Wednesday, 24 February 2016

इस संस्कृति में रामभक्ति करें या न करें, लेकिन...

पिछले कुछ समय से हमारा देश अजीब दौर से गुजर रहा है। इस देश के हालात ऐसे हो गए हैं कि वोट के सौदागर सत्ता के सिंहासन पर बैठने के लिए नीचता की पराकाष्ठा पार करने से भी गुरेज नहीं करते। देश की इस स्थिति के लिए सिर्फ इस देश के राजनेता ही जिम्मेदार नहीं नहीं हैं अपितु इसके लिए कहीं ना कहीं हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हम आज सामने वाले व्यक्ति को उसके तर्कों के आधार पर नहीं अपितु उसके तर्कों से सहमति रखने वाली राजनीतिक पार्टियों से जोड़ देते हैं। आज हम जिसे भी चाहते हैं उसे अपनी तरह का देखना चाहते हैं, आज हमारी स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि अगर हम कहते हैं कि आइए सब एक हो जाइए तो साथ में शर्त लगा देते हैं कि एक तब होंगे जब आप हमारी तरह से सोचने लगेंगे। इसको अगर एक सामान्य पंक्ति में कहें तो हम आज ‘एकता’ नहीं अपितु ‘एकरूपता’ चाहते हैं। इस एकरूपता की विचारधारा का प्रभाव सभी तरह की विचारधाराओं पर है।

कोई कहता है कि देश के मजदूरों एक हो जाओ तो वह साथ में यह भी कहने लगता है कि आपको एक होने के लिए ‘राम’ को मानना बंद करना होगा। अगर कोई यह कहता है कि इस देश के सनातनियों एक हो जाओ तो साथ में अप्रत्यक्ष शर्त लगा दी जाती है कि इसके लिए आपको मुसलमानों का विरोध करना होगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम जैसे हैं उसी तरह रहकर मात्र भारतीयता के नाम पर एक हो जाएं। इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश में कुछ लोगों को इस बात पर शर्म आती है कि हमारे लोकतांत्रिक मंदिर, यानी संसद पर हमला करके इस देश की एकात्मता पर प्रहार करने वाले अफजल गुरु नाम के आतंकी को फांसी पर लटका दिया जाता है।

इन शर्मीले लोगों के साथ-साथ एक अन्य वर्ग कहता है कि अगर वह हमला सफल हो जाता तो क्या होता? कुछ भ्रष्ट लोग ही तो मरते। मैं उनको बताना चाहता हूं कि इस देश की संसद में कोई व्यक्ति नहीं बैठता बल्कि इस देश की संसद में जनमत बैठता है। वह जनमत जिसे मैं और आप चुनते हैं, आपने जिसको अपना वोट दिया हो भले ही वह व्यक्ति उस संसद में ना पहुंचा हो लेकिन किसी अन्य की पसंद तो वहां बैठती है। सिर्फ मैं और मेरी विचारधारा, कैसी समानता है आपकी? जो काम आपके मन-मुताबिक ना हो उस पर आपको शर्म आने लगती है, कैसी मानवता है आपकी? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में जब छात्रों के वर्ग ने कहा कि ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा है…’ मुझे समझ नहीं आया कि यहां कातिल कौन है? देश का उच्चतम न्यायालय, देश का राष्ट्रपति, अफजल की फांसी के लिए अपने शहीद पति को मरणोपरांत दिए गए शौर्यता के प्रमाण पत्रों को लौटाने की बात करने वाली वे वीरांगनाएं, वे पुलिस वाले जिन्होंने अफजल को पकड़ा अथवा देश का हर एक वह नागरिक जो सड़क से लेकर संसद तक अफजल के कुकृत्य के लिए फांसी की मांग कर रहा था?

हो सकता है कि इन शर्मीले लोगों का अफजल या उसकी विचारधारा से कोई परिवारिक अथवा व्यक्तिगत संबन्ध हो इसलिए इन्हें अफजल के तथाकथित कातिलों के जिंदा होने पर शर्म आती हो, मुझे भी शर्म आती है लेकिन इस विषय को लेकर नहीं बल्कि कुछ अन्य विषयों को लेकर… अगर आप इससे आगे पढ़कर यह जानना चाहते हैं कि मुझे किन विषयों को लेकर शर्म आती है तो सबसे पहले आपने जो राजनीतिक विचारधाराओं के दुशाले ओढ़कर रखें हैं उन्हें उतार फेकें। इस लेख को आगे पढ़ने से पहले आप अपने ह्दय से अपनी प्रिय राजनीतिक पार्टी के झंडे को नीचे करके सिर्फ तिरंगे को स्थान दें और फिर आगे पढ़ें…

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश की एक केन्द्रीय मंत्री निरंजन ज्योति, सत्ता के मद में इस कदर चूर हो जाती हैं कि वह मान लेती हैं कि उसकी राजनीतिक पार्टी के पक्ष में मतदान करने वाले लोग ‘रामजादे’ हैं और उसके विपक्ष में मतदान न करने वाले लोग ‘हरामजादे’ हैं। क्या उनके कहने का अर्थ यह था कि 2014 में उनकी पार्टी को वोट देने वाले 31% लोग रामजादे तथा अन्य 69% लोग हरामजादे थे? अगर आज सबसे अधिक वोट पाने वाली पार्टी को देश की सरकार मान लिया जाता है तो क्या उसी आधार पर यह भी मान लिया जाए कि यह देश हरामजादों का है (बहुमत के आधार पर)।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में एक प्रदेश की सत्ता का संचालन करने वाली पार्टी, टीएमसी के नेता तमस पॉल अपने प्रदेश की एक प्रमुख विपक्षी पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं को रेप करवाने की धमकी दे डालते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश की जनता कुछ उम्मीदों के साथ मात्र वाकपटुता को देखकर एक व्यक्ति को इस देश की संसद का नेतृत्व करने के लिए भेजती है और वह व्यक्ति पार्टी स्वार्थ में लिप्त होकर विरोधियों को नक्सली करार देते हुए जंगल जाने की सलाह दे देता है। देश का प्रधान यहीं पर नहीं रुकता वह उस समय के सबसे लोकप्रिय युवा राजनेता अरविंद केजरीवाल को पाकिस्तान का एजेंट करार देता है।

मुझे शर्म तब आती है जब ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ वाली संस्कृति को मानने वाले देश में एक बेटी ‘दामिनी’ सड़क पर तड़पती रहती है और कोई उसे उठाकर हॉस्पिटल तक ले जाने की कोशिश नहीं करता।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश के एक प्रदेश का एक पूर्व मुख्यमंत्री तथा केन्द्रीय सरकार का पूर्व मंत्री दिग्विजय सिंह एक महिला सांसद के लिए ‘100 टका टंच माल’ जैसी उपमाओं का प्रयोग करता है।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में हजारों सेवा प्रकल्प चलाने वाले विश्व के सबसे बड़े गैर राजनीतिक संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकी और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं को गुंडा कहा जाता है।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का एक नेता गिरिराज सिंह कहता है कि जो उसके ‘प्रधान’ का विरोध कर रहे हैं उनका स्थान पाकिस्तान में है भारत में नहीं। इतना ही नहीं वह महाशय अशफ़ाक उल्ला खां और वीर अब्दुल हमीद के देश में आतंक फैलाने वालों को एक समुदाय विशेष से जोड़कर पूरे समुदाय को आतंकी घोषित करने की कोशिश करते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का सर्वोच्च नेता कहता है कि बलात्कार करने वाले लड़कों को फांसी नहीं देनी चाहिए, लड़कों से गलती हो जाती है।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार, जिसने इस देश में सबसे अधिक शासन किया है, उसकी सर्वोच्च नेता अपने देश के बेटों पर भरोसा न करके विदेश इलाज कराने जाती हैं और इस देश से उम्मीद करती हैं कि हम उनके बेटे के भरोसे देश छोड़ दें।

मुझे शर्म तब आती है जब जाति व्यवस्था को पानी पी-पी कर कोसने वाले वामपंथी मात्र चर्चाओं में रहने के लिए एक छात्र को दलित बनाकर जातिगत राजनीति करने लगते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब इस देश में चंद राष्ट्रद्रोहियों की वजह से देश को कई नेता, अभिनेता, पत्रकार, शिक्षाविद् देने वाले विश्वविद्यालय को आतंक का अड्डा करार दिया जाता है।

मुझे शर्म तब आती है जब किसी ‘दल’ के लोग संस्कृति का झंडा लेकर हिंसा का रास्ता अपनाते हैं। इतना ही नहीं संस्कृति के ये तथाकथित ठेकेदार अपने शहीदों की पुण्यतिथि और उन शहीदों से जुड़े तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने से नहीं हिचकते। अपनी सांस्कृतिक भव्यता को समझाने की क्षमता तो इनमें रही नहीं इसलिए लाठी-डंडे और झूठे तथ्यों का सहारा लेते हैं।

मुझे शर्म तब आती है जब कुछ लोग देश के प्रधान के लिए ‘नीम का पत्ता कड़वा है, नरेन्द्र मोदी भ… है’ जैसी बातें बोलकर राज-द्रोह करते हैं और उन पर पुलिस जमकर लाठियां बरसाती है लेकिन जब कुछ लोग एक शैक्षिक संस्थान के अंदर ‘भारत तेरी बर्बादी तक….’ जैसे नारे लगाते हैं तो हमारे देश की वीर पुलिस आई-कार्ड देखने लगती है। किसकी नौकरी करते हैं ये पुलिस वाले… राजा की या राष्ट्र की…

मुझे शर्म तब आती है जब हत्यारों और बलात्कारियों को पकड़ने में नाकाम रहने वाली पुलिस एक नेता की भैंस को चोरी करने वाले को पकड़ लेती है।

मुझे शर्म तब आती है जब एक कामचोर कर्मचारी, एक टैक्स चोर और सड़क पर बिना घबराए सिग्नल तोड़ने वाला व्यक्ति पूछता है कि पीएम साहब अच्छे दिन कब लाएंगे?

मुझे शर्म तब आती है जब इतने सारे विषयों के होते हुए कोई एक आतंकी की फांसी को गलत बताते हुए उसके मानवाधिकार की बात करता है। जिस आतंकी में मानवता नाम की चीज ही नहीं है उसके लिए किस आधार पर मानवाधिकार की बातें की जाती हैं यह मेरी समझ से परे है। एक बात और इतिहास के द्वारा बताना चाहता हूं। शायद कुछ लोगों का उसमें विश्वास ना हो लेकिन मेरा है, अपने विश्वास के आधार पर एक अतिमहत्वपूर्ण विषय की ओर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।

दोस्तो, विभीषण रावण के राज्य में रहने वाला एक ऐसा व्यक्ति था जिसके सहयोग के बिना श्रीराम को सीता नहीं मिलतीं, जिनके सहयोग के बिना लक्ष्मण जीवित नहीं बचते, जिसके सहयोग के बिना रावण के राज्य की गोपनीय बातें हनुमान-श्रीराम को पता नहीं लगतीं। एक लाइन में कहें तो ‘श्रीराम का आदर्श भक्त’… इतना कुछ होते हुए भी आज उस घटना के हजारों सालों के बाद भी किसी पिता ने अपने बेटे का नाम ‘विभीषण’ नहीं रखा। जानते हैं क्यों?

क्योंकि इस संस्कृति में आप राम भक्ति करें या ना करें कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर राष्ट्रभक्ति नहीं की तो कभी माफ नहीं किए जाएंगे।

Tuesday, 23 February 2016

कैसी मानवीयता है आपकी, यह दोहरा चरित्र क्यों?

आज वामपंथ को लेकर मेरे मन में कुछ सवाल उत्पन्न हुए। मुझे उन प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे इसी अपेक्षा के साथ इस ब्लॉग को लिख रहा हूं। उन सवालों को आपके समझ रखने से पहले मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि मुझे वामपंथ के मूल विचार से कोई आपत्ति नहीं है अपितु मुझे तो लगता है कि जहां से वामपंथ आया है वहां के लिए वह सर्वश्रेष्ठ था। अपने विषय को स्पष्ट करने से पहले एक उदाहरण देता हूं। मान लीजिए आप तमिलनाडु में रहते हैं जहां 12 महीने गर्मी रहती है, उस मौसम के हिसाब से आप लुंगी या कोई हल्का कपड़ा पहनते हैं लेकिन फिर किसी कारणवश आप जम्मू-कश्मीर में रहने के लिए चले जाते हैं। क्या आप वहां पर भी सिर्फ इस तर्क के साथ कि अरे मैं तो तमिलनाडु का हूं, वहां मैंने हमेशा लुंगी पहनी है, इसलिए यहां भी वही पहनूंगा कहकर वही पुराने कपड़े पहनकर जी सकते हैं?

आपका जवाब ना ही होगा, क्योंकि आपको पता है कि वातावरण, परिस्थिति और परिवेश के अनुसार परिवर्तित होना ही समझदारी है।

यही स्थिति आज वामपंथ की है। आधुनिक वामपंथ के जनक कार्ल मार्क्स ने कहा था कि समाज में दो ही वर्ग होते हैं: पूंजीपति और सर्वहारा। कार्ल मार्क्स जहां के थे वहां वास्तव में दो ही वर्ग थे, एक शोषक यानि पूंजीपति और दूसरा शोषित यानी सर्वहारा। लेकिन क्या भारत में भी दो ही वर्ग रहे हैं? हो सकता है भारतीय इतिहास को सिरे से नकार देने वाले वामपंथी यहां भी कह दें कि भारत में भी यही दो वर्ग थे लेकिन जिसने सकारात्मक दृष्टि के, बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए भारतीय इतिहास का अध्ययन किया है, उसे पता होगा कि भारत में प्रत्येक व्यक्ति का एक विशिष्ट वर्ग था। हर एक व्यक्ति स्वयं में पूर्ण था लेकिन फिर भी एक दूसरे पर आश्रित था। यही भारत की सामाजिक व्यवस्था थी। अगर इसी के साथ हम वामपंथी इतिहास पर नजर डालें तो हमें पता लगेगा कि मार्क्‍सवाद को बड़े पैमाने पर व्यवहार में उतारने का एक बड़ा प्रयास माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीन में किया गया, जिसके फलस्वरूप 1949 में चीनी लोक गणराज्य की स्थापना हुई। आरंभ में साम्यवादी चीन को समस्त प्रकार की सोवियत सहायता प्राप्त हुई। ऐसा लगा कि इतनी विशाल आबादी और क्षेत्र वाले ये दोनों साम्यवादी देश पूंजीवादी विश्व के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर विश्व के अन्य देशों में साम्यवाद का प्रसार करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

1960 के दशक के आरंभ में दोनों देशों के बीच वैचारिक मतभेद उभरने लगे। इसका एक कारण दोनों के अलग-अलग राष्ट्रीय हित और उसके अनुसार मार्क्‍सवाद की अलग-अलग व्याख्याएं थीं। इसके साथ एक प्रमुख कारण यह था कि निकिता ख्रुश्चेव के नेतृत्व में सोवियत संघ पूंजीवाद के साथ ‘शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व’ की नीति अपनाना चाहता था जबकि माओ पूंजीवादी देशों के प्रति युद्धरत रहने पर बल दे रहे थे। वामपंथ वहां स्थायित्व नहीं ले पाया।

1920 में जब वामपंथ ने भारत में पैर रखा तो उसके सिद्धान्त वही थे जो उसका मूल आधार थे, लेकिन चूंकि भारत के परिपेक्ष्य में यहां का परिवेश वामपंथ को अपना चुके अन्य देशों की तरह नहीं था इस नाते यह तय था कि इससे भारत का नुकसान ही होगा। बिना परिस्थितियों का अध्ययन और विश्लेषण किए वामपंथ भारत में जड़ें जमाने की कोशिश करने लगा। जिस भारतीय संस्कृति को धर्म से जोड़कर कहा गया कि ‘धर्म अफीम की तरह होता है’ उस संस्कृति का चिंतन ही नहीं किया गया। यानी जिस स्थान पर रहकर वहां के तथाकथित धर्म को अफीम बताया गया, उन पूजा पद्धतियों में बुराइयां रही थीं। वहां धर्म के नाम पर शोषण किया जाता था। लेकिन इस भारत की स्थिति तो ऐसी नहीं थी। मैं मानता हूं कि भारत में भी एक लंबे समय तक कुछ वर्गों को दबाने की भरसक कोशिशें की गई हैं लेकिन अगर हम मूल भारतीय संस्कृति के बारे में सोचे तो उसमें कोई कमी नहीं। पूर्ण समानता आधारित संस्कृति को लाने के लिए आपको भारत की शिक्षा देनी होगी। अगर आप भारत में जर्मनी या रूस की शिक्षा देंगे तो यह संभव ही नहीं है कि इस देश में शांति बनी रहेगी।

आप ईश्वर को नहीं मानते, हमें कोई समस्या नहीं, आपका पूजा पद्दतियों में विश्वास नहीं, हमें कोई समस्या नहीं, आप धर्म को भी नहीं मानते फिर भी कोई समस्या नहीं लेकिन किसी एक विषय पर तो आपको हमारे साथ खड़ा होना होगा या किसी एक विषय पर तो हमें अपने साथ खड़ा कर लीजिए। आपसे हम कहते हैं कि ‘देश’ या ‘राष्ट्र’ के विषय पर ही आप हमारे साथ आ जाइए लेकिन आप नहीं आते। चलिए हम आपसे पूछते हैं कि आखिर आप किस विषय पर हमें अपने साथ लेना चाहते हैं? हमें पता है आपका जवाब ‘मानवता’ होगा, लेकिन यह कैसी मानवता है कि आप एक कलबुर्गी की हत्या पर अवार्ड वापसी का दौर शुरू कर देते हैं लेकिन देश के दिल, दिल्ली में खड़ी देश की संसद पर हमला करके दिल्ली पुलिस के पांच जवानों, सीआरपीएफ की एक महिला कर्मी और 2 सुरक्षा गार्डों के हत्यारे के समर्थन में नारे लगाते हैं। वहीं, जब एक स्वयंसेवक की खुलेआम आपकी विचारधारा के लोग उसके परिवार के सामने हत्या कर देते हैं तब आपके मुंह में दही जम जाता है। कैसी मानवीयता है आपकी? यह दोहरा चरित्र क्यों?

मैं निंदा करता हूं किसी भी व्यक्ति की हत्या की, चाहे वह किसी भी विचारधारा का अनुपालक हो लेकिन महोदय एक वामपंथी साहित्यकार की हत्या पर आप देश के उस पीएम से इस्तीफा मांगने लगते हैं जिसे इस देश की जनता ने चुन कर भेजा है, एक इखलाक की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या पर आप पूरे देश को असहिष्णु करार देते हैं परंतु क्या एक ऐसे व्यक्ति के लिए आपका मानवाधिकार नहीं है, जिसे आपकी विचारधारा से ग्रसित लोगों से समर्थन प्राप्त नक्सलियों के द्वारा, वनवासियों के आधुनिकीकरण में प्रयासरत, शिक्षा का विस्तार कर रहे वनवासी कल्याण आश्रम के पूर्णकालिक को मार दिया जाता है। जल-जंगल-जमीन के लिए तथाकथित लड़ाई लड़ने वाले, हमारे सुरक्षा जवानों की हत्या करने वाले नक्सलियों की आप वकालत करने लगते हैं। आप कहते हैं कि वे अगर अपनी जमीन के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं तो बुराई क्या है? लेकिन आपकी ये दलीलें कश्मीर के मुद्दे पर कहां चली जाती हैं? आप अपनी जमीन के लिए लड़ाई लड़ें तो क्रांतिकारी और अगर हम अपनी जमीन को बचाए रखने की बात करें अपने लिए नहीं आम जनता के लिए तो असहिष्णु हो जाते हैं। आप बात करते हैं समानता की, कैसी समानता? जिन देशों में वहां की महिलाओं को मात्र वस्तु समझा जाता हो वहां पर महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए आंदोलन शुरू हुए और हमारे देश में तो भव्यता की नींव पर टिकी एक संस्कृति है जिसमें महिला को पूज्य माना गया है। आप उन कुछ साल पुरानी अपरिपक्व संस्कृतियों के नजरिए से इस देश में महिला सशक्तीकरण के पैमाने तय करते हैं।

सबसे ऊपर दिए गए उदाहरण के आधार पर जो इस क्षेत्र(जिसे मैं राष्ट्र कहता हूं) के लिए उपयुक्त हो उसे स्वीकार करिए। सिर्फ स्वयं को बुद्धिजीवी दिखाने के लिए ऐसे काम मत करिए जिससे सोवियत संघ से भी बुरी हालत हो जाए। इस देश को आधुनिक विश्वगुरु बनाइए। एक साथ मिलकर काम करिए। देश की संकल्पना को साकार करिए और अपने ही विषय को वसुधैव कुटुंबकम के नजरिए से सिर्फ एक बार देखने की कोशिश करिए।

Monday, 15 February 2016

JNU के 'प्रगतिवादियों' को राष्ट्रवादी शिक्षा देनी होगी


आज वॉट्सऐप पर एक मित्र ने मेसेज किया कि अगर कश्मीर के लोग चाहते हैं कि वे अलग हो जाएं तो उनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए, उनको स्वतंत्र कर देना चाहिए ताकि वे अपने हिसाब से जी सकें। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से अपने उस मित्र को मेरे प्रिय बागी कवि विनीत चौहान की दो पंक्तियां समर्पित करना चाहता हूं-

अपनी इस केसर घाटी को इतना लहू दे चुके हैं हम,
अब तो जो भी फूल खिलेंगे, सारे फूल हमारे होंगे।


वैसे उन्होंने सच ही कहा कि कश्मीर का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि वह भारत से अलग हो जाए। ऐसे लोगों के लिए विनीत ने कहा है, ‘कश्मीर वह बेवफा औरत हो चला है जो खाता हमसे है, पहनता हमसे है, जीता हमसे है और नैन-मटक्के पड़ोसी के साथ करना चाहता है।’ मेरे उस मित्र की बात का जवाब आज मैं राजनीतिक तौर पर देने की स्थिति में नहीं हूं क्योंकि मैंने पिछले लोकसभा चुनाव में अपना वोट बीजेपी को दिया था। वही बीजेपी जो विपक्षी पार्टी होने के दौरान अफजल गुरु की फांसी के लिए आंदोलन करती थी, वही बीजेपी जिसके मातृ संगठन के द्वारा एक राष्ट्र, एक ध्वज, एक निशान और एक विधान के नारे सुनकर मुझे लगता था कि राष्ट्रीय एकात्मता के लिए कार्य करने वाला अन्य कोई संगठन हो ही नहीं सकता। उसी बीजेपी ने सत्ताकांक्षा के नशे में चूर होकर दो ध्वजों के नीचे खड़े होकर स्व. मुफ्ती साहब से हाथ मिलाया।

यह वही मुफ्ती साहब थे जिन्होंने घाटी में सफल चुनाव का श्रेय पाकिस्तान, सीमापार के तत्वों और हुर्रियत को दिया था। यह वही मुफ्ती साहब थे जिनके दिसंबर 1989 में भारत का गृहमंत्री बनते ही आतंकवादियों ने इन्हीं की बेटी रूबिया को अगवा कर लिया था, और फिर भारत सरकार को रूबिया की रिहाई के बदले पांच आतंकवादियों को जेल से छोड़ना पड़ा था।


यह वह दौर था जब घाटी में आतंकी गतिविधियां अपने चरम पर पहुंच गई थीं और आतंकवाद कश्मीरी पंडितों को वहां से खदेड़कर एक इस्लामिक गणतंत्र की मांग करने लगा था। लेकिन इस देश की सबसे बड़ी तथाकथित लोकतांत्रिक पार्टी ने इतिहास को भूलते हुए अपने सिद्धान्तों से समझौता कर लिया और सत्ता लोलुपता के चलते घाटी में गठबंधन कर कमल खिला दिया। जब ऐसा हुआ तो मुझे लगा कि बीजेपी का यह कदम उन पचास हजार से अधिक सैनिकों के मुंह पर तमाचा है जिन्होंने कश्मीर के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए आपने प्राणों की बाजी लगा दी।
दोस्तों, मैं आपको इस समस्या के बारे में बेहतर तरीके से बताने के लिए थोड़ा सा इतिहास में ले जाऊंगा। वैसे तो कश्मीर को हथियाने के लिए पाकिस्तान की ओर से लगातार कोशिश होती रहती हैं, लेकिन 1971 के बाद से पाकिस्तान इसे लेकर ज्यादा गंभीर हो गया है। पाकिस्तान ने जितने कश्मीर पर कब्जा कर रखा है उसे ही नहीं झेल पा रहा है तो और ज्यादा लेकर क्या करेगा? जब कश्मीर से स्वतंत्र होने की मांग उठती है तो यहां कुछ लोगों को लगता है कि भले ही कश्मीर स्वतंत्र हो जाए लेकिन पाकिस्तान के पास ना जाए। फिर लोग कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मांग करने लगते हैं।

ऐसे लोगों को मैं इतिहास का एक पृष्ठ याद दिलाना चाहता हूं, 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के एक हिस्से को पूर्ण स्वतंत्र बांग्लादेश बना दिया था, उसी तरह अब पाकिस्तान भारत के टुकड़े करना चाहता है। पाकिस्तान अब कश्मीर को अपना हिस्सा नहीं बनाना चाहता अपितु वह चाहता है कि कश्मीर अलग करके वह 1971 का बदला ले सके और इसी उद्देश्य के साथ पाकिस्तान से आतंकी भेजे जाते हैं जो भारत में ‘अलगाववादी’ कहे जाते हैं। भोले-भाले कश्मीरियों को बरगलाकर ये अपने साथ मिलाते हैं और कश्मीर में अलग झंडा लेकर भारत का विरोध करने के लिए तैयार खड़े रहते हैं। जब लोग यह कहते हैं कि कश्मीर में जनमत संग्रह कराना चाहिए तो मेरा उनसे कहना है कि अगर जनमत संग्रह कराना है तो कश्मीर में नहीं बल्कि पूरे भारत के लोगों से कराइए। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि तीन प्रदेशों के बराबर हम सिर्फ एक जम्मू कश्मीर पर खर्च करते हैं। इस देश के लोगों के द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे से कश्मीर का खर्च चलता है, ऐसे में कश्मीर का क्या करना है यह तय करने का अधिकार सिर्फ वहां रह रहे लोगों का नहीं बल्कि पूरे भारत का है।

जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो जम्मू-कश्मीर हमारे (यानी भारत के) साथ नहीं था। 20 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया और 24 अक्टूबर तक जम्मू कश्मीर की सेना ने पाकिस्तानी हमलावरों के आगे घुटने टेक दिए थे, पाकिस्तानी सेना श्रीनगर के नजदीक पहुंच गई थी। महाराजा हरि सिंह को लगा कि अब अगर पाकिस्तान को रोका नहीं गया तो ना सिर्फ जम्मू-कश्मीर को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखने का सपना टूट जाएगा बल्कि जम्मू-कश्मीर एक इस्लामिक राष्ट्र बन जाएगा। इस मामले में भारत की सेना कुछ कर नहीं सकती थी क्योंकि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं था। आखिरकार महाराजा हरि सिंह ने भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को पत्र लिखकर कहा कि ‘आप हमारी पाकिस्तान से रक्षा कीजिए, बदले में हम अपना पूरा का पूरा राज्य भारत में मिलाने को तैयार हैं।’ इसके बाद एक लिखित समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस विषय में आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के साथ महाराजा हरि सिंह ने एक शर्त भी रखी। हरि सिंह अपनी संस्कृति की विशिष्टता को बनाए रखना चाहते थे इसलिए उन्होंने जम्मू-कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा देने की शर्त रखी। कश्मीर के भारत राष्ट्र में विलय के बाद भारतीय सेना ने कार्रवाई शुरू की लेकिन वह उतना आसान नहीं था क्योंकि इस अवधि में वहां बर्फबारी होती है और पाकिस्तानी सेना काफी अन्दर तक घुस आई थी इसलिए भारतीय सेना को दो-ढाई महीने का समय लग गया। चूंकि कश्मीर की सेना की जगह अब भारतीय सेना आ गई थी और जम्मू-कश्मीर के राजा ने भारत के साथ विलय का समझौता भी कर लिया था तो पाकिस्तान को लगा कि जम्मू-कश्मीर पर कब्ज़ा करना अब मुश्किल है, इसलिए पाकिस्तान ने कूटनीतिक प्रयास शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने मान लिया था कि जम्मू-कश्मीर पर तो अब हम कब्ज़ा कर नहीं सकते लिहाजा जितना इलाका हमारे हाथ लगा है उसी को अपने आधीन कर लिया जाए। इसी उद्देश्य के साथ पाकिस्तान ने अमेरिका से संपर्क किया और समझौता कराने को कहा।

समझौता हुआ लेकिन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने एक गलती कर दी, नेहरु ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी, जबकि युद्धविराम का नियम है कि युद्धविराम का फैसला कैबिनेट की मीटिंग बुलाकर किया जाता है, पर नेहरु ने अकेले ही यह घोषणा ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से कर दी। जिसके बाद पाकिस्तान की सेना जहां तक थी वहां तक का पूरा क्षेत्र पाक अधिकृत कश्मीर बन गया। आज धारा 370 के आधार पर कश्मीर का झंडा अलग है, कश्मीर का कानून अलग है, कश्मीर का संविधान अलग है। फिर भी जब कोई सरकार कहती है कि कश्मीर, भारत का अभिन्न अंग है तो मुझे लगता है कि देश को धोखा देने की कोशिश की जा रही है।

आपको पता होगा कि भारत सरकार आपके लिए कोई भी खर्चा करती है तो उसका हिसाब कैग (Comptroller and Auditor General of India) रखता है लेकिन जम्मू-कश्मीर पर आज तक जितना भी खर्च हुआ है उसका हिसाब कैग के पास नहीं है। इस बारे में स्वर्गीय राजीव दीक्षित के द्वारा जब कैग से पूछा गया तो कैग ने कहा कि कश्मीर के खर्च का हिसाब जम्मू-कश्मीर की सरकार के पास है। उस जम्मू-कश्मीर से भारत को बाहर करने के लिए जब नारे लगाए जाते हैं तो पीड़ा होती है। यह पीड़ा इसलिए होती है क्योंकि जिस राजनीतिक पार्टी को मैंने व्यक्तिगत रूप से लोकसभा चुनाव में वोट दिया था उस राजनीतिक पार्टी के राज में एक साल में जितने पाकिस्तानी झंडे घाटी में लहराए गए उतने तो पिछले 68 सालों में नहीं लहराए गए। क्या आपने इतने भारत विरोधी नारे देश की राजधानी में पहले कभी सुने। लेकिन फिर भी थोड़ी सी संतुष्टि इस बात की है कि कम से कम इन भारत विरोधियों पर कुछ कार्रवाई तो हो रही है। खैर, बुद्धिजीवियों का गढ़ कहे जाने वाले जेएनयू के ‘प्रगतिवादी’ छात्रों को अब राष्ट्रवादी शिक्षा देनी होगी।


Tuesday, 9 February 2016

वैलंटाइंस डे स्पेशल: धिक्कार है 'संस्कृति' के ठेकेदारों पर


वैलंटाइंस डे आने वाला है, उसकी भूमिका वाले 'डे' भी चल रहे हैं। अच्छी बात है कि इस प्रकार के पाश्चात्य दिनों को मनाने वाले लोग भारतीय उत्सवधर्मिता को प्रदर्शित कर रहे हैं लेकिन इस देश के कुछ फर्जी देशभक्त और सोशल मीडिया के तथाकथित क्रांतिकारी 14 फरवरी को एक नया शहीदी दिवस बनाकर पेश करने में लगे हैं। पिछले कई दिनों से देख रहा हूं कि एक मेसेज सोशल मीडिया पर काफी शेयर हो रहा है। मेसेज है - 'हममें से ज्यादातर लोग जानते हैं कि 14 फरवरी वैलंटाइंस डे के रूप में मनाया जाता है। लेकिन आपको पता होना चाहिए कि 14 फरवरी 1931 को लाहौर में हमारे देश के महान सपूतों को फांसी दी गई थी। हम केवल वैलंटाइंस डे को सेलिब्रेट करते हैं। इस मेसेज को सभी को शेयर करें।'

ऐसे कई मेसेज पिछले कई सालों से सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे हैं। इतना ही नहीं इन 'देशभक्तों' के अनुयायियों को ऐतिहासिक तथ्यों की जांच किए बिना शेयर करने से भी कोई गुरेज नहीं है। ऊपर दिए गए मेसेज के अलावा एक अन्य मेसेज भी सोशल मीडिया पर चल रहा है। उस मेसेज के मुताबिक 14 फरवरी को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई थी।

इन दोनों ही प्रकार के संदेशों का ऐतिहासिक तथ्यों से किसी प्रकार का संबन्ध नहीं है। वास्तविकता यह है कि 26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया। 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत के द्वारा 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई। फांसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई। इसके बाद भगत सिंह की फांसी की माफी के लिए प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई। इसके बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने वायसराय के सामने सजा माफी के लिए 14 फरवरी, 1931 को अपील दायर की, कि वह अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मानवता के आधार पर फांसी की सजा माफ कर दें। महात्मा गांधी ने इस विषय को लेकर 17 फरवरी 1931 को वायसराय से बात की फिर 18 फरवरी, 1931 को आम जनता की ओर से भी वायसराय के सामने विभिन्न तर्को के साथ सजा माफी के लिए अपील दायर की। यह सब कुछ भगत सिंह की इच्छा के खिलाफ हो रहा था क्यों कि भगत सिंह नहीं चाहते थे कि उनकी सजा माफ की जाए।

भगत सिंह से जुड़े साहित्य को पढ़ने पर पता लगता है कि जब भगत सिंह ने सांडर्स को मारकर लालाजी की मौत का बदला लेने के बाद असेंबली में बम फेंकने का निर्णय लिया तब चंद्रशेखर आजाद ने पूरी योजना तैयार की कि किसी तरह और किन रास्तों से बम विस्फोट करने के बाद निकालकर भागा जा सकता है। उन्होंने यह योजना भगत सिंह को बताई लेकिन भगत सिंह ने इस पर अमल करने से साफ तौर से मना कर दिया। भगत सिंह गिरफ्तार होना चाहते थे। इस मुद्दे पर आजाद से भगत सिंह की गर्मागर्म बहस भी हुई। भगत सिंह का कहना था, 'हम असेंबली में बम किसी की जान लेने के लिए नहीं फेंकने वाले हैं। हमारा उद्देश्य है, लोगों को जगाना और उस उद्देश्य को मैं गिरफ्तार होकर ज्यादा बेहतर तरीके से पूरा कर सकता हूं। केस चलेगा, जिरह होगी और उस जिरह हमें अपनी बात देशवासियों तक पहुंचाने का मौका मिलेगा।'

इस पर आज़ाद का कहना था कि केस का मतलब होगा मौत की सजा। इसके बाद भगत सिंह ने आजाद से कहा, 'मैं जान देने के लिए ही गिरफ्तार होना चाहता हूं, मैं जीवित रहकर आजादी के आंदोलन में उतना योगदान नहीं दे पाऊंगा जितना मरकर दे सकता हूं।' भगत सिंह बोले, 'मेरी मौत कई भगत सिंह पैदा कर देगी।' दोनों महान क्रांतिकारियों के बीच लंबी बहस हुई लेकिन भगतसिंह अपनी जिद के पक्के थे। आखिरकार आजाद को उनके आगे हार माननी पड़ी। फिर वही हुआ जो भगतसिंह चाहते थे। उनकी उनकी 116 दिन की भूख हड़ताल और उसके बाद तय तिथि से एक दिन पहले 23 मार्च 1931 को हुई फांसी ने पूरे देश को झकझोर दिया और आजादी के आंदोलन की एक मजबूत नींव पड़ गई।

मुझे पीड़ा इस बात की है कि संस्कृति के ठेकेदार तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करके इस राष्ट्र को खोखला कर रहे हैं। क्या हमारी संस्कृति इतनी कमजोर है कि हमें उसे बचाने के लिए झूठे तथ्य गढ़ने पड़ें। मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसे 'डेज' का समर्थन नहीं करता लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं प्रेम का विरोधी हूं। प्रेम तो शाश्वत है। प्रेम तो मेरे आराध्य श्री राम ने किया था, जिन्होंने अपनी जीवनसंगिनी के लिए नदियां छोड़िए समुद्र पर पुल बना दिया। प्रेम के नाम पर अश्लीलता और फेसबुक से शुरू होकर वॉट्सऐप से होते हुए बिस्तर पर जाकर खत्म हो जाने वाले प्रेम के कारण ही आज इस देश में वृद्धाश्रम की परंपरा शुरू हो गई है। इन संस्कृति के ठेकेदारों ने ऐसा खेल किया कि विकिपीडिया के 14 फरवरी के पेज पर भी यही दिया है कि इसदिन भगत सिंह को फांसी दी गई थी।

लेकिन वैलंटाइंस डे न मनाने का यह मतलब बिलकुल नहीं है कि मैं लाठी-डंडे लेकर किसी एक दल का 'कर्मठ' कार्यकर्ता बन जाऊं। यदि वास्तव में धर्म और संस्कृति के ठेकेदारों को भारतीय संस्कृति इतनी समृद्ध लगती है तो उसके महत्व को बताएं जिससे कि उस भारतीय विचार के प्रति व्यक्ति के मन में सम्मान और स्थायित्व स्थापित हो। इस तरह से तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करके तथा लाठी डंडे चलाकर ये लोग अपनी नीचता को प्रमाणित करते हुए 'मेरी' संस्कृति का नुकसान कर रहे हैं। काश! अब भगत सिंह के वामपंथी ठेकेदारों की 'राष्ट्रीय भावनाएं' आहत होतीं।

'लेडी सिंघम', आपसे ऐसी उम्मीद न थी

भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाकर 'लेडी सिंघम' के नाम से ख्याति पाने वाली यूपी के बुलंदशहर जिले की डीएम बी. चन्द्रकला एक सेल्फी मामले को लेकर काफी चर्चा में रहीं। मामला था कि फरहान नाम के एक युवक ने उनके साथ सेल्फी खींचने की कोशिश की तो उन्होंने इसे निजता का हनन बताते हुए शांति भंग करने के आरोप में धारा 151 के तहत जेल भेज दिया। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले डीएम महोदया उस लड़के के साथ अपनी मर्जी से फोटो खिंचा चुकी हैं।

निश्चित तौर पर किसी के साथ बिना अनुमति तस्वीर खींचने की कोशिश करना गलत है लेकिन क्या डीएम महोदया ने उस लड़के के दृष्टिकोण से सोचकर देखा? एक महिला जिलाधिकारी जो कि लीक से हटकर कुछ कर रही हो, जिसके भ्रष्टाचार विरोधी कुछ विडियोज वायरल हो चुके हों और जो बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम कर रही हो ऐसी महिला के साथ एक सामान्य व्यक्ति खास कर युवा के लिए फोटो खिंचाना एक सपना होता है। किसी बड़े चेहरे के साथ फोटो क्लिक कराना एक सामान्य स्वभाव है लेकिन यदि डीएम साहिबा को इसमें निजता का हनन लगता है तो मुझे लगता है कि वह अभी स्वयं का स्तर तय नहीं कर पाई हैं।

खैर उस लड़के को तो जमानत मिल गई लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ वह और भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है। हिंदी दैनिक समाचार पत्र, दैनिक जागरण के पत्रकार द्वारा सेल्फी मामले से संबन्धित जानकारी मांगी गई तो डीएम महोदया बिफर पड़ी और शिष्टाचार समझाने लगीं। पद के अहंकार में चूर डीएम महोदया यह भूल गईं कि जिस व्यक्ति से वह बात कर रही हैं वह लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ का एक हिस्सा है, वह यह भूल गईं कि जब राजनीति, नौकरशाही को अपने पैर की जूती बनाने की कोशिश करती है तो इसी स्तंभ के सहारे नौकरशाही को स्थायित्व मिलता है। डीएम महोदया का पत्रकार से कहना था कि आपकी बहन, पत्नी के साथ कोई फोटो खींचे तो कैसा लगेगा?

डीएम महोदया, हमारे क्षेत्र में यानि पत्रकारिता के क्षेत्र में जब कोई निर्भीक महिला पत्रकार समाज में जाती है तो बहुत से लोग उसके साथ तस्वीर लेने की कोशिश करते हैं और वह महिला पत्रकार खुशी-खुशी निर्भीकता फोटो खींचने देती है। वह महिला पत्रकार भी किसी की बहन, बेटी, पत्नी और मां होती है लेकिन उसे पता होता है कि हजारों लोग उसके प्रशंसक हैं, हजारों लोग उसके जैसा बनना चाहते हैं। ऐसी ही कुछ स्थिति आपके साथ भी है, आपको भी लाखों लोग फॉलो करते हैं। सिविल की तैयारी करने वाले हजारों छात्र आपके जैसा बनने का सपना देख रहे हैं।

बड़ा पद बड़ी जिम्मेदारियां लेकर आता है लेकिन इस बात को न समझते हुए अपने पद का दुरुपयोग करके लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को तोड़ने की कोशिश करना दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। जब मैंने बी चन्द्रकला महोदया का पहला विडियो देखा तो लगा कि अगर ऐसी प्रशासनिक अधिकारी से अन्य अधिकारी भी प्रेरणा लेकर काम करें तो देश बदल सकता है लेकिन आज की स्थिति को देखकर मुझे यह सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि अगर नौकरशाही ऐसे ही बेलगाम हो गई और उस बेलगाम नौकरशाही पर पत्रकारिता खामोश हो गई तो देश कहां जाएगा?

पत्रकारिता के क्षेत्र में आने में व्यक्ति पैसे के लिए नहीं आता है, वह पत्रकारिता के क्षेत्र में इस लिए आता है जिससे कि वह प्रशासन और आम जनता के बीच संवाद-सेतु का काम कर सके लेकिन डीएम महोदया ने तो उस पत्रकार पर ही एफआईआर करा दी। डीएम महोदया के भ्रष्टाचार निरोधक लक्ष्य को लेकर मैं कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा लेकिन उनकी कार्यपद्धति पर तो प्रश्नचिन्ह बनता ही है....


 (डीएम और पत्रकार की बातचीत को सुनने के लिए यहां क्लिक करें)

Friday, 5 February 2016

वंचितों को आरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन...

कुछ दिन पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाला रोहित वेमुला नाम का एक मेधावी छात्र आत्महत्या कर लेता है। निश्चित ही आत्महत्या जैसा कदम उठाना कोई सामान्य बात नहीं होती, तय है कि वह बहुत परेशान रहा होगा तभी उसने ऐसा कदम उठाया। आंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन नामक जिस संगठन का वह कार्यकर्ता था, उसकी विचारधारा का मैं समर्थन नहीं करता लेकिन फिर भी मैं उस छात्र विशेष की योग्यता पर पूर्ण विश्वास रखता हूं। रोहित के परिवार के साथ मेरी पूरी संवेदनाएं हैं। देश ने निश्चित तौर पर एक काबिल बेटा खोया है, इस मामले की निष्पक्ष जांच करा कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए लेकिन उस छात्र की मौत के बाद भारत को सबसे अधिक पत्रकार देने वाले दिल्ली के आईआईएमसी में जो चल रहा है उससे बहुत आहत हूं।

पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाला एक छात्र, उत्कर्ष सिंह फेसबुक पर पोस्ट डालता है। उस पोस्ट को पढ़कर उसके कुछ सहपाठियों की तथाकथित तौर पर भावनाएं आहत होती हैं और वे इसकी शिकायत कॉलेज प्रशासन से करते हैं। अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए उत्कर्ष माफी मांगता है और आपत्तिजनक शब्दों को अपनी पोस्ट से हटा देता है। यहां तक मामला मुझे समझ में आया लेकिन इसके बाद उसी कॉलेज के एक अन्य छात्र की भावनाएं इस कदर आहत हो जाती हैं कि वह एससी-एसटी आयोग में शिकायत कर देता है। चलिए यहां तक भी ठीक है। शिकायत करना और अपनी भावनाएं आहत करवाना इस देश में एक संवैधानिक अधिकार है लेकिन क्या इस मामले के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हमें उस पोस्ट को नहीं पढ़ना चाहिए जिसको लेकर आईआईएमसी के छात्र प्रशांत की भावनाएं आहत हुईं।
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यह उत्कर्ष की पुरानी पोस्ट है जिसमें घेरे में वे शब्द हैं जो प्रशांत की भावनाओं को आहत करते हैं। मैंने कुछ साल पहले एक फिल्म देखी थी ‘रांझणा’ जिसमें ‘रंडीरोना’ शब्द प्रयोग बोला गया था। तब किसी की भावनाएं आहत नहीं हुईं। दिन में 500 फेसबुक पोस्ट देखता हूं जिसमें लिखा होता है ‘….अब मीडिया का रंडीरोना शुरू होगा।’ लेकिन हम तो अपनी भावनाएं आहत नहीं करवाते।

उत्कर्ष ने जो कुछ लिखा उसे एक बार समझकर देखिए। वह तो बाहें फैलाकर बिछड़ों को अपनाना चाहता है, वह तो खुलकर कह रहा है कि आओ और हमारे साथ मिलकर खत्म कर दो इस खाई को, वह तो आपसे पहले जातिप्रथा को समाप्त करने की वकालत कर रहा है, कंधे से कंधा मिलाकर चलने की बात कर रहा है लेकिन हमारे कुछ भावी पत्रकार अपनी भावनाएं आहत करा लेते हैं। कैसी मानसिकता के लोग हैं वे जो आयोग को इस पोस्ट के खिलाफ लिख रहे हैं।

मुझे उत्कर्ष की इस पोस्ट में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि इस देश के तथाकथित नंबर वन चैनल इस विषय को लेकर दिनभर डिबेट करा रहे हैं। एक पीएचडी छात्र की आत्महत्या के बाद जो होता है उसे बहस का मुद्दा बनाने वाले इन तथाकथित समाज के प्रहरी चैनलों के गर्म कमरों में बैठने वाले क्रांतिकारी पत्रकारों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सियाचीन में देश के 10 बेटों का इंतजार ‘काल का गाल’ कर रहा है। इन क्रांतिकारियों को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि पाकिस्तान में खुले आम घूमने वाला एक आतंकी भारत को धमकियां दे रहा है। इन क्रांतिकारियों को फर्क पड़ता है एक मसालेदार टीआरपी वाली आधारहीन खबर से। ये एक कॉलेज के वैचारिक मतभेद को राष्ट्रीय मुद्दा बना देते हैं।
मैं नहीं जानता उत्कर्ष कौन है, वह किस विचारधारा से जुड़ा है लेकिन मुझे इतना जरूर पता है कि आगे आने वाले सालों में वह एक समाचार संस्थान में काम कर रहा होगा। उस उत्कर्ष की पीड़ा ना ही मैं समझ सकता और ना ही आप। जिन चैनल की माइक आईडी लेकर वह दूसरों से जवाब मांगना चाहता था उसी माइक आईडी के सामने उसे जवाब देना कैसा लग रहा होगा? और रही बाद उस तथाकथित दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की तो यह बात सामने आ चुकी है कि वह दलित था ही नहीं। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है कि एक ओबीसी कैटिगरी के छात्र द्वारा एससी कैटिगरी का जाति प्रमाण पत्र बनवा लेने पर बहस करे? क्या ऐसी लचर व्यवस्था पर सवाल नहीं उठना चाहिए?

एक दलित छात्र आत्महत्या कर लेता है तो देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता शोक संवेदना व्यक्त करने लगते हैं। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल जी तो पीएम मोदी को देश से माफी मांगने की सलाह तक दे डालते हैं लेकिन अगर यह मामला मीडिया में ना उछाला जाता तो क्या ये नेता वहां जाते? पिछले 10 सालों में हैदराबाद के कुल 10 दलित छात्रों ने आत्महत्या की लेकिन क्या राहुल गांधी एक बार भी वहां गए? एक होनहार छात्र की आत्महत्या पर पीएम मोदी को माफी मांगने की सलाह देने वाले केजरीवाल, गजेन्द्र सिंह की आत्महत्या पर कहते थे कि किसी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए लेकिन आज?

खैर, आज आहत भावनाओं के साथ संघर्ष कर रहे भावी पत्रकार प्रशांत की कुछ पुरानी फेसबुक पोस्ट देखीं। पहली पोस्ट में प्रशांत जी श्रीराम मंदिर बना रहे हैं, दूसरी पोस्ट में ऐसा लग रहा है जैसे वह देश के प्रत्येक नागरिक में समानता चाहते हैं, तीसरी पोस्ट में अटल जी की कविता के साथ इस बात से इनकार कर रहे हैं कि वह किसी जाति विशेष से आते हैं, चौथी पोस्ट में वह एक ऐसे शब्द का प्रयोग कर रहे हैं जिसे सामान्य तौर पर सभ्य नहीं माना जाता, पांचवीं पोस्ट में आम आदमी पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में देश में परिवर्तन की क्रांति लाना चाहते हैं और छठी पोस्ट में भी वह मंदिर निर्माण के आधारभूत स्तंभ के रूप में स्वयं को प्रदर्शित कर रहे हैं। इस तस्वीर को मैं आपके सामने इसलिए नहीं रख रहा कि आप इन विचारों के विरोधाभास को देखें अपितु मैं इसे आपके सामने इस लिए रख रहा हूं ताकि आप इस बात पर एक बार अवश्य चिंतन करें कि जब ऐसी विरोधाभासी विचारधारा वाला व्यक्ति आज एक वैचारिक मतभेद के चलते उसे एक समुदाय विशेष का मुद्दा बना देता है तो कल को जब वह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे मजबूत और निष्पक्ष स्तम्भ का एक अंग बनेगा तो देश कहां जाएगा?
मित्रो, मैं एक समाचार संस्थान में काम करता हूं। मेरे सहकर्मियों को शायद यह भी नहीं पता होगा कि मैं किस जाति वर्ग से आता हूं। जिस दिन से मेरे मन में ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना ने जन्म लिया उस दिन मैंने सबसे पहले अपने नाम से जाति सूचक शब्द को हटाया। मैं भी आरक्षण का विरोध करता हूं लेकिन मेरा मानना है कि वंचितों को, वनवासियों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण मिलना चाहिए। चार पहिया गाड़ियों से घूमने वाले और जातिगत आरक्षण के नाम पर सरकार का शोषण कर प्रतिभावान विद्यार्थियों के अधिकार पर डाका डालने वाले लोगों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। योग्यता, क्षमता और प्रतिभा किसी आरक्षण की मोहताज नहीं होती।
मुझे गर्व है उस उत्कर्ष पर जिसने अपने मित्रों की भावनाओं का सम्मान करते हुए अपनी पोस्ट से उन सामान्य से शब्दों को हटाया जो तथाकथित तौर पर आपत्तिजनक थे लेकिन उसने कॉलेज प्रशासन के सामने अपनी पूरी पोस्ट को हटाने से साफ तौर से इनकार कर दिया। ऐसी सहिष्णुता और ऐसा विश्वास जिस युवा में होगा वह निश्चित ही पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ बेहतर करेगा। साथ ही मैं प्रशांत से भी कहना चाहता हूं कि अपने विवेक के आधार पर निर्णय करना सीखो दोस्त, कहीं ऐसा ना हो कि किसी के बहकावे में आकर स्थिति ऐसी हो जाए कि आज से 10 साल के बाद खुद से ही नजर न मिला पाओ। आवश्यक है कि हम सभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच के बारीक अंतर को बरकरार रखें साथ ही अपने अधिकारों का दुरुपयोग न करें।

Tuesday, 2 February 2016

'प्रभु' की रेल का शर्मनाक चेहरा

पिछले कुछ दिनों में विभिन्न समाचार पत्रों में रेल मंत्री सुरेश प्रभु के कार्य की काफी सराहना पढ़ने को मिली। ख़बरों को पढ़कर लगता था की मेरी अगली ट्रेन की यात्रा शायद कुछ शानदार अनुभवों वाली होगी। कुछ पारिवारिक परेशानियों के चलते पिछले कुछ दिनों से लखनऊ में था। इसी दौरान मध्य प्रदेश के रीवा जिले में एक कार्यक्रम के लिए जाना हुआ। रीवा से वापसी के दौरान 31 जनवरी को रीवा-आनंद विहार ट्रेन से दिल्ली जाते समय ट्रेन के स्लीपर कोच में जो कुछ घटित हुआ वह कहीं ना कहीं रेलवे की व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह जरूर लगाता है। उस यात्रा के दौरान जो कुछ घटित हुआ वह वास्तव में काफी दुःखद है।
मैं, ट्रेन के एस-5 कोच की 26 नंबर सीट पर लेटा था। ट्रेन रीवा से जब इलाहाबाद पहुंची तो मेरे ठीक सामने वाली 31 नंबर साइड लोअर बर्थ पर तीन अधेड़ उम्र के लोग आकर बैठ गए। कुछ देर बाद वहां से टिकट पर्यवेक्षक महोदय गुजरे।
 
उनमें से एक व्यक्ति ने पर्यवेक्षक महोदय से कहा, ‘सर, हमारा वेटिंग टिकट है, अगर कोई सीट हो तो दे दीजिए।’ पर्यवेक्षक महोदय ने तत्काल अपना मुंह खोला और बोले, ‘एक सीट का 500 रुपए लगेगा।’ मैं चुपचाप लेटा था क्योंकि अगर वेटिंग टिकट है तो थोड़ा सा तो झेलना ही होगा। लेकिन टीटीई  की बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। एक ओर जहां प्रभु की रेल भ्रष्टाचार मुक्ति के बड़े-बड़े दावे कर रही है वहीं दूसरी ओर उनका एक कर्मचारी इलाहाबाद से अलीगढ़ के लिए 500 रुपए में सीट बेच रहा था। खुलेआम इस तरह की मांग की कल्पना मैंने नहीं की थी।

एक पत्रकार होने के नाते मैंने उन लोगों से पूरा विषय फिर से पूछा। नियमतः यदि ट्रेन में कोई सीट चार्ट बनने के बाद भी खाली रह जाती है तो टिकट पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी है कि RAC वाले व्यक्ति को पूरी सीट उपलब्ध कराए और यदि उसके बाद भी कोई सीट खाली रहती है तो वेटिंग टिकट वाले को सीट दे और यदि फिर भी सीट खाली रहती है तो जनरल टिकट के साथ आरक्षित डिब्बे में यात्रा कर रहे यात्रियों को पेनल्टी के साथ सीट दे।
लेकिन इस ट्रेन के हालात कुछ और ही थे। सहयात्री से पूरा विषय जानने के बाद मैं उनके साथ टीटीई के पास गया। सामान्य तौर पर मैं कहीं पर यह नहीं बताता कि मैं पत्रकार हूं। मैंने टीटीई  से कहा कि आप 500 रुपये में सीट कहां से देते और वो 500 रुपए कहां जाते? तो उनका जवाब था, ‘यह नेतागिरी कॉलेज तक ही रखो और अगर तुमसे दुःख नहीं देखा जा रहा है तो अपनी सीट दे दो। मैं कुछ नहीं जानता।’ इतना कहने के बाद वह मेरे सहयात्री से बोले, ‘तुमको वेटिंग टिकट के साथ आरक्षित डिब्बे में बैठने का अधिकार नहीं है। वो तो मैंने तुमको घुसने दिया है तो चुपचाप बैठ जाओ। ज्यादा नेताओं को लेकर आओगे तो इनके साथ तुमको भी रात में अन्य यात्रियों को डिस्टर्ब करने के आरोप में बंद करवा दूंगा।’ यह मेरे लिए एक आश्चर्यजनक स्थिति थी। 

जितनी आसानी से पर्यवेक्षक महोदय ने रात के 10:20 बजे यह बात बोली थी उतना ही आसान मेरे लिए उनकी इस करतूत को आईना दिखाना था। मैंने तत्काल तय किया कि इस स्थिति के विषय में ट्वीट के द्वारा माननीय रेल मंत्री महोदय को अवगत कराऊंगा। लगभग 5 मिनट तक दो टिकट पर्यवेक्षक मुझे धमकी भरे अंदाज में नियम कानून समझाते रहे। फिर मैंने उनको अपना परिचय देते हुए कहा कि आप अपना नाम बता दीजिए तो वह बोले, ‘मीडिया बहुत अच्छा है क्या? मेरे पर्स में 20 पत्रकारों के कार्ड पड़े हैं। जाकर अपनी सीट पर सो जाओ नहीं तो समस्या में पड़ जाओगे।’
 
तभी फतेहपुर स्टेशन आ गया। उन में से एक टीटीई बाहर उतर गया। मैं चाहता तो बहस कर सकता था लेकिन मैं समझ गया था कि इसका कोई मतलब नहीं निकलेगा। मैंने अपना स्मार्टफोन निकाल कर रेलमंत्री को ट्वीट करने की कोशिश की लेकिन अंबानी के ‘रिलायंस’ ने मेरा साथ नहीं दिया। नेटवर्क की समस्या के चलते मैं ना ही किसी को कॉल कर सकता था और ना ही मेसेज। उन दोनों में एक टीटीई की उम्र मुश्किल से 26 के आस-पास रही होगी। तय है कि अपने छात्र जीवन में उस युवा ने भी भ्रष्टाचार का सामना किया होगा, और संभवतः उसे भी लगता होगा कि काश इस देश में भ्रष्टाचार ना होता। लेकिन आज जब उसके पास जिम्मेदारी है, जब वह कुछ कर सकता है तब वह उसी भ्रष्टाचार की गंदगी में फंस गया।

खैर मैं अपनी सीट पर आकर वापस लेट गया और अपनी सीट पर उनमें से एक अन्य को बैठाया। उस व्यक्ति के मुंह से बस इतना ही निकला कि ‘काश! मोदी जी को यह पता होता’… मैं उसकी सकारात्मक उम्मीद को देखकर हैरान था। कुछ ही देर में मुझे नींद आ गई, फिर मेरी आंख खुली तब तक ट्रेन खुर्जा पहुंच चुकी थी। मैं एक बार फिर से टीटीई का नाम जानने के लिए उसकी सीट पर गया लेकिन वह भी जा चुके थे। मैं चुपचाप आकर अपनी सीट पर बैठ गया और आनंद विहार रेलवे स्टेशन के आने का इंतजार करने लगा। मेरे मन में एक ही सवाल था कि बिना खुद को बदले क्या हमारा ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ की उम्मीद करना ठीक है?

Monday, 18 January 2016

शून्य की खोज से पहले रावण के 10 सिर कैसे गिने गए?

कुछ दिनों से वॉट्सऐप के अलग-अलग समूहों में एक मेसेज काफी चल रहा है।
मेसेज: ‘अगर शून्य का अविष्कार 5वीं सदी में आर्यभट्ट जी ने किया फिर हजारों वर्ष पूर्व रावण के 10 सिर बिना शून्य के कैसे गिने गए। बिना शून्य के कैसे पता लगा कि कौरव 100 थे। कृपा कर यदि किसी को उत्तर पता हो तो बताएं।’

काफी तर्कसंगत प्रश्न है कि आखिर बिना शून्य के 10, 100 या अन्य संख्याओं की गणना कैसे संभव है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें इतिहास का अध्ययन करना होगा लेकिन इतिहास के सागर में डुबकी लगाने से पहले हमें अविष्कार (Invention) और खोज (discovery) के अंतर को समझना होगा। किसी नई विधि, रचना या प्रक्रिया के माध्यम से कुछ नया बनाना अविष्कार कहलाता है तथा खोज का अर्थ होता है किसी ऐसी चीज को समाज के सामने लाना जिसके विषय में समाज को जानकारी ना हो परन्तु वह हो। एक उदाहरण के माध्यम से समझिए कि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त की खोज की अर्थात गुरुत्वाकर्षण न्यूटन के पहले भी था लेकिन समाज उसके विषय में जानता नहीं था। गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त को न्यूटन की खोज कहा जाएगा न कि अविष्कार।

कथित तौर पर शून्य की खोज करने वाले आर्यभट्ट का जन्म 476 ईस्वी में तथा देहांत 550 ईस्वी में हुआ और रामायण तथा महाभारत का काल इससे बहुत पुराना है। वर्तमान में हिंदी भाषा का लेखन कार्य देवनागरी लिपि में होता है। इससे पहले की लिपि ब्राह्मी लिपि मानी जाती है। लगभग ई. 350 के बाद ब्राह्मी की दो शाखाएं हो गईं एक उत्तरी शैली तथा दूसरी दक्षिणी शैली। देवनागरी को नागरी लिपि के नाम से भी जाना जाता था। यह लिपि ब्राह्मी की उत्तरी शैली का विकसित रूप है।
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 इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि शून्य की खोज देवनागरी लिपि के प्रचलन के बाद हुई। इससे पहले शून्य की संकल्पना नहीं थी। ब्राह्मी लिपि में गणना की व्यवस्था थी लेकिन उस गणना में शून्य नहीं था। आप चित्र के माध्यम से समझ सकते हैं कि शून्य के बिना भी 10,20 या 100 जैसी संख्याओं की गणना हो सकती थी। संभवतः अब आपको पता लग गया होगा कि रावण के 10 सिर और कौरवों की संख्या गिनना उस काल में कैसे संभव हुआ। आर्यभट्ट ने इस विश्व को एक नई अक्षरांक पद्धति से परिचित कराया। शून्य की संकल्पना की कहानी भी काफी रोचक है।
शून्य, एक ऐसी संख्या जो स्वयं में कुछ नहीं है अर्थात खाली है लेकिन फिर भी पूर्ण है। एक बार संकल्पना का आधार समझिए। कल एक पुस्तक पढ़ रहा था जिसमें अध्यात्म और शून्य का संबन्ध बताया गया था। उसके अनुसार शून्य को ईश्वर बताया गया था। उस पुस्तक के अनुसार भारतीय संस्कृति में आत्मा को परमात्मा(ब्रह्म) का अंश माना गया है, साथ ही भारतीय संस्कृति में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ भी कहा गया है और उस ब्रह्म को पूर्ण माना गया है।
शून्य की संकल्पना का आधार कुछ ऐसा ही बताया गया है। शून्य की तरह ईश्वर को भी पूर्ण माना गया है। 0(परमात्मा)-0(आत्मा)= 0(परमात्मा) इसको हम इस रूप में भी कह सकते हैं कि आत्मा=परमात्मा। इतनी सुंदर व्याख्या आध्यात्मिक दृष्टि से शायद की किसी संस्कृति में होना संभव हो। शून्य अर्थात जो कुछ भी नहीं है, निराकार है वह सर्वव्यापक है। सर्वव्यापकता निराकार ब्रह्म की सबसे बड़ी विशेषता है। शून्य या निराकार इतना छोटा है कि छोटे से छोटे स्थान पर भी व्यापक है, और इतना विशाल है कि आकाश की असीमित दुनिया में भी सीमित नहीं होता। जहां तक भी दृष्टि जाती है, यही दिखाई देता है।
खैर, अब आपको यह तो पता लग ही गया होगा कि महाभारत और रामायण काल में रावण के 10 सिरों और कौरवों के 100 होने की गणना कैसे की गई होगी।

Friday, 8 January 2016

आप का 'राग'- आशुतोष के साथ

आमिर खान के साथ भारत सरकार के 'अतुल्य भारत' अभियान का कॉन्ट्रैक्ट समाप्त होने के बाद जब हवा यह उड़ी कि अमिताभ बच्चन को इस अभियान का ब्रैंड ऐंबैसडर बनाया जा सकता है तो आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने ट्वीट कर अमिताभ बच्चन को राय दे डाली कि उन्हें भारत सरकार के इस अभियान से नहीं जुड़ना चाहिए क्योंकि आमिर को हटाना भारत सरकार का बदले की भावना से प्रेरित कदम है। इस ट्वीट से ऐसा लगा जैसे एक दिया(दीपक) सूर्य को रोशनी देने की बात कर रहा हो। उन्होंने राय दी, अच्छी बात है लेकिन क्या एक राजनीतिक पार्टी के नेता को इस तरह की बातें करने से पहले उसके प्रभाव या दुष्प्रभाव के विषय में नहीं सोचना चाहिए।

संभव है कि मंत्रालय का यह कदम आमिर के प्रति किसी तथाकथित बदले की भावना से प्रेरित हो और उसे बदल पाना किसी विपक्षी पार्टी के बस की बात भी नहीं है। इन सबमें न पड़ते हुए मैं 'आप' से मात्र इतना पूछना चाहता हूं कि मान लीजिए यदि अमिताभ बच्चन ने आपकी बात मानते हुए 'अतुल्य भारत' से ना जुड़ने का फैसला कर लिया तो क्या भारत सरकार के इस अभियान को कोई ब्रैंड ऐंबैसडर नहीं मिलेगा? निश्चित रूप से इस अभियान से जुड़ने के लिए बहुत से लोग तैयार खड़े हैं और मिल भी जाएंगे लेकिन सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ के जुड़ने से इस अभियान को जितना लाभ होगा उतना शायद किसी अन्य बॉलीवुड अभिनेता के जुड़ने से नहीं होगा। आमिर और अमिताभ के अलावा भी शाहरुख खान और सलमान खान जैसे कई विकल्प पर्यटन मंत्रालय से अनुबंधित एजेंसी के सामने खुले हैं लेकिन अमिताभ इस सूची में सबसे ऊपर हैं इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता।

आम आदमी पार्टी की ओर से इस तरह की राय दिए जाने का कारण मुझे समझ नहीं आया। हो सकता है कि आशुतोष की इस राय को उनकी पार्टी व्यक्तिगत कहने लगे लेकिन क्या आशुतोष जैसा व्यक्ति जो एक प्रतिष्ठित चैनल में पत्रकार रहा है, उससे इस प्रकार की अपेक्षा की जाती है। मैं व्यक्तिगत रूप से आम आदमी पार्टी का समर्थक नहीं हूं लेकिन उनके कुछ काम, उनकी कार्यपद्धति और स्पष्टवादिता बहुत पसंद है। देश में यह एकमात्र ऐसी राजनीतिक पार्टी है जिसके सभी बड़े नेता पढ़े-लिखे हैं और ऐसी राजनीतिक पार्टी से सामान्य व्यक्ति की कुछ अपेक्षाएं तो रहती हैं। आपकी लाख लड़ाइयां होंगी नरेन्द्र मोदी से, आपको लगता होगा कि पर्यटन मंत्रालय का निर्णय 'बदले की भावना' के चलते लिया गया है लेकिन क्या आपकी राजनीतिक रंजिशें राष्ट्र से भी बड़ी हो गईं, कल को आप पूरी दुनिया के सामने कहना शुरू कर दो कि भारत सरकार ने आमिर खान को हटाकर बदला लिया है इसलिए किसी को भारत घूमने नहीं आना चाहिए। इन सबसे हानि किसकी होगी, क्या आशुतोष ने इस बारे में सोचा?



आशुतोष जी, आप एक केन्द्र शासित प्रदेश की सरकार चलाने वाली पार्टी के नेता हैं। कल जब इस देश के पास बजट नहीं होगा तो आप कहेंगे कि केन्द्र सरकार आपकी मदद नहीं कर रही। महोदय, इस देश को 'आप' से बहुत उम्मीदें हैं, लोग इस बार एक नए तरह की राजनीति देखना चाहते हैं। पुरानी घिसी-पिटी बयानबाजी के आधार पर कहीं ऐसा ना हो कि आपको आम आदमी पार्टी का दिग्विजय सिंह घोषित कर दिया जाए।




अब बुद्ध को युद्ध करना ही होगा...



कुछ ही दिन पहले जब आतंक ने मां भारती के धवल दामन पर काला धब्बा लगाने की कोशिश की तो इस देश के बेटों ने पठानकोट में अभूतपूर्व शौर्य गढ़ते हुए यह बता दिया कि इस देश के बेटे अपनी मां की छाती पर चढ़कर अशांति फैलाने का कुत्सित प्रयास करने वालों का सामना करने के लिए हर पल तैयार खड़े हैं। इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद आज अवकाश होने के कारण मैंने सोचा कि एक बार उस समय के बारे में भी पढ़ा जाए जब हम अंग्रेजी सल्तनत के अधीन थे। मेरे मन में दुःख के बीच यह उत्सुकता भी थी कि उस दौर के सैनिकों (क्रांतिकारियों) के मन में परिवार और मां भारती के प्रति कैसे विचार रहे होंगे। उस समय के विषय में अध्ययन करने के दौरान दो प्रसंग ऐसे सामने आए जिनको पढ़कर इस ब्लॉग को लिखने का विचार आया। उन दोनों प्रसंगों को आपसे साझा कर रहा हूं:

प्रथम प्रसंग: 85 साल का एक बूढ़ा शेर, बहादुर शाह ज़फर अंग्रेजों की जेल (रंगून) में कैद था तो अंग्रेजों ने दो पंक्तियां लिखवाकर भेजीं कि,
दमदमे में दम नहीं है, खैर मांगो जान की।
अब ज़फर! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्तान की।।

तो बहादुर शाह जफर ने वहीं जेल की दीवारों पर दो पंक्तियां जवाब के तौर पर लिखीं:
गाज़ियों में में बू रहेगी, जब तलक ईमान की।
तख्त-ए- लंदन तक चलेगी, तेग हिंदुस्थान की।।


दूसरा प्रसंगः जब पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां को फांसी की सजा सुनाई गई तो जेल में अशफ़ाक की आखों से आंसू की दो बूंदें टपक गईं। कहीं से यह जानकारी बिस्मिल को मिली तो बिस्मिल ने पत्र के माध्यम से अशफ़ाक से पूछा, 'अशफ़ाक, फांसी से डर गए क्या?' तो अशफ़ाक ने बिस्मिल को उत्तर देते हुए लिखा, 'बिस्मिल, रोता इसलिए नहीं कि मैं मरने वाला हूं, मैं इस लिए रोता हूं कि तुमने सनातन धर्म में जन्म लिया है, तुम्हारे धर्म की मान्यता है कि तुम्हारे यहां पुनर्जन्म होता है, तुम मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए कई बार जन्म लेकर संघर्ष कर सकते हो। लेकिन मेरे मजहब की मान्यता है कि पुनर्जन्म नहीं होता होता इसलिए मैं मां भारती के लिए अपना एक जीवन ही कुर्बान कर पाऊंगा।

इन दो प्रसंगों के माध्यम से मैं वह समय याद दिलाना चाहता हूं जब इस देश, इस मातृभूमि के लिए स्वयं को न्योछावर कर देने वाले मात्र राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मानते थे। उन क्रांतिकारियों को पता था कि देश की सत्ता का संचालन जिनके हाथों में है, उन फिरंगियों लिए उनकी भावनाओं का कोई महत्व नहीं है। लेकिन इस दौर में जब हम पूरी दुनिया के सामने एक स्वस्थ लोकतंत्र रखने का दावा करते हैं, ऐसे में क्या वास्तव में देश का सैनिक इस बात को स्वीकार कर सकता है कि यदि वह अपनी जान, इस राष्ट्र की रक्षा के लिए कुर्बान करेगा तो उसके बाद इस देश की सत्ता के सिंहासन पर बैठे वे लोग, जिनको वहां बैठाने में उस सैनिक का भी योगदान है, क्या वे आतंक को रोकने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ आतंकियों से निपटने की जिम्मेदारी सेना को दे पाएंगे?

हमारे देश के एक बड़े नेता और केन्द्र की सरकार के मंत्री अरुण जेटली जी ने प्रेस वार्ता के दौरान दो दिन पहले कहा कि पठानकोट ऑपरेशन में अधिक समय इस लिए लग गया क्यों कि हम आतंकियों को जिंदा पकड़ना चाहते थे। अरे जेटली जी, एक कसाब पर इस देश की तत्कालीन सरकार ने 3.5 लाख प्रतिदिन के हिसाब से 70 करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर दिए। उस दौरान तो आप बड़े गर्व से कहते थे कि देश पर हमला करने वालों को तुरंत मार देना चाहिए। शायद अपने इसी बदले हुए रवैये को आप सत्ता की जिम्मेदारी कहें लेकिन मैं इसे इच्छा शक्ति की नपुंसकता मानता हूं। इस देश के सैनिक चाहते तो उन आतंकियों को जिंदा भी पकड़ सकते थे, लेकिन उन्हें पता था कि अगर जिंदा पकड़ लिया तो आप उन आतंकियों के लिए एक विशिष्ट बैरक के साथ तैयार खड़े हैं। साहब, उन्होंने नेताओं की तरह दलाली के पैसे से खरीदी गई खद्दर नहीं पहनी हैं, वे मां भारती की रक्षा के लिए तैयार वर्दी पहनते हैं, उन्हें यह पता होता है कि किस पर गोली चलानी है और किसे जीवित छोड़ना है। लाल किले से आतंक के खिलाफ आग की भाषा बोलना बहुत आसान होता है लेकिन उस आतंक के खिलाफ आग उगलने का काम इस देश के सैनिकों की बन्दूकें करती हैं।

6 आतंकियों को मारने में हमने इस देश के 7 जांबाज जवानों को खो दिया। कल्पना करिए उन परिवारों के बारे में, जिनके परिवार का सदस्य कुछ ही पलों में उनसे दूर चला गया। निरंजन की उस दो साल की बेटी विस्मय के मन की पीड़ा को महसूस करिए। उस गरुड़ कमांडो गुरुसेवक सिंह की पत्नी के विषय में सोचिए जिसने मात्र डेढ़ महीने पहले 18 नवंबर को एक नए जीवन की शुरुआत की थी। शहीद हवलदार कुलवंत सिंह के उस बेटे के बारे में सोचिए जो नए साल पर अपने पिता और नई बाइक की प्रतीक्षा कर रहा था। धन्य है यह देश जहां अपने पति को राष्ट्ररक्षा में न्यौछावर कर देने के 24 घंटे भी नहीं पूरे हुए और जब पत्रकारों ने उस वीरांगना से बात की तो भीगी आंखों के साथ उसने जवाब दिया, 'अभी तो मेरा बेटा भी है, वह अपने पिता के सपनों को पूरा करेगा। मैं उसे भी सेना में भेजूंगी।'

आतंकी हमले क्यों होते हैं उसका एक मात्र कारण है कि हमने सेना के पैरों में बेड़ियां डाल कर रखी हैं। जब मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा कि अब भारत को इन आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए तो मेरे कुछ मित्रों ने कहा कि आप क्यों चाहते हैं कि भारत, पाकिस्तान पर हमला करे? क्या युद्ध एक मात्र विकल्प है? मैं, उन्हें और अधिक स्पष्टता के साथ बता देना चाहता हूं कि मैं पाकिस्तान पर हमला नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि उन आतंकियों पर हमला हो जो पाकिस्तान में बैठे हैं। पाकिस्तान हमारा दुश्मन नहीं है। वहां भी हमारे जैसे ही लोग रहते हैं। उनके भी पूर्वजों ने कभी इस देश की आजादी के लिए संघर्ष किया था। वे भी नहीं चाहते कि स्कूल में पढ़ने गए उनके बच्चे वापस ना आएं। मुझे उम्मीद है कि पाकिस्तान हमारा साथ देगा और मान लीजिए हमला करने के दौरान पाकिस्तान उन आतंकियों के साथ खड़ा हो जाए तो हम इतने सक्षम हैं कि एक और युद्ध लड़ सके। अगर हमने साफ तौर पर विश्व को यह संदेश देकर हमला किया कि हमारा हमला आतंकियों पर है तो विश्वास मानिए विश्व का कोई देश पाकिस्तान के साथ नहीं खड़ा होगा।

मेरी पीड़ा क्यों है उसका एक कारण है। अभिमन्यु, चक्रव्यूह का सप्तम द्वार नहीं भेद पाया तो इसमें अभिमन्यु का कोई दोष नहीं था। कभी पिता अर्जुन और मामा श्रीकृष्ण को यह फुर्सत नहीं मिली कि वे अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदने की कला सिखा दें। अभिमन्यु को मां सुभ्रदा के गर्भ में मात्र एक बार चक्रव्यूह को भेदने की कहानी सुनने का अवसर मिला लेकिन सुभ्रदा को नींद आ गई। अभिमन्यु ने तो अपनी जिम्मेदारी निभाई और समय आने पर यह प्रमाणित किया कि उनको मां के गर्भ में जितना सीखने का अवसर मिला उतना उसने पूरी निष्ठा से सीखा। मोदी जी से पहले मैंने दो सरकारें और देखीं, एक अटल जी की सरकार और एक मनमोहन जी की सरकार दोनों ने इस देश के युवाओं को संतुष्टि नहीं दी। अब अगर मोदी सरकार भी उनकी तरह ही मात्र शोक-संवेदना व्यक्त करके चुपचाप बैठी रहेगी तो मेरे बाद की पीढ़ी को यह विश्वास दिलाना काफी मुश्किल होगा कि आतंक को रोकने के लिए अगर सेना में गए तो देश की राजनीति आपके साथ खड़ी होगी। फिर शायद कोई बेटा सेना में नहीं जाएगा, फिर शायद कोई मां अपने बेटे को सेना में नहीं भेजेगी और फिर शायद कोई बेटी अपने पिता की शहादत पर अर्थी को कंधा देती नहीं दिखेगी। यह देश युद्ध और बुद्ध, दोनों ही संस्कृतियों को जीता है, हमें यह बताना होगा कि हम गांधी और बुद्ध के अनुयायी भगत सिंह और वीर शिवाजी की भाषा भी जानते हैं। हमें यह समझना होगा कि हमारा शत्रु कैसा है? हमारी कार्यशैली, हमारे शत्रु की कार्यशैली पर निर्भर होनी चाहिए। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि अगर हम एक बार विश्व स्तर पर यह संदेश दे दें कि हम आतंक का मुंहतोड़ जवाब दे देंगे तो शायद इस देश में आतंकवादी हमलों की तादात कम हो जाए।

Sunday, 3 January 2016

मोदी जी! देश जीत गया लेकिन आप हार गए

नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले इंडिया टीवी के शो 'आप की अदालत' का एक एपिसोड आज अनायास ही याद आ गया। उस शो को मैंने अभी ऑफिस से वापस आकर फिर से देखा। उस शो का एक हिस्सा आप सभी से शेयर करना कर रहा हूं।

रजत शर्मा(होस्ट)- 26/11 की घटना के समय अगर आप इन्चार्ज होते तो क्या करते?
नरेन्द्र मोदी: जो मैंने गुजरात में किया वो कर के दिखाता, मुझे देर नहीं लगती। मैं आज भी कहता हूं, पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए, ये लव लेटर लिखना बंद कर देना चाहिए। प्रणव मुखर्जी(तत्कालीन रक्षा मंत्री) रोज एक चिट्टठी भेज रहे और वो सवाल भेज रहे, ये जवाब देते फिरते हैं। गुनाह वो करें और जवाब भारत सरकार दे रही है।
रजत शर्मा- लेकिन इंटरनैशनल प्रेशर है, उसका भी तो ख्याल रखना पड़ेगा भारत सरकार को।
नरेन्द्र मोदी: इंटरनैशनल प्रेशर पैदा करने की ताकत आज हिंदुस्तान में है, 100 करोड़ का देश है। पूरी दुनिया पर प्रेशर आज हम पैदा कर सकते हैं जी। मैं तो हैरान हूं जी, पाकिस्तान हमको मार कर चला गया, पाकिस्तान ने हम पर हमला बोल दिया मुंबई में और हमारे मंत्री जी अमेरिका गए और रोने लगे, ओबामा, ओबामा...पाकिस्तान हमको मार कर चला गया, बचाओ...बचाओ...ये कोई तरीका होता है क्या? पड़ोसी मार कर चला जाए और अमेरिका जाते हो, अरे पाकिस्तान जाओ ना।
रजत शर्मा- क्या तरीका होता है?
नरेन्द्र मोदी: पाकिस्तान जिस भाषा में समझे, समझाना चाहिए।

दोस्तों, मैं अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी का स्वयंसेवक हूं, मेरी शिक्षा भी विद्या भारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु/ विद्या मंदिर में हुई है लेकिन मैंने अपने जीवन में सिर्फ एक बार बीजेपी को वोट दिया है। मैं लखनऊ महानगर का एकमात्र ऐसा स्वयंसेवक था जो संघ के प्रचारकों के साथ मेरे आराध्य श्रीराम का राजनीतिकरण करने वाली बीजेपी के सिद्धान्तों पर बहस करता था। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने जवानी को जिया तो ऐसा कि राजसी सुखों को छोड़कर समाज के लिए कार्य करने वाले एक ऋषि के साथ वन को चले गए और वन जाते वक्त जब पिता दशरथ ने कहा कि राक्षसों से लड़ने के लिए सेना लेते जाओ तो कहा कि सेना ले गया तो क्या फायदा? वहां जाकर वहां के लोगों की सेना बनाऊंगा ताकि मेरे बाद भी उनमें राक्षसों से युद्ध करने का आत्मविश्वास बना रहे। मैं बहस करता था उन राम के लिए लिए जिन्होंने अपनी पीढ़ियों की परंपरा को तोड़ते हुए एकपत्नीव्रत लिया और एक ऐसी महिला से विवाह किया जिसका कुल तक ज्ञात नहीं था। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने पितृ भक्ति में अपने पिता के एक वचन को इस तरह से निभाया कि 14 सालों तक अयोध्या का सिंहासन फुटबॉल की तरह उछलता रहा। मैं बहस करता था तो उन राम के लिए तो उन राम के लिए जिन्होंने अपने प्रेम के लिए नदियों को छोड़िए, समुद्र पर भी पुल बना दिया। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने राजधर्म निभाया तो ऐसा कि राक्षसों का वध करके जीते गए क्षेत्र को वहीं के मूल निवासियों के हवाले कर दिया और अपने राज्य के एक सामान्य व्यक्ति की बात सुनकर अपनी धर्म पत्नी स्वयं से दूर कर दिया। मैं बहस करता था उन राम के लिए जिन्होंने मातृभूमि से प्रेम किया तो ऐसा कि सोने की लंका को छोड़ कर सामान्य जनमानस के बीच अयोध्या पहुंच गए।

मेरे उन श्रीराम को राजनीतिक गलियारों में बेचने वाले तथाकथित भक्तों को मैंने मोदी के भाषणों की वजह से लोकसभा चुनाव में वोट दिया। मेरे सांसद महोदय आज देश के गृहमंत्री हैं लेकिन कल पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकवादी हमले के समय उनकी हिम्मत नहीं थी कि वे देश की जनता का सामना कर सकें। देश के जवानों ने जब आतंकियों को मार गिराते हुए विजय पताका लहराई तब वे मीडिया के सामने आने की हिम्मत जुटा पाए। अरे राजनाथ जी, देश के जवान तो तब भी आतंकियों के सामने अपनी जान की बाजी लगा कर संघर्ष कर रहे थे जब हमारे सांसद कुर्सियों के नीचे छिपने की जगह ढ़ूंढ रहे थे, उस वक्त आप कहते थे कि भारत को उन्हें जवाब देना चहिए लेकिन आज जब आपके हाथ में सब कुछ है तो आप चुप-चाप बस सैनिकों को शाबासी देकर चल दिए।

मुझे खुशी है कि आज पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकी हमले के बाद हमारे देश के सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सभी आतंकियों को मार गिराया लेकिन मुझे दुःख भी है कि एक के बदले 10 सिर लाने का दंभ भरने वाली सरकार का प्रधान जब कर्नाटक के एक कार्यक्रम में भाषण देता है तो मात्र उसी पुरानी जुमले बाजी के सहारे देश के मन में खुद को प्रतिस्थापित करने की करने की कोशिश करता है जिनके भरोसे आज वह देश की सत्ता के सिंहासन पर काबिज है।  माननीय प्रधानमंत्री महोदय, इस गलतफहमी में मत रहिएगा कि देश ने अगर एक इतिहास को रचते हुए अगर आपको पूर्ण बहुमत वाली कुर्सी दी है तो वह इसलिए नहीं दी कि देश कांग्रेस से परेशान था, देश की जनता ने आपको देश की सत्ता का संचालन इसलिए सौंपा है ताकि आप देश के स्वाभिमान की रक्षा कर सकें। साड़ियां और शालें तो आती-जाती जाती रहेंगी लेकिन अगर आप सत्ता के अहंकार में देश के दिल से निकल गए तो फिर दुबारा वापस आने का मौका नहीं मिलेगा।

केन्द्र में बीजेपी सरकार आने से पहले नरेन्द्र मोदी ने एक निजी चैलन को दिए गए साक्षात्कार में कहा था, 'लादेन का पाकिस्तान की धरती पर मारा जाना इस बात की पुष्टि करता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों का एक बहुत बड़ा अड्डा बना हुआ है, भारत सरकार को इस विषय को तत्काल संज्ञान में लेना चाहिए और विश्व की मानवतावादी शक्तियों को एकजुट करते हुए अमेरिका पर भी दबाव डालना चाहिए कि वह ढ़ुलमुल नीति ना अपनाए। यह दुर्भाग्य है कि सुबह ओबामा के वक्तव्य में पाकिस्तान के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा गया है। भारत सरकार को इसे गंभीरता से लेते हुए मानवतावादी शक्तियों को एकजुट करना चाहिए।'

मोदी जी, तब हमारे तत्कालीन पीएम अमेरिका के सामने खड़े नहीं हो पाते थे, शायद इस लिए क्योंकि उन्हें भारत की युवा शक्ति पर विश्वास नहीं था लेकिन आप तो देश की शक्ति  को जानते हैं, बराक सहित विश्व के सभी बड़े नेता आपके मित्र हैं, अब बनाइए इंटरनैशनल प्रेशर और घर में घुसकर मारिए मौलाना मसूद अजहर को। अब तो नवाज से भी आपकी अच्छी दोस्ती है, वह भी साथ देंगे आपका, कोशिश तो करिए। मोदी जी, मैं अब भी आशाहीन नहीं हुआ हूं, मुझे उम्मीद है कि आपका पौरुष जागेगा और 17 साल पहले की गई गलती को सुधार लिया जाएगा। पता नहीं क्यों उम्मीद का दिया मेरे मन में जल रहा है? वो भी उन परिस्थितियों में जब हमले के बाद खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली पार्टी की ओर से यह बयान आता है कि सिर्फ एक हमले की वजह से पाकिस्तान के साथ चल रही वार्ता रद्द नहीं की जाएगी। अब देश जुमलेबाजी में फंसने वाला नहीं है और इस बात को दिल्ली तथा बिहार की जनता ने प्रमाणित भी कर दिया है। यदि पीएम साहब फ्लाइट मोड और साइलंट मोड में फंसे रहे तो यह तय है कि इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा। उम्मीद है कि खुद को प्रधानसेवक कहने वाले मोदी जी जनरल मोड पर आ जाएंगे और पाकिस्तान को उसी की भाषा में रिटर्न गिफ्ट देंगे।

Thursday, 31 December 2015

उस साल की वो आखिरी रात...

31 दिसंबर 2006, की सुबह 10 बजे मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा आयोजित प्राथमिक शिक्षा वर्ग (ITC) पूर्ण करके घर पहुंचा। 8 दिनों तक बिना किसी बाहरी संपर्क के बस 283 लोगों के साथ अपना एक अलग समाज बन गया था। वर्ग स्थल से निकलते समय आंखों में आंसू थे लेकिन घर पहुंचते पहुंचते सब सामान्य हो गया। घर पहुंचते ही सबसे पहले मोबाइल ऑन किया और उसे चार्जिंग पर लगाया। उन दिनों संघ के कैंप में मोबाइल पूरी तरह से प्रतिबंधित था और मेरे पास Bird का मोबाइल हुआ करता था जिसमें एयरटेल का सिम था। 1.99 रुपए कॉलरेट के उस दौर में पिता जी महीने में 50 रुपए का रिचार्ज कराते थे यानि बात करने के लिए मिलते थे 21 मिनट। उनके अनुसार मुझे कहीं बात करने की जरूरत ही नहीं थी क्यों कि परिवार के सभी सदस्य मेरी कॉल को काट कर कॉल बैक करते थे। मिसकॉल के उस दौर में मैंने शाम पांच बजे उसे कॉल की तो उसकी मां ने फोन उठाया। उसकी मां से मैंने कहा कि मुझे राहुल से बात करनी है तो उन्होंने रॉन्ग नंबर कहते हुए फोन काट दिया। उसी कॉल के साथ मेरा बैलेंस भी खत्म हो गया।






उन दिनों जब भी उसकी मां या पापा फोन उठाते थे तो मन में जो भी नाम आता था उसे ले लेता था। क्या प्यार था, यही सोचता था कि अगर उसका नाम लिया तो उसके सामने कई सवाल खड़े हो जाएंगे। पिछले 5 महीने में ऐसा पहली बार हुआ था जब मैं उससे लगातार 8 दिन मिला नहीं था। मिलना तो छोड़िए उसकी आवाज भी नहीं सुनी थी। 31 की शाम को शाखा पर अंग्रेजी नववर्ष और वर्ष प्रतिपदा (भारतीय नववर्ष) पर एक लंबा चौड़ा भाषण दिया और शाखा खत्म होते ही अपनी अंग्रजी की ट्यूशन पढ़ने के लिए निकला लेकिन वहां ना जाकर उसके घर के नीचे खड़ा हो गया इस उम्मीद के साथ कि शायद वह बॉलकनी में आ जाए और उसका चेहरा मुझे दिख जाए लेकिन 1 घंटे के इंतजार के बाद भी वह नहीं आई। बैलेंसहीन मोबाइल होने की वजह से मिसकॉल भी नहीं कर सकता था। अंधेरा भी काफी हो गया था और पिताजी का फोन भी आ चुका था तो वापस जाना ही बेहतर समझा। वापस पहुंचने पर उसकी पसंदीदा फिल्म मोहब्बतें लगाई और देखने लगा।

मेरे घर पर रात 9 बजे के बात टीवी देखने की अनुमति नहीं थी। उस दिन भी दादी जी ने आकर कहा कि अब इसे बंद करके खाना खा लो तो मैंने कहा कि आप सब लोग खाकर सो जाओ मैं देर से खाऊंगा क्यों कि 8 दिनों तक टीवी से दूर रहा हूं तो आज देखने की बहुत इच्छा है। क्या बहाने थे...खैर.... रात में फिल्म खत्म होने के बाद दुबारा से लगा ली। कई सारी शंकाएं मन में आ रही थीं कि कहीं ऐसी कौन सी वजह है जिसकी वजह से वह बात नहीं कर रही? कहीं मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई, कहीं वह नाराजगी के चलते हमेशा के लिए बात करना ना बंद कर दे... यही सब सोचते सोचते कब नींद आ गई पता ही नहीं लगा। अगली सुबह बाबा जी ने 5 बजे जगाया लेकिन नींद पूरी ना होने के कारण मैं सर दर्द का बहाना बनाकर फिर से सो गया। उस दौरान शीतकालीन अवकाश चल रहा था तो कॉलेज की परेशानी भी नहीं थी

सुबह साढ़े 10 बजे नींद पूरी हुई... तो फ्रेश होने के बाद मोबाइल चेक किया तो देखा कि उसके नंबर से 3 मिसकॉल पड़ी हैं। अब बैलेंस ना होने की वजह से ना ही मैं कॉल कर सकता था और ना ही मेरे पास पैसे थे। और अचानक किसी नई किताब के लिए भी पैसे नहीं ले सकता था तो एक नया बहाना बनाया। मैंने घर पर कहा कि मैम का फोन आया है आज अभी ट्यूशन पढ़ने जाना है और नीचे जाकर साइकल की हवा निकाल दी फिर वापस आकर बाबा से कहा कि बाबा साइकल पंचर है और कोचिंग जाना बहुत जरूरी है तो 10 रुपए देकर बोले कि जाओ रास्ते में साइकल सही कराकर चले जाना। मैंने उनसे पैसे लिए और रास्ते में जाकर खुद से हवा भरी। रास्ते भर क्वाइन बॉक्स वाला पीसीओ ढ़ूढता रहा सिससे कि 1 रुपए में बात हो जाए। उसकी कॉलोनी के पास में ही एक पीसीओ मिला। वहां से मैंने उसे डरते डरते कॉल की। उसने जैसे ही फोन उठाकर हेल्लो बोला... ऐसा लगा जैसे दुनिया कि सारी खुशियां मिल गईं। उस दौर में मैं यह नहीं समझता था कि ऐसी खुशियां क्षणिक होती हैं जिनमें कोई स्थायित्व नहीं होता।

जब मैंने हेलो बोला तो उसने कहा, 'गौरव कहां हो तुम? मैं कब से तुम्हें कॉल कर रही हूं... ऐसा कौन सा कैंप होता है जहां बात भी नहीं की जा सकती।' मैं कुछ बोलता इससे पहले ही उसने कहा, 'सब लोग न्यू ईयर पर 1 घंटे में चंद्रिका देवी मंदिर जा रहे हैं.. तुम घर आ जाओ.. हम लोग बैठ कर ढ़ेर सारी बातें करेंगे।' यह सुनते ही लगा जैसे रात को मेरी आंखों में आई नमी को मेरे श्रीराम ने महसूस कर लिया।

मैं तुरंत वापस गया और कपड़े बदलने लगा। बाबा ने पूछा कि क्या हुआ तो मैंने बोला कि ठंड लग रही थी इस लिए सोचा कि एक स्वेटर और पहन लूं। कुछ ही मिनटों में मैं उसके गेट पर था। बेल बजाने पर उसने दरवाजा खोला और अंदर आकर बैठने को कहा और खुद पानी लेने चली गई... कुछ पलों के बाद सोफे पर मेरे ठीक बगल में वह बैठी थी। मैं उठकर उसके सामने बैठ गया और उससे कहा कि, आज मैं तुम्हें जी भरकर देखना चाहता हूं।

वह बार-बार बालकनी ले नीचे अपने मां-पापा को देखने जा रही थी। हम लोग एक साथ लगभग 3 घंटे बैठे रहे। उसने कई सवाल पूछे लेकिन मेरे पास किसी का जवाब नहीं था। मैं उसे नहीं बस उसे देखता जा रहा था। मैं उसे 'संघ' समझाने की स्थिति में नहीं था। मैं उसे यह नहीं बता सकता था कि मैं इतने दिनों तक कहां था। मैं उसमें खोया था कि अचानक सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आवाज आई, वह दौड़कर बालकनी में गई और वापस आकर बोली कि गौरव सब लोग आ गए, अब क्या होगा। मैं तुरंत उठा और उसके घर के ऊपर वाले फ्लोर पर चला गया। फिर लगभग 10 मिनट के इंतजार के बाद नीचे आकर देखा तो उसके घर का दरवाजा बंद था। सबसे सुकून भरा दिन था वह... ऐसा लगा जैसे उन 3 घंटों में सारी जिन्दगी जी ली हो। उसके साथ बिताए उन लम्हों के बारे में सोचते सोचते मैं घर पहुंचा और फिर से 'मोहब्बतें' लगा कर देखने लगा लेकिन इस बार वह फिल्म कुछ अलग लग रही थी। मेरे लिए 2007 की इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती थी।

पिछले साल 31 दिसंबर 2014 को मैं अपने दोस्तों के साथ 'क्वीन ऑफ हिल्स' कहे जाने वाली मसूरी में था। उन हसीन वादियों में अपनी क्वीन के बारे में सोच रहा था कि काश वह भी हमारे साथ होती। 31 की रात तो दीपक, सिद्धार्थ, शशिकांत और उत्कर्ष के साथ बीत गई लेकिन मैं अपनी जिन्दगी के नए साल यानी 2016 की शुरुआत अपनी क्वीन की आवाज सुनकर करना चाहता था। मैंने उसे कॉल किया लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। पूरी रात सुबह के इंतजार में बीत रही थी। मैं अपने साथ-साथ अन्य दोस्तों को भी जागने पर मजबूर कर रहा था। उनको लग रहा था कि मैं उन लोगों के साथ नए साल के मजे लेना चाहता था लेकिन सच तो कुछ और ही था। मैं बस इतना चाहता था कि जल्दी से सुबह हो जाए और मैं उसे कॉल करके उसकी आवाज सुनूं। सुबह के 6 बजते-बजते सब सो गए और मैं होटल के बाहर टहलने निकल गया। सुबह का 8 बजा और उसका फोन भी... उसने फोन उठाते ही कहा 'इतनी रात में कॉल क्यों किया था?' मेरे पास कोई जवाब नहीं था, मेरा काम हो गया था। नए साल की शुरुआत में उसके द्वारा इस तरह के प्रश्न की अपेक्षा नहीं थी.... लेकिन आवाज सुन ली तो मन को सांत्वना दे दी कि यह साल बहुत ही बेहतर जाने वाला है... और सच में पिछला साल बहुत ही बेहतर गया... बहुत से चेहरे बेनकाब हो गए... उन बेनकाब चेहरों में एक चेहरा उसका भी था...

अंग्रेजी नववर्ष का विरोध क्यों? इस तरह मनाएं इसे.....

इस बार मैं अपने जीवन का दूसरा अंग्रेजी नववर्ष मनाऊंगा, जी हां, सही पढ़ा, दूसरा। 1 साल पहले तक मैं अंग्रेजी नववर्ष के उत्सव को नहीं मनाता था लेकिन जब दिसंबर 2014 में इस विषय पर चिंतन किया तो कोई ऐसा कारण नजर नहीं आया जिसके कारण अंग्रेजी नववर्ष का बहिष्कार किया जाए। जब हम अंग्रेजी तिथियों के अनुसार अब तक का अपना पूरा जीवन जी रहे हैं तो उस नववर्ष को मनाने में क्या बुराई है? यह बात मेरी समझ से परे है। रही बात प्रकृति की तो दीवाली भी ठंड में होती है, उसे पूरी ऊर्जा के साथ मनाते हैं तो 31 दिसंबर को या 1 जनवरी को क्यों इतनी ठंड लगती है? यह मुझे समझ में नहीं आ रहा। मैं इसे गुलामी के पर्व के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे दिन के रूप में लेता हूं जिस दिन पूरी दुनिया, शराब और शबाब के नशे में डूबी होती है उस दिन हम भारत के लोग कुछ अच्छा करने का संकल्प ले रहे होते हैं। पिछले साल की तरह ही इस बार भी 31 दिसंबर की रात आगामी अंग्रेजी नववर्ष के लिए एक संकल्प लेने की रात होगी।

जैसा कि मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं कि मैं बहुत ही स्वार्थी किस्म का व्यक्ति हूं और अंग्रेजी नववर्ष के उत्सव को मनाना के पीछे भी मेरा एक स्वार्थ है। प्रत्येक वर्ष भारतीय नववर्ष के प्रारम्भ में मैं एक संकल्प लेता हूं और प्रयास करता हूं कि उस संकल्प को पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से पूर्ण कर सकूं। लेकिन पिछले साल से वैसा ही एक संकल्प अंग्रेजी नववर्ष पर लेना शुरू किया। इससे अब एक साल में मेरे दो-दो संकल्प हो जाते हैं। दोस्तों, भारत में बहुत ही उत्सवधर्मी प्रकृति के लोग रहते हैं। छोटी छोटी बातों में खुशियां ढ़ूढना हमारी खासियत है। अपने जीवन में हर दिन हम खुश रहने के बहाने ढूढ़ते हैं तो अंग्रेजी नववर्ष में हम अपनी खुशियां क्यों नहीं ढ़ूढ सकते? क्यों हम इस दिन कुछ नया और समाज के लिए अच्छा करने का संकल्प नहीं कर सकते? मैंने तो सोच लिया है कि मैं इस साल आने वाले हर पर्व पर अपने आस पास के एक बच्चे को खुशी देने की कोशिश करूंगा। बहुत छोटी सी कोशिश है लेकिन मैं इसी में अपनी खुशी खोजने की कोशिश करूंगा। कुछ अच्छा करने के लिए हमें एक बहाना चाहिए होता है। उस बहाने के रूप में मेरा यह संकल्प काम करेगा।



मैंने पिछले वर्ष संकल्प किया था कि पूरे साल में सिर्फ एक व्यक्ति की नकारात्मकता दूर करूंगा और जब उसकी नकारात्मकता दूर हो जाएगी तो मैं उससे निवेदन करूंगा कि अपने किसी परिचित की नकारात्मकता दूर करे। इसके लिए मैंने एक ऐसे लड़के को चुना था जो अपने आगे किसी की नहीं सुनता था। बहुत बचपना था उसमें, उम्मीद थी कि एक साल में मैं जरूर सफल हो जाऊंगा। लेकिन मुझे खुशी है कि ईश्वर की कृपा से मैं 8 महीनों में ही सफल हो गया। यह बात आज भी उस लड़के को नहीं पता है कि उससे संबन्धित मैंने अपने जीवन में कोई संकल्प किया था। आज वह एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में कार्यरत है, मेरे साथ ही पढ़ता था। बहुत सी क्षमताएं थी उसमें लेकिन बस नकारात्मकता के कारण अपनी क्षमताओं को समझ नहीं पा रहा था। पिछली बार जब उससे 6 महीने के बाद मिला तो लगा कि चलो अंग्रेजी नववर्ष के कारण अपनी जिंदगी में कुछ तो अच्छा किया।
इस साल भी एक संकल्प लिया है औऱ मुझे पता है कि मैं उसे पूरा कर लूंगा। आप भी कुछ अच्छा करें तो अंग्रेजी नववर्ष को भारतीयता का रूप दे सकते हैं। तो आईए साथ मिलकर मनाते हैं अंग्रेजों के इस नए साल का जश्न, अपनों के साथ और अपनों के लिए.....लेकिन रुकिए इस नए साल के जश्न के चक्कर में भारतीय नए साल को भूल मत जाना....उस दिन भी कुछ अलग करना है और उस समय तो और अच्छे से कर पाएंगे क्यों कि प्रकृति भी हमारे साथ होगी...

वन्दे भारती...

Wednesday, 30 December 2015

30 दिसंबर का एक यशस्वी सत्य

दोस्तों, आज 30 दिसंबर है, क्या आपको पता है कि हमारे इस परम पवित्र भारत वर्ष के लिए इस दिन का क्या महत्व है? शायद नहीं...संभव है कि आप इस दिन अगले दिन की तैयारियों में व्यस्त रहते हों...लेकिन इस तिथि के मायने कुछ और भी हैं। इस दिन क्या हुआ था इस बात पर चर्चा करने से पहले मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। क्या आप जानते हैं कि भारत का प्रथम स्वतंत्रता दिवस कब मनाया गया? निश्चित तौर पर आप 15 अगस्त 1947 ही कहेंगे लेकिन मैं उसे स्वतंत्रता दिवस नहीं मानता क्यों कि उस दिन तो मात्र हमारे देश में सत्ता का हस्तांतरण हुआ था। हमारा देश से उससे 4 साल पहले ही आजाद हो चुका था। जी हां, आजादी का अर्थ होता है मानसिक आजादी, 30 दिसंबर 1943 को हमारे मन में स्वतंत्रता का भाव जागृत हो चुका था। इस दिन भारत के एक हिस्से को पूर्ण स्वतंत्रता मिली थी, लेकिन कौन सा भाग था वह, किसके सहयोग से आजादी मिली, किसने उस स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया, किसने आजादी के बाद उस क्षेत्र को संभाला, ये सारी बातें आपको नहीं पता होंगी, क्यों कि हमें यह सब पढ़ाया ही नहीं गया। हमारा पाठ्यक्रम अकबर और औरंगजेब के आसपास ही घूंता रहा। भारत के मूल इतिहास को पढ़ाने की किसी ने जरूरत ही नहीं समझी।

दोस्तों, 30 दिसंबर 1943 को सुभाष चन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज ने, जापानी सेना के सहयोग से अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह को ब्रिटिश शासन से आजाद कराकर, इसे भारत का प्रथम स्वाधीन प्रदेश घोषित किया था। इसी दिन मां भारती के वीर सपूत नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता का जयघोष करते हुए पोर्ट ब्लेयर में, तिरंगा फहराकर वहां अपने मुख्यालय की स्थापना की थी। दीप समूह पर आजाद हिन्द फौज के कब्जे के बाद, सिंगापुर से भारत की अस्थायी सरकार के प्रमुख सुभाष चन्द्र बोस जी ने भारत की आजादी की घोषणा की और भारत की जनता से आजादी की रक्षा करने का आह्वान किया था।

इस आधार पर हमारा पहला स्वतंत्रता दिवस 30 दिसंबर, 1943 को मनाया गया। उस दिन नेता जी ने एक घोषणा पत्र जारी किया था, जिसमें उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री, प्रथम विदेश मंत्री और प्रथम राज्य प्रमुख के रूप में भारत के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी।

उनके घोषणा पत्र के अनुसार वह शपथ कुछ इस प्रकार थी-

मैं 'सुभाष चन्द्र बोस', ईश्वर को साक्षी मानकर ये पवित्र शपथ लेता हूं, कि -
मै सदैव भारत का एक दास रहूंगा,
अपने 38 करोड़ भाई-बहनों के कल्याण का ध्यान रखना, मेरा सर्वोच्च कर्तव्य होगा
मैं स्वतंत्रता के इस पवित्र युद्ध को अपने जीवन की अंतिम साँस तक जारी रखूंगा
मैं पूर्ण आज़ादी मिलने के बाद भी, भारत की स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए, अपने रक्त की आखरी बूंद बहाने के लिए सदैव तत्पर रहूंगा
लेकिन आजादी की लड़ाई की इतनी महत्वपूर्ण घटना को भी, सत्ता की ताकत से नेहरू ने दबा दिया। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह जिसकी पहचान दो आजन्म कारावास की सजा पाने वाले, काला पानी जेल के नायक 'वीर सावरकर' और 'सुभाष चन्द्र बोस' से होनी चाहिए, उसे सत्ता के मद में चूर नेहरू सरकार ने काला पानी की सजा दे दी। क्या कसूर था उन वीरों का? सिर्फ इतना कि वे निःस्वार्थ भाव से मां भारती की सेवा में लगे हुए थे। उस द्वीप के बंदरगाह का नाम भी नेहरू के नाम पर ही है। इतिहास आज फिर दुनिया के सामने आने के लिए प्रतीक्षारत है। अपने यशस्वी इतिहास को लेकर आप कितने सजग हैं यह बात हमारी अगली पीढ़ी प्रमाणित करेगी।

वंदे भारती

Monday, 21 December 2015

'निर्भया' हम शर्मिंदा हैं....

दोस्तों, 16 दिसम्बर 2012, इस तिथि को सुनते ही आत्मा काँप गई ना। जी हाँ, मेरी भी कुछ हालत ऐसी ही हो जाती है। बहुत सी यादें जुड़ी हैं इस तिथि से....

2012 के अंत से लेकर एक लंबे समय तक बहुत सी लाठियां खाईं। छात्रसंघ चुनाव लड़ने की तैयारी के बीच अचानक सब कुछ छोड़ कर चला गया जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा पर प्रदर्शन करने, कालीदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पर जाकर नारेबाजी शुरू की तो लाठियां चलने लगी। सब झेला सिर्फ इस लिए कि शायद कुछ ऐसा हो जाए कि देश की सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोगों को एहसास हो कि इस देश का युवा चाहता कि भारत की प्रतिष्ठा का सम्मान बना रहे लेकिन आज सब कुछ छलावा लग रहा है। पिछली बातों को याद करके बस आंखों में नमी सी छाने लगने लगती है।

दोस्तों, वह एक ऐसा आंदोलन था जिसमें मैं पूरी शिद्दत से लगा था। मेरे जीवन का सबसे बड़ा किंतु असफल आंदोलन... 22 दिसंबर को जब इस देश के युवाओं ने आजादी के बाद के 65 सालों के इतिहास को बदलते हुए देश के प्रथम व्यक्ति के रायसीना हिल्स स्थित घर के दरवाजे पर सुबह सुबह लात मारते हुए कहा कि उठो और इस देश की बेटी के साथ हुए कुकृत्य का जवाब दो तो इस देश की सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था यह तय नहीं कर पा रही थी कि इन युवाओं को क्या कहकर रोका जाए।  उसके ठीक अगले दिन सुबह लखनऊ में जब हम सब मुख्यमंत्री आवास पहुंचे तो पुलिसवालों का चेहरा बता रहा था कि वो हमें रोकना नहीं चाह रहे थे। उनकी अनचाही नाकाम कोशिश के बाद जब हम मुख्यमंत्री आवास पहुंचे तो सुबह से शाम हो गई लेकिन कोई नहीं आया लेकिन लखनऊ के युवाओं ने भी बता दिया कि वो अपनी 'बहन' के लिए कुछ भी कर सकते हैं। फिर शाम 6 बजे भारी ठंड में राजनीति ने अपनी गंदी चालों को  चलना शुरू किया। हमें वहां से हटाने के लिए तत्कालीन जिला न्यायाधीश अनुराग यादव आए और बोले कि आप सब धरना स्थल चलिए वहां हम आपसे बात करेंगे। जब हम नहीं माने तो वे हमारे साथ पैदल धरना स्थल पर गए। सात किलोमीटर की उस पदयात्रा के दौरान ठंड के बीच उनके चेहरे का पसीना बता रहा था कि वे मजबूरी में पैदल चल रहे हैं। अंत में धरना स्थल पर हम सबको अश्वासनों की मीठी गोली दे दी गई। 1 महीने तक मैं और मेरे कई साथी सुबह के समय धरना स्थल पर बैठते थे तो रात में कैंडिल मार्च करते थे। नेताओं के आश्वासनों ने हम सबको अपनी झूठी चालों में फंसा लिया।

पढ़ें: नारी और हमारे समाज की विकृत मानसिकता

आज जब उस घृणित अपराध को अंजाम देने वाले व्यक्ति को नाबालिक करार देते हुए छोड़ दिया गया तो बस मन में यही आया कि क्या से क्या हो गए हैं हम? जिस देश में नारी को पूज्या समझा जाता था और जिस देश में नारी के सम्मान की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने समुद्र पर पुल बना दिया था उस देश में नारी के साथ ऐसा व्यवहार... बातें राम मंदिर की हो रही हैं...कैसा राम मंदिर यार, जब आप अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पा रहे तो क्या राम आएंगे....नहीं, हमें ही राम बनना होगा...बदलनी होगी यह व्यवस्था... आफरोज जैसे रावणों के वंशजों को हमें ही समाप्त करना होगा और अगर हम इस व्यवस्था को नहीं बदल सकते तो हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम किसी श्रीराम मंदिर की बात करें.... देवताओं का वास तो वहां होता है, जहां महिलाओं का सम्मान होता है।

कल मेरे एक अनुज पंकज ने एक ब्लॉग लिखा...(पंकज के ब्लॉग को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।) उसके अलावा कई छोटे भाई प्रदीप तिवारी जैसे कई लोग फेसबुक पर लगातार लिख रहे हैं कि देश संवेदनाओं से नहीं कानून से चलता है। मैं प्रदीप तथा पंकज की बातों से सहमत नहीं हूं। मेरा मानना है कि यह देश आज भी संवेदनाओं से चल रहा है। इस राष्ट्र का आधार संवेदना है। हम इंग्लैंड में नहीं रहते हैं जहां रिश्ते कानून आधारित होते हों। मेरा इनसे बहुत ही सीधा सा प्रश्न है कि क्या इनकी मां और पिता का रिश्ता कानून यानी लॉज आधारित है? मुझे पता है इसका जवाब नहीं ही होगा। जब इस देश में रिश्ते कानूनन नहीं बनते तो इस देश की बेटी की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने वाले को छोड़ने के पीछे कानून की दुहाई क्यों दी जा रही है, यह मेरी समझ से परे है। और सबसे बड़ी बात कि जो व्यक्ति बलात्कार जैसा कुकृत्य कर सकता है उसे नाबालिग किस आधार पर कहा जा रहा है।

सिर्फ एक यही मामला नहीं है, हाल ही में देश में अपराध दर पर एक रिपोर्ट आई है जो बताती है कि पिछले दस साल में नाबालिगों द्वारा किए गए संज्ञेय अपराधों में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जहां 2003 में नाबालिगों द्वारा किए गए अपराध के 17,819 मामले दर्ज किए गए, वहीं 2014 में यह संख्या बढ़ कर 38,586 हो गयी। दस साल पहले रेप के 466 मामले सामने आए थे, जबकि पिछले साल दर्ज हुए मामलों में 2,144 बलात्कार के हैं। अकेले दिल्ली में ही संख्या 140 रही।

आज जब इस देश के माननीय प्रधानमंत्री महोदय विश्व पटल पर बहुत ही गर्व से यह कहते हैं कि भारत एक युवा देश है तो उसका आधार होता है कि इस देश में लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या 18 की उम्र से कम है। तो क्या यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि 'भारत एक नाबालिग देश है।'

पढ़ें: आखिर क्यों होते हैं बलात्कार?

बलात्कार गंदी और निम्न स्तर सोच के कारण होते हैं। वह सोच उम्र नहीं देखती। भारत के बहुविध समाज में स्त्रियों का विशिष्ट स्थान रहा हैं। पत्नी को पुरूष की अर्धांगिनी माना गया हैं। वह एक विश्वसनीय मित्र के रूप में भी पुरूष की सदैव सहयोगी रही हैं। कहा जाता हैं कि जहां नारी की पूजा होती हैं वहीं देवता रमण करते है। नारी नर की खान है। वह पति के लिए चरित्र, संतान के लिए ममता, समाज के लिए शील और विश्व के लिए करूणा संजोने वाली महाकृति है। एक गुणवान स्त्री काँटेदार झाड़ी को भी सुवासित कर देती हैं और निर्धन से निर्धन परिवार को भी स्वर्ग बना देती हैं।

भारतीय समाज में नारी का देवी स्वरूपा स्थान है। एक आदर्श नारी धैर्य, त्याग, ममता, क्षमा, स्नेह,समर्पण, सहनशीलता, करूणा, दया परिश्रमशीलता आदि गुणों से परिपूर्ण हैं। महादेवी वर्मा ने कहा है कि 'नारी केवल एक नारी ही नहीं अपितु वह काव्य और पे्रम की प्रतिमूर्ति हैं। पुरूष विजय का भूखा होता हैं और नारी समर्पण की' वास्तव में भारतीय नारी पृथ्वी की कल्पलता के समान हैं।

मैं मानता हूं कि मात्र उस बलात्कारी हत्यारे को सजा देने से बलात्कार जैसे अपराध नहीं रुकेंगे लेकिन दोस्तों, एक कठोर सजा देने से समाज में यह संदेश तो जरूर जाता कि यह देश ऐसे अपराधों के लिए माफी देने वाला शांतिप्रिय देश नहीं बल्कि अपने शरीर को छोड़ चुके लोगों भी को न्याय देने वाला न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के सिद्धान्तों का अनुपालक है। एक बात और ऐसे घृणित अपराधों के लिए मैं शरियत का समर्थन करता हूं और मुझे लगता है कि ऐसे बलात्कारियों को बस इस्लाम सजा दे सकता है।


 उस आंदोलन की कुछ तस्वीरें...




तत्कालीन जिलाधिकारी अनुराग यादव जी....

मेरी सहपाठी एवं एबीवीपी की कार्यकर्ता के लगी चोट...

तब लगा था जीत जाऊंगा....लेकिन....

सीएम आवास के अंदर पहुंचने के बाद कुछ ऐसी खुशी थी... 
आंदोलन के इतिहास में अभूतपूर्व परिवर्तन...
 
बच्चों से लेकर महिलाएं...सब छोड़कर आ गईं थी साथ...

पुलिस ने रोकने की कोशिश तो बहुत की लेकिन नहीं रोक लके....


छात्रनेता नितिन मित्तल के सवालों का जवाब तक नहीं था डीएम साहब के पास

सबके साथ...सब जगह...बस एक ही मांग...'हत्यारों को फांसी दो'

वंदे भारती

Sunday, 6 December 2015

कैसे राम, और कैसा मंदिर?


दोस्तों, आज से 23 साल पहले बाबरी ढ़ांचे जिसे कुछ अज्ञानी मस्जिद भी कहते हैं, उसे देश की जनता के एक वर्ग ने गिरा दिया। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि एक स्वतंत्र देश में गुलामी की कोई निशानी नहीं होनी चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि देश की सारी मस्जिदें तोड़ दो..अरे मस्जिद भी इस देश के नागरिकों की, हमारे भाइयों की इबादतगाह है, उसका सम्मान होना चाहिए। और इस देश के प्रत्येक नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि इस देश के नागरिकों के पूजन स्थल की, इबादतगाह की सुरक्षा करे। अब संभव है कि आपके मन में सवाल उठे कि जब आप मानते हैं कि मस्जिद नहीं टूटनी चाहिए तो फिर बाबरी के गिरने को सही कैसे ठहरा सकते हैं? तो दोस्तों, मैं आपको बता दूं कि पहली बात तो यह कि यह देश राम का देश है, बाबर का नहीं...अब इसे यह मत कहना कि मैं मुस्लिम विरोधी हूं... मैं चाहता हूं कि इस देश के लोगों के बीच चर्चाएं बाबर पर नहीं बल्कि इस देश के सबसे बड़े मुसलमान, एपीजे अब्दुल कलाम पर चर्चा पर हो, अशफाक उल्ला खां पर चर्चा हो। उन पर कोई उंगली उठाएगा तो इस देश के मुसलमानों के साथ नहीं बल्कि उनसे आगे खड़ा होकर उनका विरोध करूंगा जो इस देश की एकात्मता के आधार कलाम जैसे मुस्लिमों पर उंगली उठाएंगे और मैं ऐसा इस लिए करूंगा क्यों कि कलाम साहब सिर्फ मुसलमानों के नहीं अपितु इस देश के प्रत्येक नागरिक के हैं। ठीक इसी प्रकार राम सिर्फ हिंदुओं के नहीं अपितु प्रत्येक हिंदुस्थानी के हैं।

यह भी पढ़ें: कब बनेगा राम मंदिर

सांस्कृतिक आधार पर इस देश के मुसलमान जिन्ना के नहीं अशफाक उल्ला खां के वंसज हैं। जिनको इस भारत मां से प्यार नहीं था वे 1947 में ही यह देश छोड़कर जा चुके हैं। अब जो यहां पर हैं वे हमारे अपने हैं। अगर आप उन पर प्रश्नचिन्ह लगाना पूरी तरह से गलत होगा। मेरे इस कथन को इस रूप में ना लिया जाए कि मैं याकूब की शवयात्रा को निकालने वालों का समर्थन करता हूं। वे भटके हुए लोग हैं जो याकूब की शवयात्रा निकालते हैं। उन्हें सत्य से अवगत कराना होगा और वे यदि इस भारत भूमि के प्रति सम्मान ना रखें तो उन्हें पाकिस्तान मत भेजो बल्कि चौराहे पर खड़े करके गोली मार दो। राम तो हमारी अस्मिता के आधार हैं, राम तो वह हैं जो वनवास के समय जब दुनिया और मानवता के सबसे बड़े दुश्मन, रावण से युद्ध करने निकलते हैं तो एक राजकुमार होते हुए भी वे किसी राजा का साथ नहीं लेते बल्कि वंचितों को, वनवासियों को गले लगाते हैं।

राम का तो पूरा जीवन ही त्रासदीपूर्ण रहा। इसके बावजूद लोग राम की पूजा करते हैं। भारतीय मानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं; बल्कि उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने उन तमाम मुश्किलों का सामना बहुत ही शिष्टता पूर्वक किया। अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने खुद को बेहद गरिमा पूर्ण रखा। मैंने ने राम को इसलिए पसंद किया, क्योंकि मैंने राम के आचरण में निहित सूझबूझ को समझा।

दरअसल, राम की पूजा इसलिए नहीं की जाती कि हमारी भौतिक इच्छाएं पूरी हो जाएं-मकान बन जाए, प्रमोशन हो जाए, सौदे में लाभ मिल जाए। बल्कि राम की पूजा हम उनसे यह प्रेरणा लेने के लिए करते हैं कि मुश्किल क्षणों का सामना कैसे धैर्य पूर्वक बिना विचलित हुए किया जाए। राम ने अपने जीवन की परिस्थितियों को सहेजने की काफी कोशिश की, लेकिन वे हमेशा ऐसा कर नहीं सके। उन्होंने कठिन परिस्थतियों में ही अपना जीवन बिताया, जिसमें चीजें लगातार उनके नियंत्रण से बाहर निकलती रहीं, लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उन्होंने हमेशा खुद को संयमित और मर्यादित रखा। आध्यात्मिक बनने का यही सार है।

संत कबीर कहते हैं कि
राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप


अर्थात राम नाम को महत्व जाने बिना उसे जपना तो न जपने जैसा ही है क्योंकि जब तक मस्तिष्क पर देहाभिमान की छाया है तब तक अपने पापों से छुटकारा नहीं मिल सकता।

इस संसार में चार राम हैं-

एक राम दशरथ का बेटा , एक राम घट घट में बैठा !
एक राम का सकल पसारा , एक राम है सबसे न्यारा !


संसार में चार राम हैं ! जिनमें से तीन को हम जगत व्यवहार में जानते हैं पर चौथा अज्ञात राम ही सार है । उसका विचार करना चाहिये । एक दशरथ पुत्र राम को सभी जानते हैं और एक जो प्रत्येक जीवात्मा के घट ( शरीर ) में विराजमान है तथा एक ये जो समस्त ( सकल ) दृश्य अदृश्य सृष्टि है , ये ( विराट पुरुष ) राम ही है - राम में ही है । लेकिन इन सबसे परे जो चौथा ( आत्मा ) राम है । वही हमारा और इन सबका सार है । अतः उसी को जानना उत्तम है।



इसलिए मैं उस राम का मंदिर चाहता हूं जो हिंदुओं के नहीं बल्कि प्रत्येक भारतीय के हैं। भाजपा ने तो हमारे राम को भरे बाजार बेच दिया और आज भी उन्ही राम पर राजनीति करना चाहती है, लेकिन यह देश सब समझता है। इस देश की जनता को जब मंदिर बनाना होगा, मंदिर बन जाएगा। मंदिर बनाने के लिए इस देश के 125 करोड़ भारतीयों को किसी 'दल' की जरूरत नहीं लेकिन हां 'दल' को अवश्य इस देश के लोगों की जरूरत होगी। जब इस देश का प्रत्येक 'भारतीय' यह कहेगा कि मंदिर बने तब मंदिर बनना चाहिए और जिसे राम स्वीकार नहीं उसे स्वयं को भारतीय कहलाने का भी अधिकार नहीं। शब्द पर ध्यान दीजिएगा मात्र प्रत्येक 'भारतीय'।

यह भी पढ़ें: कब बनेगा राम मंदिर

वंदे भारती

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...