना के बाद अगर दामिनी जैसी देश की कोई बेटी पुकारे तो अपने सारे लाइक कमेंट्स को छोड़ कर सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोगों से उस बेटी के साथ हुई दुष्टता का हिसाब मांगने पहुंच जाना।

वंदे भारती

Friday, 30 October 2015

यही तो है घोर कलियुग...




दोस्तों अभी कुछ दिन पहले विजयादशमी का पर्व बीता। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने राक्षसों के राजा रावण का वध किया था। रावण दहन का अर्थ है कि हम हमारे अंदर की बुराइयों का अंत कर भगवान श्रीराम के आदर्शों पर चलने की कोशिश करें लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ और ही दिख रहा है मेरे पास कई संदेश आए जिसमें यह जताने का प्रयास किया गया कि अगर हम आज रावण भी बन जाएं तो बेहतर हैं। मेरे पास एक संदेश आया कि रावण में अहंकार लेकिन पश्चाताप भी था, रावण में वासना के साथ संयम भी था, रावण में सीता के अपहरण की ताकत थी साथ ही बिना सहमति परस्त्री को स्पर्श भी न करने का संकल्प भी था। इस प्रकार से रावण की महिमा मंडित किया जाना मुझे अच्छा नहीं लगा तो मैंने सोचा कि इस विषय पर कुछ लिखा जाए।

मेरे एक मित्र ने संदेश भेजा कि सीता जीवित मिली यह निश्चित रूप से श्रीराम की ताकत थी, परन्तु वह पवित्र मिली यह रावण की मर्यादा थी। क्या शानदार विश्लेषण था उनका। किसी ने कहा है कि अधूरा ज्ञान विनाश की जड़ होता है। बिना अध्ययन के इस प्रकार के विषयों को समाज में फैलाना एक राष्ट्रीय अपराध है। रावण ने सीता को बलपूर्वक इसलिए हाथ नहीं लगाया क्योंकि उसे कुबेर के पुत्र नलकुबेर ने श्राप दिया था कि यदि रावण ने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध अनैतिक कामेच्छा से छुआ या अपने महल में रखा तो तेरे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे। रावण ने कुबेर की पत्नी के साथ बलात्कार किया था । इसी डर के कारण रावण ने ना तो सीता को कभी बलपूर्वक छूने का प्रयास किया और न ही अपने महल में रखा। इतना ही नहीं रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहां रावण ने माया को अपने वाक्जाल में फंसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासनायुक्त होकर मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया। इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।

कुछ लोग तो रावण जैसा भाई बनने तक की सलाह दे देते हैं। उनका मानना है कि बहन के अपमान का बदला लेने के लिए सीता का हरण किया और अपनी बहन के लिए अपने पूरे कुल की कुर्बानी दे दी। जबकि यह सत्य नहीं है। रावण ने अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए सीता का अपहरण नहीं किया बल्कि इसलिए किया क्योंकि वह कामांध था। उसने अपने पूरे जीवनकाल में 70 से भी ज्यादा स्त्रियों के साथ बलात्कार किया था जिनमें कुबेर की पत्नी आख़िरी थी। जब शूर्पणखा ने रावण के सामने सीता की सुंदरता का वर्णन किया, तो उसके मन में सीता को प्राप्त करने की लालसा जाग उठी। इसलिए रावण ने सीता का हरण किया। और रावण की बहन शूर्पणखा ने यूं ही रावण के समक्ष सीता के विषय में नहीं बताया था अपितु इसके पीछे भी एक रहस्य था। शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था।  वह कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का भी वध कर दिया। इस कारण से श्री राम और लक्ष्मण की वीरता को देखते हुए उसने रावण से अपना बदला लेने के लिए यह खेल खेला।

कुछ लोगों का मानना है कि रावण अजेय योद्धा था। वह अपने जीवन में कभी किसी से नहीं हारा। जबकि ये बात पूरी तरह से गलत है। रावण राम के अलावा पाताल लोक के राजा बलि, महिष्मति के राजा कार्तवीर्य अर्जुन, वानरराज बालि और भगवान शिव से पराजित हो चुका था। वह कोई शिव भक्त नहीं था बल्कि उसे पता था कि जिनसे जिनसे वह पराजित हुआ है उनमें एकमात्र शिव ही ऐसे हैं जो अजर अमर हैं इस नाते वह शिव जी का सम्मान करता था। इस सम्मान को यदि डर का नाम दिया जाए तो भी गलत नहीं होगा। वह जब बैजनाथ का शिवलिंग लेकर जा रहा था, तब उसे लघुशंका आई, उसने ब्राह्मण के रुप में आए विष्णु को शिवलिंग थमा दिया और खुद निवृत्त होने चला गया। विष्णु ने शिवलिंग वहीं जमीन पर रख दिया। जब रावण आया और उसने शिवलिंग को उठाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं हिल सका तो रावण ने गुस्से में शिवलिंग पर मुठ्ठी से प्रहार कर दिया, जिससे शिवलिंग आधे से ज्यादा जमीन में धंस गया। मैं मानता हूं कि रावण विद्वान था, लेकिन उसने अपने ज्ञान को कभी व्यवहारिक जीवन में नहीं उतारा। लाखों ऋषियों का वध किया, कई यज्ञों का ध्वंस किया और महिलाओं का अपहरण करके उनका बलात्कार किया। रावण ने रंभा नामक अप्सरा से भी बलात्कार किया था। रावण ने वेदवती नाम की एक ब्राह्मणी के रूप से प्रभावित होकर उनसे भी बलात्कार करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने किसी प्रकार से स्वयं को बचाकर आत्मदाह कर लिया। हो सकता है कि आप कहें कि यदि रावण शिव भक्त नहीं था तो शिव जी ने रावण को सोने की लंका क्यों दी लेकिन दोस्तों यह सत्य नहीं है। सत्य यह है कि लंका का निर्माण देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा ने किया था। उसमें सबसे पहले राक्षस ही निवास करते थे। भगवान विष्णु के भय से जब राक्षस पाताल चले तो लंका सूनी हो गई। रावण के बड़े भाई (सौतेले) ने अपनी तपस्या से भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने उसे लोकपाल बना दिया और सोने की लंका में निवास करने के लिए कहा। जब रावण विश्व विजय पर निकला तो उसने कुबेर से सोने की लंका व पुष्पक विमान भी छीन लिया और उसकी पत्नी से बलात्कार किया। फिर रावण ने वहां राक्षसों का राज्य स्थापित किया।
मित्रों इस प्रकार की बातें वे लोग करते हैं जिन्होंने कभी रामायण पढ़ने की कोशिश तक नहीं की। उनकी सम्पूर्ण रामायण मात्र स्व. रामानन्द सागर के धारावाहिक और चचा की विचारधारा वाली पाठ्यपुस्तकों तक ही सीमित है और जो थोड़ी बहुत रही सही कसर थी वह वामपंथी तथाकथित इतिहासकारों ने पूरी कर दी। इसी का परिणाम है कि स्थिति ऐसी बन गई कि लोगों को रावण बनने का प्रवचन दिया जाने लगा, नमस्ते के स्थान पर कई लोग जय लंकेश कहा जाने लगा। हम कहते हैं कि राम एक चरित्र हैं तो उसी प्रकार रावण एक दुष्चरित्र है इसलिए लाखों साल से हिन्दू रावण और बुराई को पर्यायवाची मानते आये हैं किन्तु आज कुछ बुद्धि भ्रष्ट लोगों को प्रभु श्रीराम के निर्मल चरित्र के स्थान पर रावण अधिक प्रेरणास्पद लगता है। आपसे निवेदन है कि इस दुष्चक्र में आप न फंसें। राम बनें, राम का जन्म रावण यानी बुराई को अच्छा ठहराने के लिए नहीं अपितु रावण का संहार करने के लिए हुआ था।

वन्दे भारती


Friday, 23 October 2015

कलराज जी, 'अच्छे दिन' जाने वाले हैं...



इस देश की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। आज संवेदनहीनता और असहिष्णुता की पराकाष्ठा को पार करते हुए कांग्रेस के एक नेता जयराम रमेश ने गोमांस के मुद्दे पर कहा कि किसी को लोगों पर यह नहीं थोपना चाहिए कि वे क्या खाएं और क्या न खाएं। रमेश ने कहा, 'आप इस पर नियम-कायदे नहीं बना सकते। आप यह नहीं कह सकते कि आप गोमांस नहीं खा सकते। कल आप कहेंगे कि 'दाल मखनी' नहीं खा सकते, आप 'मटर पनीर' नहीं खा सकते। क्या बकवास है यह सब? भारत किस तरफ जा रहा है?'

ऐसे हैं हमारे देश के नेता। जयराम रमेश वो नेता हैं जिनको इस देश की जनता ने केन्द्रीय मंत्री स्वीकार किया। रमेश जी भारत की चिंता मुझे भी है। मैं भी दिनरात यही सोचता रहता हूं कि भारत किस ओर जा रहा है। इस देश के लोगों को एकजुट करने के लिए जैसे ही कोई खड़ा होता है आप जैसे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारत की अस्मिता का चीरहरण करने लगते हैं। अरे रमेश जी आप कहते हैं कि बीफ खाना एक निजी मुद्दा है। बस आप इतना बता दो कि आपकी मां के साथ कोई दुर्व्यवहार करे, दुराचार करे तो क्या यह दुराचार करने वाले का निजी मुद्दा है? क्या आप दुराचार करने वाले व्यक्ति को भी अपने इसी सिद्धान्त के आधार पर स्वतंत्रता देंगे। नहीं दे सकते, क्यों कि उसे झेलने वाली आपकी मां है। और नेताजी यदि आपने उस दुराचारी को स्वतंत्रता दे भी दी तो भी इस देश के युवा आपकी मां के लिए खड़े रहेंगे क्यों कि यह वह देश है जिसमें मां को ईश्वर से भी ऊपर माना गया है।

स्वतंत्रता और स्वच्छन्दता के अंतर को समझिए। मैं आपको याद दिला दूं कि इस देश का आधार इस देश की संस्कृति है और इस देश की संस्कृति में गाय को पूज्यनीय माना गया है। इसे हिंदू मुसलमान से मत जोड़िए। मेरा यह क्रोध मात्र कांग्रेस के जयराम रमेश जी से ही संबन्धित नहीं है अपितु आज इस देश की तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय नेता ने भी बहुत सुन्दर बात कही, केन्द्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रम मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र ने कहा कि "यदि लोग बीफ खाते हैं तो आप उन्हें कैसे रोक सकते हैं?"
सही कहा कलराज जी इस देश में जब आप जैसे दोगले लोगों को हम मंत्री बनने से नहीं रोक पाए तो बीफ खाने वालों को कैसे रोकेंगे। मुझे आपसे ज्यादा गुस्सा तो स्वयं पर आ रहा है। जब भाजपा का गढ़ कहे जाने वाले लखनऊ में भाजपा का अस्तित्व समाप्त होने की कगार पर था, उस समय आपको लखनऊ पूर्वी विधानसभा प्रत्याशी बनाया गया था और आपके चुनाव प्रचार के लिए आपकी विधानसभा में रहने वाले अपने मित्र नितिन मित्तल के कहने पर आपके चुनाव प्रचार में मैं भी गया था। लगातार 16 दिन तक अपने 18 मित्रों की टीम के साथ मैं उस विधानसभा में जाकर बिना कुछखाए पिए आपका प्रचार करता था। नितिन हमेशा मुझसे यही कहता था कि विश्व गौरव कलराज जी, अटल जी के समकक्ष हैं, यदि कलराज जी हार गए तो अटल जी हार जाएंगे। काश उस समय आपका यह घिनौना चेहरा मेरे सामने आ गया होता तो मैं आपके विरोध में प्रचार करता।

आपके चुनाव में तन, मन और धन से लगने वाले उस नितिन ने गौ संरक्षण हेतु काऊ मिल्क पार्टी जैसा देशव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया और आप उसको शाबासी देने के स्थान पर अप्रत्यक्ष रुप से उसके विरोध में खड़े हो गए। किसी ने सच ही कहा है कि सत्ता बड़े बड़े मठाधीशों को मानसिक रूप से विकलांग बना देती है। ऐसे विषयों पर मीडिया को तो मसाला  मिल गया लेकिन उस विचार का क्या जो देश की एकता, अखंडता और एकात्मता का संरक्षण करेगा।

आप दोनों बड़े नेता हैं, लाखों फॉलोवर्स हैं आपके लेकिन इतिहास आपको माफ नहीं करेगा....रही बात मेरी तो मुझे इस बात की चिंता नहीं कि देश ऐसे चल रहा है....मुझे चिंता इस बात की है कि कहीं देश यूं ही ना चलता रहे....

काऊ मिल्क पार्टी के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें

नितिन मित्तल के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें

काऊ मिल्क पार्टी अभियान से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें

Thursday, 22 October 2015

संघ क्यों है और क्यों रहेगा?

दोस्तों, आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 साल का हो चुका है। 1925 में दशहरे के दिन, उस दिन की सार्थकता को प्रमाणित करते हुए डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। सांप्रदायिक,हिंदूवादी, फासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ अपने उद्देश्य से नहीं भटका। मैं इस लेख को इस लिए नहीं लिख रहा क्यों कि मैं एक स्वयंसेवक हूं अपितु अपने पत्रकारिता धर्म को निभाते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ देश के सामने उस संगठन के बारे में लिख रहा हूं जिसकी तुलना आईएसआईएस से करके आतंकवादी करार दिया जाता है।

दोस्तों, स्वतंत्रता के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नजर रखी। यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार। उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे। विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज्यादा राहत शिविर लगाए थे।

1962 में हुए युद्ध के समय सेना की मदद के लिए देशभर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी। संघ ने सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता भी की। जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए। निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- 'यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।'

आज जिस कश्मीर के लिए हम पाकिस्तान से वार्ता कर रहे हैं। वह कश्मीर कभी यह कहता था कि हम भारत के साथ नहीं आएंगे। कश्मीर के महाराजा हरिसिंह विलय का फैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार तो- हम क्या करें वाली मुद्रा में- मुंह बिचकाए बैठी थी। उस समय सरदार पटेल और संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर की इच्छा शक्ति के कारण कश्मीर का भारत में विलय हुआ।

1965 में पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया था। शास्त्रीजी ने कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था।

इतना ही नहीं दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे। गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा
आज़ाद हुआ।

भारत का काला अध्याय कहे जाने वाले 1975 से 1977 के बीच लगे आपातकाल के खिलाफ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताजा है। सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन चलाना शुरू किया। आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने संभाला। जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं।

1955 में बना भारतीय मजदूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मजदूर संगठन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था। कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मजदूर संघ ने ही शुरू किया था। आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मजदूर संगठन है। जहां बड़ी संख्या में जमींदार थे उस राजस्थान में खुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं। संघ के स्वयंसेवक शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने।

भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे संगठनों की स्थापना संघ के स्वयंसेवकों ने संघ से प्रेरित होकर ही की। विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है। केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं। संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं। अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज्यादा काम कर रहा है। लगभग 35 हजार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू और कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम और 19 हिंदू बच्चे हैं।

1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक- संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है। भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में संघ के स्वयंसेवकों ने संघ की विचारधारा का मूर्त रूप प्रस्तुत किया।

दोस्तों संघ एक संगठन है, जिसमें विभिन्न प्रकार के लोग जुड़े हैं। संभव है कि संघ के किसी स्वयंसेवक की व्यक्तिगत विचारधारा से आपकी सहमति ना हो लेकिन संघ की मूल विचारधारा से असहमति का विषय किसी के मन में नहीं आ सकता। सैकड़ों आरोपों के बावजूद यदि संघ आज खड़ा है तो उसका एकमात्र कारण है कि संघ ने कभी बांटने की कोशिश नहीं की। राष्ट्रीय एकात्मता के आधारभूत स्तंभ के रूप में संघ आज भी खड़ा है। मित्रों, जब तक संघ का मूल विचार संघ के स्वयंसेवकों के मन में स्थापित रहेगा तब तक संघ इस धरती पर रहेगा और जिस दिन संघ के स्वयंसेवक ने राजनीति में 'अनावश्यक' हस्तक्षेप शुरू कर दिया उस दिन संघ समाप्त हो जाएगा।

वंदे भारती

Wednesday, 21 October 2015

ऐसे शरियत की भारत को जरूरत नहीं

मित्रों, अभी अभी एक खबर देखी कि मुंबई के वरली तट के निकट स्थित एक छोटे से टापू पर स्थित एक हाजी अली दरगाह में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित है। इस खबर को पड़कर मेरी इच्छा हुई कि इस दरगाह के विषय में जाना जाए, लेकिन कुछ खास जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी लेकिन वर्तमान समय में जो मामला चल रहा है उसके विषय में पूर्ण जानकारी अवश्य मिल गई।

सोमवार को हाजी अली दरगाह के ट्रस्टियों ने मीटिंग में फैसला लेकर मुंबई हाईकोर्ट को एक पत्र के जरिए यह जानकारी दी है कि वे दरगाह में किसी महिला को घुसने नहीं देंगे। इससे पहले कुछ महिलाओं तथा महिला संगठनों ने इस बात की याचिका दाखिल की थी कि इस दरगाह में महिलाओं के प्रतिबंधित प्रवेश को तत्काल बहाल किया जाए। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाली महिलाओं के वकील राजू मोरे ने अदालत में दलील दी थी कि अन्य दरगाहों या धार्मिक स्थलों पर महिलाओं की एंट्री बैन नहीं है फिर हाजी अली दरगाह में पाबंदी क्यों है।

जस्टिस वी.एम.कानडे की खंडपीठ को हाजी अली दरगाह के कमिटी मेंबर्स ने जो पत्र दिया है। उसमें कहा गया है कि मुस्लिम संत के मजार के करीब महिलाओं का प्रवेश महापाप है। दरगाह कमिटी ने अदालत को बताया कि उसने इस संबंध में निर्णय लेने का जो आदेश दिया था उसके तहत दरगाह के ट्रस्टियों की दोबारा मीटिंग बुलाई गई थी। जिसमें एक बार फिर से सर्वसम्मति से महिलाओं को दरगाह के गर्भगृह में प्रवेश नहीं देने का निर्णय लिया गया है। दरगाह के ट्रस्ट ने अपनी बात के समर्थन में हाईकोर्ट के समक्ष एक दलील और पेश की है। जिसमें कहा गया है कि संविधान के कानून और विशेषकर अनुच्छेद 26 के तहत ट्रस्ट को अपने धार्मिक मामलों को अपने मूलभूत अधिकारों के तहत चलाने की आजादी मिली हुई है। और इसमें किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप अनुचित है।
मित्रों , किस देश में जी रहे हैं हम और कैसे लोगों के साथ। जिस देश में अर्धनारीश्वर स्वरूप की पूजा होती है, जिस देश में नारी को पूज्या माना गया है, जिस देश में ऐसे मंदिर हैं जहां बिना पत्नी के आप ईश्वर के दर्शन नहीं कर सकते, जिस देश में बिना विवाह के मोक्ष की कल्पना नहीं की जाती है, उस देश के अन्दर आज भी ऐसे लोग हैं जो नारी को सजदा तक नहीं करने देते।

मेरे इस विषय को हिंदू- मुसलमान से जोड़कर ना पढ़ें। मैं मानता हूं कि हिंदुओं में भी कुछ लोग नारियों को पुरुष के बराबर नहीं समझते। वे लोग लड़कियों को पढ़ने से या अन्य कई कामों से रोकते हैं लेकिन हमें यह विचार करना होगा कि क्या यह हमारी मूल संस्कृति थी। इस देश के अन्दर गार्गी जैसी विद्युषी हुई है जो याज्ञवल्क्य जैसे ज्ञानी को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती देती है। यह देश रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेन्नमा, बेगम हजरत महल का देश है, यहां पर ऐसे लोगों का कोई स्थान नहीं जो लिंग भेद को बढ़ावा दे रहे हैं।

कल शाम की ही बात है कि एक चैनल की डीबेट में एक मोहतरमा शरियत कानून की वकालत कर रही थीं। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसे लोगों को हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर क्यों बरदाश्त कर रहे हैं। क्यों उन्हें यह मौका दिया जाता है कि वे भेदभाव करने वाले कानून को लागू करके देश तोड़ने वालों का समर्थन करें।
यदि मेरे इस विषय का किसी के पास कोई जवाब है तो कृपया बताएं...
वन्दे भारती

Thursday, 15 October 2015

अगर वह हार गया तो समझ लेना....

मित्रों हमारा अभियान आगे बढ़ रहा है,कुछ हमारा साथ देने के लिए आगे आ रहे हैं तो कुछ हमें अपने साथ लेना चाहते हैं। आज शाम मेरे पास एक राजनीतिक संगठन से फ़ोन आया। बात कर रहे व्यक्ति ने मुझसे कहा कि विश्व गौरव जी आप नितिन जी से बात करके इस अभियान को हमारे बैनर पर चलाइए,हमारे पास बहुत से कार्यकर्ता हैं, मीडिया का सपोर्ट भी मिलेगा। आप सब लोग बस हमारे साथ आ जाइए। मैं समझ गया कि अब हमारे उद्देश्य को पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता क्यों कि जब झूठे वादे और कसमों के आधार पर सत्ता के सिंघासन पर बैठने वाली राजनीतिक पार्टियां आपका सहयोग मांगने लगें तो समझ जाइए कि आपकी मेहनत रंग ला रही है।मैंने उन नेता जी को तो मना कर दिया लेकिन सोचा कि अपने भाई और #मिल्कपार्टी अभियान के सूत्रधार श्री नितिन मित्तल जी के लिए कुछ लिखूं। आज का ये ब्लॉग उस दिन के लिए लिख रहा हूँ जब हमारा ये आंदोलन सफल हो जाएगा। बहुत से लालच दिए जाएंगे, बहुत से लोग इस आंदोलन के कर्णधारों से जुड़कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहेंगे लेकिन बस इतना निवेदन है कि उनके जाल में मत फंसना...

सबसे पहले नितिन को आगाह करते हुए कुछ पक्तियां आप सभी को समर्पित करता हूँ।

एक बार फिर जीवन का रथ मुड़ा राष्ट्रहित पथ पर
राजनीति ने डोरे डाले फिर सेवा के व्रत पर
लक्ष्मण रेखा बड़ी क्षीण है, बड़ी क्रूर है काई
कदम कदम पर फिसलाएगी रेशम सी चिकनाई
काजल के पथ पर चढ़ना और चढ़ कर पार उतरना
बहुत कठिन है निष्कलंक रहकर ये सब करना।


मित्रों, बड़ी लड़ाई है, थोड़ी मुश्किल है लेकिन आसान काम करना होता तो ईश्वर इस काम के लिए नितिन जैसे संघर्षशील व्यक्ति को नहीं चुनता। छोटा काम तो कोई भी कर सकता है। अगर किसी एक जगह पर मिल्क पार्टी करनी होती तो लखनऊ या दिल्ली जैसे स्थानों पर हजारों विद्यार्थी तो नितिन के एक इशारे पर वैसे ही खड़े हो जाते और शानदार पार्टी करा देते। ये आंदोलन एक निर्णायक आंदोलन सिद्ध होगा। मैं खुद को इस लायक नहीं समझता कि नितिन या मुस्लिम गौ भक्त भाई दानिश आजाद के बराबर खुद को कह सकूँ। लेकिन मैं बस इतना जानता हूँ कि कभी प्रेम पर, कभी राजनीति पर,कभी सिद्धांतों पर, कभी संस्कृति,कभी शायरियां लिखने वाली मेरी कलम अब अगले कुछ समय में सिर्फ गाय माता के लिए लिखेगी।
अपने दोस्तों में, परिवार में, ऑफिस में मुझे सिर्फ इस आंदोलन की चर्चा करनी है वो सिर्फ इस लिए कि गौ हत्या बंद हो। अलगे कुछ महीने के बाद अगर देश की संसद गौ हत्या निषेध क़ानून लागू करे, अगर 2017 में उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में कोई राजनीतिक पार्टी अपने घोषणा पत्र में यह लिखे कि हम गौ संरक्षण को प्रोत्साहन देने के लिए कानून लाएंगे तो समझ लेना कि देश जीत गया, मैं यानी विश्व गौरव जीत गया।

मित्रों, आज वो समय चल रहा है जब इस देश के लोग ये बात मान चुके हैं कि इस देश में गौ हत्या निषेध जैसा कोई कानून नहीं आ सकता, यह वो समय है जब इस देश का युवा गौ हत्या जैसे विषयों पर बात करने को साम्प्रदायिकता समझता है। ऐसे समय में इस आंदोलन को मिल रहा समर्थन व्यक्तिगत रूप से मुझे शक्ति दे रहा है।

मैं पेशे से एक समाचार संस्थान में पत्रकार हूं। दिन के 9 घंटे मैं ऑफिस को देता हूं फिर कुछ समय अन्य व्यक्तिगत कामों को देकर सो जाता हूं। आज से 20 दिन पहले मेरे पूज्य गुरुदेव एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण भगत जी के निर्देशानुसार एक पुस्तक लिखनी  शुरू की थी लेकिन गौ रक्षा के इस आंदोलन के मद्देनजर अपने सभी कामों को छोड़कर सिर्फ यही काम कर रहा हूं। ऑफिस में 9 घंटे देने के बाद पिछले 6 दिनों से सिर्फ 4-5 घंटे की नींद ले रहा हूं ताकि मेरी मां यह न कहे कि मेरा बेटा इतना कमजोर है कि अपनी जीवनदायिनी के लिए कुछ समय भी नहीं दे सकता।

दोस्तों, इस विषय पर नितिन से मेरी बात हुई तो मैंने उससे कहा कि क्या देश आपका साथ देगा? तो उसने कहा कि पूरा देश मेरे लिए एकजुट हो या ना हो लेकिन अपनी मां के लिए कौन बेटा नहीं खड़ा होगा? मैंने बस इतना ही कहा कि अगर अब देश नहीं खड़ा हुआ तो मैं दुबारा सोशल मीडिया पर राष्ट्रवाद को आधार मानकर कुछ नहीं लिखूंगा और ना ही अपने छोटे भाइयों से ऐसे विषय पर लिखने के लिए कहूंगा। किसी मंच से राष्ट्रवाद की बातें नहीं करूंगा। मैं यह मान लूंगा कि जिस देश के बेटे अपनी मां के लिए एकजुट नहीं हो सकते, वो मेरे जैसे एक छोटे से कलमकार के लिखने से क्या बदलेंगे।

दोस्तों, दिन में रोटी पर, बोटी पर और एक कुतिया पर मर मिटने वाले कुत्ते भी गली में किसी चोर के आ जाने पर एकजुट हो जाते हैं हमारे यहां तो हमारी मां को बेचने के लिए, हमारी मां को काटने के लिए लोग तैयार खड़े हैं। एक अंतिम बात- आज इस देश का 5 फुट 7 इंच का एक नौजवान गौ माता के लिए अपना सब कुछ छोड़कर खड़ा हुआ है। अगर आज आपने उसका साथ नहीं दिया तो आज मैं विश्व गौरव पूरी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि अगले 50 सालों तक कोई नितिन मित्तल हमारी गौ मां के लिए संघर्ष करने के लिए नहीं खड़ा होगा। उसको हारने मत देना दोस्तों..... अपनी मां को हारने मत देना....

सकारात्मक सहयोग की अपेक्षा के साथ...
विश्व गौरव

Tuesday, 13 October 2015

क्या आप नहीं देंगे इस आंदोलन का साथ


मित्रों आजकल गौहत्या, बीफ पार्टी, पोर्क पार्टी त्यादि विषयों की चर्चाएं जोरों पर हैं। जब इस देश में जब बीफ पार्टी होती है तो कुछ लोग पोर्क पार्टी करने लगते हैं। वे सब यह भूल जाते हैं कि हमारी संस्कृति यह नहीं कहती कि यदि कोई गलत करे तो उसका विरोध करने के लिए हम गलत तरीका अपनाएं। गाय किसी एक धर्म विशेष की है ऐसा नहीं है, गाय का दूध तो प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभकारी होता है। ऐसे में गाय को लेकर हिंदू- मुस्लिम करना गलत होगा। हमने तय किया है कि हम सकारात्मकता के साथ इस विषय को उठाएंगे और इसकी शुरुआत लखनऊ से होगी। हम देश के विभिन्न हिस्सों में काऊ मिल्क पार्टी का आयोजन करेंगे. उन पार्टीज में हम गाय के दूध तथा गाय से प्राप्त अन्य उत्पादों के लाभ समाज को बताएंगे। देश में हुए पिछले कुछ आंदोलनों से एक बात तय हो गई है कि आप चुनिंदा लोग कुछ भी कर सकते हैं। हम अपने इस प्रयास में सोशल मीडिया का सहारा लेंगे और आप देखना आपके छोटे से प्रयास से कुछ बड़ा होगा। मैं वादा तो नहीं करता लेकिन इतना जरूर कहता हूं कि अगर हम सब एक होकर कोई लक्ष्य निर्धारित करेंगे तो उस लक्ष्य तक पहुंचने में हमें कोई भी बुरी ताकत नहीं रोक सकती। मुझे आप सब पर विश्वास है और मुझे यह भी पता है कि हमारा यह आंदोलन अवश्य सफल होगा। इस आंदोलन के सफल होने के बाद हम गर्व से कह सकेंगे कि किसी विषय का विरोध सकारात्मक तरीके से भी किया जा सकता है।

मित्रों मैं बहुत ही स्वार्थी किस्म का व्यक्ति हूं। मैं इस आंदोलन से सिर्फ इस लिए जुड़ा हूं कि आज से 20 साल के बाद मेरी बहन का बेटा जब मुझसे पूछे कि मामा जी आज से 20 साल पहले गाय माता को बचाने के लिए आंदोलन चल रहा था तब आप कहां थे? तो मैं उससे नजर मिला कर यह कह सकूं कि बेटा मैं उन गौ भक्तों के साथ मिलकर सोशल मीडिया पर एक क्रांति लाने के लिए प्रयास कर रहा था। मैं उसे बता सकूंगा कि बेटा इस देश के युवाओं ने मेरे साथ, मेरे कंधे से कंधा मिलाकर इस क्रांति में सहयोग किया था।

दोस्तों, आज गौ माता की रक्षा के लिए इस देश के कुछ युवा एकजुट होकर मिल्क पार्टी करना चाहते हैं। उनमें से कई लोगों से मेरी बात हुई, वो सभी लोग बस एक ही बात कह रहे थे कि विश्व गौरव भाई आप देखना इस देश के युवा हमारा साथ देंगे, इस देश के युवा गाय माता से बहुत प्रेम करते हैं लेकिन राजनीति उन्हें एक नहीं होने दे रही। उन्होंने कहा कि इस देश को राजनेता हिन्दू- मुस्लिम में बांट कर देश तोड़ना चाहते हैं लेकिन इस देश का युवा ऐसा नहीं होने देंगे। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भाई आप देखना 17 अक्टूबर को जब लखनऊ से इस आंदोलन की शुरुआत करेंगे, उस दिन फेसबुक और ट्विटर पर #milkparty टॉप ट्रेंड में चल रहा होगा। मैं नहीं जानता कि ऐसा होगा या नहीं लेकिन मैं यह बात पूरे विश्वास से अवश्य कह सकता हूं कि इस आंदोलन के साथ ईश्वर है और जिस आंदोलन के साथ ईश्वर हो उस आंदोलन को सफल होने से कौन रोक सकता है। मैं आज बस आपसे इतना ही निवेदन करना चाहता हूं कि इन युवाओं का साथ जरूर देना, अगर आज आप इनके साथ नहीं खड़े हुए तो अगले 200 सालों तक कोई युवा गौ संरक्षण के लिए आगे नहीं आएगा।

इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लखनऊ के नितिन मित्तल अपना सब कुछ छोड़कर गौ माता की सेवा के लिए लगने वाले हैं। मैं इस ऊर्जावान युवा को हारते हुए नहीं देख सकता। ये आंदोलन नितिन का व्यक्तिगत आंदोलन नहीं है यह आंदोलन इस देश के प्रत्येक नागरिक का आदोलन है। यह आंदोलन है इस देश की अस्मिता, एकात्मता एवं संस्कृति के संरक्षण के लिए। इन लोगों को हारने मत देना क्यों कि अगर ये लोग हार गए तो एक बार फिर यह प्रमाणित हो जाएगा कि देश ने राजनीति की गंदी सोच को देश ने स्वीकार कर लिया है। अगर ये लोग हार गए तो तुष्टीकरण की जीत हो जाएगी।
हमारी सरकार से स्पष्ट मांग है कि गौ हत्या पर सख्त कानून बने और गौ संरक्षण के लिए सरकार की ओर से योजनाएं शुरू करके प्रोत्साहन दिया जाए।

इस आदोंलन को सफल बनाने के लिए फेसबुक या ट्विटर पर कोई भी पोस्ट डालें तो उसके साथ #milkparty अवश्य जोड़े।
फेसबुक पर COW MILK PARTY के पेज को लाइक करने के लिए यहां क्लिक करें

हमें ओवैसी और आजम खान जैसे लोगों को यह एहसास दिलाना है कि भारत मां अभी बांझ नहीं हुई हैं। वह अभी भी वीरों को जन्म देती है।
अगले लेख में... मनुष्य जाति के लिए कितनी लाभदायक हैं गौ माता

जय गौ माता    वन्दे भारती






Sunday, 11 October 2015

अरे मामा जी, प्रणाम!


कक्षा 6 में एक कहानी पढ़ी थी, कहानी आज के परिदृश्य में बिलकुल प्रासंगिक लगती है। कहानी कुछ इस तरह थी कि एक सज्जन बनारस पहुँचे। वह स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता हुआ आया और मामाजी ! मामाजी का संबोधन करते हुए लपक कर चरण छूते हुए बोला, 'मैं मुन्ना। आप पहचाने नहीं मुझे ? मुन्ना ? वे सोचने लगे। हाँ, मुन्ना। भूल गये आप मामाजी!'




सज्जन थोड़े संतुष्ट हुए और सोचने लगे कि चलो अनजाना ही सही कोई तो मिल गया जो बनारस घुमाएगा। अपनी किस्मत पर मन ही मन प्रसन्न होते हुए सोचने लगे कि शायद इसे कोई गलतफहमी हुई है लेकिन कोई बात नहीं, कोई ना हो इससे बेहतर है कि कोई तो हो। वह यह सोच ही रहे थे कि वह लड़का फिर से बोला, 'मामा जी, कोई बात नहीं, इतने साल भी तो हो गये। मैं आजकल यहीं हूँ।' प्रसन्नतापूर्वक मामाजी अपने भांजे के साथ बनारस घूमने लगे। कभी इस मंदिर, कभी उस मंदिर। फिर पहुँचे गंगाघाट और बोले कि सोच रहा हूँ, नहा लूँ !
इतना सुनते ही मुन्ना बोला, ' बिलकुल नहाइए मामा जी। बनारस आए हैं और नहाएंगे नहीं, यह कैसे हो सकता है ?' भांजे का अश्वासन मिलते ही मामाजी ने गंगा जी में हर-हर गंगे बोलते हुए डुबकी लगाई और उसके बाद जैसे ही बाहर निकले तो सामान गायब, कपड़े गायब ! लड़का... मुन्ना भी गायब!


मुन्ना... ए मुन्ना ! बोलते हुए वह नदी से बाहर निकले। मगर मुन्ना वहां हो तो मिले। वह तौलिया लपेट कर खड़े हैं और लोगों से पूछ रहे हैं कि क्यों भाई साहब, आपने मुन्ना को देखा है ? किसी ने पूछा- कौन मुन्ना ? तो वह सज्जन बोले-वही जिसके हम मामा हैं। वह तौलिया लपेटे यहां से वहां दौड़ते रहे। मुन्ना नहीं मिला। ठीक उसी प्रकार... भारतीय नागरिक और भारतीय वोटर के रुप में हमारी यही स्थिति है ! चुनाव के मौसम में हर कोई आता है और हमारे चरणों में गिर जाता है और कहता है, 'मुझे नहीं पहचाना? मैं चुनाव का उम्मीदवार। होने वाला विधायक'

आप प्रजातंत्र की गंगा में डुबकी लगाते हैं। बाहर निकलने पर आप देखते हैं कि वह शख्स जो कल आपके चरण छूता था, आपका वोट लेकर गायब हो गया। वोटों की पूरी पेटी लेकर भाग गया। समस्याओं के घाट पर हम तौलिया लपेटे खड़े हैं। सबसे पूछ रहे हैं — क्यों साहब, वह कहीं आपको नज़र आया ? अरे वही, जिसके हम वोटर हैं। पांच साल इसी तरह तौलिया लपेटे, घाट पर खड़े बीत जाते हैं। 5 साल बाद अगले चुनावी स्टेशन पर पहुंचते पहुंचते सारी पुरानी बातें भूलकर आपको लगता है कि पुराना वाला भांजा बुरा था, यह अच्छा होगा, लेकिन स्थिति जस की तस ही रहती है।

अपने विवेक के आधार पर मतदान करें। आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में बहुत से भांजे मिलेंगे लेकिन अगर फिर से उनके चक्कर में फंसे तो याद रखिएगा ये भांजे आपके पास बनारस से घर जाने के पैसे भी नहीं छोड़ेंगे।


Tuesday, 6 October 2015

क्या फर्क पड़ता है अगर उनका नाम चाँद मियां था

पिछले दो साल में एक विषय बहुत ही चर्चा में रहा। हमारे एक तथाकथित धर्म के रक्षक या यूँ कहें ठेकेदार ने शिरडी के साईं बाबा के विषय में कुछ कहा। इस विषय पर बहुत से टीवी चैनल्स की डिबेट में जाना हुआ।एक बार उसी समय मन में आया कि इन तथाकथित हिंदूवादियों पर अपनी लेखनी चलाऊँ लेकिन फिर सोचा अपनी आस्था को प्रमाणित करने की आवश्यकता क्या है।

मित्रों सोचा कि आखिर क्यों हिंदुत्व की ऐसी स्थिति है तो ओस प्रश्न का उत्तर स्वतः मिल गया। क्या फर्क पड़ता है यदि उस व्यक्ति का नाम चाँद मियां था। क्या फर्क पड़ता है कि वो मांस खाते थे। महाराष्ट्र के 50 प्रतिशत से अधिक ब्राह्मण मांस खाते हैं। अभी हाल ही के मामले को देख लीजिए महाराष्ट्र के एक हिन्दू राजनीतिक परिवार की ओर से मांस बैन का विरोध किया गया।
वहां मांस की सुलभ उपलब्धता थी तो वो खाते होंगे। इस बात से समस्या क्या है। हिंदुत्व की बात होती है तो सबसे पहले संघ का नाम आता है, लेकिन संघ ने कभी भी साईं पूजा का विरोध नहीं किया। हिंदूवादी चैनल की बात आती है तो सुदर्शन न्यूज़ का नाम आता है। और साईं बाबा का सबसे बड़ा समर्थक सुदर्शन न्यूज़ है जो सुबह शिर्डी की आरती दिखाता है।
सोशल मीडिया पर कुछ समय से मैं देख रहा हूँ कि पोस्ट की जाती है साईं मुसलमान था इस लिए पूजन मत करो। अरे भाई मेरे कट्टर हिन्दू भाई आप ही कहते हो ना कि यहाँ का हर मुसलमान कनवर्टेड है तो वो भी अपने ही परिवार की पीढ़ी से निकले हैं ना। और दूसरा विषय यदि कोई साईं पूजक उनका पूजन करता है तो वह किसी मजार अथवा मस्जिद में नहीं अपितु मंदिर में जाता है। एक मूर्ती का पूजन करता है। व्यक्ति में ईश्वर के स्वरुप को देखना ही तो हमारी संस्कृति का आधार है। उनके कर्मों के आधार पर उनका पूजन किया जाता है।
राम और कृष्ण की भांति ही वह भी हमारे पूर्वज हैं। मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि अब मत बांटो, अब मत तोड़ो सनातन को, बहुत हो गया। सनातन अजर अमर है। इसका अंत नहीं हो सकता। हिंदुत्व समाप्त हो सकता है सनातन नहीं। सनातन को तोड़ोगे तो हिंदुत्व समाप्त हो जाएगा।
बिना किसी विषय का उद्देश्य समझे कॉपी पेस्ट कर देने से हिंदुत्व मजबूत नहीं होगा। मैं साईं बाबा का पूजक हूँ। आओ और देखो शिर्डी में होने वाले सेवा कार्यों को। सेवा ही सिखाता है ना हिंदुत्व। मुझे गर्व है कि विप्रः पूज्यते की संस्कृति के संवाहक के दायित्व का निर्वहन करने के लिए ईश्वर ने मेरा जन्म इस परम पवित्र मोक्षदायिनी भारत माता की गोद में होना सुनिश्चित किया। आप भी विरोध करने से वेदों की ऋचाओं का अध्ययन करो। गीता के सार को समझो, राम को समझो उनके चरित्र को समझो और फिर उसे साईं बाबा से मिलाओ। गीता में दिए गए श्री कृष्ण के उपदेशों का सार और साईं वचन को एक बार साथ में पढ़ कर देखो।
जो श्री कृष्ण सिखाना चाहते हैं उसी के एक माध्यम में रूप में यदि साईं बाबा ने कार्य किया तो उनका विरोध क्यों.....

Monday, 5 October 2015

जीवन का आधार है आत्मबल

बिना आत्मबल के जीवन में कुछ भी करना संभव नहीं है। हम अपने जीवन में बहुत कुछ नहीं पा पाते और उनके लिए स्वयं की कमियों को दोष न देकर अन्य लोगों को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। वास्तव में हमारी सभी समस्याओं की जड़ यही है कि हम दूसरों को अपनी गलतियों के लिए कोसना शुरू कर देते हैं। असफल होने का एक अन्य कारण जो मुझे समझ आता है वो ये कि हम सामान्य तौर पर स्वयं को समझने से अधिक समय दूसरों को समझने में लगा देते हैं लेकिन ऐसा करने से परिणाम शून्य आता है। एक बार सोच कर देखिए कि क्या हम किसी को समझ सकते हैं। ये संभव ही नहीं है कि हम किसी को समझ लें। 

एक उदाहरण से समझिए कि जिस माँ ने हमें जन्म दिया है, जिस पिता ने हमें पाला है जिसने हमें उँगली पकड़कर चलना सिखाया क्या वो माँ पिता हमें अपने पूरे जीवन में समझ पाते हैं। जिनका रक्त हमारी शिराओं में बह रहा है वो भी हमें नहीं समझ पाते और हम किसी के साथ कुछ समय व्यतीत करके ये मान लेते हैं कि हम उसे पूरी तरह से समझ चुके हैं अथवा समझ सकते हैं।
कुछ ऐसी ही गलती मैं भी अपने जीवन में कर चुका हूँ। लेकिन इसमें किसी की गलती नहीं थी,ये कहीं न कहीं मेरी कमी थी कि मैं उस व्यक्ति को समझ नहीं पाया। जब उसने मुझे अपने मन की भावना बताई तो मुझे पता चला कि उसकी अपेक्षाओं को मैं पूर्ण नहीं कर पाया। आप अपनी भावनाओं को कभी किसी के सामने अभिव्यक्त नहीं कर सकते। ऐसी अवस्था में यदि हम इसमें उसकी गलती दे दें तो निश्चित ही हम गलत कर रहे हैं। हमको आवश्यकता है स्वयं को पहचानने की, स्वयं की क्षमताओं को पहचानने की और उन्हें पहचान कर मूर्त रूप देकर हम निश्चय ही अधिक संतुष्ट रह सकते हैं।

आज से यदि कभी भी मन में किसी के लिए कोई गलत विचार आपके मन में आए तो बस मेरा एक तरीका अपनाइएगा। स्वयं से इस बात का चिंतन करिएगा कि आपने जिस व्यक्ति से जुड़कर उसके लिए जो कुछ किया है उससे आप आत्मसंतुष्ट हैं अथवा नहीं। यदि आपको लगे कि आप अपने द्वारा किए गए कार्यों से संतुष्ट हैं तो इस बात से चिंतित मत होइएगा कि सामने वाला व्यक्ति क्या कह रहा है या क्या सोच रहा है।
मित्रों यदि रास्ते पर कंकड़ ही कंकड़ हो तो भी एक अच्छा जूता पहनकर उस पर चला जा सकता है..
लेकिन यदि एक अच्छे जूते के अंदर एक भी कंकड़ हो तो एक अच्छी सड़क पर भी कुछ कदम भी चलना मुश्किल है।

अर्थात बाहर की चुनौतियों से नहीं हम अपनी अंदर की कमजोरियों से हारते हैं। स्वयं से कभी मत हारिएगा। अपने आपमें कभी नकारात्मक परिवर्तन मत लाइएगा। सकारात्मक सोच और उसका अनुसरण ही आपके जीवन का आधार है। मैं कोई बहुत बड़ा ज्ञानी नहीं हूँ लेकिन अपने अनुभवों के आधार ये आपसे साझा कर रहा हूँ।

वंदे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...