Wednesday, 27 July 2016

एक साल पहले कलाम की मौत पर इसलिए रोया था पूरा देश

आज से ठीक एक साल पहले देश ने अपने एक मजबूत स्तंभ को खो दिया था, देश के लिए यह एक अपूर्णीय क्षति थी। आज आपको अपने जीवन का एक अनकहा सच बताने जा रहा हूं। मेरे जीवन में एक दौर ऐसा भी था, जब मन के एक हिस्से में मुस्लिमों के प्रति दुर्भावना बसी हुई थी। यह दुर्भावना मेरे अध्ययन की कमी और कुछ हद तक कुसंगति के कारण थी। उस समय मेरी उम्र मुश्किल से 15-16 साल रही होगी। वह एक ऐसा समय था जब मैं ना ही उस संगठन के मूल विचार को समझता था जिससे मैं जुड़ा था और ना ही मैं हिन्दू शब्द की मूल परिकल्पना को समझता था। मैं अपने परिवार का एकमात्र ऐसा व्यक्ति था जो इस तरह की सोच रखता था। मेरी इस तरह की सोच के लिए पूरी तरह से मैं ही जिम्मेदार था क्योंकि मैं इस्लाम का प्रतिनिधि उन आतंकवादियों को मानने लगा था जो निर्दोषों की जान लेते हैं। 
उसी दौरान एक दिन मेरे बाबा जी ने मुझे कलाम साहब की जीवनी पढ़ने को दी, वह मेरे विचारों में परिवर्तन के लिए पर्याप्त थी। सिर्फ 3 दिन में मेरे विचारों में अद्भुत परिवर्तन आया। मेरे विचार बदल चुके थे, मेरे लिए इस्लाम की परिभाषा बदल चुकी थी और साथ ही उसका प्रतिनिधित्व करने वाले भी बदल चुके थे। मदरसे से पढ़कर निकला एक व्यक्ति राष्ट्र निर्माण में अपना अभूतपूर्व योगदान किस तरह से दे सकता है, इस बात को डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने प्रमाणित किया था। तमिलनाडु जैसे स्थान पर रहने के बावजूद कलाम साहब शाकाहारी बन गए। यह कोई सामान्य बात नहीं है क्योंकि हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां कुछ मांसाहारी लोग यह तक कहते हैं कि जीव-जंतु तो खाने के लिए ही बने हैं और घास-फूस इंसानों के लिए नहीं बल्कि जानवरों के लिए है। अगर वे किसी ऐसे स्थान पर रह रहे होते जहां शाकाहारी भोजन की सुविधा उपलब्ध नहीं होती तो समझ में आता है लेकिन दिल्ली जैसी जगह पर ऐसी बातें करके वे क्या जताना चाहते हैं यह समझना मेरे जैसे ‘नासमझ’ के लिए बहुत ज्यादा मुश्किल हो जाता है। खैर, यह उनकी व्यक्तिगत ‘चॉइस’ है लेकिन कलाम साहब ने जो किया उसे सामान्य श्रेणी में तो नहीं रखा जा सकता।
कलाम साहब की जीवनी में मैंने एक वाक्य पढ़ा। उस एक वाक्य को मैं अपने जीवन में प्रतिस्थापित करने का प्रयास कर रहा हूं। वाक्य था, ‘अंग्रेजी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में विज्ञान के मूल काम अंग्रेजी में हैं। मेरा विश्वास है कि अगले दो दशक में विज्ञान के मूल काम हमारी भाषाओं में आने शुरू हो जायेंगे, तब हम जापानियों की तरह आगे बढ़ सकेंगे…’ राष्ट्रभाषा के प्रति उनके समर्पण को देखकर उनके उद्देश्य को मूर्त रूप देने के लिए मैंने अपने स्तर पर प्रयास शुरू किया और अपने सभी कार्यों को हिंदी में करने का प्रयास आज भी करता रहता हूं।
डॉ. कलाम के व्यक्तित्व में आपको एक बच्चे की ईमानदारी, एक वयस्क की ऊर्जा, एक वयस्क की परिपक्वता और एक बुजुर्ग का अनुभव दिखाई देगा। भारत में राष्ट्रपति का पद, एक ऐसा पद होता है जिसका चुनाव सीधे आम जनमानस के द्वारा नहीं होता लेकिन संपूर्ण भारत में शायद ही कोई ऐसा हो जो कलाम साहब का विरोध करने की क्षमता और मानसिकता रखता हो। वह चाहते थे कि भारत विश्व पटल पर एक विशिष्ट पहचान के साथ विश्व शक्ति बनकर खड़ा हो, भारत ज्ञान के शक्ति पुंज के रूप में उभरे यानी भारत पूर्व की भांति विश्वगुरु के पद पर पुनः प्रतिस्थापित हो। उनको सच्ची श्रद्धांजलि देने की इच्छा रखने वालों के लिए अनिवार्यता है कि वे डॉ कलाम के स्वप्न को यथार्थ रूप देने के लिए एक साथ मिलकर राष्ट्रीय एकात्मता को आधारभूत स्तंभ मानते हुए एकजुट हों।
लेकिन इसमें एक समस्या है, हमारे समाज में, हमारे बीच में एक ऐसा वर्ग भी है जो भारत को ‘गाली’ देता है… उसे भारतीय संस्कृति और भारतीय परंपराओं में सिर्फ कमियां और खामियां नजर आती हैं। अब ऐसे लोगों की नकारात्मक सोच के साथ एक सकारात्मक स्वप्न को मूर्त रूप देना कैसे संभव हो पाएगा? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुताबिक, डॉ कलाम में दम (आत्म नियंत्रण), दान और दया का अनूठा संगम व्याप्त था। लेकिन संभव है कि वह ‘खास’ वर्ग इस बात का विरोध मात्र इसलिए करने लगे क्योंकि यह बात एक स्वयंसेवक राजनेता ने कही है। हमारा वह वर्ग कहता है कि संघ के प्रचारक अगर शादी करके बच्चे पैदा करते तो शायद देश के लिए ज्यादा बेहतर कर पाते लेकिन कलाम साहब ने भी तो बच्चे नहीं पैदा किए, तो क्या उन्होंने देश के लिए कुछ नहीं किया? क्या सच में भारत और भारतीय संस्कृति के पास ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके कारण लोग यहां शिक्षा और ज्ञान की लालसा के साथ आते थे? कुछ तो जरूर रहा होगा, उस ‘कुछ’ को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा। साहब, कलाम साहब ने भारत को ‘अग्नि’ संपन्न बनाया, उन्होंने भारत को उस स्थिति में ला दिया जहां से भारत विश्व शक्तियों की नजर से नजर मिलाकर बात कर सकता है, जहां से भारत पुनः विश्वगुरु के पद पर प्रतिस्थापित होने के लिए प्रथम कदम बढ़ा रहा है।
जमीन से जुड़े उस व्यक्ति को, जिसने भारत को रॉकेट सफर करने का हौसला दिया, उसे मैं राष्ट्रवादी मानता हूं। मेरे राष्ट्रवाद की परिभाषा डॉ. कलाम से शुरू होकर उन पर ही समाप्त हो जाती है। जिस व्यक्ति ने गीता और कुरान दोनों का अध्ययन किया हो उसे एक संप्रदाय विशेष से जोड़ना कहीं न कहीं बेईमानी लगता है। अपने व्यक्तिगत जीवन में मैंने भारत को परमाणु संपन्न बनाने वाले डॉक्टर अब्दुल कलाम से बहुत कुछ सीखा है और मैं चाहता हूं कि भारत का मुसलमान जाकिर नाईक ने समर्थन में खड़े होने से पहले एक बार डॉ. कलाम को अनिवार्य रूप से पढ़ें।

Tuesday, 26 July 2016

'दलित उद्धारक' पत्रकारों के नाम खुला पत्र

नमस्ते भाई,
हो सकता है कि आपको मेरे संबोधन से भी आपत्ति हो क्योंकि रिश्तों की पवित्रता से अधिक महत्व आप भौतिकता को देते हैं लेकिन मैं साफ कर दूं कि इस पत्र में जो कुछ भी है वह एक राष्ट्रवादी लिख रहा है। एक ऐसा राष्ट्रवादी जो किसी तथाकथित राष्ट्रवादी राजनीतिक पार्टी का अंधभक्त नहीं है लेकिन उसे अपनी संस्कृति और सभ्यता पर बहुत गर्व है। आपसे निवेदन है कि कृपया अगले 10 मिनट के लिए आपने जिस भी ‘वाद’ का चश्मा पहन रखा है, उसे उतार कर रख दें और फिर इस पत्र को पढ़ें।
मैं पिछले कई सालों से जानने की कोशिश कर रहा था कि आखिर वामपंथियों की मूल समस्या क्या है? वे पत्रकारिता जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के साथ धोखा कैसे कर सकते हैं, वे पत्रकार होते हुए भी अपनी कुत्सित मानसिकता पर ‘मानवतावाद’ का चोंगा डालकर पूरे देश पर थोपने का प्रयास कैसे कर सकते हैं? ऐसे कई सवाल मन में आते थे लेकिन इनका उत्तर मिलना नामुमकिन सा लगता था। इसका कारण यह था कि वामपंथी विचारधारा से संबंध रखने वाले जिन पत्रकारों या पत्रकारिता के शिक्षकों से मेरा संवाद होता था, वे एक सीमा तक ही वामपंथ को मानते थे। वे एक सीमा में थे शायद इसीलिए मेरा और उनका संवाद हो पाता था। लेकिन पिछले 2 सालों में मेरे सामने वामपंथ का जो रूप आया उसने मुझे पूरी तरह से हिलाकर रख दिया।
आप कहते हैं भारत में सवर्णों ने दलितों पर अत्याचार किए, क्या आपने वह इतिहास नहीं पढ़ा है जिसमें सामान्य वर्ग के जो लोग इस्लाम स्वीकार नहीं करते थे उनसे मुगल शासकों द्वारा मैला उठवाया जाता था। क्या आपने वह इतिहास नहीं पढ़ा है जिसमें वे लोग सहनशीलता की पराकाष्ठा का प्रदर्शन करते हुए अपना शीलभंग तक करवा लेते थे। मैं मानता हूं कि कुछ तथाकथित सनातनी पूजा पद्धति को मानने वालों ने ऐसे लोगों को खुद से दूर कर दिया, उन्हें मंदिरों में नहीं जाने दिया लेकिन साहब आप उस दौर का वह इतिहास क्यों भूल जाते हैं, जब मेरे कुल के बड़े, विनायक दामोदर सावरकर ने तथाकथित सवर्ण होते हुए भी ‘अपनों’ के विरोध में अछूत माने जाने वाले वर्ग को मंदिर में प्रवेश दिलवाया था। और यह सब उन्होंने उसी उद्देश्य के साथ किया था जिस उद्देश्य के साथ आज मैं यह पत्र लिख रहा हूं।
आप अपने नाम के आगे ‘सवर्ण सूचक शब्द’ इसलिए लगाते हैं ताकि जब दलित उद्धार के नाम पर कोई आग भड़के तो उस आग में घी डालते हुए आप जता सकें कि देखो, हम सवर्ण होते हुए भी दलितों के साथ खड़े हैं… आप ऐसा इसलिए करते हैं ताकि जो वामपंथ पूरी दुनिया से शून्य के स्तर तक पहुंचता जा रहा है उसे दलितों के सहारे समाज में प्रतिस्थापित कर सकें। आप संघ को गालियां देते हैं, मैं संघ को बहुत करीब से जानता हूं और पूरी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि संघ की मूल विचारधारा में कहीं कोई बुराई नहीं है। और बुराई होगी भी कैसे, जिस संगठन के एक-एक सिद्धान्त पर लोगों ने बिना किसी स्वार्थ के अपना जीवन खपा दिया उसमें बुराई की संभावना तो नगण्य हो जाती है। मैं जिस संगठन से आता हूं, वहां ना ही किसी की जाति पूछी जाती है और ना ही जाति के आधार पर किसी को सम्मान दिया जाता है। लेकिन जब आपसे संघ की बात करो तो आप बजरंग दल, साध्वी प्राची और बीजेपी पर आ जाते हैं।
rssअरे, संघ की मूल विचारधारा पर बात करिए ना। वामपंथ के नाम पर पूरे देश में गिने-चुने लोग बचे हैं फिर भी आपके समर्थक ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ एवं ‘भारत मुर्दाबाद’ के नारे लगाते हैं और उनके मामले पर आप कह देते हैं कि किस-किस को नियंत्रण में रखें? अरे साहब, आप चार लफंगों पर नियंत्रण नहीं रख सकते और उम्मीद करते हैं कि संघ की शाखा में कभी-कभार गए लोगों पर विश्न का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन पूर्ण नियंत्रण रखें। अरे! आपके पूरे देश में आपके जितने कार्यकर्ता हैं उससे कहीं अधिक संघ के स्वयंसेवक अपना अलग संगठन बनाकर दुनिया भर में बिना किसी स्वार्थ के काम कर रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा वर्ग के दौरान मेरे प्रांत प्रचारक ने अपने वक्तव्य के दौरान कहा था कि हम संघ के स्वयंसेवक हैं, ऐसा व्यवहार में आना चाहिए… मैंने उसे माना और वापस आने के बाद जब 11वीं की परीक्षा के दौरान रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरा तो अपना जातिसूचक शब्द हटा दिया… वर्तमान जातिव्यवस्था को खत्म करने के लिए मैंने स्वयं से शुरुआत की… और यही कारण है कि जब आपसे बात करता हूं तो आप तर्कहीन हो जाते हैं… इसके विपरीत एक बार अपने बारे में सोचिए, आप तो पहला सवाल ही यही करते हैं कि ‘कौन जात हो?’ हद हो गई यार, लेकिन अब यह नहीं चलेगा कि तुम खेलो तो गोल्फ और हम खेलें तो कंचा।
मैं अगर जाति व्यवस्था की मूल अवधारणा आपको समझाने की कोशिश करता हूं तो आप कहते हैं कि तुम जातिवाद के समर्थक हो, तुम्हें अपने सवर्ण होने पर गर्व है, तुम्हारे इसी गर्व के कारण दलित पिछड़ गए हैं। अरे भइया, मैं जातिवाद का समर्थक नहीं हूं, मैं मानता हूं कि वर्तमान जाति व्यवस्था हमारे लिए सबसे बड़ी समस्या है। लेकिन उसके मूल रूप को नकार देना मेरे बस में नहीं क्योंकि मैं उसका अध्ययन कर रहा हूं। जिसे आज आप सवर्ण कहते हैं, मैं उसका हिस्सा नहीं हूं। ‘मैं श्रेष्ठ हूं’, ऐसा मानना गलत नहीं है लेकिन सिर्फ मैं ही श्रेष्ठ हूं, यह कहना और मानना पूर्णतया गलत है। स्वयं को श्रेष्ठ मानने और श्रेष्ठ होने में कोई बुराई नहीं है… मैं चाहता हूं कि सभी श्रेष्ठ हों और स्वयं को श्रेष्ठ मानें। आखिर जो हैं उसे मानने में क्या बुराई है? बशर्ते पहले सभी श्रेष्ठ हों तो… और इसमें हम सबकी जिम्मेदारी है कि श्रेष्ठ बनें और दूसरों को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करें, हम तो उस परंपरा के लोग हैं जो ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ में विश्वास रखते हैं। यानि सिर्फ मैं ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व श्रेष्ठ बने। अब अगर आपको श्रेष्ठ बनने में भी बुराई नजर आती है तो यह आपका दृष्टिदोष है और इसके लिए आपको किसी चिकित्सक के पास जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि इसका इलाज कोई चिकित्सक कर ही नहीं सकता।
बांटने की राजनीति तो आपकी विचारधारा के कारण आपके व्यवहार में व्याप्त हो गई है। आपको सीधी सी बात समझाने की कोशिश करो कि कर्म के आधार पर जाति व्यवस्था का निर्धारण किया गया था तो आप कहते हो कि ब्राह्मण को मुख से और शूद्र को पैर से क्यों निकला हुआ बताया। अरे पैर कौन सी खराब चीज है, मैं जिस परंपरा से आता हूं उसमें अगर हनुमान अपने बाल्य काल में सूर्य के अहंकार को तोड़ने के लिए अपना मुख बड़ा करके भानु को अपने मुख में रख लेते हैं तो वहीं राजा बली के भक्ति भाव से परिपूर्ण अहंकार को तोड़ने के लिए वामन रूप में उस ईश्वर स्वरूप को अपने पैरों का उपयोग ही करना पड़ता है।
मैं साफ-सफाई करने को जब एक सामान्य कर्म बताता हूं तो आप कहते हैं कि वह कोई बड़ी बात नहीं। वास्तव में यह कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि मैं जिस संगठन से आता हूं उसके प्रशिक्षण वर्ग में ‘श्रम साधना’ नाम का एक कालांश होता है, उसमें हमें हर दिन मैदान से लेकर टॉइलट्स तक साफ करना होता है। वहां ऐसा नहीं होता कि आपका व्यक्तिगत टॉइलट आपको साफ कराना है। उस वर्ग में प्रत्येक ‘जाति’ के लोग होते हैं और हमें उस काम को करने में कोई शर्म नहीं आती क्योंकि यह तो एक सामान्य कर्म है।
आपके लिए मनुस्मृति कुत्सित मानसिकता से लिखी गई एक पुस्तक मात्र हो सकती है, लेकिन अगर आप ऐसा कहते हैं तो उसका कोई तर्क तो होगा, कोई आधार तो होगा। मैंने जितना पढ़ा है उतने में कोई बुराई नहीं दिखी अगर आपको दिख रही है तो कृपया हमें भी बताइए। और अगर है भी तो उसे इग्नोर करके सिर्फ अच्छी बातों को मानने में क्या बुराई है? आपकी विचारधारा में एक सीमा तक अच्छाइयां हैं, हम तो उनको स्वीकार करने के लिए तैयार बैठे हैं। लेकिन आप ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आप दुनिया भर की संस्कृतियों के भारतीय संस्कृति से उत्कृष्ट होने के पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। आपसे जब संवाद करने की कोशिश की जाती है तो आप हम दोनों की विचारधाराओं को विपरीत छोर का मान लेते हैं। अरे साहब! राजनीति छोड़िए… और राष्ट्रनीति की बात करिए… एक राष्ट्र जहां सब एक हों… सबकी एक विशिष्ट पहचान हो… जहां कोई भेदभाव न हो…खुद को बदलिए… तब बदलेगी व्यवस्था… कुछ न करिए तो कम से कम संवाद क्षमता तो रखिए।

Monday, 25 July 2016

हां, मैं सवर्ण हूं और शूद्र भी

किसी भी व्यक्ति के अधिकारों का हनन करना और उसे किसी काम के लिए बाध्य करना, असंवैधानिक भी है और अनैतिक भी लेकिन आज दलित उद्धार के नाम पर सवर्ण समाज को जिस तरह से निशाने पर लिया जा है उसका अर्थ मेरी समझ से परे है। मैं एक तथाकथित सवर्ण परिवार से आता हूं लेकिन जब से मैं समझने वाला हुआ हूं तब से मेरे परिवार में कभी किसी जाति विशेष से संबन्ध रखने वाले व्यक्ति के साथ किसी तरह कोई भेदभाव नहीं किया गया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में जातिगत भेदभाव नहीं है, बिल्कुल है लेकिन उसके लिए जिम्मेदार कौन है, यह सबसे बड़ा सवाल होना चाहिए।
ऋग्वेद में एक वाकसूत्र आता है:
ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद्‍ बाहु राजन्य कृत:।
उरु तदस्य यद्वैश्य: पद्मयां शूद्रो अजायत। (ऋग्वेद)
इस वाकसूत्र का अर्थ है कि ब्राह्मण की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय की भुजाओं से, वैश्य की उदर से तथा शूद्रों की पैरों से हुई है। भाष्यगत गलती या यूं कहें कि भारतीयता एवं सनातनी साहित्य को निकृष्ट दिखाने के उद्देश्य से इस देश के वामपंथी बुद्धिजीवियों और अंग्रेजी परंपरा के तथाकथित साहित्यकारों ने गलत विवेचना करके अर्थ का अनर्थ कर दिया। सोचने का विषय है कि क्या पैरों का महत्व मुख, भुजा अथवा उदर से कम है क्या? बिल्कुल नहीं। हमारे शरीर के प्रत्येक अंग का अपना विशिष्ट महत्व है। ब्रह्मा के मुख से पैदा होने से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या समूह से है जिसका कार्य बुद्धि से संबंधित है अर्थात अध्ययन अथवा अध्यापन। भुजा से उत्पन्न क्षत्रिय वर्ण अर्थात उस दौर के राजा या उनकी सेना में कार्यरत लोग, जिन्हें आज के समय में सुरक्षाबलों में कार्यरत व्यक्ति कहा जा सकता है। उदर से पैदा हुआ वैश्य अर्थात उत्पादक या व्यापारी वर्ग और अंत में चरणों से उत्पन्न शूद्र वर्ण।
हमें समझना होगा कि साजिशन मात्र पैरों से उत्पन्न हुआ बताए जाने के कारण ‘शूद्र’ वर्ण को अपवित्र या निकृष्ट बताया गया है। जबकि मनु के अनुसार यह ऐसा वर्ग है जो न तो बुद्धि का उपयोग कर सकता है, न ही उसके शरीर में पर्याप्त बल है और व्यापार कर्म करने में भी वह सक्षम नहीं है। ऐसे में वह सेवा कार्य अथवा श्रमिक के रूप में कार्य कर समाज में अपने योगदान दे सकता है। आज का श्रमिक वर्ग अथवा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मनु की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही है। चाहे वह फिर किसी भी जाति या वर्ण का क्यों न हो। मैंने पहले भी लिखा है कि जब मैं अपने घर की सफाई कर रहा होता हूं या गुरुवार को साईं मंदिर जाकर श्रमदान कर रहा होता हूं तो वह ‘शूद्रकर्म’ होता है और मुझे नहीं लगता कि इस कर्म को करने में कोई बुराई है। बल्कि मैं तो इसे बहुत अच्छा काम मानता हूं।
वर्तमान ब्राह्मणवाद या तथाकथित सवर्णवाद किसी वर्ग विशेष की देन नहीं है। इसके लिए समाज में व्याप्त कुछ स्वार्थी तत्व ही जिम्मेदार हैं। पुराने समय में भी ऐसे लोग रहे होंगे जिन्होंने अपनी अयोग्य संतानों को अपने जैसा बनाए रखने अथवा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए लिए अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया होगा। वर्तमान संदर्भ में आप स्वयं देखिए कि किस तरह से एक परिवार विशेष की महारानी अपने अयोग्य पुत्र को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाना चाहती हैं। वह जानती हैं कि उनका पुत्र इस लायक नहीं है कि देश की सत्ता का संचालन कर सके लेकिन पुत्र मोह के वशीभूत होकर वह ऐसा कर रही हैं। संभव है कि उस दौर में भी कुछ लोगों ने अपने वंशमोह के चलते परिभाषाएं ही बदल दीं। लेकिन इसके लिए समाज के एक वर्ग विशेष को पूरी तरह से जिम्मेदार करार देना पूरी तरह से गलत है। मैं मानता हूं कि किसी पर भी अत्याचार नहीं होना चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति अथवा वर्ग से संबन्ध रखता हो लेकिन समस्या यह है कि केरल में जब वामपंथी कट्टरवादी, विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रनिर्माण में लगे एक स्वयंसेवक को जान से मार देते हैं तो इनके कलम की स्याही सूख हो जाती है? आखिर ये लोग जब असमानता की प्रतिमूर्ति बनकर सैकड़ों मानदंडों पर भेदभाव करते हैं तो समानता का झुनझुना बजाने का ढोंग क्यों करते हैं?
सवर्णों ने हमेशा तुम्हें लूटा है, तुम्हें दबाया है, तुम्हारा शोषण किया है जैसी बातें लिखकर या कहकर हम कहीं न कहीं उन बिछड़े हुए लोगों के मन में एक वर्ग विशेष के प्रति घृणा का भाव उत्पन्न कर रहे हैं। आज हमारी जिम्मेदारी है कि इन बिछड़े हुए लोगों को यह बताने के बजाय सकारात्मक पक्ष को रखें। अगर आज उनके साथ किसी तरह का अत्याचार हो तो हमारी जिम्मेदारी है कि उसकी निंदा करें और अपराधियों को सजा दिलाने के लिए जो कुछ कर सकें, वह करें। लेकिन हम करते क्या हैं? उन्हें भड़काते हैं कि देखो, उस समय तुमसे सवर्णों ने टट्टी उठवाई थी और आज भी तुमको नंगा करके पीट रहे हैं। हद हो गई यार, किसी के साथ गलत हो रहा है तो उसका विरोध होना चाहिए लेकिन वोट बैंक की राजनीति के लिए आप खुद को एक वर्ग विशेष के लिए ‘उद्धारक’ बना कर पेश करें तो यह पूरी रह से गलत है क्योंकि ऐसा करने पर अनजाने में फिर से भेदभाव पनपने लगता है बस ‘कर्ता’ बदल जाता है।
बाबा साहब का मत थ कि वह ब्राह्मणवाद के खिलाफ हैं किसी जाति विशेष के नहीं और ब्राह्मणवाद को परिभाषित करते हुए वे कहते थे की इसका अर्थ ऊंच-नीच और अंधविश्वास का होना है जो किसी भी समुदाय में हो सकता है। अगर बाबा साहब के लिए मन में सम्मान है तो आवश्यक है कि उनके सिद्धांतों का सम्मान करें।
मनुस्मृति को गालियां देने वाले लोग और मनुस्मृति के तथाकथित ‘पूजक’ अगर उसके मूल ज्ञान को सकारात्मक दृष्टिकोण से समझ लें तो सभी समस्याओं का समाधान हो जाए। मनु तो सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था अनिवार्य करते हैं। बिना पढ़े लिखे व्यक्ति को वह विवाह का अधिकार भी नहीं देते, जबकि वर्तमान में आजादी के 70 साल बाद भी देश का एक वर्ग आज भी अनपढ़ है। अब बात करते हैं उस खास वर्ग की जिसे दबाया हुआ बताया जाता है। मैं फिर कह रहा हूं कि उनके साथ अत्याचार हुए हैं लेकिन उसके अलावा एक पक्ष और भी है जिसे हम अनदेखा कर देते हैं।
प्रख्यात लेखक डॉ. विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक ‘हिन्दू चर्ममारी जाति: एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास’ लिखी। डॉ. शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी। डॉ. विजय सोनकर शास्त्री के मुताबिक, तुर्क आक्रमणकारियों के काल में चंवर राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा चंवरसेन थे। इस क्षत्रिय वंश के राज परिवार का वैवाहिक संबंध बप्पा रावल वंश के साथ था।  राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रैदास को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी।
संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे। उनके महान व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरु माना और उनके अनुयायी बने। सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा। वह जानता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जाएंगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी। स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त बन गया। लेकिन हम कभी उनको यह नहीं कहेंगे कि देखो, तुम्हारे पूर्वजों ने कितने शौर्य का काम किया था। मेरा बहुत सीधा सा सवाल है कि ‘दलित’ वर्ग को भड़काकर ‘सवर्ण’ वर्ग के सामने खड़ा करना ज्यादा बेहतर है या फिर ‘सवर्ण समाज’ को ‘दलित’ वर्ग का गौरवशाली अतीत बताकर सामाजिक रूप से उनकी स्वीकार्यता को 100 प्रतिशत करना ज्यादा बेहतर है?
संत रैदास की बड़ती स्वीकार्यता के फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार या दूसरे शब्दों में कहें तो अछूत चंडाल घोषित कर दिया। उसने संत रैदास को बहुत शारीरिक कष्ट दिए लेकिन उस कट्टरपंथी के सामने रैदास ने स्वयं को डिगने नहीं दिया। संत रैदास पर हो रहे अत्याचारों के प्रतिउत्तर में चंवर वंश के क्षत्रियों ने दिल्ली को घेर लिया। इससे भयभीत होकर सिकन्दर लोदी को संत रैदास को छोड़ना पड़ा था। चंवर वंश के वीर क्षत्रिय जिन्हें सिकंदर लोदी ने ‘चमार’ बनाया और हमारे-आपके कुछ स्वार्थी पूर्वजों ने उन्हें अछूत बना कर खड़ा कर दिया। हम तो स्वार्थी नहीं हैं, हम तो भेदभाव नहीं करते तो फिर क्यों उनके मन में हमारे खिलाफ जहर भरा जा रहा है? मैं कहता हूं कि देश के अंतिम नागरिक के साथ भी अगर कुछ गलत हो तो पूरा देश कुछ इस तरह से एक हो जाए कि सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोग हिल जाएं। लेकिन यह नहीं चलेगा कि सोने का मुकुट और हीरे की अंगूठी पहनकर ‘दलित देवी’ के रूप में स्वयं को प्रतिस्थापित करके हमारे समाज के दो वर्गों के बीच की दूरियों को पाटने के बजाय उसे और लंबा करें।

Wednesday, 20 July 2016

एक गैर कश्मीरी का अपने कश्मीरी भाई के नाम खुला खत

मेरे प्रिय कश्मीरी भाई,
कल यूट्यूब पर एक विडियो देखा। उस विडियो में उन भारतविरोधियों के पक्ष को रखा गया था जो कथित तौर पर पाकिस्तान से मोहब्बत करते हैं और पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं। उस विडियो को देखकर मुझे तुम्हारी याद आ गई, तुम तो हमेशा कहते हो कि तुम भारत से मोहब्बत करते हो…तुम्हारे अब्बू जान ने मां वैष्णों देवी मंदिर जाने वाले सनातनी यात्रियों को अपने खच्चर पर बैठा कर ही तो दर्शन कराए… उन्हीं सनातनी यात्रियों से मिले पारिश्रमिक से तुम्हारी पढ़ाई हुई और उसी की बदौलत तो तुम आज एक बड़े ऑफिसर बनकर बैठे हो। तुम्हारे अब्बू को तो भारतीय सेना के किसी ऑफिसर ने गोली नहीं मारी, वह भी तो यही कहते हैं, ‘मैंने कभी भारत माता की जय नहीं बोला लेकिन दिन में 5 बार नमाज पढ़ते समय हर बार इस मुल्क की सरजमीं का ही तो सजदा करता हूं।’ एक सवाल मुझे बहुत परेशान करता है कि क्या सच में भारतीय सेना इतनी बुरी है कि कश्मीर में रहने वाले मुस्लिम उससे नफरत करने लगें? और तुम हर बार मेरे इस सवाल पर बस यही कहते हो कि हमारी सेना तो हमारी लाइफलाइन है।
बहुत कन्फ्यूज हूं यार, कि आखिर किसकी मानूं… तुम सही हो या वे लोग। आखिर वे भी तो तुम्हारी तरह ही इंसान हैं… उनको इग्नोर तो नहीं किया जा सकता लेकिन अगर उनको मान लिया तो तय है कि अनर्थ हो जाएगा। अगर उनकी मानकर अपने कुछ बुद्धिजीवियों की तरह हम भी भारत सरकार से कहने लगे कि आपने फ़ौज के बल पर उनकी ज़मीन पर कब्जा करके रखा है, आपने उनको उनके ही घर में बंधक बनाकर रखा है, उन्हें आजाद छोड़ दीजिए ताकि पाकिस्तान उन पर वैसे ही कब्जा कर ले जैसे कथित तौर पर आपने किया है तो भाई, तुम्हारा क्या होगा… फिर… बस इसी ‘फिर’ की वजह से हमारी हिम्मत नहीं होती कि हम भारत सरकार के सामने कह पाएं कि ‘कश्मीर-राग’ अलापना बंद करो।
अभी हाल ही में प्रदेश में चुनाव हुए थे, तुम भी बहुत दूर से अपने गांव सिर्फ वोट डालने गए थे। बहुत खुश थे उस दिन तुम, क्योंकि तुम अपने प्रदेश की सरकार चुनने जा रहे थे और तुम्हारी तरह ही प्रदेश की 65 प्रतिशत से अधिक आवाम ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। चुनाव परिणाम आने से पहले जब मेरी तुमसे बात हुई तो तुमने मुझसे यही कहा था कि ये 65 प्रतिशत लोग बिल्कुल तुम्हारी तरह ही हैं। लेकिन भाई, क्या इन 65 प्रतिशत के लिए बाकी 35 प्रतिशत लोगों को नकार देना चाहिए। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में विश्वास न रखकर वोट न देने वाले कितने प्रतिशत लोग तुम्हारे कश्मीर में हैं? क्या तुम्हारे जैसे 65 प्रतिशत लोगों को छोड़कर बाकी सारे लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते? हमारे भारत के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी तो यही कहते हैं। मुझे पता है यह बात पूरी तरह से अवैज्ञानिक भी है और आधारहीन भी लेकिन फिर भी चलो कुछ समय के लिए उन बुद्धिजीवियों की बात मानकर इसी आधार पर बात करते हैं।
माना कि 35 फीसदी लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते, तो क्या उनके लिए कश्मीर को तथाकथित ‘आजादी’ दे देनी चाहिए और भारतीय सेना हटा लेनी चाहिए? चलो यह भी कर लिया तो मानवाधिकार की जीत हो जाएगी क्या? फिर वे 35 प्रतिशत लोग तो खुश हो जाएंगे लेकिन बाकी 65 प्रतिशत लोगों का क्या होगा? वे लोग भी तो वहां उसी तरह से रहेंगे जैसे आज कथित तौर पर भारत विरोधी लोग रहे हैं। वहां की पुलिस कहती है कि ‘उनके’ पास रोजगार नहीं है इसलिए पत्थरबाजी कर रहे हैं। रोजगार के लिए पढ़ना पड़ेगा और पढ़ाई से तो कोसों दूर भागते हैं वे? अब ऐसे में सवाल यह है कि ये सब सही कैसे होगा? बस इसी सवाल का जवाब चाहता हूं तुमसे? वैसे अगर एक आतंकी बुरहान वानी की मौत पर मानवाधिकार का चोंगा ओढ़कर एसी कमरों में बैठने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी भी शांति के लिए कोई वैकल्पिक मार्ग बता सकें तो उस पर सोचा जाना चाहिए। लेकिन इसमें भी समस्या यह है कि उनको उस आतंकी का मानवाधिकार तो दिखेगा लेकिन पत्थर खाकर भी सिर्फ इंसानियत के लिए खाना खिलाने वाले सैनिकों के प्रति उनके मन में दयाभाव नहीं जगेगा।
तुमसे और तुम्हारे जैसे हर एक इंसान से बहुत मोहब्बत है मुझे लेकिन उनसे मोहब्बत कैसे करूं जो मेरे घर के पड़ोस में रहने वाले मिश्रा जी के बेटे पर पत्थर चलाते हैं। असल में वे लोग मिश्रा जी के बेटे पर पत्थर नहीं चलाते हैं, वे लोग तो भारत की ‘कब्जे वाली पॉलिसी’ पर पत्थर चलाते हैं। सही मायनों में वे पत्थर नहीं चलाते, वे तो तमाचा मारते हैं मेरे और तुम्हारे मुंह पर, कि देखो हम तो तुम्हारे घर में रहकर और जिंदा हैं। पता नहीं आज भारत सरकार ने जो कदम उठाया है उस पर तुम क्या स्टैंड लेते हो लेकिन मैं बहुत खुश हूं कि कम से कम मेरे देश के प्रधान में इतनी क्षमता तो है कि वह चंद गिने-चुने लफंगों को सजा देने में देर नहीं कर रहा है। मेरे देश के बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों को इतनी सी बात कब समझ में आएगी कि जिस पाकिस्तान ने अपने देश में मासूम बच्चों की हत्या पर काला दिवस नहीं मनाया, वही पाकिस्तान बुरहान की मौत पर काला दिवस क्यों मनाता है? तुम तो सब समझते हो लेकिन इन बुद्धिजीवियों को समझाने का कोई रास्ता तो बता दो… ऐसे बुद्धिजीवियों को देखकर कवि वेद व्रत बाजपेई की दो पंक्तियां याद आ जाती हैं…
युद्धों में कभी नहीं हारे, हम डरते हैं छल-छंदों से,
हर बार पराजय पाई है, अपने घर के जयचंदों से…
तुम खुश रहो और इन बुद्धिजीवियों की बुद्धि-शुद्दि के लिए खुदा से दुआ करो।
इसी अपेक्षा और आकांक्षा के साथ…
तुम्हारा,
एक गैर कश्मीरी भारतीय भाई

Monday, 27 June 2016

गलत प्रस्तुति की वजह से 33 करोड़ हुए '33 कोटि' देवता

आज अगर देश की सबसे बड़ी समस्या को समझने की कोशिश करें तो साफ तौर वह धार्मिक अज्ञानता है। इस धार्मिक अज्ञानता के कारण वे लोग हैं जो कालांतर में विभिन्न धर्म की एकछत्र ठेकेदारी करते रहे। इसी धार्मिक अज्ञानता के कारण चंद लोगों ने जिहाद जैसे सकारात्मक शब्द को नकारात्मकता की पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया तो वहीं दूसरी ओर उसी श्रेणी के कुछ लोगों ने सनातन को उसकी मूल अवधारणा से विरक्त कर दिया। जिन उद्देश्यों के साथ विभिन्न धार्मिक ग्रंथों की रचना की गई थी, वे उद्देश्य अज्ञानता और अकर्मण्यता की भेंट चढ़ गए। अपने-अपने तरीके से धर्म के ठेकेदारों ने उन विषयों को समाज के सामने रखा जो समाज को सकारात्मक दिशा देने के लिए हमारे पूर्वजों ने गहन शोध और चिंतन के बाद प्रतिस्थापित किए थे। अर्थ का अनर्थ करने के कारण ही आज स्थिति यह हो गई है कि समाज में एक वर्ग ऐसा तैयार हो गया है जो धर्म को ‘अफीम’ बताने लगा है। हम उस वर्ग से तार्किक संवाद नहीं कर पाते क्योंकि हमारे समक्ष हमारे ही धर्म (रिलिजन) को जिस रूप में प्रदर्शित किया गया है, वह रूप कई बुराइयों से या यूं कहें कि गलतफहमियों से भरा हुआ है। इसी तरह के लोगों में से कोई मुल्ला यह कहता है कि इस्लाम में कद्दू की तौहीन करना बहुत बड़ा गुनाह है और उसकी सजा कत्ल है, (पढ़ें: कद्दू न खाने पर क़त्ल का फ़रमान, भला यह कैसा इस्लाम?) तो दूसरी ओर कोई स्वरूपानंद सरस्वती यह कहने लगता है कि महिलाओं द्वारा शनिदेव की पूजा करने से रेप जैसी घटनाएं बढ़ जाएंगी।
आज सनातन धर्म (जिसे वर्तमान समय में हिंदू धर्म के नाम से जाना जाता है) की एक ऐसी ही गलत रूप से प्रस्तुत अवधारणा के विषय पर बात करने के लिए इस ब्लॉग को लिख रहा हूं। समाज में कहा जाता है कि सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता हैं। सबसे पहले तो इस बात के पीछे का कारण समझने की कोशिश करते हैं। थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी-देवताओं की गणना की गई होगी। लेकिन यहां तो हर रोज एक नए देवता का मंदिर बन जाता है, ऐसे में यह संख्या स्थायी क्यों है? यह मेरी समझ से परे है। कुछ विद्वानों का मत है कि जब यह परिकल्पना दी गई होगी उस समय दुनिया की जनसंख्या 33 करोड़ रही होगी। अत: सभी को देवी-देवता मान लिया गया। यदि इस तर्क को माना जाए तो आज विश्व की जनसंख्या 7 अरब 50 करोड़ के करीब है। ऐसे में आज तो यह कहना चाहिए कि कुल मिलाकर अब 7.5 अरब देवी-देवता हैं। बात यहीं पर खत्म नहीं होती। इसमें भी एक पेंच है। पेंच यह है कि सनातन परंपरा तो प्रत्येक जीव और प्रत्येक कण-कण में ईश्वर का वास मानती है तो फिर उनकी गणना क्यों नहीं की जाती?
चलिए, अब समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर यह 33 करोड़ वाला ‘खेल’ क्या है? सत्य यह है कि किसी भी सनातन ग्रंथ में 33 करोड़ देवताओं का जिक्र नहीं हुआ है। ग्रंथों में ’33 कोटि’ शब्द का प्रयोग हुआ है। करोड़ के साथ-साथ कोटि का एक अर्थ ‘प्रकार’ भी होता है। इसे यदि आसान शब्दों में श्रेणी या कैटिगरी कहें तो गलत न होगा। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इसी ‘कोटि’ को करोड़ बना दिया। शतपथ ब्राह्मण नामक ग्रंथ में देवताओं की कुल संख्या 33 बताई गई है। यह संख्या यूं ही नहीं बताई गई है बल्कि संख्या के साथ इस देवताओं के विषय में भी बताया गया है। आगे बढ़ने से पहले यह समझ लेते हैं कि देवता आखिर माना किसे गया है? निरुक्त (7-15) में कहा गया है: देवो दानाद्वा, दीपनाद्वा घोतनाद्वा, घुस्थानो भवतीति व।। अर्थात अर्थात दान देने से देव नाम पड़ता है और दान कहते है अपनी चीज दूसरे के अर्थ दे देना। दीपन कहते है प्रकाश करने को, धोतन कहते है सत्योपदेश को। यानी जो अपनी कोई भी चीज दान करता है सामान्य अर्थों में वह देवता कहलाता है।
शतपथ ब्राह्मण (11.6.3.5) में जिन 33 देवताओं की चर्चा की गई है उनमें 8 वसु हैं, 11 रुद्र है, 12 आदित्य तथा इन्द्र और प्रजापति शामिल हैं। उनमें से 8 वसु देवों में अग्नि , पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, घौ:, चन्द्रमा और नक्षत्र शामिल हैं। इनके नाम वसु इसलिये है कि सब पदार्थ इन्ही में वास करते है और ये ही सबके निवास करने के स्थान हैं। इनमें 11 रूद्र देवों में प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कुर्म, कृकल, देवदत्त, धनज्जय और अंतिम जीवात्मा शामिल हैं। ये देव (तत्व) जब इस शरीर से निकल जाते हैं तब मरण होने से सभी सम्बन्धी रोते हैं। वे निकलते हुए अन्य लोगों को रुलाते हैं , इस कारण इनका नाम रूद्र है।
इसी प्रकार आदित्य 12 महीनों को कहते है, क्योंकि वे सब जगत के पदार्थों का आदान अर्थात सबकी आयु को ग्रहण करते चले जाते है, इसी से इनका नाम आदित्य है। ऐसे ही इंद्र नाम बिजली का है, क्योंकि वह उत्तम ऐश्वर्य की विधा का मुख्य हेतु है और यज्ञ को प्रजापति इसलिए कहते है  क्योंकि उससे वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा प्रजा का पालन होता है। ये सब मिलकर अपने दिव्यगुणों से त्रिदेव कहलाते हैं। इनमें से किसी को भी उपासना के योग्य नहीं माना गया है, किन्तु व्यवहार मात्र की सिद्धि के लिए ये सभी देव माने गए हैं। इसी संकल्पना से संपूर्ण जगत को बनाने वाले ब्रह्मा, सर्वत्र व्यापक होने वाले विष्णु और दुष्टों को दण्ड दे कर रुलाने वाले रूद्र कहे गए हैं।

Tuesday, 21 June 2016

...अब किसी घायल को अनदेखा करके नहीं जाऊंगा

मेरी फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में रोहित पांडे नामक एक पत्रकार मित्र जुड़े हुए हैं। मेरा और रोहित का परिचय पिछले तीन सालों से है। रोहित से मेरी सामान्य मित्रता थी, 4-5 महीनों में बात हो जाया करती थी, कभी अगर मेरा लखनऊ जाना हुआ या उनका दिल्ली आना हुआ तो मिलना हो जाता था। हमारे बीच सामान्य तौर पर राजनीतिक चर्चाएं हुआ करती थीं। उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में मैं बहुत अधिक नहीं जानता था लेकिन फादर्स डे (19 जून) के मौके पर विभिन्न समाचार पत्रों तथा वेबसाइट्स के माध्यम से उनके बारे में जो कुछ पता चला उसने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं उन पर गर्व करूं। चलिए तो अब आपको बताता हूं रोहित की कहानी…
कल शाम रोहित से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा, ‘विश्व गौरव भाई, इस जीवन में बस एक ही लक्ष्य है कि लोगों को जीवन का महत्व समझ में आ जाए। मैंने अपने पिता के बिना अब तक का जीवन जिस पीड़ा के साथ जिया है, मैं नहीं चाहता कि कोई और उस पीड़ा को झेले। अपने स्तर पर जितना कर सकता हूं कर रहा हूं। शायद मेरे काम से किसी के घर की खुशियां बची रहें।’ फादर्स डे पर रोहित ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर कुछ लिखा था। उनकी भावनाओं को उन्हीं के शब्दों में आप सभी से शेयर कर रहा हूं-उत्तर प्रदेश स्थित बलरामपुर के रहने वाले रोहित पांडे के पिता जी का देहांत 28 नवंबर 2002 को एक सड़क दुर्घटना में हो गया था। उस वक्त रोहित की उम्र मात्र 12 वर्ष थी। 2009 में रोहित का जाना उस स्थान पर हुआ जहां उनके पिता की मृत्यु हुई थी। वहां पर रोहित को पता लगा कि ऐक्सिडेंट के बाद उनके पिता 45 मिनट तक सड़क पर ही पड़े रहे लेकिन किसी ने भी उन्हें अस्पताल तक नहीं पहुंचाया। समय रहते इलाज न मिल पाने के कारण उनके पिता ने दम तोड़ दिया। ऐसे हादसे के बाद जब कोई भी सामान्य व्यक्ति पूरी तरह से टूट जाता है, रोहित ने एक संकल्प लिया कि वह सड़क हादसे में घायल हुए लोगों के जीवन को बचाने का हरसंभव प्रयास करेंगे। 2009 से आज तक रोहित अपने उस संकल्प के साथ ही जीवन यापन कर रहे हैं। रिपोर्टिंग के दौरान यदि कहीं पर कोई भी व्यक्ति उन्हें घायल अवस्था में मिल जाता है तो वह तत्काल उसे हॉस्पिटल ले जाते हैं। अब तक रोहित 35 से अधिक लोगों का जीवन बचा चुके हैं। कई बार तो वह अपने घर के काम के लिए दिए गए पैसे को भी घायलों के इलाज में लगा चुके हैं।
प्रणाम पिता जी, वैसे तो यार हर दिन तुम्हारी याद आती है, अमा तुम थे भी वैसे कि याद आओ। पान खाते, मुस्कुराते, राजदूत से फड़फड़ाते हुए, वैसे कुछ दिन पहले बॉक्सर भी तो ले ली थी, है आज भी। मिलना यार पापा, लेकिन जाना मत कुछ काम लेना है तुमसे। और सुनो मैं भी सबसे मुस्कुराते हुए ही मिलता हूं, तुमसे ही सीखा था।
पापा कब आओगे?
जाने कब से ढूंढ रहा हूं
अपनों में और सपनों में ,
इन पलकों की छांव तले
क्या एक झलक ना दिखलाओगे ?
सच बोलो ना पापा मुझसे,
पापा कब आओगे ?
आपको याद करके मां 
हर दिन है रोया करतीं,
आपकी यादों में वह 
हर पल है खोया करतीं ,
यादों के इन झरोखों से बाहर
क्या आप कभी ना आओगे?
सच बोलो ना पापा मुझसे ,
पापा कब आओगे?
आपके बिना सूना है घर-आंगन ,
आपके बिना सूना है यह जीवन ,
क्या अपनी आवाज इस घर-आंगन में
फिर से नहीं सुनाओगे?
सच बोलो ना पापा मुझसे,
पापा कब आओगे?
क्या रूठे हो पापा मुझसे
या खुशियां हमसे रूठ गई हैं,
इन रूठी खुशियों को क्या
फिर से नहीं मनाओगे?
सच बोलो ना पापा मुझसे,
पापा कब आओगे ?
जानता हूं जीवन की इस सच्चाई को
कि आप कभी ना आओगे,
फिर भी आंखों में छिपे इस इंतज़ार को
क्या कभी ना ख़त्म करवाओगे?
सच बोलो ना पापा मुझसे ,
पापा कब आओगे?
भले ही आपको रोहित की कहानी कुछ खास न लगी हो लेकिन मैंने तय कर लिया है कि मैं भी उनकी तरह ही सड़क पर घायल पड़े किसी भी व्यक्ति को अनदेखा करके नहीं जाऊंगा। क्या आप नहीं चाहेंगे कि आपकी छोटी सी मदद से किसी परिवार की खुशियां बची रहें? सोचिएगा जरूर और अगर उचित लगे तो कुछ ऐसा ही करिएगा भी।

Thursday, 16 June 2016

क्या सच में 'भगवान' नहीं है? जवाब है यहां

कल फेसबुक पर एक पोस्ट देखी। इस ब्लॉग को पढ़ने से पहले यदि आप यहां क्लिक करके उस पोस्ट को पढ़ लेंगे तो इस ब्लॉग को लिखने का उद्देश्य समझ में आ जाएगा। वैसे उस फेसबुक पोस्ट को लिखने वाले महाशय का सार यह था कि 'भगवान' जैसी कोई शक्ति इस सृष्टि में नहीं है। अपने इस विषय को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने कुछ प्रश्न भी उठाए थे। तो मैंने सोचा कि उनकी जिज्ञासाओं का समाधान ब्लॉग के माध्यम से करूं। एक बात पहले ही स्पष्ट कर दूं कि मेरे 'भगवान' कोई क्षीर सागर में शेषनाग पर लेटे हुए पुरुष नहीं हैं बल्कि मेरे लिए भगवान का अर्थ है सकारात्मक ऊर्जा का एक अथाह सागर। चलिए, अब अपने विषय पर आते हैं।

यदि मैं यह मानता हूं कि इस दुनिया में अच्छाई है तो मुझे यह भी मानना होगा कि इस दुनिया में बुराई का भी अस्तित्व है। बहुत सीधा और सामान्य सा अन्तर है कि अच्छाई का प्रतिनिधित्व 'भगवान' और बुराई का प्रतिनिधित्व 'दानव' करते हैं। ये मात्र दो शक्तियां हैं। आगे बढ़ने से पहले एक छोटी सी कहानी है, उसे पढ़ लीजिए।

एक गांव में बहुत पुराना मंदिर हुआ करता था। उस मंदिर में एक वृद्ध पुजारी अपने परिवार के साथ रहता था। वह पुजारी सपरिवार पूरे दिन ईश्वर भक्ति में लीन रहता था। आस-पास के गरीब लोगों को दान में मिले अन्न से भरपेट भोजन कराने के पश्चात बचा हुआ भोजन अपने परिवार के साथ करता था। भगवान पर उसका अटूट विश्वास और श्रद्धा थी। स्वयं के कर्मों से वह संतुष्ट भी था।  एक बार गांव के समीप की नदी में बाढ़ आ गई। गांव के लोग गांव छोड़कर भागने लगे। जब नदी का पानी अपने विकराल रूप को धारण करने लगा तो पुजारी के परिवार के सदस्यों ने पुजारी से कहा कि आप भी हमारे साथ चलिए। लेकिन पुजारी ने यह कहकर मना कर दिया कि मुझे भगवान बचाने आएंगे। एक दिन और बीता। गांव में पानी बढ़ता ही जा रहा था लेकिन पुजारी, मंदिर छोड़ने को तैयार नहीं था। फिर उसी शाम एक गरीब आदमी जिसको वह पुजारी नियमित रूप से भोजन कराता था, पुजारी के पास आया और बोला कि पुजारी जी, हमारे साथ चलिए नहीं तो आज आपकी मृत्यु सुनिश्चित है, क्योंकि आज रात तक पूरा गांव डूब जाएगा। लेकिन पुजारी ने उसे भी यह कहकर मना कर दिया कि तुम जाओ, मुझे मेरे भगवान बचाने आएंगे। पुजारी के जवाब को सुनकर वह आदमी भी वहां से चला गया। रात हुई और पुजारी की मृत्यु हो गई। जब वह पुजारी स्वर्ग में पहुंचा तो उसने भगवान से कहा, 'मैंने तो आजीवन आपकी सेवा की, गरीबों की सेवा की, कभी किसी के साथ गलत नहीं किया तो फिर आप मुझे बचाने क्यों नहीं आए?' पुजारी के इस प्रश्न पर भगवान ने जवाब दिया कि वह व्यक्ति जो मृत्यु से पहले वाली शाम को तुम्हारे पास आया था, वह मैं ही तो था।

वैसे तो यह एक कहानी है लेकिन मेरा एक छोटा सा सवाल है कि इस पूरे घटनाक्रम को आप क्या कहेंगे? आप कुछ भी कहें, मैं तो इसे अन्धभक्ति कहूंगा। यजुर्वेद का सार है 'अहम् ब्रह्मास्मि' अर्थात् मैं ब्रह्म हूं या आत्मा ही ब्रह्म है यानी जीव ही ब्रह्म (जिसे आप भगवान कह रहे हैं) है। साथ ही सामवेद का कथन है 'तत्वमसि' अर्थात वह तुम हो। ब्रह्म यानी भगवान मैं और आप ही तो हैं। मेरे कुछ वामपंथी परिचित कहते हैं कि राम हुए होंगे लेकिन वह भगवान नहीं मात्र एक चरित्र थे। मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में एक चरित्र होता है, प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में एक विचार होता है। रही बात भगवान की तो भगवान जिसे मैं ईश्वर कहता हूं, उसका सीधी सा अर्थ है सद्चरित्र और दानव का अर्थ है दुश्चरित्र, इस सामान्य सी व्याख्या को समझने में क्या समस्या आती है यह मेरी समझ से परे है।

मेरी समझ के अनुरूप भगवान शब्द की व्याख्या कुछ इस प्रकार है-
भ = भूमि
अ = अग्नि
ग = गगन
वा = वायु
न = नीर

शाब्दिक आधार पर भगवान यानी पंच तत्वों से बना हुआ। हमारा अथवा किसी भी जीव का शरीर भी तो इन्हीं पंच तत्वों से निर्मित है। हम अपने कर्मों के आधार पर सकारात्मता अथवा नकारात्मकता की ओर जाते हैं। यदि सकारात्मकता को आधार बनाया तो कहा जा सकता है कि हम ईश्ववरीय गुणों की ओर जा रहे हैं और अगर नकारात्मकता को आधार बनाया तो उसे दानवी प्रवृत्ति वाली श्रेणी में माना जा सकता है। कर्म ही तो भारतीय संस्कृति का आधार रहा है। और इस कर्म के सिद्धान्त का सबसे बड़ा उदाहरण मेरे आराध्य श्रीराम हैं। जब तक वह अयोध्या में थे तब तक मात्र राजकुमार राम थे और जब वह वनवास से वापस आए तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कहलाए। 14 वर्षों के कर्मों के आधार पर ही वह मर्यादा पुरुषोत्तम बने। अब बात करते हैं उस पोस्ट की जो उस सकारात्मक शक्ति पर  प्रश्नचिन्ह लगाने का प्रयास कर रही है।

उस पोस्ट में लिखा गया कि अगर कण-कण में भगवान हैं तो कण-कण में भ्रष्टाचार क्यों है?
इस सवाल का जवाब यदि वह महाशय खुद से पूछ लेते तो शायद ज्यादा संतुष्टि मिलती। भ्रष्टाचार हम और आप करते हैं और जब तक हम यह करते रहेंगे या इसे स्वीकार करते रहेंगे तब तक नहीं कहा जा सकता कि कण-कण में भगवान हैं। भ्रष्टाचार तो एक नकारात्मक प्रवृत्ति है यानि जिस तथाकथित कण में भ्रष्टाचार है, वहां भगवान नहीं दानव वास करते हैं।

उन्होंने लिखा, 'लोग कहते हैं कि बगैर भगवान की मर्जी के पत्ता भी नहीं हिलता, तो क्या भगवान चोरी भी करवाता है? जब सब कुछ भगवान की मर्जी से होता है तो भगवान बलात्कार भी करवाता होगा ? डकैती भी डलवाता होगा? अगर यह सब भगवान ही करवाता है तो कितना निर्दयी है भगवान!'
बिलकुल सही लिखा है उन्होंने। ऐसे दुष्कर्म करने वाला निश्चित ही घोर निर्दयी है। लेकिन क्या ये कर्म भगवान के हैं। कुतर्क चाहे कुछ भी हो लेकिन जवाब नहीं ही है। क्योंकि इन नकारात्मक कर्मों को कोई सकारात्मक प्रवृत्ति वाला व्यक्ति आधार कैसे बना सकता है। जो ऐसे कर्म करे वह निश्चित ही दानवी प्रवृत्ति से प्रेरित है।

उन्होंने आगे लिखा, 'लोग कहते हैं कि भगवान गरीबों, मजलूमों, असहायों की रक्षा करता है। तो हिन्दुस्तान की आधे से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने के लिए मजबूर क्यों है? भगवान क्यों नहीं इन्हें अमीर बना देता? दुनिया में हर कहीं असहाय, मजलूम ही प्रताड़ित हो रहा है , भगवान क्यों नहीं इनकी मदद करता?' इसके अलावा भी उन्होंने कई सारे बेतुके प्रश्न उठाए हैं। इन प्रश्नों को पढ़कर ही पता लगता है कि उन्होंने भारतीय साहित्य को पढ़ने की और समझने की जरा सी भी कोशिश नहीं की। भगवान किसी को गरीब या अमीर नहीं बनाता। हमारे कर्म और हमारी व्यवस्था लोगों को अमीर-गरीब बनाती है। एसी कमरे में बैठकर मजलूमों के अधिकार की बातें अपने ऐपल आईफोन से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लिखने से गरीबी नहीं जाएगी। और ना ही इस गरीबी को दूर करने के लिए कोई अवतरित होगा। हमें अपनी व्यवस्थाओं में परिवर्तन लाना होगा। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ कुछ अच्छा करने का प्रयास करना होगा। इसके बाद जिसके साथ अच्छा करें, उससे पूछिएगा कि 'भगवान' जैसी कोई चीज है क्या? तो भले ही वह नास्तिक हो लेकिन उसका जवाब यही होगा, 'मेरे लिए तो भगवान आप ही हो।'

बस स्वयं में भगवान की मूल परिकल्पना को आत्मसात करने का प्रयास करिए, देखिएगा सच में अच्छा लगेगा। आपको भी और जिसके साथ अच्छा करेंगे उसको भी। मुझे लगता है कि 'भगवान' के इस रूप की स्वीकार्यता से किसी तथाकथित वामपंथी को आपत्ति नहीं होगी। और यदि अभी भी आपत्ति है तो विश्वास मानिए आप तर्कशीलता के निम्नतम स्तर पर पहुंच कर कुतर्क को ही तर्क समझने लगे हैं।

Tuesday, 14 June 2016

बीजेपी वाले मोदी को 'जुमलेबाज' साबित करके मानेंगे

कुछ दिन पहले काशी (वाराणसी) जाने की योजना बनी। मन काफी उत्साहित था कि अपने देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में जाने का अवसर मिल रहा है। उम्मीद थी कि बनारस की तस्वीर पहले से काफी बेहतर हो गई होगी। मेरे साथ मेरे दो अन्य मित्र भी थे। जब लखनऊ में रहा करता था तो हर 4-5 महीने में बनारस जाना होता था। वहां पर मेरे कुछ रिश्तेदार भी रहते हैं तो इस नाते रुकना भी उनके घर पर ही होता था। लेकिन 3 साल पहले दिल्ली आने के बाद से बनारस जाना नहीं हुआ।
लोकसभा चुनाव के दौरान जब यह पता लगा कि बीजेपी के पीएम प्रत्याशी बनारस से चुनाव लड़ने वाले हैं तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि अब बनारस की तस्वीर बदल जाएगी। बनारस और बनारस की संस्कृति को नजदीक से समझने के लिए हमने तय किया कि इस बार किसी रिश्तेदार के घर पर न रुक कर किसी गेस्ट हाऊस में रुकेंगे ताकि किसी तरह की बंदिशें न रहें। रेलवे स्टेशन पर उतरकर ऑटो से ऑनलाइन बुक किए गए गेस्ट हाऊस की ओर जैसे ही मैंने बढ़ना शुरू किया, मेरी उम्मीदें भी टूटने लगीं। मैं जो कुछ भी देख रहा था वह हैरान कर देने वाला था।  स्टेशन से कुछ ही दूरी पर नगर निगम का एक कूड़ाघर था, लेकिन कूड़ा उसके बाहर पड़ा हुआ था। एक गाय उस कूड़े में पड़ी पॉलीथीन खा रही थी लेकिन उसे रोकने वाला कोई नहीं था।
cow
प्रतीकात्मक तस्वीर।
यूपी में वैसे तो इस तरह के दृश्य सामान्य हैं लेकिन जिस पार्टी ने अपने चुनाव में गौ रक्षा को मुद्दा बनाया हो, जो पार्टी गौमांस निषेध के लिए कानून की मांग करती हो और जो पार्टी गाय को मां कहती हो, उस पार्टी के बैनर पर प्रधानमंत्री के सिंहासन पर काबिज हुए व्यक्ति के निर्वाचन क्षेत्र में मैं ऐसे दृश्यों की अपेक्षा नहीं करता था। हालांकि मैं यह नहीं मानता कि इस तरह के दृश्यों के लिए सीधे प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहरा देना ठीक होगा, लेकिन यदि उस क्षेत्र में पार्षद से लेकर मेयर तक सभी उस तथाकथित गौभक्त राजनीतिक दल के हों तो पार्टी की मूल विचारधारा तथा कार्यपद्धति में प्रदर्शित होने वाले अंतर पर एक सवाल तो बनता ही है। गाय को खाने की बात करने वालों को तो यह गौ भक्त पार्टी भारतीय संस्कृति का विरोधी करार देती है लेकिन जहां गाय की मौत को रोक सकती है वहां मूक दर्शक बनकर बैठी है।
खैर, यह एकमात्र विषय नहीं था जिससे काशी में मेरा मन दुखी हुआ। इसके अलावा भी काशी में कुछ ऐसा दिखा जिसकी मैंने कल्पना नहीं की थी। मेरा गेस्ट हाउस मणकर्णिका घाट के पास था। जो लोग वहां गए होंगे उनको पता होगा कि उस घाट पर जाने के किए एक पतली सी गली से लगभग 2 किमी पैदल जाना होता है। यह एक ऐसा घाट है जहां पर अंतिम संस्कार की अग्नि कभी ठंडी नहीं होती, पूरे देश से इस घाट पर अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए आते हैं।काशी लेकिन इस घाट पर जाने के लिए जो रास्ता है वह इतना बुरा है कि यदि बारिश हो जाए तो वहां से निकलना मुश्किल हो जाएगा। गंगा नदी में आज भी उसी तरह से शव (लाशें) बहकर आती हैं जैसे पहले आती थीं, अगर उनको रोकना संभव नहीं है तो गंगा संरक्षण मंत्रालय जैसी खानापूर्ती करने की क्या आवश्यकता है? दशाश्वमेध घाट और अस्सी घाट जैसे घाटों पर अच्छा काम हुआ है लेकिन क्या बनारस को उसके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार से दूर ले जाकर मात्र पर्यटन स्थल बनाना है।
काशी की आत्मा गलियों में बसती है, हर रोज कड़ी धूप में महामूरगंज रोड पर 2 किलोमीटर की दूरी तय करने में कम से कम 1 घंटा लगता है। क्या इस समस्या से समाधान की आवश्यकता नहीं है? जब पीएम मोदी जी जन-धन योजना लेकर आए तो मुझे व्यक्तिगत रूप से लगा कि अब हर एक व्यक्ति की पहुंच बैंक तक होगी। जब कोई नकारात्मक प्रवृत्ति वाला व्यक्ति मुझसे कहता था कि मोदी सरकार ने अब तक कुछ भी अच्छा किया है क्या? तो सबसे पहले मैं स्वच्छ भारत अभियान और जन-धन योजना का ही नाम लेता था क्योंकि मुझे लगता था कि इन दोनों का सीधा फायदा एक गांव में रहने वाले व्यक्ति को होगा। लेकिन आज अपनी काशी यात्रा के बाद मैं यह कह सकता हूं कि यह मेरा भ्रम था। आप कल्पना कर सकते हैं कि काशी, जहां मिनी पीएमओ बना हुआ है वहां पर 13 में से 12 एटीएम कैशलेस पड़े हुए हैं। ऐसे में एक सीधा सा और सामान्य सा सवाल है कि एक गरीब आदमी आखिर क्यों बैंक में अपना अकाउंट खुलवाए।
एक गरीब आदमी हर महीने किसी तरह से 500 रुपए बचाकर अकाउंट में जमा करता है कि अब तो एटीएम कार्ड है, कभी भी निकाल लूंगा, लेकिन जब उसका बेटा बीमार होता है तो उसे अपने 500 रुपए बनारस की सड़कों पर घूमते हुए एटीएम मशीन में कैश चेक करने में खर्च करने पड़ते है। वह सिर्फ 500 रुपए खर्च नहीं कर रहा होता है बल्कि अपने एक महीने की पूरी बचत खर्च कर रहा होता है। यह बात मैं किसी स्वकल्पित उदाहरण स्वरूप नहीं लिख रहा अपितु यह काशी के एक चाय वाले का अनुभव है। शायद मैं उसकी इस बात पर इतनी आसानी से विश्वास नहीं करता लेकिन मैंने खुद ऐसा ही कुछ झेला है तो ऐसे में संभव है कि लोगों के साथ इससे भी अधिक बुरा होता हो।
काशी को मोक्ष की नगरी माना जाता है। मैं यह भी मानता हूं कि देश के प्रधान के पास इतना समय नहीं होता कि वह मात्र अपने निर्वाचन क्षेत्र की चिंता करता रहे लेकिन क्या सांसद प्रतिनिधि, मिनी पीएमओ में काम करने वाले लोगों, मेयर, विधायकों और पार्षदों को इस बात का भान नहीं है कि पूरे विश्व से लोग इस जगह पर घूमने के लिए आते हैं। क्या यहां की व्यवस्था को देखकर उन देशी-विदेशी पर्यटकों के माध्यम से विश्व स्तर पर भारत के पीएम की इच्छा शक्ति के विषय में नकारात्मक संदेश नहीं जाता होगा? मुझे लगता है कि बीजेपी के कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों को इस सवाल पर चिंतन की आवश्यकता है। कहीं उनकी कामचोरी से हमारे पीएम सच में ‘जुमलेबाज’ न साबित हो जाएं।

Saturday, 28 May 2016

यूं ही नहीं कोई 'सावरकर' बन जाता है

आज 133 साल पूरे हो गए, एक हुतात्मा ने आज ही के दिन इस भारतभूमि पर जन्म लिया था। सावरकर, क्या था इस शब्द में? कुछ भी नहीं, लेकिन इस शब्द को जिस रूप में हम जान रहे हैं, वह महत्वपूर्ण विषय है। वह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने साम्राज्यवाद के रथ पर काबिज होकर चलने वाले अंग्रेजों की क्रूरता की पराकाष्ठा झेली और फिर उस भारत को भी देखा जो जाति भेद की आग में जल रहा था। उनको पढ़कर बहुत सी ऐसी बातें समझीं जो यह प्रमाणित करती हैं कि उस दौर में ‘उनसे’ बेहतर विचार नहीं हो सकते थे।
विनायक दामोदर सावरकर का नाम कुछ समय पहले सुर्खियों में छाया हुआ था। भारत में एक नई परंपरा शुरू हो गई है जिसके आधार पर राजनीतिक पार्टियां क्रांतिकारियों और महापुरुषों को अपनी सुविधानुसार बांट लेती हैं और फिर उनके नाम पर जी भरकर राजनीति करती हैं।vir कोई पार्टी स्वयं को सावरकर हितैषी बताकर उनके लिए भारत रत्न की मांग करती है तो कोई सावरकर को गद्दार बना देती है। इन दोनों ही विचार परिवारों के समर्थक इस बात पर जी जान लगाकर बहस करते हैं कि सावरकर देशभक्त थे अथवा गद्दार, सावरकर को भारत रत्न मिलना चाहिए अथवा नहीं। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि कोई महापुरुष अथवा क्रांतिकारी किसी ‘दल’ विशेष का नहीं होता और महापुरुष वही होता है जो सामान्य व्यक्ति से बेहतर तरीके से समाज के प्रति स्वयं को समर्पित करे। हो सकता है उस ‘महापुरुष’ की विचारधारा हमसे 100 प्रतिशत ना मिलती हो, लेकिन क्या ऐसे में आप उससे 100 प्रतिशत असहमत हो सकते हैं?
आपका तर्क कुछ भी हो लेकिन इसका जवाब ‘नहीं’ में ही मिलेगा। समाज के विषय में सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में एक विशिष्ट विचार है। यदि आप किसी विचार से 100 प्रतिशत असहमत हैं तो इसका साफ तौर पर मतलब है कि आप उसका विरोध अज्ञानतावश अथवा द्वेषवश कर रहे हैं, और यदि आप किसी से 100 प्रतिशत सहमत होने का दावा कर रहे हैं तो इसका भी अर्थ यही है कि या तो आप अज्ञानी हैं अथवा अंधभक्त हैं। अब बात करते हैं कि आखिर आज क्यों विनायक दामोदर सावरकर जैसे दिव्य पुरुष के विषय में चिंतन करने की आवश्यकता महसूस हो रही है लेकिन उससे पहले राष्ट्रवाद के प्रखर हस्ताक्षर, अटल बिहारी वाजपेयी जी ने सावरकर की जो व्याख्या की है उसके एक अंश को समझते हैं-
अटल जी ने सावरकर का अर्थ तेज, त्याग, तप, तारुण्य, तथ्य, तर्क, तीर, तलवार और तिलमिलाहट जैसे शब्दों को बताया है। संभव है कि आप कहें कि ये सब तो एक ‘संघी’ या भाजपाई प्रधानमंत्री ने कहा था।atalलेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है जिसे मैं मानकर चलता हूं। सावरकर की व्याख्या करने वाला व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का सदस्य था इसलिए उसकी बात मान लें, यह उचित नहीं है। अटल जी को मैं एक नेता नहीं बल्कि एक लेखक, एक संपादक तथा एक पत्रकार के रूप में पसंद करता हूं। एक प्रधानमंत्री के रूप में उनकी कुछ नीतियां मुझे पसंद नहीं थीं लेकिन इसके लिए राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन जैसे समाचार पत्रों/ पत्रिकाओं के आधारभूत स्तंभ रहे व्यक्ति को नकार दिया जाए तो निश्चित ही गलत होगा। क्योंकि उस दौर में इन पत्रों में किसी बीजेपी नेता अथवा किसी स्वयंसेवक की कंपनी की ओर से विज्ञापन नहीं आते थे। इसलिए अटल जी जैसे व्यक्तित्व द्वारा सावरकर की व्याख्या को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए।
एक राजनीतिक दल यह आरोप लगाता है कि पोर्ट ब्लेयर (अंडमान द्वीप) जेल से अपनी ‘काले पानी’ की सजा से रिहाई के लिए अंग्रेजों से क्षमा याचना की थी। हो सकता है ऐसा हो, लेकिन क्या ऐसा करने का उद्देश्य यह नहीं हो सकता कि सावरकर ने भी वही सोचा हो जो एक समय श्रीकृष्ण ने सोचा था, जिसकी वजह से वह रणछोड़ कहलाए।savarkar परिस्थिति का विवेचन एक सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ करें तो पाएंगे कि अपने-अपने समय में इन व्यक्तित्वों ने जो निर्णय लिए वे एकमात्र विकल्प थे। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं इसका एक कारण है, यदि हम स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान की सोच को उस दौर के क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ कर समझने का प्रयास करेंगे तो सामने आएगा कि उस दौर के अधिकतर क्रांतिकारी जान देने के पक्ष में नहीं थे। इसका कारण यह नहीं था कि वह जान देने से डरते थे, बल्कि इसका कारण यह था कि उनको पता था कि देश की स्वतंत्रता के लिए जीवित रहकर संघर्ष करना अतिआवश्यक है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के बीच का अंसेबली में बम फेंकने से पहले का संवाद है।
शहीद भगत सिंह से जुड़े साहित्य को पढ़ने पर पता लगता है कि जब भगत सिंह ने सांडर्स को मारकर लालाजी की मौत का बदला लेने के बाद असेंबली में बम फेंकने का निर्णय लिया तब चंद्रशेखर आजाद ने पूरी योजना तैयार की कि किसी तरह और किन रास्तों से बम विस्फोट करने के बाद निकालकर भागा जा सकता है। उन्होंने यह योजना भगत सिंह को बताई लेकिन भगत सिंह ने इस पर अमल करने से साफ तौर से मना कर दिया। भगत सिंह गिरफ्तार होना चाहते थे। इस मुद्दे पर आजाद से भगत सिंह की गर्मागर्म बहस भी हुई। भगत सिंह का कहना था, ‘हम असेंबली में बम किसी की जान लेने के लिए नहीं फेंकने वाले हैं। हमारा उद्देश्य है, लोगों को जगाना और उस उद्देश्य को मैं गिरफ्तार होकर ज्यादा बेहतर तरीके से पूरा कर सकता हूं। केस चलेगा, जिरह होगी और उस जिरह हमें अपनी बात देशवासियों तक पहुंचाने का मौका मिलेगा।’
इस पर आज़ाद का कहना था कि केस का मतलब होगा मौत की सजा। इसके बाद भगत सिंह ने आजाद से कहा, ‘मैं जान देने के लिए ही गिरफ्तार होना चाहता हूं, मैं जीवित रहकर आजादी के आंदोलन में उतना योगदान नहीं दे पाऊंगा जितना मरकर दे सकता हूं।’ भगत सिंह बोले, ‘मेरी मौत कई भगत सिंह पैदा कर देगी।’ दोनों महान क्रांतिकारियों के बीच लंबी बहस हुई लेकिन भगतसिंह अपनी जिद के पक्के थे। आखिरकार आजाद को उनके आगे हार माननी पड़ी। फिर वही हुआ जो भगतसिंह चाहते थे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़े व्यक्ति द्वारा जीवन को व्यर्थ नष्ट कर देने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। भगत सिंह तथा उनके साथी क्रांतिकारियों का उद्देश्य साफ था कि उनकी मौत एक नए आंदोलन को खड़ा करेगी लेकिन सभी क्रांतिकारी सिर्फ अपनी जान कुर्बान कर देते तो शायद आज हम स्वतंत्र देश में सांस नहीं ले रहे होते।  कुछ ऐसे ही विचार विनायक दामोदर सावरकर के भी बन गए थे। और यह विचार क्यों बने होंगे, इस बात का अंदाजा आप तब तक नहीं लगा सकते जब तक उस दौर की स्थितियों के विषय में अध्ययन न कर लें।
10 मई, 1907 को सावरकर ने इंडिया हाउस, लन्दन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाई। इस अवसर पर विनायक सावरकर ने अपने ओजस्वी भाषण में प्रमाणों सहित 1857 के संग्राम को गदर नहीं, अपितु भारत के स्वातन्त्र्य का प्रथम संग्राम सिद्ध किया। सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का ‘स्वाधीनता संग्राम’ बताते हुए लगभग एक हजार पृष्ठों का इतिहास लिखा। जून 1908 में तैयार हो चुकी पुस्तक ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857’ में सावरकर ने इस लड़ाई को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आजादी की पहली लड़ाई घोषित किया था। इस पुस्तक से भारत में भगत सिंह सहित कई लोगों ने प्रेरणा ली।
हो सकता है कि अब कोई यह तर्क दे कि भगत सिंह तो सावरकर के हिंदुत्व के विरोधी थे। बिलकुल थे, क्योंकि उन्होंने सावरकर के हिंदुत्व को समझा नहीं था। जब सावरकर की पुस्तक भारत में कोहराम मचा रही थी तब भगत सिंह अपने शैशव काल में थे और सावरकर उस दौर में अंग्रेजों के गढ़ में रहकर मां भारती के चरणों की जंजीरों को तोड़ने के लिए प्रयास कर रहे थे। इसे आयु आधारित अनुभव कहें तो गलत न होगा। आगे जिस रूप में भगत सिंह ने सावरकर के हिंदुत्व को समझा, अगर मैं भी वैसा ही मान लूं तो मैं भी विरोध करूंगा लेकिन वास्तविकता यह है कि सावरकर के हिंदुत्व की व्यापकता उतनी सीमित नहीं जितना प्रचारित की गई।gandhi यह बिलकुल वैसा ही था जैसे एक 13-14 साल का छोटा सा बच्चा गांधी- गांधी करते हुए एक बुजुर्ग नेता के पीछे घूमता रहता है और फिर जब वह नेता अहिंसा के नाम पर अपने आंदोलन को वापस लेने की घोषणा करता है तो बच्चा उस नेता के रास्ते को नकार कर उसके विपरीत सिद्धांत आधारित रास्ते का चुनाव कर लेता है। इस विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि महात्मा गांधी ने अपने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को वापस लेकर कुछ गलत किया था। इसी आधार पर सावरकर को भी सिर्फ एक व्यक्ति के दृष्टिकोण के चलते गलत नहीं माना जा सकता।
आइए, सावरकर से जुड़े कुछ विषयों का विश्लेषण करते हैं:
क्या बंगाल विभाजन के दौरान 1905 में पुणे में अभिनव भारत संगठन द्वारा विदेशी कपड़ों की होली जलाना कोई सामान्य कदम था, उस समय जब हम गुलाम थे और सोशल मीडिया जैसी कोई चीज नहीं होती थी।
क्या यह झूठ है कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सावरकर की योग्यता, क्षमता और प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें छात्रवृत्ति दी थी।
क्या यह भी झूठ है कि भगत सिंह, राजाराम शास्त्री से कहा करते थे मुझे सावरकर जी के जीवन प्रसंगों, जैसे लंदन में रहते हुए मदनलाल ढींगरा को क्रांति की ओर प्रेरित करना, गिरफ्तारी के दौरान भारत लाए जाते समय जहाज से समुद्र में कूद पड़ऩा आदि ने बहुत प्रभावित किया है। (काशी विद्यापीठ के युवा राजाराम शास्त्री को लाला लाजपतराय जी ने द्वारका दास पुस्तकालय का प्रबंधक मनोनीत किया था। भगत सिंह से राजाराम के मैत्रीपूर्ण संबंध बन गये थे। राजाराम शास्त्री ने कई जगह अपने और भगत सिंह के संवाद का जिक्र किया है।)
क्या यह भी झूठ है कि सावरकर की प्रेरणा से ही जर्मनी में संपन्न होने वाली इंटरनैशनल सोशलिस्ट कांग्रेस में सरदार सिंह राणा और श्रीमती भीखाजी ने भारत का प्रतिनिधि बनकर वन्दे मातरम् लिखित ध्वज को फहराया।
क्या यह भी झूठ है कि वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दो आजीवन कारावास की सजा पाने वाले एकमात्र क्रांतिकारी हैं।
क्या यह भी झूठ है कि सावरकर ने अंडमान जेल में रहते हुए, अंग्रेजों के कानूनों के जाल में उनको ही फंसाकर कैदियों को सामान्य सुविधाएं उपलब्ध कराई थीं।
क्या यह भी झूठ है कि ‘सवर्ण’ होते हुए भी दलितों को सम्मान दिलाने के लिए उन्होंने रत्नागिरी में प्रथम प्रयास किया।
क्या यह भी झूठ है कि अस्पृश्यता निवारण के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करते हुए सावरकर ने अपने ब्राह्मणत्व कर्म का प्रतिपालन किया।
क्या यह भी झूठ है कि ‘भाषा शुद्धि’ यानी हिंदी तथा देवनागरी के संरक्षण हेतु उन्होंने प्रयास किए।
क्या यह भी झूठ है कि सुभाष चन्द्र बोस को रासबिहारी बोस के उस पत्र से आजाद हिंद फौज बनाने की प्रेरणा मिली जो उन्होंने विनायक दामोदर सावरकर को लिखा था।
ऐसे बहुत सारे विषय हैं जो अटल जी द्वारा की गई सावरकर की व्याख्या को प्रमाणित करते हैं। स्वातंत्र्य वीर विनायक सावरकर के सिद्धांतों की वर्तमान समाज में एक विशिष्ट प्रासंगिकता इसलिए भी है क्योंकि आज भी कानूनों के आधार पर देश के प्रधान की तस्वीर के साथ छेड़छाड़ करने वाले को जेल हो जाती है और भारत की बर्बादी के नारे लगाने वाले जेल के सीकचों से बाहर ही रहते हैं। उन सिद्धांतों की प्रासंगिकता इसलिए भी है क्योंकि हमारे गांवों में आज भी ‘बिछड़े जनों’ को स्वयं से अलग ही समझा जाता है।
मेरा मानना है कि रानी लक्ष्मीबाई हों या रानी चेन्नमा, चन्द्रशेखर आजाद हों या भगत सिंह, अशफाक उल्ला खां हों या बहादुर शाह जफर, जवाहर लाल नेहरू हों या महात्मा गांधी, सभी ने अपने स्तर पर कुछ ना कुछ तो अच्छा किया है। जो अच्छा है, जो सकारात्मक है, जो अनुकरणीय है, उसे आत्मसात करने अथवा उसकी प्रशंसा करने में क्या बुराई है? हिंदुत्व शब्द से परेशानी है तो स्पष्ट समझ लें कि ‘श्रीराम को पूजना हिंदुत्व नहीं बल्कि श्रीराम को आत्मसात करना हिंदुत्व है।’

Tuesday, 10 May 2016

यादों में, 1857 की क्रांति और वे वीरांगनाएं!

10 मई 1857, मुझे यकीन है कि आपको याद आ गया होगा कि इस दिन क्या हुआ था। यही वह दिन था जब सैकड़ों सालों की गुलामी सहने वाला भारत का स्वाभिमान एक बार फिर जाग उठा था। अंग्रेजों की नीतियों से आजादी के लिए प्रत्येक वर्ग को लड़ने की प्रेरणा देने वाली क्रांति, इसी दिन शुरू हुई थी। यह भारत में महाभारत के बाद लड़ा गया सबसे बड़ा युद्ध था। इस संग्राम की मूल प्रेरणा स्वधर्म की रक्षा के लिए स्वराज की स्थापना करना था।
यह स्वाधीनता हमें बिना संघर्ष, बिना खड़ग-ढाल के नहीं मिली है अपितु लाखों हुतात्माओं द्वारा इस महायज्ञ में स्वयं की आहुति देने से मिली है। एसी कमरों में बैठकर, सब्सिडी वाली शराब पीकर ‘भारत में आजादी’ की मांग करना बहुत आसान लगता है लेकिन जो हमारे पास आज है, उसके लिए हमारे पूर्वजों ने क्या-क्या किया है, इसे महसूस करना संभव नहीं। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान मेरे गुरुदेव श्री राकेश योगी कहते थे कि आजाद भारत में जन्म लेने वाले लोग समझ ही नहीं सकते कि गुलामी क्या होती है। उस गुलामी को न मैं महसूस कर सकता हूं और ना ही आप, लेकिन हम इतना जरूर कर सकते हैं कि अपने पूर्वजों के संघर्ष का सम्मान करें।
1857
भारत में नारी को हमेशा देवी की संज्ञा दी गई है। जब आवश्यकता पड़ी तो उसने ज्ञान की प्रतिमूर्ति बनकर स्वरों से देश को एक नई दिशा दी और जब अवसर आया तो उसी नारी ने शक्ति स्वरूपा चंडी का भी रूप धारण कर अदम्य शक्ति का लोहा मनवाया। ‘शासन और समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं’ जैसी पुरुषवादी धारणाओं को ध्वस्त करती भारतीय वीरांगनाओं का जिक्र किए बिना संपूर्ण स्वाधीनता आंदोलन की दास्तान अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए। आज जब महिला सशक्तिकरण और महिला ‘स्वतंत्रता’ की बातें हो रही हैं, ऐसे समय में मैं आपको इस ब्लॉग के माध्यम से 1857 की क्रांति से संबन्धित 6 ऐसी महिलाओं की याद दिलाऊंगा जिन्होंने उस दौर में भी राष्ट्र को सर्वोपरि माना।
लज्जो– बहुत ही कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि बैरकपुर में मंगल पांडे को चर्बी लगे कारतूसों के बारे में सबसे पहले मातादीन ने बताया और मातादीन को इसकी जानकारी उसकी पत्नी लज्जो ने दी। लज्जो, अंग्रेज अफसरों के घर पर काम करती थी और वहीं पर उसे यह सुराग मिला कि अंग्रेज गाय और सुअर की चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने जा रहे हैं।
hazrat-mahalबेगम हजरत महल– लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया। अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेजी सेना का स्वयं मुकाबला किया। उनकी अभूतपूर्व संगठन क्षमता के कारण ही अवध के जमींदार, किसान और सैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे। आलमबाग की लड़ाई के दौरान अपने जांबाज सिपाहियों की उन्होंने भरपूर हौसला अफजाई की और हाथी पर सवार होकर अपने सैनिकों के साथ दिन-रात युद्ध करती रहीं। लखनऊ में पराजय के बाद वह अवध के देहातों मे चली गईं और वहां भी क्रांति की चिंगारी सुलगाई।
zeenat
बेगम जीनत महल– मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की बेगम जीनत महल ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में स्वातंत्र्य योद्धाओं को संगठित कर अभूतपूर्व देश प्रेम का परिचय दिया। सन् 1857 की क्रांति के लिए बहादुरशाह जफर को प्रोत्साहित करने का काम उन्होंने ही किया था। बेगम जीनत महल ने ललकारते हुए कहा था, ‘यह समय गजलें कह कर दिल बहलाने का नहीं है, बिठूर से नाना साहब का पैगाम लेकर देशभक्त सैनिक आए हैं, आज सारे हिन्दुस्तान की आंखें दिल्ली तथा आप पर लगी हैं, खानदान-ए-मुगलिया का खून हिन्द को गुलाम होने देगा तो इतिहास उसे कभी क्षमा नहीं करेगा।’
हैदरीबाई– लखनऊ की तवायफ हैदरीबाई के यहां तमाम अंग्रेज अफसर आते थे और कई बार क्रांतिकारियों के खिलाफ योजनाओं पर बात किया करते थे। हैदरीबाई ने पेशे से परे अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए इन महत्वपूर्ण सूचनाओं को क्रांतिकारियों तक पहुंचाया और बाद में वह भी रहीमी के नेतृत्व में बनाए गए बेगम हजरत महल के महिला सैनिक दल में शामिल हो गईं।
Uda-Devi
ऊदा देवी– ऊदा देवी ने पीपल के घने पेड़ पर छिपकर लगभग 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। अंग्रेज असमंजस में पड़ गए और जब हलचल होने पर कैप्टन वेल्स ने पेड़ पर गोली चलाई तो ऊपर से एक मानवाकृति गिरी। नीचे गिरने से उसकी लाल जैकेट का ऊपरी हिस्सा खुल गया, जिससे पता चला कि वह महिला है। ऊदा देवी का जिक्र वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार अमृतलाल नागर ने अपनी कृति ‘गदर के फूल’ में भी किया है। यह भी माना जाता है कि क्रिस्टोफर हिबर्ट ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट म्यूटिनी’ में लखनऊ स्थित सिकन्दरबाग किले पर हमले के दौरान जिस वीरांगना के अदम्य साहस का वर्णन किया है, वह ऊदा देवी ही थीं।
JHALKARI---3-FINAL
झलकारीबाई– झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की ‘दुर्गा दल’ नामक एक अलग टुकड़ी बनाई थी। इस दल की पूरी जिम्मेदारी कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई के हाथों में थी। झलकारीबाई ने कसम खाई थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं श्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊंगी। अंग्रेजों ने जब झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई पूरे जोश के साथ लड़ीं और शहीद हो गईं।
ऐसा नहीं है कि उस क्रांति में सिर्फ इन्हीं महिलाओं का योगदान था। इनके अतरिक्त भी हजारों ऐसी महिलाएं थीं जिन्होंने देशप्रेम में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया लेकिन मुझे पता है कि सभी को अपनी स्मृति में रख पाना संभव नहीं होता। इसलिए कुछ नाम जो उस क्रांति के बारे में पढ़ते समय मेरी स्मृति में रहे, उन्हें आपसे साझा कर रहा हूं। भले ही ये लड़ाईयां भारतीय महिलाओं ने न जीती हों लेकिन उनके अदम्य शौर्य और साहस को नमन करना तो बनता ही है। और वैसे भी युद्ध में जय-पराजय इस बात से तय नहीं होती कि अंत में किसने-किसको पराजित किया बल्कि इस बात से तय होती है कि स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा के नाम पर लड़ने वाले सैनिकों ने गोली पीठ पर खाई है या सीने पर।
आज 159 साल हो गए उस क्रांति को, माना कि लंबा समय हो गया है लेकिन संपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन की आधारशिला तैयार करने वाली उस यशस्वी क्रांति को पूरी तरह से भूल जाना उचित नहीं होगा। आइए, नमन करें उन्हें जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की नींव तैयार करते हुए धर्म, जाति, लिंग, वर्ग, वर्ण, श्रेणी इत्यादि से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि माना। याद रखिए, वे कोई और नहीं थे बल्कि हमारे और आपके परिवारों के लोग ही थे।
1857 की क्रांति को शुरू करने वाले तथा उसे अंजाम तक पहुंचाने वाले इतिहास के पृष्ठों में गुम हो चुके प्रत्येक क्रांतिपुरोधा को वंदन।

इसे नहीं पढ़ा तो कुछ नहीं पढ़ा

मैं भी कहता हूं, भारत में असहिष्णुता है

9 फरवरी 2016, याद है क्या हुआ था उस दिन? देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में भारत की बर्बादी और अफजल के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने ज...