एक कोशिश, आपको समझने की। एक कोशिश, खुद को समझाने की। एक कोशिश, आपसे जुड़ने की। एक कोशिश, आपकी आवाज बनने की। एक कोशिश, खुद के नाम को सार्थक करने की।
Tuesday, 26 April 2016
'ऑड-ईवन' पर देश के मन की बात सुनिए मोदीजी!
Tuesday, 19 April 2016
मैं सनातनी हूं और मनुस्मृति को मानता हूं, लेकिन...
Friday, 15 April 2016
राम मंदिर की बात करने से पहले श्रीराम के चरित्र को समझें
राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप।
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप।।
इस संसार में चार राम हैं-
एक राम का सकल पसारा, एक राम है सबसे न्यारा।।
क्या आज हम प्रेम के उस स्वरूप को मानते हैं?
क्या आज हम उस प्रकार का भेदभाव रहित आचरण करते हैं?
क्या हमने कभी किसी की गलती पर इतना बड़ा दिल दिखाया?
क्या हमने अपनी शक्ति और अपने दायित्व में सामन्जस्य स्थापित करने का प्रयास किया?
क्या हम अपने विरोधियों अथवा शत्रुओं से कुछ सीखने की क्षमता रखते हैं?
क्या आज हम नारी पर इतना विश्वास करते हैं?
क्या आज के राजनेता ऐसी राजनीति और ऐसा राजधर्म निभाने की क्षमता रखते हैं?
Thursday, 14 April 2016
सोच बदलिए स्वरूपानंद जी, तब बचेगा सनातन
Wednesday, 13 April 2016
पद की गरिमा देखें शंकराचार्य, साईं का चढ़ावा नहीं
Friday, 8 April 2016
गौरवशाली अतीत और समृद्धि की प्रतीक है वर्ष प्रतिपदा
शुक्लपक्षे समग्रं तु तदा सूर्योदये सति ।।
Thursday, 7 April 2016
कैसे तुमको बतलाता कि जीवन का आधार तुम्हीं थी
कैसा जीवन है बिन तेरे, कैसे तुमको समझाऊं
नहीं रहा अब प्रेम पुराना, कैसे मन को बतलाऊं।
जीवन की उस नरम डोर को जब से तुमने छोड़ा है
हर पागल दीवाने ने मुझसे, खुद को जोड़ा है
प्रेम राग था बड़ा कठिन पर मैंने उसको गाया था
उसी दौर में एक स्वप्न तब मेरी नींद में आया था।
कैसा था अहसान तुम्हारा, मेरे दिल की हसरत पर
हर आहट दस्तक देती थी, मेरे मन की चौखट पर
मिला था जब भी साथ तुम्हारा, खुद से पार गया था मैं
नहीं मिला जब प्रेम तुम्हारा, खुद से हार गया था मैं
नहीं रुका करता है जीवन, किसी के आने जाने से
प्रेम पल्लवित होता है बस, अपने मन को भाने से
यही दिलासा दी थी तुमने, जब मैं मिलने आया था
'नहीं तुम्हारी जगह कोई अब' कहकर हाथ छुड़ाया था
कैसे तुमको बतलाता कि जीवन का आधार तुम्हीं थी
कैसे तुमको समझाता कि मेरा तो विश्वास तुम्हीं थी
Wednesday, 6 April 2016
बिना तुम्हारे स्वप्न लोक भी लगता मुझको अधूरा था
तेरी बाँहों में झूला, शब्द प्रस्फुटित हुआ तभी तो
जीवन का आधार बनी तुम, बसकर मेरी सांसों में
फिर मेरा संसार बनी तुम, आकर मेरी बाँहों में
प्रेमपुंज का दीपक हो तुम, मेरी तुम अभिलाषा हो
मुझको मुझ से मिलाने वाली, तुम मेरी परिभाषा हो
कैसे तुमको नहीं लिखूं मैं, तुम तो मेरी चाहत हो
कलम में पड़ने वाली स्याही, की तुम तो अकुलाहट हो
तुमने जीना सिखलाया, फिर नजर झुका कर चली गई
फिर इस गौरव की इच्छा, बाजार बीच में छली गई
तुझमें खोकर खुद को पाया, कैसे अहसान चुकाऊंगा
तू भी दूर गई तो बोलो कैसे जीवित रह पाऊंगा।
ये शब्द नहीं पीड़ाएँ हैं, जीवन के अकथित पृष्ठों की
था प्रेम भरा तुमने आकर, फिर छोड़ मुझे तुम चली गई।
जाना था तो जाती तुम, क्यों सुन्दर स्वप्न वो दिखलाए
क्यों किया दिखावा मुझसे वो, क्यों महल कीर्ति के बिखराए।
था प्रेम तुम्हारा जीवन में, तब मैं खुद में ही पूरा था
बिना तुम्हारे स्वप्न लोक भी लगता मुझको अधूरा था
पूनम, तुम मरकर भी वेमुला न हुई
वह लड़का किसी भी संप्रदाय का हो सकता था लेकिन दुर्भाग्यवश वह मुसलमान था और लड़की दलित। अगर वह लड़का कोई हिंदू सवर्ण होता तो शायद आज देश का राष्ट्रीय मीडिया उसे अपनी टीआरपी का साधन बना चुका होता लेकिन गेम उल्टा हो गया और लड़का मुसलमान निकल गया। मीडिया अगर इस मामले को उठाती तो सांप्रदायिक हो जाती, कोई नेता अगर उस लड़की के घर चला जाता तो उसे दंगाई करार दिया जाता। खैर नेता और मीडिया ने अपने चरित्र को साफ सुथरा रखते हुए दायित्व का बखूबी निर्वहन किया साथ देश को हिंदू-मुसलमान में बांटने वालों को इसमें लव जेहाद दिखने लगा और एक लड़का जिसको शायद कुरान की चार आयतें भी याद नहीं होंगी, उसके दुष्कृत्य की वजह से पूरी कौम निशाने पर आ गई।
लेकिन क्या किसी ने सोचा कि इस पूरे मामले में किसने क्या खोया और किसने क्या पाया? मैं बताता हूं, एक लड़की ने अपने सपने खोए, उसने अपनी जिंदगी खोई, उसके मां-बाप ने अपना विश्वास खोया, समाज में मोहब्बत फिर शर्मसार हुई और देश तोड़ने वालों को मिला गया एक मुद्दा। एक ऐसा मुद्दा जिसे लेकर वे आगामी कई सालों तक जब टीवी डिबेट में तर्कहीन हो जाएंगे तो कहेंगे, 'पूनम भारती की जिंदगी से खेलने वाले को मदरसे से ट्रेनिंग मिली थी।'

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि धोखा, फरेब और मौत का भी मजहबीकरण कर दिया जाता है। बिहार के जहानाबाद के शास्त्रीनगर मुहल्ले में रहने वाली पूनम भारती के सुसाइड नोट के मुताबिक, वह जहानाबाद के राजाबाजार मुहल्ले के रहने वाले मुस्लिम युवक जहांगीर अंसारी से प्रेम करती थी। पूनम की मोहब्बत इस कदर परवान चढ़ी कि उसने अपना सब कुछ जहांगीर को सौंप दिया। पूनम मां भी बनने वाली थी लेकिन जहांगीर ने उस बच्चे को पैदा होने से पहले ही मार दिया। आप कह सकते हैं कि पूनम कमजोर थी, वह जिंदगी से हार गई थी, उसे लड़ना चाहिए था लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता क्योंकि यह सब एक दिन में नहीं होता। उसे पूंजीवाद, मनुवाद, संघवाद या ब्राह्मणवाद ने नहीं मारा और अगर वह इनमें से किसी भी 'वाद' से तथाकथित तौर पर संपर्क रखने वाले लड़के ने पूनम के साथ ऐसा किया होता तो शायद आज धृतराष्ट्र की मुद्रा में बैठा मीडिया सबसे पहले पीएम मोदी को निशाना बनाता और विपक्ष शायद यह कहता कि सुरेश प्रभु को इस्तीफा देना चाहिए क्योंकि उसने ट्रेन से कूदकर आत्महत्या की थी। इस देश को खतरा सिर्फ ऐसे लोगों से ही नहीं है जो हिंदू-मुसलमान के नाम पर देश की एकता, अखंडता, एकात्मता और अस्मिता को खंडित कर रहे हैं बल्कि देश को खतरा उन मीडिया वालों और नेताओं से भी है जो स्वयं में हजारों चरित्र समाहित किए हुए हैं।
Friday, 1 April 2016
मजाक के नाम पर खिलवाड़ का दिन है अप्रैल 'फूल्स डे'
उस दिन भी रोज की तरह ही हम दोनों कॉलेज पहुंचे। दोपहर के समय नितिन भैया के मकान मालिक का स्कूल में फोन आया और उन्होंने बताया कि गांव में नितिन भैया की माता जी का स्वर्गवास हो गया है। नितिन भैया को यह बात पता लगी तो वह मेरे पास आए और अपना स्कूल बैग मुझे देते हुए नम आंखों से बोले, 'इसे घर लिए जाना।' इसके अलावा वह कुछ भी न कह सके और अगने गांव के लिए निकल गए। जब मैं घर वापस आया तो मैंने अपने घर में बताया कि किस तरह से नितिन भैया बिना कुछ बताए गांव चले गए। मेरे बाबा जी ने जब नितिन भैया के मकान मालिक से पता किया तो पता लगा कि नितिन भैया की माता जी का निधन हो गया है और उनके गांव से किसी ने यह जानकारी फोन पर दी है। नितिन भैया से मेरे परिवार का लगाव कुछ ज्यादा ही था इसलिए बाबा जी ने तय किया कि वह भी उनके गांव जाएंगे। फिर बाबा जी ने नितिन भैया के मकान मालिक से उनके पिता जी का फोन नंबर लिया और कॉल की। वहां से मिली जानकारी हैरान कर देने वाली थी। नितिन भैया के पिता जी ने बताया कि नितिन की माता जी पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं और जिसने भी कॉल किया था उसने 'अप्रैल फूल' बनाने के लिए ऐसा भद्दा मजाक किया था।
अब जरा एक बार आप कल्पना कर के देखिए कि 800 किमी दूर रह रहे उस लड़के की क्या स्थिति हुई होगी जब उसने इस परिस्थिति का सामना किया होगा। 'उत्सवधर्मिता' के नाम पर 'अप्रैल फूल डे' जैसे दिनों को मनाने का प्रचलन कितना खतरनाक है, इस बात का अंदाजा हम सिर्फ एक उदाहरण से मना सकते हैं। कुछ लोगों का तर्क हो सकता है कि दीवाली और होली पर भी तो लोगों की जान जाती है तो क्या उसे भी मनाना बंद कर देना चाहिए? दोस्तो, विषय जान जाने या किसी को मानसिक प्रताड़ना देने का नहीं है बल्कि विषय है कि उत्सव के पीछे की मानसिकता क्या है? क्या किसी को मूर्ख (फूल) बनाना बहुत अच्छी बात है? कुतर्क चाहे कुछ भी हो लेकिन सही मायनों में जवाब 'नहीं' ही है।
इस 'दिन' को मनाने के पीछे सर्वाधिक प्रचलित मान्यता ब्रिटेन के लेखक चॉसर की पुस्तक द कैंटरबरी टेल्स की एक कहानी पर बेस्ड है। चॉसर ने अपनी इस पुस्तक में कैंटरबरी का उल्लेख किया है जहां 13वीं सदी में इंग्लैंड के राजा रिचर्ड सेकेंड और बोहेमिया की रानी एनी की सगाई 32 मार्च 1381 को आयोजित किए जाने की घोषणा की जाती है। कैंटरबरी के आम नागरिक इसे सही मानकर मूर्ख बन जाते हैं, तभी से एक अप्रैल को मूर्ख दिवस अर्थात अप्रैल फूल डे मनाया जाने लगा। एक अन्य मान्यता है कि 1564 से पहले यूरोप के अधिकांश देशों मे एक जैसा कैलेंडर प्रचलित था जिसमें नया साल 1 अप्रैल से आरंभ होता था। 1564 में राजा चार्ल्स नवम् (CHARLES IX) ने एक बेहतर कैलेंडर को अपनाने का आदेश दिया। नए कैलेंडर में 1 जनवरी को वर्ष का प्रथम दिन माना गया था। लोगों ने इस नए कैलेंडर को अपना लिया, लेकिन कुछ लोगों ने इसे अपनाने से इनकार कर दिया तथा वे 1 जनवरी को नया साल न मानकर 1 अप्रैल को ही वर्ष का पहला दिन मानते थे। नया कैलेंडर अपनाने वालों ने इन लोगों को मूर्ख मानकर उपहास उड़ाना शुरू कर दिया। तभी से 1 अप्रैल को 'फूल्स डे' के रूप मे मनाने का प्रचलन हो गया।
इन दो मान्यताओं के अलावा एक और तर्क दिया जाता है कि भारतीय संस्कृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष का प्रारंभ माना जाता है। अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति के विषय में हमेशा कहा कि यह पिछड़ी संस्कृति है, इसको मानने वाले 'पागल' हैं और इन बातों के हजारों भी प्रमाण मिल जाएंगे। चूंकि भारत में तो सभी पर्व और त्योहार 'तिथि' यानि नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार मनाए जाते थे, इस प्रकार की गणना अंग्रेजों की समझ के परे थी तो उन्होंने मान लिया कि ये लोग 1 अप्रैल को नया साल मनाते हैं। और फिर भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नीचा दिखाने के लिए 1 अप्रैल को 'फूल डे' मनाने लगे।
इन तर्कों में कोई भी तर्क सही हो सकता है लेकिन इस तथाकथित 'डे' का आधार कहीं से भी आज के परिप्रेक्ष्य में उचित नहीं लगता। कल भी एक अप्रैल था, क्या खास था कल? शायद कुछ नहीं, फिर क्यों मजाक के नाम पर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करा गया? क्यों एक आधारहीन तर्क के साथ अव्यवहारिक 'दिवस' हमने जोर शोर से मनाया? किसी के साथ मजाक करने और किसी को परेशान करने में अंतर होता है। जिस 'डे' के आरंभ होने में ही नकारात्मकता हो उसे आप किस आधार पर तर्कसंगत कह सकते हैं? भारतीय संस्कृति एक उत्सवधर्मी संस्कृति है, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिस उत्सव को हम आत्मसात कर रहे हैं वह पाश्चात्य देशों से आया है या कहीं और से, फर्क इस बात से पड़ता है कहीं हम उत्सवधर्मिता के नाम पर ठगे तो नहीं जा रहे।
सनातन संस्कृति में योग का विशेष महत्व है और 'हास्य' योग के विषय में भी आपने सुना ही होगा। जिस संस्कृति में 'हास्य' को योग की श्रेणी में माना गया हो उसमें 'फूल डे' जैसे दिनों को मनाना क्या कहा जाएगा, आप स्वयं तय कर लीजिए....
Wednesday, 23 March 2016
किसको 'फॉलो' करते हैं मोदी? आपको क्या?
मैं एक सामान्य व्यक्ति हूं, पेशे से पत्रकार हूं, अपने काम को किसी प्रकार की वैचारिक प्रतिबद्धता के अधीन होकर नहीं करता और मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मैंने नरेन्द्र मोदी के नाम पर बीजेपी को वोट दिया था। मैं स्वयं को हिंदू मानता हूं, सनातन मूल्यों में मेरा पूर्ण विश्वास है, मानवीयता को सर्वश्रेष्ठ गुण मानता हूं, प्राकृतिक संपदाओं के दोहन का विरोध करता हूं, मनुष्य ही नहीं जीवों को भी इस धरती पर अपने बराबर का सहभागी मानता हूं और यह सब मुझे सनातन संस्कृति ने सिखाया है क्योंकि यही वह संस्कृति है जो मुझे यह सिखाती है कि चीटियों को भी आटा खिलाना है और नागों को भी दूध पिलाना है। रही बात हिंदुत्व की तो यह मेरी राष्ट्रीयता का आधार है और मुझे इस पर गर्व है, जिस प्रकार से लोग राष्ट्रीयता को भारतीय कहते हैं उसी के आधार पर मैं हिंदू को राष्ट्रीयता मानता हूं। इसका एक मात्र कारण है कि मेरा मानना है कि हिंदुत्व में सनातन संस्कारों का समावेश है। मैं नहीं मानता कि हिंदू होने के लिए मंदिर जाना जरूरी है या किसी खास पूजा पद्धति का अनुसरण करके ही आप हिंदू हो सकते हैं। लेकिन जो लोग हिंदुत्व को पूजा पद्धति से जोड़ कर स्वयं की राष्ट्रीयता को भारतीय बताते हैं, मैं उनका विरोध भी नहीं करता क्योंकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वास्तव में 'हिंदू' को रिलिजन ही समझा जाता है। जिस प्रकार से मैं विरोध नहीं करता उसी प्रकार से यह अपेक्षा भी करता हूं कि 'हिंदू' शब्द को मैं जिस रूप में लेता हूं यदि उसमें कोई गलत बात नहीं है तो उसका विरोध न किया जाए। हिन्दुत्व को लेकर बहुत से लोगों के अपने अलग पैमाने हैं, कोई कहता है कि हिंदू वह है जो राम मंदिर की बात करें, कोई कहता है कि हिंदु वह है जो रोज गीता पढ़े, तो कोई कहता है कि मनुस्मृति को जीवन का आधार मानने वाला ही हिंदू है। मैं इन सब में नहीं पड़ना चाहता लेकिन मैं बस इतना मानता हूं कि हिंदू 'वीर' तो हो सकता है लेकिन कभी कट्टर नहीं हो सकता, हिंदू 'परंपरा' को तो मान सकता है लेकिन अंन्धभक्ति नहीं कर सकता, हिंदू अपनी सनातन संस्कृति को सम्मान दे सकता है लेकिन नियमित मंदिर जाने की अनिवार्यता नहीं थोप सकता, हिंदू अपने संस्कारों पर गर्व तो कर सकता है लेकिन दूसरी संस्कृतियों का विरोधी नहीं हो सकता। इस देश का दुर्भाग्य है कि हिॆदुत्व के नाम पर कट्टरता का सहारा लिया जा रहा है लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है।
मैं पहले भी लिख चुका हूं कि आप किसी जमीनी स्तर पर काम करने वाले कांग्रेसी या वामपंथी से पूछेंगे कि देश टूट जाए क्या? या देश किसी का गुलाम हो जाए क्या? तो उसका जवाब नहीं ही होगा। अगर कोई कांग्रेसी या वामपंथी है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह राष्ट्रविरोधी है। बहुत सीधी सी बात है कि व्यक्ति अपने विवेक के आधार पर तय करता है कि सभी विचारधाराओं/पार्टियों में कौन सी विचारधारा/पार्टी सर्वाधिक अच्छी और परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है। इसके लिए यह अनिवार्यता नहीं कि वह व्यक्ति पूरी तरह से उस विचारधारा अथवा पार्टी से सहमत हो। वरिष्ठ पत्रकार श्री नीरेन्द्र नागर जी ने एक दिन मुझसे कहा था कि विश्व गौरव, व्यक्ति का महत्व नहीं उसके विचारों का महत्व होता है। मैं भी यही मानता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति एक विचार है, वह पूरी तरह किसी विचारधारा से सहमत हो ही नहीं सकता, यदि उसमें स्वयं का विवेक है तो। विचारधारा को कई लोगों के विचारों का कॉकटेल कहें तो गलत नहीं होगा। आप किसी के विचारों से सहमत हो सकते हैं और किसी के विचारों से असहमत, इसी आधार पर आप किसी मुद्दे पर किसी विचारधारा से सहमत हो सकते हैं और किसी मुद्दे पर असहमत हो सकते हैं।
मैं एक पत्रकार हूं, पूर्व में छात्र राजनीति में सक्रिय रहा हूं इसी नाते बहुत से लोग सोशल मीडिया पर जुड़े हैं, फेसबुक पर लगभग 14000 लोग जुड़े हैं, 4000-5000 ग्रुप में जुड़ा हूं, कभी किसी पेज पर अच्छा विचार दिख गया तो उसे लाइक कर दिया। अब एक सीधे सवाल का जवाब दे दीजिए, क्या 14000 लोगों में कोई कुछ लिखता है जिससे कि मैं सहमत न हूं तो क्या उसके लिए यह कहना उचित होगा कि इसकी मित्र सूची में एक पत्रकार जुड़ा है और इसका मतलब है कि वह 'कट्टर' अथवा 'अंधभक्त' है? किसी ग्रुप में कोई फर्जी पोस्ट आ जाए तो क्या यह कहना उचित होगा कि इस ग्रुप में एक पत्रकार है यानि कि वह अफवाहों को बढ़ावा देता है, किसी पेज के द्वारा कुछ अपमान जनक कहा जा रहा है तो क्या यह कहा जाना उचित होगा कि इस पेज को एक पत्रकार ने लाइक कर रखा है और इस बात के लिए इस पत्रकार पर मानहानि का केस करना चाहिए। मेरी सहमति इस बात से तय होगी कि मैं कौन सी पोस्ट शेयर करता हूं।
मैं एक बहुत ही सामान्य व्यक्ति हूं, जिस ट्विटर अकाउंट पर मैं लगातार ऐक्टिव रहता हूं उस पर सिर्फ 3 अकाउंट्स फॉलो कर रखे हैं, एक मेरे छोटे भाई का है, एक उस संस्थान का है जहां मैं कार्यरत हूं और एक अकाउंट कुमार विश्वास का है। मैं कुमार विश्वास का प्रशंसक हूं, इसका मतलब यह नहीं कि उसके सभी ट्वीट्स से पूरी तरह सहमत होता हूं, उसके टू लाइनर अच्छे लगते हैं तो फॉलो करता हूं, कोई काम न होते हुए भी मैं इन तीन हैंडल्स द्वारा किए गए सारे ट्वीट्स नहीं देख पाता। मेरी सहमति उस ट्वीट से प्रदर्शित होगी जिसे मैं रीट्वीट करूंगा।
अब आता हूं मुख्य मुद्दे पर, आज एक 'विशेष रिपोर्ट' पढ़ी। उस विशेष रिपोर्ट का शीर्षक था, 'ट्विटर पर आपकी संगति कुछ ठीक नहीं लगती प्रधानमंत्री जी!'। बहुत ही शोधात्मक रिपोर्ट थी। उस रिपोर्ट को आप 'यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।' इस रिपोर्ट में कहा गया कि ‘कट्टर हिन्दू’ लोगों को फॉलो करते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इन कट्टरपंथियों में कोई भी ‘कट्टर मुस्लिम’, ‘कट्टर सिख’, ‘कट्टर जैनी’ या ‘कट्टर ईसाई’ नहीं है, इनमें कभी लोगों से ‘जी न्यूज़’ देखने की मांग की जाती है, तेजिंदर पाल सिंह बग्गा को नरेंद्र मोदी स्वयं भी फॉलो करते हैं। अब आप बताइए इसमें क्या कोई समस्या है, क्या इन सभी लोगों से पीएम मोदी की पूर्ण सहमति की अनिवार्यता है?
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि नरेन्द्र मोदी मायपीएम नमो, नरेंद्र मोदी पीएम, मोदी फॉर पीएम, मोदी यूनाइटेड फैन क्लब, फ़ोर्स नमो, नमो टी पार्टी, नरेंद्र मोदी आर्मी, नमो चाय पार्टी, इंडिया नीड्स मोदी, नरेंद्र मोदीज फैन, मोदीप्लोमैसी, नरेंद्र मोदी फैन, नमो लीग, नमो 2019, नमो शक्ति, माय पीएम नरेंद्र मोदी, मोदी-फाइंग इंडिया, नमो इंडिया, देश भक्त, नमो_गाथा, मोदीफाई यूपी, नमो युग, नमो माय पीएम, भाजपा पथ-नमो पथ जैसे अकाउंट फॉलो करते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्ममुग्धता का परिचय सिर्फ उनके ‘सेल्फी-प्रेम’ या अपने नाम वाला सूट पहनने से ही नहीं बल्कि ट्विटर अकाउंट्स से भी देखा जा सकता है. यहां मोदी दर्जनों ऐसे अकाउंट्स को फॉलो करते हैं जो उनके नाम से और उन्हें महिमामंडित करने के लिए बनाए गए हैं'। मुझे समझ नहीं आता कि आखिर इसमें बुराई क्या है? आखिर जिन लोगों ने प्रत्यक्ष रूप से मोदी के चुनाव में काम किया, पूरा सोशल मीडिया मैनेज किया उनके विचारों से क्या इस देश के प्रधान को अवगत होने का अधिकार नहीं है? लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि देश का प्रधान उनके दिखाए रास्ते पर ही चलेगा। एक नेता का यह अधिकार के साथ साथ कर्तव्य भी है कि उसे कुर्सी देने वालों से या उसे कुर्सी तक पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत करने वालों के विचारों को जाने और उसमें से जो उचित लगे उस विचार को अपनाए। साथ ही उस नेता का यह कर्तव्य भी है कि वह विपक्ष द्वारा चलाई गई उन योजनाओं को भी जारी रखे जो राष्ट्र हित में है। इन दोनों पैमानों में नरेन्द्र मोदी खरे उतरते हैं। एक वेबसाइट के द्वारा ऐसे विषयों पर विशेष रिपोर्ट्स के नाम पर तथाकथित सनसनीखेज खुलासे किए जा रहे हैं यह वास्तव में दुखद स्थिति है। मैं आज इन ट्विटर अकाउंट्स को चेक कर रहा था, वास्तव में इसमें बहुत सी ऐसी पोस्ट डाली गई हैं जो गलत हैं लेकिन क्या आप यह मानकर चल रहे हैं कि ये लोग जो भी पोस्ट डालेंगे उससे मोदी जी की सहमत होंगे।

मैं बहुत से विषयों पर पीएम मोदी का विरोध करता हूं। पहले भी करता था, एक समय था जब मोदी जी गुजरात के सीएम हुआ करते थे। उस दौरान उन्होंने मेरे नाम से मेरे संस्थान के लिए एक शुभकामना संदेश भेजा था। क्या इस शुभकामना संदेश के आधार पर आप यह कह सकते हैं कि मेरे संस्थान की हर खबर के प्रत्येक पक्ष से वह सहमत थे। नहीं, बिलकुल नहीं। उनको कुछ लेख पसंद आए होंगे तो उन्होंने शुभकामनाएं भेजीं, हर दिन तो वह उस समाचारपत्र को पढ़ते भी नहीं होंगे। ठीक उसी प्रकार ट्विटर पर किसी का ट्वीट पसंद आया तो उसे फॉलो कर लिया, अब अगर इसे मुद्दा बनाकर पेश किया जाएगा तो शायद उचित नहीं होगा।
देश में हजारों विषयों के होते हुए ऐसे विषयों को उठाया जा रहा है। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि यदि आप किसी विचारधारा का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करते हैं तो इसका अर्थ यह है कि आप अपनी विपक्षी विचारधारा में कुछ अच्छा देखने की कोशिश ही नहीं करेंगे। मेरी एक साथी स्वाति मिश्रा ने आज फेसबुक पर लिखा, 'UPA सरकार के दूसरे कार्यकाल की बात है। मनमोहन सिंह की सरकार के लिए बहुत कुछ कहा जा रहा था। भ्रष्टाचार के साथ-साथ और भी तमाम मुद्दे थे। ऐसे में भी उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। मीडिया के सवालों का लाइव जवाब दिया। स्थानीय भाषा की मीडिया से भी कई बार बात की। भारत में भी जब कहीं दौरे पर गए, तो ज़्यादातर बार मीडिया के सवालों का जवाब दिया। इधर अपने मोदी को देखिए। ना चुनाव से पहले बोले, ना अब बोलते हैं। कभी बोले भी, तो अपने लोग छांट के उनसे ही बोले। कभी कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, मीडिया के सवाल नहीं। लोग बोलते रहें, लेकिन उनकी सेहत को असर नहीं पड़ता। ऐसा नहीं कि बोलते नहीं, बोलते खूब हैं पर बस अपने मन का।
सोचिए कि मोहल्ले में कोई एक बड़ा लाउडस्पीकर लगाए और जब चाहे उसपर आड़ा-तिरछा चिल्लाए। आप परेशान होते रहें, लेकिन कभी उस लाउडस्पीकर से हैप्पी बर्थडे का गाना आए और कभी खाली-पीली का दर्शन। मोदी इस देश में वही लाउडस्पीकर हैं। बजते हैं, पर किसी काम का नहीं।'
बहुत अच्छी बात है कि स्वाति जी ने अपने मन की बात कह दी। मन की बात कहने का अधिकार हर एक को है, देश के प्रधान को अधिकार है कि अपने मन की बात पूरे देश से करे और यही अधिकार इस लोकतंत्र में एक सामान्य व्यक्ति को भी मिला है। लेकिन स्वाति जी के द्वारा उठाए गए विषय का एक दूसरा पक्ष भी है। इस देश का प्रधानमंत्री यूके जाता है और वहां पर प्रेस वार्ता में एएनआई के पत्रकार को यह सोचकर प्रश्न पूछने के लिए कहता है कि यह मेरे देश का पत्रकार है, यह इस समय मेरे लिए देश की आवाज है और देश के लिए मेरी आवाज, तो यह जो भी पूछेगा देश के हित में पूछेगा लेकिन हमारे पत्रकार साहब मोदी जी के समक्ष असहिष्णुता का मुद्दा उठाते हैं। जिस स्थान पर पूरे विश्व का मीडिया हो वहां पर देश की आतंरिक स्थिति पर देश के प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा कर देना उन पत्रकार महोदय का कैसा दायित्व है। जितना मोदी ने असहिष्णुता के मुद्दे पर वहां बोला कि मेरे लिए हर एक घटना महत्व रखती है उतनी बात अगर यहाँ बोल देते तो शायद आधी समस्याओं का समाधान हो जाता। पत्रकार का काम देश में और देश के बाहर जनता और सत्ता के बीच सकारात्मक सोच के साथ सेतु का काम करना है। एएनआई के पत्रकार यदि भारत में मोदी जी की एक बाइट लेकर चला देते तो शायद आज तथाकथित 'असहिष्णुता' कोई मुद्दा ही ना होता। अब यह मत कहिएगा कि पीएम साहब देश में रहते कब हैं?
यह विषय मात्र पत्रकारों तक ही सीमित नहीं है। प्रत्येक सामान्य व्यक्ति को इस देश के विषय में सोचना होगा, प्रत्येक उस विषय का समर्थन करना होगा जिसमें देश का कल्याण निहित हो। अभी कुछ दिन पहले कानपुर से वापस आते हुए ट्रेन में यात्रा के दौरान सुबह 7 बजे मेरे 2 सहयात्रियों ने नाश्ते में चाय और बिस्किट लिए। वे मेरे परिचित नहीं थे, लगभग 20 और 30 साल की उम्र वाले उन दोनों सहयात्रियों ने बिस्किट का खाली पैकेट वहीं सीट के नीचे फेंक दिया। मैं थोड़ा 'मुंहफट' किस्म का व्यक्ति हूं तो मैंने बड़े भाई से कहा कि भाईसाहब क्या करते हैं? तो वह बोले कि बस काम-धंधा चलता है अपना। मैंने नीचे पड़े बिस्किट के खाली पैकेट उठाकर पास लगी डस्टबिन में फेंकते हुए कहा कि अगर आप यह काम और कर देते तो मुझे बहुत खुशी होती। मैं यह 'हरकत' इसलिए करता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि शायद इससे किसी को शर्म आ जाए और वह आगे से गंदगी करने से पहले एक बार सोचे। लेकिन आप एक सामान्य व्यक्ति की सोच समझिए, उसने अपनी चाय खत्म करते हुए कप उसी तरह नीचे डालते हुए बोला कि भाई ट्रेन साफ करने के पैसे दिए जाते हैं, अगर गंदगी नहीं होगी तो सफाई करने वाले के पास हराम के पैसे जाएंगे। मैं उस पढ़े-लिखे से दिखने वाले आदमी की सोच पर निःशब्द था। क्या सोच थी उसकी। उसके छोटे भाई ने तुरंत नीचे फेंका हुआ अपने भाई का कप उठाया और अपने कप के साथ उसे डस्टबिन में फेंक कर आया।
दोस्तो, यह वह समय है जब इस देश के प्रत्येक वर्ग को एक होना होगा, अपने लिए नहीं बल्कि अपनों के लिए। मोदी हों या केजरीवाल, दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, सभी की अच्छी और समाज के लिए उपयुक्त परंपराओं को एक साथ आना होगा। जब तक 'फर्जी' विषयों से बाहर निकल कर, एकरूपता के प्रभाव को स्थापित करने का प्रयास छोड़कर एकता के लिए प्रयास नहीं किया जाएगा तब तक इस देश को विश्व शक्ति नहीं बनाया जा सकता।
वंदे भारती
Monday, 21 March 2016
जनरल टिकट के साथ स्लीपर कोच की रात
इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा
मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है
9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...
