Friday, 5 February 2016

वंचितों को आरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन...

कुछ दिन पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाला रोहित वेमुला नाम का एक मेधावी छात्र आत्महत्या कर लेता है। निश्चित ही आत्महत्या जैसा कदम उठाना कोई सामान्य बात नहीं होती, तय है कि वह बहुत परेशान रहा होगा तभी उसने ऐसा कदम उठाया। आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन नामक जिस संगठन का वह कार्यकर्ता था, उसकी विचारधारा का मैं समर्थन नहीं करता लेकिन फिर भी मैं उस छात्र विशेष की योग्यता पर पूर्ण विश्वास रखता हूं। रोहित के परिवार के साथ मेरी पूरी संवेदनाएं हैं। देश ने निश्चित तौर पर एक काबिल बेटा खोया है, इस मामले की निष्पक्ष जांच करा कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए लेकिन उस छात्र की मौत के बाद भारत को सबसे अधिक पत्रकार देने वाले दिल्ली के आईआईएमसी में जो चल रहा है उससे बहुत आहत हूं।

पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाला एक छात्र, उत्कर्ष सिंह फेसबुक पर पोस्ट डालता है। उस पोस्ट को पढ़कर उसके कुछ सहपाठियों की तथाकथित तौर पर भावनाएं आहत होती हैं और वे इसकी शिकायत कॉलेज प्रशासन से करते हैं। अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए उत्कर्ष माफी मांगता है और आपत्तिजनक शब्दों को अपनी पोस्ट से हटा देता है। यहां तक मामला मुझे समझ में आया लेकिन इसके बाद उसी कॉलेज के एक अन्य छात्र की भावनाएं इस कदर आहत हो जाती हैं कि वह एससी-एसटी आयोग में शिकायत कर देता है। चलिए यहां तक भी ठीक है। शिकायत करना और अपनी भावनाएं आहत करवाना इस देश में एक संवैधानिक अधिकार है लेकिन क्या इस मामले के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हमें उस पोस्ट को नहीं पढ़ना चाहिए जिसको लेकर आईआईएमसी के छात्र प्रशांत की भावनाएं आहत हुईं।
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यह उत्कर्ष की पुरानी पोस्ट है जिसमें घेरे में वे शब्द हैं जो प्रशांत की भावनाओं को आहत करते हैं। मैंने कुछ साल पहले एक फिल्म देखी थी ‘रांझणा’ जिसमें ‘रंडीरोना’ शब्द प्रयोग बोला गया था। तब किसी की भावनाएं आहत नहीं हुईं। दिन में 500 फेसबुक पोस्ट देखता हूं जिसमें लिखा होता है ‘….अब मीडिया का रंडीरोना शुरू होगा।’ लेकिन हम तो अपनी भावनाएं आहत नहीं करवाते।

उत्कर्ष ने जो कुछ लिखा उसे एक बार समझकर देखिए। वह तो बाहें फैलाकर बिछड़ों को अपनाना चाहता है, वह तो खुलकर कह रहा है कि आओ और हमारे साथ मिलकर खत्म कर दो इस खाई को, वह तो आपसे पहले जातिप्रथा को समाप्त करने की वकालत कर रहा है, कंधे से कंधा मिलाकर चलने की बात कर रहा है लेकिन हमारे कुछ भावी पत्रकार अपनी भावनाएं आहत करा लेते हैं। कैसी मानसिकता के लोग हैं वे जो आयोग को इस पोस्ट के खिलाफ लिख रहे हैं।

मुझे उत्कर्ष की इस पोस्ट में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश के तथाकथित नंबर वन चैनल इस विषय को लेकर दिनभर डिबेट करा रहे हैं। एक पीएचडी छात्र की आत्महत्या के बाद जो होता है उसे बहस का मुद्दा बनाने वाले इन तथाकथित समाज के प्रहरी चैनलों के गर्म कमरों में बैठने वाले क्रांतिकारी पत्रकारों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सियाचीन में देश के 10 बेटों का इंतजार ‘काल का गाल’ कर रहा है। इन क्रांतिकारियों को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि पाकिस्तान में खुले आम घूमने वाला एक आतंकी भारत को धमकियां दे रहा है। इन क्रांतिकारियों को फर्क पड़ता है एक मसालेदार टीआरपी वाली आधारहीन खबर से। ये एक कॉलेज के वैचारिक मतभेद को राष्ट्रीय मुद्दा बना देते हैं।
मैं नहीं जानता उत्कर्ष कौन है, वह किस विचारधारा से जुड़ा है लेकिन मुझे इतना जरूर पता है कि आगे आने वाले सालों में वह एक समाचार संस्थान में काम कर रहा होगा। उस उत्कर्ष की पीड़ा ना ही मैं समझ सकता और ना ही आप। जिन चैनल की माइक आईडी लेकर वह दूसरों से जवाब मांगना चाहता था उसी माइक आईडी के सामने उसे जवाब देना कैसा लग रहा होगा? और रही बाद उस तथाकथित दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की तो यह बात सामने आ चुकी है कि वह दलित था ही नहीं। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है कि एक ओबीसी कैटिगरी के छात्र द्वारा एससी कैटिगरी का जाति प्रमाण पत्र बनवा लेने पर बहस करे? क्या ऐसी लचर व्यवस्था पर सवाल नहीं उठना चाहिए?

एक दलित छात्र आत्महत्या कर लेता है तो देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता शोक संवेदना व्यक्त करने लगते हैं। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल जी तो पीएम मोदी को देश से माफी मांगने की सलाह तक दे डालते हैं लेकिन अगर यह मामला मीडिया में ना उछाला जाता तो क्या ये नेता वहां जाते? पिछले 10 सालों में हैदराबाद के कुल 10 दलित छात्रों ने आत्महत्या की लेकिन क्या राहुल गांधी एक बार भी वहां गए? एक होनहार छात्र की आत्महत्या पर पीएम मोदी को माफी मांगने की सलाह देने वाले केजरीवाल, गजेन्द्र सिंह की आत्महत्या पर कहते थे कि किसी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए लेकिन आज?

खैर, आज आहत भावनाओं के साथ संघर्ष कर रहे भावी पत्रकार प्रशांत की कुछ पुरानी फेसबुक पोस्ट देखीं। पहली पोस्ट में प्रशांत जी श्रीराम मंदिर बना रहे हैं, दूसरी पोस्ट में ऐसा लग रहा है जैसे वह देश के प्रत्येक नागरिक में समानता चाहते हैं, तीसरी पोस्ट में अटल जी की कविता के साथ इस बात से इनकार कर रहे हैं कि वह किसी जाति विशेष से आते हैं, चौथी पोस्ट में वह एक ऐसे शब्द का प्रयोग कर रहे हैं जिसे सामान्य तौर पर सभ्य नहीं माना जाता, पांचवीं पोस्ट में आम आदमी पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में देश में परिवर्तन की क्रांति लाना चाहते हैं और छठी पोस्ट में भी वह मंदिर निर्माण के आधारभूत स्तंभ के रूप में स्वयं को प्रदर्शित कर रहे हैं। इस तस्वीर को मैं आपके सामने इसलिए नहीं रख रहा कि आप इन विचारों के विरोधाभास को देखें अपितु मैं इसे आपके सामने इस लिए रख रहा हूं ताकि आप इस बात पर एक बार अवश्य चिंतन करें कि जब ऐसी विरोधाभासी विचारधारा वाला व्यक्ति आज एक वैचारिक मतभेद के चलते उसे एक समुदाय विशेष का मुद्दा बना देता है तो कल को जब वह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे मजबूत और निष्पक्ष स्तम्भ का एक अंग बनेगा तो देश कहां जाएगा?
मित्रो, मैं एक समाचार संस्थान में काम करता हूं। मेरे सहकर्मियों को शायद यह भी नहीं पता होगा कि मैं किस जाति वर्ग से आता हूं। जिस दिन से मेरे मन में ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना ने जन्म लिया उस दिन मैंने सबसे पहले अपने नाम से जाति सूचक शब्द को हटाया। मैं भी आरक्षण का विरोध करता हूं लेकिन मेरा मानना है कि वंचितों को, वनवासियों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण मिलना चाहिए। चार पहिया गाड़ियों से घूमने वाले और जातिगत आरक्षण के नाम पर सरकार का शोषण कर प्रतिभावान विद्यार्थियों के अधिकार पर डाका डालने वाले लोगों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। योग्यता, क्षमता और प्रतिभा किसी आरक्षण की मोहताज नहीं होती।
मुझे गर्व है उस उत्कर्ष पर जिसने अपने मित्रों की भावनाओं का सम्मान करते हुए अपनी पोस्ट से उन सामान्य से शब्दों को हटाया जो तथाकथित तौर पर आपत्तिजनक थे लेकिन उसने कॉलेज प्रशासन के सामने अपनी पूरी पोस्ट को हटाने से साफ तौर से इनकार कर दिया। ऐसी सहिष्णुता और ऐसा विश्वास जिस युवा में होगा वह निश्चित ही पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ बेहतर करेगा। साथ ही मैं प्रशांत से भी कहना चाहता हूं कि अपने विवेक के आधार पर निर्णय करना सीखो दोस्त, कहीं ऐसा ना हो कि किसी के बहकावे में आकर स्थिति ऐसी हो जाए कि आज से 10 साल के बाद खुद से ही नजर न मिला पाओ। आवश्यक है कि हम सभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच के बारीक अंतर को बरकरार रखें साथ ही अपने अधिकारों का दुरुपयोग न करें।

Tuesday, 2 February 2016

'प्रभु' की रेल का शर्मनाक चेहरा

पिछले कुछ दिनों में विभिन्न समाचार पत्रों में रेल मंत्री सुरेश प्रभु के कार्य की काफी सराहना पढ़ने को मिली। ख़बरों को पढ़कर लगता था की मेरी अगली ट्रेन की यात्रा शायद कुछ शानदार अनुभवों वाली होगी। कुछ पारिवारिक परेशानियों के चलते पिछले कुछ दिनों से लखनऊ में था। इसी दौरान मध्य प्रदेश के रीवा जिले में एक कार्यक्रम के लिए जाना हुआ। रीवा से वापसी के दौरान 31 जनवरी को रीवा-आनंद विहार ट्रेन से दिल्ली जाते समय ट्रेन के स्लीपर कोच में जो कुछ घटित हुआ वह कहीं ना कहीं रेलवे की व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह जरूर लगाता है। उस यात्रा के दौरान जो कुछ घटित हुआ वह वास्तव में काफी दुःखद है।
मैं, ट्रेन के एस-5 कोच की 26 नंबर सीट पर लेटा था। ट्रेन रीवा से जब इलाहाबाद पहुंची तो मेरे ठीक सामने वाली 31 नंबर साइड लोअर बर्थ पर तीन अधेड़ उम्र के लोग आकर बैठ गए। कुछ देर बाद वहां से टिकट पर्यवेक्षक महोदय गुजरे।
 
उनमें से एक व्यक्ति ने पर्यवेक्षक महोदय से कहा, ‘सर, हमारा वेटिंग टिकट है, अगर कोई सीट हो तो दे दीजिए।’ पर्यवेक्षक महोदय ने तत्काल अपना मुंह खोला और बोले, ‘एक सीट का 500 रुपए लगेगा।’ मैं चुपचाप लेटा था क्योंकि अगर वेटिंग टिकट है तो थोड़ा सा तो झेलना ही होगा। लेकिन टीटीई  की बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। एक ओर जहां प्रभु की रेल भ्रष्टाचार मुक्ति के बड़े-बड़े दावे कर रही है वहीं दूसरी ओर उनका एक कर्मचारी इलाहाबाद से अलीगढ़ के लिए 500 रुपए में सीट बेच रहा था। खुलेआम इस तरह की मांग की कल्पना मैंने नहीं की थी।

एक पत्रकार होने के नाते मैंने उन लोगों से पूरा विषय फिर से पूछा। नियमतः यदि ट्रेन में कोई सीट चार्ट बनने के बाद भी खाली रह जाती है तो टिकट पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी है कि RAC वाले व्यक्ति को पूरी सीट उपलब्ध कराए और यदि उसके बाद भी कोई सीट खाली रहती है तो वेटिंग टिकट वाले को सीट दे और यदि फिर भी सीट खाली रहती है तो जनरल टिकट के साथ आरक्षित डिब्बे में यात्रा कर रहे यात्रियों को पेनल्टी के साथ सीट दे।
लेकिन इस ट्रेन के हालात कुछ और ही थे। सहयात्री से पूरा विषय जानने के बाद मैं उनके साथ टीटीई के पास गया। सामान्य तौर पर मैं कहीं पर यह नहीं बताता कि मैं पत्रकार हूं। मैंने टीटीई  से कहा कि आप 500 रुपये में सीट कहां से देते और वो 500 रुपए कहां जाते? तो उनका जवाब था, ‘यह नेतागिरी कॉलेज तक ही रखो और अगर तुमसे दुःख नहीं देखा जा रहा है तो अपनी सीट दे दो। मैं कुछ नहीं जानता।’ इतना कहने के बाद वह मेरे सहयात्री से बोले, ‘तुमको वेटिंग टिकट के साथ आरक्षित डिब्बे में बैठने का अधिकार नहीं है। वो तो मैंने तुमको घुसने दिया है तो चुपचाप बैठ जाओ। ज्यादा नेताओं को लेकर आओगे तो इनके साथ तुमको भी रात में अन्य यात्रियों को डिस्टर्ब करने के आरोप में बंद करवा दूंगा।’ यह मेरे लिए एक आश्चर्यजनक स्थिति थी। 

जितनी आसानी से पर्यवेक्षक महोदय ने रात के 10:20 बजे यह बात बोली थी उतना ही आसान मेरे लिए उनकी इस करतूत को आईना दिखाना था। मैंने तत्काल तय किया कि इस स्थिति के विषय में ट्वीट के द्वारा माननीय रेल मंत्री महोदय को अवगत कराऊंगा। लगभग 5 मिनट तक दो टिकट पर्यवेक्षक मुझे धमकी भरे अंदाज में नियम कानून समझाते रहे। फिर मैंने उनको अपना परिचय देते हुए कहा कि आप अपना नाम बता दीजिए तो वह बोले, ‘मीडिया बहुत अच्छा है क्या? मेरे पर्स में 20 पत्रकारों के कार्ड पड़े हैं। जाकर अपनी सीट पर सो जाओ नहीं तो समस्या में पड़ जाओगे।’
 
तभी फतेहपुर स्टेशन आ गया। उन में से एक टीटीई बाहर उतर गया। मैं चाहता तो बहस कर सकता था लेकिन मैं समझ गया था कि इसका कोई मतलब नहीं निकलेगा। मैंने अपना स्मार्टफोन निकाल कर रेलमंत्री को ट्वीट करने की कोशिश की लेकिन अंबानी के ‘रिलायंस’ ने मेरा साथ नहीं दिया। नेटवर्क की समस्या के चलते मैं ना ही किसी को कॉल कर सकता था और ना ही मेसेज। उन दोनों में एक टीटीई की उम्र मुश्किल से 26 के आस-पास रही होगी। तय है कि अपने छात्र जीवन में उस युवा ने भी भ्रष्टाचार का सामना किया होगा, और संभवतः उसे भी लगता होगा कि काश इस देश में भ्रष्टाचार ना होता। लेकिन आज जब उसके पास जिम्मेदारी है, जब वह कुछ कर सकता है तब वह उसी भ्रष्टाचार की गंदगी में फंस गया।

खैर मैं अपनी सीट पर आकर वापस लेट गया और अपनी सीट पर उनमें से एक अन्य को बैठाया। उस व्यक्ति के मुंह से बस इतना ही निकला कि ‘काश! मोदी जी को यह पता होता’… मैं उसकी सकारात्मक उम्मीद को देखकर हैरान था। कुछ ही देर में मुझे नींद आ गई, फिर मेरी आंख खुली तब तक ट्रेन खुर्जा पहुंच चुकी थी। मैं एक बार फिर से टीटीई का नाम जानने के लिए उसकी सीट पर गया लेकिन वह भी जा चुके थे। मैं चुपचाप आकर अपनी सीट पर बैठ गया और आनंद विहार रेलवे स्टेशन के आने का इंतजार करने लगा। मेरे मन में एक ही सवाल था कि बिना खुद को बदले क्या हमारा ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ की उम्मीद करना ठीक है?

Monday, 18 January 2016

शून्य की खोज से पहले रावण के 10 सिर कैसे गिने गए?

कुछ दिनों से वॉट्सऐप के अलग-अलग समूहों में एक मेसेज काफी चल रहा है।
मेसेज: ‘अगर शून्य का अविष्कार 5वीं सदी में आर्यभट्ट जी ने किया फिर हजारों वर्ष पूर्व रावण के 10 सिर बिना शून्य के कैसे गिने गए। बिना शून्य के कैसे पता लगा कि कौरव 100 थे। कृपा कर यदि किसी को उत्तर पता हो तो बताएं।’

काफी तर्कसंगत प्रश्न है कि आखिर बिना शून्य के 10, 100 या अन्य संख्याओं की गणना कैसे संभव है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें इतिहास का अध्ययन करना होगा लेकिन इतिहास के सागर में डुबकी लगाने से पहले हमें अविष्कार (Invention) और खोज (discovery) के अंतर को समझना होगा। किसी नई विधि, रचना या प्रक्रिया के माध्यम से कुछ नया बनाना अविष्कार कहलाता है तथा खोज का अर्थ होता है किसी ऐसी चीज को समाज के सामने लाना जिसके विषय में समाज को जानकारी ना हो परन्तु वह हो। एक उदाहरण के माध्यम से समझिए कि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त की खोज की अर्थात गुरुत्वाकर्षण न्यूटन के पहले भी था लेकिन समाज उसके विषय में जानता नहीं था। गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त को न्यूटन की खोज कहा जाएगा न कि अविष्कार।

कथित तौर पर शून्य की खोज करने वाले आर्यभट्ट का जन्म 476 ईस्वी में तथा देहांत 550 ईस्वी में हुआ और रामायण तथा महाभारत का काल इससे बहुत पुराना है। वर्तमान में हिंदी भाषा का लेखन कार्य देवनागरी लिपि में होता है। इससे पहले की लिपि ब्राह्मी लिपि मानी जाती है। लगभग ई. 350 के बाद ब्राह्मी की दो शाखाएं हो गईं एक उत्तरी शैली तथा दूसरी दक्षिणी शैली। देवनागरी को नागरी लिपि के नाम से भी जाना जाता था। यह लिपि ब्राह्मी की उत्तरी शैली का विकसित रूप है।
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 इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि शून्य की खोज देवनागरी लिपि के प्रचलन के बाद हुई। इससे पहले शून्य की संकल्पना नहीं थी। ब्राह्मी लिपि में गणना की व्यवस्था थी लेकिन उस गणना में शून्य नहीं था। आप चित्र के माध्यम से समझ सकते हैं कि शून्य के बिना भी 10,20 या 100 जैसी संख्याओं की गणना हो सकती थी। संभवतः अब आपको पता लग गया होगा कि रावण के 10 सिर और कौरवों की संख्या गिनना उस काल में कैसे संभव हुआ। आर्यभट्ट ने इस विश्व को एक नई अक्षरांक पद्धति से परिचित कराया। शून्य की संकल्पना की कहानी भी काफी रोचक है।
शून्य, एक ऐसी संख्या जो स्वयं में कुछ नहीं है अर्थात खाली है लेकिन फिर भी पूर्ण है। एक बार संकल्पना का आधार समझिए। कल एक पुस्तक पढ़ रहा था जिसमें अध्यात्म और शून्य का संबन्ध बताया गया था। उसके अनुसार शून्य को ईश्वर बताया गया था। उस पुस्तक के अनुसार भारतीय संस्कृति में आत्मा को परमात्मा(ब्रह्म) का अंश माना गया है, साथ ही भारतीय संस्कृति में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ भी कहा गया है और उस ब्रह्म को पूर्ण माना गया है।
शून्य की संकल्पना का आधार कुछ ऐसा ही बताया गया है। शून्य की तरह ईश्वर को भी पूर्ण माना गया है। 0(परमात्मा)-0(आत्मा)= 0(परमात्मा) इसको हम इस रूप में भी कह सकते हैं कि आत्मा=परमात्मा। इतनी सुंदर व्याख्या आध्यात्मिक दृष्टि से शायद की किसी संस्कृति में होना संभव हो। शून्य अर्थात जो कुछ भी नहीं है, निराकार है वह सर्वव्यापक है। सर्वव्यापकता निराकार ब्रह्म की सबसे बड़ी विशेषता है। शून्य या निराकार इतना छोटा है कि छोटे से छोटे स्थान पर भी व्यापक है, और इतना विशाल है कि आकाश की असीमित दुनिया में भी सीमित नहीं होता। जहां तक भी दृष्टि जाती है, यही दिखाई देता है।
खैर, अब आपको यह तो पता लग ही गया होगा कि महाभारत और रामायण काल में रावण के 10 सिरों और कौरवों के 100 होने की गणना कैसे की गई होगी।

Friday, 8 January 2016

आप का 'राग'- आशुतोष के साथ

आमिर खान के साथ भारत सरकार के 'अतुल्य भारत' अभियान का कॉन्ट्रैक्ट समाप्त होने के बाद जब हवा यह उड़ी कि अमिताभ बच्चन को इस अभियान का ब्रैंड ऐंबैसडर बनाया जा सकता है तो आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने ट्वीट कर अमिताभ बच्चन को राय दे डाली कि उन्हें भारत सरकार के इस अभियान से नहीं जुड़ना चाहिए क्योंकि आमिर को हटाना भारत सरकार का बदले की भावना से प्रेरित कदम है। इस ट्वीट से ऐसा लगा जैसे एक दिया(दीपक) सूर्य को रोशनी देने की बात कर रहा हो। उन्होंने राय दी, अच्छी बात है लेकिन क्या एक राजनीतिक पार्टी के नेता को इस तरह की बातें करने से पहले उसके प्रभाव या दुष्प्रभाव के विषय में नहीं सोचना चाहिए।

संभव है कि मंत्रालय का यह कदम आमिर के प्रति किसी तथाकथित बदले की भावना से प्रेरित हो और उसे बदल पाना किसी विपक्षी पार्टी के बस की बात भी नहीं है। इन सबमें न पड़ते हुए मैं 'आप' से मात्र इतना पूछना चाहता हूं कि मान लीजिए यदि अमिताभ बच्चन ने आपकी बात मानते हुए 'अतुल्य भारत' से ना जुड़ने का फैसला कर लिया तो क्या भारत सरकार के इस अभियान को कोई ब्रैंड ऐंबैसडर नहीं मिलेगा? निश्चित रूप से इस अभियान से जुड़ने के लिए बहुत से लोग तैयार खड़े हैं और मिल भी जाएंगे लेकिन सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ के जुड़ने से इस अभियान को जितना लाभ होगा उतना शायद किसी अन्य बॉलीवुड अभिनेता के जुड़ने से नहीं होगा। आमिर और अमिताभ के अलावा भी शाहरुख खान और सलमान खान जैसे कई विकल्प पर्यटन मंत्रालय से अनुबंधित एजेंसी के सामने खुले हैं लेकिन अमिताभ इस सूची में सबसे ऊपर हैं इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता।

आम आदमी पार्टी की ओर से इस तरह की राय दिए जाने का कारण मुझे समझ नहीं आया। हो सकता है कि आशुतोष की इस राय को उनकी पार्टी व्यक्तिगत कहने लगे लेकिन क्या आशुतोष जैसा व्यक्ति जो एक प्रतिष्ठित चैनल में पत्रकार रहा है, उससे इस प्रकार की अपेक्षा की जाती है। मैं व्यक्तिगत रूप से आम आदमी पार्टी का समर्थक नहीं हूं लेकिन उनके कुछ काम, उनकी कार्यपद्धति और स्पष्टवादिता बहुत पसंद है। देश में यह एकमात्र ऐसी राजनीतिक पार्टी है जिसके सभी बड़े नेता पढ़े-लिखे हैं और ऐसी राजनीतिक पार्टी से सामान्य व्यक्ति की कुछ अपेक्षाएं तो रहती हैं। आपकी लाख लड़ाइयां होंगी नरेन्द्र मोदी से, आपको लगता होगा कि पर्यटन मंत्रालय का निर्णय 'बदले की भावना' के चलते लिया गया है लेकिन क्या आपकी राजनीतिक रंजिशें राष्ट्र से भी बड़ी हो गईं, कल को आप पूरी दुनिया के सामने कहना शुरू कर दो कि भारत सरकार ने आमिर खान को हटाकर बदला लिया है इसलिए किसी को भारत घूमने नहीं आना चाहिए। इन सबसे हानि किसकी होगी, क्या आशुतोष ने इस बारे में सोचा?



आशुतोष जी, आप एक केन्द्र शासित प्रदेश की सरकार चलाने वाली पार्टी के नेता हैं। कल जब इस देश के पास बजट नहीं होगा तो आप कहेंगे कि केन्द्र सरकार आपकी मदद नहीं कर रही। महोदय, इस देश को 'आप' से बहुत उम्मीदें हैं, लोग इस बार एक नए तरह की राजनीति देखना चाहते हैं। पुरानी घिसी-पिटी बयानबाजी के आधार पर कहीं ऐसा ना हो कि आपको आम आदमी पार्टी का दिग्विजय सिंह घोषित कर दिया जाए।




अब बुद्ध को युद्ध करना ही होगा...



कुछ ही दिन पहले जब आतंक ने मां भारती के धवल दामन पर काला धब्बा लगाने की कोशिश की तो इस देश के बेटों ने पठानकोट में अभूतपूर्व शौर्य गढ़ते हुए यह बता दिया कि इस देश के बेटे अपनी मां की छाती पर चढ़कर अशांति फैलाने का कुत्सित प्रयास करने वालों का सामना करने के लिए हर पल तैयार खड़े हैं। इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद आज अवकाश होने के कारण मैंने सोचा कि एक बार उस समय के बारे में भी पढ़ा जाए जब हम अंग्रेजी सल्तनत के अधीन थे। मेरे मन में दुःख के बीच यह उत्सुकता भी थी कि उस दौर के सैनिकों (क्रांतिकारियों) के मन में परिवार और मां भारती के प्रति कैसे विचार रहे होंगे। उस समय के विषय में अध्ययन करने के दौरान दो प्रसंग ऐसे सामने आए जिनको पढ़कर इस ब्लॉग को लिखने का विचार आया। उन दोनों प्रसंगों को आपसे साझा कर रहा हूं:

प्रथम प्रसंग: 85 साल का एक बूढ़ा शेर, बहादुर शाह ज़फर अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था तो अंग्रेजों ने दो पंक्तियां लिखवाकर भेजीं कि,
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

तो बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर दो पंक्तियां जवाब के तौर पर लिखीं:
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्थान की।।


दूसरा प्रसंगः जब पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां को फांसी की सजा सुनाई गई तो जेल में अशफ़ाक की आखों से आंसू की दो बूंदें टपक गईं। कहीं से यह जानकारी बिस्मिल को मिली तो बिस्मिल ने पत्र के माध्यम से अशफ़ाक से पूछा, 'अशफ़ाक, फांसी से डर गए क्या?' तो अशफ़ाक ने बिस्मिल को उत्तर देते हुए लिखा, 'बिस्मिल, रोता इसलिए नहीं कि मैं मरने वाला हूं, मैं इस लिए रोता हूं कि तुमने सनातन धर्म में जन्म लिया है, तुम्हारे धर्म की मान्यता है कि तुम्हारे यहां पुनर्जन्म होता है, तुम मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए कई बार जन्म लेकर संघर्ष कर सकते हो। लेकिन मेरे मजहब की मान्यता है कि पुनर्जन्म नहीं होता होता इसलिए मैं मां भारती के लिए अपना एक जीवन ही कुर्बान कर पाऊंगा।

इन दो प्रसंगों के माध्यम से मैं वह समय याद दिलाना चाहता हूं जब इस देश, इस मातृभूमि के लिए स्वयं को न्योछावर कर देने वाले मात्र राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मानते थे। उन क्रांतिकारियों को पता था कि देश की सत्ता का संचालन जिनके हाथों में है, उन फिरंगियों लिए उनकी भावनाओं का कोई महत्व नहीं है। लेकिन इस दौर में जब हम पूरी दुनिया के सामने एक स्वस्थ लोकतंत्र रखने का दावा करते हैं, ऐसे में क्या वास्तव में देश का सैनिक इस बात को स्वीकार कर सकता है कि यदि वह अपनी जान, इस राष्ट्र की रक्षा के लिए कुर्बान करेगा तो उसके बाद इस देश की सत्ता के सिंहासन पर बैठे वे लोग, जिनको वहां बैठाने में उस सैनिक का भी योगदान है, क्या वे आतंक को रोकने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ आतंकियों से निपटने की जिम्मेदारी सेना को दे पाएंगे?

हमारे देश के एक बड़े नेता और केन्द्र की सरकार के मंत्री अरुण जेटली जी ने प्रेस वार्ता के दौरान दो दिन पहले कहा कि पठानकोट ऑपरेशन में अधिक समय इस लिए लग गया क्यों कि हम आतंकियों को जिंदा पकड़ना चाहते थे। अरे जेटली जी, एक कसाब पर इस देश की तत्कालीन सरकार ने 3.5 लाख प्रतिदिन के हिसाब से 70 करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर दिए। उस दौरान तो आप बड़े गर्व से कहते थे कि देश पर हमला करने वालों को तुरंत मार देना चाहिए। शायद अपने इसी बदले हुए रवैये को आप सत्ता की जिम्मेदारी कहें लेकिन मैं इसे इच्छा शक्ति की नपुंसकता मानता हूं। इस देश के सैनिक चाहते तो उन आतंकियों को जिंदा भी पकड़ सकते थे, लेकिन उन्हें पता था कि अगर जिंदा पकड़ लिया तो आप उन आतंकियों के लिए एक विशिष्ट बैरक के साथ तैयार खड़े हैं। साहब, उन्होंने नेताओं की तरह दलाली के पैसे से खरीदी गई खद्दर नहीं पहनी हैं, वे मां भारती की रक्षा के लिए तैयार वर्दी पहनते हैं, उन्हें यह पता होता है कि किस पर गोली चलानी है और किसे जीवित छोड़ना है। लाल किले से आतंक के खिलाफ आग की भाषा बोलना बहुत आसान होता है लेकिन उस आतंक के खिलाफ आग उगलने का काम इस देश के सैनिकों की बन्दूकें करती हैं।

6 आतंकियों को मारने में हमने इस देश के 7 जांबाज जवानों को खो दिया। कल्पना करिए उन परिवारों के बारे में, जिनके परिवार का सदस्य कुछ ही पलों में उनसे दूर चला गया। निरंजन की उस दो साल की बेटी विस्मय के मन की पीड़ा को महसूस करिए। उस गरुड़ कमांडो गुरुसेवक सिंह की पत्नी के विषय में सोचिए जिसने मात्र डेढ़ महीने पहले 18 नवंबर को एक नए जीवन की शुरुआत की थी। शहीद हवलदार कुलवंत सिंह के उस बेटे के बारे में सोचिए जो नए साल पर अपने पिता और नई बाइक की प्रतीक्षा कर रहा था। धन्य है यह देश जहां अपने पति को राष्ट्ररक्षा में न्यौछावर कर देने के 24 घंटे भी नहीं पूरे हुए और जब पत्रकारों ने उस वीरांगना से बात की तो भीगी आंखों के साथ उसने जवाब दिया, 'अभी तो मेरा बेटा भी है, वह अपने पिता के सपनों को पूरा करेगा। मैं उसे भी सेना में भेजूंगी।'

आतंकी हमले क्यों होते हैं उसका एक मात्र कारण है कि हमने सेना के पैरों में बेड़ियां डाल कर रखी हैं। जब मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा कि अब भारत को इन आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए तो मेरे कुछ मित्रों ने कहा कि आप क्यों चाहते हैं कि भारत, पाकिस्तान पर हमला करे? क्या युद्ध एक मात्र विकल्प है? मैं, उन्हें और अधिक स्पष्टता के साथ बता देना चाहता हूं कि मैं पाकिस्तान पर हमला नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि उन आतंकियों पर हमला हो जो पाकिस्तान में बैठे हैं। पाकिस्तान हमारा दुश्मन नहीं है। वहां भी हमारे जैसे ही लोग रहते हैं। उनके भी पूर्वजों ने कभी इस देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था। वे भी नहीं चाहते कि स्कूल में पढ़ने गए उनके बच्चे वापस ना आएं। मुझे उम्मीद है कि पाकिस्तान हमारा साथ देगा और मान लीजिए हमला करने के दौरान पाकिस्तान उन आतंकियों के साथ खड़ा हो जाए तो हम इतने सक्षम हैं कि एक और युद्ध लड़ सके। अगर हमने साफ तौर पर विश्व को यह संदेश देकर हमला किया कि हमारा हमला आतंकियों पर है तो विश्वास मानिए विश्व का कोई देश पाकिस्तान के साथ नहीं खड़ा होगा।

मेरी पीड़ा क्यों है उसका एक कारण है। अभिमन्यु, चक्रव्यूह का सप्तम द्वार नहीं भेद पाया तो इसमें अभिमन्यु का कोई दोष नहीं था। कभी पिता अर्जुन और मामा श्रीकृष्ण को यह फुर्सत नहीं मिली कि वे अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदने की कला सिखा दें। अभिमन्यु को मां सुभ्रदा के गर्भ में मात्र एक बार चक्रव्यूह को भेदने की कहानी सुनने का अवसर मिला लेकिन सुभ्रदा को नींद आ गई। अभिमन्यु ने तो अपनी जिम्मेदारी निभाई और समय आने पर यह प्रमाणित किया कि उनको मां के गर्भ में जितना सीखने का अवसर मिला उतना उसने पूरी निष्ठा से सीखा। मोदी जी से पहले मैंने दो सरकारें और देखीं, एक अटल जी की सरकार और एक मनमोहन जी की सरकार दोनों ने इस देश के युवाओं को संतुष्टि नहीं दी। अब अगर मोदी सरकार भी उनकी तरह ही मात्र शोक-संवेदना व्यक्त करके चुपचाप बैठी रहेगी तो मेरे बाद की पीढ़ी को यह विश्वास दिलाना काफी मुश्किल होगा कि आतंक को रोकने के लिए अगर सेना में गए तो देश की राजनीति आपके साथ खड़ी होगी। फिर शायद कोई बेटा सेना में नहीं जाएगा, फिर शायद कोई मां अपने बेटे को सेना में नहीं भेजेगी और फिर शायद कोई बेटी अपने पिता की शहादत पर अर्थी को कंधा देती नहीं दिखेगी। यह देश युद्ध और बुद्ध, दोनों ही संस्कृतियों को जीता है, हमें यह बताना होगा कि हम गांधी और बुद्ध के अनुयायी भगत सिंह और वीर शिवाजी की भाषा भी जानते हैं। हमें यह समझना होगा कि हमारा शत्रु कैसा है? हमारी कार्यशैली, हमारे शत्रु की कार्यशैली पर निर्भर होनी चाहिए। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि अगर हम एक बार विश्व स्तर पर यह संदेश दे दें कि हम आतंक का मुंहतोड़ जवाब दे देंगे तो शायद इस देश में आतंकवादी हमलों की तादात कम हो जाए।

Sunday, 3 January 2016

मोदी जी! देश जीत गया लेकिन आप हार गए

नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले इंडिया टीवी के शो 'आप की अदालत' का एक एपिसोड आज अनायास ही याद आ गया। उस शो को मैंने अभी ऑफिस से वापस आकर फिर से देखा। उस शो का एक हिस्सा आप सभी से शेयर करना कर रहा हूं।

रजत शर्मा(होस्ट)- 26/11 की घटना के समय अगर आप इन्चार्ज होते तो क्या करते?
नरेन्द्र मोदी: जो मैंने गुजरात में किया वो कर के दिखाता, मुझे देर नहीं लगती। मैं आज भी कहता हूं, पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए, ये लव लेटर लिखना बंद कर देना चाहिए। प्रणव मुखर्जी(तत्कालीन रक्षा मंत्री) रोज एक चिट्टठी भेज रहे और वो सवाल भेज रहे, ये जवाब देते फिरते हैं। गुनाह वो करें और जवाब भारत सरकार दे रही है।
रजत शर्मा- लेकिन इंटरनैशनल प्रेशर है, उसका भी तो ख्याल रखना पड़ेगा भारत सरकार को।
नरेन्द्र मोदी: इंटरनैशनल प्रेशर पैदा करने की ताकत आज हिंदुस्तान में है, 100 करोड़ का देश है। पूरी दुनिया पर प्रेशर आज हम पैदा कर सकते हैं जी। मैं तो हैरान हूं जी, पाकिस्तान हमको मार कर चला गया, पाकिस्तान ने हम पर हमला बोल दिया मुंबई में और हमारे मंत्री जी अमेरिका गए और रोने लगे, ओबामा, ओबामा...पाकिस्तान हमको मार कर चला गया, बचाओ...बचाओ...ये कोई तरीका होता है क्या? पड़ोसी मार कर चला जाए और अमेरिका जाते हो, अरे पाकिस्तान जाओ ना।
रजत शर्मा- क्या तरीका होता है?
नरेन्द्र मोदी: पाकिस्तान जिस भाषा में समझे, समझाना चाहिए।

दोस्तों, मैं अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी का स्वयंसेवक हूं, मेरी शिक्षा भी विद्या भारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु/ विद्या मंदिर में हुई है लेकिन मैंने अपने जीवन में सिर्फ एक बार बीजेपी को वोट दिया है। मैं लखनऊ महानगर का एकमात्र ऐसा स्वयंसेवक था जो संघ के प्रचारकों के साथ मेरे आराध्य श्रीराम का राजनीतिकरण करने वाली बीजेपी के सिद्धान्तों पर बहस करता था। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने जवानी को जिया तो ऐसा कि राजसी सुखों को छोड़कर समाज के लिए कार्य करने वाले एक ऋषि के साथ वन को चले गए और वन जाते वक्त जब पिता दशरथ ने कहा कि राक्षसों से लड़ने के लिए सेना लेते जाओ तो कहा कि सेना ले गया तो क्या फायदा? वहां जाकर वहां के लोगों की सेना बनाऊंगा ताकि मेरे बाद भी उनमें राक्षसों से युद्ध करने का आत्मविश्वास बना रहे। मैं बहस करता था उन राम के लिए लिए जिन्होंने अपनी पीढ़ियों की परंपरा को तोड़ते हुए एकपत्नीव्रत लिया और एक ऐसी महिला से विवाह किया जिसका कुल तक ज्ञात नहीं था। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने पितृ भक्ति में अपने पिता के एक वचन को इस तरह से निभाया कि 14 सालों तक अयोध्या का सिंहासन फुटबॉल की तरह उछलता रहा। मैं बहस करता था तो उन राम के लिए तो उन राम के लिए जिन्होंने अपने प्रेम के लिए नदियों को छोड़िए, समुद्र पर भी पुल बना दिया। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने राजधर्म निभाया तो ऐसा कि राक्षसों का वध करके जीते गए क्षेत्र को वहीं के मूल निवासियों के हवाले कर दिया और अपने राज्य के एक सामान्य व्यक्ति की बात सुनकर अपनी धर्म पत्नी स्वयं से दूर कर दिया। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने मातृभूमि से प्रेम किया तो ऐसा कि सोने की लंका को छोड़ कर सामान्य जनमानस के बीच अयोध्या पहुंच गए।

मेरे उन श्रीराम को राजनीतिक गलियारों में बेचने वाले तथाकथित भक्तों को मैंने मोदी के भाषणों की वजह से लोकसभा चुनाव में वोट दिया। मेरे सांसद महोदय आज देश के गृहमंत्री हैं लेकिन कल पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकवादी हमले के समय उनकी हिम्मत नहीं थी कि वे देश की जनता का सामना कर सकें। देश के जवानों ने जब आतंकियों को मार गिराते हुए विजय पताका लहराई तब वे मीडिया के सामने आने की हिम्मत जुटा पाए। अरे राजनाथ जी, देश के जवान तो तब भी आतंकियों के सामने अपनी जान की बाजी लगा कर संघर्ष कर रहे थे जब हमारे सांसद कुर्सियों के नीचे छिपने की जगह ढ़ूंढ रहे थे, उस वक्त आप कहते थे कि भारत को उन्हें जवाब देना चहिए लेकिन आज जब आपके हाथ में सब कुछ है तो आप चुप-चाप बस सैनिकों को शाबासी देकर चल दिए।

मुझे खुशी है कि आज पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकी हमले के बाद हमारे देश के सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सभी आतंकियों को मार गिराया लेकिन मुझे दुःख भी है कि एक के बदले 10 सिर लाने का दंभ भरने वाली सरकार का प्रधान जब कर्नाटक के एक कार्यक्रम में भाषण देता है तो मात्र उसी पुरानी जुमले बाजी के सहारे देश के मन में खुद को प्रतिस्थापित करने की करने की कोशिश करता है जिनके भरोसे आज वह देश की सत्ता के सिंहासन पर काबिज है।  माननीय प्रधानमंत्री महोदय, इस गलतफहमी में मत रहिएगा कि देश ने अगर एक इतिहास को रचते हुए अगर आपको पूर्ण बहुमत वाली कुर्सी दी है तो वह इसलिए नहीं दी कि देश कांग्रेस से परेशान था, देश की जनता ने आपको देश की सत्ता का संचालन इसलिए सौंपा है ताकि आप देश के स्वाभिमान की रक्षा कर सकें। साड़ियां और शालें तो आती-जाती जाती रहेंगी लेकिन अगर आप सत्ता के अहंकार में देश के दिल से निकल गए तो फिर दुबारा वापस आने का मौका नहीं मिलेगा।

केन्द्र में बीजेपी सरकार आने से पहले नरेन्द्र मोदी ने एक निजी चैलन को दिए गए साक्षात्कार में कहा था, 'लादेन का पाकिस्तान की धरती पर मारा जाना इस बात की पुष्टि करता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों का एक बहुत बड़ा अड्डा बना हुआ है, भारत सरकार को इस विषय को तत्काल संज्ञान में लेना चाहिए और विश्व की मानवतावादी शक्तियों को एकजुट करते हुए अमेरिका पर भी दबाव डालना चाहिए कि वह ढ़ुलमुल नीति ना अपनाए। यह दुर्भाग्य है कि सुबह ओबामा के वक्तव्य में पाकिस्तान के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा गया है। भारत सरकार को इसे गंभीरता से लेते हुए मानवतावादी शक्तियों को एकजुट करना चाहिए।'

मोदी जी, तब हमारे तत्कालीन पीएम अमेरिका के सामने खड़े नहीं हो पाते थे, शायद इस लिए क्योंकि उन्हें भारत की युवा शक्ति पर विश्वास नहीं था लेकिन आप तो देश की शक्ति  को जानते हैं, बराक सहित विश्व के सभी बड़े नेता आपके मित्र हैं, अब बनाइए इंटरनैशनल प्रेशर और घर में घुसकर मारिए मौलाना मसूद अजहर को। अब तो नवाज से भी आपकी अच्छी दोस्ती है, वह भी साथ देंगे आपका, कोशिश तो करिए। मोदी जी, मैं अब भी आशाहीन नहीं हुआ हूं, मुझे उम्मीद है कि आपका पौरुष जागेगा और 17 साल पहले की गई गलती को सुधार लिया जाएगा। पता नहीं क्यों उम्मीद का दिया मेरे मन में जल रहा है? वो भी उन परिस्थितियों में जब हमले के बाद खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली पार्टी की ओर से यह बयान आता है कि सिर्फ एक हमले की वजह से पाकिस्तान के साथ चल रही वार्ता रद्द नहीं की जाएगी। अब देश जुमलेबाजी में फंसने वाला नहीं है और इस बात को दिल्ली तथा बिहार की जनता ने प्रमाणित भी कर दिया है। यदि पीएम साहब फ्लाइट मोड और साइलंट मोड में फंसे रहे तो यह तय है कि इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा। उम्मीद है कि खुद को प्रधानसेवक कहने वाले मोदी जी जनरल मोड पर आ जाएंगे और पाकिस्तान को उसी की भाषा में रिटर्न गिफ्ट देंगे।

Thursday, 31 December 2015

उस साल की वो आखिरी रात...

31 दिसंबर 2006, की सुबह 10 बजे मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा आयोजित प्राथमिक शिक्षा वर्ग (ITC) पूर्ण करके घर पहुंचा। 8 दिनों तक बिना किसी बाहरी संपर्क के बस 283 लोगों के साथ अपना एक अलग समाज बन गया था। वर्ग स्थल से निकलते समय आंखों में आंसू थे लेकिन घर पहुंचते पहुंचते सब सामान्य हो गया। घर पहुंचते ही सबसे पहले मोबाइल ऑन किया और उसे चार्जिंग पर लगाया। उन दिनों संघ के कैंप में मोबाइल पूरी तरह से प्रतिबंधित था और मेरे पास Bird का मोबाइल हुआ करता था जिसमें एयरटेल का सिम था। 1.99 रुपए कॉलरेट के उस दौर में पिता जी महीने में 50 रुपए का रिचार्ज कराते थे यानि बात करने के लिए मिलते थे 21 मिनट। उनके अनुसार मुझे कहीं बात करने की जरूरत ही नहीं थी क्यों कि परिवार के सभी सदस्य मेरी कॉल को काट कर कॉल बैक करते थे। मिसकॉल के उस दौर में मैंने शाम पांच बजे उसे कॉल की तो उसकी मां ने फोन उठाया। उसकी मां से मैंने कहा कि मुझे राहुल से बात करनी है तो उन्होंने रॉन्ग नंबर कहते हुए फोन काट दिया। उसी कॉल के साथ मेरा बैलेंस भी खत्म हो गया।






उन दिनों जब भी उसकी मां या पापा फोन उठाते थे तो मन में जो भी नाम आता था उसे ले लेता था। क्या प्यार था, यही सोचता था कि अगर उसका नाम लिया तो उसके सामने कई सवाल खड़े हो जाएंगे। पिछले 5 महीने में ऐसा पहली बार हुआ था जब मैं उससे लगातार 8 दिन मिला नहीं था। मिलना तो छोड़िए उसकी आवाज भी नहीं सुनी थी। 31 की शाम को शाखा पर अंग्रेजी नववर्ष और वर्ष प्रतिपदा (भारतीय नववर्ष) पर एक लंबा चौड़ा भाषण दिया और शाखा खत्म होते ही अपनी अंग्रजी की ट्यूशन पढ़ने के लिए निकला लेकिन वहां ना जाकर उसके घर के नीचे खड़ा हो गया इस उम्मीद के साथ कि शायद वह बॉलकनी में आ जाए और उसका चेहरा मुझे दिख जाए लेकिन 1 घंटे के इंतजार के बाद भी वह नहीं आई। बैलेंसहीन मोबाइल होने की वजह से मिसकॉल भी नहीं कर सकता था। अंधेरा भी काफी हो गया था और पिताजी का फोन भी आ चुका था तो वापस जाना ही बेहतर समझा। वापस पहुंचने पर उसकी पसंदीदा फिल्म मोहब्बतें लगाई और देखने लगा।

मेरे घर पर रात 9 बजे के बात टीवी देखने की अनुमति नहीं थी। उस दिन भी दादी जी ने आकर कहा कि अब इसे बंद करके खाना खा लो तो मैंने कहा कि आप सब लोग खाकर सो जाओ मैं देर से खाऊंगा क्यों कि 8 दिनों तक टीवी से दूर रहा हूं तो आज देखने की बहुत इच्छा है। क्या बहाने थे...खैर.... रात में फिल्म खत्म होने के बाद दुबारा से लगा ली। कई सारी शंकाएं मन में आ रही थीं कि कहीं ऐसी कौन सी वजह है जिसकी वजह से वह बात नहीं कर रही? कहीं मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई, कहीं वह नाराजगी के चलते हमेशा के लिए बात करना ना बंद कर दे... यही सब सोचते सोचते कब नींद आ गई पता ही नहीं लगा। अगली सुबह बाबा जी ने 5 बजे जगाया लेकिन नींद पूरी ना होने के कारण मैं सर दर्द का बहाना बनाकर फिर से सो गया। उस दौरान शीतकालीन अवकाश चल रहा था तो कॉलेज की परेशानी भी नहीं थी

सुबह साढ़े 10 बजे नींद पूरी हुई... तो फ्रेश होने के बाद मोबाइल चेक किया तो देखा कि उसके नंबर से 3 मिसकॉल पड़ी हैं। अब बैलेंस ना होने की वजह से ना ही मैं कॉल कर सकता था और ना ही मेरे पास पैसे थे। और अचानक किसी नई किताब के लिए भी पैसे नहीं ले सकता था तो एक नया बहाना बनाया। मैंने घर पर कहा कि मैम का फोन आया है आज अभी ट्यूशन पढ़ने जाना है और नीचे जाकर साइकल की हवा निकाल दी फिर वापस आकर बाबा से कहा कि बाबा साइकल पंचर है और कोचिंग जाना बहुत जरूरी है तो 10 रुपए देकर बोले कि जाओ रास्ते में साइकल सही कराकर चले जाना। मैंने उनसे पैसे लिए और रास्ते में जाकर खुद से हवा भरी। रास्ते भर क्वाइन बॉक्स वाला पीसीओ ढ़ूढता रहा सिससे कि 1 रुपए में बात हो जाए। उसकी कॉलोनी के पास में ही एक पीसीओ मिला। वहां से मैंने उसे डरते डरते कॉल की। उसने जैसे ही फोन उठाकर हेल्लो बोला... ऐसा लगा जैसे दुनिया कि सारी खुशियां मिल गईं। उस दौर में मैं यह नहीं समझता था कि ऐसी खुशियां क्षणिक होती हैं जिनमें कोई स्थायित्व नहीं होता।

जब मैंने हेलो बोला तो उसने कहा, 'गौरव कहां हो तुम? मैं कब से तुम्हें कॉल कर रही हूं... ऐसा कौन सा कैंप होता है जहां बात भी नहीं की जा सकती।' मैं कुछ बोलता इससे पहले ही उसने कहा, 'सब लोग न्यू ईयर पर 1 घंटे में चंद्रिका देवी मंदिर जा रहे हैं.. तुम घर आ जाओ.. हम लोग बैठ कर ढ़ेर सारी बातें करेंगे।' यह सुनते ही लगा जैसे रात को मेरी आंखों में आई नमी को मेरे श्रीराम ने महसूस कर लिया।

मैं तुरंत वापस गया और कपड़े बदलने लगा। बाबा ने पूछा कि क्या हुआ तो मैंने बोला कि ठंड लग रही थी इस लिए सोचा कि एक स्वेटर और पहन लूं। कुछ ही मिनटों में मैं उसके गेट पर था। बेल बजाने पर उसने दरवाजा खोला और अंदर आकर बैठने को कहा और खुद पानी लेने चली गई... कुछ पलों के बाद सोफे पर मेरे ठीक बगल में वह बैठी थी। मैं उठकर उसके सामने बैठ गया और उससे कहा कि, आज मैं तुम्हें जी भरकर देखना चाहता हूं।

वह बार-बार बालकनी ले नीचे अपने मां-पापा को देखने जा रही थी। हम लोग एक साथ लगभग 3 घंटे बैठे रहे। उसने कई सवाल पूछे लेकिन मेरे पास किसी का जवाब नहीं था। मैं उसे नहीं बस उसे देखता जा रहा था। मैं उसे 'संघ' समझाने की स्थिति में नहीं था। मैं उसे यह नहीं बता सकता था कि मैं इतने दिनों तक कहां था। मैं उसमें खोया था कि अचानक सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आवाज आई, वह दौड़कर बालकनी में गई और वापस आकर बोली कि गौरव सब लोग आ गए, अब क्या होगा। मैं तुरंत उठा और उसके घर के ऊपर वाले फ्लोर पर चला गया। फिर लगभग 10 मिनट के इंतजार के बाद नीचे आकर देखा तो उसके घर का दरवाजा बंद था। सबसे सुकून भरा दिन था वह... ऐसा लगा जैसे उन 3 घंटों में सारी जिन्दगी जी ली हो। उसके साथ बिताए उन लम्हों के बारे में सोचते सोचते मैं घर पहुंचा और फिर से 'मोहब्बतें' लगा कर देखने लगा लेकिन इस बार वह फिल्म कुछ अलग लग रही थी। मेरे लिए 2007 की इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती थी।

पिछले साल 31 दिसंबर 2014 को मैं अपने दोस्तों के साथ 'क्वीन ऑफ हिल्स' कहे जाने वाली मसूरी में था। उन हसीन वादियों में अपनी क्वीन के बारे में सोच रहा था कि काश वह भी हमारे साथ होती। 31 की रात तो दीपक, सिद्धार्थ, शशिकांत और उत्कर्ष के साथ बीत गई लेकिन मैं अपनी जिन्दगी के नए साल यानी 2016 की शुरुआत अपनी क्वीन की आवाज सुनकर करना चाहता था। मैंने उसे कॉल किया लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। पूरी रात सुबह के इंतजार में बीत रही थी। मैं अपने साथ-साथ अन्य दोस्तों को भी जागने पर मजबूर कर रहा था। उनको लग रहा था कि मैं उन लोगों के साथ नए साल के मजे लेना चाहता था लेकिन सच तो कुछ और ही था। मैं बस इतना चाहता था कि जल्दी से सुबह हो जाए और मैं उसे कॉल करके उसकी आवाज सुनूं। सुबह के 6 बजते-बजते सब सो गए और मैं होटल के बाहर टहलने निकल गया। सुबह का 8 बजा और उसका फोन भी... उसने फोन उठाते ही कहा 'इतनी रात में कॉल क्यों किया था?' मेरे पास कोई जवाब नहीं था, मेरा काम हो गया था। नए साल की शुरुआत में उसके द्वारा इस तरह के प्रश्न की अपेक्षा नहीं थी.... लेकिन आवाज सुन ली तो मन को सांत्वना दे दी कि यह साल बहुत ही बेहतर जाने वाला है... और सच में पिछला साल बहुत ही बेहतर गया... बहुत से चेहरे बेनकाब हो गए... उन बेनकाब चेहरों में एक चेहरा उसका भी था...

अंग्रेजी नववर्ष का विरोध क्यों? इस तरह मनाएं इसे.....

इस बार मैं अपने जीवन का दूसरा अंग्रेजी नववर्ष मनाऊंगा, जी हां, सही पढ़ा, दूसरा। 1 साल पहले तक मैं अंग्रेजी नववर्ष के उत्सव को नहीं मनाता था लेकिन जब दिसंबर 2014 में इस विषय पर चिंतन किया तो कोई ऐसा कारण नजर नहीं आया जिसके कारण अंग्रेजी नववर्ष का बहिष्कार किया जाए। जब हम अंग्रेजी तिथियों के अनुसार अब तक का अपना पूरा जीवन जी रहे हैं तो उस नववर्ष को मनाने में क्या बुराई है? यह बात मेरी समझ से परे है। रही बात प्रकृति की तो दीवाली भी ठंड में होती है, उसे पूरी ऊर्जा के साथ मनाते हैं तो 31 दिसंबर को या 1 जनवरी को क्यों इतनी ठंड लगती है? यह मुझे समझ में नहीं आ रहा। मैं इसे गुलामी के पर्व के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे दिन के रूप में लेता हूं जिस दिन पूरी दुनिया, शराब और शबाब के नशे में डूबी होती है उस दिन हम भारत के लोग कुछ अच्छा करने का संकल्प ले रहे होते हैं। पिछले साल की तरह ही इस बार भी 31 दिसंबर की रात आगामी अंग्रेजी नववर्ष के लिए एक संकल्प लेने की रात होगी।

जैसा कि मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं कि मैं बहुत ही स्वार्थी किस्म का व्यक्ति हूं और अंग्रेजी नववर्ष के उत्सव को मनाना के पीछे भी मेरा एक स्वार्थ है। प्रत्येक वर्ष भारतीय नववर्ष के प्रारम्भ में मैं एक संकल्प लेता हूं और प्रयास करता हूं कि उस संकल्प को पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से पूर्ण कर सकूं। लेकिन पिछले साल से वैसा ही एक संकल्प अंग्रेजी नववर्ष पर लेना शुरू किया। इससे अब एक साल में मेरे दो-दो संकल्प हो जाते हैं। दोस्तों, भारत में बहुत ही उत्सवधर्मी प्रकृति के लोग रहते हैं। छोटी छोटी बातों में खुशियां ढ़ूढना हमारी खासियत है। अपने जीवन में हर दिन हम खुश रहने के बहाने ढूढ़ते हैं तो अंग्रेजी नववर्ष में हम अपनी खुशियां क्यों नहीं ढ़ूढ सकते? क्यों हम इस दिन कुछ नया और समाज के लिए अच्छा करने का संकल्प नहीं कर सकते? मैंने तो सोच लिया है कि मैं इस साल आने वाले हर पर्व पर अपने आस पास के एक बच्चे को खुशी देने की कोशिश करूंगा। बहुत छोटी सी कोशिश है लेकिन मैं इसी में अपनी खुशी खोजने की कोशिश करूंगा। कुछ अच्छा करने के लिए हमें एक बहाना चाहिए होता है। उस बहाने के रूप में मेरा यह संकल्प काम करेगा।



मैंने पिछले वर्ष संकल्प किया था कि पूरे साल में सिर्फ एक व्यक्ति की नकारात्मकता दूर करूंगा और जब उसकी नकारात्मकता दूर हो जाएगी तो मैं उससे निवेदन करूंगा कि अपने किसी परिचित की नकारात्मकता दूर करे। इसके लिए मैंने एक ऐसे लड़के को चुना था जो अपने आगे किसी की नहीं सुनता था। बहुत बचपना था उसमें, उम्मीद थी कि एक साल में मैं जरूर सफल हो जाऊंगा। लेकिन मुझे खुशी है कि ईश्वर की कृपा से मैं 8 महीनों में ही सफल हो गया। यह बात आज भी उस लड़के को नहीं पता है कि उससे संबन्धित मैंने अपने जीवन में कोई संकल्प किया था। आज वह एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में कार्यरत है, मेरे साथ ही पढ़ता था। बहुत सी क्षमताएं थी उसमें लेकिन बस नकारात्मकता के कारण अपनी क्षमताओं को समझ नहीं पा रहा था। पिछली बार जब उससे 6 महीने के बाद मिला तो लगा कि चलो अंग्रेजी नववर्ष के कारण अपनी जिंदगी में कुछ तो अच्छा किया।
इस साल भी एक संकल्प लिया है औऱ मुझे पता है कि मैं उसे पूरा कर लूंगा। आप भी कुछ अच्छा करें तो अंग्रेजी नववर्ष को भारतीयता का रूप दे सकते हैं। तो आईए साथ मिलकर मनाते हैं अंग्रेजों के इस नए साल का जश्न, अपनों के साथ और अपनों के लिए.....लेकिन रुकिए इस नए साल के जश्न के चक्कर में भारतीय नए साल को भूल मत जाना....उस दिन भी कुछ अलग करना है और उस समय तो और अच्छे से कर पाएंगे क्यों कि प्रकृति भी हमारे साथ होगी...

वन्दे भारती...

Wednesday, 30 December 2015

30 दिसंबर का एक यशस्वी सत्य

दोस्तों, आज 30 दिसंबर है, क्या आपको पता है कि हमारे इस परम पवित्र भारत वर्ष के लिए इस दिन का क्या महत्व है? शायद नहीं...संभव है कि आप इस दिन अगले दिन की तैयारियों में व्यस्त रहते हों...लेकिन इस तिथि के मायने कुछ और भी हैं। इस दिन क्या हुआ था इस बात पर चर्चा करने से पहले मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। क्या आप जानते हैं कि भारत का प्रथम स्वतंत्रता दिवस कब मनाया गया? निश्चित तौर पर आप 15 अगस्त 1947 ही कहेंगे लेकिन मैं उसे स्वतंत्रता दिवस नहीं मानता क्यों कि उस दिन तो मात्र हमारे देश में सत्ता का हस्तांतरण हुआ था। हमारा देश से उससे 4 साल पहले ही आजाद हो चुका था। जी हां, आजादी का अर्थ होता है मानसिक आजादी, 30 दिसंबर 1943 को हमारे मन में स्वतंत्रता का भाव जागृत हो चुका था। इस दिन भारत के एक हिस्से को पूर्ण स्वतंत्रता मिली थी, लेकिन कौन सा भाग था वह, किसके सहयोग से आजादी मिली, किसने उस स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया, किसने आजादी के बाद उस क्षेत्र को संभाला, ये सारी बातें आपको नहीं पता होंगी, क्यों कि हमें यह सब पढ़ाया ही नहीं गया। हमारा पाठ्यक्रम अकबर और औरंगजेब के आसपास ही घूंता रहा। भारत के मूल इतिहास को पढ़ाने की किसी ने जरूरत ही नहीं समझी।

दोस्तों, 30 दिसंबर 1943 को सुभाष चन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज ने, जापानी सेना के सहयोग से अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह को ब्रिटिश शासन से आजाद कराकर, इसे भारत का प्रथम स्वाधीन प्रदेश घोषित किया था। इसी दिन मां भारती के वीर सपूत नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता का जयघोष करते हुए पोर्ट ब्लेयर में, तिरंगा फहराकर वहां अपने मुख्यालय की स्थापना की थी। दीप समूह पर आजाद हिन्द फौज के कब्जे के बाद, सिंगापुर से भारत की अस्थायी सरकार के प्रमुख सुभाष चन्द्र बोस जी ने भारत की आजादी की घोषणा की और भारत की जनता से आजादी की रक्षा करने का आह्वान किया था।

इस आधार पर हमारा पहला स्वतंत्रता दिवस 30 दिसंबर, 1943 को मनाया गया। उस दिन नेता जी ने एक घोषणा पत्र जारी किया था, जिसमें उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री, प्रथम विदेश मंत्री और प्रथम राज्य प्रमुख के रूप में भारत के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी।

उनके घोषणा पत्र के अनुसार वह शपथ कुछ इस प्रकार थी-

मैं 'सुभाष चन्द्र बोस', ईश्वर को साक्षी मानकर ये पवित्र शपथ लेता हूं, कि -
मै सदैव भारत का एक दास रहूंगा,
अपने 38 करोड़ भाई-बहनों के कल्याण का ध्यान रखना, मेरा सर्वोच्च कर्तव्य होगा
मैं स्वतंत्रता के इस पवित्र युद्ध को अपने जीवन की अंतिम साँस तक जारी रखूंगा
मैं पूर्ण आज़ादी मिलने के बाद भी, भारत की स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए, अपने रक्त की आखरी बूंद बहाने के लिए सदैव तत्पर रहूंगा
लेकिन आजादी की लड़ाई की इतनी महत्वपूर्ण घटना को भी, सत्ता की ताकत से नेहरू ने दबा दिया। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह जिसकी पहचान दो आजन्म कारावास की सजा पाने वाले, काला पानी जेल के नायक 'वीर सावरकर' और 'सुभाष चन्द्र बोस' से होनी चाहिए, उसे सत्ता के मद में चूर नेहरू सरकार ने काला पानी की सजा दे दी। क्या कसूर था उन वीरों का? सिर्फ इतना कि वे निःस्वार्थ भाव से मां भारती की सेवा में लगे हुए थे। उस द्वीप के बंदरगाह का नाम भी नेहरू के नाम पर ही है। इतिहास आज फिर दुनिया के सामने आने के लिए प्रतीक्षारत है। अपने यशस्वी इतिहास को लेकर आप कितने सजग हैं यह बात हमारी अगली पीढ़ी प्रमाणित करेगी।

वंदे भारती

Monday, 21 December 2015

'निर्भया' हम शर्मिंदा हैं....

दोस्तों, 16 दिसम्बर 2012, इस तिथि को सुनते ही आत्मा काँप गई ना। जी हाँ, मेरी भी कुछ हालत ऐसी ही हो जाती है। बहुत सी यादें जुड़ी हैं इस तिथि से....

2012 के अंत से लेकर एक लंबे समय तक बहुत सी लाठियां खाईं। छात्रसंघ चुनाव लड़ने की तैयारी के बीच अचानक सब कुछ छोड़ कर चला गया जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा पर प्रदर्शन करने, कालीदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पर जाकर नारेबाजी शुरू की तो लाठियां चलने लगी। सब झेला सिर्फ इस लिए कि शायद कुछ ऐसा हो जाए कि देश की सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोगों को एहसास हो कि इस देश का युवा चाहता कि भारत की प्रतिष्ठा का सम्मान बना रहे लेकिन आज सब कुछ छलावा लग रहा है। पिछली बातों को याद करके बस आंखों में नमी सी छाने लगने लगती है।

दोस्तों, वह एक ऐसा आंदोलन था जिसमें मैं पूरी शिद्दत से लगा था। मेरे जीवन का सबसे बड़ा किंतु असफल आंदोलन... 22 दिसंबर को जब इस देश के युवाओं ने आजादी के बाद के 65 सालों के इतिहास को बदलते हुए देश के प्रथम व्यक्ति के रायसीना हिल्स स्थित घर के दरवाजे पर सुबह सुबह लात मारते हुए कहा कि उठो और इस देश की बेटी के साथ हुए कुकृत्य का जवाब दो तो इस देश की सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था यह तय नहीं कर पा रही थी कि इन युवाओं को क्या कहकर रोका जाए।  उसके ठीक अगले दिन सुबह लखनऊ में जब हम सब मुख्यमंत्री आवास पहुंचे तो पुलिसवालों का चेहरा बता रहा था कि वो हमें रोकना नहीं चाह रहे थे। उनकी अनचाही नाकाम कोशिश के बाद जब हम मुख्यमंत्री आवास पहुंचे तो सुबह से शाम हो गई लेकिन कोई नहीं आया लेकिन लखनऊ के युवाओं ने भी बता दिया कि वो अपनी 'बहन' के लिए कुछ भी कर सकते हैं। फिर शाम 6 बजे भारी ठंड में राजनीति ने अपनी गंदी चालों को  चलना शुरू किया। हमें वहां से हटाने के लिए तत्कालीन जिला न्यायाधीश अनुराग यादव आए और बोले कि आप सब धरना स्थल चलिए वहां हम आपसे बात करेंगे। जब हम नहीं माने तो वे हमारे साथ पैदल धरना स्थल पर गए। सात किलोमीटर की उस पदयात्रा के दौरान ठंड के बीच उनके चेहरे का पसीना बता रहा था कि वे मजबूरी में पैदल चल रहे हैं। अंत में धरना स्थल पर हम सबको अश्वासनों की मीठी गोली दे दी गई। 1 महीने तक मैं और मेरे कई साथी सुबह के समय धरना स्थल पर बैठते थे तो रात में कैंडिल मार्च करते थे। नेताओं के आश्वासनों ने हम सबको अपनी झूठी चालों में फंसा लिया।

पढ़ें: नारी और हमारे समाज की विकृत मानसिकता

आज जब उस घृणित अपराध को अंजाम देने वाले व्यक्ति को नाबालिक करार देते हुए छोड़ दिया गया तो बस मन में यही आया कि क्या से क्या हो गए हैं हम? जिस देश में नारी को पूज्या समझा जाता था और जिस देश में नारी के सम्मान की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने समुद्र पर पुल बना दिया था उस देश में नारी के साथ ऐसा व्यवहार... बातें राम मंदिर की हो रही हैं...कैसा राम मंदिर यार, जब आप अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहे तो क्या राम आएंगे....नहीं, हमें ही राम बनना होगा...बदलनी होगी यह व्यवस्था... आफरोज जैसे रावणों के वंशजों को हमें ही समाप्त करना होगा और अगर हम इस व्यवस्था को नहीं बदल सकते तो हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम किसी श्रीराम मंदिर की बात करें.... देवताओं का वास तो वहां होता है, जहां महिलाओं का सम्मान होता है।

कल मेरे एक अनुज पंकज ने एक ब्लॉग लिखा...(पंकज के ब्लॉग को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।) उसके अलावा कई छोटे भाई प्रदीप तिवारी जैसे कई लोग फेसबुक पर लगातार लिख रहे हैं कि देश संवेदनाओं से नहीं कानून से चलता है। मैं प्रदीप तथा पंकज की बातों से सहमत नहीं हूं। मेरा मानना है कि यह देश आज भी संवेदनाओं से चल रहा है। इस राष्ट्र का आधार संवेदना है। हम इंग्लैंड में नहीं रहते हैं जहां रिश्ते कानून आधारित होते हों। मेरा इनसे बहुत ही सीधा सा प्रश्न है कि क्या इनकी मां और पिता का रिश्ता कानून यानी लॉज आधारित है? मुझे पता है इसका जवाब नहीं ही होगा। जब इस देश में रिश्ते कानूनन नहीं बनते तो इस देश की बेटी की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने वाले को छोड़ने के पीछे कानून की दुहाई क्यों दी जा रही है, यह मेरी समझ से परे है। और सबसे बड़ी बात कि जो व्यक्ति बलात्कार जैसा कुकृत्य कर सकता है उसे नाबालिग किस आधार पर कहा जा रहा है।

सिर्फ एक यही मामला नहीं है, हाल ही में देश में अपराध दर पर एक रिपोर्ट आई है जो बताती है कि पिछले दस साल में नाबालिगों द्वारा किए गए संज्ञेय अपराधों में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जहां 2003 में नाबालिगों द्वारा किए गए अपराध के 17,819 मामले दर्ज किए गए, वहीं 2014 में यह संख्या बढ़ कर 38,586 हो गयी। दस साल पहले रेप के 466 मामले सामने आए थे, जबकि पिछले साल दर्ज हुए मामलों में 2,144 बलात्कार के हैं। अकेले दिल्ली में ही संख्या 140 रही।

आज जब इस देश के माननीय प्रधानमंत्री महोदय विश्व पटल पर बहुत ही गर्व से यह कहते हैं कि भारत एक युवा देश है तो उसका आधार होता है कि इस देश में लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या 18 की उम्र से कम है। तो क्या यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि 'भारत एक नाबालिग देश है।'

पढ़ें: आखिर क्यों होते हैं बलात्कार?

बलात्कार गंदी और निम्न स्तर सोच के कारण होते हैं। वह सोच उम्र नहीं देखती। भारत के बहुविध समाज में स्त्रियों का विशिष्ट स्थान रहा हैं। पत्नी को पुरूष की अर्धांगिनी माना गया हैं। वह एक विश्वसनीय मित्र के रूप में भी पुरूष की सदैव सहयोगी रही हैं। कहा जाता हैं कि जहां नारी की पूजा होती हैं वहीं देवता रमण करते है। नारी नर की खान है। वह पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील और विश्व के लिए करूणा संजोने वाली महाकृति है। एक गुणवान स्त्री काँटेदार झाड़ी को भी सुवासित कर देती हैं और निर्धन से निर्धन परिवार को भी स्वर्ग बना देती हैं।

भारतीय समाज में नारी का देवी स्वरूपा स्थान है। एक आदर्श नारी धैर्य, त्याग, ममता, क्षमा, स्नेह,समर्पण, सहनशीलता, करूणा, दया परिश्रमशीलता आदि गुणों से परिपूर्ण हैं। महादेवी वर्मा ने कहा है कि 'नारी केवल एक नारी ही नहीं अपितु वह काव्य और पे्रम की प्रतिमूर्ति हैं। पुरूष विजय का भूखा होता हैं और नारी समर्पण की' वास्तव में भारतीय नारी पृथ्वी की कल्पलता के समान हैं।

मैं मानता हूं कि मात्र उस बलात्कारी हत्यारे को सजा देने से बलात्कार जैसे अपराध नहीं रुकेंगे लेकिन दोस्तों, एक कठोर सजा देने से समाज में यह संदेश तो जरूर जाता कि यह देश ऐसे अपराधों के लिए माफी देने वाला शांतिप्रिय देश नहीं बल्कि अपने शरीर को छोड़ चुके लोगों भी को न्याय देने वाला न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के सिद्धान्तों का अनुपालक है। एक बात और ऐसे घृणित अपराधों के लिए मैं शरियत का समर्थन करता हूं और मुझे लगता है कि ऐसे बलात्कारियों को बस इस्लाम सजा दे सकता है।


 उस आंदोलन की कुछ तस्वीरें...




तत्कालीन जिलाधिकारी अनुराग यादव जी....

मेरी सहपाठी एवं एबीवीपी की कार्यकर्ता के लगी चोट...

तब लगा था जीत जाऊंगा....लेकिन....

सीएम आवास के अंदर पहुंचने के बाद कुछ ऐसी खुशी थी... 
आंदोलन के इतिहास में अभूतपूर्व परिवर्तन...
 
बच्चों से लेकर महिलाएं...सब छोड़कर आ गईं थी साथ...

पुलिस ने रोकने की कोशिश तो बहुत की लेकिन नहीं रोक लके....


छात्रनेता नितिन मित्तल के सवालों का जवाब तक नहीं था डीएम साहब के पास

सबके साथ...सब जगह...बस एक ही मांग...'हत्यारों को फांसी दो'

वंदे भारती

Sunday, 6 December 2015

कैसे राम, और कैसा मंदिर?


दोस्तों, आज से 23 साल पहले बाबरी ढ़ांचे जिसे कुछ अज्ञानी मस्जिद भी कहते हैं, उसे देश की जनता के एक वर्ग ने गिरा दिया। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि एक स्वतंत्र देश में गुलामी की कोई निशानी नहीं होनी चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि देश की सारी मस्जिदें तोड़ दो..अरे मस्जिद भी इस देश के नागरिकों की, हमारे भाइयों की इबादतगाह है, उसका सम्मान होना चाहिए। और इस देश के प्रत्येक नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि इस देश के नागरिकों के पूजन स्थल की, इबादतगाह की सुरक्षा करे। अब संभव है कि आपके मन में सवाल उठे कि जब आप मानते हैं कि मस्जिद नहीं टूटनी चाहिए तो फिर बाबरी के गिरने को सही कैसे ठहरा सकते हैं? तो दोस्तों, मैं आपको बता दूं कि पहली बात तो यह कि यह देश राम का देश है, बाबर का नहीं...अब इसे यह मत कहना कि मैं मुस्लिम विरोधी हूं... मैं चाहता हूं कि इस देश के लोगों के बीच चर्चाएं बाबर पर नहीं बल्कि इस देश के सबसे बड़े मुसलमान, एपीजे अब्दुल कलाम पर चर्चा पर हो, अशफाक उल्ला खां पर चर्चा हो। उन पर कोई उंगली उठाएगा तो इस देश के मुसलमानों के साथ नहीं बल्कि उनसे आगे खड़ा होकर उनका विरोध करूंगा जो इस देश की एकात्मता के आधार कलाम जैसे मुस्लिमों पर उंगली उठाएंगे और मैं ऐसा इस लिए करूंगा क्यों कि कलाम साहब सिर्फ मुसलमानों के नहीं अपितु इस देश के प्रत्येक नागरिक के हैं। ठीक इसी प्रकार राम सिर्फ हिंदुओं के नहीं अपितु प्रत्येक हिंदुस्थानी के हैं।

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सांस्कृतिक आधार पर इस देश के मुसलमान जिन्ना के नहीं अशफाक उल्ला खां के वंसज हैं। जिनको इस भारत मां से प्यार नहीं था वे 1947 में ही यह देश छोड़कर जा चुके हैं। अब जो यहां पर हैं वे हमारे अपने हैं। अगर आप उन पर प्रश्नचिन्ह लगाना पूरी तरह से गलत होगा। मेरे इस कथन को इस रूप में ना लिया जाए कि मैं याकूब की शवयात्रा को निकालने वालों का समर्थन करता हूं। वे भटके हुए लोग हैं जो याकूब की शवयात्रा निकालते हैं। उन्हें सत्य से अवगत कराना होगा और वे यदि इस भारत भूमि के प्रति सम्मान ना रखें तो उन्हें पाकिस्तान मत भेजो बल्कि चौराहे पर खड़े करके गोली मार दो। राम तो हमारी अस्मिता के आधार हैं, राम तो वह हैं जो वनवास के समय जब दुनिया और मानवता के सबसे बड़े दुश्मन, रावण से युद्ध करने निकलते हैं तो एक राजकुमार होते हुए भी वे किसी राजा का साथ नहीं लेते बल्कि वंचितों को, वनवासियों को गले लगाते हैं।

राम का तो पूरा जीवन ही त्रासदीपूर्ण रहा। इसके बावजूद लोग राम की पूजा करते हैं। भारतीय मानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं; बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टता पूर्वक किया। अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा। मैंने ने राम को इसलिए पसंद किया, क्योंकि मैंने राम के आचरण में निहित सूझबूझ को समझा।

दरअसल, राम की पूजा इसलिए नहीं की जाती कि हमारी भौतिक इच्छाएं पूरी हो जाएं-मकान बन जाए, प्रमोशन हो जाए, सौदे में लाभ मिल जाए। बल्कि राम की पूजा हम उनसे यह प्रेरणा लेने के लिए करते हैं कि मुश्किल क्षणों का सामना कैसे धैर्य पूर्वक बिना विचलित हुए किया जाए। राम ने अपने जीवन की परिस्थितियों को सहेजने की काफी कोशिश की, लेकिन वे हमेशा ऐसा कर नहीं सके। उन्होंने कठिन परिस्थतियों में ही अपना जीवन बिताया, जिसमें चीजें लगातार उनके नियंत्रण से बाहर निकलती रहीं, लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने हमेशा खुद को संयमित और मर्यादित रखा। आध्यात्मिक बनने का यही सार है।

संत कबीर कहते हैं कि
राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप


अर्थात राम नाम को महत्व जाने बिना उसे जपना तो न जपने जैसा ही है क्योंकि जब तक मस्तिष्क पर देहाभिमान की छाया है तब तक अपने पापों से छुटकारा नहीं मिल सकता।

इस संसार में चार राम हैं-

एक राम दशरथ का बेटा , एक राम घट घट में बैठा !
एक राम का सकल पसारा , एक राम है सबसे न्यारा !


संसार में चार राम हैं ! जिनमें से तीन को हम जगत व्यवहार में जानते हैं पर चौथा अज्ञात राम ही सार है । उसका विचार करना चाहिये । एक दशरथ पुत्र राम को सभी जानते हैं और एक जो प्रत्येक जीवात्मा के घट ( शरीर ) में विराजमान है तथा एक ये जो समस्त ( सकल ) दृश्य अदृश्य सृष्टि है , ये ( विराट पुरुष ) राम ही है - राम में ही है । लेकिन इन सबसे परे जो चौथा ( आत्मा ) राम है । वही हमारा और इन सबका सार है । अतः उसी को जानना उत्तम है।



इसलिए मैं उस राम का मंदिर चाहता हूं जो हिंदुओं के नहीं बल्कि प्रत्येक भारतीय के हैं। भाजपा ने तो हमारे राम को भरे बाजार बेच दिया और आज भी उन्ही राम पर राजनीति करना चाहती है, लेकिन यह देश सब समझता है। इस देश की जनता को जब मंदिर बनाना होगा, मंदिर बन जाएगा। मंदिर बनाने के लिए इस देश के 125 करोड़ भारतीयों को किसी 'दल' की जरूरत नहीं लेकिन हां 'दल' को अवश्य इस देश के लोगों की जरूरत होगी। जब इस देश का प्रत्येक 'भारतीय' यह कहेगा कि मंदिर बने तब मंदिर बनना चाहिए और जिसे राम स्वीकार नहीं उसे स्वयं को भारतीय कहलाने का भी अधिकार नहीं। शब्द पर ध्यान दीजिएगा मात्र प्रत्येक 'भारतीय'।

यह भी पढ़ें: कब बनेगा राम मंदिर

वंदे भारती

Friday, 27 November 2015

एक मुस्लिम लड़के का आमिर को करारा जवाब

एक ओर जहां देश में तथाकथित 'असहिष्णुता' को लेकर माहौल गरम दिख रहा है वहीं दूसरी ओर एक वर्ग ऐसा भी है जिसे देश देश के माहौल से कोई समस्या नहीं है। कल कुछ सर्च करते करते अचानक मेरी नजर quora.com की एक पोस्ट पर गई। उस पोस्ट को पढ़कर मुझे लगा कि आखिर कोई कैसे यह कह सकता है कि इस देश में असहिष्णुता बढ़ रही है। एक मुस्लिम लड़के ने यह पोस्ट लिखी तो काफी समय पहले थी लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में यह बिलकुल सटीक बैठती है। वर्तमान परिदृश्य के अनुसार बेहद प्रासंगिक लगने वाली वह पोस्ट अंग्रेजी भाषा में लिखी गई थी। उस पोस्ट को मैं हिन्दी भाषा में आपके सामने रख रहा हूं। इस पूरे विषय पर मेरा क्या विचार है उसे आप लेख के अंत में पाएंगे। वेबसाइट पर प्रश्न पूछा गया था कि एक भारतीय मुसलमान के तौर पर आपको किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा है?
पोस्ट के जवाब में सैयद नासिर ने जो कुछ लिखा वह भारत की गंगा जमुनी तहजीब को बताता है। नासिर लिखता है कि मेरे साथ एक बार नहीं कई बार भेदभाव हुआ है।

रमजान के महीने में जब मेरे दोस्‍त अपने व मेरे बीच भेदभाव करते हुए कहते हैं कि तुम घर जाओ हम काम संभाल लेंगे।

रमजान की एक शाम एक गैर मुस्‍लिम दोस्‍त ने अपने व मेरे घर के बीच भेदभाव किया। उसने कहा कि आज हम प्रॉजेक्‍ट वर्क तुम्‍हारे घर पर निपटाएंगे, चूंकि रमजान है और मैं तुम्‍हारे घर पर बने लजीज व्‍यंजनों का स्‍वाद मिस नहीं करना चाहता।

जब भी शराब पीने वाले दोस्‍तों के साथ पार्टी होती है तो वह मेरे साथ भेदभाव करते और मेरे लिए सॉफ्ट ड्रिंक लाना नहीं भूलते।

जब भी हम कहीं बाहर नॉन वेज खाने का प्‍लान बनाते हैं। तो मेरे दोस्‍त रेस्‍तरांओं के बीच भेदभाव करते हैं। वे वहीं जाते हैं जहां उन्‍हें मेरे लिए हलाल फूड मिलने का यकीन होता है।

हर शुक्रवार को मुझे अपने और गैर मुस्‍लिम दोस्‍तों के बीच भेदभाव महसूसत होता है। जब मुझे नमाज के लिए जाने की इजाजत होती है और वे उस आधे घंटे के दौरान काम कर रहे होते हैं।

तफरी के दौरान भी मुझसे भेदभाव होता है। अगर माहौल है तो मुझसे उर्दू शायरी सुनाने की उम्‍मीद की जाती है।

हर बार घर जाते समय मुझे भेदभाव का सामना करना पड़ता है। वापस आने पर मुझसे ढेर सारी बिरयानी लाने की उम्‍मीद की जाती है। किसी और के साथ ऐसा नहीं होता। यह भेदभाव है।

हर रोज जब दोपहर के वक्‍त वर्कप्‍लेस पर अपनी टेबल के करीब नमाज के वक्‍त मेरे साथी बाहर चले जाते हैं। जिससे कि उन पांच मिनटों के दौरान लंच की उनकी गपशप से मैं डिस्‍टर्ब न हो जाऊं।

नासिर ने आगे लिखा कि बहरहाल अगर साफ शब्‍दों में कहूं तो मुझे याद नहीं आता कि कभी मेरे साथ कहीं पर भी भेदभाव हुआ। मुझे नौकरी बिना किसी परेशानी के और प्रमोशन टैलेंट के दम पर मिला। इस्‍तीफा भी बिना किसी विवाद के दिया। मैं अपने करियर में बिना यह इस फीलिंग के साथ आगे बढ़ सकता हूं कि अपने धर्म के चलते मैंने कोई अवसर खो दिया।

नासिर लिखता है कि कुछ मुस्‍लिम दोस्‍तों ने जरूर मुझे बताया कि उन्‍हें नए शहर में किराए का मकान मिलने में तकलीफ होती है। मेरा मानना है कि ऐसा मकानमालिकों के मुस्‍लिमों को नापसंद करने की बजाय नॉन वेजिटेरियंस को मकान न देने के चलते हो सकता है। मांस मच्‍छी न खाना उनके धर्म का हिस्‍सा होगा और संभव है वह अपने घर में मांस न चाहते हों। ऐसे लोगों को दरकिनार कर आगे बढ़िए। आखिर आपका इरादा मकानमालिक की बेटी से शादी करने का तो नहीं है। संभव है आप अपने धर्म को लेकर कांशियस हो रहे हैं, जिसके चलते लगने लगा है कि सिर पर लगी टोपी की वजह से एयरपोर्ट पर ज्‍यादा तलाशी या ट्रैफिक पुलिस वाला रोक रहा है। इन्‍हें इग्‍नोर कर आगे बढ़िए। भारत में आगे बढ़ने के लिए आपके पास पर्याप्‍त मौके हैं।
सिविल सर्विस एग्‍जामिनेशन से लेकर सॉफ्टेवेयर इंडस्‍ट्री में नौकरियों तक, पर्याप्‍त व ट्रांसपेरेंट रास्‍ते हैं जहां आप अपने को साबित कर सकते हैं। उन पर ध्‍यान केंद्रित करिए बजाय यह सोचने कि मेट्रो में बैठी महिला आपको दाढ़ी के चलते देख रही थी। अपने गैर मुस्‍लिम दोस्‍तों के सवालों का जवाब दीजिए जो वह अकसर किसी दुर्भावना नहीं बल्‍कि क्‍यूरियोसिटी के चलते पूछ रहे होते हैं। मुस्‍कुराते रहिए। अपने धर्म व उसकी हीलिंग व अच्‍छाई को बढ़ावा देने की ताकत में यकीन करिए। आपका वक्‍त अच्‍छा गुजरेगा।

नासिर ने अपने जवाब के अंत में 'प्राउड एंड हैप्‍पी टू बी इंडियन। जय हिंद' लिखा है।


दोस्तों, इस उत्तर को पढ़कर मुझे ह्रदय से बहुत ही खुशी हुई। अगर हम मुस्लिम्स से यह अपेक्षा करते हैं कि वे गैर मुस्लिमों के बारे में वैसे ही विचार रखें जैसे कि नासिर के हैं तो दोस्तों हमें भी मुस्लिमों के साथ वैसा ही व्यवहार करना होगा जैसा कि नासिर के मुस्लिम परिचितों ने उसके साथ किया। दोस्तों, जो मुस्लिम आज इस देश में रह रहे हैं वे तुर्की या अरब से नहीं आए हैं बल्कि वे सभी यहीं के हैं लेकिन इस देश के कुछ लोग ऐसा मान कर बैठे हैं मुसलमान का मतलब गद्दार और जब उनके सामने एपीजे अब्दुल कलाम या अशफाक उल्ला खान का नाम लो तो वे बहुत आसानी से सवाल को टालते हुए इन नामों को अपवाद करार देते हैं।

दोस्तों, एक चौपाई है, जाकी रही भावना जैसी, रघु मूरति देखी तिन तैसी। बिलकुल वैसी ही स्थिति है, आप जिस रूप में जिसे देखेंगे वैसे ही वे दिखेंगे। आप एक मुसलमान में अगर लादेन देखेंगे तो वह आपको वैसा ही दिखेगा और अगर उसी मुसलमान में आप एपीजे अब्दुल कलाम को देखने की कोशिश करेंगे तो निश्चित ही आपकी अपेक्षानुसार वह व्यक्ति एपीजे कलाम बनने की कोशिश करेगा। हमारे पुराणों में आकर्षण के सिद्धान्त की बात की गई है, वही तो है यह।

और दोस्तों, अगर कोई व्यक्ति इतना गिरा हुआ है कि वह इस देश की माटी के साथ गद्दारी करने के बारे में सोच रहा है तो उसे जेल में मत डालो बल्कि चौराहे पर गोली मार दो, लेकिन उस व्यक्ति को इस्लाम से मत जोड़ो और इसके साथ इतनी हिम्मत भी रखो कि अगर कोई ऐसा व्यक्ति जो भगवा कपड़े पहन कर इस देश को तोड़ने की साजिश करे तो उसे भी उतनी ही बर्बरता से मारने की हिम्मत रखो। और दोस्तों भगवा पहन कर देश तोड़ने की बात करने वाला एक बड़ा नाम तथाकथित स्वामी अग्निवेश का है। मेरा मानना है कि जो राष्ट्र और मातृभूमि को सर्वप्रथम ना माने वह भले ही दिन में 50 बार मंदिर जाता हो लेकिन उसे हिंदू नहीं कहा जा सकता। यह सिद्धान्त मेरा अपना नहीं है अपितु यह सिद्धान्त तो हमारे पूर्वज श्री रामचन्द्र जी ने दिया था। याद है ना आपको श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा था, "अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥" अभी हाल ही में हुए पेरिस हमले के बाद अपने एक मुस्लिम मित्र दानिश से मैंने पूछा कि भाई यह कैसा इस्लाम है तो दानिश ने कहा कि जो मजमूलों का कातिल है वह मुसलमान नहीं हो सकता। उसके जवाब से मुझे एहसास हुआ कि हम दोनों के विचार तो एक ही हैं।
इस ब्लॉग को एक अपेक्षा के साथ लिख रहा हूं... मेरी अपेक्षा यह है कि आने वाले कुछ समय में इस देश का प्रत्येक मुसलमान जब भारत से कहीं बाहर जाए तो वह कहे कि भारत के 25 करोड़ मुसलमान 100 करोड़ सनातनियों की सुरक्षा में रहते हैं और जब कोई सनातनी कहीं बाहर जाए तो वह कहे कि भारत के मुसलमान हमसे पहले मां भारती की रक्षा में अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार खड़े रहते हैं तथा जब तक भारत में ईमान के पक्के ये 25 करोड़ मुसलमान हैं तब तक भारत का कोई कुछ नहीं कर सकता।

इसी अपेक्षा के साथ वन्दे भारती...

Thursday, 26 November 2015

खड़गे जी, कुछ पढ़कर आओ..

अभी अभी कांग्रेस के एक बड़े नेता तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने राजग के सांसदों से कहा, 'तुम, आर्य तो बाहर से आए थे, हम इस देश के हैं...' मुझे समझ नहीं आता ऐसे अज्ञानी लोग क्यों इस देश में रह रहे हैं। जिन्हें इस देश की संस्कृति, इस देश के इतिहास का ज्ञान नहीं वह क्यों लोकसभा में पहुंच जाते हैं? और इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देश के नागरिक ऐसे कुत्सित विचारों वाले लोगों को अपना नेता चुन लेते हैं।

दोस्तों, आर्य शब्द वेदों मे वर्णित हैं यह संस्कृत का शब्द हैं, जिसका अर्थ होता हैं “श्रेष्ठ” या “नेक”। सृष्टि की आदि से वेदों के आदेशो का पालन करने वाले मनुष्य आर्य कहलाते आये हैं। अंग्रेजी और वामपंथी इतिहास में देश को तोड़ने की बड़ी साजिशें की गईं। इस देश में दो प्रकार के संप्रदाय बहुत ही पुराने समय से चल रहे हैं एक वैष्णव तथा दूसरा शैव। वैष्णव, भगवान विष्णु के पूजकों को तथा शैव, भगवान शिव के पूजकों को कहा जाता है। आर्य का अर्थ स्पष्ट रूप से वैष्णव और द्रविड़ का अर्थ शैव है। अंग्रेजों के समय मैकॉले और मैक्समूलर जैसे लोगों ने षणयंत्र रचकर यह प्रचारित किया कि आर्य बाहर से आये थे। उनका उद्देश्य था कि इस तरीके से भारत मे फूट डालो राज करो की निति के आधार पर शासन किया जाए।

ऋग्वेद में एक वेद मंत्र आता है,
अहं भूमिददामार्यायाहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याम् ।
अहमपो अनयं वावशाना मम देवासो अनु केतामायन् ॥
ऋग्वेद  4/26/2
अर्थात् (ईश्वर कहते हैं) मैं आर्य के लिए भूमि देता हूँ । मैं दानशील मनुष्य के लिए धन की वर्षा करता हूँ । मैं घनघोर शब्द करनेवाले बादलों को धरती पर वर्षाता हूँ । विद्वानलोग मेरे ज्ञान (उपदेश)के अनुसार चलते हैं ।
इस वेद मन्त्र में बतलाया गया है कि ईश्वर आर्य के लिए ही अर्थत अच्छे उत्तम मनुष्यों के लिए ही भूमि और धन देता है। वर्षा करता है और ज्ञान देता है।
इस पंक्ति को सामान्य तौर पर ना लें। इसका स्पष्ट अर्थ है कि ईश्वर ने यह भूमि श्रेष्ठ लोगों को दी है। खुद ही सोचिए अपनी बनाई चीज किसको दी जाती है?

'कृण्वन्तो विश्वार्यम' तो आप सबने पढ़ा ही होगा। यह ऋग्वेद के एक मंत्र का एक हिस्सा है। ऋग्वेद में कहा गया है -
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ।
अपघ्नन्तो अराव्ण: ॥
ऋग्वेद 9/63/5

अर्थात् - आत्मा को बढ़ाते हुए दिव्य गुणों से अलंकृत करते हुए तत्परता के साथ कार्य करते हुए अदानशीलता को , ईर्ष्या , द्वेष , द्रोह की भावनाओं को , शत्रुओं को परे हटते हुए सम्पूर्ण विश्व को , समस्त संसार को आर्य बनाएं। आर्य कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है जिसे आप यह कह दें कि वेद, धर्म परिवर्तन या जाति परिवर्तन के लिए कहा  जा रहा है। कितनी सुंदर बात है कि संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाएं, सम्पूर्ण विश्व को नेक बनाएं। हमें गर्व होना चाहिए कि हम ऐसी संस्कृति के संवाहक हैं जो नेक बनाने पर जोर देती है। हमारी संस्कृति यह नहीं कहती कि दुनिया को मूर्ति पूजक बनाओ, बल्कि श्रेष्ठ बनने और बनाने को कहती है। आर्य यदि जाति होती तो लोग कहते मैं आर्य हूं लेकिन इतिहास में किसी ने यह नहीं कहा कि मैं आर्य हूं। रामायण महाभारत मे भी आर्य का सम्बोधन आया है। मगर क्या यह संबोधन क्या किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए था? या उस समय के लोग खुद को आर्य (श्रेष्ठ) कहते थे? बिल्कुल नहीं उस समय भी दूसरों के द्वारा भी “आर्यपुत्र” “आर्यमाता” “आर्यपत्नी” का संबोधन मिलता है। एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है जिसमें किसी ने खुद को आर्य कहा हो।

श्रीमद्भगवद्गीता में आर्य शब्द का प्रयोग
भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन से कहा है -
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकिर्तिकरमर्जुन ।।
श्री मद्भग्वद गीता 2/2

अर्थात - हे अर्जुन ! तुम को विषम स्थल में यह अज्ञान किस हेतु से प्राप्त हुआ है , क्यों कि यह न तो आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषों का प्रिय व उन द्बारा अपनाया गया है ।न स्वर्ग देनेवाला है और न कीर्ति को करनेवाला है ।
यह सभी जानते हैं की अर्जुन मोह में पड़कर अपना कर्तव्य - कर्म भूल चुके थे और भिक्षा का अन्न खाने के लिए तैयार था । अपने धर्म को छोड़कर निन्दित कर्म करने के लिए तैयार था। इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने उसे अनार्य कहा है। और आर्यों के गुण अपनाने के लिए ही उसे पूरे गीता का उपदेश दिया है। श्री कृष्ण आर्य थे - अर्जुन आर्य था। जब अर्जुन आर्य के कर्तव्य कर्म को छोड़कर उसके विपरीत कर्मों को अपनाने लगा तो श्री कृष्ण ने अर्जुन को धिक्कारा और आर्य अर्थात श्रेष्ठ बने रहने के लिए उपदेश दिया।

रामायण में भी आर्य शब्द का प्रयोग
 
वाल्मीकि रामायण में आर्य शब्द का अनेक बार प्रयोग हुआ है ।
भगवान राम के गुणों का वर्णन करने के पश्चात वाल्मीकि मुनि से नारद जी कहते हैं -
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रिय दर्शनः ॥ 1/16
वे आर्य एवं सब में समान भाव रखनेवाले हैं । उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है ।
एक मनुष्य में जितने अच्छे गुण होने चाहिए उन गुणों का वर्णन भगवान श्री राम में करने के पश्चात नारद जी उन्हें आर्य कहते हैं ।

आधुनिक विद्वान आर्य शब्द का प्रयोग इन्हीं अर्थों में करते हैं । भारत के मूल निवासी जितने भी हैं वे आर्य हैं ।
महाकवि मैथिलिशरण गुप्त ने भारत - भारती में लिखा है -
जग जान ले कि न आर्य केवल नाम के ही आर्य हैं ।
वे नाम के अनुरूप ही करते सदा शुभ कार्य हैं ॥

दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य शब्द की व्याख्या (meaning of arya) में कहा है कि “जो श्रेष्ठ स्वभाव, धर्मात्मा, परोपकारी, सत्य-विद्या आदि गुणयुक्त और आर्यावर्त (aryavart) देश में सब दिन से रहने वाले हैं उनको आर्य कहते है।”
इतने प्रमाणों के बाद भी कुछ लोग इस देश की एकात्मता को तोड़ने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि हम इस प्रकार के कुत्सित प्रयासों में फंसते जा रहे हैं। मैं मात्र इतना कहना चाहता हूं कि इस भारत माता की गोद में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति आर्य अर्थात श्रेष्ठ है क्यों कि उसने इस पतित पावनी भारत भूमि पर जन्म लिया है।

वन्दे भारती


Friday, 13 November 2015

आत्मपरीक्षण भाग- 2


आत्मपरीक्षण भाग- 1 से आगे...

दोस्तों, हिंदू कभी आतंकी नहीं हो सकता, हिंदुत्व कट्टर नहीं है, हिंदुत्व वीर है। जो कट्टरता की बात करे वो हिन्दू नहीं है। यह बात मैं उसी आधार पर कह रहा हूँ जिस आधार पर मैं यह कहता हूँ कि आतंकवादी मुसलमान नहीं हो सकता। बिना गीता पढ़े , बिना उसका अनुपालन किए हम स्वयं को कृष्ण के वंशज कहलाने के अधिकारी नहीं हैं। गीता में स्पष्ट लिखा है कि धर्म युद्ध में निरपेक्षता का कोई स्थान नहीं है। आज आवश्यकता धर्म निरपेक्षता की नहीं धर्म परायणता की है लेकिन धर्म परायण होने के लिए धर्म का मूल चरित्र समझ लें।


धर्म को पूजा पद्धति समझ लिया तो गीता का पूरा सिद्धांत फेल हो जाएगा। आपका दायित्व की आपका धर्म है, मेरा राष्ट्र के प्रति एक पत्रकार के रूप में बिना किसी प्रतिबद्धता के विषय रखना ही धर्म है। माता पिता के प्रति उनके बेटे के रूप में उन्हें अपेक्षानुरूप सुविधाएँ एवं आत्मिक शांति देने का प्रयास करना ही मेरा धर्म है। विद्यार्थी के प्रति एक गुरु के रूप में अपने ज्ञान को बिना किसी लालच और अपेक्षा के विस्तृत करना ही मेरा धर्म है। अपने छोटे भाई के प्रति एक बड़े भाई के रूप में उसे अपने अनुभव के आधार पर सही गलत का रास्ता दिखाना ही मेरा धर्म है। परिस्थिति के अनुरूप धर्म बदल जाता है लेकिन धर्म का मूल चरित्र नहीं बदलता। धर्म की बहुत ही सुंदर व्याख्या मनुस्मृति में की गई है। मनु स्मृति में मनु कहते है:
आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च समानमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

अर्थात अगर किसी मनुष्य में धार्मिक लक्षण नहीं है और उसकी गतिविधी केवल आहार ग्रहण करने, निंद्रा में,भविष्य के भय में अथवा संतान उत्पत्ति में लिप्त है, वह पशु के समान है क्योंकि धर्म ही मनुष्य और पशु में भेद करता हैं|
इसके आगे मनु धार्मिक शब्द की व्याख्या करते हैं। मनु स्मृति में मनु आगे कहते है कि

धृति क्षमा दमोस्तेयं, शौचं इन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो, दसकं धर्म लक्षणम ॥


धृति = प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धैर्य न छोड़ना , अपने धर्म के निर्वाह के लिए
क्षमा = बिना बदले की भावना लिए किसी को भी क्षमा करने की
दमो =  मन को नियंत्रित करके मन का स्वामी बनना
अस्तेयं = किसी और के द्वारा स्वामित्व वाली वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग नहीं करना, यह चोरी का बहुत व्यापक अर्थ है , यहाँ अगर कोई व्यक्ति किसी और व्यक्ति की वस्तुओं या सेवाओं का उपभोग करने की सोचता भी है तो वह धर्म विरूद्ध आचरण कर रहा हैं
शौचं = विचार, शब्द और कार्य में पवित्रता
इन्द्रियनिग्रहः= इंद्रियों को नियंत्रित कर के स्वतंत्र होना
धी = विवेक जो कि मनुष्य को सही और गलत में अंतर बताता हैं
र्विद्या = भौतिक और अध्यात्मिक ज्ञान
सत्यं = जीवन के हर क्षेत्र में सत्य का पालन करना, यहाँ मनु यह भी कहते है कि सत्य को प्रमाणित करके ही उसे सत्य माना जाए
अक्रोधो = क्रोध का अभाव क्योंकि क्रोध ही आगे हिंसा का कारण होता हैं
यह दस गुण मनुष्य को पशुओं से अलग करते हैं। यदि किसी व्यक्ति में यह गुण नहीं हैं तो वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है। इन 10 गुणों का अनुपालन करने वाला व्यक्ति ही धार्मिक कहा जाता है। इस प्रकार के धर्म के प्रति परायणता परम आवश्यक है और मुझे लगता है कि किसी भी पूजा पद्दति को मानने वाला व्यक्ति इन गुणों को सांप्रदायिक या कट्टर नहीं कहेगा।

पढ़ें: हां मैं पत्रकार हूं और राष्ट्रवादी हिंदू भी...
दोस्तों,12 जुलाई 2013 को रायटर्स को दिए गए एक साक्षात्कार में नरेन्द्र मोदी जी ने कहा कि वह हिंदू राष्ट्रवादी हैं। उस दिन के बाद से ही मैंने सोशल मीडिया पर उनके समर्थन में लिखना शुरू किया। 20 जून 2011 को मैंने फेसबुक पर विश्व गौरव राष्ट्रवादी हिन्दू नाम से अपना एक पेज बनाया था। मेरे लिए हिंदू और राष्ट्रवाद की परिकल्पना पूर्णतः स्पष्ट थी। मैं हिन्दू शब्द को एक राष्ट्रीयता मानकर कर स्वयं को हिन्दू कहता हूं। जहां तक रिलिजन की बात है तो इस शब्द में मेरा विश्वास नहीं है। रिलीजन तो विभेद पैदा करता है और धर्म विभेद समाप्त करने का। मैं धार्मिक हूं और अपेक्षा करता हूं कि यदि धर्म की इस वास्तविक परिकल्पना को तथाकथित नास्तिक ने समझ लिया तो वह स्वयं को धार्मिक ही मानेगा। फिर वह कभी यह नहीं कहेगा कि वह नास्तिक है। हम अपने विषय को स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं इसका एकमात्र कारण है संवाद की कमी। संवाद होते रहना चाहिए, संवाद के बिना यह दुनिया समाप्त हो जाएगी।

पढ़ें: कुछ सवाल जो शायद आपको भी परेशान करते होंगे...

मैं संघ के वर्गों में भी गया हूं, शारीरिक से अधिक बौद्धिक विषयों पर ध्यान दिया। विद्यार्थी जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में काम किया। विद्यार्थियों का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मिली तो विद्यार्थी नवजागृति मंच में प्रदेश प्रवक्ता, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय अध्यक्ष के दायित्व का निर्वहन किया। बाबा जी भाजपा और चाचा जी सपा से जुड़े हैं इस नाते राजनीति को समझने का अवसर मिला। कई करीबी परिचित कांग्रेस और वामपंथी संगठनों से भी जुड़े हैं इस लिए उनको भी समझा। दोस्तों लेकिन इन सभी विचारधाराओं को उसी रूप में स्वीकार नहीं किया जैसी यह प्रदर्शित होती हैं। इनके बारे में पढ़ा, मैंने दीनदयाल जी के साथ मार्क्स और लेनिन को भी पढ़ा। मैनें एक लड़की से प्रेम भी किया, उसके दूर जाने के बाद आज भी शायरियां लिखता हूं लेकिन एक प्रेमी के रूप में मैंने रांझा, महिवाल को आदर्श नहीं माना। मेरे प्रेम के आदर्श श्री राम बने जिन्होंने अपने प्रेम की रक्षा के लिए समुद्र पर भी पुल बना दिया।

पढ़ें: हां, मैं भी एक लड़की से प्रेम करता हूं

दोस्तों, मैं यह नहीं कहता कि आप मेरे विचारों से पूर्णतः सहमत हों लेकिन मैं इतना जरूर चाहता हूं कि अपने विवेक का इस्तेमाल करके विषयों का विश्लेषण अवश्य करें.... विषय मात्र इतना है कि भक्ति ठीक है लेकिन अंधभक्ति उचित नहीं। दोस्तों, बस इतना याद रखना कि अगर इंग्लैंड के पास अतीत की शक्ति है, अगर जापान के पास तकनीक की शक्ति है, अगर चीन के पास श्रम की शक्ति है, अगर अमेरिका के पास डॉलर की शक्ति है तो भारत के पास मात्र परिवार और संस्कार की शक्ति है। हमने अगर अपनी इस शक्ति को खो दिया तो संभव है कि हम अमेरिका, चीन और जापान जैसे बन जाएं लेकिन इतना याद रखना आज से 100 साल के बाद आपकी उस समय की पीढ़ी के बारे में यही कहा जाएगा कि इनका देश बिलकुल चीन,अमेरिका या जापान जैसा है। कोई यह नहीं कहेगा कि इनका देश भारत है। दोस्तों, भारत को अमेरिका, जापान, चीन नहीं बल्कि भारत बनाने के लिए एक जुट हो जाओ...
वन्दे भारती




आत्मविश्लेषण भाग-1


आज पत्रकारिता के क्षेत्र के एक महान व्यक्तित्व से बातचीत हुई। उनकी बातों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि फेसबुक या ट्विटर पर मैं जो कुछ भी लिखता हूं क्या वह उसे पढ़नें वालों तक उसी रूप में पहुंचता है। उनसे चर्चा के बाद इस विषय पर मैंने अपने कई सोशल मीडिया के मित्रों से बात की। उनमें से जो लम्बे समय से मुझसे जुड़े थे उन्होंने तो वही बातें कहीं जो मैं सोचता हूं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन बातों को नकारात्मक रूप में ले लेते हैं। मैं क्या हूं? मैं क्या सोचता हूं? मेरे विचारों का आधार क्या है? इन बातों को मुझ से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। मैं जब भी मोदी या भाजपा के खिलाफ लिखता हूँ तो लोग उसे दिखावा करार देते थे, लोग कहते थे कि विश्व गौरव जी आप पत्रकारिता से जुड़ गए इस लिए खुद को निष्पक्ष साबित करने के लिए यह सब लिख रहे हो।

 


यहां तक कह दिया जाता है कि तुम सेक्युलर बन रहे हो। मैं कभी सेक्युलर बनने की कोशिश नहीं करता, बल्कि मेरी कोशिश रहती है कि मैं धर्मपरायण बनूं। पत्रकारिता मेरा धर्म है और उस धर्म को निभाते हुए यदि सत्ता के सिंहासन पर बैधा व्यक्ति कुछ गलत करता है तो मैं उसकी आलोचना करता हूं।
दोस्तों इस देश के अंदर जितनी भी समस्याएं चल रही हैं उन सबका एक मात्र कारण है संवाद की कमी। मैंने पहले भी लिखा है कि डायलॉग बहुत जरुरी है। मेरा मानना यह है कि यदि आप बात ही नहीं करेंगे, संवाद ही नहीं करेंगे तो आपको अपनी वास्तविकता या आपकी कार्यपद्धति के वास्तविक प्रभाव का पता कैसे चलेगा? आप एक ओर कहते हो मदरसों में आतंकवाद पढ़ाया जाता है दूसरी ओर उन्हीं मदरसों से एपीजे अब्दुल कलाम निकलते हैं।

आप कहते हो आरएसएस आतंकवादी संगठन है, उसी संगठन का एक स्वयंसेवक विदेशों में इस देश का प्रतिनिधित्व कर रहा है। यदि इन दोनों बातों को कहने वाले लोगों के बीच में संवाद रहा होता तो शायद इस देश को और भी कई कलाम और मोदी मिल जाते। इस दुनिया में मात्र दो पक्ष होते हैं सत्य और असत्य। सत्य की ओर खड़ा व्यक्ति मदरसों से भी निकल सकता है और असत्य की ओर खड़ा होने वाला व्यक्ति अर्थात अपने पूर्वजों के नाम पर राजनीति करने वाला, उनकी कसमें खाने वाला, उन्हें एक मुद्दा बना देने वाला व्यक्ति भी संघ का एक तथाकथित स्वयंसेवक हो सकता है।



पढ़ें: नितिन गडकरी से एक सवाल

मेरे विचार एकदम स्पष्ट हैं कि यदि वास्तव में हम चाहते हैं कि भारत विश्वगुरु के पद पर पुनर्स्थापित हो तो उसके लिए हमें अपने विवेक का उपयोग करना होगा। रावण के राज्य में भी विभीषण को इतनी स्वतंत्रता थी कि वह श्री राम के भजन करते थे। किसी भी पूजा पद्धति पर आघात गलत होगा। बेहतर होगा कि सभी पूजा पद्धतियों से राष्ट्र को सर्वोपरि, मानवता को सर्वोपरि मानने वाले लोग एक ओर और अन्य किसी शक्ति में विश्वास रखने वाले लोग दूसरी ओर रहें। इस संस्कृति ने सभी को समाहित किया है अपितु इस वर्त्तमान भारत में ही हजारों तरह की संस्कृतियाँ आज भी हैं। हमें विविधताओं का देश कहा जाता है। कुछ विविधताओं को और स्वीकार करो और उन सभी में जो उचित और आवश्यक लगे उसे अपनाकर स्वयं को और मजबूत करो। हम सब में बराबर शक्ति है बस आवश्यकता है उसे पहचानने की। अगर अपनी ऊर्जा का दुरप्रयोग कर दिया जो हमारी आने वाली पीढ़ी हमें गालियां देगी। अकेला मोदी कुछ नहीं करेगा, हम सबको एक साथ मिलकर काम करना होगा। प्रत्येक पूजा पद्धति के अच्छे लोगों को काम करना होगा।

अभी एक पोस्ट के कमेंट बॉक्स में दो वर्ग बंटे हुए थे, एक कह रहा था कि हिन्दू एक हुआ है तब मोदी आए दूसरा कह रहा था अगर मुसलमानों ने वोट नहीं दिया होता तो मोदी नहीं आते।
मैंने दोनों पक्षों के लोगों को व्यक्तिगत सन्देश भेजकर पूछा कि क्या आपके मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान या जन धन योजना की 100 प्रतिशत सफलता बिना मुस्लिमों के सहयोग के हो जाएगी और क्या बिना एक भी हिंदू के सहयोग के इस देश के पूरे मुसलमान एक होकर किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना सकते हैं। दोनों का जवाब ना ही है। आज जब एक होने का समय है तो एक हो जाओ। जब तक एक नहीं होगे तब तक भारत को विश्व गुरु बनाने के बारे में सोचना मात्र छलावा है।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सत्ता के साथ विपक्ष भी पूर्ण रूप से साथ खड़ा हो। दोस्तों, एक बार सोच कर देखो कि अगर प्रधानमंत्री जन धन योजना या स्वच्छ भारत अभियान शुरू करते हैं और सोनिया गांधी,राहुल,मुलायम,लालू नितीश सब यह कह दें कि सभी को अकाउंट खुलवाना है या सफाई करनी है तो इन योजनाओं का पूरा होना कितना आसान हो जाएगा।





विपक्ष का काम विरोध करना नहीं होता, विपक्ष का काम सत्ता पक्ष को भटकने से बचाने का होता है। मात्र 31 प्रतिशत वाला जो कह दे वह सही,इसको आधार मानकर नहीं चलना होगा। 69 प्रतिशत के वर्ग के सहयोग की आवश्यकता अवश्य पड़ेगी। मैं संघ का स्वयंसेवक हूँ, हालांकि काम की वजह से नियमित शाखा नहीं जा पाता लेकिन 14 वर्ष के स्वस्तरीय सक्रिय कार्य और संघ के वर्गों से यही सीखा है कि सत्य के साथ खड़े रहना है। संघ के वर्ग में एक बार तत्कालीन सरसंघचालक पूजनीय सुदर्शन जी ने कहा था कि यदि कांग्रेस हमारे विचारों का समर्थन करे तो हम उसके साथ हैं। डॉक्टर साहब ने भी कांग्रेस में काम किया था और जब विचार पसंद नहीं आए तो छोड़ दिया। संघ के इस विचार को मानता हूँ कि यदि कोई अच्छा कर रहा है तो उसे अंगीकार करो। मात्र इस लिए आप उसके अच्छे कामों का  विरोध शुरू कर दो क्यों कि वह आपका समर्थक नहीं है। ऐसा करना निश्चय ही गलत होगा।

पढ़ें: अब बस करो ओवैसी, नहीं तो...

दोस्तों, इस देश का सांस्कृतिक आधार श्री राम,कृष्ण और हरिश्चंद्र हैं यदि वास्तव में आप संस्कृति के संरक्षक हो तो उनके समय में एक दूसरे के प्रति जैसा प्रेम और जैसा विश्वास था वैसा पैदा करो। इसे और आसानी से समझिए श्री राम के समय कार नहीं थी तो क्या आप संस्कृति के नाम पर कार नहीं चलाओगे? कार चलाओ लेकिन अपने मन में माता पिता के प्रति श्री राम जैसा आदर रखो। राम को अपने जीवन में उतारो और जिस दिन राम इस देश के नागरिकों के मन में उतर जाएँ उस दिन मंदिर बनाओ और दुनिया के सामने कहो कि देखो हम अपने आदर्शों, अपने पूर्वजों के आदर्शों पर चल रहे हैं। हमने राम को पढ़ा तो लेकिन समझा नहीं। हम कहते रहे कि राम कोई व्यक्ति नहीं एक चरित्र हैं लेकिन कभी इस चरित्र को जीवन में उतरने का प्रयास नहीं किया।

दोस्तों, संवाद की कमी तब महसूस होती है जब इस देश का प्रधानमंत्री यूके जाता है और वहां पर प्रेस वार्ता में एएनआई के पत्रकार को यह सोचकर प्रश्न पूछने के लिए कहता है कि यह मेरे देश का पत्रकार है, यह इस समय मेरे लिए देश की आवाज है और देश के लिए मेरी आवाज, तो यह जो भी पूछेगा देश के हित में पूछेगा लेकिन हमारे पत्रकार साहब मोदी जी के समक्ष असहिष्णुता का मुद्दा उठाते हैं। जिस स्थान पर पूरे विश्व का मीडिया हो वहां पर देश की आतंरिक स्थिति पर देश के प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा कर देना उन पत्रकार महोदय का कैसा दायित्व है। जितना मोदी ने असहिष्णुता के मुद्दे पर वहां बोला कि मेरे लिए हर एक घटना महत्व रखती है उतनी बात अगर यहाँ बोल देते तो शायद आधी समस्याओं का समाधान हो जाता। पत्रकार का काम देश में और देश के बाहर जनता और सत्ता के बीच सकारात्मक सोच के साथ सेतु का काम करना है। एएनआई के पत्रकार यदि भारत में मोदी जी की एक बाइट लेकर चला देते तो शायद आज तथाकथित 'असहिष्णुता' कोई मुद्दा ही ना होता।

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Sunday, 1 November 2015

ऑनलाइन मायाजाल में फंसता भारत


कुछ दिन पहले की बात है, मैं स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एक ब्रांच मैनेजर से मिलने के लिए बैंक गया था। बैंक में मेरी मुलाकात मेरे घर के पास रहने वाले 65 वर्षीय रामशंकर पांडेय जी से हुई। मैंने उनसे पूछा कि चाचा जी आप अपने घर से इतनी दूर क्या करने के लिए आए हो? तो उन्होंने बताया कि उन्हें कुछ पैसा कहीं ट्रान्सफर करना था। इसलिए वह घर से 7 किलोमीटर दूर स्थित इस बैंक में आए थे। उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं रहता था, इसलिए मैंने उनसे कहा कि चाचा जी घर पर चलकर मैं इंटरनेट बैंकिंग चालू कर देता हूं, फिर आपको इतनी परेशानी नहीं होगी। तो वह बोले कि ऐसा मैं क्यूँ करूँ ?

तो मैंने कहा कि अब छोटे छोटे ट्रांसफर के लिए बैंक आने की और घंटों बर्बाद करने की जरूरत नहीं, और आप जब चाहे तब घर बैठे अपनी ऑनलाइन शॉपिंग भी कर सकते हैं। हर चीज बहुत आसान हो जाएगी। मैं बहुत उत्सुक था उन्हें नेट बैंकिंग की दुनिया के बारे में विस्तार से बताने के लिए। इस पर उन्होंने पूछा अगर मैं ऐसा करता हूँ तो क्या मुझे घर से बाहर निकलने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी? मुझे बैंक जाने की भी ज़रूरत नहीं?
मैंने उत्सुकतावश कहा, हाँ आपको कही जाने की जरुरत नही पड़ेगी और आपको किराने का सामान भी घर बैठे ही डिलिवरी हो जाएगा और ऐमजॉन, फ्लिपकॉर्ट व स्नैपडील सबकुछ घर पर ही डिलिवरी करते हैं।

उन्होंने इस बात पर जो जवाब मुझे दिया वह वास्तव में एक गंभीर विषय था। मेरे जैसे व्यक्ति ने भी उस पक्ष के बारे में सोचा ही नहीं था।

उन्होंने कहा आज सुबह जब से मैं इस बैंक में आया, मै अपने चार मित्रों से मिला और मैंने उन कर्मचारियों से बातें भी की जो मुझे जानते हैं। मेरे बच्चें दूसरे शहर में नौकरी करते हैं और कभी कभार ही मुझसे मिलने आते जाते हैं, पर आज ये वो लोग हैं जिनका साथ मुझे चाहिए। मैं अपने आप को तैयार कर के बैंक में आना पसंद करता हूं, यहां जो अपनापन मुझे मिलता है उसके लिए ही मैं वक़्त निकालता हूँ।

उन्होंने एक पुरानी घटना के बारे में बताते हुए कहा कि दो साल पहले की बात है मैं बहुत बीमार हो गया था। जिस मोबाइल दुकानदार से मैं रीचार्ज करवाता हूं, वो मुझे देखने आया और मेरे पास बैठ कर मुझसे सहानुभूति जताई और उसने मुझसे कहा कि मैं आपकी किसी भी तरह की मदद के लिए तैयार हूँ।
वो आदमी जो हर महीने मेरे घर आकर मेरे यूटिलिटी बिल्स ले जाकर ख़ुद से भर आता था, जिसके बदले मैं उसे थोड़े बहुत पैसे दे देता था उस आदमी के लिए कमाई का यही एक जरिया था और उसे खुद को रिटायरमेंट के बाद व्यस्त रखने का तरीका भी।
कुछ दिन पहले मॉर्निंग वॉक करते समय अचानक मेरी पत्नी गिर पड़ी, मेरे किराने वाले दुकानदार की नजर उस पर गई, उसने तुरंत अपनी कार में डाल कर उसको घर पहुँचाया क्यूंकि वो जानता था कि वो कहा रहती हैं।
अगर सारी चीज़ें ऑन लाइन ही हो गई तो मानवता, अपनापन, रिश्ते - नाते सब समाप्त जाएंगे !
मैं हर वस्तु अपने घर पर ही क्यूं मगाऊं ?
मैं अपने आपको सिर्फ अपने कम्प्यूटर से ही बातें करने में क्यूं झोंकू ?
मैं उन लोगों को जानना चाहता हूं जिनके साथ मेरा लेन-देन का व्यवहार है, जो कि मेरी निगाहों में सिर्फ दुकानदार नहीं हैं। इससे हमारे बीच एक रिश्ता, एक बन्धन कायम होता है !
क्या ऐमजॉन, फ्लिपकॉर्ट या स्नैपडील ये रिश्ते-नाते,प्यार, अपनापन भी दे पाएंगे ?

फिर उन्होने बड़े पते की एक बात कही जो मुझे बहुत ही विचारणीय लगी, आशा हैं आप भी इस पर चिंतन करेंगे....
उन्होने कहा कि ये घर बैठे सामान मंगवाने की सुविधा देने वाला व्यापार उन देशों में फलता फूलता हैं जहां आबादी कम हैं और लेबर काफी मंहगी है।
अपने भारत जैसे 125 करोड़ की आबादी वाले गरीब एंव मध्यम वर्गीय बहुल देश मे इन सुविधाओं को बढ़ावा देना आज तो नया होने के कारण अच्छा लग सकता हैं पर इसके दूरगामी प्रभाव बहुत ज्यादा नुकसानदायक होंगे।

देश मे 80% जो व्यापार छोटे छोटे दुकानदार गली मोहल्लों मे कर रहे हैं वे सब बंद हो जाएंगे और बेरोजगारी अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाएगी। तो अधिकतर व्यापार कुछ गिने चुने लोगों के हाथों मे चला जाएगा। हमारी आदतें खराब और शरीर इतना आलसी हो जाएगा कि बहार जाकर कुछ खरीदने का मन नहीं करेगा। जब ज्यादातर धन्धे और दुकानें ही बंद हो जाएंगी तो रेट कहां से टकराएंगे तब ये ही कंपनिया जो अभी सस्ता माल दे रही है वो ही फिर मनमानी किम्मत हमसे वसूल करेंगी। हमे मजबूर होकर सबकुछ ऑनलाइन ही खरीदना पड़ेगा और ज्यादातर जनता बेकारी की ओर अग्रसर हो जाएगी।

दोस्तों एक बार इस विषय पर सोचिएगा जरूर... मैं यह नहीं कहता कि ऑनलाइन शॉपिंग ना करें लेकिन सब्जियों जैसी चीजें ऑनलाइन खरीदने का मतलब है? इसे समझना बहुत आवश्यक है...

वन्दे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...